शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

सख़्त कानून के साथ करनी होगी सख़्त कार्रवाई भी

 विशेष लेख-

पेपरलीक माफिया पर निर्णायक प्रहार का समय
राजस्थान सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपरलीक रोकने के लिए देश के सबसे कठोर कानूनों में से एक लागू करने का निर्णय लिया है। इस कानून के अंतर्गत पेपरलीक कराने वाले संगठित गिरोहों के लिए आजीवन कारावास और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। केंद्र सरकार भी सार्वजनिक परीक्षाओं की सुरक्षा को और सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से कानून को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। निस्संदेह यह एक स्वागतयोग्य पहल है। किन्तु सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल कानून सख़्त कर देने से पेपरलीक की घटनाएँ रुक जाएँगी? पिछले दो दशकों का अनुभव बताता है कि उत्तर है नहीं। कठोर कानून जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक है उसका कठोर, निष्पक्ष और समयबद्ध क्रियान्वयन। प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों, संघर्ष और भविष्य की आधारशिला हैं। एक पेपरलीक लाखों अभ्यर्थियों की वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देता है। परीक्षा निरस्त होती है, नियुक्तियाँ टल जाती हैं, युवाओं की आयु सीमा प्रभावित होती है और व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास डगमगा जाता है।
पेपरलीक का फैलता दायरा
विभिन्न अध्ययनों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पिछले एक दशक में देशभर में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े अनेक बड़े पेपरलीक सामने आए हैं। इन घटनाओं से करोड़ों अभ्यर्थी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित हुए। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन घटनाओं का कोई समेकित राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, जिससे समस्या की वास्तविक व्यापकता का आकलन करना कठिन हो जाता है।
किन राज्यों में सबसे अधिक पेपरलीक हुए
यद्यपि राज्यवार कोई आधिकारिक सूची उपलब्ध नहीं है, फिर भी सार्वजनिक अभिलेखों और चर्चित मामलों के आधार पर निम्नलिखित राज्य सबसे अधिक प्रभावित माने जाते हैं-
1. राजस्थान-राजस्थान पिछले कुछ वर्षों में पेपरलीक की सबसे अधिक घटनाओं के कारण चर्चा में रहा। रीट, द्वितीय श्रेणी शिक्षक भर्ती, उपनिरीक्षक भर्ती, पटवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष, कनिष्ठ अभियन्ता तथा अन्य अनेक भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएँ सामने आईं। हजारों गिरफ्तारियाँ हुईं, अनेक परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं और लाखों अभ्यर्थी प्रभावित हुए। यही कारण है कि राज्य ने अब सबसे कठोर कानून बनाने का निर्णय लिया है।
2. उत्तर प्रदेश-उत्तर प्रदेश में पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा, समीक्षा अधिकारी तथा सहायक समीक्षा अधिकारी परीक्षा सहित कई भर्ती परीक्षाओं में पेपरलीक के आरोप लगे। वर्ष 2024 में लगभग 48 लाख अभ्यर्थियों की पुलिस भर्ती परीक्षा निरस्त करनी पड़ी। यह देश के सबसे बड़े परीक्षा संकटों में से एक था।
3. बिहार-बिहार में बीपीएससी की संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा, सिपाही भर्ती तथा राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) से जुड़े मामलों ने राष्ट्रीय स्तर पर चिंता उत्पन्न की। जाँच एजेंसियों ने अंतरराज्यीय गिरोहों की सक्रियता की ओर संकेत किया।
4. मध्य प्रदेश-व्यापम घोटाला भारतीय इतिहास के सबसे बड़े परीक्षा घोटालों में गिना जाता है। चिकित्सा, अभियांत्रिकी और सरकारी नौकरियों से जुड़ी अनेक परीक्षाएँ वर्षों तक इसकी चपेट में रहीं। यह केवल पेपरलीक का मामला नहीं था, बल्कि पूरे भर्ती तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गया।
5. गुजरात-प्रधान लिपिक, कनिष्ठ लिपिक तथा अन्य भर्ती परीक्षाओं में पेपरलीक की घटनाओं ने राज्य सरकार को कठोर कानून बनाने के लिए विवश किया।
6. उत्तराखंड-उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की भर्ती परीक्षा में पेपरलीक के बाद राज्य ने देश के सबसे कठोर नकल विरोधी कानूनों में से एक लागू किया।
7. महाराष्ट्र-शिक्षक पात्रता परीक्षा तथा अन्य भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाए। स्पष्ट है कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। पेपरलीक अब संगठित अपराध का रूप ले चुका है, जिसकी जड़ें अनेक राज्यों तक फैली हुई हैं।
कठोर कानून के बावजूद सफलता क्यों नहीं
देश के अनेक राज्यों ने समय-समय पर कठोर कानून बनाए। सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया। हजारों पृष्ठों की विवेचनाएँ तैयार हुईं। फिर भी दोषसिद्धि के मामले अपेक्षाकृत बहुत कम दिखाई देते हैं।
इसका कारण है-
1.विवेचना में अत्यधिक विलम्ब।
2.वर्षों तक लंबित न्यायिक प्रक्रिया।
3.मुख्य सूत्रधारों तक पहुँचने में कठिनाई।
4.तकनीकी साक्ष्यों का अभाव।
5.विभिन्न राज्यों की जाँच एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी।
6.कई मामलों में प्रभावशाली लोगों के संरक्षण की आशंकाएँ।
जब अपराधी यह समझ जाता है कि मुकदमा वर्षों तक चलेगा और दण्ड की सम्भावना अनिश्चित है, तब कानून का भय स्वतः कम हो जाता है।
शिक्षा विशेषज्ञ क्या कहते हैं
राष्ट्रीय परीक्षा सुधार समिति के अध्यक्ष तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. के. राधाकृष्णन ने परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों की अनुशंसा करते हुए स्पष्ट कहा था कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। परीक्षा प्रक्रिया को प्रौद्योगिकी आधारित, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना होगा। अनेक शिक्षाविदों का मत है कि परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता ही शिक्षा व्यवस्था की आत्मा है। यदि अभ्यर्थियों का विश्वास समाप्त हो जाए तो पूरी व्यवस्था खोखली हो जाती है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा कि परीक्षा की पवित्रता और विश्वसनीयता सर्वोपरि है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि परीक्षा प्रणाली पर से विश्वास उठ गया तो इसका दुष्प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा। यह टिप्पणी केवल एक मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण परीक्षा व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है।
केवल दण्ड नहीं, व्यवस्था भी बदले
पेपरलीक रोकने के लिए केवल कठोर दण्ड पर्याप्त नहीं होगा। कुछ बुनियादी सुधार अनिवार्य हैं-
1.प्रश्नपत्रों की बहुस्तरीय डिजिटल सुरक्षा। परीक्षा केन्द्रों की सतत निगरानी।
2.प्रत्येक मामले की अधिकतम तीन माह में विवेचना।
3.एक वर्ष के भीतर न्यायिक निर्णय।
4.दोषियों की संपत्ति की कुर्की।
5.परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की व्यक्तिगत जवाबदेही।
6.अंतरराज्यीय गिरोहों के विरुद्ध संयुक्त अभियान।
7.कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी व्यवस्था का उपयोग।
राजनीतिक इच्छाशक्ति सबसे आवश्यक
पेपरलीक केवल प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम नहीं है। इसके पीछे करोड़ों रुपये का अवैध कारोबार सक्रिय रहता है। जब तक इस आर्थिक तंत्र को ध्वस्त नहीं किया जाएगा और किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। कानून तभी प्रभावी होता है जब अपराधी को यह विश्वास हो जाए कि अपराध करने के बाद बच निकलना असंभव है।
युवाओं का विश्वास लौटाना होगा
आज देश का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, बल्कि निष्पक्ष अवसर चाहता है। वह चाहता है कि उसकी मेहनत का मूल्य किसी दलाल, गिरोह या भ्रष्ट अधिकारी की मिलीभगत से न छीना जाए। यदि बार-बार परीक्षाएँ रद्द होंगी, परिणाम रुकेंगे और वर्षों तक मुकदमे चलते रहेंगे, तो युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है। राजस्थान का नया कानून निश्चित रूप से देश के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। अन्य राज्यों को भी इससे सीख लेनी चाहिए। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि कानून की कठोरता से अधिक महत्त्वपूर्ण उसका निष्पक्ष और त्वरित क्रियान्वयन है। पेपरलीक केवल प्रश्नपत्र की चोरी नहीं है, यह करोड़ों युवाओं के सपनों, उनके परिश्रम और उनके भविष्य की चोरी है। इसलिए अब समय केवल कठोर कानून बनाने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करने का है जिसमें अपराधी को शीघ्र दण्ड मिले, गिरोहों की आर्थिक कमर टूटे और प्रत्येक अभ्यर्थी को यह विश्वास हो कि उसकी सफलता केवल उसकी प्रतिभा और परिश्रम पर निर्भर करेगी। देश को अब सख़्त कानून के साथ सख़्त कार्रवाई भी चाहिए। यही युवाओं के विश्वास, शिक्षा व्यवस्था की गरिमा और राष्ट्र के भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

मूल मुद्दों से भटकी केंद्र सरकार!

 लेख-

रोजगार, शिक्षा और युवाओं की
उम्मीदों के बीच बढ़ता असंतोष

‘युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। यदि उनके सपनों को दिशा मिले तो वे देश का भविष्य बदल देते हैं, लेकिन यदि वे निराश हो जाएँ तो वही ऊर्जा असंतोष का रूप ले लेती है।’ भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यह स्थिति हमारे लिए एक अभूतपूर्व अवसर भी है और एक बड़ी चुनौती भी। हर वर्ष लाखों युवा विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं से निकलकर रोजगार की दुनिया में प्रवेश करते हैं। उनके मन में एक ही सपना होता है-सम्मानजनक रोजगार, सुरक्षित भविष्य और अपनी मेहनत के अनुरूप अवसर। लेकिन जब उन्हें बार-बार परीक्षा स्थगित होने, पेपर लीक, भर्ती में देरी या सीमित रोजगार के अवसरों का सामना करना पड़ता है, तो स्वाभाविक रूप से व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास डगमगाने लगता है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने बुनियादी ढाँचे, डिजिटल इंडिया, विदेशी निवेश, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, रक्षा आधुनिकीकरण और कल्याणकारी योजनाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। एक्सप्रेस-वे, वंदे भारत ट्रेनें, डिजिटल भुगतान प्रणाली, स्टार्टअप संस्कृति और वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका इसके उदाहरण हैं। किंतु इसके साथ ही एक प्रश्न लगातार उठता रहा है-क्या विकास की इस यात्रा में युवाओं की सबसे बड़ी चिंताओं को पर्याप्त प्राथमिकता मिली है?
रोजगार-सबसे बड़ा सवाल
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन रोजगार का प्रश्न अब भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। लाखों शिक्षित युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिताते हैं। निजी क्षेत्र में अवसर बढ़े हैं, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता, वेतन और स्थायित्व को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं। सरकारी नौकरियाँ सीमित हैं और उनके लिए प्रतिस्पर्धा लगातार कठिन होती जा रही है। युवाओं की शिकायत केवल नौकरियों की संख्या को लेकर नहीं है, बल्कि भर्ती प्रक्रिया की गति और पारदर्शिता को लेकर भी है।
पेपर लीक और टूटता विश्वास
हाल के वर्षों में नीट-यूजी, यूजीसी-नेट और कई भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। लाखों अभ्यर्थियों ने वर्षों की तैयारी, भारी आर्थिक निवेश और मानसिक संघर्ष के बाद परीक्षाएँ दीं। जब परीक्षाएँ रद्द हुईं या उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठे, तो उनके भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक था। आज का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, वह निष्पक्ष अवसर चाहता है। उसे विश्वास होना चाहिए कि उसकी मेहनत का परिणाम किसी भ्रष्ट तंत्र की भेंट नहीं चढ़ेगा।
भर्ती में देरी भी बड़ी समस्या
रेलवे, एसएससी और अन्य सरकारी विभागों की कई भर्तियों में वर्षों तक परिणाम और नियुक्ति प्रक्रिया लंबित रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई उम्मीदवार आयु सीमा पार कर जाते हैं। वर्षों की तैयारी और संघर्ष के बाद भी नियुक्ति न मिलना युवाओं में गहरी निराशा पैदा करता है।
अग्निपथ योजना और युवा
अग्निपथ योजना भी युवाओं के बीच व्यापक बहस का विषय रही। सरकार ने इसे सेना के आधुनिकीकरण और युवा प्रोफाइल तैयार करने की दिशा में बड़ा सुधार बताया, जबकि अनेक सैन्य अभ्यर्थियों ने इसे स्थायी रोजगार के अवसर कम होने के रूप में देखा। यह विवाद इस बात का उदाहरण है कि किसी भी नीति की सफलता केवल उसके उद्देश्य पर नहीं, बल्कि समाज द्वारा उसकी स्वीकार्यता पर भी निर्भर करती है।
महँगाई और बढ़ता आर्थिक दबाव
महँगाई का प्रभाव केवल गरीबों तक सीमित नहीं रहता। शिक्षित मध्यम वर्ग और युवा भी इससे प्रभावित होते हैं। किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और दैनिक जीवन का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में नौकरी मिलने के बाद भी आर्थिक सुरक्षा का एहसास कम होता जा रहा है।
क्या सरकार का पक्ष नहीं है?
निश्चित रूप से है। केंद्र सरकार का कहना है कि उसने स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन जैसी योजनाओं के माध्यम से रोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। सरकार का तर्क है कि बड़े आर्थिक सुधारों के परिणाम समय के साथ अधिक स्पष्ट होंगे और भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह भी सच है कि देश में सड़क, रेल, हवाई अड्डे, डिजिटल भुगतान और सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। इसलिए पूरे परिदृश्य को एक ही दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं होगा।
विद्वानों की राय
प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ. रघुराम राजन का मानना है कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित करना है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमत्र्य सेन लगातार शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश को विकास की सबसे मजबूत नींव बताते रहे हैं। वहीं प्रो. अभिजीत बनर्जी का मत है कि आर्थिक विकास तभी सार्थक होगा जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति और युवाओं तक पहुँचे। इन विचारों से स्पष्ट है कि आर्थिक विकास का वास्तविक मूल्यांकन तभी होगा जब वह युवाओं के जीवन में अवसर, सुरक्षा और सम्मान का रूप ले।
भविष्य की राह
यदि सरकार युवाओं का विश्वास और अधिक मजबूत करना चाहती है तो कुछ कदम अत्यंत आवश्यक हैं-
1.भर्ती परीक्षाओं को पूरी तरह पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जाए।
2.पेपर लीक पर कठोरतम दंड सुनिश्चित हो।
3.सरकारी भर्तियों को समयबद्ध बनाया जाए।
4.कौशल विकास को उद्योगों की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ा जाए।
5. एमएसएमई और स्टार्टअप को अधिक प्रोत्साहन मिले।
6.शिक्षा व्यवस्था को रोजगारोन्मुख बनाया जाए।
7.महँगाई नियंत्रण और रोजगार सृजन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार ने कुछ भी नहीं किया, और यह कहना भी सही नहीं होगा कि युवाओं की सभी समस्याएँ समाप्त हो चुकी हैं। वास्तविकता इन दोनों के बीच है। युवाओं का असंतोष लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि एक संदेश है। ऐसा संदेश जिसे सुनना और समझना आवश्यक है। यदि भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनना है तो उसकी सबसे बड़ी शक्ति, अर्थात् उसके युवाओं के विश्वास, प्रतिभा और परिश्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। सरकार, विपक्ष, शिक्षण संस्थान और समाज, सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ हर युवा यह विश्वास कर सके कि उसकी मेहनत का सम्मान होगा और उसका भविष्य केवल उसके परिश्रम से तय होगा, किसी व्यवस्था की कमजोरी से नहीं। जब युवाओं के सपनों को उड़ान मिलेगी, तभी भारत का भविष्य वास्तव में स्वर्णिम होगा।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार

बुधवार, 8 जुलाई 2026

क्या भारत को एक नए जनांदोलन की जरूरत है?

 लेख-

इतिहास के आईने में विश्व और
भारत के आंदोलनों का प्रभाव

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब समाज में अन्याय, असमानता, शोषण या व्यवस्था के प्रति असंतोष बढ़ा है, तब-तब आंदोलनों ने परिवर्तन की राह दिखाई है। कोई भी बड़ा सामाजिक या राजनीतिक बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि जनचेतना के जागरण से आता है। भारत हो या विश्व, अनेक आंदोलनों ने अनेक देशों की दिशा और दशा बदल दी। प्रश्न यह है कि क्या आज के भारत को भी किसी नए आंदोलन की आवश्यकता है?
आंदोलन केवल विरोध नहीं, परिवर्तन का माध्यम
आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार का विरोध करना नहीं होता। उसका वास्तविक लक्ष्य समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना, लोगों को जागरूक करना और व्यवस्था को बेहतर बनाना होता है। सफल आंदोलन वही माना जाता है जो हिंसा नहीं, बल्कि जनसहभागिता और नैतिक शक्ति के आधार पर परिवर्तन लाए। महात्मा गांधी ने कहा था, ‘आप स्वयं वह परिवर्तन बनिए, जिसे आप दुनिया में देखना चाहते हैं।’ यही किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी प्रेरणा है।
विश्व के वे आंदोलन जिन्होंने इतिहास बदल दिया
विश्व इतिहास में फ्रांसीसी क्रांति (1789) ने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का विचार पूरी दुनिया को दिया। अमेरिकी स्वतंत्रता आंदोलन ने लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी। रूसी क्रांति (1917) ने विश्व राजनीति की दिशा बदल दी और समाजवादी विचारधारा को नई शक्ति दी। दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में रंगभेद विरोधी आंदोलन ने नस्लीय भेदभाव की जड़ों को हिला दिया। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में चले सिविल राइट्स आंदोलन ने अश्वेत नागरिकों को समान अधिकार दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। इन आंदोलनों ने केवल अपने देशों को नहीं बदला, बल्कि पूरी दुनिया को लोकतंत्र, मानवाधिकार और समानता का नया दृष्टिकोण दिया।
भारत के आंदोलन-जनशक्ति का अद्भुत उदाहरण
भारत का स्वतंत्रता संग्राम विश्व का सबसे बड़ा अहिंसक जन आंदोलन माना जाता है। 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अंग्रेजी शासन के विरुद्ध पहला व्यापक विद्रोह था। इसके बाद स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन ने करोड़ों भारतीयों को एक सूत्र में बाँध दिया। महात्मा गांधी ने यह सिद्ध कर दिया कि सत्य और अहिंसा भी किसी साम्राज्य को झुका सकते हैं। यही कारण है कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विश्वभर के अनेक देशों के लिए प्रेरणा बना।
स्वतंत्र भारत के महत्वपूर्ण आंदोलन
आजादी के बाद भी अनेक जन आंदोलनों ने देश को नई दिशा दी। विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भूमि सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास था। जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए जनजागरण का कार्य किया। चिपको आंदोलन ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विकास और विस्थापन के बीच संतुलन का प्रश्न उठाया। सूचना के अधिकार आंदोलन ने शासन में पारदर्शिता की नींव मजबूत की, जबकि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश में जवाबदेही और जनभागीदारी पर व्यापक बहस छेड़ी।
सबसे बड़ा आंदोलन कौन सा?
यदि प्रभाव की दृष्टि से देखा जाए तो भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विश्व के सबसे सफल जन आंदोलनों में गिना जाता है, क्योंकि इसने बिना व्यापक सशस्त्र संघर्ष के ब्रिटिश साम्राज्य को सत्ता छोड़ने पर विवश कर दिया। वहीं फ्रांसीसी क्रांति ने आधुनिक लोकतंत्र की अवधारणा को जन्म दिया, जबकि दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद विरोधी आंदोलन मानव समानता का वैश्विक प्रतीक बन गया। प्रत्येक आंदोलन अपने समय और उद्देश्य के अनुसार ऐतिहासिक महत्व रखता है। इतिहासकार रामचंद्र गुहा मानते हैं कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी लोकतांत्रिक परंपरा और शांतिपूर्ण जन भागीदारी रही है। वहीं अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन का मत है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और सार्वजनिक विमर्श पर निर्भर करती है।
क्या आज भारत को नए आंदोलन की आवश्यकता है?
आज भारत स्वतंत्र है, लोकतांत्रिक है और विकास की नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा है। फिर भी अनेक चुनौतियाँ सामने हैं जैसे-शिक्षा की गुणवत्ता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सौहार्द्र, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, डिजिटल भ्रामक सूचना, नैतिक मूल्यों का ह्रास और नागरिक जिम्मेदारी जैसे विषय गंभीर चिंता का कारण हैं। ऐसी स्थिति में देश को हिंसक या टकराव वाले आंदोलनों की नहीं, बल्कि जनजागरण आंदोलनों की आवश्यकता है। ऐसा आंदोलन जो लोगों में संविधान के प्रति सम्मान, ईमानदारी, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, महिला सम्मान, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने कहा था, ‘संपूर्ण क्रांति केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन है।’ यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
आंदोलन की नई दिशा
आज का आंदोलन सड़कों पर संघर्ष से अधिक समाज के भीतर जागरूकता का अभियान होना चाहिए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, मीडिया, साहित्य, सामाजिक संगठनों और युवाओं को इसमें प्रमुख भूमिका निभानी होगी। सोशल मीडिया का उपयोग भी सकारात्मक जनचेतना के लिए किया जा सकता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर का संदेश-‘शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो’। आज भी सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी सूत्र है। इतिहास बताता है कि बड़े आंदोलन केवल सत्ता नहीं बदलते, वे समाज की सोच बदलते हैं। विश्व और भारत के आंदोलनों ने मानवता को स्वतंत्रता, समानता और न्याय की नई राह दिखाई है। आज भारत को किसी हिंसक क्रांति की नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक कर्तव्यों पर आधारित राष्ट्रीय जनजागरण आंदोलन की आवश्यकता है। यदि प्रत्येक नागरिक स्वयं से परिवर्तन की शुरुआत करे, तो वही सबसे बड़ा और सबसे सफल आंदोलन सिद्ध होगा। यही भविष्य के भारत की सबसे मजबूत नींव बन सकती है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


रविवार, 5 जुलाई 2026

युवाओं में बढ़ती क्रूरता और हिंसा

 विशेष लेख-

आखिर समाज किस दिशा में जा रहा है?
चिंता का विषय बनती युवा मानसिकता

भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। यही युवा देश के विकास की सबसे बड़ी शक्ति माने जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह युवाओं से जुड़े जघन्य अपराध सामने आए हैं, उन्होंने पूरे समाज को चिंता में डाल दिया है। मामूली विवाद में हत्या, प्रेम संबंधों में बर्बरता, सड़क पर हिंसा, गैंग संस्कृति और सोशल मीडिया के लिए अपराध जैसी घटनाएँ यह सोचने पर विवश करती हैं कि आखिर युवाओं के एक वर्ग में संवेदनहीनता और क्रूरता क्यों बढ़ रही है? यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज, परिवार, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय है।
जब घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया
पिछले दस वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ हुईं जिन्होंने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। वर्ष 2017 का गुरुग्राम का प्रद्युम्न हत्याकांड, 2019 में हैदराबाद की महिला पशु चिकित्सक के साथ सामूहिक दुष्कर्म और हत्या, 2022 का श्रद्धा वालकर हत्याकांड, 2023 में दिल्ली की साक्षी की सरेआम हत्या, 2024 का पुणे पोर्शे कार हादसा, 2025 का चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड तथा हाल के समय में सिया गोयल-केतन अग्रवाल प्रकरण और बेंगलुरु में सामने आईं कई क्रूर घटनाएँ इस बात का संकेत देती हैं कि कुछ मामलों में हिंसा पहले से अधिक निर्मम और संवेदनहीन होती जा रही है। घटनाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन हर घटना समाज से यही सवाल पूछती है क्या हम अपनी युवा पीढ़ी को सही दिशा दे पा रहे हैं?
आँकड़े भी बढ़ा रहे हैं चिंता
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि किशोरों और युवाओं से जुड़े गंभीर अपराध चिंता का विषय बने हुए हैं। हत्या, गंभीर हमला, महिलाओं के विरुद्ध अपराध और किशोर अपराधों के मामलों में लगातार सतर्क रहने की आवश्यकता बनी हुई है। यह भी सच है कि देश के अधिकांश युवा कानून का सम्मान करने वाले और समाज के निर्माण में लगे हुए हैं, लेकिन कुछ जघन्य घटनाएँ पूरी पीढ़ी की छवि पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं।
मनोचिकित्सक क्या कहते हैं
प्रख्यात मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख का मानना है कि आज का युवा पहले की तुलना में कहीं अधिक मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, अकेलेपन और असफलता के भय से जूझ रहा है। यदि उसे समय पर भावनात्मक सहयोग और मनोवैज्ञानिक परामर्श नहीं मिलता, तो कुछ मामलों में यह आक्रामक व्यवहार का रूप ले सकता है। मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी के अनुसार बच्चों और युवाओं को केवल अच्छी शिक्षा नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा, संवाद और अपनापन भी चाहिए। जब परिवार में संवाद कम होता है, तब कई समस्याएँ भीतर ही भीतर पनपने लगती हैं। वहीं डॉ. संजय चुघ का कहना है कि क्रोध पर नियंत्रण न होना, आवेग में निर्णय लेना और नशे की बढ़ती प्रवृत्ति हिंसक अपराधों की पृष्ठभूमि तैयार करती है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा और स्वास्थ्य नीति का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
परिवार की बदलती तस्वीर
संयुक्त परिवारों का टूटना, माता-पिता की व्यस्त दिनचर्या, बच्चों के साथ संवाद में कमी और मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता ने पारिवारिक संबंधों को प्रभावित किया है। अनेक बच्चे अपनी परेशानियाँ किसी से साझा नहीं कर पाते। धीरे-धीरे यह अकेलापन कुंठा, अवसाद और आक्रोश में बदल सकता है। परिवार यदि समय रहते बच्चे के व्यवहार में आ रहे बदलावों को समझ ले, तो कई समस्याओं को शुरुआत में ही रोका जा सकता है।
क्या सोशल मीडिया भी जिम्मेदार है
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया स्वयं अपराध नहीं कराता, लेकिन हिंसक वीडियो, वेब सीरीज, ऑनलाइन गेम और लगातार डिजिटल दुनिया में डूबे रहने का असर कुछ युवाओं के व्यवहार पर पड़ सकता है। वायरल होने की मानसिकता, त्वरित प्रसिद्धि की चाह और आक्रामक सामग्री के लगातार संपर्क से कुछ युवाओं की संवेदनशीलता कम हो जाती है। इसलिए डिजिटल साक्षरता भी समय की मांग बन चुकी है।
नशा और गैंग संस्कृति का बढ़ता असर
शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थ निर्णय क्षमता को प्रभावित करते हैं। कई अपराधों में नशा एक महत्वपूर्ण कारक पाया गया है। इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में गैंग संस्कृति, हथियारों का आकर्षण और सोशल मीडिया पर अपराधियों का महिमामंडन भी युवाओं को गलत दिशा में प्रेरित कर रहा है।
सफलता का बढ़ता दबाव
समाजशास्त्रियों का कहना है कि आज का समाज सफलता को केवल धन, प्रसिद्धि और दिखावे से जोड़कर देखता है। असफलता को स्वीकार करने का धैर्य कम होता जा रहा है। प्रतियोगिता इतनी तीव्र हो गई है कि अनेक युवा मानसिक दबाव में जी रहे हैं। जब भावनात्मक संतुलन कमजोर होता है, तो छोटी-सी बात भी बड़े विवाद का कारण बन सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान लगातार इस बात पर बल देता रहा है कि किशोरावस्था और युवावस्था में मानसिक स्वास्थ्य की समय पर पहचान और परामर्श अत्यंत आवश्यक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी युवाओं में हिंसा को केवल अपराध नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती मानता है। विशेषज्ञों के अनुसार स्कूलों और कॉलेजों में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक उपलब्ध होना अब विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता है।
क्या है समाधान
समस्या जटिल है, इसलिए समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए।
1.प्रत्येक विद्यालय और महाविद्यालय में मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता नियुक्त किए जाएँ।
2.जीवन-कौशल, नैतिक शिक्षा, सहानुभूति और क्रोध-प्रबंधन को शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए।
3.माता-पिता प्रतिदिन बच्चों से खुलकर बातचीत करें और उनके व्यवहार में आने वाले बदलावों पर ध्यान दें।
4.खेल, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए ताकि युवाओं की ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगे।
5.नशा-विरोधी अभियानों को और प्रभावी बनाया जाए।
6.सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग की शिक्षा दी जाए।
7.गंभीर अपराधों में त्वरित न्याय और प्रभावी कानून-व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
सिर्फ सरकार नहीं, समाज भी जिम्मेदार
हिंसा केवल पुलिस या अदालतों से नहीं रुकेगी। इसके लिए परिवार, विद्यालय, समाज, मीडिया और सरकार सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। बच्चों को बचपन से ही संवेदनशीलता, सहिष्णुता, संवाद और मानवीय मूल्यों का संस्कार देना होगा। यदि हम केवल आर्थिक सफलता को ही उपलब्धि मानते रहेंगे और चरित्र निर्माण की उपेक्षा करेंगे, तो ऐसी घटनाएँ बार-बार सामने आती रहेंगी। यह सही नहीं होगा कि कुछ अपराधों के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। आज भी देश के करोड़ों युवा विज्ञान, शिक्षा, सेना, चिकित्सा, खेल, साहित्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अद्भुत कार्य कर रहे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बढ़ती हिंसा हमें समय रहते सचेत होने का संदेश दे रही है। यदि परिवार संवाद का वातावरण बनाए, शिक्षा व्यवस्था संवेदनशील नागरिक तैयार करे, मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिले और समाज सकारात्मक मूल्यों को पुनः स्थापित करे, तो निश्चित ही इस चुनौती का समाधान संभव है। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में होता है, और उन हाथों में किताब, कौशल और करुणा होनी चाहिए, हथियार और हिंसा नहीं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

एथनॉल मिश्रित पेट्रोल-आत्मनिर्भर भारत का ईंधन या नई चुनौतियों की शुरुआत?

 महत्वपूर्ण लेख-

भारत में पिछले कुछ वर्षों से पेट्रोल में एथनॉल मिलाने की नीति तेजी से लागू की जा रही है। अब देश के अधिकांश पेट्रोल पंपों पर ई-20 अर्थात 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रित पेट्रोल उपलब्ध है। सरकार इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम बता रही है, जबकि वाहन मालिकों, पर्यावरणविदों और अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग इससे जुड़ी कुछ आशंकाएँ भी व्यक्त कर रहा है। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि एथनॉल मिश्रण की यह नीति आखिर है क्या, इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी, दुनिया के अन्य देशों का अनुभव क्या रहा है और भारत के लिए इसके क्या मायने हैं। एथनॉल एक प्रकार का एथिल अल्कोहल है, जिसे मुख्य रूप से गन्ने के शीरे, गन्ने के रस, मक्का, टूटे चावल तथा अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। जब इसे पेट्रोल में निर्धारित अनुपात में मिलाया जाता है तो उसे एथनॉल मिश्रित पेट्रोल कहा जाता है। उदाहरण के लिए, 20 प्रतिशत एथनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल वाले ईंधन को ई-20 कहा जाता है। भारत सरकार ने एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम को कई उद्देश्यों के साथ लागू किया है। सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है। भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता पर पड़ता है। सरकार का मानना है कि यदि पेट्रोल का एक हिस्सा देश में उत्पादित एथनॉल से प्रतिस्थापित किया जाए तो विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होगी, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और किसानों को भी अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा।
एथनॉल मिश्रण का एक बड़ा आधार कृषि भी है। गन्ना उत्पादक किसानों को अक्सर चीनी मिलों से भुगतान में देरी का सामना करना पड़ता है। एथनॉल उत्पादन बढ़ने से चीनी मिलों को अतिरिक्त बाजार मिलता है और किसानों को अपेक्षाकृत बेहतर भुगतान मिलने की संभावना बढ़ती है। हाल के वर्षों में मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से भी एथनॉल बनाया जा रहा है, जिससे कृषि क्षेत्र को नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं।
दुनिया के कई देशों ने भारत से बहुत पहले एथनॉल मिश्रण अपनाया था। ब्राजील इसका सबसे सफल उदाहरण माना जाता है। वहाँ 1970 के दशक से पेट्रोल में लगभग 27 प्रतिशत एथनॉल मिलाया जा रहा है और बड़ी संख्या में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन ऐसे हैं जो शुद्ध एथनॉल पर भी चल सकते हैं। अमेरिका में सामान्यतः ई-10 का उपयोग होता है, जबकि कुछ राज्यों में ई-15 और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए ई-85 भी उपलब्ध है। कनाडा, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देशों में भी विभिन्न स्तरों पर एथनॉल मिश्रण अपनाया गया है।
यदि लाभों की बात करें तो पहला लाभ विदेशी मुद्रा की बचत है। तेल आयात कम होने से देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। दूसरा लाभ किसानों और ग्रामीण उद्योगों को मिलता है। तीसरा लाभ पर्यावरण से जुड़ा है। एथनॉल एक जैव-ईंधन है और इसके उपयोग से कुछ हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कम हो सकता है। सरकार का दावा है कि ई-20 के अनुरूप विकसित वाहनों में प्रदूषण कम होता है और इंजन का प्रदर्शन भी बेहतर हो सकता है। लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
सबसे पहले माइलेज का प्रश्न आता है। एथनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। इसी कारण अनेक वाहन विशेषज्ञों का मानना है कि ई-20 के उपयोग से माइलेज में लगभग 2 से 4 प्रतिशत, कुछ परिस्थितियों में इससे थोड़ा अधिक भी, कमी महसूस हो सकती है। वाहन निर्माता भी स्वीकार करते हैं कि ईंधन दक्षता पर कुछ प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि उनका कहना है कि यह सुरक्षा का नहीं बल्कि दक्षता का विषय है।
दूसरी चिंता पुराने वाहनों को लेकर है। भारत की सड़कों पर करोड़ों ऐसे वाहन हैं जिनका निर्माण उस समय हुआ था जब ई-20 ईंधन उपलब्ध नहीं था। ऐसे वाहनों में रबर की पाइप, सील, गैस्केट तथा ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों पर लंबे समय में प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त की जाती रही है। हालांकि सरकार और वाहन निर्माता कहते हैं कि व्यापक स्तर पर इंजन फेल होने जैसी घटनाएँ सामने नहीं आई हैं, फिर भी पुराने वाहन मालिकों की शंकाओं का पूरी तरह समाधान होना अभी बाकी है।
तीसरी चुनौती खाद्य सुरक्षा की है। यदि बड़ी मात्रा में मक्का, गन्ना और अन्य कृषि उत्पाद ईंधन बनाने में लगेंगे, तो भविष्य में खाद्यान्न की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है। अमेरिका में वर्षों से ‘फूड बनाम फ्यूल’ की बहस चलती रही है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में इस पहलू पर विशेष सावधानी बरतनी होगी।
चैथा प्रश्न जल संसाधनों से जुड़ा है। गन्ना अत्यधिक पानी लेने वाली फसल है। भारत पहले से ही कई राज्यों में भूजल संकट का सामना कर रहा है। यदि एथनॉल उत्पादन मुख्यतः गन्ने पर आधारित रहेगा, तो जल प्रबंधन की चुनौती और बढ़ सकती है। इसलिए विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भविष्य में कृषि अवशेषों और दूसरी पीढ़ी के जैव-ईंधनों को अधिक बढ़ावा दिया जाए।
भारत में नई कारों और दोपहिया वाहनों को धीरे-धीरे ई-20 के अनुरूप बनाया जा रहा है। यदि किसी उपभोक्ता ने पिछले कुछ वर्षों में नया वाहन खरीदा है, तो उसके लिए चिंता अपेक्षाकृत कम है। लेकिन पुराने वाहन मालिकों को अपने वाहन निर्माता की सलाह के अनुसार ही ईंधन का उपयोग करना चाहिए और समय-समय पर वाहन की सर्विस कराते रहना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि ई-20 कार्यक्रम अभी भी एक प्रकार का प्रायोगिक चरण है और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन जारी है। इससे स्पष्ट है कि सरकार स्वयं भी इस नीति के परिणामों पर लगातार नजर रखे हुए है।
वास्तव में एथनॉल मिश्रित पेट्रोल न तो कोई चमत्कारी समाधान है और न ही ऐसी नीति जिसे पूरी तरह खारिज कर दिया जाए। ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य इसके पक्ष में हैं। वहीं माइलेज, पुराने वाहनों की अनुकूलता, जल संकट और खाद्य सुरक्षा जैसे प्रश्न इसके सामने चुनौती बनकर खड़े हैं।
भारत को ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों से सीख लेते हुए अपनी परिस्थितियों के अनुरूप संतुलित नीति अपनानी होगी। उपभोक्ताओं को सही जानकारी देना, वाहनों की तकनीकी तैयारी सुनिश्चित करना, जल संरक्षण पर ध्यान देना और कृषि नीति में संतुलन बनाए रखना इस कार्यक्रम की सफलता की शर्तें हैं। यदि ऐसा किया गया, तो एथनॉल मिश्रित पेट्रोल भारत की ऊर्जा यात्रा में मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। लेकिन यदि इन चुनौतियों की उपेक्षा की गई, तो यही नीति भविष्य में नए विवादों और समस्याओं का कारण भी बन सकती है। इसलिए आवश्यकता किसी अंध-समर्थन या अंध-विरोध की नहीं, बल्कि तथ्यों, विज्ञान और दूरदर्शिता के आधार पर आगे बढ़ने की है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


सोमवार, 29 जून 2026

गाजियाबाद के सिटीजन चार्टर का सच

 विशेष लेख-

यदि आपकी गली का सीवर जाम हो जाए, स्ट्रीट लाइट खराब हो जाए या कई दिनों तक कूड़ा न उठे, तो क्या आपको पता है कि नगर निगम को इसे कितने दिनों में ठीक करना चाहिए? अधिकांश नागरिक इसका उत्तर नहीं जानते। जबकि इसके लिए बाकायदा ‘सिटीजन चार्टर’ बना हुआ है, जिसमें हर सेवा की समय-सीमा तय है। सवाल यह है कि क्या इन समय-सीमाओं का पालन भी हो रहा है? यही है सिटीजन चार्टर का सच। सरकारी कार्यालयों में वर्षों तक आम नागरिक की सबसे बड़ी शिकायत रही है-‘आज नहीं, कल आइए’, ‘फाइल चल रही है’, ‘साहब मीटिंग में हैं।’ इन समस्याओं से निजात दिलाने के उद्देश्य से सिटीजन चार्टर की अवधारणा सामने आई। इसका उद्देश्य था कि सरकार स्वयं यह घोषित करे कि कौन-सी सेवा कितने समय में उपलब्ध कराई जाएगी और यदि निर्धारित अवधि में सेवा नहीं मिलती है, तो संबंधित अधिकारी जवाबदेह होगा।
गाजियाबाद में नगर निगम ने लगभग दो दशक पहले सिटीजन चार्टर लागू किया और बाद में इसे उत्तर प्रदेश सरकार की समयबद्ध सेवा व्यवस्था के अनुरूप और व्यवस्थित बनाया गया। आज नगर निगम के अलावा जिला प्रशासन, तहसील, राजस्व, खाद्य एवं रसद, समाज कल्याण, परिवहन, विद्युत तथा अन्य विभाग भी नागरिक सेवाओं के लिए समय-सीमा निर्धारित करने का दावा करते हैं। लेकिन नगर निगम का सिटीजन चार्टर सबसे विस्तृत और स्पष्ट रूप में उपलब्ध है।
चार्टर के अनुसार सड़क, नाली और सार्वजनिक स्थानों की सफाई, कूड़ा न उठने, सीवर जाम, गंदे पेयजल और स्ट्रीट लाइट खराब होने जैसी शिकायतों का निस्तारण 24 घंटे के भीतर होना चाहिए। सड़क पर गड्ढा भरने के लिए चार दिन, सड़क और नाली की मरम्मत के लिए सात दिन, अस्थायी अतिक्रमण हटाने के लिए पाँच दिन, स्थायी अतिक्रमण पर कार्रवाई के लिए दस दिन, सड़क पर सीवर का पानी भरने की समस्या के लिए तीन दिन, सीवर लाइन की मरम्मत के लिए 15 दिन, नामांतरण (म्यूटेशन) के लिए 45 दिन, जबकि संपत्ति कर एवं ट्रेड लाइसेंस संबंधी मामलों के लिए लगभग 48 दिन की समय-सीमा निर्धारित की गई है। यदि इन समय-सीमाओं का ईमानदारी से पालन हो, तो नागरिकों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता ही न पड़े। लेकिन जमीनी हकीकत इससे कुछ अलग दिखाई देती है।
पिछले दस वर्षों में गाजियाबाद में सबसे अधिक शिकायतें सफाई, कूड़ा उठान, सीवर जाम, जलभराव, गंदे पेयजल, स्ट्रीट लाइट, अतिक्रमण, आवारा पशुओं और संपत्ति कर से संबंधित रही हैं। हर मानसून में जलभराव और सीवर की समस्या सुर्खियाँ बनती है। कई इलाकों में सफाई और कूड़ा उठान को लेकर स्थानीय निवासी बार-बार शिकायत दर्ज कराते हैं। नगर निगम ने मोबाइल ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, हेल्पलाइन और जनसुनवाई जैसी डिजिटल व्यवस्थाएँ शुरू की हैं, जिससे शिकायत दर्ज कराना पहले की तुलना में आसान हुआ है। यह एक सकारात्मक बदलाव है।
फिर भी सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता का है। यदि किसी नागरिक से पूछा जाए कि पिछले दस वर्षों में नगर निगम को कुल कितनी शिकायतें मिलीं, उनमें से कितनी निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित हुईं, कितनी अभी भी लंबित हैं और कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, तो इसका स्पष्ट उत्तर उपलब्ध नहीं है। विभिन्न विभाग अपने-अपने स्तर पर आँकड़े रखते हैं, लेकिन पूरे जिले का समेकित सिटीजन चार्टर रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक नहीं किया जाता। जब तक परिणाम जनता के सामने नहीं होंगे, तब तक किसी भी व्यवस्था की सफलता का निष्पक्ष मूल्यांकन संभव नहीं है।
रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए), व्यापारी संगठन और सामाजिक संस्थाएँ समय-समय पर यह शिकायत उठाती रही हैं कि कई मामलों में शिकायतों का समाधान केवल कागजों में दिखा दिया जाता है, जबकि वास्तविक समस्या बनी रहती है। कुछ नागरिकों का कहना है कि उन्हें एक ही शिकायत कई बार दर्ज करनी पड़ती है। विशेषकर सीवर, सफाई, जलभराव और स्ट्रीट लाइट जैसी समस्याओं में यह शिकायत अक्सर सुनने को मिलती है। उनका मानना है कि यदि निर्धारित समय-सीमा का पालन नहीं होता, तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
दूसरी ओर प्रशासन का पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि पहले की तुलना में शिकायत निस्तारण व्यवस्था कहीं अधिक पारदर्शी हुई है। ऑनलाइन जनसुनवाई, मोबाइल ऐप और नियमित समीक्षा बैठकों के माध्यम से शिकायतों की निगरानी की जाती है। उनका दावा है कि अधिकांश शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण किया जाता है और जिन मामलों में देरी होती है, उनकी समीक्षा कर आवश्यक निर्देश दिए जाते हैं। प्रशासन का यह भी कहना है कि डिजिटल तकनीक के कारण अब शिकायतों की ट्रैकिंग संभव हो गई है और जवाबदेही पहले से बेहतर हुई है।
जनप्रतिनिधियों की राय भी इस मुद्दे पर विचारणीय है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों इस बात पर सहमत हैं कि सिटीजन चार्टर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्था है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब इसका पूरी ईमानदारी से पालन हो। कई पार्षद नगर निगम की बैठकों में यह मुद्दा उठा चुके हैं कि शिकायतों का केवल ऑनलाइन निस्तारण दिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौके पर समस्या का वास्तविक समाधान होना चाहिए। विधायकों और जनप्रतिनिधियों ने भी समय-समय पर सफाई, सीवर, जलभराव और अतिक्रमण जैसी समस्याओं पर अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
दरअसल, सिटीजन चार्टर केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि सरकार और नागरिक के बीच विश्वास का एक अनुबंध है। यदि सरकार स्वयं यह घोषणा करती है कि अमुक सेवा एक दिन, तीन दिन या सात दिन में उपलब्ध होगी, तो नागरिक को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह उस समय-सीमा का पालन न होने पर जवाब मांग सके। दुर्भाग्य से आज भी अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं है कि उनके अधिकार क्या हैं और शिकायत के निस्तारण की तय समय-सीमा क्या है।
समय आ गया है कि प्रत्येक विभाग हर महीने अपनी वेबसाइट पर यह प्रकाशित करे कि कितनी शिकायतें प्राप्त हुईं, कितनी निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित हुईं, कितनी लंबित हैं और किन मामलों में अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। इससे न केवल प्रशासन की जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा। इसके साथ ही प्रत्येक सरकारी कार्यालय में सिटीजन चार्टर को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाना चाहिए और नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए।
गाजियाबाद जैसे तेजी से विकसित हो रहे महानगर में सुशासन की पहचान केवल चैड़ी सड़कों, ऊँची इमारतों और नई परियोजनाओं से नहीं होगी, बल्कि इस बात से होगी कि एक सामान्य नागरिक की शिकायत कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से सुनी और सुलझाई जाती है। सिटीजन चार्टर इसी कसौटी का नाम है।
सरकारी सेवाएँ किसी की कृपा नहीं, बल्कि नागरिक का संवैधानिक अधिकार हैं। यदि सिटीजन चार्टर केवल दीवार पर टंगा एक पोस्टर बनकर रह जाए, तो उसका कोई अर्थ नहीं। लेकिन यदि उसकी हर समय-सीमा का पालन हो, हर शिकायत का वास्तविक समाधान मिले और हर अधिकारी अपनी जवाबदेही स्वीकार करे, तभी कहा जा सकेगा कि सिटीजन चार्टर का सच वास्तव में नागरिक के पक्ष में खड़ा है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 23 जून 2026

कोचिंग सेंटरों में अग्निकांड

 आवश्यक लेख-

शिक्षा के मंदिर या मौत के जाल?
22 जून 2026 को लखनऊ के अलीगंज स्थित एक व्यावसायिक भवन में संचालित कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हादसे में कम से कम 15 लोगों की जान चली गई, जिनमें अधिकांश छात्र थे। कई छात्र जान बचाने के लिए पहली मंजिल से कूद पड़े। यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम भी थी। यह पहला अवसर नहीं है। पिछले दस वर्षों में देश के अनेक कोचिंग संस्थानों में आग लगने की घटनाओं ने दर्जनों छात्रों की जान ली है और सैकड़ों को घायल किया है। हर घटना के बाद जांच, आदेश और आश्वासन मिलते हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है। भारत सरकार के पास केवल कोचिंग सेंटरों में लगी आग का अलग राष्ट्रीय डेटाबेस उपलब्ध नहीं है, लेकिन प्रमुख घटनाओं का अध्ययन बताता है कि पिछले दस वर्षों में 15 से अधिक बड़ी आग की घटनाएँ सामने आईं। इनमें कम से कम 37-40 लोगों की मृत्यु हुई और 100 से अधिक छात्र घायल या झुलसे। वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि छोटे शहरों की अनेक घटनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज नहीं हो पातीं।
प्रमुख घटनाएँ
सूरत (2019)-तक्षशिला आर्केड के कोचिंग सेंटर में आग लगने से 22 छात्रों की मृत्यु हुई। जांच में सामने आया कि भवन में फायर एनओसी नहीं थी, लकड़ी की सीढ़ियाँ थीं और आपातकालीन निकास का अभाव था। तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया।
दिल्ली, मुखर्जी नगर (2023)-बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगने पर छात्र रस्सियों और बिजली के तारों के सहारे नीचे उतरे। 61 छात्र घायल हुए। घटना के बाद उच्च न्यायालय ने सुरक्षा ऑडिट के आदेश दिए।
नागपुर (2026)-एक कोचिंग संस्थान में आग लगने के बाद जांच में पता चला कि भवन में आवश्यक फायर सुरक्षा उपकरण ही नहीं थे। लगभग 150 छात्र बाल-बाल बचे।
लखनऊ (2026)-नवीनतम हादसे में 15 लोगों की मौत ने एक बार फिर देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हमारे कोचिंग संस्थान वास्तव में सुरक्षित हैं।
कितने कोचिंग सेंटर
भारत में कोचिंग उद्योग आज लगभग 60-70 हजार करोड़ रुपये का बाजार बन चुका है। विभिन्न उद्योग अध्ययनों के अनुसार देश में लगभग 1 से 1.5 लाख छोटे-बड़े कोचिंग संस्थान संचालित हैं। इनमें से बड़ी संख्या स्थानीय स्तर पर संचालित होती है, जिनका समुचित पंजीकरण या नियमित सुरक्षा निरीक्षण नहीं होता।
अवैध संचालन कितना बड़ा संकट?
दिल्ली में मुखर्जी नगर अग्निकांड के बाद किए गए निरीक्षणों में पाया गया कि अधिकांश संस्थानों में गंभीर कमियाँ थीं। सुरक्षा ऑडिट में संकरे प्रवेश-द्वार, आपातकालीन निकास का अभाव, फायर अलार्म और स्प्रिंकलर न होना तथा क्षमता से अधिक छात्रों को बैठाना जैसी अनियमितताएँ मिलीं। इसके बाद जुलाई 2024 से फरवरी 2026 तक चलाए गए अभियान में 89 कोचिंग सेंटर सील किए गए। 505 कोचिंग सेंटरों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। कुल 370 प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई हुई। लखनऊ हादसे के बाद कानपुर में भी 16 कोचिंग सेंटर सील कर दिए गए और 22 अन्य के विरुद्ध कार्रवाई शुरू हुई।
आखिर आग क्यों लगती है?
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश मामलों में कारण लगभग समान हैं। ओवरलोड विद्युत व्यवस्था और शॉर्ट सर्किट। बिना फायर एनओसी संचालन। बेसमेंट या अवैध मंजिलों में कक्षाएँ। केवल एक प्रवेश और निकास मार्ग। संकरी सीढ़ियाँ। अग्निशमन उपकरणों का अभाव। क्षमता से अधिक छात्रों की भीड़। नियमित सुरक्षा ऑडिट न होना।
सरकार कहाँ चूकी?
सरकारों ने नियम बनाए, लेकिन उनका पालन कराने में गंभीर कमी रही। सबसे बड़ी विफलताएँ रहीं-बिना अनुमति संस्थानों का वर्षों तक संचालन। नगर निगम, विकास प्राधिकरण और अग्निशमन विभाग के बीच समन्वय का अभाव। शिकायतों पर समय पर कार्रवाई न होना। राजनीतिक और स्थानीय दबाव में निरीक्षणों की अनदेखी। दुर्घटना के बाद ही अभियान चलाना। यही कारण है कि लगभग हर बड़ी दुर्घटना के बाद वही कमियाँ दोबारा सामने आती हैं।
सरकार ने क्या प्रयास किए
हाल के वर्षों में कई राज्यों ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए हैं- विशेष फायर सेफ्टी ऑडिट। अवैध संस्थानों की सीलिंग। संयुक्त निरीक्षण दलों का गठन। जिम्मेदार अधिकारियों का निलंबन। संचालकों के विरुद्ध एफआईआर और गिरफ्तारी। फायर सुरक्षा नियमों को और सख्ती से लागू करने की पहल। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ये कदम अधिकतर दुर्घटना के बाद उठाए जाते हैं, न कि पहले।
विशेषज्ञों की राय
आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों और अग्नि सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि अब केवल दिशा निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। वे सुझाव देते हैं-प्रत्येक कोचिंग सेंटर का अनिवार्य पंजीकरण हो। फायर एनओसी के बिना संचालन पूरी तरह प्रतिबंधित हो। हर भवन में कम-से-कम दो आपातकालीन निकास अनिवार्य हों। प्रत्येक छह माह में स्वतंत्र फायर ऑडिट कराया जाए। बेसमेंट में कक्षाएँ पूर्णतः प्रतिबंधित हों। छात्र संख्या के अनुसार भवन क्षमता तय हो। नियमों का उल्लंघन करने पर केवल संचालक ही नहीं, संबंधित अधिकारियों की भी व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो। छात्रों के लिए नियमित मॉक ड्रिल और आपदा प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।
कोचिंग सेंटर आज लाखों युवाओं के भविष्य का आधार हैं, लेकिन यदि वे स्वयं सुरक्षित नहीं हैं तो यह व्यवस्था गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। सूरत से लेकर मुखर्जी नगर और अब लखनऊ तक हर त्रासदी ने यही संदेश दिया है कि दुर्घटनाएँ केवल आग से नहीं होतीं, बल्कि नियमों की अनदेखी, प्रशासनिक ढिलाई और लालच से भी होती हैं। यदि अब भी कठोर और स्थायी सुधार नहीं किए गए, तो अगली त्रासदी केवल समय का प्रश्न होगी। शिक्षा का उद्देश्य भविष्य बनाना है, उसे छात्रों के लिए जोखिम का पर्याय नहीं बनने दिया जा सकता।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)