मंगलवार, 8 सितंबर 2026

सत्य निकेतन से गाजियाबाद-नोएडा तक

 आवश्यक लेख-

कब्जों और अवैध निर्माण ने कितनी बड़ी कीमत वसूली?
सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी भवन का भरभराकर गिरना केवल एक इमारत का हादसा नहीं है। यह दिल्ली-एनसीआर के उस शहरी विकास मॉडल पर गंभीर सवाल है, जिसमें आवासीय मकान पीजी बन जाते हैं, स्वीकृत नक्शे से अधिक मंजिलें खड़ी हो जाती हैं, बेसमेंट का उपयोग बदल जाता है और सरकारी अथवा ग्रीन बेल्ट की जमीन पर कब्जे धीरे-धीरे स्थायी निर्माण में बदल जाते हैं। सत्य निकेतन में सात लोगों की मौत और पांच लोगों के घायल होने के बाद यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या प्रशासन अवैध निर्माण को हादसे से पहले पहचानता है या हादसे के बाद जागता है?
सत्य निकेतन-चेतावनी नहीं, आईना
7 सितंबर को दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में लगभग 50-55 वर्ष पुरानी पांच मंजिला इमारत अचानक ढह गई। इसमें मुख्यतः विद्यार्थी रहते थे। बचाव अभियान में 12 लोगों को मलबे से निकाला गया, जिनमें सात की मृत्यु हो गई और पांच घायल हुए। भवन में निर्माण-मरम्मत का काम चल रहा था और बेसमेंट में भी काम होने की जानकारी सामने आई है।  एमसीडी की प्रारंभिक जांच के अनुसार भवन के पास स्वीकृत नक्शा नहीं था, बेसमेंट अनधिकृत था, फायर एनओसी नहीं थी और पांचवीं मंजिल भी नियमों के अनुरूप स्वीकृत नहीं थी। सबसे चैंकाने वाली बात यह है कि इस भवन को इस साल के मानसून-पूर्व सर्वे में खतरनाक घोषित भवनों की सूची में शामिल नहीं किया गया था। दिल्ली में 2020 से 2024 के बीच ढांचे गिरने से लगभग 170 मौतें दर्ज हुईं। इसलिए सत्य निकेतन को एक अलग-थलग दुर्घटना मानना मुश्किल है।
दिल्ली में कार्रवाई के आंकड़े भी कम गंभीर नहीं
सत्य निकेतन जैसी घटनाओं के बीच दिल्ली में अवैध निर्माण के विरुद्ध अभियान के आंकड़े बताते हैं कि समस्या कितनी व्यापक है। जून 2026 में एमसीडी ने एक अभियान में 217 अनधिकृत ढांचे गिराए और 237 संपत्तियां सील कीं। इसके अलावा 330 कारण बताओ नोटिस, 151 सीलिंग नोटिस और 91 ध्वस्तीकरण आदेश जारी किए गए। राजस्व विभाग ने केवल 5 से 15 जून के बीच दिल्ली में 773 स्थानों का निरीक्षण किया। पश्चिमी दिल्ली में 165, दक्षिण दिल्ली में 93, उत्तर दिल्ली में 89 और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में 70 निरीक्षण हुए। इन निरीक्षणों में अनधिकृत निर्माण, अग्नि सुरक्षा और भूमि-उपयोग से जुड़े उल्लंघन मिले।  लेकिन सवाल यह है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करनी पड़ रही है, तो ये निर्माण बनते समय दिखाई क्यों नहीं दिए?
पीजी संस्कृति ने बढ़ाया खतरा
दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों के आसपास निजी पीजी की मांग बहुत अधिक है। इसी मांग ने कई आवासीय इलाकों में मकानों को बहुमंजिला पीजी में बदलने का रास्ता खोला है। सत्य निकेतन में जिस इमारत के गिरने से सात जानें गईं, उसके आसपास भी कई भवन पीजी के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। जांच में आसपास के कुछ पीजी में संकरे रास्ते, सीमित प्रवेश-निकास और बिजली व्यवस्था से जुड़े सुरक्षा सवाल सामने आए हैं। यही स्थिति गुरुग्राम में भी दिखाई देती है। वहां 453 पीजी चिन्हित किए गए हैं और 18 को सील किया जा चुका है। डीएलएफ फेज-3 में कार्रवाई के दौरान चार पीजी भवनों के 181 कमरे सील किए गए और 29 अवैध व्यावसायिक इकाइयों पर भी ताले लगाए गए। यानी सत्य निकेतन का सवाल केवल दिल्ली का नहीं, बल्कि पूरे एनसीआर के पीजी मॉडल का सवाल बन चुका है।
गुरुग्राम-घर से पीजी और पीजी से व्यावसायिक परिसर
गुरुग्राम में कई आवासीय क्षेत्रों में अतिरिक्त मंजिलों और स्टिल्ट पार्किंग के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से विवाद है। डीएलएफ फेज-3 में कार्रवाई के दौरान ऐसे भवन भी मिले जिनमें स्वीकृत सीमा से अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं। एक अभियान में 13 अनधिकृत निर्माण ध्वस्त किए गए और 18 भवन सील किए गए। साथ ही लगभग डेढ़ एकड़ एमसीजी जमीन कब्जामुक्त कराई गई।  यहां सवाल केवल भवन का नहीं है। जब आवासीय प्लॉट पर अतिरिक्त मंजिल बनती है, दर्जनों लोग रहने लगते हैं और नीचे व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं तो सड़क, पार्किंग, सीवर, पानी और अग्नि सुरक्षा सभी पर दबाव बढ़ता है।
गाजियाबाद-हिंडन के किनारे 258 अवैध कॉलोनियां
गाजियाबाद की तस्वीर और भी चिंताजनक है। प्रशासन के अनुसार हिंडन नदी के किनारे 258 अवैध कॉलोनियां बसी हुई हैं। जिलाधिकारी ने यमुना और हिंडन नदी क्षेत्रों में सरकारी जमीनों पर हुए अतिक्रमण का सर्वे कराकर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यह केवल जमीन कब्जाने का मामला नहीं है। नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण होने का सीधा असर जलनिकासी और बाढ़ के जोखिम पर पड़ता है। जुलाई 2026 में भी हिंडन के बाढ़ क्षेत्र में नए मकान, पशुशालाएं, शौचालय और अन्य निर्माण दिखाई देने की रिपोर्ट सामने आई। यानी जिस जमीन को प्राकृतिक जल प्रवाह और बाढ़ नियंत्रण के लिए खुला रहना चाहिए, वहां धीरे-धीरे आबादी और निर्माण खड़ा हो रहा है।
नोएडा-5,903 करोड़ की जमीन कब्जामुक्त
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में अतिक्रमण का पैमाना जमीन के आंकड़ों से समझा जा सकता है। गौतमबुद्धनगर पुलिस के अनुसार 2025 से जून 2026 तक 13 लाख 25 हजार 960 वर्ग गज सरकारी और प्राधिकरण की जमीन अतिक्रमण से मुक्त कराई गई। इसकी अनुमानित कीमत 5,903 करोड़ 95 लाख रुपये से अधिक बताई गई है। इसमें सेंट्रल नोएडा 8,89,127 वर्ग गज, ग्रेटर नोएडा 4,21,833 वर्ग गज, नोएडा 15,000 वर्ग गज जमीन शामिल है। कई मामलों में भूमाफियाओं ने सरकारी जमीन पर बाउंड्रीवाल, निर्माण या अवैध प्लॉटिंग की थी और कुछ मामलों में एफआईआर भी दर्ज हुई। यह आंकड़ा बताता है कि नोएडा में मामला केवल सड़क या फुटपाथ के कब्जे तक सीमित नहीं है। यहां हजारों करोड़ रुपये मूल्य की जमीन भी अतिक्रमण के निशाने पर रही है।
फरीदाबाद-ग्रीन बेल्ट भी सुरक्षित नहीं
फरीदाबाद में भी नगर निगम, एफएमडीए और एचएसवीपी को लगातार अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाने पड़ रहे हैं। पिछले एक वर्ष में शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में हजारों अस्थायी और स्थायी अतिक्रमण हटाए जाने की जानकारी सामने आई है। समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एफएमडीए ने सेक्टर-88 की ग्रीन बेल्ट और सरकारी जमीन को दोबारा कब्जे से बचाने के लिए लगभग 1.53 करोड़ रुपये की फेंसिंग परियोजना शुरू की है। प्रशासन को कई स्थानों पर एक ही जगह बार-बार अतिक्रमण हटाना पड़ता है। ग्रीन बेल्ट पर कब्जा केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं है। इससे बारिश के पानी की निकासी भी प्रभावित होती है और जलभराव बढ़ सकता है।
क्या मास्टर प्लान की धज्जियां उड़ रही हैं?
इस प्रश्न का उत्तर अब टालना मुश्किल है। दिल्ली की सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमेटी ने जुलाई 2026 में ही आवासीय परिसरों में मिश्रित उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियों के कारण अग्नि सुरक्षा नियमों, यूबीबीएल-2016 और मास्टर प्लान-2021 के उल्लंघन पर रिपोर्ट दर्ज की है। अर्थात समस्या केवल यह नहीं कि किसी ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया। असली समस्या यह है कि आवासीय मकान पीजी बन गया। पीजी बहुमंजिला हो गया। बेसमेंट का उपयोग बदल गया। पार्किंग व्यावसायिक गतिविधि में चली गई। ग्रीन बेल्ट पर निर्माण हो गया। नदी के बाढ़ क्षेत्र में कॉलोनी बस गई। इन सबका संयुक्त परिणाम शहर की नियोजित संरचना को कमजोर करता है।
सबसे बड़ा सवाल, प्रशासन पहले क्यों नहीं जागता
सत्य निकेतन हादसे के बाद भवन मालिक परिवार के तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया गया और पांच एमसीडी अधिकारियों को निलंबित किया गया। सभी पीजी और हॉस्टल भवनों के संरचनात्मक ऑडिट की मांग भी तेज हुई है। लेकिन असली कसौटी यही होगी कि क्या यह कार्रवाई हादसे के बाद तक सीमित रहती है या व्यवस्था बदलती है? दिल्ली-एनसीआर में एक साझा डिजिटल रजिस्टर होना चाहिए, जिसमें प्रत्येक पीजी, गेस्ट हाउस और बहुमंजिला आवासीय भवन की स्थिति दर्ज हो, स्वीकृत नक्शा, वास्तविक मंजिलें, फायर एनओसी, संरचनात्मक ऑडिट, भूमि उपयोग और कार्रवाई की स्थिति।
कब्जे का इलाज बुलडोजर नहीं, रोकथाम है
सत्य निकेतन की सात मौतें हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि शहरों में अवैध निर्माण आखिर बनता कैसे है। 13 लाख वर्ग गज जमीन कब्जामुक्त कराने के बाद भी यदि नए कब्जे होते रहें, 258 अवैध कॉलोनियां नदी किनारे बनी रहें और 453 पीजी में से 18 को हादसे के डर के बीच सील करना पड़े, तो समस्या केवल अतिक्रमणकारियों की नहीं है। यह निगरानी और नियोजन की भी समस्या है। दिल्ली-एनसीआर को अब केवल यह बताने की जरूरत नहीं कि कितने कब्जे हटाए गए। उसे यह बताना होगा कि कितने कब्जे बनने से पहले रोके गए, कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, कितने अवैध पीजी बंद हुए और कितनी जानें बचाई गईं। क्योंकि सत्य निकेतन के मलबे के नीचे केवल सात लोग नहीं दबे, उसके नीचे हमारी शहरी नियोजन व्यवस्था की कई कमजोरियां भी उजागर हुई हैं।


लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


बुधवार, 2 सितंबर 2026

हिमालय की पीड़ा, आपदाएं, पिघलते ग्लेशियर और हमारी विकास-दृष्टि

 समसामयिक लेख-

भारत का हिमालय केवल बर्फ से ढके पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है। वह देश की नदियों का उद्गम, करोड़ों लोगों के जीवन का आधार, जैव-विविधता का भंडार और जलवायु-संतुलन की एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था है। लेकिन पिछले एक दशक से हिमालय बार-बार हमें चेतावनी दे रहा है। कहीं बादल फट रहे हैं, कहीं पहाड़ दरक रहे हैं, कहीं ग्लेशियल झीलें फैल रही हैं और कहीं अचानक आने वाली बाढ़ पूरे गांव और सड़कें बहा ले जा रही है। हाल की नेपाल त्रासदी ने इस चेतावनी को फिर बेहद भयावह बना दिया है। सबसे पहले 2013 की केदारनाथ त्रासदी को याद करना जरूरी है। जून 2013 में उत्तराखंड में 14 से 18 जून के बीच असाधारण वर्षा हुई। सामान्य 71.3 मिलीमीटर के मुकाबले 385.1 मिलीमीटर वर्षा दर्ज हुई, अर्थात सामान्य से लगभग 440 प्रतिशत अधिक। सरकारी आकलन में 169 लोगों की मृत्यु और 4,021 लोगों के लापता होने की सूचना थी, जिन्हें बाद में मृत मानने की स्थिति बनी। 50 हजार करोड़ रुपये के आसपास बुनियादी ढांचे के नुकसान का अनुमान लगाया गया। केदारनाथ, गौरीकुंड, मंदाकिनी और अलकनंदा घाटियां सबसे अधिक प्रभावित हुईं। केदारनाथ ने हमें बताया था कि पहाड़ में प्रकृति की छोटी-सी अतिरिक्त मार भी कितनी बड़ी त्रासदी बन सकती है। लेकिन उसके बाद के वर्षों में घटनाओं का सिलसिला थमा नहीं।
लगातार बढ़ता खतरा
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से लेकर नेपाल और तिब्बत तक हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन, अचानक बाढ़, बादल फटना और ग्लेशियल झीलों के फटने की घटनाएं लगातार सामने आई हैं। उत्तराखंड में 2015 से 2024 के बीच 4,600 से अधिक भूस्खलन दर्ज किए गए और इनमें कम से कम 316 लोगों की मृत्यु हुई। पिथौरागढ़ में अकेले लगभग 100 मौतें दर्ज हुईं। फरवरी 2021 में चमोली की ऋषिगंगा-धौलीगंगा घाटी में हुई त्रासदी ने एक नया खतरा सामने रखा। रौंती क्षेत्र से भारी मात्रा में चट्टान और बर्फ नीचे आई और अचानक जलप्रवाह ने ऋषिगंगा तथा धौलीगंगा घाटियों को अपनी चपेट में ले लिया। दो जलविद्युत परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और 200 से अधिक लोगों की मृत्यु या लापता होने की सूचना सामने आई। यह घटना इस बात का प्रमाण थी कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर, चट्टान, पानी और मानव निर्माण मिलकर कितनी भयावह स्थिति पैदा कर सकते हैं। अक्टूबर 2023 में सिक्किम में दक्षिण ल्होनाक झील के फटने से तीस्ता नदी में अचानक भीषण बाढ़ आई। सरकारी स्थिति रिपोर्ट के अनुसार सिक्किम में 42 शव बरामद किए गए, तीस्ता नदी के क्षेत्र में पश्चिम बंगाल पुलिस ने 62 अज्ञात शव बरामद किए और 77 लोग लापता थे। 88,400 लोग प्रभावित हुए, 2,563 लोगों को बचाया गया और 5,665 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।  यह केवल बाढ़ नहीं थी। यह ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ थी। दक्षिण ल्होनाक झील का आधे से अधिक पानी अचानक निकल गया था। यही वह खतरा है जो आने वाले वर्षों में हिमालय के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन सकता है।
ग्लेशियरों की बदलती दुनिया
भारतीय हिमालय के ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव अब केवल वैज्ञानिक शोध का विषय नहीं रह गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर औसतन लगभग 14.9 मीटर प्रतिवर्ष पीछे हट रहे हैं। गंगा बेसिन में यह औसत लगभग 15.5 मीटर और ब्रह्मपुत्र बेसिन में लगभग 20.2 मीटर प्रतिवर्ष है। 1975 से 2023 तक भारतीय हिमालयी ग्लेशियरों में संचयी बर्फ-द्रव्यमान हानि का अनुमान लगभग 26 मीटर जल-समतुल्य लगाया गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के उपग्रह अध्ययन ने भी गंभीर संकेत दिए हैं। 1984 से 2023 के बीच 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 हिमनदीय झीलों का अध्ययन किया गया। इनमें 676 झीलों का उल्लेखनीय विस्तार पाया गया। इन 676 में 130 झीलें भारत में हैं, 65 सिंधु नदी क्षेत्र में, 7 गंगा क्षेत्र में और 58 ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में। इनमें 601 झीलों का आकार दोगुने से भी अधिक बढ़ चुका था। हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाटी की एक हिमनदीय झील का आकार 1989 से 2022 के बीच 36.49 हेक्टेयर से बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया, यानी लगभग 178 प्रतिशत की वृद्धि।  इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि हर बढ़ती झील कल ही फट जाएगी। लेकिन इसका अर्थ यह अवश्य है कि जो खतरे पहले छोटे और दूर थे, वे अब बड़े और अधिक संवेदनशील हो रहे हैं।
हिमाचल की लगातार त्रासदियां
2023 में हिमाचल प्रदेश ने अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन की भयावह स्थिति देखी। राज्य सरकार द्वारा केंद्र को दी गई रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 में जल-मौसम संबंधी आपदाओं में 556 लोगों की जान गई, 21,506 पशु मारे गए और 15,792 मकान क्षतिग्रस्त हुए। 2024-25 में 408 लोगों की मृत्यु हुई और 1,089 मकान क्षतिग्रस्त हुए। 2025-26 में उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में 195 मौतें और 10,525 मकानों के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है। इन आंकड़ों में अलग-अलग प्रकार की घटनाएं शामिल हैं और इन्हें केवल भूस्खलन या बाढ़ की मौतें मानना उचित नहीं होगा। फिर भी ये बताते हैं कि पहाड़ी राज्यों में आपदा का आर्थिक और मानवीय बोझ कितना बड़ा हो गया है। उत्तराखंड में 2025 में भी बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन की कई घटनाएं हुईं। धराली जैसी घटनाओं ने दिखाया कि कुछ ही मिनटों में नदी और मलबा पूरे बस्ती क्षेत्र का स्वरूप बदल सकते हैं।
और अब नेपाल की त्रासदी
अगस्त 2026 की नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र की त्रासदी ने पूरे हिमालय को फिर झकझोर दिया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार नेपाल के रसुवा क्षेत्र में हिमालयी क्षेत्र से जुड़े अचानक आए बाढ़ के प्रकोप में 1243 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता थे। नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार 85 सुरक्षाकर्मी भी लापता थे। विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े 60 लोग, 391 विदेशी पर्यटक और 93 नेपाली पर्यटक भी संपर्क से बाहर बताए गए। बाढ़ में 19 मोटर योग्य पुल और लगभग 40 किलोमीटर सड़क क्षतिग्रस्त हुई। ये आंकड़े 26 अगस्त 2026 तक की स्थिति के हैं और बचाव अभियान जारी रहने के कारण बदल सकते हैं। अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में नेपाल और तिब्बत को मिलाकर मृतकों और लापता लोगों की संख्या इससे कहीं अधिक बताई गई है। इसलिए अंतिम आंकड़ा राहत एवं खोज अभियान पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगा। नेपाल की यह त्रासदी भारत के लिए भी सीधी चेतावनी है। हिमालय किसी राजनीतिक सीमा से बंटा हुआ पर्वत नहीं है। उसकी बर्फ, नदियां, ग्लेशियर और भूगर्भीय प्रक्रियाएं भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत के बीच साझा प्राकृतिक व्यवस्था हैं।
केवल प्रकृति दोषी नहीं
प्राकृतिक आपदा को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन प्राकृतिक खतरे को मानवीय त्रासदी बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है। हिमालय में अनियंत्रित सड़क चैड़ीकरण, पहाड़ों की कटाई, नदी के प्राकृतिक मार्ग में निर्माण, अत्यधिक पर्यटन, जलविद्युत परियोजनाओं का दबाव, कमजोर जल-निकासी व्यवस्था और भूगर्भीय संवेदनशीलता की अनदेखी जोखिम को बढ़ाती है। सरकार की ओर से भी कई महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं। उपग्रह निगरानी, भूस्खलन मानचित्रण, हिमनदीय झीलों की निगरानी, चेतावनी प्रणालियां, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजनाएं और बचाव बलों की क्षमता में वृद्धि हुई है। हिमाचल सहित पर्वतीय राज्यों के लिए केंद्र ने आपदा जोखिम कम करने, समुदाय आधारित तैयारी और प्रारंभिक चेतावनी को मजबूत करने के कार्यक्रम चलाए हैं। भू-स्थान आधारित चेतावनी व्यवस्था के माध्यम से मौसम विभाग, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और अन्य संस्थाओं की चेतावनियों को जोड़ने की व्यवस्था भी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब पर्याप्त है?
हिमालय के लिए नई विकास नीति जरूरी
अब समय राहत और पुनर्वास से आगे बढ़कर आपदा रोकथाम आधारित विकास का है। हर पहाड़ी जिले की वहन क्षमता वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित की जानी चाहिए। जहां भूस्खलन का खतरा अधिक है, वहां निर्माण पर स्पष्ट प्रतिबंध होना चाहिए। नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में निर्माण रोकना होगा। बड़ी सड़क, सुरंग और जलविद्युत परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल एक परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि पूरी घाटी पर उनके संयुक्त प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। हर संवेदनशील हिमनदीय झील की चैबीसों घंटे निगरानी हो। उपग्रह, ड्रोन, स्वचालित सेंसर, मौसम केंद्र और स्थानीय लोगों की सूचनाओं को एक साथ जोड़कर वास्तविक समय की चेतावनी व्यवस्था बनाई जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात, चेतावनी केवल सरकारी कार्यालय तक नहीं पहुंचनी चाहिए। वह गांव के अंतिम घर तक पहुंचे। सायरन हो, मोबाइल संदेश हो, सुरक्षित मार्ग पहले से तय हों और स्थानीय युवाओं को बचाव का प्रशिक्षण मिले। सरकार को हिमालयी आपदाओं का एक सार्वजनिक राष्ट्रीय आंकड़ा केंद्र भी बनाना चाहिए, जिसमें प्रत्येक घटना के मृतक, घायल, लापता, विस्थापित, आर्थिक नुकसान, सड़क बंद होने की अवधि और पुनर्निर्माण की स्थिति दर्ज हो। आज केंद्र स्वयं स्वीकार करता है कि देशभर की आपदाओं में जान-माल के नुकसान का कोई केंद्रीय समेकित आंकड़ा उसके पास नहीं है और आंकड़े राज्यों से प्राप्त रिपोर्टों पर आधारित हैं।
केदारनाथ से चमोली, सिक्किम से हिमाचल और अब नेपाल तक हिमालय लगातार हमें एक ही संदेश दे रहा है, पहाड़ को केवल संसाधन समझकर उसके साथ व्यवहार नहीं किया जा सकता। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। सैकड़ों हिमनदीय झीलों का विस्तार हो रहा है। अत्यधिक वर्षा की घटनाएं गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं। भूस्खलन लगातार जीवन और बुनियादी ढांचे को प्रभावित कर रहे हैं। हिमालय को विकास से अलग करना समाधान नहीं है। समाधान है-हिमालय की प्रकृति के अनुरूप विकास। सड़कें बनें, लेकिन पहाड़ काटकर नहींय बिजली बने, लेकिन घाटियों की वहन क्षमता को नष्ट करके नहींय पर्यटन बढ़े, लेकिन प्रकृति की सीमा तोड़कर नहीं। क्योंकि सवाल यह नहीं है कि अगली आपदा आएगी या नहीं। सवाल यह है कि जब अगली आपदा आएगी, तब हम कितनी जानें बचाने के लिए तैयार होंगे। और उससे भी बड़ा सवाल है-’’क्या हम हिमालय को बचाने के लिए अपनी विकास की परिभाषा बदलने को तैयार हैं?’’

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 1 सितंबर 2026

कविता का स्तर-मंच से सोशल मीडिया तक

 लेख-

कविता मनुष्य की संवेदना, कल्पना और विचार की सबसे सघन अभिव्यक्तियों में से एक है। वह केवल तुकबंदी या भावुक शब्दों का समूह नहीं, बल्कि अपने समय, समाज और मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व को शब्द देने की कला है। इसलिए कविता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसे कितनी तालियाँ मिलीं, कितने लोगों ने उसे सुना या सोशल मीडिया पर कितने लोगों ने उसे लाइक और शेयर किया। आज कविता एक दिलचस्प संक्रमण के दौर से गुजर रही है। एक ओर कवि सम्मेलन और साहित्यिक मंच हैं, जहाँ कविता सामूहिक रूप से सुनी जाती है, दूसरी ओर फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल मंच हैं, जहाँ कविता कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक पहुँच जाती है। माध्यम बदला है, पाठक बदला है और प्रस्तुति का ढंग भी बदला है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न है-क्या कविता का स्तर भी बदल गया है?
मंच की कविता और उसका साहित्यिक अनुशासन
कभी कवि सम्मेलन केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं होते थे। वे साहित्यिक संस्कार के सार्वजनिक मंच थे। कवि अपनी रचना को बार-बार सँवारकर श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करता था। भाषा, छंद, लय, बिंब, प्रतीक और कथ्य पर पर्याप्त मेहनत की जाती थी। श्रोता भी कविता को सुनने और समझने की तैयारी के साथ आते थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य के संबंध को व्यापक सामाजिक जीवन और लोकमंगल से जोड़कर देखने पर जोर दिया। उनके आलोचनात्मक चिंतन में साहित्य का मूल्य केवल मनोरंजन में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के व्यापक हित से भी जुड़ता है। यही दृष्टि आज भी कविता के मूल्यांकन के लिए उपयोगी है। कविता कितनी लोकप्रिय है, यह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे पहले यह देखना जरूरी है कि कविता मनुष्य के अनुभव को कितनी गहराई से व्यक्त करती है। मंचीय कविता में हास्य, व्यंग्य, वीर रस, श्रृंगार और सामाजिक सरोकार सभी के लिए स्थान रहा है। समस्या हास्य या मनोरंजन में नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कविता का उद्देश्य केवल तत्काल तालियाँ प्राप्त करना रह जाए। तालियाँ कविता का पुरस्कार हो सकती हैं, लेकिन कविता की गुणवत्ता का प्रमाणपत्र नहीं।
तालियों से लोकप्रियता तक
मंच पर कवि की लोकप्रियता का एक बड़ा आधार उसकी प्रस्तुति होती है। प्रभावशाली आवाज, चेहरे के भाव, मंच संचालन और श्रोताओं से संवाद कविता के प्रभाव को बढ़ाते हैं। कई बार साधारण पंक्ति भी शानदार प्रस्तुति के कारण खूब तालियाँ बटोर लेती है और गंभीर कविता अपेक्षाकृत शांत प्रतिक्रिया के साथ समाप्त हो जाती है। यहाँ हमें लोकप्रियता और श्रेष्ठता के बीच का अंतर समझना होगा। हर लोकप्रिय कविता श्रेष्ठ नहीं होती और हर श्रेष्ठ कविता तत्काल लोकप्रिय हो, यह भी आवश्यक नहीं। साहित्य का प्रभाव कई बार धीरे-धीरे विकसित होता है। कुछ कविताएँ सुनते ही तालियाँ पाती हैं, जबकि कुछ कविताएँ सुनने के बाद पाठक के भीतर लंबे समय तक काम करती रहती हैं। नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने कविता के नए प्रतिमान के माध्यम से समकालीन कविता को परखने के लिए नए मानदंडों की आवश्यकता पर बल दिया था। उनके अनुसार आलोचना का काम केवल रचना की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसके रचनात्मक और वैचारिक पक्षों की पड़ताल करना भी है। इसलिए कविता को केवल मंचीय प्रभाव से नहीं, उसके कथ्य और शिल्प से भी परखा जाना चाहिए।
सोशल मीडिया ने बदली कविता की दुनिया
सोशल मीडिया ने कविता के सामने अभूतपूर्व संभावनाएँ खोल दी हैं। अब किसी कवि को अपनी कविता प्रकाशित कराने के लिए किसी पत्रिका के संपादकीय कार्यालय के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं। वह अपनी कविता स्वयं प्रकाशित कर सकता है और कुछ ही समय में देश-दुनिया के पाठकों तक पहुँच सकता है। डिजिटल माध्यम ने कविता को अधिक लोकतांत्रिक बनाया है। छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों से लिखने वाले अनेक रचनाकारों को पाठक मिले हैं। कविता की वीडियो प्रस्तुति ने उन लोगों को भी कविता से जोड़ा है, जो शायद पारंपरिक साहित्यिक गोष्ठियों तक कभी नहीं पहुँच पाते। हाल के एक आलोचनात्मक लेख में डॉ. सुशील कुमार शर्मा ने भी रेखांकित किया है कि डिजिटल युग ने साहित्य को बहुत तेजी से आम पाठक तक पहुँचाया है, लेकिन अनुशासन और आत्मचिंतन के अभाव में यही लोकतांत्रिक मंच साहित्य के लिए चुनौती भी बन सकता है। यही सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों है। यहाँ प्रवेश सबके लिए खुला है, लेकिन साहित्यिक कसौटी का द्वार स्वयं लेखक को बनाना पड़ता है।
लाइक-शेयर बनाम साहित्यिक गुणवत्ता
सोशल मीडिया ने कविता के मूल्यांकन की एक नई समस्या पैदा की है। कविता के नीचे हजारों लाइक दिखाई देते हैं तो हम उसे स्वतः अच्छी कविता मान लेते हैं। कोई कविता लाखों बार देखी जाती है तो उसे सफल समझ लिया जाता है। लेकिन क्या व्यूज साहित्यिक गुणवत्ता का पैमाना हैं? निश्चित रूप से नहीं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उस सामग्री को अधिक लोगों तक पहुँचाता है, जो तुरंत ध्यान आकर्षित करती है। छोटी, भावुक, चैंकाने वाली या आसानी से साझा की जा सकने वाली पंक्तियाँ तेजी से फैलती हैं। गंभीर और विचारप्रधान कविता को कई बार उतनी तत्काल लोकप्रियता नहीं मिलती। यहीं से एक दूसरी समस्या पैदा होती है। कविता और कथन के बीच का अंतर मिटने लगता है। किसी सामान्य जीवन-सूक्ति को चार पंक्तियों में तोड़ देना कविता नहीं बन जाता। प्रेम, अकेलापन, सफलता, असफलता या रिश्तों पर भावुक वाक्य लिख देना अभिव्यक्ति हो सकती है, लेकिन साहित्यिक कविता बनने के लिए उसमें भाषा का सौंदर्य, अनुभव की प्रामाणिकता, कल्पना और कलात्मक संरचना भी आवश्यक है। कविता लिखना आसान हो सकता है, अच्छी कविता लिखना कठिन है।
कविता का भविष्य, माध्यम नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण
आधुनिक हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह का उदाहरण यहाँ विशेष रूप से प्रासंगिक है। उनके काव्य में सामान्य जीवन, गाँव-कस्बे की संवेदना, सामाजिक यथार्थ और प्रकृति के प्रति गहरी चिंता दिखाई देती है। एक शोध-अध्ययन उन्हें आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख कवियों में रखते हुए उनकी कविता में ग्रामीण-कस्बाई संवेदना, यथार्थबोध और पर्यावरणीय चेतना को विशेष रूप से रेखांकित करता है। केदारनाथ सिंह का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने साधारण जीवन के अनुभवों को साधारण भाषा में लिखते हुए भी कविता को साधारण नहीं होने दिया। यही अंतर सोशल मीडिया की अनेक लोकप्रिय कविताओं और टिकाऊ साहित्य के बीच दिखाई देता है। नंदकिशोर नवल ने केदारनाथ सिंह की कविता में सुंदर और मूल्यवान चीजों के प्रति आकर्षण तथा दुनिया को बेहतर बनाने वाली शक्ति के प्रति आशावाद को महत्वपूर्ण माना है। आज के कवि के सामने चुनौती यही है कि वह सोशल मीडिया की तात्कालिक लोकप्रियता के दबाव में अपनी कविता की गंभीरता न खो दे। सोशल मीडिया को कविता का दुश्मन मानना भी गलत होगा और उसे कविता का अंतिम मानदंड मान लेना भी। मंच और सोशल मीडिया दोनों की अपनी उपयोगिता है। मंच कविता को सामूहिक श्रवण और जीवंत संवाद देता है। सोशल मीडिया उसे व्यापक पहुँच और नए पाठक देता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि माध्यम कविता पर हावी न हो जाए। कविता का स्तर लाइक, शेयर और व्यूज से नहीं तय होना चाहिए। उसे भाषा, संवेदना, विचार, शिल्प और समय की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। आलोचना की भूमिका भी इसी कारण आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर नामवर सिंह तक हिंदी आलोचना की परंपरा हमें यही सिखाती है कि साहित्य को उसके व्यापक संदर्भ, रचनात्मकता और सामाजिक अर्थों के साथ पढ़ा जाना चाहिए। नामवर सिंह स्वयं आलोचना को रचना के साथ गंभीर संवाद की प्रक्रिया मानते थे। अंततः कविता का माध्यम बदल सकता है, उसका पाठक बदल सकता है और उसकी प्रस्तुति का तरीका भी बदल सकता है, लेकिन अच्छी कविता की पहचान नहीं बदलती। वह मनुष्य के भीतर कुछ जगाती है, उसे सोचने पर विवश करती है और पढ़े या सुने जाने के बाद भी भीतर बनी रहती है। मंच की तालियाँ क्षणिक हैं, सोशल मीडिया के व्यूज भी। लेकिन सच्ची कविता समय से संवाद करती है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कविता मंच पर बेहतर है या सोशल मीडिया पर। असली प्रश्न यह है कि हम कविता को लोकप्रिय बनाने के साथ-साथ श्रेष्ठ बनाने की चिंता भी कर रहे हैं या नहीं। यदि कविता के साथ साहित्यिक अनुशासन, आत्मालोचन और भाषा के प्रति ईमानदारी बनी रहती है तो सोशल मीडिया कविता के पतन का माध्यम नहीं, उसके विस्तार का सबसे शक्तिशाली माध्यम सिद्ध हो सकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 18 अगस्त 2026

बदलते समय में रक्षा के अर्थ की तलाश

 रक्षाबंधन पर्व 28 अगस्त पर विशेष लेख-

रक्षाबंधन को सामान्यतः भाई-बहन के प्रेम का पर्व कहा जाता है। बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन यदि हम इस पर्व को केवल इसी परंपरा तक सीमित कर दें तो शायद उसके व्यापक अर्थ को समझने से चूक जाएँगे। रक्षाबंधन की यात्रा बहुत लंबी है। इसका मूल रक्षा-सूत्र की प्राचीन परंपरा में दिखाई देता है, पुराणों ने इसे धार्मिक आख्यानों से जोड़ा, लोकजीवन ने इसे भाई-बहन के रिश्ते का पर्व बनाया और आधुनिक भारत में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे सामाजिक एकता का प्रतीक तक बना दिया। आज जब परिवारों के भीतर संवाद कम हो रहा है, सामाजिक तनाव बढ़ रहे हैं और रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिक होते जा रहे हैं, तब रक्षाबंधन की उपयोगिता पहले से कहीं अधिक दिखाई देती है। जरूरत केवल इस बात की है कि हम “रक्षा” शब्द का अर्थ समय के साथ बदलकर समझें।
रक्षा-सूत्र की प्राचीन परंपरा
रक्षाबंधन का कोई एक निश्चित ऐतिहासिक आरंभ-वर्ष बताना कठिन है। इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय परंपरा के रक्षा-सूत्र में मिलती हैं। वैदिक और उत्तरवैदिक परंपराओं में अनिष्ट से बचाने और मंगलकामना के लिए पवित्र सूत्र बाँधने की परंपरा रही है। बाद के ग्रंथों में श्रावण पूर्णिमा को रक्षा-सूत्र बाँधने की परंपरा के उल्लेख मिलते हैं। भविष्य पुराण से जुड़ी प्रसिद्ध कथा में देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी द्वारा इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधने का उल्लेख आता है। यहाँ राखी भाई-बहन के संबंध का प्रतीक नहीं, बल्कि संकट से रक्षा और विजय की कामना का प्रतीक है। यही बात रक्षाबंधन के मूल अर्थ की ओर संकेत करती है। रक्षा का अर्थ प्रारंभ से ही केवल किसी एक व्यक्ति की रक्षा करना नहीं था, यह कल्याण और सुरक्षा की व्यापक कामना थी।
कृष्ण-द्रौपदी से लेकर लोकजीवन तक
कृष्ण और द्रौपदी की कथा रक्षाबंधन के साथ सबसे लोकप्रिय रूप से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार कृष्ण की उँगली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। कृष्ण ने इस स्नेह को स्वीकार किया और द्रौपदी के प्रति संरक्षण का भाव रखा। ऐतिहासिक दृष्टि से इसे आधुनिक रक्षाबंधन की शुरुआत का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन भारतीय लोकमानस ने इस कथा में राखी के भाव को पहचान लिया यानी संकट में साथ खड़े होना। लक्ष्मी-बलि और यम-यमुना जैसी कथाएँ भी इस पर्व के अर्थ को अलग-अलग रूपों में सामने लाती हैं। इन कथाओं की ऐतिहासिकता से अलग उनका सांस्कृतिक संदेश स्पष्ट है यानी रिश्ते केवल नाम के नहीं होते, उनमें दायित्व भी जुड़े होते हैं।
भाई-बहन का पर्व कैसे बना
समय के साथ रक्षा-सूत्र की व्यापक परंपरा का एक महत्वपूर्ण रूप भाई-बहन के संबंध से जुड़ गया। विशेष रूप से उत्तर भारतीय सामाजिक जीवन में विवाह के बाद बहन का मायके से संबंध बनाए रखने में भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्ष में एक बार बहन का मायके आना, भाई की कलाई पर राखी बाँधना और दोनों का एक-दूसरे के प्रति दायित्व दोहराना सामाजिक संबंधों को मजबूत करता था। इस दृष्टि से राखी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी। वह परिवार की स्मृति और संबंधों की पुनर्पुष्टि का अवसर भी थी। लेकिन आज इस परंपरा को एक नए अर्थ की आवश्यकता है। यदि हम अब भी यह मानें कि केवल भाई ही रक्षक है और बहन केवल संरक्षण पाने वाली है, तो हम आधुनिक सामाजिक वास्तविकता से पीछे रह जाएँगे। आज बहन भी भाई की उतनी ही बड़ी ताकत बन सकती है। इसलिए आधुनिक राखी का संदेश होना चाहिए-“हम एक-दूसरे की रक्षा और सहायता करेंगे।”
कर्णावती और हुमायूँ की कहानी
रक्षाबंधन के साथ रानी कर्णावती और हुमायूँ की कहानी भी लोकप्रिय है। कहा जाता है कि मेवाड़ पर संकट के समय कर्णावती ने हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता माँगी थी। हालांकि इतिहासकार इस कथा के विवरण और प्रमाणों को लेकर सावधानी बरतते हैं, इसलिए इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य कहना उचित नहीं होगा। फिर भी इस कथा का सांस्कृतिक महत्व है। यह बताती है कि राखी की कल्पना रक्त संबंधों से आगे जाकर विश्वास और संरक्षण के रिश्ते के रूप में भी की गई।
जब ठाकुर ने राखी को बना दिया एकता का प्रतीक
रक्षाबंधन का आधुनिक इतिहास 1905 में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेता है। ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया। इस विभाजन के विरोध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राखी को हिंदू-मुस्लिम एकता और बंगाल की अखंडता का प्रतीक बनाया। उन्होंने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बाँधने का आह्वान किया। इस तरह राखी का अर्थ परिवार से निकलकर समाज तक पहुँच गया। एक हिंदू दूसरे मुसलमान की कलाई पर राखी बाँध सकता था और दोनों यह कह सकते थे कि हम एक-दूसरे के साथ हैं। यह प्रसंग आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। जब धर्म, जाति, भाषा और राजनीतिक विचारों के आधार पर समाज में दूरी पैदा होती दिखाई देती है, तब ठाकुर का संदेश हमें याद दिलाता है कि रक्षा केवल व्यक्ति की नहीं, सामाजिक सद्भाव की भी करनी होती है।
भारत में हर जगह एक जैसी राखी क्यों नहीं?
भारत की विविधता के कारण श्रावण पूर्णिमा का स्वरूप भी हर क्षेत्र में समान नहीं रहा। महाराष्ट्र और कोंकण के तटीय क्षेत्रों में नारली पूर्णिमा प्रमुख है। मछुआरा समुदाय समुद्र और वरुण की पूजा करता है तथा नारियल अर्पित करता है। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इसी समय अवनि अवित्तम या उपाकर्म की परंपरा प्रमुख है, जिसमें यज्ञोपवीत परिवर्तन और वैदिक अध्ययन से जुड़े संस्कार होते हैं। ओडिशा में गम्हा पूर्णिमा का अपना सांस्कृतिक महत्व है, जिसका संबंध स्थानीय धार्मिक, कृषि और पशुधन परंपराओं से है। पश्चिम बंगाल में इसी समय झूलन पूर्णिमा की वैष्णव परंपरा भी महत्वपूर्ण रही है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इन क्षेत्रों में रक्षाबंधन “मनाया ही नहीं जाता।” अधिक सटीक बात यह है कि एक ही तिथि को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग सांस्कृतिक परंपराएँ प्रमुख रही हैं।
आज के संदर्भ में रक्षा का अर्थ
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज रक्षाबंधन की उपयोगिता क्या है? आज महिला को केवल पुरुष की शारीरिक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। उसे सम्मान, समान अवसर, स्वतंत्र निर्णय, शिक्षा और सुरक्षित सामाजिक वातावरण चाहिए। इसी तरह पुरुष भी भावनात्मक सुरक्षा, पारिवारिक सहयोग और विश्वास चाहता है। इसलिए आज राखी का अर्थ होना चाहिए-सुरक्षा नहीं, पारस्परिक सहारा। भाई बहन के साथ खड़ा हो और बहन भाई के साथ। एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझना, बीमारी या आर्थिक संकट में साथ देना, अकेलेपन में बातचीत करना और जीवन के निर्णयों में सम्मान देना, यही आज की वास्तविक रक्षा है।
परिवार में संवाद का पर्व
आज परिवार एक छत के नीचे रहते हुए भी कई बार एक-दूसरे से दूर हैं। मोबाइल, सामाजिक माध्यम और व्यस्त जीवन ने संवाद का स्थान कम कर दिया है। ऐसे समय में रक्षाबंधन परिवार को फिर से एक साथ बैठने का बहाना देता है। जरूरी नहीं कि राखी के साथ महँगा उपहार दिया जाए। कभी-कभी एक घंटा साथ बैठना, पुराने दिनों को याद करना और यह पूछ लेना कि “तुम सचमुच ठीक हो?” किसी भी महँगे उपहार से अधिक मूल्यवान हो सकता है।
रक्षा केवल बहन की नहीं
आज हमें यह भी समझना होगा कि समाज में अनेक लोग भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा की जरूरत महसूस करते हैं। बुजुर्ग, अकेले रहने वाले लोग, आर्थिक कठिनाइयों से गुजरते परिवार, बच्चे और वे लोग जो किसी कारण से समाज के हाशिए पर हैं। यदि रक्षाबंधन हमें किसी कमजोर व्यक्ति के साथ खड़े होने की प्रेरणा देता है तो यह पर्व अपने मूल अर्थ के और निकट पहुँचता है। रक्षाबंधन की हजारों वर्षों की यात्रा में इसका अर्थ लगातार विस्तृत हुआ है। प्राचीन रक्षा-सूत्र से शुरू होकर यह पुराणिक कथाओं, लोकजीवन, भाई-बहन के संबंध और फिर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के माध्यम से सामाजिक एकता तक पहुँचा। रक्षा का अर्थ अब केवल यह नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा। रक्षा का अर्थ यह है कि मनुष्य मनुष्य के साथ खड़ा होगा। रिश्तों की रक्षा होगी। सम्मान की रक्षा होगी। स्त्री की गरिमा की रक्षा होगी। बुजुर्गों की उपेक्षा से रक्षा होगी। बच्चों के भविष्य की रक्षा होगी। समाज में सद्भाव की रक्षा होगी और सबसे बढ़कर मानवीय संवेदना की रक्षा होगी। राखी का धागा बहुत पतला होता है, लेकिन वह हमें एक बहुत मजबूत बात याद दिलाता है कि रिश्ते खून से बन सकते हैं, पर विश्वास और जिम्मेदारी से टिकते हैं। इसलिए इस रक्षाबंधन पर यदि भाई बहन की कलाई पर राखी बाँधते हुए केवल इतना कह दे-“जब भी जरूरत होगी, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा” और बहन भी यही वचन भाई को दे दे, तो शायद सदियों पुरानी इस परंपरा को आज के समय का सबसे सुंदर अर्थ मिल जाए। क्योंकि वास्तविक रक्षा कलाई पर बँधे धागे से नहीं, मुश्किल समय में थामे गए हाथ से होती है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 11 अगस्त 2026

रूस की फैक्ट्रियों में ‘गुलाम ब्रिगेड’

 समसामयिक लेख-

दुनिया के सबसे बंद और दमनकारी देशों में गिने जाने वाले उत्तर कोरिया की तस्वीर आमतौर पर मिसाइलों, परमाणु हथियारों और तानाशाह किम जोंग उन की सैन्य परेडों के साथ सामने आती है। लेकिन इस चमकदार सैन्य शक्ति के पीछे एक और भयावह व्यवस्था चलती है, अपने नागरिकों को विदेशों में काम करने भेजना और उनके श्रम से विदेशी मुद्रा अर्जित करना। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यह व्यवस्था एक नए और अधिक चिंताजनक रूप में दिखाई दे रही है। रूस में श्रमिकों की कमी और उत्तर कोरिया-रूस के बढ़ते सैन्य गठजोड़ के बीच उत्तर कोरियाई नागरिकों के रूस पहुंचने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। निर्माण स्थलों से लेकर माल-वितरण केंद्रों और दूसरे श्रम-प्रधान क्षेत्रों तक उत्तर कोरियाई कामगारों की मौजूदगी दर्ज की गई है। इनमें महिलाओं की मौजूदगी ने विशेष चिंता पैदा की है। वर्ष 2025 में रूस की ऑनलाइन खरीद-बिक्री कंपनी ‘वाइल्डबेरीज’ के एक माल-वितरण केंद्र में सैकड़ों उत्तर कोरियाई महिलाओं के कथित रूप से काम करने की खबर सामने आई थी। हालांकि कंपनी ने विदेशी श्रमिकों के एक परीक्षण कार्यक्रम की बात स्वीकार की थी, लेकिन इन महिलाओं की उत्तर कोरियाई पहचान और उनकी वास्तविक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई थी।
पासपोर्ट से लेकर मजदूरी तक पर नियंत्रण
वर्ष 2026 में ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ की एक महत्वपूर्ण जांच ने इस पूरे तंत्र की भयावहता पर नया प्रकाश डाला है। संगठन ने रूस के तीन शहरों में निर्माण स्थलों पर काम कर चुके 21 उत्तर कोरियाई श्रमिकों के साक्षात्कार किए। उनके अनुसार रूस पहुंचने के बाद उनके पासपोर्ट जब्त कर लिए गए और उन्हें प्रतिदिन 12 से 16 घंटे तक काम करना पड़ा। कुछ श्रमिकों ने वर्ष में 364 दिन तक काम करने की बात कही। यहां सवाल सिर्फ लंबे काम के घंटों का नहीं है। असली सवाल है, क्या इन श्रमिकों को अपने श्रम और अपनी कमाई पर अधिकार है? ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ की रिपोर्ट के अनुसार कुछ श्रमिक लगभग 800 डॉलर अर्थात करीब 67 हजार रुपये प्रतिमाह की मजदूरी अर्जित करते थे, लेकिन उत्तर कोरियाई सरकार अनिवार्य कोटे और दूसरी कटौतियों के जरिए लगभग 600 डॉलर तक ले लेती थी। कुछ मामलों में श्रमिक के हाथ में महीने के अंत में केवल लगभग 10 डॉलर यानी करीब 850 रुपये ही बचते थे। उत्तर कोरिया विशेषज्ञ येझी किम ने एक बातचीत में बताया कि कुछ श्रमिकों को प्रतिदिन 16 घंटे तक काम करना पड़ता है, उन्हें छुट्टी नहीं मिलती और उनके हाथ में महीने के अंत में बहुत मामूली रकम बचती है। उनका आकलन इस बात की ओर संकेत करता है कि विदेश भेजे गए श्रमिकों की कमाई पर प्योंगयांग का नियंत्रण बेहद कठोर है।
‘गुलामी’ शब्द क्यों इस्तेमाल हो रहा है?
यहां ‘गुलाम’ शब्द केवल भावनात्मक विशेषण नहीं है। मानवाधिकार संगठनों ने जिन परिस्थितियों का वर्णन किया है, उनमें जबरन श्रम के कई संकेत दिखाई देते हैं। जैसे, आवागमन पर प्रतिबंध, दस्तावेजों पर नियंत्रण, लगातार निगरानी, अत्यधिक लंबे काम के घंटे और मजदूरी का बड़ा हिस्सा राज्य द्वारा अपने नियंत्रण में लेना। मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की वरिष्ठ शोधकर्ता लीना यून ने उत्तर कोरिया के विदेश भेजे जाने वाले श्रमिकों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनके अनुसार उत्तर कोरियाई सरकार देश के भीतर और विदेशों में श्रम तथा निगरानी के जरिए अपने नागरिकों का शोषण करती है। लीना यून का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उत्तर कोरिया के साथ संबंधों में केवल मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और विदेशों में तैनात उत्तर कोरियाई नागरिकों की स्थिति को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।
किम जोंग उन के लिए मजदूर भी विदेशी मुद्रा का स्रोत
उत्तर कोरिया पर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हैं। इसलिए विदेशी मुद्रा हासिल करना उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। विदेशों में श्रमिक भेजना प्योंगयांग के लिए इसी आर्थिक रणनीति का हिस्सा रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने पहले भी रूस की कंपनियों और उत्तर कोरियाई संस्थाओं पर कार्रवाई करते हुए कहा था कि वे उत्तर कोरियाई जबरन श्रम के विदेशों में निर्यात में शामिल थे और इससे प्राप्त आय उत्तर कोरियाई सरकार अथवा सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी तक पहुंचती थी। वर्ष 2026 में ‘सिटिजन्स अलायंस फॉर नॉर्थ कोरियन ह्यूमन राइट्स’ की एक जांच ने रूस में उत्तर कोरिया से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का दावा किया। संगठन के अनुसार रूस में उत्तर कोरिया से जुड़ी अनेक सैन्य एवं सुरक्षा कंपनियों तथा बड़ी संख्या में रूसी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों और वित्तीय संस्थाओं के बीच ऐसा नेटवर्क मौजूद है, जो श्रमिकों की तैनाती से मिलने वाले राजस्व को उत्तर कोरिया के सैन्य और परमाणु कार्यक्रमों से जोड़ता है। इसका अर्थ यह है कि किसी रूसी निर्माण स्थल पर ईंट लगाने वाला मजदूर केवल एक मजदूर नहीं रह जाता। उसके श्रम से उत्पन्न धन का एक हिस्सा उस शासन की आर्थिक क्षमता बढ़ा सकता है, जो परमाणु हथियार और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम चला रहा है।
यूक्रेन युद्ध ने बदली पूरी तस्वीर
रूस के लिए भी यह व्यवस्था सुविधाजनक है। यूक्रेन युद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी पैदा की है। निर्माण, माल-वितरण, कारखानों और दूसरे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में अतिरिक्त हाथों की जरूरत बढ़ी है। रूस और उत्तर कोरिया के बीच वर्ष 2024 में हुई व्यापक रणनीतिक साझेदारी ने दोनों देशों को एक-दूसरे की जरूरतों के और करीब ला दिया। उत्तर कोरिया रूस को हथियार और सैनिक उपलब्ध करा रहा है, जबकि रूस के साथ आर्थिक और राजनीतिक सहयोग प्योंगयांग को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दबाव से राहत देता दिखाई देता है। रॉयटर्स की 6 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार रूस के युद्ध प्रयासों में उत्तर कोरिया की भूमिका काफी बढ़ गई है। हजारों उत्तर कोरियाई सैनिकों के अलावा निर्माण और अन्य कार्यों के लिए भी उत्तर कोरियाई कर्मियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। इसलिए रूस में उत्तर कोरियाई श्रमिकों का प्रश्न अब केवल ‘मजदूरों की कमी’ का प्रश्न नहीं है। यह रूस-उत्तर कोरिया की व्यापक रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध और रूस की भूमिका
सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि उत्तर कोरियाई नागरिकों को विदेशों में रोजगार दिलाने की व्यवस्था पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रतिबंध लगाए हैं। सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 2397 के तहत उत्तर कोरियाई नागरिकों को विदेशों में आय अर्जित करने के लिए भेजने की व्यवस्था पर रोक लगाई गई थी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि विदेशों में काम करने वाले उत्तर कोरियाई नागरिकों से प्राप्त विदेशी मुद्रा प्योंगयांग के हथियार कार्यक्रमों तक न पहुंचे। लेकिन आज स्थिति यह है कि उसी रूस के साथ उत्तर कोरिया का संबंध इतना गहरा हो गया है कि इन प्रतिबंधों को लागू कराना बेहद कठिन हो गया है। यही कारण है कि इस पूरे मामले को केवल ‘मजदूरों के शोषण’ के रूप में देखना अधूरा होगा। यह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध व्यवस्था की कमजोरी और बदलती वैश्विक राजनीति का भी उदाहरण है।
महिलाएं सबसे आसान निशाना?
उत्तर कोरियाई महिलाओं की स्थिति इस कहानी को और गंभीर बनाती है। ‘वाइल्डबेरीज’ के मामले में सामने आई तस्वीरों और रिपोर्टों में एक जैसी पोशाक पहने महिलाओं को समूहों में काम करते दिखाया गया था। उनके साथ पुरुष पर्यवेक्षकों की मौजूदगी और नियंत्रित आवागमन की खबरों ने सवाल खड़े किए। हालांकि इन दावों का हर हिस्सा स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है, इसलिए इन्हें अंतिम तथ्य के बजाय आरोप और रिपोर्ट के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन व्यापक उत्तर कोरियाई श्रम व्यवस्था को लेकर उपलब्ध प्रमाण कहीं अधिक मजबूत हैं। ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ के अनुसार उत्तर कोरिया के भीतर भी महिलाओं समेत विभिन्न वर्गों से जबरन श्रम कराया जाता है। विदेशों में भेजे गए श्रमिकों के मामले में पासपोर्ट, आवाजाही और संपर्क पर नियंत्रण इस व्यवस्था को और कठोर बनाता है।
परिवार बन जाता है ‘गारंटी’
इस व्यवस्था का सबसे भयावह पक्ष शायद वह है जो कारखाने की दीवारों के बाहर दिखाई ही नहीं देता। ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ के अनुसार रूस में काम करने वाले उत्तर कोरियाई श्रमिकों पर केवल व्यक्तिगत निगरानी ही नहीं रहती। भागने या विरोध करने की स्थिति में उत्तर कोरिया में उनके परिवारों को भी रोजगार, आवास, आर्थिक दंड, पूछताछ और अन्य दमन का सामना करना पड़ सकता है। अर्थात एक श्रमिक रूस में बंद है तो उसके परिवार की जिंदगी उत्तर कोरिया में बंधक बनी रहती है। यही वह तंत्र है जो श्रमिक को भागने से रोकता है, भले ही वह स्वयं रूस की किसी फैक्ट्री या निर्माण स्थल से बाहर निकलना चाहता हो।
दो सरकारों का हित, मजदूर का नुकसान
यह पूरा मॉडल तीन स्तरों पर काम करता दिखाई देता है। पहला, रूस को सस्ते और अनुशासित श्रमिक मिलते हैं। दूसरा, उत्तर कोरियाई शासन को विदेशी मुद्रा मिलती है। तीसरा, दोनों देशों के बीच बढ़ता रणनीतिक गठजोड़ प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बावजूद मजबूत होता है।
नुकसान किसका है?
उस मजदूर का, जो 12-16 घंटे काम करता है। उस महिला का, जिसकी आवाजाही नियंत्रित है। उस परिवार का, जो उत्तर कोरिया में रहकर किसी संभावित विद्रोह की कीमत चुका सकता है। और अंततः उस वैश्विक व्यवस्था का, जिसने जबरन श्रम को रोकने के लिए नियम बनाए थे।
क्या यह आधुनिक गुलामी है?
कानूनी और मानवाधिकार विशेषज्ञों के लिए आधुनिक गुलामी की पहचान केवल यह नहीं है कि मजदूरी कम है। सवाल है-क्या व्यक्ति अपनी नौकरी छोड़ सकता है? क्या वह अपने दस्तावेज अपने पास रख सकता है? क्या वह स्वतंत्र रूप से घूम सकता है? क्या उसे अपनी कमाई पर अधिकार है? क्या वह विरोध करने पर सुरक्षित रहता है? रूस में उत्तर कोरियाई श्रमिकों के संबंध में उपलब्ध वर्ष 2026 की जांचों में इन सवालों के जवाब बेहद चिंताजनक हैं। ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ ने अपने शोध में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के जबरन श्रम के संकेतकों का इस्तेमाल किया और निगरानी, दबाव तथा राज्य नियंत्रण की व्यापक व्यवस्था का उल्लेख किया है। इसलिए ‘आधुनिक गुलामी’ शब्द को केवल सनसनी पैदा करने वाला शब्द मानकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा। रूस को मजदूर चाहिए और उत्तर कोरिया को विदेशी मुद्रा। यूक्रेन युद्ध ने दोनों की जरूरतों को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। लेकिन सवाल यह है कि इस सौदे में मजदूर की स्वतंत्रता कहां है? एक लोकतांत्रिक दुनिया के लिए यह बेहद असहज सवाल है कि 21वीं सदी में कोई सरकार अपने नागरिकों को हजारों किलोमीटर दूर भेजे, उनके दस्तावेज अपने पास रखे, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा ले और उनके परिवारों को नियंत्रण के साधन के रूप में इस्तेमाल करे और फिर भी यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय राजनीति की परतों में छिपी रहे। किम जोंग उन के लिए यह विदेशी मुद्रा का कारोबार हो सकता है। रूस के लिए यह श्रमिकों की कमी दूर करने का रास्ता हो सकता है। लेकिन उन महिलाओं और पुरुषों के लिए, जो इन कारखानों और निर्माण स्थलों में काम कर रहे हैं, यह उनकी जिंदगी, मेहनत और स्वतंत्रता की कीमत पर होने वाला सौदा है। और शायद इस कहानी का सबसे भयावह पहलू यही है इन मजदूरों का श्रम दिखाई देता है, लेकिन उनका अधिकार नहीं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

विष पीने वाला ही कहलाता है शिव

 महाशिवरात्रि पर विशेष लेख-

आज के दौर में शिवत्व का वास्तविक अर्थ
महाशिवरात्रि केवल व्रत, जलाभिषेक और मंदिरों में दर्शन का पर्व नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर भी है। भगवान शिव का सम्पूर्ण व्यक्तित्व त्याग, धैर्य, करुणा, न्याय और लोककल्याण का प्रतीक है। समुद्र मंथन के समय जब अमृत से पहले कालकूट विष निकला और उसके प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई, तब देवता और दानव दोनों पीछे हट गए। ऐसे समय में भगवान शिव ने वह विष स्वयं ग्रहण कर लिया। उन्होंने विष को न तो निगला और न ही उगला, बल्कि अपने कंठ में धारण किया। तभी से वे नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि आज संसार में विष का स्वरूप बदल गया है। अब यह विष नफरत, हिंसा, असहिष्णुता, झूठ, स्वार्थ, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और मानसिक तनाव के रूप में हमारे सामने है। शिवपुराण, भागवत पुराण और महाभारत में समुद्र मंथन का वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में स्पष्ट संकेत है कि समाज के कल्याण के लिए त्याग करने वाला ही सच्चा नेतृत्व करता है। भारतीय दर्शन में भगवान शिव को संहारक नहीं, बल्कि परिवर्तन के देवता माना गया है। उनका विषपान यह संदेश देता है कि समाज में उत्पन्न नकारात्मकता को समाप्त करने के लिए किसी को उसका भार उठाना ही पड़ता है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-‘लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि।’ अर्थात समाज के हित को ध्यान में रखकर कर्म करना ही श्रेष्ठ है। यद्यपि यह श्लोक सीधे शिव से संबंधित नहीं है, लेकिन लोककल्याण की वही भावना शिव के विषपान में दिखाई देती है। अक्सर लोग विष पीने का अर्थ केवल अन्याय सहना समझ लेते हैं, जबकि धर्मग्रंथ ऐसा नहीं कहते। शिव करुणा के साथ-साथ न्याय के भी प्रतीक हैं। जब अधर्म बढ़ता है तो वही शिव रौद्र रूप धारण करते हैं। अर्थात शिव का संदेश यह है कि समाज की कटुता को अपने भीतर घृणा न बनने दें, लेकिन अन्याय का साहसपूर्वक प्रतिकार अवश्य करें।
आज का विष कैसा है?
आज समाज अनेक प्रकार के विष से घिरा है, जैसे-
1.सोशल मीडिया पर झूठी खबरें और नफरत फैलाने वाले संदेश।
2.छोटी-छोटी बातों पर हिंसा और असहिष्णुता।
3.राजनीतिक कटुता का सामाजिक संबंधों पर प्रभाव।
4.परिवारों में संवाद का अभाव।
5.पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति का दोहन।
6.युवाओं में अवसाद, अकेलापन और मानसिक तनाव।
7.भ्रष्टाचार और नैतिक मूल्यों का हृास।
इन परिस्थितियों में जो व्यक्ति धैर्य, विवेक और संयम बनाए रखकर समाज को जोड़ने का प्रयास करता है, वही आधुनिक अर्थों में शिवत्व का पालन कर रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में देश ने अनेक ऐसी घटनाएँ देखी हैं, जहाँ धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक मतभेदों ने तनाव का रूप लिया। सोशल मीडिया पर अफवाहों ने कई बार वास्तविक जीवन में हिंसा को जन्म दिया। सड़क पर मामूली विवाद भी कभी-कभी गंभीर संघर्ष में बदल जाते हैं। ऐसे समय में समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि समाधान का मार्ग चुनें। जो कटु भाषा का उत्तर कटुता से न दें, बल्कि विवेक और संवाद से दें। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे, ‘शक्ति वही है जो दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझे।’ शिव का विषपान इसी करुणा का सर्वोच्च उदाहरण है। महात्मा गांधी का मानना था कि घृणा का उत्तर घृणा से नहीं दिया जा सकता। यद्यपि गांधीजी ने शिव के विषपान पर विशेष टिप्पणी नहीं की, पर उनका अहिंसा का सिद्धांत इसी भावना से जुड़ता है कि नकारात्मकता का उत्तर सकारात्मकता से दिया जाए। आध्यात्मिक गुरु स्वामी चिन्मयानंद ने कहा था कि समुद्र मंथन मनुष्य के मन का प्रतीक है। जब मन का मंथन होता है तो पहले भीतर का विष यानी क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार बाहर आता है। जो उसे नियंत्रित कर लेता है, वही आत्मविकास की ओर बढ़ता है। श्री श्री रविशंकर भी अनेक अवसरों पर कह चुके हैं कि शिव का अर्थ है असीम चेतना। भीतर के क्रोध और तनाव को साध लेना ही शिवत्व की दिशा है।
शिवरात्रि हमें क्या सिखाती है?
शिवरात्रि केवल पूरी रात जागने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर जागने का अवसर है। यदि इस दिन हम यह संकल्प लें-मैं झूठ नहीं फैलाऊँगा। मैं कटु भाषा का प्रयोग नहीं करूँगा। मैं पर्यावरण की रक्षा करूँगा। मैं परिवार और समाज में संवाद बढ़ाऊँगा। मैं कठिन परिस्थितियों में भी संयम रखूँगा तो यही सच्ची शिवभक्ति होगी। मंदिर में जल चढ़ाना आस्था है, लेकिन किसी प्यासे को जल पिलाना शिव के संदेश को जीवन में उतारना है। बेलपत्र अर्पित करना पूजा है, लेकिन समाज से ईष्र्या, द्वेष और हिंसा का विष कम करना उससे भी बड़ी साधना है।
आज समाज को शिव क्यों चाहिए?
आज दुनिया तकनीकी रूप से जितनी विकसित हुई है, मानसिक रूप से उतनी ही बेचैन भी दिखाई देती है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संतोष घटा है। संवाद बढ़ा है, पर समझ कम हुई है। ऐसे समय में शिव का संदेश केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय आवश्यकता बन गया है। आज हमें ऐसे शिक्षक चाहिएं जो छात्रों का तनाव समझें, ऐसे माता-पिता चाहिएं जो बच्चों को समय दें, ऐसे नेता चाहिएं जो समाज को जोड़ें, ऐसे पत्रकार चाहिएं जो सत्य और संतुलन का पालन करें और ऐसे नागरिक चाहिएं जो मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करें। यही आधुनिक शिवत्व है।
भगवान शिव का विषपान केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए एक शाश्वत आदर्श है। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय को स्वीकार कर लिया जाए, बल्कि यह है कि समाज के हित में अपने अहंकार, क्रोध और स्वार्थ पर नियंत्रण रखा जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर धर्म और न्याय की रक्षा के लिए साहसपूर्वक खड़ा हुआ जाए। महाशिवरात्रि हमें यही संदेश देती है कि यदि हम अपने भीतर के विष यानी क्रोध, ईष्र्या, द्वेष, असत्य और अहंकार का मंथन कर उसे नियंत्रित कर लें, तो प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में शिवत्व का स्पर्श पा सकता है। सच तो यह है कि आज समाज को मंदिरों में जितने शिव चाहिएं, उससे कहीं अधिक चरित्र में शिव चाहिएं। क्योंकि विष पीने वाला ही नहीं, बल्कि विष को समाज में फैलने से रोकने वाला ही वास्तव में शिव कहलाने का अधिकारी है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

बुधवार, 5 अगस्त 2026

कांवड़ यात्रा-आस्था का सम्मान, आमजन परेशान, समाधान कब

 आवश्यक लेख-

हर वर्ष स्कूलों की बंदी, यातायात अव्यवस्था और जनजीवन पर असर के बीच संतुलित व्यवस्था की जरूरत

भारत विविध आस्थाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का देश है। इन्हीं परंपराओं में श्रावण मास में आयोजित होने वाली कांवड़ यात्रा सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में से एक है। हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख, सुल्तानगंज सहित विभिन्न तीर्थों से करोड़ों शिवभक्त गंगाजल लेकर अपने-अपने शिवालयों तक पहुँचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय लोक आस्था का विराट स्वरूप भी है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा के दौरान स्कूल-कॉलेजों की बंदी, लंबा ट्रैफिक जाम, व्यापार पर असर, मरीजों की परेशानी और कानून-व्यवस्था से जुड़े प्रश्न लगातार चर्चा का विषय बने हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आस्था और सामान्य जनजीवन के बीच बेहतर संतुलन स्थापित नहीं किया जा सकता?
पिछले एक दशक में बढ़ा यात्रा का दायरा
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दस वर्षों में कांवड़ यात्रा का स्वरूप पहले की तुलना में कहीं अधिक विशाल हुआ है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और बिहार सहित अनेक राज्यों से करोड़ों श्रद्धालु इसमें भाग लेने लगे हैं। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था, यातायात नियंत्रण और प्रशासनिक चुनौतियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के अनेक जिलों में यात्रा के दौरान कई दिनों तक स्कूल-कॉलेज बंद रखने के आदेश जारी किए जाते रहे हैं। प्रशासन का तर्क है कि लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ और मार्ग परिवर्तन के कारण विद्यार्थियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। वहीं अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि हर वर्ष शिक्षा प्रभावित होना दीर्घकालीन समाधान नहीं हो सकता। कांवड़ यात्रा के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यातायात व्यवस्था होती है। राष्ट्रीय राजमार्गों और प्रमुख सड़कों पर कई किलोमीटर लंबे जाम आम बात बन जाते हैं। कार्यालय जाने वाले कर्मचारियों, व्यापारियों और दैनिक यात्रियों को घंटों सड़क पर बिताने पड़ते हैं। इसके अलावा स्कूल और कॉलेज कई दिनों तक बंद रहते हैं। अस्पताल पहुँचने में मरीजों और एम्बुलेंस को कठिनाई होती है। छोटे व्यापारियों और दैनिक मजदूरों की आय प्रभावित होती है। सार्वजनिक परिवहन बाधित होने से यात्रियों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। कई स्थानों पर छोटी-छोटी घटनाएँ भी कानून-व्यवस्था की चुनौती बन जाती हैं। हालाँकि यह भी सच है कि अधिकांश कांवड़िये पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ यात्रा पूरी करते हैं। विवाद और हिंसा की घटनाएँ सीमित संख्या में होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है।
पिछले दस वर्षों की प्रमुख घटनाएँ
-वर्ष 2016 और 2017 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों पर कांवड़ियों और वाहन चालकों के बीच विवाद तथा तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आईं।
-2018 और 2019 में दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे तथा अन्य मार्गों पर कई घंटे तक जाम लगा। कई जिलों में विद्यालयों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
-2020 और 2021 में कोविड-19 महामारी के कारण यात्रा सीमित रही और कई राज्यों ने प्रतिबंध लगाए।
-2022 से यात्रा फिर सामान्य रूप से प्रारंभ हुई और करोड़ों श्रद्धालुओं की भागीदारी दर्ज की गई। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था और यातायात प्रबंधन फिर बड़ी चुनौती बनकर सामने आया।
-2023, 2024 और 2025 में उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के कई जिलों में स्कूल-कॉलेजों को कई दिनों तक बंद रखने या ऑनलाइन कक्षाएँ संचालित करने के आदेश जारी किए गए।
क्या स्कूल-कॉलेज बंद करना उचित है?
यह प्रश्न दो दृष्टिकोणों से देखा जाना चाहिए। प्रशासन का कहना है कि जब करोड़ों श्रद्धालु सड़कों पर हों और प्रमुख मार्ग पूरी तरह कांवड़ मार्ग घोषित कर दिए जाएँ, तब विद्यार्थियों की सुरक्षा सर्वोपरि हो जाती है। ऐसे में अस्थायी बंदी व्यावहारिक निर्णय माना जाता है। दूसरी ओर शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि केवल कुछ मार्ग प्रभावित हैं, तो पूरे जिले के सभी शिक्षण संस्थानों को बंद करना आवश्यक नहीं होना चाहिए। वैकल्पिक मार्ग, समय परिवर्तन या ऑनलाइन कक्षाओं जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। प्रख्यात शिक्षाविद डॉ. राकेश सिन्हा का मानना है कि धार्मिक आस्था का सम्मान लोकतंत्र की पहचान है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था बार-बार बाधित होना उचित नहीं। प्रशासन को तकनीक और बेहतर प्रबंधन का सहारा लेना चाहिए। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. एस. वाई. कुरैशी ने कई अवसरों पर सार्वजनिक आयोजनों के संदर्भ में कहा है कि लोकतंत्र में सभी नागरिकों के अधिकार समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि किसी एक गतिविधि के कारण दूसरे नागरिकों के अधिकार अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों। प्रबंधन विशेषज्ञ प्रो. अनुज धर का कहना है के भीड़ प्रबंधन केवल पुलिस का विषय नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक योजना, ट्रैफिक इंजीनियरिंग और नागरिक सहभागिता का संयुक्त परिणाम होता है। यातायात विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि पहले से विस्तृत योजना बनाई जाए तो अधिकांश समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
क्या है स्थायी समाधान
हर वर्ष एक जैसी समस्याएँ सामने आने का अर्थ है कि अब अस्थायी नहीं बल्कि दीर्घकालिक समाधान तलाशने होंगे।
1.सबसे पहले प्रमुख कांवड़ मार्गों पर स्थायी कांवड़ कॉरिडोर विकसित किए जाने चाहिए ताकि सामान्य यातायात प्रभावित न हो। 2.यात्रा को चरणबद्ध या क्षेत्रवार व्यवस्थित करने पर विचार किया जा सकता है जिससे एक समय में अत्यधिक भीड़ न हो।
3.केवल कांवड़ मार्ग से जुड़े क्षेत्रों के स्कूलों में अवकाश दिया जाए, जबकि अन्य क्षेत्रों में नियमित पढ़ाई जारी रहे। आवश्यकता पड़ने पर ऑनलाइन या हाइब्रिड कक्षाएँ संचालित की जा सकती हैं।
4.अस्पतालों के लिए चैबीसों घंटे ग्रीन कॉरिडोर सुनिश्चित किया जाए ताकि एम्बुलेंस कभी न रुके।
5.जीपीएस आधारित ट्रैफिक प्रबंधन, वैकल्पिक मार्गों की अग्रिम सूचना, पर्याप्त पार्किंग, अस्थायी शिविर और विश्राम स्थलों का निर्माण भी आवश्यक है।
6.धार्मिक संगठनों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए ताकि श्रद्धालुओं को भी अनुशासन और यातायात नियमों के पालन के लिए प्रेरित किया जा सके।
7.किसी भी प्रकार की तोड़फोड़, हिंसा या कानून हाथ में लेने की घटना पर निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई हो, ताकि पूरी यात्रा की गरिमा बनी रहे।
आस्था और अधिकार-दोनों का सम्मान आवश्यक
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। साथ ही शिक्षा, आवागमन और सुरक्षित जीवन का अधिकार भी सुनिश्चित करता है। इसलिए किसी भी नीति का उद्देश्य इन अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। कांवड़ यात्रा भारत की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान हर नागरिक का दायित्व है। वहीं प्रशासन का यह दायित्व भी है कि आम नागरिकों, विद्यार्थियों, मरीजों और व्यापारियों का जीवन अनावश्यक रूप से प्रभावित न हो।
कांवड़ यात्रा को समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक विशाल सार्वजनिक आयोजन के रूप में देखने की आवश्यकता है, जिसके लिए आधुनिक प्रबंधन, वैज्ञानिक योजना और संवेदनशील प्रशासन अनिवार्य है। हर वर्ष स्कूलों की बंदी, यातायात अव्यवस्था और जनजीवन में बाधा यदि दोहराई जा रही है, तो यह संकेत है कि अब स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर पहल की जानी चाहिए। आस्था और व्यवस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि सरकार, प्रशासन, धार्मिक संगठन और समाज मिलकर दूरदर्शी योजना बनाएँ, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की यात्रा भी सुचारु रूप से संपन्न हो सकती है और आम नागरिकों का जीवन भी सामान्य बना रह सकता है। यही संतुलन भारत की लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक परंपरा की वास्तविक पहचान है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि और पत्रकार)