लेख-
बीस वर्षों में बदलती शिक्षा व्यवस्था की पड़ताल
कभी शिक्षा को समाज निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता था। गुरु-शिष्य परंपरा से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, संस्कार और राष्ट्र निर्माण था। लेकिन पिछले दो दशकों में शिक्षा के स्वरूप में ऐसा परिवर्तन आया है कि आज अक्सर यह सवाल पूछा जाने लगा है ‘क्या शिक्षा सेवा है या व्यवसाय?’, यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेश ने अभूतपूर्व विस्तार किया है, वहीं बढ़ती फीस, फर्जी संस्थानों, प्रवेश घोटालों और परीक्षा-पत्र लीक जैसी घटनाओं ने व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाए हैं।
साल 2005 के बाद भारत में निजी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी। उच्च शिक्षा में आज अधिकांश नामांकन निजी संस्थानों में होता है। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, चिकित्सा, नर्सिंग, फार्मेसी और व्यावसायिक शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथों में है। सरकार की सीमित क्षमता और बढ़ती मांग के बीच निजी निवेश ने लाखों विद्यार्थियों को अवसर उपलब्ध कराए। आधुनिक प्रयोगशालाएँ, डिजिटल कक्षाएँ, उद्योग आधारित पाठ्यक्रम और बेहतर आधारभूत सुविधाएँ निजी संस्थानों की बड़ी उपलब्धियाँ मानी जाती हैं। लेकिन इसी दौर में शिक्षा के बाजारीकरण की आलोचना भी तेज हुई। कई निजी संस्थानों पर मनमानी फीस वसूलने, शिक्षकों को कम वेतन देने, प्लेसमेंट के बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने और गुणवत्ता से समझौता करने के आरोप लगे। अनेक राज्यों में अभिभावकों ने फीस वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन किए और सरकारों को फीस नियमन संबंधी कानून बनाने पड़े।
घटनाक्रम जिन्होंने व्यवस्था पर सवाल खड़े किए
पिछले बीस वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था की साख को प्रभावित किया-
वर्ष 2009 में लागू शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम ने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया। इससे शिक्षा का दायरा बढ़ा, लेकिन निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच गुणवत्ता की बहस भी तेज हुई।
वर्ष 2010-2015 के दौरान देश के अनेक राज्यों में फर्जी विश्वविद्यालयों और बिना मान्यता वाले संस्थानों के मामले सामने आए। समय-समय पर नियामक संस्थाओं ने ऐसे संस्थानों की सूची जारी कर विद्यार्थियों को सतर्क किया।
वर्ष 2016 में निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश और शुल्क व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हुई। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से नीट को एक समान प्रवेश परीक्षा के रूप में लागू किया गया। इससे कई अनियमितताओं पर अंकुश लगा, हालांकि नई चुनौतियाँ भी सामने आईं।
वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। ऑनलाइन शिक्षा सामान्य हो गई। निजी संस्थानों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी ने डिजिटल असमानता को उजागर कर दिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 लागू हुई, जिसने बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और लचीले पाठ्यक्रम की नई दिशा दी।
वर्ष 2023 और 2024 में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और विशेष रूप से नीट-यूजी 2024 और 2026 को लेकर उठे विवाद ने देशभर में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। लाखों छात्र और अभिभावक सड़कों पर उतरे। अदालतों तक मामले पहुँचे और सरकार को परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़े। यह स्पष्ट हुआ कि केवल संस्थान ही नहीं, बल्कि परीक्षा संचालन और नियामक तंत्र की मजबूती भी उतनी ही आवश्यक है।
निजी क्षेत्र का योगदान भी कम नहीं
यदि केवल नकारात्मक पक्ष देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रहेगी। देश के अनेक निजी विश्वविद्यालय और संस्थान शोध, नवाचार, स्टार्टअप संस्कृति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और उद्योग आधारित शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। कई निजी संस्थानों ने विदेशी विश्वविद्यालयों से समझौते किए, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएँ स्थापित कीं और विद्यार्थियों को वैश्विक अवसर उपलब्ध कराए। यही कारण है कि लाखों विद्यार्थी आज भी निजी संस्थानों को प्राथमिकता देते हैं।
फिर समस्या कहाँ है?
समस्या तब उत्पन्न होती है जब शिक्षा का उद्देश्य केवल लाभ कमाना रह जाता है। कई संस्थानों में शिक्षकों को अनुबंध पर कम वेतन पर रखा जाता है, जबकि विद्यार्थियों से लाखों रुपये फीस ली जाती है। कुछ संस्थानों में शोध केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। दूसरी ओर सरकारी संस्थानों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, रिक्त पद, धीमी नियुक्तियाँ और प्रशासनिक जटिलताएँ भी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। इसलिए दोष केवल किसी एक पक्ष का नहीं है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
प्रो. कृष्ण कुमार, पूर्व निदेशक, एनसीईआरटी, का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। उनके अनुसार यदि शिक्षा केवल बाजार की मांग के अनुसार ढल जाएगी तो उसका मानवीय पक्ष कमजोर पड़ जाएगा। शिक्षाविद् प्रो. अनिल सदगोपाल लंबे समय से शिक्षा के बढ़ते निजीकरण पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा को सामाजिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि केवल आर्थिक गतिविधि के रूप में। उनके अनुसार गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् प्रो. वाई. एस. राजन का मत था कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो नवाचार, अनुसंधान और रोजगार तीनों के बीच संतुलन स्थापित करे। केवल डिग्री आधारित शिक्षा देश को आगे नहीं ले जा सकती।
जिम्मेदार कौन?
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक संस्था या वर्ग में नहीं मिलता। सरकारों ने पर्याप्त सार्वजनिक निवेश नहीं किया, नियामक संस्थाएँ कई बार समय पर कार्रवाई नहीं कर सकीं, कुछ निजी संस्थानों ने शिक्षा को लाभ का माध्यम बना दिया और समाज ने भी कई बार केवल चमकदार परिसर और ऊँची फीस को गुणवत्ता का पर्याय मान लिया। परिणामस्वरूप शिक्षा का मूल उद्देश्य धीरे-धीरे पीछे छूटता गया।
आगे का रास्ता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने सुधार की दिशा अवश्य दिखाई है, लेकिन केवल नीति पर्याप्त नहीं होगी। नियमन में पारदर्शिता, शिक्षकों का सम्मानजनक वेतन, शोध को प्रोत्साहन, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, फर्जी संस्थानों पर कठोर कार्रवाई और फीस में संतुलन जैसे कदम समान रूप से आवश्यक हैं। शिक्षा को सेवा और उत्तरदायित्व दोनों के रूप में देखने की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने की है कि यदि शिक्षा केवल बाजार की वस्तु बन गई तो सबसे बड़ा नुकसान राष्ट्र के भविष्य का होगा। निजी क्षेत्र की ऊर्जा, सरकारी उत्तरदायित्व और समाज की अपेक्षाओं, इन तीनों के संतुलन से ही ऐसी शिक्षा व्यवस्था बन सकती है जो डिग्री ही नहीं, चरित्र, कौशल और नागरिकता भी गढ़े। यही भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
कभी शिक्षा को समाज निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता था। गुरु-शिष्य परंपरा से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, संस्कार और राष्ट्र निर्माण था। लेकिन पिछले दो दशकों में शिक्षा के स्वरूप में ऐसा परिवर्तन आया है कि आज अक्सर यह सवाल पूछा जाने लगा है ‘क्या शिक्षा सेवा है या व्यवसाय?’, यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेश ने अभूतपूर्व विस्तार किया है, वहीं बढ़ती फीस, फर्जी संस्थानों, प्रवेश घोटालों और परीक्षा-पत्र लीक जैसी घटनाओं ने व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाए हैं।
साल 2005 के बाद भारत में निजी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी। उच्च शिक्षा में आज अधिकांश नामांकन निजी संस्थानों में होता है। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, चिकित्सा, नर्सिंग, फार्मेसी और व्यावसायिक शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथों में है। सरकार की सीमित क्षमता और बढ़ती मांग के बीच निजी निवेश ने लाखों विद्यार्थियों को अवसर उपलब्ध कराए। आधुनिक प्रयोगशालाएँ, डिजिटल कक्षाएँ, उद्योग आधारित पाठ्यक्रम और बेहतर आधारभूत सुविधाएँ निजी संस्थानों की बड़ी उपलब्धियाँ मानी जाती हैं। लेकिन इसी दौर में शिक्षा के बाजारीकरण की आलोचना भी तेज हुई। कई निजी संस्थानों पर मनमानी फीस वसूलने, शिक्षकों को कम वेतन देने, प्लेसमेंट के बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने और गुणवत्ता से समझौता करने के आरोप लगे। अनेक राज्यों में अभिभावकों ने फीस वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन किए और सरकारों को फीस नियमन संबंधी कानून बनाने पड़े।
घटनाक्रम जिन्होंने व्यवस्था पर सवाल खड़े किए
पिछले बीस वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था की साख को प्रभावित किया-
वर्ष 2009 में लागू शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम ने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया। इससे शिक्षा का दायरा बढ़ा, लेकिन निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच गुणवत्ता की बहस भी तेज हुई।
वर्ष 2010-2015 के दौरान देश के अनेक राज्यों में फर्जी विश्वविद्यालयों और बिना मान्यता वाले संस्थानों के मामले सामने आए। समय-समय पर नियामक संस्थाओं ने ऐसे संस्थानों की सूची जारी कर विद्यार्थियों को सतर्क किया।
वर्ष 2016 में निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश और शुल्क व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हुई। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से नीट को एक समान प्रवेश परीक्षा के रूप में लागू किया गया। इससे कई अनियमितताओं पर अंकुश लगा, हालांकि नई चुनौतियाँ भी सामने आईं।
वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। ऑनलाइन शिक्षा सामान्य हो गई। निजी संस्थानों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी ने डिजिटल असमानता को उजागर कर दिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 लागू हुई, जिसने बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और लचीले पाठ्यक्रम की नई दिशा दी।
वर्ष 2023 और 2024 में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और विशेष रूप से नीट-यूजी 2024 और 2026 को लेकर उठे विवाद ने देशभर में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। लाखों छात्र और अभिभावक सड़कों पर उतरे। अदालतों तक मामले पहुँचे और सरकार को परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़े। यह स्पष्ट हुआ कि केवल संस्थान ही नहीं, बल्कि परीक्षा संचालन और नियामक तंत्र की मजबूती भी उतनी ही आवश्यक है।
निजी क्षेत्र का योगदान भी कम नहीं
यदि केवल नकारात्मक पक्ष देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रहेगी। देश के अनेक निजी विश्वविद्यालय और संस्थान शोध, नवाचार, स्टार्टअप संस्कृति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और उद्योग आधारित शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। कई निजी संस्थानों ने विदेशी विश्वविद्यालयों से समझौते किए, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएँ स्थापित कीं और विद्यार्थियों को वैश्विक अवसर उपलब्ध कराए। यही कारण है कि लाखों विद्यार्थी आज भी निजी संस्थानों को प्राथमिकता देते हैं।
फिर समस्या कहाँ है?
समस्या तब उत्पन्न होती है जब शिक्षा का उद्देश्य केवल लाभ कमाना रह जाता है। कई संस्थानों में शिक्षकों को अनुबंध पर कम वेतन पर रखा जाता है, जबकि विद्यार्थियों से लाखों रुपये फीस ली जाती है। कुछ संस्थानों में शोध केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। दूसरी ओर सरकारी संस्थानों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, रिक्त पद, धीमी नियुक्तियाँ और प्रशासनिक जटिलताएँ भी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। इसलिए दोष केवल किसी एक पक्ष का नहीं है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
प्रो. कृष्ण कुमार, पूर्व निदेशक, एनसीईआरटी, का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। उनके अनुसार यदि शिक्षा केवल बाजार की मांग के अनुसार ढल जाएगी तो उसका मानवीय पक्ष कमजोर पड़ जाएगा। शिक्षाविद् प्रो. अनिल सदगोपाल लंबे समय से शिक्षा के बढ़ते निजीकरण पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा को सामाजिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि केवल आर्थिक गतिविधि के रूप में। उनके अनुसार गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् प्रो. वाई. एस. राजन का मत था कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो नवाचार, अनुसंधान और रोजगार तीनों के बीच संतुलन स्थापित करे। केवल डिग्री आधारित शिक्षा देश को आगे नहीं ले जा सकती।
जिम्मेदार कौन?
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक संस्था या वर्ग में नहीं मिलता। सरकारों ने पर्याप्त सार्वजनिक निवेश नहीं किया, नियामक संस्थाएँ कई बार समय पर कार्रवाई नहीं कर सकीं, कुछ निजी संस्थानों ने शिक्षा को लाभ का माध्यम बना दिया और समाज ने भी कई बार केवल चमकदार परिसर और ऊँची फीस को गुणवत्ता का पर्याय मान लिया। परिणामस्वरूप शिक्षा का मूल उद्देश्य धीरे-धीरे पीछे छूटता गया।
आगे का रास्ता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने सुधार की दिशा अवश्य दिखाई है, लेकिन केवल नीति पर्याप्त नहीं होगी। नियमन में पारदर्शिता, शिक्षकों का सम्मानजनक वेतन, शोध को प्रोत्साहन, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, फर्जी संस्थानों पर कठोर कार्रवाई और फीस में संतुलन जैसे कदम समान रूप से आवश्यक हैं। शिक्षा को सेवा और उत्तरदायित्व दोनों के रूप में देखने की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने की है कि यदि शिक्षा केवल बाजार की वस्तु बन गई तो सबसे बड़ा नुकसान राष्ट्र के भविष्य का होगा। निजी क्षेत्र की ऊर्जा, सरकारी उत्तरदायित्व और समाज की अपेक्षाओं, इन तीनों के संतुलन से ही ऐसी शिक्षा व्यवस्था बन सकती है जो डिग्री ही नहीं, चरित्र, कौशल और नागरिकता भी गढ़े। यही भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

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