शनिवार, 13 जून 2026

ढाबे से फूड प्लाजा तक

 लेख-

हाईवे के ढाबे और रेस्टोरेंट स्वाद
का सफर या सुरक्षा की चुनौती?

भारत में सड़क यात्रा और ढाबों का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना राजमार्गों का इतिहास। कभी ट्रक चालकों और लंबी दूरी तय करने वाले यात्रियों की जरूरत के रूप में विकसित हुए ढाबे आज भारतीय खानपान संस्कृति की पहचान बन चुके हैं। मुरथल के परांठों से लेकर पंजाब की लस्सी, राजस्थान की दाल-बाटी और उत्तर प्रदेश के तंदूरी व्यंजनों तक, ढाबों ने न केवल यात्रियों की भूख मिटाई है बल्कि स्थानीय व्यंजनों को राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई है। दूसरी ओर, शहरों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधुनिक रेस्टोरेंट, फूड कोर्ट और हाईवे प्लाजा तेजी से बढ़े हैं, जिन्होंने यात्रा के दौरान भोजन की परंपरा को नया रूप दिया है। लेकिन पिछले एक दशक की तस्वीर केवल स्वाद और सुविधा की कहानी नहीं है। यह स्वच्छता, सुरक्षा, आगजनी, खाद्य गुणवत्ता, ढांचागत मजबूती और बदलती उपभोक्ता अपेक्षाओं की भी कहानी है।
बदलता हुआ हाईवे भारत
पिछले दस वर्षों में भारत के सड़क नेटवर्क में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। नए एक्सप्रेस-वे और राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के साथ हाईवे पर भोजनालयों का स्वरूप भी बदला है। पहले जहाँ अधिकांश ढाबे साधारण खाटों और खुले चूल्हों पर आधारित होते थे, वहीं अब अनेक ढाबे वातानुकूलित हॉल, डिजिटल भुगतान, बच्चों के खेलने की जगह और आधुनिक शौचालय जैसी सुविधाएँ देने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आय, पारिवारिक पर्यटन और निजी वाहनों की संख्या में वृद्धि ने ढाबों और रेस्टोरेंटों को अपनी सेवाएँ बेहतर करने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज कई प्रसिद्ध ढाबे छोटे उद्योगों का रूप ले चुके हैं और उनका वार्षिक कारोबार करोड़ों रुपये तक पहुँच गया है।
आखिर ढाबे इतने लोकप्रिय क्यों हैं?
ढाबों की सबसे बड़ी ताकत उनका स्वाद और आत्मीयता है। यात्रियों को घर जैसा भोजन, ताजा रोटियाँ और स्थानीय व्यंजन अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध हो जाते हैं। ट्रक चालक समुदाय के लिए तो ढाबे वर्षों से दूसरे घर की तरह रहे हैं। इसके अतिरिक्त, लंबी यात्रा के दौरान ढाबे विश्राम का भी अवसर प्रदान करते हैं। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि हर दो से तीन घंटे की ड्राइविंग के बाद कुछ समय का विश्राम दुर्घटनाओं की संभावना कम करता है। इस दृष्टि से ढाबे केवल भोजनालय नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा के अप्रत्यक्ष सहयोगी भी हैं।
रेस्टोरेंट और फूड प्लाजा की बढ़ती लोकप्रियता
हाल के वर्षों में यात्रियों की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। अब परिवार केवल स्वाद नहीं बल्कि स्वच्छता, सुरक्षित पार्किंग, साफ शौचालय और आरामदायक वातावरण को भी महत्व देते हैं। इसी कारण राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधुनिक रेस्टोरेंट और फूड प्लाजा तेजी से विकसित हुए हैं। इन स्थानों पर भोजन के साथ-साथ स्वच्छ शौचालय, प्राथमिक चिकित्सा, बच्चों के लिए स्थान, ईवी चार्जिंग और सुरक्षित पार्किंग जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं। यही वजह है कि परिवारों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच इनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
कोविड काल-सबसे बड़ा झटका
वर्ष 2020 और 2021 ढाबा और रेस्टोरेंट उद्योग के लिए बेहद कठिन साबित हुए। कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण यातायात लगभग ठप हो गया। हजारों ढाबों और छोटे भोजनालयों की आय अचानक समाप्त हो गई। कई स्थानों पर कर्मचारियों को हटाना पड़ा, जबकि अनेक छोटे ढाबे स्थायी रूप से बंद हो गए। उद्योग संगठनों के अनुसार महामारी के दौरान भोजन सेवा क्षेत्र को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हालांकि महामारी के बाद घरेलू पर्यटन और सड़क यात्राओं में तेजी आने से इस क्षेत्र में फिर से जान लौटी।
स्वाद के साथ बढ़ते खतरे
ढाबों और रेस्टोरेंटों की लोकप्रियता जितनी बढ़ी है, उतनी ही तेजी से उनसे जुड़े जोखिम भी सामने आए हैं। खाद्य सुरक्षा विभागों द्वारा समय-समय पर की गई जांचों में भोजन की गुणवत्ता, रसोई की सफाई और पेयजल की शुद्धता से जुड़े गंभीर सवाल उठे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भोजन में कीड़े, दूषित सामग्री और अस्वच्छ रसोई से जुड़ी शिकायतों में वृद्धि हुई है। कई मामलों में उपभोक्ता अदालतों ने ग्राहकों को मुआवजा देने के आदेश भी दिए। विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नियमित निरीक्षण और कठोर निगरानी की आवश्यकता है।
आग और ढांचागत हादसे-सबसे बड़ी चिंता
पिछले दशक में ढाबों और रेस्टोरेंटों से जुड़ी सबसे चिंताजनक घटनाएँ आगजनी और ढांचागत दुर्घटनाएँ रही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में रेस्टोरेंटों में लगी आग ने कई लोगों की जान ली। जांचों में बार-बार सामने आया कि अग्निशमन उपकरणों का अभाव, अवैध निर्माण, गैस सिलेंडरों का असुरक्षित उपयोग और आपात निकास मार्गों की कमी ऐसी घटनाओं के प्रमुख कारण रहे। 2024 में पटना में गैस सिलेंडर विस्फोट से लगी आग ने कई लोगों की जान ले ली। वहीं 2025 में जयपुर के एक ढाबे की छत गिरने से एक व्यक्ति की मृत्यु हुई और कई घायल हुए। हाल के वर्षों में दिल्ली समेत कई शहरों में हुई आग की घटनाओं ने यह सवाल उठाया कि क्या भोजनालय सुरक्षा मानकों का वास्तव में पालन कर रहे हैं।
हाईवे पर सुरक्षा की अलग चुनौती
हाईवे ढाबों से जुड़ी समस्याएँ केवल भोजन तक सीमित नहीं हैं। कई स्थानों पर अव्यवस्थित पार्किंग, सड़क किनारे अतिक्रमण और अचानक वाहन रुकने की प्रवृत्ति दुर्घटनाओं का कारण बनती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ढाबों के सामने सुरक्षित प्रवेश और निकास मार्ग, पर्याप्त पार्किंग और स्पष्ट संकेतक होना जरूरी है। कई दुर्घटनाएँ केवल इसलिए हुईं क्योंकि तेज गति से चल रहे वाहन अचानक ढाबे की ओर मुड़ गए या सड़क किनारे खड़े वाहनों से टकरा गए।
सरकार के नए प्रयास
इन चुनौतियों को देखते हुए सरकार और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने आधुनिक ‘वे-साइड अमेनिटी’ केंद्र विकसित करने की योजना शुरू की है। इन केंद्रों का उद्देश्य केवल भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि यात्रियों को एक सुरक्षित और सुविधाजनक पड़ाव प्रदान करना है। इन सुविधाओं में स्वच्छ शौचालय, मेडिकल सहायता, ड्राइवर विश्राम कक्ष, सुरक्षित पार्किंग, फूड कोर्ट, ईवी चार्जिंग स्टेशन और डिजिटल सुविधाएँ शामिल हैं। आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्गों पर बड़ी संख्या में ऐसे केंद्र विकसित किए जाने की योजना है।
क्या ढाबे खत्म हो जाएंगे?
इस प्रश्न का उत्तर अधिकांश विशेषज्ञ ‘नहीं’ में देते हैं। उनका मानना है कि ढाबे भारतीय सड़क संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। आधुनिक फूड प्लाजा सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन ढाबों का स्वाद, आत्मीयता और स्थानीय पहचान आसानी से प्रतिस्थापित नहीं की जा सकती। हाँ, यह अवश्य है कि भविष्य का सफल ढाबा वही होगा जो स्वाद के साथ स्वच्छता, सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं का संतुलन बना सके। जो ढाबे बदलती अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को ढाल लेंगे, वे आने वाले वर्षों में और अधिक लोकप्रिय होंगे।
पिछले दस वर्षों में भारतीय ढाबों और रेस्टोरेंटों ने लंबा सफर तय किया है। वे पारंपरिक भोजनालयों से विकसित होकर आधुनिक आतिथ्य उद्योग का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। एक ओर उन्होंने करोड़ों यात्रियों को स्वाद, आराम और स्थानीय संस्कृति का अनुभव कराया है, तो दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा, आग, स्वच्छता और ढांचागत सुरक्षा जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्वाद और परंपरा के साथ सुरक्षा और गुणवत्ता को भी समान महत्व दिया जाए। यदि ऐसा हुआ, तो भारतीय हाईवे के ढाबे और रेस्टोरेंट न केवल यात्रियों के पसंदीदा पड़ाव बने रहेंगे, बल्कि सुरक्षित और विश्वसनीय यात्रा संस्कृति के प्रतीक भी बन सकेंगे।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

गुरुवार, 11 जून 2026

जनसंख्या विस्फोट से जनसंख्या संकट तक

 लेख-

क्या दुनिया बच्चों के अभाव की ओर बढ़ रही है?
सन् 1968 में अमेरिकी जीवविज्ञानी पॉल  एहरलीच  ने अपनी चर्चित पुस्तक द पापुलेशन  बम  में चेतावनी दी थी कि बढ़ती जनसंख्या मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। उस समय दुनिया की आबादी लगभग 3.5 अरब थी और आशंका व्यक्त की जा रही थी कि पृथ्वी के संसाधन बढ़ती आबादी का बोझ नहीं उठा पाएंगे। आज, लगभग छह दशक बाद, दुनिया की आबादी 8 अरब को पार कर चुकी है, लेकिन चिंता का विषय बदल चुका है। अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि दुनिया में लोग बहुत अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया पर्याप्त बच्चे पैदा कर रही है? संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक जनसांख्यिकीय अध्ययनों के अनुसार 1950 के दशक में विश्व की कुल प्रजनन दर (टोटल  फर्टिलिटी  रेट ) लगभग 5 बच्चे प्रति महिला थी। 2023 तक यह घटकर लगभग 2.3 रह गई है और सदी के मध्य तक इसके प्रतिस्थापन स्तर 2.1 तक पहुँचने या उससे नीचे जाने का अनुमान है। मानव इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि जन्मदर इतनी तेजी से गिरी हो। वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि 1950 में औसत महिला लगभग 5 बच्चों को जन्म देती थी। आज दुनिया के अधिकांश देशों में यह संख्या आधी से भी कम रह गई है। 2026 के विश्लेषणों के अनुसार विश्व की लगभग 71 प्रतिशत आबादी ऐसे देशों में रहती है जहाँ जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है।  यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन भी है। जिन देशों को कभी जनसंख्या विस्फोट से डर था, वे आज बच्चों की कमी से चिंतित हैं।
जापान-भविष्य की एक झलक
यदि कोई देश दुनिया को भविष्य की चेतावनी देता है तो वह जापान है। जापान में लगातार घटती जन्मदर और बढ़ती आयु ने समाज की संरचना बदल दी है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल बंद हो रहे हैं क्योंकि वहाँ पर्याप्त बच्चे नहीं बचे। लाखों घर खाली पड़े हैं। बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जबकि कामकाजी युवाओं की संख्या घट रही है। जापानी सरकार विवाह प्रोत्साहन, बाल-पालन सहायता, कर छूट और नकद प्रोत्साहन जैसी योजनाएँ चला रही है, लेकिन जन्मदर में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
दक्षिण कोरिया का संकट
दक्षिण कोरिया आज दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर वाले देशों में शामिल है। वहाँ महंगे घर, अत्यधिक प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था, लंबी कार्य संस्कृति और बढ़ती जीवन-यापन लागत के कारण युवा विवाह और मातृत्व-पितृत्व से दूर होते जा रहे हैं। सरकार अरबों डॉलर खर्च कर चुकी है, लेकिन सामाजिक प्रवृत्तियों को बदलना आसान नहीं साबित हुआ।
चीन-नीति का ऐतिहासिक उलटफेर
1979 में चीन ने एक-बच्चा नीति लागू की थी। उस समय उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि को रोकना था। लेकिन चार दशक बाद स्थिति बदल गई। अब चीन लोगों को दो और तीन बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। लगातार घटती जन्मदर और सिकुड़ती कार्यशील आबादी ने चीन की आर्थिक योजनाओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। जिस देश ने कभी जन्म को नियंत्रित किया था, वही आज जन्म बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यह इतिहास का एक अनोखा मोड़ है।
भारत की बदलती कहानी
भारत आज दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है, लेकिन भारत की जन्मदर भी तेजी से गिर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफसी-5) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 तक पहुँच चुकी है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। 1992 में एनएचएफसी-1 के दौरान भारत की प्रजनन दर लगभग 3.4 थी। अर्थात् तीन दशकों में देश ने अपनी प्रजनन दर में लगभग 40 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की है। ताजा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार भारत की प्रजनन दर 1.9 तक पहुँच चुकी है। केवल कुछ राज्य ही अब प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर बचे हैं।
दिल्ली, पंजाब और दक्षिण भारत की तस्वीर
दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जन्मदर काफी नीचे जा चुकी है। दिल्ली की प्रजनन दर देश में सबसे कम स्तरों में गिनी जाती है। दूसरी ओर बिहार और उत्तर प्रदेश अभी भी राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं। यह अंतर बताता है कि शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की कार्य भागीदारी और जीवनशैली का जन्मदर पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
कामकाजी दम्पत्तियों की नई दुनिया
आज का युवा दम्पत्ति अपने माता-पिता की पीढ़ी से अलग सोचता है। पहले विवाह जल्दी होते थे, परिवार जल्दी बनता था और तीन-चार बच्चों का होना सामान्य माना जाता था। आज स्थिति बदल गई है। उच्च शिक्षा में अधिक समय लग रहा है। करियर प्राथमिकता बन चुका है। घर खरीदना कठिन हो गया है। बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ गया है। महिलाएँ आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र हैं। महानगरों में जीवन-यापन महंगा हो गया है। परिणामस्वरूप लाखों दम्पत्ति परिवार विस्तार का निर्णय टाल रहे हैं या केवल एक बच्चे तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं।
जनसंख्या घटेगी तो समस्या क्या होगी?
सामान्य धारणा यह है कि कम जनसंख्या हमेशा अच्छी होती है। लेकिन अर्थशास्त्री इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। जब जन्म कम होते हैं तो कुछ दशकों बाद कार्यशील आयु की आबादी घटती है, उद्योगों को श्रमिकों की कमी होती है, पेंशन व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है, आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। इसी कारण जापान, जर्मनी, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे देश कम जन्मदर को राष्ट्रीय चुनौती मानते हैं।
क्या भारत को डरना चाहिए?
फिलहाल भारत दुनिया का सबसे युवा बड़ा देश है। भारत की औसत आयु लगभग 29 वर्ष के आसपास है जबकि जापान और यूरोप के अनेक देशों में यह 45 से 50 वर्ष तक पहुँच चुकी है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। इसे ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ कहा जाता है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि जन्मदर लगातार नीचे जाती रही तो 2040-2050 के बाद भारत को भी वृद्ध होती आबादी और घटते कार्यबल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
20वीं और 21वीं सदी का अंतर
20वीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न था-‘जनसंख्या को कैसे नियंत्रित किया जाए?’, मगर 21वीं सदी का उभरता हुआ प्रश्न है-‘पर्याप्त जनसंख्या कैसे बनाए रखी जाए?’, यही वह परिवर्तन है जो दुनिया की जनसांख्यिकीय बहस को नई दिशा दे रहा है।
दुनिया एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। कभी जनसंख्या विस्फोट मानवता का सबसे बड़ा डर था। आज अनेक देशों के सामने जनसंख्या संकट खड़ा है। घटती जन्मदर, बढ़ती बुजुर्ग आबादी और सिकुड़ता कार्यबल नई चुनौतियाँ बनकर उभर रहे हैं। भारत अभी युवा शक्ति के स्वर्णकाल में है, लेकिन बदलती जीवनशैली, छोटे परिवारों की प्रवृत्ति और गिरती प्रजनन दर संकेत दे रही है कि आने वाले दशकों में हमें भी जनसंख्या संतुलन पर गंभीरता से विचार करना होगा। कल तक दुनिया बच्चों की बढ़ती संख्या से डरती थी, आज कई देश बच्चों की घटती संख्या से चिंतित हैं। इतिहास का यह शायद सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय उलटफेर है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


बुधवार, 10 जून 2026

कामकाजी माता-पिता और बच्चों के बीच घटता समय

 लेख-

सामाजिक प्रभाव और समाधान
बदलती जीवनशैली का नया प्रश्न

आधुनिक भारत में परिवारों की संरचना और जीवनशैली तेजी से बदल रही है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक, अब ऐसे परिवारों की संख्या बढ़ रही है जहाँ पति और पत्नी दोनों कामकाजी हैं। बढ़ती महंगाई, बेहतर जीवन स्तर की आकांक्षा और करियर की चुनौतियों ने दोहरी आय वाले परिवारों को सामान्य बना दिया है। लेकिन इस बदलाव के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उभर रहा है-क्या माता-पिता अपने बच्चों को पर्याप्त समय दे पा रहे हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक रूप से मजबूत होते परिवारों के सामने अब भावनात्मक समय की कमी एक नई चुनौती बनकर खड़ी हो गई है। बच्चे भौतिक सुविधाएँ तो पा रहे हैं, लेकिन कई बार उन्हें माता-पिता का साथ और संवाद अपेक्षित मात्रा में नहीं मिल पाता।
समय की कमी क्यों बढ़ रही है?
आज अधिकांश कामकाजी दंपतियों का दिन सुबह से ही भागदौड़ में शुरू होता है। कार्यालय आने-जाने में लगने वाला समय, बढ़ता ट्रैफिक, कार्यस्थल का दबाव और डिजिटल दुनिया की निरंतर व्यस्तता परिवार के समय को प्रभावित कर रही है। विशेषकर महानगरों में कई माता-पिता सुबह घर से निकलते हैं और शाम को देर से लौटते हैं। ऐसे में बच्चों के साथ उनका प्रत्यक्ष संवाद सीमित रह जाता है। सप्ताहांत भी कई बार सामाजिक कार्यक्रमों, अतिरिक्त कार्य या घरेलू जिम्मेदारियों में निकल जाता है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से संकेत मिलता है कि शहरी कामकाजी परिवारों में माता-पिता बच्चों के साथ प्रतिदिन औसतन 1 से 3 घंटे का प्रत्यक्ष समय बिता पाते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि माता-पिता बच्चों की शिक्षा और गतिविधियों को लेकर पहले की तुलना में अधिक चिंतित हैं, लेकिन उनके पास समय अपेक्षाकृत कम है। कई अभिभावक स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे बच्चों के साथ पर्याप्त समय न बिता पाने के कारण अपराधबोध महसूस करते हैं।
बच्चों पर क्या पड़ रहा है प्रभाव?
1. भावनात्मक दूरी-बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। जब संवाद कम होता है तो बच्चे अपनी भावनाएँ साझा करने में संकोच करने लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे बच्चे कई बार अपनी समस्याएँ दोस्तों, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर तलाशने लगते हैं, जबकि उन्हें सबसे पहले परिवार से मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
2. बढ़ती अकेलेपन की भावना-संयुक्त परिवारों के कम होते जाने और परमाणु परिवारों के बढ़ने से कई बच्चे घर में अकेले समय बिताते हैं। स्कूल से लौटने के बाद यदि घर में कोई बड़ा सदस्य मौजूद न हो तो बच्चों में अकेलेपन की भावना विकसित हो सकती है। यह स्थिति लंबे समय में मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
3. स्क्रीन पर बढ़ती निर्भरता-समय की कमी का सबसे बड़ा प्रभाव डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग के रूप में दिखाई देता है। मोबाइल फोन, वीडियो गेम, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म बच्चों के प्रमुख साथी बनते जा रहे हैं। कई परिवारों में स्क्रीन बच्चों को व्यस्त रखने का माध्यम बन गई है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से ध्यान क्षमता, नींद और सामाजिक व्यवहार प्रभावित हो सकते हैं।
4. व्यवहार संबंधी चुनौतियाँ-अध्ययन बताते हैं कि जिन बच्चों को परिवार के साथ नियमित संवाद और सहभागिता मिलती है, उनमें आत्मविश्वास अधिक होता है। इसके विपरीत, संवाद की कमी कई बार चिड़चिड़ापन, गुस्सा, असुरक्षा और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं को जन्म दे सकती है।
क्या केवल समय की मात्रा ही महत्वपूर्ण है?
विशेषज्ञों का उत्तर है नहीं। बच्चों के विकास में ‘क्वालिटी टाइम’ यानी गुणवत्तापूर्ण समय अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि माता-पिता प्रतिदिन केवल एक घंटा भी बच्चों के साथ पूरी एकाग्रता से बिताते हैं, उनकी बातें सुनते हैं, खेलते हैं या पढ़ाई में सहयोग करते हैं, तो उसका प्रभाव कई घंटों की औपचारिक उपस्थिति से अधिक हो सकता है।
परिवार के साथ समय बिताने के लाभ
1-संवाद बेहतर होता है
2-आत्मविश्वास बढ़ता है
3-शैक्षणिक प्रदर्शन सुधरता है
4-मानसिक स्वास्थ्य मजबूत होता है

विशेषज्ञों के सुझाव
साथ भोजन करें-दिन में कम से कम एक बार पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन करें। यह संवाद का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम माना जाता है।
मोबाइल-मुक्त समय तय करें-घर में प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित किया जाए जब सभी सदस्य मोबाइल और टीवी से दूर रहें।
बच्चों की बात सुनें-सिर्फ सलाह देने के बजाय बच्चों की बातें ध्यान से सुनना भी उतना ही आवश्यक है।
सप्ताहांत परिवार के नाम-सप्ताह में एक दिन परिवार के साथ किसी गतिविधि, भ्रमण या खेल के लिए निर्धारित किया जा सकता है।
सोने से पहले संवाद-विशेषज्ञों के अनुसार, सोने से पहले 15-20 मिनट की बातचीत बच्चों के भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत लाभकारी होती है।
तकनीक और आर्थिक विकास ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ नई सामाजिक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा, बेहतर सुविधाएँ और सुरक्षित भविष्य देना आवश्यक है, परंतु उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें समय, स्नेह और संवाद देना। बच्चों के लिए माता-पिता केवल अभिभावक नहीं, बल्कि पहले शिक्षक, मार्गदर्शक और मित्र भी होते हैं। इसलिए समय की गुणवत्ता और पारिवारिक संवाद को प्राथमिकता देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।
तथ्य बॉक्स
कामकाजी परिवार और बच्चे

1.शहरी परिवारों में माता-पिता बच्चों को औसतन 1-3 घंटे प्रतिदिन दे पाते हैं।
2.कई बच्चे प्रतिदिन 3-5 घंटे तक स्क्रीन का उपयोग करते हैं।
3.विशेषज्ञ प्रतिदिन कम से कम 30-60 मिनट गुणवत्तापूर्ण पारिवारिक समय की सलाह देते हैं।
4.साथ भोजन करने वाले परिवारों में बच्चों का भावनात्मक जुड़ाव अधिक पाया गया है।
5.संवाद और सहभागिता बच्चों के आत्मविश्वास तथा मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाते हैं।

आज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि माता-पिता बच्चों से प्रेम कम करते हैं, बल्कि यह है कि व्यस्त जीवनशैली के बीच उस प्रेम को समय में कैसे बदला जाए। आने वाले वर्षों में सफल समाज वही होगा जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ परिवार और बच्चों के लिए समय बचाने की संस्कृति भी विकसित कर सके।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 9 जून 2026

साहित्य में बढ़ रही है ‘कॉकरोची प्रवृत्ति’?

 लेख-

सृजन से अधिक दिखावे और नेटवर्किंग के दौर पर एक विमर्श
साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं, संघर्षों और समय की चेतना का दस्तावेज होता है। किंतु पिछले कुछ दशकों में साहित्य की दुनिया को लेकर अनेक गंभीर प्रश्न उठे हैं। क्या साहित्य अब भी समाज की पीड़ा और यथार्थ का प्रतिनिधित्व कर रहा है, या वह पुरस्कारों, प्रतिष्ठानों, गुटों और प्रचार के जाल में उलझता जा रहा है? इसी संदर्भ में कुछ आलोचक और पाठक व्यंग्य में ‘कॉकरोची साहित्य’ जैसी संज्ञा का प्रयोग करने लगे हैं। यह शब्द भले ही साहित्यिक शब्दावली का हिस्सा न हो, किंतु इसके पीछे की चिंता गंभीर है। आशय उस लेखन से है जो किसी भी परिस्थिति में स्वयं को बचाए रखने, हर सत्ता और हर प्रवृत्ति के साथ तालमेल बैठाने तथा सृजनात्मक जोखिम लेने के बजाय सुविधाजनक रास्ते चुनने लगता है।
साहित्य के बाजारीकरण पर पुरानी चिंताएँ
साहित्य में बाजार के हस्तक्षेप को लेकर चिंता कोई नई नहीं है। हिंदी के महान आलोचक रामविलास शर्मा ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का संबंध जनता के जीवन से होना चाहिए, न कि केवल प्रतिष्ठा और उपभोग से। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने भी कई अवसरों पर कहा कि साहित्य में विचार और रचना की जगह यदि केवल खेमेबाजी और प्रतिष्ठानवाद ले लें, तो साहित्य की स्वायत्तता संकट में पड़ जाती है। विश्व साहित्य में भी ऐसी चिंताएँ व्यक्त हुई हैं। प्रसिद्ध लेखक जाॅर्ज ओरवल ने लिखा था कि लेखक का सबसे बड़ा दायित्व सत्य के प्रति ईमानदार रहना है। जब लेखन सत्ता, प्रचार या निजी लाभ का उपकरण बन जाता है, तब उसकी नैतिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है।
पुरस्कार, प्रतिष्ठा और गुटबाजी
समकालीन साहित्य की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक गुटबाजी है। कई साहित्यिक मंचों, पत्रिकाओं और पुरस्कारों को लेकर समय-समय पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। वरिष्ठ हिंदी कवि केदारनाथ सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था कि साहित्य में संवाद आवश्यक है, किंतु जब समूह रचना से बड़ा हो जाए तो समस्या पैदा होती है। साहित्यिक इतिहास बताता है कि हर युग में गुट बने हैं, परंतु सोशल मीडिया के दौर में यह प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। अब लेखक की रचना से पहले उसकी डिजिटल उपस्थिति, प्रचार-क्षमता और नेटवर्क पर चर्चा होने लगी है। इससे नए और गंभीर लेखकों के सामने अतिरिक्त चुनौतियाँ खड़ी होती हैं।
सोशल मीडिया का साहित्य
डिजिटल युग ने लेखन को लोकतांत्रिक बनाया है। अब कोई भी व्यक्ति अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर सकता है। यह सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन इसके साथ कुछ समस्याएँ भी सामने आई हैं। तत्काल प्रसिद्धि की चाह में कई बार अधपकी रचनाएँ भी व्यापक प्रचार पा जाती हैं। लाइक, शेयर और फॉलोअर्स को साहित्यिक गुणवत्ता का पैमाना मान लिया जाता है। परिणामस्वरूप गहन अध्ययन, भाषा की साधना और वैचारिक तैयारी जैसी प्रक्रियाएँ पीछे छूटने लगती हैं। प्रख्यात चिंतक टीएस इलियट का मानना था कि परंपरा और अध्ययन के बिना साहित्यिक उत्कृष्टता संभव नहीं। आज यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है।
क्या पाठक भी जिम्मेदार हैं?
साहित्य की स्थिति के लिए केवल लेखक या संस्थाएँ ही जिम्मेदार नहीं हैं। पाठक समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जब पाठक गंभीर पुस्तकों के बजाय केवल चर्चित नामों तक सीमित हो जाते हैं, तब प्रकाशक और साहित्यिक संस्थाएँ भी उसी दिशा में झुकने लगती हैं। बाजार अंततः मांग का अनुसरण करता है। भारत में पुस्तक-पठन की संस्कृति पर कई अध्ययन बताते हैं कि मनोरंजन और त्वरित सामग्री की खपत बढ़ी है, जबकि गंभीर साहित्य का पाठक वर्ग अपेक्षाकृत सीमित हुआ है। ऐसे में साहित्यिक गुणवत्ता और लोकप्रियता के बीच संतुलन का प्रश्न और जटिल हो जाता है।
फिर भी उम्मीद बाकी है
समकालीन साहित्य की आलोचना जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उसके सकारात्मक पक्ष को भी देखना। आज हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में अनेक युवा लेखक ग्रामीण जीवन, पर्यावरण, स्त्री-अनुभव, दलित प्रश्न, आदिवासी समाज, प्रवासी जीवन और तकनीकी बदलावों पर गंभीर लेखन कर रहे हैं। अनेक छोटी पत्रिकाएँ और स्वतंत्र प्रकाशन संस्थाएँ भी गुणवत्तापूर्ण साहित्य को मंच दे रही हैं। ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी जैसे मंचों से सम्मानित अनेक रचनाएँ यह साबित करती हैं कि साहित्य की मुख्य धारा में अभी भी गंभीरता और सृजनात्मकता जीवित है।
कॉकरोची साहित्य’-एक रूपक, एक चेतावनी
यदि ‘कॉकरोची साहित्य’ शब्द का प्रयोग किया जाए तो उसे पूरे साहित्य की परिभाषा नहीं, बल्कि एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह उस प्रवृत्ति की आलोचना है जिसमें रचना की जगह संबंध, विचार की जगह प्रचार, और साहित्य की जगह साहित्यिक कारोबार प्रमुख हो जाता है। सच्चा साहित्य हमेशा जोखिम उठाता है। वह सत्ता से प्रश्न करता है, समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करता है और मनुष्य की संवेदनाओं को विस्तार देता है। इसके विपरीत सुविधाजनक लेखन हर परिस्थिति में स्वयं को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है। साहित्य का संकट केवल साहित्य का संकट नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक चेतना का संकट भी है। यदि हम चाहते हैं कि साहित्य अपनी गरिमा बनाए रखे, तो लेखकों को ईमानदार सृजन, आलोचकों को निष्पक्ष मूल्यांकन, संस्थाओं को पारदर्शिता और पाठकों को गंभीर पठन की संस्कृति अपनानी होगी। अन्यथा वह समय दूर नहीं जब रचना की गुणवत्ता से अधिक उसकी मार्केटिंग पर चर्चा होगी, और साहित्य के बारे में यह व्यंग्य बार-बार सुनाई देगा कि यहाँ शब्दों से अधिक ‘जीवित बने रहने की कला’ का सम्मान हो रहा है।
आज का साहित्य-एक नजर में
 1-साहित्य में गुटबाजी और पुरस्कार राजनीति पर बहस नई नहीं है।
2-सोशल मीडिया ने लेखन को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन तात्कालिकता भी बढ़ाई।
3-हिंदी के कई वरिष्ठ आलोचक साहित्य की स्वायत्तता और गुणवत्ता पर चिंता जता चुके हैं।
4-गंभीर साहित्य का पाठक वर्ग सीमित होने से बाजार-प्रधान प्रवृत्तियाँ मजबूत हुई हैं।
5-आज भी भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता का साहित्य निरंतर लिखा जा रहा है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(पत्रकार एवं लेखक)


महंगाई पर भारी शौक

 महत्वपूर्ण लेख-

खाने और घूमने पर खुलकर खर्च कर रहे भारतीय
कोरोना के बाद बदला खर्च का गणित,
अनुभवों पर बढ़ रहा निवेश

महंगाई बढ़ रही है, पेट्रोल-डीजल महंगे हैं, खाद्य पदार्थों की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं, फिर भी भारतीयों के घूमने-फिरने और खाने-पीने के शौक में कमी नहीं आई है। कोरोना महामारी के बाद देश में घरेलू पर्यटन, धार्मिक यात्राओं और बाहर भोजन करने की प्रवृत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। अब भारतीय केवल बचत करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीवन के अनुभवों पर भी खुलकर खर्च कर रहे हैं।
भारतीयों की बदलती प्राथमिकताएं
ए-2024 में घरेलू पर्यटन खर्च महामारी पूर्व स्तर से अधिक
बी-बिरयानी लगातार सबसे अधिक ऑर्डर किया जाने वाला भोजन
सी-धार्मिक पर्यटन सबसे तेजी से बढ़ता क्षेत्र
डी-युवा वर्ग आय का बड़ा हिस्सा अनुभवों पर खर्च कर रहा
ई-वीकेंड ट्रिप और शॉर्ट वेकेशन का चलन बढ़ा
एफ-ऑनलाइन फूड डिलीवरी बाजार में लगातार विस्तार
जी-डिजिटल भुगतान ने खर्च को आसान बनाया
खानपान-स्वाद पर बढ़ता खर्च
पिछले दस वर्षों में भारतीयों के खानपान की आदतों में बड़ा बदलाव आया है। पारंपरिक भोजन आज भी पसंदीदा है, लेकिन उसके साथ-साथ फास्ट फूड, कैफे संस्कृति और फूड डिलीवरी सेवाओं ने बाजार का आकार कई गुना बढ़ा दिया है।
सबसे लोकप्रिय व्यंजन
✔ बिरयानी
✔ डोसा
✔ छोले-भटूरे
✔ पिज्जा
✔ मोमोज
✔ पावभाजी
✔ बटर चिकन
विशेषज्ञों के अनुसार शहरी भारत में बाहर खाने का खर्च पहले की तुलना में दोगुना तक बढ़ा है।
घूमने की नई संस्कृति
पहले परिवार साल में एक बार लंबी छुट्टी पर जाते थे। अब लोग छोटी-छोटी यात्राएं अधिक करने लगे हैं।
सबसे लोकप्रिय पर्यटन श्रेणियां

धार्मिक पर्यटन

काशी
अयोध्या
वैष्णो देवी
उज्जैन
तिरुपति

पर्वतीय पर्यटन
मनाली
शिमला
नैनीताल
मसूरी

विरासत पर्यटन
जयपुर
उदयपुर
जोधपुर

समुद्री पर्यटन
गोवा
पुडुचेरी
कोच्चि
कोरोना के बाद क्या बदला?
महामारी ने लोगों को यह एहसास कराया कि जीवन अनिश्चित है। यही कारण है कि महामारी के बाद लोगों ने अनुभवों पर खर्च बढ़ा दिया।
पहले
विदेश यात्राओं का आकर्षण
बड़ी समूह यात्राएं
लंबी छुट्टियां
अब
घरेलू पर्यटन
परिवार केंद्रित यात्राएं
वीकेंड ट्रिप
रोड ट्रिप
धार्मिक यात्राएं
महंगाई का असर कितना?
महंगाई का असर साफ दिखाई देता है, लेकिन उसने यात्रा और खानपान की इच्छा को कम नहीं किया।
लोगों ने क्या बदला?
✔ महंगे होटल की जगह बजट होटल
✔ लंबी यात्रा की जगह छोटी यात्रा
✔ हवाई यात्रा की जगह रेल या सड़क यात्रा
✔ महंगे रेस्तरां की जगह मूल्य आधारित विकल्प
✔ ऑफ-सीजन पर्यटन
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
पर्यटन विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय उपभोक्ता अब अनुभवों को प्राथमिकता दे रहा है। युवा वर्ग अपनी आय का बड़ा हिस्सा यात्रा और मनोरंजन पर खर्च करने को तैयार है। अर्थशास्त्रियों की राय में महंगाई ने खर्च की दिशा बदली है, लेकिन खर्च की इच्छा नहीं। भारतीय उपभोक्ता खर्च रोकने की बजाय उसे पुनर्गठित कर रहा है।
युवा बने बदलाव के वाहक
18 से 35 वर्ष आयु वर्ग आज सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है। सोशल मीडिया के प्रभाव से लोग नई जगहें खोज रहे हैं, स्थानीय व्यंजन आजमा रहे हैं, यात्रा अनुभव साझा कर रहे हैं, ‘वर्क फ्रॉम एनीवेयर’ का लाभ उठा रहे हैं।
फैक्ट फाइल
पिछले दशक की प्रमुख प्रवृत्तियां

क्षेत्र                            2015                                     2025-26
बाहर खाना                  सीमित                           सामान्य जीवनशैली
ऑनलाइन फूड ऑर्डर    शुरुआती चरण                     व्यापक उपयोग
धार्मिक पर्यटन               स्थिर                                        तेज वृद्धि
वीकेंड ट्रिप                    कम                               अत्यधिक लोकप्रिय
डिजिटल भुगतान           सीमित                              लगभग सर्वव्यापी
भारतीय समाज एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। बचत और सुरक्षा के साथ-साथ अब आनंद और अनुभव भी जीवन की प्राथमिकताओं में शामिल हो चुके हैं। यही कारण है कि बढ़ती महंगाई के बावजूद पर्यटन स्थलों पर भीड़ है, रेस्तरां भरे हुए हैं और यात्रा उद्योग लगातार विस्तार कर रहा है। आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति भारतीय अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाली साबित हो सकती है। महंगाई जेब पर असर डाल सकती है, लेकिन घूमने और अच्छा खाने की इच्छा पर नहीं। आज का भारतीय उपभोक्ता वस्तुओं से अधिक अनुभवों में निवेश कर रहा है। कोरोना ने लोगों को जीवन जीने का महत्व समझाया, और यही पर्यटन व खानपान क्षेत्र की नई ऊर्जा का आधार बना है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

सोमवार, 8 जून 2026

हर साल बारिश में क्यों खुल जाती है सड़कों की पोल?

 लेख-

दिल्ली-एनसीआर देश का सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र है। यहां रोजाना करोड़ों लोग सड़कों पर सफर करते हैं। पिछले दस वर्षों में एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर और चैड़ी सड़कों का जाल बिछा है, लेकिन मानसून की पहली तेज बारिश के साथ ही विकास के दावों की परीक्षा शुरू हो जाती है। कहीं गड्ढे उभर आते हैं, कहीं सड़क धंस जाती है और कहीं जलभराव घंटों तक यातायात को जाम कर देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल सड़क निर्माण की नहीं, बल्कि ड्रेनेज सिस्टम, रखरखाव और एजेंसियों के बीच समन्वय की भी है।
दिल्ली की सबसे संवेदनशील सड़कें
पिछले कई वर्षों से कुछ सड़कें मानसून के दौरान विशेष रूप से परेशानी का कारण बनती रही हैं।
1. आउटर रिंग रोड-दिल्ली की सबसे व्यस्त सड़कों में शामिल आउटर रिंग रोड पर बारिश के दौरान गड्ढे, जलभराव और दुर्घटनाएं लगातार चिंता का विषय रहे हैं। 2025 में भी यह राजधानी की सबसे खतरनाक सड़कों में शामिल रही।
2. रिंग रोड (इनर रिंग रोड)-दिल्ली की जीवनरेखा कही जाने वाली इस सड़क पर 2025 में सर्वाधिक सड़क मौतें दर्ज की गईं। चैड़ी सड़क और तेज रफ्तार वाहनों के कारण दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
3. मथुरा रोड-बारिश के दौरान गड्ढों और जलभराव की शिकायतें लगातार आती रही हैं। सड़क की सतह कई बार टूटने के कारण यातायात प्रभावित हुआ है।
4. आईटीओ और मिंटो ब्रिज क्षेत्र-यह इलाका जलभराव के लिए वर्षों से बदनाम है। तेज बारिश के दौरान यहां वाहन फंसने और लंबा जाम लगने की घटनाएं आम रही हैं।
5. एनएच-48 (दिल्ली-गुरुग्राम मार्ग)-गुरुग्राम सीमा तक फैला यह कॉरिडोर हर मानसून में जलभराव और ट्रैफिक जाम का सामना करता है।
पिछले 10 वर्षों में सबसे खतरनाक बने सड़क क्षेत्र
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग की रिपोर्टों के अनुसार निम्न स्थान लगातार दुर्घटना-प्रवण रहे हैं-
आजादपुर मंडी जंक्शन
वजीराबाद क्षेत्र
कश्मीरी गेट-आईएसबीटी
भलस्वा चैक
मुकरबा चैक
लिबासपुर बस स्टैंड
राजोकरी फ्लाईओवर
अक्षरधाम एक्सप्रेसवे क्षेत्र
इन स्थानों पर सड़क की स्थिति, तेज रफ्तार, निर्माण कार्य और अव्यवस्थित यातायात दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण रहे हैं।
जान-माल का नुकसान
दिल्ली में सड़क दुर्घटनाएं लगातार बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
2024
111 ब्लैक स्पॉट्स पर 1,132 दुर्घटनाएं
483 लोगों की मौत
649 लोग घायल
2025
25 नए ब्लैक स्पॉट चिन्हित
176 दुर्घटनाएं
88 मौतें केवल इन नए ब्लैक स्पॉट्स पर
कुल सड़क दुर्घटनाएं
2024 में 5,657 दुर्घटनाएं
1,504 घातक दुर्घटनाएं
2025 में सड़क दुर्घटना मौतें बढ़कर 1,617 तक पहुंच गईं।
हालांकि हर दुर्घटना सीधे गड्ढों से नहीं जुड़ी होती, लेकिन मानसून में खराब सड़कें, जलभराव और दृश्यता की कमी दुर्घटनाओं का जोखिम काफी बढ़ा देती हैं।
बारिश से पहले किन सड़कों को प्राथमिकता पर सुधारना चाहिए?
विशेषज्ञों के अनुसार निम्न सड़कों पर तत्काल ध्यान आवश्यक है-
प्रथम श्रेणी
आउटर रिंग रोड
मथुरा रोड
एनएच-48
आईटीओ कॉरिडोर
वजीराबाद रोड
द्वितीय श्रेणी
आजादपुर-मुकरबा चैक क्षेत्र
भलस्वा चैक
कश्मीरी गेट क्षेत्र
राजोकरी फ्लाईओवर
तृतीय श्रेणी
विभिन्न अंडरपास
कॉलोनी कनेक्टिंग रोड
औद्योगिक क्षेत्रों की सड़कें
सरकारी प्रयास कितना असर?
गड्ढा-मुक्त अभियान-दिल्ली सरकार ने 2025 में एक ही दिन में 3,433 गड्ढे भरने का दावा किया। लगभग 1,400 किलोमीटर सड़क नेटवर्क पर मरम्मत अभियान चलाया गया।
जियो-टैगिंग और ड्रोन सर्वे-गड्ढों और खराब सड़कों की पहचान के लिए ड्रोन सर्वे और जियो-टैगिंग का उपयोग शुरू किया गया।
डिजिटल रोड मॉनिटरिंग-पीडब्ल्यूडी ने सड़क, जलभराव, अंधेरे क्षेत्रों और दुर्घटना-प्रवण स्थलों की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड विकसित करने की पहल की है।
नई तकनीक-सीएसआईआर और सीआरआरआई द्वारा विकसित ईकोफिक्स तकनीक का परीक्षण किया गया, जिससे पानी भरे गड्ढों की भी त्वरित मरम्मत संभव है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की अधिकांश सड़कें निर्माण गुणवत्ता से अधिक खराब ड्रेनेज व्यवस्था की वजह से क्षतिग्रस्त होती हैं। पानी का लगातार जमाव सड़क की ऊपरी परत को कमजोर कर देता है, जिससे गड्ढे बनते हैं और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। सड़कों के साथ-साथ नालों और वर्षा जल निकासी तंत्र के आधुनिकीकरण पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
फैक्ट बॉक्स
दिल्ली-एनसीआर सड़क सुरक्षा-एक नजर

2024 के ब्लैक स्पॉट
111 ब्लैक स्पॉट दुर्घटनाएं (2024) 1,132, मौतें (2024) 483
2025 में चिन्हित नए ब्लैक स्पॉट
25, 2025 सड़क दुर्घटना मौतें 1,617, 2025 में भरे गए गड्ढे 3,433
सबसे खतरनाक सड़कें
रिंग रोड, आउटर रिंग रोड, मथुरा रोड, एनएच-48
दिल्ली-एनसीआर की सड़कें देश की आर्थिक गतिविधियों की धुरी हैं, लेकिन मानसून हर वर्ष उनकी वास्तविक स्थिति उजागर कर देता है। यदि आउटर रिंग रोड, मथुरा रोड, आईटीओ, वजीराबाद और एनएच-48 जैसे संवेदनशील मार्गों पर समय रहते व्यापक मरम्मत, बेहतर ड्रेनेज और नियमित निगरानी सुनिश्चित नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में दुर्घटनाओं और आर्थिक नुकसान की कीमत और अधिक चुकानी पड़ सकती है। सड़क निर्माण के साथ-साथ सड़क रखरखाव को भी समान प्राथमिकता देना समय की मांग है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


रविवार, 7 जून 2026

छह साल में 114 काले हिरणों का शिकार

 लेख-

संरक्षण के बावजूद शिकार की चुनौती बरकरार
भारत की जैव विविधता में काला हिरण एक विशिष्ट स्थान रखता है। अपनी आकर्षक काया, घुमावदार सींगों और अद्भुत गति के कारण यह देश के सबसे सुंदर वन्यजीवों में गिना जाता है। कभी भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल घास के मैदानों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले काले हिरणों की आबादी बीसवीं शताब्दी के दौरान तेजी से घटने लगी थी। इसका प्रमुख कारण अंधाधुंध शिकार, कृषि विस्तार, घासभूमियों का विनाश और मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव था। हालांकि स्वतंत्र भारत में बनाए गए कठोर वन्यजीव कानूनों और समाज की बढ़ती जागरूकता ने इस प्रजाति को नया जीवन दिया है, लेकिन आज भी इसका अस्तित्व पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। हाल में सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. रंजन तोमर द्वारा प्राप्त सूचना ने एक बार फिर काले हिरणों की सुरक्षा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु अथवा शिकार से संबंधित 114 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा बताता है कि कानूनी संरक्षण के बावजूद वन्यजीव अपराधों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगाया जा सका है।
कहां-कहां पाए जाते हैं काले हिरण
काला हिरण मुख्य रूप से भारत के खुले घास के मैदानों और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। राजस्थान आज भी इसका सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है, जहां इनकी संख्या 25 हजार से अधिक आंकी गई है। इसके अतिरिक्त ओडिशा के गंजाम क्षेत्र में लगभग 9 हजार, पंजाब और हरियाणा में हजारों की संख्या में तथा गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी इनकी महत्वपूर्ण आबादी पाई जाती है। गुजरात का वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान और राजस्थान का ताल छापर अभयारण्य काले हिरणों के प्रमुख संरक्षण केंद्र हैं।
क्यों खास है यह वन्यजीव
काले हिरण का वैज्ञानिक नाम एंटीलोप सर्विकापर है। नर काले हिरण अपने काले-भूरे रंग और सर्पिलाकार सींगों के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि मादाएं हल्के भूरे रंग की होती हैं। यह दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले खुरदार जीवों में शामिल है और लगभग 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि इसे भारतीय घासभूमियों का धावक भी कहा जाता है।
कानून देता है सर्वोच्च सुरक्षा
भारत सरकार ने काले हिरण को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल किया है। यह श्रेणी देश के सबसे अधिक संरक्षित वन्यजीवों के लिए आरक्षित है। काले हिरण का शिकार, उसे घायल करना, पकड़ना या उसका अवैध व्यापार करना गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर तीन से सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
शिकार की घटनाएं क्यों नहीं रुक रहीं
विशेषज्ञों के अनुसार अवैध शिकार के पीछे कई कारण हैं। कुछ क्षेत्रों में मांस के लिए, कुछ स्थानों पर मनोरंजन अथवा ट्रॉफी शिकार के लिए और कहीं-कहीं स्थानीय संघर्षों के कारण काले हिरणों को निशाना बनाया जाता है। इसके अलावा सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले, कृषि विस्तार और प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना भी इनके अस्तित्व के लिए खतरा बने हुए हैं।
देश का सबसे चर्चित शिकार मामला
काले हिरण शिकार की चर्चा जब भी होती है तो 1998 का जोधपुर प्रकरण सबसे पहले याद किया जाता है। फिल्म ‘हम साथ-साथ हैं’ की शूटिंग के दौरान दो काले हिरणों के शिकार के आरोप में अभिनेता सलमान खान और अन्य कलाकारों के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ था। यह मुकदमा दो दशक से अधिक समय तक देश की सबसे चर्चित वन्यजीव कानूनी लड़ाइयों में शामिल रहा और इसने वन्यजीव संरक्षण कानूनों को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
वन्यजीव जीवविज्ञानी अमित गोस्वामी का मानना है कि काले हिरणों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों, विशेषकर बिश्नोई समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उनके अनुसार राजस्थान के अनेक क्षेत्रों में अभयारण्यों के बाहर भी काले हिरण सुरक्षित दिखाई देते हैं।
वन अधिकारी और शोधकर्ता गीतांजलि मेरियासेल्वम का कहना है कि संरक्षण को केवल सामाजिक आस्था पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए समुदाय आधारित संरक्षण योजनाओं और सरकारी सहयोग की आवश्यकता है। संरक्षण विशेषज्ञ टी. मुरुगावेल के अनुसार भारत में घासभूमियों के संरक्षण पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। यदि घासभूमियां सिकुड़ती रहीं तो काले हिरणों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
संरक्षण की असली कुंजी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं। वन्यजीव अपराधों की निगरानी, त्वरित न्यायिक प्रक्रिया, आधुनिक तकनीक का उपयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही दीर्घकालिक समाधान प्रदान कर सकती है। साथ ही घासभूमियों को भी उतना ही महत्व देना होगा जितना जंगलों को दिया जाता है।
साझा जिम्मेदारी
काला हिरण केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसकी बढ़ती आबादी संरक्षण की सफलता का संकेत देती है, वहीं शिकार और आवास विनाश की घटनाएं हमें सावधान भी करती हैं। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, वन विभाग और समाज मिलकर प्रयास करें तो आने वाली पीढ़ियां भी भारतीय घासभूमियों में दौड़ते हुए इस सुंदर जीव को देख सकेंगी। प्रकृति की इस अनमोल धरोहर की रक्षा करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

फैक्ट बॉक्स
    काला हिरण एक नजर में

► सामान्य नाम-काला हिरण
► वैज्ञानिक नाम-एंटीलोप सर्विकापर
► प्राकृतिक आवास-घासभूमियां, अर्द्ध-शुष्क मैदान, खुले वन क्षेत्र
► अधिकतम गति- 70-80 किलोमीटर प्रति घंटा
► विशेष पहचान-नर के लंबे सर्पिलाकार सींग और गहरा काला-भूरा रंग
► भारत में कहां पाये जाते हैं-राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश
► सबसे बड़ी आबादी-राजस्थान
► संरक्षण दर्जा-वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल
► शिकार पर सजा-3 से 7 वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना
► प्रमुख खतरे-अवैध शिकार, घासभूमियों का विनाश, सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले और मानव-वन्यजीव संघर्ष
► विशेष समुदाय-बिश्नोई समाज, जिसने सदियों से काले हिरणों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है
► प्रमुख संरक्षित क्षेत्र-ताल छापर अभयारण्य (राजस्थान), वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान (गुजरात), अबोहर क्षेत्र (पंजाब), रानीबेन्नूर ब्लैकबक अभयारण्य (कर्नाटक)
► सबसे चर्चित मामला-1998 का जोधपुर काला हिरण शिकार प्रकरण
► हालिया चिंता-आरटीआई के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु-शिकार से जुड़ी 114 घटनाएं दर्ज होने का दावा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि और पत्रकार)