बुधवार, 28 जनवरी 2026

यूजीसी का नया नियम बना सत्ता के गले की फाँस

 विशेष लेख-

सियासत गर्म, सवर्णों में उबाल, क्या है निदान?
भारत में शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, सत्ता-संतुलन और भविष्य-निर्माण का औज़ार भी रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में लागू अथवा प्रस्तावित नए नियमों ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि शिक्षा नीति का हर बदलाव केवल अकादमिक नहीं होता, वह गहरे सामाजिक और राजनीतिक परिणाम भी लेकर आता है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं, उनसे स्पष्ट है कि यह विषय अब शैक्षिक परिसरों से निकलकर राजनीतिक गलियारों और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ चुका है।
नया नियम : सुधार या असंतुलन?
यूजीसी द्वारा लाए गए नए प्रावधान, चाहे वे शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े हों, योग्यता मानकों में परिवर्तन हो या प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर, सरकार की मंशा के अनुसार “गुणवत्ता सुधार” के नाम पर प्रस्तुत किए गए हैं। किंतु आलोचकों का मानना है कि ये नियम समान अवसर की भावना को कमजोर करते हैं और पहले से मौजूद सामाजिक असंतुलन को और गहरा कर सकते हैं। एक वरिष्ठ शिक्षाविद् का कथन है “जब शिक्षा नीति समाज की वास्तविक विविधता को ध्यान में रखे बिना बनाई जाती है, तब वह सुधार नहीं, प्रतिरोध को जन्म देती है।”
सत्ता के गले की फाँस क्यों?
राजनीतिक दृष्टि से यह नया नियम सरकार के लिए दोधारी तलवार बन गया है। एक ओर सत्ता प्रतिष्ठान इसे ‘मेरिट’ और ‘गुणवत्ता’ का प्रश्न बताकर बचाव कर रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और शिक्षाविद्ों का एक बड़ा वर्ग इसे सामाजिक न्याय के विरुद्ध कदम मान रहा है। शिक्षा हमेशा से मतदाता चेतना को प्रभावित करने वाला विषय रही है। विश्वविद्यालयों में असंतोष, शिक्षकों का विरोध और छात्रों की लामबंदी किसी भी सरकार के लिए खतरे की घंटी होती है। यही कारण है कि यूजीसी का यह निर्णय सत्ता के लिए “गले की फाँस” बनता दिख रहा है। न तो इसे पूरी तरह वापस लिया जा सकता है और न ही बिना संवाद के आगे बढ़ाया जा सकता है।
सियासत क्यों हुई गर्म?
राजनीति वहाँ प्रवेश करती है जहाँ नीति जनभावनाओं को छूती है। यूजीसी के नए नियमों ने ठीक यही किया है। विपक्ष इसे “शिक्षा का केंद्रीकरण” और “संवैधानिक मूल्यों से विचलन” बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “पुरानी व्यवस्था की जड़ता तोड़ने का साहसिक कदम” कह रहा है। एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार “जब शिक्षा नीति वोट बैंक से टकराती है, तब वह नीति नहीं रहती, वह सियासत बन जाती है।” यही कारण है कि संसद से लेकर सड़क तक और सोशल मीडिया से लेकर अकादमिक मंचों तक, यह मुद्दा तीखे बहस का विषय बन चुका है।
सवर्णों में उबाल : वास्तविकता या राजनीतिक आख्यान?
इस पूरे विवाद में एक प्रमुख कोण ‘सवर्ण असंतोष’ का है। एक वर्ग का मानना है कि नए नियमों से योग्यता आधारित अवसरों पर आघात हुआ है, जबकि दूसरा वर्ग इसे सदियों से चले आ रहे विशेषाधिकारों में आ रही दरार के रूप में देखता है। एक समाजशास्त्री का मत है-“सवर्ण असंतोष को केवल प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक संक्रमण की पीड़ा के रूप में देखना चाहिए।” यह उबाल केवल किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का भी है जो बदलते सामाजिक ढाँचे के साथ स्वयं को समायोजित करने में कठिनाई महसूस कर रही है।
शिक्षा बनाम सामाजिक न्याय : टकराव या संतुलन?
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि यूजीसी का नया नियम सही है या गलत, बल्कि यह है कि क्या वह संतुलित है? क्या वह गुणवत्ता और सामाजिक न्याय दोनों को साथ लेकर चलता है? संविधान शिक्षा को केवल योग्यता का विषय नहीं, बल्कि समान अवसर का माध्यम भी मानता है। जब नीति इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बना पाती, तब असंतोष स्वाभाविक है। एक संवैधानिक विद्वान के शब्दों में “मेरिट और सामाजिक न्याय विरोधी नहीं हैं; समस्या तब होती है जब नीति उन्हें विरोधी बना देती है।”
निदान क्या है?
इस पूरे विवाद का समाधान न तो केवल विरोध में है, न ही केवल समर्थन में। निदान संवाद, पारदर्शिता और समावेशी पुनर्विचार में निहित है।
व्यापक संवाद-यूजीसी को शिक्षकों, छात्रों, सामाजिक समूहों और राज्यों के साथ खुला संवाद करना चाहिए।
चरणबद्ध लागूकरण-नियमों को एक साथ थोपने के बजाय चरणों में लागू किया जाए।
समीक्षा तंत्र-स्वतंत्र विद्वानों की समिति द्वारा नियमों की सामाजिक प्रभाव समीक्षा हो।
संवैधानिक संतुलन-गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ सामाजिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित हो। एक शिक्षा नीति विशेषज्ञ के अनुसार “नीति वही टिकाऊ होती है, जिसमें सुधार का साहस और सुधार की गुंजाइश दोनों मौजूद हों।”
यूजीसी का नया नियम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारत की शिक्षा, समाज और राजनीति के चौराहे पर खड़ा प्रश्न है। यदि इसे केवल सत्ता के अहं या विरोध की राजनीति से देखा गया, तो यह टकराव बढ़ाएगा। किंतु यदि इसे आत्ममंथन और सुधार के अवसर के रूप में लिया गया, तो यही विवाद भविष्य की अधिक न्यायपूर्ण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था की नींव बन सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को युद्धभूमि नहीं, संवाद का मंच बनाया जाए। यही इस संकट का वास्तविक निदान है।

-डॉ. चेतन आनंद 
(लेखक वरिष्ठ कवि और पत्रकार है।)


मंगलवार, 6 जनवरी 2026

दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलनों और मुशायरों में गुटबाज़ी

 विशेष लेख-

दिल्ली-एनसीआर लंबे समय से हिंदी कवि सम्मेलनों और उर्दू मुशायरों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ की महफ़िलों ने देश को अनेक बड़े कवि, शायर और साहित्यिक आंदोलन दिए हैं। कभी ये मंच विचारों की उर्वर भूमि हुआ करते थे, जहाँ रचना की गुणवत्ता, संवेदना और वैचारिक गहराई ही कवि की पहचान होती थी। किंतु आज के संदर्भ में यदि ईमानदारी से देखा जाए, तो दिल्ली-एनसीआर के अधिकांश कवि सम्मेलनों और मुशायरों पर गुटबाज़ी की छाया गहराती जा रही है। यह गुटबाज़ी साहित्य से अधिक संबंधों, समीकरणों और स्वार्थों पर आधारित होती जा रही है।
गुटबाज़ी का बदलता स्वरूप
आज की गुटबाज़ी वैचारिक बहस या साहित्यिक मतभेद तक सीमित नहीं है। यह अब व्यक्तिगत निकटताओं, आयोजकों से रिश्तों, मंच संचालकों की पसंद-नापसंद और सोशल मीडिया नेटवर्किंग पर टिकी हुई है। किसी कवि या शायर का मंच पर आना कई बार उसकी रचना की ताकत से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि वह किस गुट का हिस्सा है। “आप हमारे कार्यक्रम में आइए, हम आपको अपने कार्यक्रम में बुलाएँगे”, यह आपसी लेन-देन आज मंच चयन की सबसे प्रचलित कसौटी बन गई है।
वही चेहरे, वही आवाज़ें
दिल्ली, गाज़ियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद और गुरुग्राम, लगभग हर साहित्यिक आयोजन में बार-बार वही चेहरे दिखाई देते हैं। श्रोता कई बार यह महसूस करता है कि कार्यक्रम बदल गया है, पर कवि-सूची वही है। इससे न केवल मंच की विविधता समाप्त होती है, बल्कि नए और युवा रचनाकारों के लिए दरवाज़े भी बंद हो जाते हैं। अनेक प्रतिभाशाली कवि वर्षों तक मंच के बाहर खड़े रह जाते हैं, जबकि औसत रचनाएँ लिखने वाले लोग केवल गुटीय पहचान के कारण मंच पर बने रहते हैं।
युवा कवियों के लिए कठिन राह
गुटबाज़ी का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव युवा कवियों पर पड़ता है। कई आयोजनों में उनसे या तो अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की जाती है, या फिर यह संकेत दिया जाता है कि पहले “हमारे लोगों” के कार्यक्रमों में नियमित उपस्थिति दर्ज कराइए। कई युवा कवि निराश होकर मंचीय कविता से दूरी बना लेते हैं और कुछ साहित्य से ही विमुख हो जाते हैं। यह स्थिति साहित्यिक भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।
विचारधारा की राजनीति
दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलनों में अब विचारधारात्मक गुट भी स्पष्ट दिखने लगे हैं। कुछ मंच केवल एक खास सोच या विचारधारा से जुड़े कवियों को ही आमंत्रित करते हैं। जो कवि उस वैचारिक खांचे में फिट नहीं बैठता, उसे भले ही उसकी रचना उत्कृष्ट क्यों न हो, मंच नहीं मिलता। साहित्य, जो प्रश्न पूछने और विविध दृष्टियों को स्वीकार करने की परंपरा रहा है, वह आज कई जगह संकीर्णता का शिकार होता दिख रहा है।
मंच संचालन भी गुटीय
मंच संचालन की भूमिका कभी कार्यक्रम की आत्मा हुआ करती थी। आज कई आयोजनों में मंच संचालक स्वयं किसी गुट विशेष का प्रतिनिधि बन जाता है। परिणामस्वरूप समय-वितरण असंतुलित हो जाता है। कुछ कवियों को आवश्यकता से अधिक समय, बार-बार वाहवाही और भूमिका मिलती है, जबकि कुछ को औपचारिक दो-तीन मिनट देकर निपटा दिया जाता है। श्रोता भले ही इसे सहज प्रवाह समझे, लेकिन मंच के भीतर की राजनीति साफ़ दिखाई देती है।
सम्मान और पुरस्कारों की सच्चाई
आज कवि सम्मेलनों में दिए जाने वाले अनेक सम्मान और स्मृति-चिह्न भी गुटबाज़ी की भेंट चढ़ चुके हैं। वही नाम बार-बार सम्मानित किए जाते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि सम्मान साहित्यिक योगदान का नहीं, बल्कि आयोजक से संबंधों का पुरस्कार बन गया है। इससे सम्मान की गरिमा कम होती है और वास्तविक साहित्यिक मूल्यांकन की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है।
सोशल मीडिया और गुटबाज़ी
सोशल मीडिया ने इस गुटीय संस्कृति को और मज़बूत किया है। अपने गुट के कवियों की प्रस्तुतियों को जमकर प्रचार मिलता है, जबकि दूसरे गुट की अच्छी प्रस्तुति भी अनदेखी रह जाती है। तारीफ़, साझा करना और समर्थन, सब कुछ आपसी दायरे में सिमट गया है। डिजिटल मंच, जो लोकतांत्रिक होना चाहिए था, वह भी कई बार गुटीय प्रचार का औज़ार बन गया है।
साहित्य का मंच या मनोरंजन का मेला?
गुटबाज़ी का सीधा असर कविता की प्रकृति पर भी पड़ा है। गंभीर, विचारोत्तेजक और संवेदनशील रचनाओं की जगह अब त्वरित तालियाँ बटोरने वाली रचनाएँ अधिक पसंद की जाने लगी हैं। कविता धीरे-धीरे साहित्य से खिसककर केवल मंचीय मनोरंजन बनती जा रही है। शोर, चुटकुले और सतही भावुकता कई जगह कविता पर हावी हो गए हैं।
क्या हर जगह स्थिति एक-सी है?
यह कहना भी अनुचित होगा कि हर कवि सम्मेलन या मुशायरा इसी बीमारी से ग्रस्त है। दिल्ली-एनसीआर में आज भी कुछ आयोजन ऐसे हैं जो बिना गुट, बिना शर्त और बिना पक्षपात के मंच प्रदान करते हैं। वहाँ रचना, प्रस्तुति और संवेदना को प्राथमिकता दी जाती है। किंतु ऐसे आयोजन अपवाद बनते जा रहे हैं, जबकि गुटबाज़ी धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का रूप लेती जा रही है।
दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलन और मुशायरे आज भी जीवित हैं, सक्रिय हैं और श्रोताओं को आकर्षित करते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गुटबाज़ी ने इनके साहित्यिक चरित्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। जब तक आयोजक निष्पक्षता नहीं अपनाते, मंच संचालक ईमानदार नहीं होता और कवि स्वयं गुटों से ऊपर उठकर साहित्य को प्राथमिकता नहीं देते, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। साहित्य का मंच केवल तालियों और पहचान का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और चेतना का वाहक होता है। यदि यह मंच संकीर्णताओं में कैद हो गया, तो नुकसान केवल कवियों का नहीं, बल्कि पूरी साहित्यिक परंपरा का होगा। आज ज़रूरत इस बात की है कि कवि सम्मेलन और मुशायरे फिर से रचना की गरिमा, विचार की स्वतंत्रता और साहित्यिक ईमानदारी की ओर लौटें।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


सोमवार, 5 जनवरी 2026

दिल्ली की कवि गोष्ठियों का सच

 विशेष लेख-

भारत की सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान में दिल्ली का विशेष स्थान रहा है। यहाँ की कवि गोष्ठियाँ कभी विचार, संवेदना और सामाजिक सरोकार की जीवंत प्रयोगशालाएँ मानी जाती थीं। हिंदी-उर्दू कविता की अनेक धाराएँ यहीं से आगे बढ़ीं। परंतु बीते एक दशक में दिल्ली की कवि गोष्ठियों का स्वरूप जिस तेजी से बदला है, उसने साहित्य प्रेमियों और गंभीर रचनाकारों को आत्ममंथन के लिए विवश कर दिया है।

आयोजन की भरमार, विचारों की कमी

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आज दिल्ली में लगभग हर सप्ताह सैकड़ों कवि गोष्ठियाँ होती हैं। सभागारों में, पार्कों में, सोसायटियों में और यहां तक कि रेस्तरां व कैफे में भी। संख्या के इस विस्फोट ने गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। कई आयोजनों में कविता का उद्देश्य आत्म-अभिव्यक्ति न होकर केवल मंच-प्रदर्शन बनकर रह गया है। कविता सुनी कम जाती है, दिखाई अधिक जाती है।

वही चेहरे, वही तालियाँ

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दिल्ली की अनेक कवि गोष्ठियों में वर्षों से घूमते वही परिचित चेहरे दिखाई देते हैं। वही रचनाएँ, वही लय, वही ठहरे हुए मुहावरे। नए और युवा कवियों के लिए मंच सीमित है। अक्सर उन्हें या तो अंतिम समय में बोलने का अवसर मिलता है या बिल्कुल नहीं। इससे साहित्य का स्वाभाविक विकास बाधित होता है और कविता एक बंद दायरे में घूमती रहती है।

श्रोता : रसिक से दर्शक तक

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पहले कवि गोष्ठी का श्रोता ‘रसिक’ होता था, जो कविता को सुनता, समझता और आत्मसात करता था। आज वह कई बार ‘दर्शक’ बन गया है, जो तालियाँ बजाता है, वीडियो बनाता है और सोशल मीडिया पर साझा करता है। गंभीर और विचारोत्तेजक कविताओं के समय बेचैनी दिखती है, जबकि तुकांत, तात्कालिक और चुटीली पंक्तियों पर तुरंत प्रतिक्रिया मिल जाती है।

साहित्य से व्यापार की ओर

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दिल्ली की कुछ कवि गोष्ठियाँ अब आस्था से अधिक आयोजन-व्यवसाय का रूप ले चुकी हैं। कहीं ‘सहयोग राशि’ के नाम पर मंच तक पहुँच सुनिश्चित की जाती है, तो कहीं प्रायोजकों के बैनर कविता से बड़े दिखाई देते हैं। यह स्थिति साहित्य की आत्मा के लिए चिंताजनक है, क्योंकि कविता का मूल्य उसकी संवेदना में होना चाहिए, न कि उसकी मार्केटिंग में।

सोशल मीडिया का दबाव

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रील और शॉर्ट वीडियो संस्कृति ने कविता की संरचना तक को प्रभावित किया है। अब कविताएँ इस सोच के साथ लिखी जा रही हैं कि कौन-सी पंक्ति वायरल होगी। गहराई, धैर्य और दीर्घ अनुभूति की जगह त्वरित प्रभाव ने ले ली है। कविता की यात्रा ‘पंक्ति’ तक सिमटती जा रही है।

दिल्ली-एनसीआर की स्थिति

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ग़ाज़ियाबाद, हापुड़ और दिल्ली-एनसीआर के अन्य क्षेत्रों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। यहाँ मुहल्ला-स्तरीय कवि गोष्ठियाँ सामाजिक मेल-जोल का माध्यम तो बन रही हैं, पर साहित्यिक कसौटी पर सब खरा नहीं उतरता। प्रतिस्पर्धा अब रचना की नहीं, आयोजन की हो गई है।

आशा की किरण

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इस चित्र का दूसरा पहलू भी है। दिल्ली में कुछ संस्थाएँ, विश्वविद्यालयों के साहित्यिक मंच और स्वतंत्र समूह आज भी गंभीर कविताओं के लिए स्थान बना रहे हैं। यहाँ नए रचनाकारों को सुना जाता है, आलोचना होती है और संवाद जीवित रहता है। ये आयोजन कम प्रचारित होते हैं, पर साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान हैं।

क्या किया जाना चाहिए

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1.कवि गोष्ठियों में चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो

2.नवोदित कवियों के लिए निश्चित अवसर तय हों

3.श्रोताओं में कविता सुनने की संस्कृति विकसित की जाए

4.कविता को सोशल मीडिया कंटेंट से ऊपर रखा जाए

5.आयोजक साहित्य को उद्देश्य मानें, साधन नहीं

दिल्ली की कवि गोष्ठियाँ आज एक चौराहे पर खड़ी हैं। एक रास्ता बाजार, भीड़ और तात्कालिक लोकप्रियता की ओर जाता है, दूसरा साहित्यिक ईमानदारी, साधना और संवाद की ओर। यह तय करना कवियों, आयोजकों और श्रोताओं तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि कविता मंच की शोभा भर न बने, बल्कि समाज की चेतना की आवाज़ बनी रहे।

लेखक

डॉ. चेतन आनंद

(कवि-पत्रकार)