रविवार, 31 मई 2026

युवाओं में किताबें पढ़ने की संस्कृति कैसे बढ़े

 लेख-

तकनीक और इंटरनेट के इस युग में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या युवा पीढ़ी किताबों से दूर होती जा रही है? मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, वेब सीरीज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच किताबों का स्थान क्या रह गया है? यह सच है कि युवाओं की पढ़ने की आदतों में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि किताबों का महत्व समाप्त हो रहा है। वास्तव में चुनौती किताबों के अस्तित्व की नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति को नए समय के अनुरूप ढालने की है।
युवाओं में बढ़ती अरुचि के कारण
आज का युवा सूचना के विस्फोट के दौर में जी रहा है। उसके हाथ में स्मार्टफोन है, जहां कुछ सेकंड में मनोरंजन, समाचार और ज्ञान उपलब्ध हो जाता है। इसके कारण लंबे समय तक बैठकर पुस्तक पढ़ने का धैर्य कम हुआ है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म त्वरित संतुष्टि प्रदान करते हैं। कुछ सेकंड की रील और छोटे वीडियो युवाओं का ध्यान आकर्षित करते हैं। इसके मुकाबले किताबें समय, एकाग्रता और कल्पनाशक्ति की मांग करती हैं। यही कारण है कि कई युवा पुस्तक पढ़ने को बोझिल मानने लगे हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा व्यवस्था भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। अधिकांश विद्यार्थियों के लिए किताबें परीक्षा पास करने का माध्यम बन गई हैं। पाठ्यक्रम से बाहर साहित्य, जीवनी, इतिहास या विज्ञान की पुस्तकें पढ़ने की प्रेरणा बहुत कम मिलती है।
फिर भी किताबों से पूरी तरह दूर नहीं हैं युवा
स्थिति का दूसरा पक्ष भी है। आज भी बड़ी संख्या में युवा उपन्यास, सेल्फ-हेल्प, करियर, उद्यमिता, मनोविज्ञान और समसामयिक विषयों की पुस्तकें पढ़ रहे हैं। ऑनलाइन पुस्तक बिक्री में लगातार वृद्धि इसका प्रमाण है। पिछले कुछ वर्षों में पुस्तक मेलों, साहित्य उत्सवों और लेखक संवाद कार्यक्रमों में युवाओं की उपस्थिति बढ़ी है। ऑडियो बुक और ई-बुक्स ने भी पढ़ने की संस्कृति को नया आयाम दिया है। अनेक युवा यात्रा के दौरान या व्यायाम करते समय ऑडियो बुक सुनते हैं। यानी समस्या किताबों के प्रति अरुचि की नहीं, बल्कि पढ़ने के स्वरूप में आए बदलाव की है।
किताबों का भविष्य क्या है?
इतिहास बताता है कि नई तकनीकों के आने से पुरानी विधाएं समाप्त नहीं होतीं, बल्कि उनका स्वरूप बदलता है। रेडियो के आने से अखबार खत्म नहीं हुए, टीवी के आने से रेडियो समाप्त नहीं हुआ और इंटरनेट के बावजूद पुस्तकें आज भी मौजूद हैं। किताबें केवल सूचना का स्रोत नहीं होतीं। वे चिंतन, कल्पना, संवेदना और व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम हैं। इंटरनेट त्वरित जानकारी दे सकता है, लेकिन गहन समझ और विचार की क्षमता अक्सर पुस्तकों से ही विकसित होती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में पुस्तकें मुद्रित और डिजिटल दोनों रूपों में मौजूद रहेंगी। ई-बुक्स और ऑडियो बुक्स का विस्तार होगा, लेकिन कागजी किताबों का आकर्षण भी बना रहेगा। पुस्तक हाथ में लेकर पढ़ने का अनुभव आज भी लाखों पाठकों को प्रिय है।
पढ़ने की आदत क्यों जरूरी है?
पुस्तकें केवल ज्ञान नहीं देतीं, बल्कि व्यक्ति का दृष्टिकोण भी विकसित करती हैं। नियमित पुस्तक-पठन से भाषा और अभिव्यक्ति में सुधार होता है। कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता बढ़ती है। एकाग्रता विकसित होती है। आलोचनात्मक सोच का विकास होता है। मानसिक तनाव कम होता है। समाज और जीवन को समझने की क्षमता बढ़ती है। यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश सफल उद्यमी, वैज्ञानिक, लेखक और नेता नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ने की आदत रखते हैं।
युवाओं में पढ़ने की रुचि कैसे बढ़ाई जाए?
1. बचपन से पुस्तक संस्कृति विकसित की जाए-पढ़ने की आदत स्कूल या कॉलेज में अचानक नहीं बनती। परिवार में किताबों का वातावरण होना चाहिए। यदि माता-पिता स्वयं पढ़ते हैं तो बच्चे भी प्रेरित होते हैं।
2. पुस्तकालयों को आकर्षक बनाया जाए-देश के अधिकांश सार्वजनिक पुस्तकालय उपेक्षा का शिकार हैं। आधुनिक पुस्तकालयों में आरामदायक वातावरण, डिजिटल सुविधाएं और नई किताबें उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
3. पाठ्यक्रम से बाहर पढ़ने को प्रोत्साहन-विद्यालय और विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम के अतिरिक्त पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करें। पुस्तक समीक्षा, चर्चा और वाचन प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती हैं।
4. सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग-जहां युवा हैं, वहीं किताबों को पहुंचाना होगा। पुस्तक समीक्षा, लेखक परिचय और साहित्यिक सामग्री को सोशल मीडिया के माध्यम से लोकप्रिय बनाया जा सकता है।
5. स्थानीय भाषा के साहित्य को बढ़ावा-अनेक युवा अंग्रेजी पुस्तकों की ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन अपनी मातृभाषा में उपलब्ध उत्कृष्ट साहित्य से परिचित नहीं हो पाते। हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की अच्छी पुस्तकों को युवाओं तक पहुंचाना जरूरी है।
6. साहित्यिक उत्सव और पुस्तक मेले-पुस्तक मेलों में लेखक और पाठकों का सीधा संवाद युवाओं को आकर्षित करता है। ऐसे आयोजनों को छोटे शहरों और कस्बों तक ले जाना चाहिए।
7. डिजिटल और प्रिंट का संतुलन-युवाओं को यह समझाने की आवश्यकता है कि तकनीक और पुस्तकें विरोधी नहीं हैं। ई-बुक, ऑडियो बुक और मुद्रित पुस्तकें मिलकर पढ़ने की संस्कृति को समृद्ध बना सकती हैं।
यह धारणा कि युवा पूरी तरह किताबों से दूर हो गए हैं, वास्तविकता का केवल एक हिस्सा है। सच यह है कि पढ़ने के तरीके बदल रहे हैं। चुनौती यह है कि हम पुस्तकों को युवाओं के जीवन से जोड़ने के नए रास्ते खोजें। किताबें केवल ज्ञान का भंडार नहीं, बल्कि सभ्यता की स्मृति और समाज की चेतना होती हैं। यदि हम चाहते हैं कि भविष्य की पीढ़ी विचारशील, संवेदनशील और रचनात्मक बने, तो उसे किताबों से जोड़ना ही होगा। तकनीक के युग में भी पुस्तकें अप्रासंगिक नहीं हुई हैं, बल्कि आज उनकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। क्योंकि सूचना के समुद्र में सही दिशा देने का काम अब भी किताबें ही सबसे बेहतर ढंग से कर सकती हैं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


शनिवार, 30 मई 2026

पहाड़ों के जंगलों में हर साल क्यों धधकती है आग?

 महत्वपूर्ण लेख-







कारण, नुकसान, सरकारी कार्रवाई और अनुत्तरित सवाल  मई और जून का महीना आते ही हिमालयी राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के जंगलों से धुएँ की खबरें आने लगती हैं। हर वर्ष हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ जाता है, वन्यजीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है, स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित होती है और करोड़ों रुपये की प्राकृतिक संपदा नष्ट हो जाती है। सवाल यह है कि आखिर पहाड़ों के जंगलों में आग की घटनाएँ सबसे अधिक मई-जून में ही क्यों होती हैं? क्या यह केवल प्राकृतिक कारणों का परिणाम है या इसके पीछे मानवीय हस्तक्षेप भी है? वन विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में आग लगने के पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं। मार्च से जून के बीच पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है। तापमान बढ़ जाता है और जंगलों में गिरी सूखी पत्तियाँ तथा घास अत्यधिक ज्वलनशील हो जाती हैं। उत्तराखंड के बड़े भूभाग में फैले चीड़ के जंगल इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं। चीड़ की सूखी सुइयाँ, जिन्हें स्थानीय भाषा में पिरूल कहा जाता है, आग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं। तेज हवाएँ इस आग को कुछ ही घंटों में कई किलोमीटर तक पहुँचा देती हैं।
हालाँकि विशेषज्ञ केवल चीड़ को दोषी नहीं मानते। उनका कहना है कि अधिकांश वनाग्नि घटनाओं के पीछे मानवजनित कारण अधिक महत्वपूर्ण हैं। वन विभाग की रिपोर्टों और विभिन्न न्यायिक मंचों पर प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार बड़ी संख्या में आग की घटनाएँ मानवीय लापरवाही अथवा जानबूझकर की गई हरकतों का परिणाम होती हैं। बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े फेंकना, सूखी घास जलाना, चरागाह तैयार करने के लिए आग लगाना, शहद या अन्य वन उपज एकत्र करने के दौरान आग का प्रयोग करना तथा कुछ मामलों में शरारतन आग लगाना भी इसके प्रमुख कारण बताए जाते हैं। एक याचिका में तो यह दावा किया गया था कि लगभग 90 प्रतिशत वनाग्नि घटनाएँ मानवजनित होती हैं।
पिछले कुछ वर्षों के आँकड़े इस समस्या की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2024 में उत्तराखंड सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया था कि राज्य में जंगलों में आग लगने की लगभग 398 घटनाएँ दर्ज की गईं। वहीं नवंबर 2023 से मई 2024 के बीच आग की 900 से अधिक घटनाओं का उल्लेख विभिन्न रिपोर्टों में किया गया। वर्ष 2026 में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। हालिया आँकड़ों के अनुसार राज्य में लगभग 400 वनाग्नि घटनाएँ दर्ज की जा चुकी हैं और सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। कई जिलों में लगातार आग लगने की घटनाओं ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
इन घटनाओं का प्रभाव केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता। वनाग्नि के कारण जैव विविधता को भारी नुकसान पहुँचता है। अनेक छोटे जीव-जंतु और पक्षी आग की चपेट में आकर मर जाते हैं। बड़े वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास छोड़ने को विवश हो जाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। आग मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को भी नष्ट कर देती है। इसके परिणामस्वरूप वर्षा होने पर मिट्टी का कटाव बढ़ जाता है और भूस्खलन की आशंका अधिक हो जाती है। पहाड़ों के जलस्रोतों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बार-बार लगने वाली आग जंगलों की जल धारण क्षमता को कम करती है, जिससे झरनों और प्राकृतिक स्रोतों का जलस्तर प्रभावित हो सकता है।
वनाग्नि का एक बड़ा प्रभाव जलवायु पर भी पड़ता है। जंगलों में लगी आग से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक गैसें वातावरण में पहुँचती हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है और वैश्विक तापवृद्धि की समस्या और गंभीर हो जाती है। विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी और सूखा वनाग्नि को बढ़ावा देते हैं, जबकि वनाग्नि स्वयं जलवायु परिवर्तन को और तीव्र बनाती है। इस प्रकार एक दुष्चक्र तैयार हो जाता है।
वन क्षेत्र को हुए नुकसान को लेकर भी विभिन्न आँकड़े सामने आए हैं। कुछ स्वतंत्र अध्ययनों और सैटेलाइट विश्लेषणों में यह संकेत मिला है कि वास्तविक रूप से प्रभावित क्षेत्र कई बार सरकारी आँकड़ों से कहीं अधिक होता है। सैटेलाइट चित्रों के आधार पर किए गए विश्लेषणों में लाखों हेक्टेयर क्षेत्र पर आग के प्रभाव के संकेत मिले हैं। इससे यह बहस भी तेज हुई है कि वनाग्नि की वास्तविक स्थिति का आकलन और अधिक पारदर्शी तथा वैज्ञानिक ढंग से किया जाना चाहिए।
इस गंभीर स्थिति पर न्यायपालिका ने भी चिंता व्यक्त की है। वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में जंगलों की आग को लेकर राज्य सरकार से कड़े सवाल पूछे थे। अदालत ने कहा कि मीडिया में भयावह तस्वीरें दिखाई दे रही हैं और यह जानना आवश्यक है कि सरकार आग रोकने के लिए क्या कदम उठा रही है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल बारिश या क्लाउड सीडिंग जैसे अस्थायी उपायों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। इसके लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक रणनीति विकसित करनी होगी।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी वनाग्नि के मामलों को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग से कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ माँगी हैं। इनमें वन कर्मियों की उपलब्धता, आपातकालीन प्रबंधन व्यवस्था, आग लगने की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली और संसाधनों की स्थिति जैसे विषय शामिल हैं। एनजीटी का मानना है कि प्रभावी प्रबंधन और जवाबदेही के बिना वनाग्नि की समस्या पर नियंत्रण संभव नहीं है। सरकारों ने भी समय-समय पर कई निर्देश जारी किए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने, फायर लाइन बनाने, ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक का उपयोग करने, स्थानीय समुदायों को जागरूक करने और वन कर्मियों की संख्या बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। कई स्थानों पर पिरूल संग्रहण को प्रोत्साहित किया गया है ताकि जंगलों में ज्वलनशील सामग्री की मात्रा कम हो सके। इसके अतिरिक्त आग लगाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं।
कार्रवाई के मोर्चे पर भी कुछ आँकड़े उल्लेखनीय हैं। राज्य सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को दी गई जानकारी के अनुसार वनाग्नि से जुड़े सैकड़ों आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं और अनेक व्यक्तियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की गई है। फिर भी यह प्रश्न बना हुआ है कि यदि हर वर्ष बड़ी संख्या में घटनाएँ मानवजनित हैं, तो दोषियों की पहचान और दंड की प्रक्रिया अभी भी अपेक्षित स्तर तक प्रभावी क्यों नहीं हो पाई है। वास्तव में वनाग्नि की समस्या केवल कानून-व्यवस्था या वन विभाग की चुनौती नहीं है। यह पर्यावरण, जल संरक्षण, जैव विविधता, पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और जनजीवन से जुड़ा हुआ विषय है। पहाड़ों के जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि वे नदियों, झरनों, वन्यजीवों और लाखों लोगों की जीवनरेखा हैं। यदि इन्हें बचाना है तो सरकार, प्रशासन, न्यायपालिका, वैज्ञानिक समुदाय और स्थानीय समाज सभी को मिलकर काम करना होगा।
हर वर्ष मई-जून में धधकते जंगल हमें यह याद दिलाते हैं कि प्रकृति के साथ लापरवाही का परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है। अब समय आ गया है कि वनाग्नि को मौसमी घटना मानकर नजरअंदाज करने के बजाय इसे राष्ट्रीय पर्यावरणीय चुनौती के रूप में देखा जाए। तभी हिमालय की हरियाली, जैव विविधता और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक धरोहर को बचाया जा सकेगा।
हाल के वर्षों में हुईं घटनाएं
2024 में उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि जंगलों में आग की 398 घटनाएं दर्ज हुईं।
2024-25 फायर सीजन रहा। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के अनुसार नवंबर 2023 से मई 2024 तक आग की 910 घटनाएं सामने आई थीं। 2026 में रिपोर्टों के अनुसार 394 से अधिक वनाग्नि घटनाएं दर्ज हुईं। 331 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जल गया। 2 से 3 लोगों की मृत्यु की सूचना सामने आई। चमोली सहित कई जिले गंभीर रूप से प्रभावित हुए।
कितना नुकसान हुआ?
2026 में ही सैकड़ों हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। वास्तविक नुकसान शायद कहीं अधिक, वन विभाग और सैटेलाइट आंकड़ों में बड़ा अंतर पाया गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2023 से जून 2024 के बीच सैटेलाइट विश्लेषण में लगभग 1.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र आग से प्रभावित दिखाई दिया, जबकि विभागीय आंकड़े इससे काफी कम थे।
कितने लोगों पर कार्रवाई हुई?
सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड सरकार ने बताया था कि जंगलों में आग से जुड़े 350 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। 62 लोगों के खिलाफ कार्रवाई, मुकदमे दर्ज किए गए। 2026 में भी राज्य सरकार ने आग लगाने वालों की गिरफ्तारी और कठोर दंड के निर्देश जारी किए हैं।

लेखक-डाॅ. चेतन आनंद (कवि एवं पत्रकार)

(लेखक ने यह लेख अल्मोड़ा यात्रा से लौटकर लिखा है। फोटो भी हाल के हैं।)  


शुक्रवार, 29 मई 2026

सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक स्थल

 लेख-

देशभर में चल रहा अभियान
बढ़ती कार्रवाई और संवेदनशील चुनौती

भारत में सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक स्थलों का मुद्दा लंबे समय से प्रशासन, राजनीति और समाज के बीच बहस का विषय रहा है। सड़कों, फुटपाथों, पार्कों, रेलवे भूमि, वनभूमि, तालाबों और ग्राम समाज की जमीनों पर मंदिर, मस्जिद, मजार, गुरुद्वारे और चर्च बनने के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कई बार छोटे पूजा स्थलों के रूप में शुरू हुए निर्माण धीरे-धीरे स्थायी धार्मिक ढाँचों में बदल जाते हैं और फिर सरकारी भूमि पर कब्जे का रूप ले लेते हैं। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने ऐसे अतिक्रमणों के खिलाफ अभियान तेज किए हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम, गुजरात, मध्य प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में प्रशासनिक कार्रवाई देखने को मिली है। सुप्रीम कोर्ट भी सार्वजनिक स्थलों पर अवैध धार्मिक निर्माणों को लेकर सख्त रुख अपना चुका है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि सार्वजनिक स्थानों पर नए धार्मिक ढाँचों के निर्माण की अनुमति न दी जाए। अदालत ने यह भी कहा था कि सड़कों, पार्कों और सरकारी भूमि पर बने अवैध धार्मिक स्थलों की पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। इसके बाद कई राज्यों ने जिला स्तरीय समितियाँ गठित कीं और सर्वेक्षण शुरू किए। हालाँकि, धार्मिक संवेदनशीलता के कारण अधिकांश राज्यों में कार्रवाई बेहद सावधानी के साथ की जाती रही है।
किन राज्यों में सबसे अधिक कार्रवाई हुई
उत्तर प्रदेश-देश में सरकारी भूमि से धार्मिक अतिक्रमण हटाने की सबसे व्यापक कार्रवाई उत्तर प्रदेश में देखने को मिली। सड़क, तालाब, ग्राम समाज और नगर निकाय की भूमि पर बने हजारों अवैध ढाँचों को चिन्हित किया गया। प्रशासन ने कई जिलों में नोटिस जारी किए और “स्वैच्छिक हटाओ” अभियान चलाया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई बार कहा कि सरकारी भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा स्वीकार नहीं किया जाएगा। हाल के अभियानों में नोएडा और ग्रेटर नोएडा में प्रशासन ने लगभग 5900 करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी भूमि मुक्त कराने का दावा किया।
उत्तराखंड-उत्तराखंड में वनभूमि और सड़क किनारे बने अवैध धार्मिक ढाँचों पर विशेष अभियान चलाया गया। हरिद्वार, हल्द्वानी, नैनीताल और देहरादून में अवैध मजारों और मंदिरों को हटाने की कार्रवाई चर्चा में रही। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी और किसी को कानून से ऊपर नहीं माना जाएगा।
असम-असम में मुख्यमंत्री हिमन्त बिस्वा शर्मा के नेतृत्व में वनभूमि और सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने के अभियान तेज हुए। राज्य सरकार का कहना रहा कि विकास योजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकारी भूमि को मुक्त कराना आवश्यक है। कई जगह धार्मिक ढाँचों को लेकर विवाद भी सामने आए।
गुजरात और मध्य प्रदेश-गुजरात में सड़क चैड़ीकरण और नगर विकास परियोजनाओं के दौरान अनेक धार्मिक अतिक्रमण हटाए गए। अहमदाबाद और वडोदरा जैसे शहरों में प्रशासन ने सार्वजनिक भूमि खाली कराई। मध्य प्रदेश के भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में भी इसी प्रकार की कार्रवाई हुई। राज्य सरकार ने कहा कि धर्म के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दिल्ली-दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नगर निगमों ने सड़कों, फुटपाथों और पार्कों पर बने अवैध धार्मिक ढाँचों की पहचान शुरू की। राजधानी में कई छोटे मंदिर, मजार और अन्य ढाँचे सार्वजनिक मार्गों में बाधा के रूप में चिन्हित किए गए।
मुंबई के बांद्रा में रेलवे की बड़ी कार्रवाई-हाल के दिनों में मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित गरीब नगर क्षेत्र में पश्चिम रेलवे द्वारा चलाया गया अतिक्रमण हटाओ अभियान राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना। रेलवे प्रशासन ने दावा किया कि यह भूमि रेलवे विस्तार और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए आवश्यक है। रिपोर्टों के अनुसार, अभियान के दौरान लगभग 480 घरों और अन्य अवैध ढाँचों को हटाया गया तथा वर्षों पुराने अतिक्रमणों को तोड़ा गया। रेलवे अधिकारियों ने कहा कि कार्रवाई अदालत की अनुमति और पूर्व नोटिसों के बाद की गई। इस कार्रवाई के दौरान कुछ धार्मिक संरचनाओं को नुकसान पहुँचने की खबरों के बाद क्षेत्र में तनाव भी पैदा हुआ। विरोध प्रदर्शन और झड़पों की घटनाएँ सामने आईं, जिसके बाद भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने पुनर्वास की अपर्याप्त व्यवस्था का मुद्दा भी उठाया। यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया कि सरकारी भूमि खाली कराने की कार्रवाई केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलता से भी जुड़ जाती है।
सबसे अधिक संख्या किस धार्मिक स्थल की

विभिन्न राज्यों की प्रशासनिक रिपोर्टों और मीडिया विश्लेषणों के अनुसार सरकारी भूमि पर बने अवैध धार्मिक स्थलों में सबसे अधिक संख्या मंदिरों की बताई जाती है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि भारत में मंदिरों की कुल संख्या अन्य धार्मिक स्थलों की तुलना में बहुत अधिक है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कई बार किसी पेड़, चबूतरे या छोटे पूजा स्थल से शुरुआत होती है और धीरे-धीरे वह स्थायी मंदिर का रूप ले लेता है। हालाँकि, कई राज्यों में मस्जिदों, मजारों, गुरुद्वारों और चर्चों से जुड़े भूमि विवाद भी सामने आए हैं। उत्तराखंड में अवैध मजारों को लेकर विशेष अभियान चर्चा में रहे, जबकि कुछ महानगरों में सड़क किनारे बने छोटे मंदिरों और मस्जिदों पर कार्रवाई हुई।
कितनी भूमि मुक्त कराई गई
देशभर में मुक्त कराई गई सरकारी भूमि का कोई एकीकृत राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी विभिन्न राज्यों ने हजारों हेक्टेयर भूमि से अतिक्रमण हटाने का दावा किया है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार देश के अनेक राज्यों में लाखों हेक्टेयर वनभूमि पर अतिक्रमण दर्ज है। इनमें आवासीय निर्माण, खेती, व्यावसायिक उपयोग और धार्मिक ढाँचे सभी शामिल हैं। राज्य सरकारों का कहना है कि अतिक्रमण हटाने से सड़क चैड़ीकरण, रेलवे विस्तार, जल निकासी, पार्क निर्माण और विकास योजनाओं को गति मिलती है।
राजनीतिक और सामाजिक चुनौती
धार्मिक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई प्रशासन के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहती है। किसी भी धार्मिक स्थल पर कार्रवाई से स्थानीय लोगों की भावनाएँ प्रभावित हो सकती हैं। इसी कारण कई बार प्रशासन पहले समझौते, स्थानांतरण या स्वैच्छिक हटाने का विकल्प देता है। विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते हैं कि कार्रवाई चयनात्मक होती है, जबकि सरकारें दावा करती हैं कि अभियान सभी धर्मों के अवैध निर्माणों के खिलाफ समान रूप से चलाए जा रहे हैं। अदालतें भी समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे को केवल धार्मिक आधार पर वैध नहीं माना जा सकता। भारत में सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक स्थलों का मुद्दा केवल अतिक्रमण का प्रश्न नहीं, बल्कि कानून, आस्था, राजनीति और प्रशासन के बीच संतुलन की बड़ी चुनौती बन चुका है। लगभग हर राज्य में ऐसे मामले मौजूद हैं और समय-समय पर अभियान चलाए जाते रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि अवैध धार्मिक ढाँचों में मंदिरों की संख्या सबसे अधिक है, लेकिन मस्जिद, मजार, गुरुद्वारे और चर्च भी विवादों में शामिल रहे हैं। मुंबई के बांद्रा में रेलवे की हालिया कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में सरकारी भूमि को मुक्त कराने की मुहिम और तेज हो सकती है। लेकिन सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रहेगी कि कानून का पालन भी हो और धार्मिक-सामाजिक संवेदनशीलता भी बनी रहे।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

शुक्रवार, 22 मई 2026

“कॉकरोच जनता पार्टी” नए परिवर्तन का संकेत!

 लेख-

भारतीय राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सोशल मीडिया का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार से लेकर जनमत निर्माण तक, डिजिटल प्लेटफॉर्म अब लोकतांत्रिक विमर्श का बड़ा माध्यम बन चुके हैं। इसी डिजिटल राजनीति के बीच अचानक एक नया नाम चर्चा में आया “कॉकरोच जनता पार्टी”। शुरुआत में इसे केवल सोशल मीडिया मीम और व्यंग्य माना गया, लेकिन कुछ ही दिनों में यह इतना वायरल हो गया कि राष्ट्रीय मीडिया, राजनीतिक दलों और राजनीतिक विश्लेषकों तक में इसकी चर्चा होने लगी। अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल इंटरनेट की क्षणिक सनसनी है या भारतीय राजनीति में किसी नए परिवर्तन का संकेत?
कैसे शुरू हुई “कॉकरोच जनता पार्टी”
रिपोर्टों के अनुसार “कॉकरोच जनता पार्टी” की शुरुआत मई 2026 में सोशल मीडिया पर हुई। इसकी पृष्ठभूमि एक न्यायिक टिप्पणी से जुड़ी बताई जाती है। सोशल मीडिया पर यह दावा वायरल हुआ कि सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान बेरोजगार युवाओं के संदर्भ में “कॉकरोच” शब्द का प्रयोग किया गया। बाद में इस दावे को लेकर स्पष्टीकरण भी सामने आए, लेकिन तब तक “कॉकरोच” शब्द इंटरनेट पर व्यवस्था-विरोधी प्रतीक बन चुका था। इसी माहौल में डिजिटल रणनीतिकार अभिजीत दिपके ने काॅकरोच जनता पार्टी नाम से सोशल मीडिया अभियान शुरू किया। देखते ही देखते यह अभियान मीम संस्कृति, बेरोजगारी, राजनीतिक असंतोष और युवा व्यंग्य का मिश्रण बन गया। इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म पर इसके लाखों फॉलोअर्स हो गए। कई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि इसकी सोशल मीडिया पहुँच कुछ पारंपरिक राजनीतिक दलों से भी अधिक दिखाई देने लगी। यही कारण है कि राजनीतिक दलों ने भी इसे गंभीरता से लेना शुरू किया।
क्या यह सचमुच राजनीतिक पार्टी है?
फिलहाल “कॉकरोच जनता पार्टी” भारत निर्वाचन आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दल नहीं है। न इसका कोई स्पष्ट संगठनात्मक ढाँचा सामने आया है और न ही देशव्यापी इकाइयाँ। अधिकतर विश्लेषक इसे अभी एक डिजिटल-राजनीतिक आंदोलन या व्यंग्यात्मक मंच मानते हैं।
इसके बावजूद इस अभियान ने युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रियता हासिल की। इसका मुख्य कारण इसकी भाषा और प्रस्तुति शैली मानी जा रही है। यह आंदोलन पारंपरिक राजनीतिक भाषणों के बजाय मीम, व्यंग्य, कटाक्ष और इंटरनेट संस्कृति का प्रयोग कर रहा है। इसके घोषणा पत्र जैसी पोस्टों में चुनाव आयोग में सुधार, मीडिया जवाबदेही, महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण और न्यायपालिका से जुड़े मुद्दों तक को उठाया गया। हालाँकि इन प्रस्तावों को अधिकतर लोग गंभीर नीति दस्तावेज की बजाय प्रतीकात्मक राजनीतिक व्यंग्य मानते हैं।
युवाओं में असंतोष का संकेत
“कॉकरोच जनता पार्टी” की लोकप्रियता ने यह स्पष्ट किया है कि देश का एक बड़ा युवा वर्ग मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से असंतुष्ट दिखाई देता है। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताएँ, बढ़ती महँगाई और अवसरों की कमी जैसे मुद्दों पर सोशल मीडिया में लंबे समय से नाराजगी देखी जा रही थी। इस आंदोलन ने उसी असंतोष को इंटरनेट भाषा में अभिव्यक्ति दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक पार्टी या संगठन का मामला नहीं है, बल्कि “डिजिटल पीढ़ी” की राजनीतिक मनोदशा का संकेत है। आज का युवा लंबी राजनीतिक सभाओं से अधिक छोटे वीडियो, मीम और वायरल अभियानों से प्रभावित हो रहा है।
किसे मिलेगी चुनौती?
यदि यह आंदोलन केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहता और आगे चलकर राजनीतिक रूप लेता है, तो सबसे बड़ी चुनौती उन दलों को मिल सकती है जिनका आधार शहरी युवा और डिजिटल वर्ग है।
विश्लेषकों के अनुसार इसकी शैली आम आदमी पार्टी के शुरुआती आंदोलनकारी दौर से मिलती-जुलती दिखाई देती है, यह व्यवस्था-विरोधी और एंटी-एस्टैब्लिशमेंट नैरेटिव पर आधारित है, और सोशल मीडिया को मुख्य हथियार बना रही है। इसी कारण कुछ लोग मानते हैं कि भविष्य में यह शहरी युवा वोट बैंक पर प्रभाव डाल सकती है। हालाँकि भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं ने इस अभियान की आलोचना करते हुए इसे “राजनीतिक एजेंडा” तक बताया। सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी वैचारिक बहस भी देखने को मिली।
क्या भारत में नेपाल जैसा परिवर्तन संभव है?
“कॉकरोच जनता पार्टी” की लोकप्रियता के बाद कुछ लोगों ने यह सवाल उठाना शुरू किया कि क्या भारत में भी नेपाल जैसा बड़ा राजनीतिक परिवर्तन संभव है। नेपाल में पिछले दो दशकों में राजशाही का अंत, माओवादी आंदोलन का उभार और नई राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण हुआ। लेकिन नेपाल की परिस्थितियाँ भारत से काफी अलग थीं। वहाँ राजनीतिक अस्थिरता, लंबे संघर्ष और संस्थागत संकट की स्थिति थी। भारत में लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपेक्षाकृत अधिक मजबूत और स्थिर मानी जाती हैं। यहाँ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों का विशाल संगठनात्मक ढाँचा है। इसलिए केवल सोशल मीडिया आधारित आंदोलन से पूरे राजनीतिक ढाँचे में अचानक परिवर्तन की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है। फिर भी यह मानना गलत होगा कि डिजिटल आंदोलनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भारत में अन्ना हजारे आंदोलन, निर्भया आंदोलन, किसान आंदोलन और आम आदमी पार्टी का उदय इस बात के उदाहरण हैं कि सोशल मीडिया से शुरू हुई बहसें बाद में वास्तविक राजनीतिक दबाव में बदल सकती हैं।
नई “मीम पॉलिटिक्स” का दौर
राजनीतिक विशेषज्ञ अब इसे “मीम पॉलिटिक्स” या “डिजिटल व्यंग्य राजनीति” का नया दौर बता रहे हैं। पहले राजनीतिक दल पोस्टर, रैलियों और टीवी विज्ञापनों पर निर्भर रहते थे, लेकिन अब वायरल वीडियो, मीम और ट्रेंडिंग हैशटैग राजनीतिक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।
“कॉकरोच जनता पार्टी” इसी बदलाव का प्रतीक बनकर उभरी है। यह आंदोलन दिखाता है कि आज की राजनीति केवल विचारधारा से नहीं, बल्कि डिजिटल संस्कृति और वायरल संचार से भी संचालित हो रही है।
“कॉकरोच जनता पार्टी” फिलहाल एक औपचारिक राजनीतिक दल से अधिक सोशल मीडिया आधारित व्यंग्यात्मक आंदोलन दिखाई देती है। लेकिन इसकी लोकप्रियता यह संकेत अवश्य देती है कि भारत का युवा वर्ग राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर नई भाषा और नए माध्यमों से अपनी नाराजगी व्यक्त करना चाहता है। यह आंदोलन भविष्य में वास्तविक राजनीतिक रूप ले पाएगा या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसके लिए केवल वायरल लोकप्रियता नहीं, बल्कि संगठन, नेतृत्व, विचारधारा और जमीनी उपस्थिति भी आवश्यक होगी। फिर भी इतना तय है कि “कॉकरोच जनता पार्टी” ने भारतीय राजनीति को यह संदेश जरूर दिया है कि डिजिटल पीढ़ी अब केवल दर्शक नहीं रहना चाहती, बल्कि अपनी शैली में राजनीतिक विमर्श को प्रभावित भी करना चाहती है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


सोमवार, 18 मई 2026

माँ के दूध तक पहुँचा जहर!

 महत्वपूर्ण लेख-

बिहार की चेतावनी और भारत का पर्यावरणीय संकट
                                   -डॉ. चेतन आनंद
जिस माँ के दूध को भारतीय संस्कृति में “अमृत” कहा गया, यदि उसी में जहरीले तत्व मिलने लगें तो यह केवल एक स्वास्थ्य समाचार नहीं, बल्कि सभ्यता और व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है। हाल के वर्षों में बिहार से आई कई शोध रिपोर्टों ने देश को झकझोर दिया है। पहले माताओं के दूध में आर्सेनिक मिलने की बात सामने आई, फिर सीसा और अब यूरेनियम जैसे रेडियोधर्मी तत्व के अंश पाए जाने की खबरों ने चिंता को और गहरा कर दिया है। वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का कहना है कि यह केवल “माँ के दूध” का संकट नहीं, बल्कि पानी, मिट्टी, भोजन और पूरे पर्यावरण के विषाक्त होते जाने का संकेत है।
हाल में बिहार के छह जिलों-कटिहार, खगड़िया, समस्तीपुर, बेगूसराय, भोजपुर और नालंदा में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध के नमूनों की जाँच की गई। अध्ययन में 40 महिलाओं के सैंपल लिए गए और हर नमूने में यूरेनियम (यू-238) के अंश पाए गए। कुछ नमूनों में इसकी मात्रा 5.25 यूजीएल तक दर्ज की गई। यह अध्ययन चिकित्सा जगत में गंभीर चर्चा का विषय बन गया। एम्स दिल्ली से जुड़े डॉ. अशोक शर्मा, जो इस शोध से जुड़े रहे, ने कहा कि अध्ययन में लगभग 70 प्रतिशत शिशुओं में “संभावित नाॅन-कारसिनोजेनिक रिस्क दिखाई दिया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि माताओं को स्तनपान बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि वर्तमान में भी माँ का दूध शिशु के लिए सर्वोत्तम पोषण माना जाता है। यूरेनियम का मामला सामने आने से पहले बिहार में माताओं के दूध में आर्सेनिक मिलने की रिपोर्ट ने भी वैज्ञानिकों को चिंतित किया था। गंगा के मैदानी क्षेत्रों में हुए एक बड़े अध्ययन में 378 महिलाओं के दूध के नमूनों की जाँच हुई। उनमें से लगभग 55 प्रतिशत नमूनों में विश्व स्वास्थ्य संगठन की सीमा से अधिक आर्सेनिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि बच्चों के मूत्र तथा चावल, गेहूँ और आलू जैसे खाद्य पदार्थों में भी आर्सेनिक के अंश मौजूद थे। विशेषज्ञों ने इसका मुख्य कारण भूजल प्रदूषण को माना। आर्सेनिक मानव शरीर के लिए अत्यंत खतरनाक माना जाता है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से त्वचा रोग, कैंसर, तंत्रिका तंत्र की कमजोरी और बच्चों के मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि नवजात शिशुओं का शरीर बेहद संवेदनशील होता है, इसलिए ऐसे तत्वों का प्रभाव उन पर और गंभीर हो सकता है। इसके बाद 2025 में महावीर कैंसर संस्थान, पटना द्वारा किए गए एक अध्ययन ने और भी भयावह तस्वीर प्रस्तुत की। अध्ययन में बिहार के छह जिलों की महिलाओं के दूध में भारी मात्रा में लेड (सीसा) पाया गया। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 92 प्रतिशत नमूनों में डब्ल्यूएचओ मानकों से अधिक सीसा मौजूद था। कुछ नमूनों में इसकी मात्रा 1309 यूजीएल तक पहुँची। महिलाओं के रक्त और मूत्र में भी सीसा मिला तथा बच्चों के शरीर में भी इसके संकेत पाए गए।
डॉक्टरों के अनुसार सीसा बच्चों के मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर सीधा असर डालता है। इससे आईक्यू कम हो सकता है, सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और मानसिक विकास बाधित हो सकता है। महावीर कैंसर संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. अरुण कुमार ने इसे “भविष्य की पीढ़ियों के लिए गंभीर चेतावनी” बताया। उनका कहना है कि यदि अभी भी पर्यावरण और जल सुरक्षा पर गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ये विषैले तत्व माताओं के शरीर तक पहुँच कैसे रहे हैं? वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण दूषित भूजल है। बिहार और झारखंड के कई क्षेत्रों में पहले से ही भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की समस्या रही है। अब यूरेनियम और सीसा के संकेत भी मिलने लगे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग, औद्योगिक कचरा, खनन गतिविधियाँ, दूषित मिट्टी और जल स्रोतों की उपेक्षा इस संकट को बढ़ा रहे हैं।
दरअसल, यह मामला केवल चिकित्सा विज्ञान का नहीं, बल्कि विकास मॉडल पर भी प्रश्न खड़ा करता है। भारत तेजी से औद्योगिक और आर्थिक विकास की ओर बढ़ रहा है, लेकिन पर्यावरणीय सुरक्षा लगातार पीछे छूटती जा रही है। नदियाँ प्रदूषित हैं, भूजल जहरीला होता जा रहा है और खेती में रसायनों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। इसका असर अब सीधे मानव शरीर की सबसे संवेदनशील कड़ी माँ और नवजात शिशु तक पहुँच चुका है।
विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन रिपोर्टों का अर्थ यह नहीं कि हर माँ का दूध जहरीला हो गया है। डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ आज भी स्तनपान को शिशु के लिए सबसे सुरक्षित और सर्वोत्तम पोषण मानते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लोग भय या भ्रम में आकर स्तनपान बंद न करें। असली चिंता माँ का दूध नहीं, बल्कि वह प्रदूषित पर्यावरण है जो धीरे-धीरे मानव शरीर के भीतर प्रवेश कर रहा है।
फिर भी यह स्थिति बेहद गंभीर है। यदि किसी समाज में माँ का दूध भी पर्यावरणीय प्रदूषण से अछूता न रहे, तो यह संकेत है कि संकट बहुत गहरा हो चुका है। यह केवल बिहार की समस्या नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए चेतावनी है। दुनिया के कई देशों में भी माताओं के दूध में माइक्रोप्लास्टिक, पारा, कीटनाशक और अन्य विषैले रसायनों के अंश मिलने लगे हैं। अर्थात आधुनिक विकास की कीमत अब आने वाली पीढ़ियाँ चुका रही हैं।
अब आवश्यकता केवल शोध और बहस की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की है। सरकारों को भूजल की व्यापक जाँच, शुद्ध पेयजल की उपलब्धता, औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण और खाद्य सुरक्षा पर कठोर नीति बनानी होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य निगरानी की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। साथ ही लोगों में जागरूकता बढ़ानी होगी कि पर्यावरण संरक्षण अब केवल प्रकृति बचाने का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व बचाने का प्रश्न बन चुका है।
भारतीय परंपरा में माँ को सृष्टि का आधार माना गया है। यदि उसी माँ के दूध तक जहर पहुँचने लगे, तो यह किसी एक राज्य या सरकार की विफलता नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है। यह समय चेतने का है, क्योंकि यदि पानी, मिट्टी और हवा को अभी नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल बीमार शरीर ही नहीं, बल्कि विषाक्त भविष्य भी विरासत में पाएँगी।

(लेखक कवि और पत्रकार हैं।)


गुरुवार, 14 मई 2026

पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद केंद्र सरकार का “महंगाई बम”

 समसामयिक लेख-


भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल आर्थिक विषय नहीं रह गई हैं, बल्कि वे राजनीति, चुनाव और जनभावनाओं से भी गहराई से जुड़ चुकी हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के समाप्त होते ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई वृद्धि ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या भारत में ईंधन मूल्य निर्धारण वास्तव में पूरी तरह आर्थिक आधार पर होता है, या फिर चुनावी राजनीति भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है।

15 मई 2026 को देशभर में पेट्रोल और डीजल के दामों में 3 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में कीमतें नए स्तर पर पहुंच गईं। कोलकाता में पेट्रोल 108 रुपये प्रति लीटर के पार चला गया। तेल कंपनियों ने इसका कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, पश्चिम एशिया में तनाव और लगातार हो रहे घाटे को बताया। सरकार का पक्ष भी यही रहा कि यह निर्णय परिस्थितियों की मजबूरी में लिया गया।
लेकिन विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों ने इस वृद्धि को सीधे पश्चिम बंगाल चुनाव से जोड़ दिया। चुनाव के दौरान लगातार यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि मतदान समाप्त होते ही पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव समाप्ति से पहले ही कहा था कि “चुनावी राहत खत्म होते ही महंगाई बढ़ेगी।” उस समय सरकार ने इन दावों को खारिज कर दिया था, किंतु चुनाव समाप्त होने के कुछ ही दिनों बाद कीमतों में वृद्धि ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे दिया।
दरअसल भारत में ईंधन की कीमतें हमेशा से राजनीतिक संवेदनशीलता का विषय रही हैं। पेट्रोल-डीजल सीधे जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं। इनकी कीमत बढ़ते ही केवल वाहन चलाना महंगा नहीं होता, बल्कि परिवहन लागत बढ़ने से खाद्यान्न, सब्जियां, दूध, निर्माण सामग्री और लगभग हर आवश्यक वस्तु की कीमत प्रभावित होती है। इसी कारण अर्थशास्त्री पेट्रोलियम उत्पादों को “महंगाई की जननी” तक कहते हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक भी अपनी रिपोर्टों में ईंधन कीमतों को महंगाई का बड़ा कारण मानता रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ी सी उथल-पुथल का असर सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, होर्मुज पर संकट पैदा होता है या कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर भारी दबाव पड़ता है।
लेकिन इस पूरे मामले का दूसरा पक्ष राजनीतिक अर्थशास्त्र का है। भारत में यह धारणा लंबे समय से बनी हुई है कि चुनावों के दौरान सरकारें पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने का प्रयास करती हैं ताकि जनता में असंतोष न बढ़े। कई बार तेल कंपनियां घाटा सहन करती हैं या सरकार टैक्स संरचना में अस्थायी राहत देती है। चुनाव समाप्त होते ही कीमतों में एकमुश्त वृद्धि देखने को मिलती है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद हुई ताजा वृद्धि को भी उसी परंपरा से जोड़कर देखा जा रहा है।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के बाद तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के समय पेट्रोल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई थी। उस समय भी विपक्ष ने आरोप लगाया था कि चुनाव तक दाम कृत्रिम रूप से रोके गए। इसी प्रकार 2017 में गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लंबे समय तक स्थिरता रही, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही पुनः वृद्धि शुरू हो गई।
सबसे चर्चित उदाहरण 2022 का रहा, जब उत्तर प्रदेश सहित पाँच राज्यों के चुनाव समाप्त होने के तुरंत बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार कई दिनों तक वृद्धि की गई। उस समय देश के अनेक शहरों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गया था। रसोई गैस सिलेंडर भी महंगे हुए थे। विपक्ष ने तब भी केंद्र सरकार पर चुनाव तक जनता को राहत देने और बाद में बोझ डालने का आरोप लगाया था।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर राहत दी थी। कई आर्थिक विश्लेषकों ने इसे चुनावी रणनीति बताया। हालांकि सरकार का तर्क था कि वह जनता को वैश्विक महंगाई से राहत देना चाहती है।
सच्चाई यह है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आर्थिक निर्णयों को पूरी तरह राजनीति से अलग करके देखना कठिन है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल बाजार का प्रश्न नहीं, बल्कि जनभावना और चुनावी समीकरणों का भी हिस्सा बन चुकी हैं। सरकारें चाहें किसी भी दल की हों, वे जनता पर अचानक आर्थिक बोझ डालने से पहले राजनीतिक समय का ध्यान अवश्य रखती हैं।
फिर भी सरकार का पक्ष पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में तेल बाजार अस्थिर है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया तनाव और वैश्विक आपूर्ति संकट ने ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। तेल कंपनियां लगातार यह कह रही हैं कि यदि कीमतें नहीं बढ़ाई जाएंगी तो उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ेगा। सरकार यह भी दावा कर रही है कि उसने कई बार टैक्स कम करके राहत दी है और भारत में अभी भी कई देशों की तुलना में ईंधन कीमतें नियंत्रित हैं।
इसके साथ ही सरकार वैकल्पिक ऊर्जा, इथेनॉल मिश्रण और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की नीति पर भी जोर दे रही है ताकि भविष्य में तेल आयात पर निर्भरता कम हो सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार “डॉलर बचाओ” और “ऊर्जा आत्मनिर्भरता” की बात कर चुके हैं। उनका तर्क है कि यदि भारत तेल आयात पर कम निर्भर होगा तो देश की अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत होगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
अंततः पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद पेट्रोल-डीजल मूल्य वृद्धि ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में महंगाई और राजनीति का संबंध बेहद गहरा है। आर्थिक मजबूरियां अपनी जगह हैं, लेकिन जनता यह भी देखती है कि कीमतें कब बढ़ती हैं और कब रोकी जाती हैं। यही कारण है कि हर बार चुनाव समाप्त होने के बाद ईंधन मूल्य वृद्धि पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो जाता है।
आज आवश्यकता केवल कीमतों को नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि ऐसी दीर्घकालिक ऊर्जा नीति बनाने की है जो भारत को आयातित तेल पर निर्भरता से मुक्त कर सके। अन्यथा हर चुनाव के बाद “महंगाई बम” भारतीय राजनीति और आम जनता दोनों के लिए चिंता का विषय बना रहेगा।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

प्रवासी भारतीय बने भारत की आर्थिक शक्ति

 लेख-

भारत आज विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। तेज आर्थिक विकास, बढ़ता वैश्विक प्रभाव और विशाल युवा शक्ति भारत को नई ऊँचाइयों तक ले जा रहे हैं। किंतु इस विकास यात्रा के पीछे केवल देश के भीतर होने वाला उत्पादन और व्यापार ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे करोड़ों भारतीयों का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रवासी भारतीय हर वर्ष अरबों डॉलर भारत भेजते हैं और बड़ी मात्रा में सोना भी भारत आता है। यही कारण है कि विदेशी मुद्रा, डॉलर बचत और आत्मनिर्भरता जैसे विषय आज राष्ट्रीय आर्थिक चर्चा के केंद्र में हैं।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी समय-समय पर “डॉलर बचाने”, “स्थानीय उत्पाद अपनाने” और “आत्मनिर्भर भारत” पर बल देते रहे हैं। पहली दृष्टि में यह प्रश्न उठता है कि जब विदेशों में बसे भारतीय भारत को इतनी बड़ी मात्रा में डॉलर भेज रहे हैं, तब डॉलर बचाने की आवश्यकता क्यों है? किंतु जब भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना को गहराई से देखा जाए, तब इस कथन का महत्व स्पष्ट हो जाता है।
विश्व बैंक के अनुसार भारत लगातार दुनिया में सबसे अधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। वर्ष 2024 में प्रवासी भारतीयों ने लगभग 137-138 अरब डॉलर भारत भेजे। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 11-12 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। यह राशि कई देशों के वार्षिक बजट से भी अधिक है। संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, सऊदी अरब, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में बसे भारतीय अपने परिवारों की सहायता के लिए नियमित रूप से धन भेजते हैं।
यह धन केवल व्यक्तिगत सहायता नहीं है, यह भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने वाला महत्वपूर्ण स्रोत है। लाखों परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान निर्माण, खेती और छोटे व्यवसाय इसी धन पर निर्भर हैं। विशेष रूप से केरल, पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में प्रवासी भारतीयों का आर्थिक योगदान अत्यंत प्रभावशाली है।
पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में उसका वैश्विक भारतीय समुदाय शामिल है, जो कठिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भी भारत के लिए विदेशी मुद्रा का स्थिर स्रोत बना रहता है। वास्तव में कोविड महामारी और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के समय भी प्रवासी भारतीयों ने रिकॉर्ड मात्रा में धन भारत भेजा।
लेकिन दूसरी ओर भारत की एक बड़ी चुनौती उसका भारी आयात बिल है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर है। पेट्रोलियम, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण, खाद्य तेल, सेमीकंडक्टर और सोने के आयात पर हर वर्ष भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। भारत जितना निर्यात करता है, उससे अधिक आयात करता है, जिससे व्यापार घाटा उत्पन्न होता है।
सोना इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। भारतीय समाज में सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, सुरक्षा और बचत का प्रतीक है। विवाह, त्योहार और धार्मिक अवसरों पर सोने की खरीद भारतीय परंपरा का हिस्सा बन चुकी है। अनुमान है कि भारतीय परिवारों और मंदिरों के पास 25,000 से 35,000 टन तक सोना मौजूद है। इसकी कीमत कई ट्रिलियन डॉलर आँकी जाती है। वहीं भारतीय रिजर्व बैंक के पास लगभग 880 टन स्वर्ण भंडार है।
भारत हर वर्ष लगभग 700 से 900 टन तक सोना आयात करता है। केवल 2025-26 में भारत ने लगभग 72 अरब डॉलर मूल्य का सोना आयात किया। यह विदेशी मुद्रा पर बड़ा दबाव डालता है। इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी बार-बार यह कहते रहे हैं कि अनावश्यक आयात कम करना और डॉलर बचाना राष्ट्रीय हित में है।
मोदी जी का “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान इसी सोच से जुड़ा हुआ है। उनका तर्क है कि यदि भारत अपनी आवश्यक वस्तुएँ स्वयं बनाएगा, तो आयात कम होगा, डॉलर की बचत होगी और रोजगार बढ़ेंगे। मोबाइल निर्माण, रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति भी की है।
हालाँकि अर्थशास्त्रियों का मत है कि केवल डॉलर बचाने की अपील पर्याप्त नहीं है। अमत्र्य सेन का मानना है कि विदेशी मुद्रा का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव संसाधन विकास में होना चाहिए। यदि आर्थिक नीतियाँ आम लोगों की जीवन गुणवत्ता सुधारने में सफल नहीं होतीं, तो केवल विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने से विकास अधूरा रहेगा।
इसी प्रकार अभिजीत बनर्जी ने कहा है कि भारत जैसे विकासशील देशों में सोना गरीब और मध्यम वर्ग के लिए आर्थिक सुरक्षा का माध्यम बन जाता है। इसलिए केवल लोगों को सोना खरीदने से रोकना समाधान नहीं है, बेहतर वित्तीय विकल्प उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।
सरकार ने इसी दिशा में सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, डिजिटल गोल्ड और जनधन जैसी योजनाएँ शुरू कीं, ताकि लोग पारंपरिक सोने के बजाय वित्तीय निवेश की ओर बढ़ें। साथ ही उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं के माध्यम से भारत में विनिर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
अर्थशास्त्री कौशिक बसु का कहना है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक आर्थिक शक्ति केवल विदेशी मुद्रा बचाने में नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी उत्पादन करने में होती है। यदि भारत उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाकर वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाता है तो डॉलर अपने आप देश में आएँगे।
आज भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह अपने विशाल प्रवासी समुदाय की आर्थिक शक्ति, तकनीकी अनुभव और निवेश क्षमता का सही उपयोग करे। विदेशों में बसे भारतीय केवल धन ही नहीं भेजते, बल्कि ज्ञान, तकनीक और वैश्विक संपर्क भी भारत तक पहुँचाते हैं। यदि इन संसाधनों का योजनाबद्ध उपयोग किया जाए, तो भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी का “डॉलर बचाओ” कथन केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों और संभावनाओं से जुड़ा हुआ है। प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे गए अरबों डॉलर भारत की आर्थिक रीढ़ को मजबूत करते हैं, लेकिन साथ ही अनावश्यक आयात और विशेषकर सोने पर अत्यधिक निर्भरता विदेशी मुद्रा पर दबाव भी बनाती है। इसलिए भारत के हित में संतुलित नीति यही होगी कि एक ओर विदेशी मुद्रा की बचत हो, दूसरी ओर उत्पादन, निर्यात, शिक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिले। यही मार्ग भारत को आर्थिक रूप से सशक्त, आत्मनिर्भर और विश्व नेतृत्व की दिशा में आगे ले जा सकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

शुक्रवार, 8 मई 2026

भारत की सरहदों पर अवैध कब्जा!

 विशेष लेख-






चुनौतियाँ, प्रयास और भविष्य की रणनीति

भारत केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्र है। हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैला भारत सदियों से अपनी सीमाओं की रक्षा करता आया है। किंतु स्वतंत्रता के बाद से भारत को अपनी सीमाओं पर अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। आज भी भारत की हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि पर चीन और पाकिस्तान का अवैध कब्जा बना हुआ है। यह केवल भूभाग का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता, सुरक्षा और संप्रभुता का विषय है।
भारत सरकार के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार चीन ने लगभग 38 हजार वर्ग किलोमीटर भारतीय भूमि पर कब्जा कर रखा है, जिसे अक्साई चिन कहा जाता है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान ने 1963 में लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दिया था, जिसे भारत अवैध मानता है। दूसरी ओर पाकिस्तान के कब्जे में लगभग 78 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है, जिसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर अर्थात् पीओके कहा जाता है। भारत स्पष्ट रूप से मानता है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है।
भारत-चीन सीमा विवाद का इतिहास 1962 के युद्ध से जुड़ा हुआ है। उस युद्ध के बाद चीन ने अक्साई चिन पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। वहीं पाकिस्तान ने 1947-48 के युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जो आज भी पीओके के रूप में जाना जाता है। समय बीतने के साथ इन विवादों ने केवल सीमा विवाद का स्वरूप नहीं रखा, बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को भी प्रभावित किया।
भारत सरकार इन क्षेत्रों को वापस पाने और सीमाओं की सुरक्षा के लिए निरंतर बहुआयामी प्रयास करती रही है। सबसे पहले भारत ने कूटनीतिक स्तर पर विश्व समुदाय के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखा। संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि अक्साई चिन और पीओके भारत का हिस्सा हैं। भारत ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी का भी विरोध किया, क्योंकि यह परियोजना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरती है। भारत का तर्क है कि किसी भी विवादित भारतीय क्षेत्र में बिना भारत की अनुमति के निर्माण कार्य अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विरुद्ध है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सैन्य दृष्टि से भी अपनी स्थिति अत्यंत मजबूत की है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों, सुरंगों और एयरबेस का निर्माण तेजी से किया गया है। भारतीय सेना को आधुनिक हथियारों से सुसज्जित किया गया है। राफेल लड़ाकू विमान, एयर डिफेंस सिस्टम, ब्रह्मोस मिसाइल और अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक ने भारतीय रक्षा क्षमता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसेना की बढ़ती शक्ति भी चीन के विस्तारवादी रवैये के लिए एक बड़ा संदेश मानी जा रही है।
वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना भी भारत की एक बड़ी राजनीतिक और रणनीतिक पहल मानी गई। इस निर्णय ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाकर भारत ने प्रशासनिक और सामरिक दृष्टि से अपनी पकड़ और मजबूत की।
सीमा क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे का विकास भी भारत की प्राथमिकता बन चुका है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन द्वारा सीमावर्ती इलाकों में तेजी से सड़कें और पुल बनाए जा रहे हैं। इससे सेना की तैनाती और आपूर्ति व्यवस्था अधिक मजबूत हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने तिब्बत क्षेत्र में जिस प्रकार का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया है, उसके मुकाबले भारत अब तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि तकनीक, सूचना और आर्थिक शक्ति से भी लड़े जाते हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ जॉन स्पेंसर ने हाल ही में कहा कि भारत का एकीकृत रक्षा नेटवर्क और आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम क्षेत्रीय संतुलन को बदल रहे हैं। वहीं भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि सीमा पार आतंकवाद और घुसपैठ के खिलाफ भारत अब पहले से अधिक आक्रामक और सक्षम नीति अपना रहा है।
हालाँकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि चीन के साथ सीधा युद्ध आसान नहीं होगा, क्योंकि दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं। यही कारण है कि भारत वर्तमान में प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय सामरिक दबाव, आर्थिक मजबूती और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की नीति पर अधिक बल दे रहा है। पाकिस्तान के संदर्भ में भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक और सीमित जवाबी कार्रवाई जैसी रणनीतियों के माध्यम से यह संकेत दिया है कि आतंकवाद को अब बिना जवाब के नहीं छोड़ा जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में भारत को कुछ महत्वपूर्ण कदमों पर और अधिक ध्यान देना होगा। सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास और जनसंख्या बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि वे क्षेत्र रणनीतिक रूप से और मजबूत बन सकें। रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता भी समय की मांग है। “मेक इन इंडिया” और स्वदेशी हथियार निर्माण को बढ़ावा देकर भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी देशों पर निर्भरता कम कर सकता है। इसके साथ ही क्यूयूएडी जैसे अंतरराष्ट्रीय समूहों के साथ सामरिक साझेदारी को मजबूत करना भी आवश्यक माना जा रहा है।
आज भारत जिस प्रकार आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए और अधिक सक्षम होगा। सीमा विवाद केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, आर्थिक मजबूती और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से भी सुलझाए जाते हैं। भारत ने पिछले वर्षों में इन सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है।
निस्संदेह भारत की अवैध कब्जे वाली भूमि का मुद्दा देश की संवेदनशील राष्ट्रीय चिंताओं में से एक है। हर भारतीय की भावना इससे जुड़ी हुई है। देश की जनता चाहती है कि भारत अपनी खोई हुई भूमि वापस प्राप्त करे और उसकी सीमाएँ पूरी तरह सुरक्षित रहें। वर्तमान परिस्थितियों में भारत जिस संयम, शक्ति और रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है, वह यह संकेत देता है कि देश अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 5 मई 2026

राजस्थान के जननायक महाराणा प्रताप आज भी प्रासंगिक

 9 मई जयंती पर विशेष लेख-

भारतीय इतिहास में अनेक वीर योद्धाओं ने अपने साहस और पराक्रम से अमिट छाप छोड़ी है, किंतु महाराणा प्रताप का व्यक्तित्व उनमें अद्वितीय है। वे केवल राजस्थान के शौर्य के प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय स्वाभिमान, स्वतंत्रता और आत्मगौरव के अमर प्रतीक हैं। सदियों बाद भी उनका नाम जन-जन के हृदय में उसी सम्मान और श्रद्धा से लिया जाता है। आज के बदलते सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में भी महाराणा प्रताप का जीवन और संघर्ष अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देता है।
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। वे मेवाड़ के राजा उदयसिंह के पुत्र थे। बचपन से ही उनमें अदम्य साहस, आत्मसम्मान और राष्ट्रप्रेम के गुण दिखाई देने लगे थे। जब मुगल सम्राट अकबर भारत के बड़े हिस्से पर अपना आधिपत्य स्थापित कर चुका था, तब अधिकांश राजघरानों ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। ऐसे कठिन समय में महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प लिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया कि सम्मान और स्वतंत्रता किसी भी वैभव या सत्ता से अधिक मूल्यवान है।
आज के समय में जब व्यक्ति अपने सिद्धांतों से समझौता कर लेने को व्यावहारिकता मान बैठा है, महाराणा प्रताप का जीवन हमें आत्मसम्मान की रक्षा का पाठ पढ़ाता है। उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर जंगलों में जीवन बिताना स्वीकार किया, किंतु पराधीनता स्वीकार नहीं की। इतिहास में घास की रोटियों का प्रसंग केवल कठिनाई का प्रतीक नहीं, बल्कि त्याग और दृढ़ निश्चय का उदाहरण है। वर्तमान समय में युवाओं को उनके जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य और मूल्यों से विचलित नहीं होना चाहिए।
हल्दीघाटी का युद्ध भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित लड़ाइयों में से एक है। यह युद्ध केवल सत्ता प्राप्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का युद्ध था। यद्यपि मुगल सेना संसाधनों और संख्या में अधिक शक्तिशाली थी, फिर भी महाराणा प्रताप ने अद्भुत वीरता का परिचय दिया। उनका प्रिय अश्व चेतक भी वीरता और स्वामीभक्ति का प्रतीक बन गया। हल्दीघाटी का युद्ध यह संदेश देता है कि सच्चा योद्धा वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष करना नहीं छोड़ता।
महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल राजाओं के राजा नहीं थे, बल्कि जननायक थे। भील समाज सहित अनेक जनजातीय और ग्रामीण समुदाय उनके संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। इससे स्पष्ट होता है कि वे समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने वाले शासक थे। आज जब समाज जाति, वर्ग और संकीर्णताओं में बँटता दिखाई देता है, तब महाराणा प्रताप की समावेशी सोच हमें सामाजिक एकता और जनसहयोग का महत्व समझाती है।
उनका जीवन आत्मनिर्भरता और स्वदेशी चेतना का भी उदाहरण है। अरावली के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में रहकर उन्होंने स्थानीय संसाधनों के बल पर अपनी शक्ति को बनाए रखा। आज जब देश आत्मनिर्भर भारत की बात कर रहा है, तब महाराणा प्रताप का संघर्ष हमें यह सिखाता है कि आत्मविश्वास और स्वदेशी संसाधनों के माध्यम से भी बड़े से बड़ा संघर्ष लड़ा जा सकता है।
महाराणा प्रताप केवल युद्ध कौशल में ही महान नहीं थे, बल्कि मानवीय मूल्यों के भी संरक्षक थे। कहा जाता है कि उन्होंने युद्ध में भी नैतिकता और मर्यादा का पालन किया। वे प्रजा के सुख-दुःख का ध्यान रखने वाले शासक थे। आज राजनीति और सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों का संकट दिखाई देता है। ऐसे समय में महाराणा प्रताप का चरित्र जनप्रतिनिधियों और नेतृत्वकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है।
आज की युवा पीढ़ी के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। प्रतिस्पर्धा, तनाव, नैतिक भ्रम और त्वरित सफलता की दौड़। ऐसे दौर में महाराणा प्रताप का जीवन संघर्ष, धैर्य और संकल्प की प्रेरणा देता है। वे बताते हैं कि असफलताओं और कठिनाइयों से घबराने के बजाय साहसपूर्वक उनका सामना करना चाहिए। उनका व्यक्तित्व युवाओं में राष्ट्रप्रेम और आत्मगौरव की भावना भी जागृत करता है।
राजस्थान की लोक संस्कृति, लोकगीतों और साहित्य में महाराणा प्रताप आज भी जीवित हैं। गाँव-गाँव में उनकी वीरता की कथाएँ सुनाई जाती हैं। यही कारण है कि वे केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि जनभावनाओं का अभिन्न अंग हैं। भारत की सांस्कृतिक चेतना में उनका स्थान सदैव ऊँचा रहेगा।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जब सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय अस्मिता की चर्चा हो रही है, तब महाराणा प्रताप का जीवन और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष आवश्यक है। उनका जीवन हमें यह भी सिखाता है कि राष्ट्र की शक्ति केवल हथियारों में नहीं, बल्कि उसके लोगों के साहस, चरित्र और एकता में निहित होती है।
अंततः कहा जा सकता है कि राजस्थान के जननायक महाराणा प्रताप आज भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं। वे केवल अतीत के महान योद्धा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनका जीवन त्याग, संघर्ष, स्वाभिमान, राष्ट्रप्रेम और मानवीय मूल्यों का उज्ज्वल उदाहरण है। जब-जब भारतीय समाज अपने आदर्शों की ओर देखेगा, महाराणा प्रताप का तेजस्वी व्यक्तित्व उसे नई ऊर्जा और दिशा देता रहेगा।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


सोमवार, 4 मई 2026

आखिर क्यों ढहा ममता दीदी का किला

 लेख-

भारतीय राजनीति में कुछ नेता केवल सत्ता तक सीमित नहीं रहते, वे एक दौर, एक संघर्ष और एक जनभावना का प्रतीक बन जाते हैं। ममता बनर्जी भी ऐसा ही व्यक्तित्व रही हैं। पश्चिम बंगाल की राजनीति में “दीदी” का नाम कभी संघर्ष, सादगी और जन आंदोलन की पहचान माना जाता था। वर्ष 2011 में जब उन्होंने 34 वर्षों से जमे वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका, तब बंगाल की जनता ने उन्हें परिवर्तन की उम्मीद के रूप में सिर आँखों पर बैठाया। ऐसा लगने लगा था कि बंगाल की राजनीति में एक नया युग आरम्भ हो चुका है। लेकिन राजनीति का इतिहास गवाह है कि जनता जितनी जल्दी किसी नेता को शिखर तक पहुँचाती है, उतनी ही तेजी से उससे मोहभंग भी कर लेती है। हालिया चुनाव परिणामों ने संकेत दे दिया कि ममता बनर्जी का वर्षों पुराना राजनीतिक किला अब कमजोर पड़ चुका है। यह हार केवल सीटों की हार नहीं है, बल्कि जनविश्वास में आई दरार की कहानी है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि बंगाल की जनता, जिसने कभी ममता बनर्जी को परिवर्तन का चेहरा माना था, वही जनता अब उनसे दूरी बनाने लगी?
सबसे पहला कारण सत्ता विरोधी लहर अर्थात एंटी-इन्कम्बेंसी रहा। लगातार लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद किसी भी सरकार के प्रति जनता में स्वाभाविक थकान पैदा होने लगती है। यही स्थिति कभी वाम मोर्चे के साथ हुई थी और अब वही परिस्थिति तृणमूल कांग्रेस के सामने दिखाई दी। जनता को लगने लगा कि सरकार में अब वही चेहरे, वही शैली और वही सत्ता संस्कृति हावी हो चुकी है, जिसके खिलाफ कभी ममता बनर्जी ने संघर्ष किया था। परिवर्तन का सपना धीरे-धीरे व्यवस्था की निरंतरता में बदलता दिखाई देने लगा।
दूसरा बड़ा कारण भ्रष्टाचार के आरोप बने। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी और अन्य आर्थिक मामलों में जिस प्रकार तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के नाम सामने आए, उसने पार्टी की साख को गहरा आघात पहुँचाया। जब जनता ने टीवी चैनलों और अखबारों में नेताओं की गिरफ्तारी और करोड़ों रुपये बरामद होने की खबरें देखीं, तब यह धारणा मजबूत हुई कि परिवर्तन के नाम पर आई सरकार भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं रही। विपक्ष ने इन मुद्दों को लगातार जनता के बीच उठाया और सरकार की नैतिक छवि को चुनौती दी।
स्थानीय स्तर पर बढ़ती नाराजगी भी तृणमूल कांग्रेस के लिए भारी पड़ी। पंचायतों और ग्रामीण इलाकों में “कट-मनी”, स्थानीय नेताओं की दबंगई और प्रशासनिक पक्षपात की शिकायतें लगातार सामने आती रहीं। कई लोगों को महसूस होने लगा कि सरकार तक उनकी आवाज पहुँच ही नहीं रही। राजनीति केवल बड़े भाषणों और रैलियों से नहीं चलती, बल्कि गाँव और मोहल्ले में जनता के अनुभव से तय होती है। जब आम कार्यकर्ता और आम नागरिक खुद को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं, तब सत्ता की नींव धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।
एक महत्वपूर्ण कारण ममता बनर्जी की बदलती जनछवि भी रही। उनकी राजनीति कभी सादगी और संघर्ष की पहचान थी। सड़क पर धरना देने वाली, चप्पल पहनकर चलने वाली और जनता के बीच सहज दिखाई देने वाली “दीदी” की छवि ने ही उन्हें बंगाल की सत्ता तक पहुँचाया था। लेकिन समय के साथ अवाम के बीच यह भावना बनने लगी कि अब वह पहले वाली संघर्षशील ममता नहीं रहीं। सत्ता के लंबे दौर, पार्टी नेताओं पर बढ़ते आरोप और आम जनता से बढ़ती दूरी ने उनकी छवि को प्रभावित किया। लोगों को लगने लगा कि जो नेता कभी व्यवस्था के खिलाफ लड़ती थी, वह अब स्वयं उसी सत्ता व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है। राजनीति में छवि का बदलना अक्सर जनसमर्थन के बदलने की शुरुआत बन जाता है।
इसी बीच भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की। जो भाजपा कभी बंगाल में हाशिए की पार्टी मानी जाती थी, वही धीरे-धीरे मुख्य विपक्ष बन गई। भाजपा ने बंगाल में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, राजनीतिक हिंसा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को आक्रामक ढंग से उठाया। साथ ही केंद्रीय नेतृत्व ने भी बंगाल को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया। परिणामस्वरूप चुनाव केवल राज्य का चुनाव नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा रणक्षेत्र बन गया। भाजपा ने बंगाल के युवा मतदाताओं और शहरी वर्ग के बीच अपनी पकड़ मजबूत की।
राजनीतिक हिंसा की छवि ने भी तृणमूल कांग्रेस को नुकसान पहुँचाया। चुनावों के दौरान हिंसा, विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमले और तनावपूर्ण माहौल की खबरें लगातार आती रहीं। विपक्ष ने इसे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। बंगाल, जो कभी अपनी सांस्कृतिक चेतना और बौद्धिक वातावरण के लिए जाना जाता था, वहाँ हिंसा की खबरों ने आम मतदाता को चिंतित किया।
इसके अतिरिक्त संदेशखाली जैसी घटनाओं ने भी सरकार की साख को प्रभावित किया। महिलाओं की सुरक्षा और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर उठे सवालों ने जनता के एक वर्ग को गहराई से प्रभावित किया। विपक्ष ने इन घटनाओं को जनता के असंतोष से जोड़ते हुए सरकार को घेरने का प्रयास किया। कई मतदाताओं को लगा कि सरकार इन मुद्दों पर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा सकी।
बेरोजगारी और विकास का प्रश्न भी चुनाव में महत्वपूर्ण रहा। बंगाल का युवा वर्ग अब केवल राजनीतिक नारों से संतुष्ट नहीं है। वह रोजगार, उद्योग और बेहतर भविष्य चाहता है। लंबे समय तक उद्योगों के अभाव और रोजगार के सीमित अवसरों ने युवाओं में असंतोष बढ़ाया। राज्य से बाहर पलायन करने वाले युवाओं की संख्या भी चिंता का विषय बनी। जनता अब भावनात्मक राजनीति के साथ-साथ आर्थिक परिणाम भी देखना चाहती है।
हालिया चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि बंगाल की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। भाजपा की बड़ी सफलता और तृणमूल कांग्रेस की करारी हार केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक धुरी बदलने का संकेत है। यह स्थिति वैसी ही प्रतीत होती है जैसी वर्ष 2011 में वामपंथी शासन के पतन के समय दिखाई दी थी।
फिर भी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ममता बनर्जी का राजनीतिक अध्याय समाप्त हो गया है। भारतीय राजनीति में उन्होंने कई बार विपरीत परिस्थितियों से वापसी की है। उनका संघर्षशील व्यक्तित्व आज भी उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। संभव है कि विपक्ष में बैठकर वे फिर से जनता के बीच जाएँ और अपनी राजनीति को नए रूप में स्थापित करने का प्रयास करें।
लेकिन फिलहाल इतना तय दिखाई देता है कि बंगाल की राजनीति में परिवर्तन की एक नई कहानी लिखी जा चुकी है। जिस तरह कभी वामपंथ का अभेद्य किला ढहा था, उसी प्रकार अब तृणमूल कांग्रेस की सत्ता भी जनता के बदलते विश्वास के सामने कमजोर पड़ गई है। राजनीति का अंतिम सत्य यही है कि जनता जब किसी नेता को अपना लेती है तो उसे इतिहास बना देती है, और जब उससे मोहभंग होता है तो सबसे मजबूत किले भी ढह जाते हैं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)