बुधवार, 8 अप्रैल 2026

युद्धविराम के बाद क्या हो भारत की रणनीति

 लेख-

अमेरिका-ईरान तनाव-

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में  अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता या घटता तनाव केवल दो देशों तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ता है। विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील और ऊर्जा-निर्भर देश के लिए यह स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हालिया युद्ध विराम ने भले ही तत्काल राहत दी हो, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से भारत को अपनी रणनीति स्पष्ट और मजबूत रखनी होगी।

सबसे पहले, भारत की विदेश नीति का मूल आधार “संतुलन” होना चाहिए। भारत के अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, वहीं ईरान के साथ ऊर्जा और क्षेत्रीय सहयोग जुड़ा हुआ है। ऐसे में किसी एक पक्ष का खुला समर्थन भारत के हितों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए भारत को “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलते हुए दोनों देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए। यह नीति भारत को वैश्विक मंच पर एक स्वतंत्र और विश्वसनीय शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है ऊर्जा सुरक्षा। भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 80 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तनाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए भारत को दीर्घकाल में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जैव ईंधन की ओर तेजी से बढ़ना होगा। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना भी आवश्यक है, ताकि तेल पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सके।

तीसरा, समुद्री सुरक्षा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरने वाले व्यापारिक और ऊर्जा मार्ग भारत की जीवनरेखा हैं। भारतीय नौसेना की सक्रियता, अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग और तेल टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना समय की मांग है। यह न केवल भारत की ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करेगा, बल्कि उसे एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति के रूप में भी स्थापित करेगा।

चौथा, आर्थिक स्थिरता बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है। जैसे ही मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतों में उछाल आता है, जिसका सीधा असर महंगाई, मुद्रा विनिमय दर और शेयर बाजार पर पड़ता है। भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखना होगा और ऐसी नीतियां अपनानी होंगी जो बाहरी झटकों से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रख सकें। इसके अलावा, वैकल्पिक व्यापार मार्गों और आपूर्ति स्रोतों की खोज भी आवश्यक है।

पाँचवां और अंतिम पहलू है भारत की वैश्विक भूमिका। आज भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति है। जी 20 और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत शांति, संवाद और सहयोग की वकालत कर सकता है। यदि परिस्थितियां अनुकूल हों, तो भारत मध्यस्थ की भूमिका भी निभा सकता है, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव भारत के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। यदि भारत संतुलित कूटनीति, ऊर्जा आत्मनिर्भरता, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और सक्रिय वैश्विक भूमिका को अपनाता है, तो वह न केवल इस संकट से सुरक्षित निकल सकता है, बल्कि अपने लिए नए अवसर भी पैदा कर सकता है। आज की दुनिया में वही देश सफल है, जो संघर्षों से दूर रहते हुए भी परिस्थितियों का लाभ उठाना जानता है और भारत के पास यह क्षमता स्पष्ट रूप से मौजूद है।


लेखक

डॉ. चेतन आनंद

(कवि-पत्रकार)

गुरुवार, 26 मार्च 2026

क्या विश्व युद्ध वास्तव में संभव है!

 लेख-

बदलते वैश्विक परिदृश्य में चुनौतियाँ, संतुलन और रणनीतिक महत्व
आज की दुनिया तेजी से बदल रही है। महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष, तकनीकी हथियारों का विस्तार और आर्थिक अस्थिरता जैसे कारकों के कारण समय-समय पर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि कहीं दुनिया किसी बड़े युद्ध की ओर तो नहीं बढ़ रही। “विश्व युद्ध-3” की चर्चा भले ही अभी संभावनाओं और विश्लेषण तक सीमित हो, लेकिन यह विषय अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बना हुआ है। इतिहास हमें बताता है कि जब वैश्विक शक्ति संतुलन बिगड़ता है, सैन्य गठबंधन मजबूत होते हैं और आर्थिक संकट गहराता है, तब बड़े संघर्षों की जमीन तैयार होती है। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध इसी तरह की परिस्थितियों में हुए थे। आज की परिस्थितियाँ भले ही अलग हों, लेकिन कुछ समान संकेत विशेषज्ञों को चिंतित करते हैं।
क्या वास्तव में विश्व युद्ध संभव है
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों का मानना है कि वर्तमान समय में वैश्विक तनाव जरूर बढ़ा है, लेकिन सीधा विश्व युद्ध होना अभी निश्चित नहीं कहा जा सकता। इसके कई कारण हैं-
1. परमाणु हथियारों का भय-आज कई देशों के पास परमाणु शक्ति है। यदि बड़े युद्ध में इनका प्रयोग हुआ तो उसका विनाशकारी प्रभाव पूरी मानवता को झेलना पड़ेगा। यही कारण है कि महाशक्तियाँ सीधे टकराव से बचने की कोशिश करती हैं।
2. आर्थिक परस्पर निर्भरता-वैश्वीकरण के कारण देशों की अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। व्यापार और निवेश के माध्यम से सहयोग की आवश्यकता बढ़ी है। किसी भी बड़े युद्ध से वैश्विक मंदी आ सकती है, जिससे सभी देशों को नुकसान होगा।
3. कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ-संवाद और समझौते के माध्यम से संघर्षों को रोकने की कोशिश लगातार चलती रहती है। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालाँकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि यदि क्षेत्रीय युद्ध फैलते हैं या महाशक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने आती हैं, तो स्थिति गंभीर हो सकती है।
आधुनिक युद्ध का बदलता स्वरूप
भविष्य का युद्ध केवल सैनिकों की भिड़ंत नहीं होगा।
साइबर हमले
ड्रोन और रोबोटिक हथियार
अंतरिक्ष तकनीक
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य प्रणाली
ये सभी युद्ध को अधिक जटिल और तेज बना सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा अब पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है।
भारत की सैन्य शक्ति : वैश्विक संतुलन में भूमिका
ऐसे बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की सैन्य क्षमता और रणनीतिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियों में गिना जाता है और उसकी भौगोलिक स्थिति भी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
1. विशाल और प्रशिक्षित सेना-भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है। थल सेना, वायु सेना और नौसेना तीनों ही आधुनिक तकनीक से लैस होने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही हैं।
2. परमाणु शक्ति और प्रतिरोध क्षमता-भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है, जो “विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध” की नीति पर काम करता है। इसका उद्देश्य युद्ध को रोकना और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
3. स्वदेशी रक्षा उत्पादन-पिछले वर्षों में भारत ने आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण पर जोर दिया है। मिसाइल प्रणाली, लड़ाकू विमान, युद्धपोत और ड्रोन तकनीक जैसे क्षेत्रों में प्रगति ने देश की सामरिक क्षमता को मजबूत किया है।
4. सामरिक साझेदारी और संतुलित कूटनीति-भारत विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति अपनाता है। इससे वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक जिम्मेदार और स्थिर शक्ति के रूप में उभर रहा है।
यदि विश्व युद्ध जैसी स्थिति बनी तो भारत पर प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार, संभावित वैश्विक संघर्ष का असर भारत पर भी पड़ेगा-ऊर्जा और व्यापार आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, रक्षा व्यय बढ़ सकता है, आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। लेकिन इसके साथ भारत के लिए अवसर भी हो सकते हैं, जैसे वैश्विक उत्पादन केंद्र के रूप में उभरना या कूटनीतिक नेतृत्व की भूमिका निभाना।
आम नागरिक और राष्ट्रीय तैयारी
किसी भी वैश्विक संकट से निपटने के लिए केवल सैन्य शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती। मजबूत अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता और सामाजिक एकजुटता भी आवश्यक है। साइबर सुरक्षा और डिजिटल जागरूकता, आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य व्यवस्था, ऊर्जा और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता, ये सभी कारक राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत बनाते हैं।
विश्व युद्ध की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह भी सच है कि आधुनिक दुनिया में बड़े युद्ध के परिणाम इतने भयावह हो सकते हैं कि देश उससे बचने की हर संभव कोशिश करते हैं। भारत के लिए यह समय सतर्कता और रणनीतिक तैयारी का है। मजबूत सैन्य शक्ति, संतुलित विदेश नीति और आर्थिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से वह न केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। अंततः यह पूरी मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी है कि इतिहास की त्रासदियों से सीख लेकर सहयोग और संवाद का मार्ग चुना जाए। यही भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बना सकता है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 17 मार्च 2026

फिल्मों के अश्लील गानों पर विवाद

 समसामयिक लेख-

फिल्मों के अश्लील गानों पर विवाद
बदलती संस्कृति, बाज़ार और अभिव्यक्ति की बहस

भारतीय फिल्म उद्योग लंबे समय से समाज के बदलते स्वरूप और नैतिक मान्यताओं का आईना रहा है। फिल्मों के गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे समाज की सोच, संवेदनाओं और सांस्कृतिक दिशा को भी प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर कुछ गीतों और फिल्मों को लेकर “अश्लीलता”, “अति बोल्ड प्रस्तुति” या “द्विअर्थी अभिव्यक्ति” के आरोप लगते रहे हैं। इन विवादों ने सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन की बहस को लगातार जीवित रखा है। अगर हम 1990 के दशक की ओर देखें तो यह विवाद मुख्यधारा में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। वर्ष 1993 में आई फिल्म खलनायक का गीत “चोली के पीछे क्या है” पूरे देश में चर्चा और विरोध का कारण बना। कई महिला संगठनों ने इसे स्त्री की गरिमा के विरुद्ध बताते हुए प्रदर्शन किए। अदालत तक मामला पहुँचा, लेकिन गीत पर प्रतिबंध नहीं लगा। इसके बावजूद यह गीत उस समय का सुपरहिट बन गया। इससे यह संकेत मिला कि दर्शकों की पसंद और सामाजिक नैतिकता के बीच एक दिलचस्प द्वंद्व मौजूद है।
इसके बाद के वर्षों में फिल्मों की विषय-वस्तु और प्रस्तुति अधिक ग्लैमरस और खुली होती चली गई। वर्ष 2011 में रिलीज़ हुई फिल्म द डर्टी पिक्चर और उसका चर्चित गीत “ऊ ला ला” इसी प्रवृत्ति का उदाहरण बने। फिल्म को सेंसर बोर्ड ने “ए” सर्टिफिकेट दिया, जबकि कुछ सामाजिक समूहों ने इसे युवाओं पर गलत प्रभाव डालने वाला बताया। इसके बावजूद फिल्म और गीत दोनों ने अपार लोकप्रियता हासिल की। इसी दौर में मनोरंजन उद्योग ने यह महसूस किया कि बोल्ड कंटेंट दर्शकों के एक बड़े वर्ग को आकर्षित कर रहा है।
युवा-केन्द्रित और कॉमेडी फिल्मों में भी इस प्रवृत्ति का असर दिखा। वर्ष 2013 में आई फिल्म ग्रैंड मस्ती पर अत्यधिक द्विअर्थी संवाद और अश्लीलता के आरोप लगे। मीडिया और फिल्म समीक्षकों ने सवाल उठाया कि क्या कॉमेडी के नाम पर मनोरंजन की सीमाएँ पार की जा रही हैं। इसके बाद 2014 में रिलीज़ हुई फिल्म रागिनी एमएमएस 2 का गीत “बेबी डॉल” भी अपनी बोल्ड प्रस्तुति के कारण विवादों में रहा। आलोचकों ने इसे महिलाओं के वस्तुकरण से जोड़कर देखा, जबकि समर्थकों का कहना था कि यह आधुनिक मनोरंजन की मांग है।
इसी क्रम में 2015 में आई फिल्म हंटर के कंटेंट और गीतों को लेकर भी बहस हुई। फिल्म के विषय और प्रस्तुति को लेकर कई लोगों ने कहा कि शहरी युवा संस्कृति के नाम पर यौन संकेतों को सामान्य बनाया जा रहा है। बाद में 2018 में रिलीज़ हुई फिल्म वीरे दी वेडिंग के कुछ गीतों और संवादों पर भी भाषा और अभिव्यक्ति की मर्यादा को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। इससे स्पष्ट हुआ कि डिजिटल युग में किसी भी फिल्म या गीत का विवाद कुछ ही समय में राष्ट्रीय चर्चा बन सकता है।
हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट हुई। वर्ष 2022 में रिलीज़ हुई फिल्म पठान के गीत “बेशरम रंग” को लेकर व्यापक विरोध देखने को मिला। गाने के कॉस्ट्यूम, डांस स्टेप्स और फिल्मांकन को लेकर कई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने आपत्ति जताई। कुछ राज्यों में फिल्म के बहिष्कार की मांग तक उठी। सेंसर बोर्ड द्वारा सुझाए गए बदलावों के बाद फिल्म रिलीज़ हुई और बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता भी हासिल की। इससे यह साबित हुआ कि विवाद कभी-कभी फिल्म की लोकप्रियता को और बढ़ा देते हैं।
इसके बाद 2023 में आई फिल्म डंकी के एक गीत की प्रस्तुति को लेकर भी सोशल मीडिया पर सीमित स्तर पर आलोचना हुई। हालांकि यह विवाद पहले की तुलना में कम तीव्र था, लेकिन इससे यह संकेत मिला कि दर्शकों की संवेदनशीलता और प्रतिक्रियाएँ अब पहले से अधिक त्वरित और मुखर हो गई हैं।
फिल्मों के अलावा पॉप संगीत और म्यूज़िक वीडियो में भी बोल्डनेस को लेकर बहस जारी रही है। वर्ष 2020 में रिलीज़ हुई फिल्म स्ट्रीट डांसर 3डी के गीत “गर्मी” ने युवाओं के बीच डांस ट्रेंड बना दिया, लेकिन इसके डांस मूव्स और कैमरा एंगल को लेकर आलोचना भी हुई। इसके बाद 2021 में आए स्वतंत्र म्यूज़िक वीडियो “पानी पानी” तथा उसी वर्ष फिल्म सत्यमेव जयते 2 के गीत “कुसु कुसु” ने भी ग्लैमरस प्रस्तुति के कारण चर्चा और विवाद दोनों अर्जित किए। इन गीतों ने यह दिखाया कि आज के मनोरंजन उद्योग में क्लब-संस्कृति, तेज़ बीट्स और आकर्षक विजुअल्स का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।  इधर नोरा फतेही के डांस नंबर जैसे चुनरी चुनरी (सरके चुनर मेरी सरके) पर ग्लैमरस फिल्मांकन, गाने के आपत्तिजनक बोल और उत्तेजक डांस स्टेप्स को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना हो रही है। वहीं रैपर बादशाह के पार्टी-स्टाइल गीत टटीरी के कुछ बोलों और विजुअल प्रस्तुति को भी द्विअर्थी और क्लब-संस्कृति को बढ़ावा देने वाला बताया गया। इन सभी घटनाओं को समग्र रूप से देखें तो स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में मनोरंजन को लेकर दृष्टिकोण लगातार बदल रहा है। एक ओर युवा पीढ़ी वैश्विक ट्रेंड और आधुनिक अभिव्यक्ति को सहजता से स्वीकार कर रही है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक सोच रखने वाले वर्ग सांस्कृतिक मर्यादाओं की रक्षा की बात करते हैं। सेंसर बोर्ड और न्यायपालिका भी इस संतुलन को बनाए रखने के लिए समय-समय पर हस्तक्षेप करते रहे हैं, चाहे वह आयु-आधारित प्रमाणपत्र देना हो या कुछ दृश्यों में बदलाव सुझाना।
वास्तव में “अश्लीलता” की परिभाषा स्थिर नहीं है; यह समय, समाज और संदर्भ के साथ बदलती रहती है। जो प्रस्तुति एक पीढ़ी को अस्वीकार्य लगती है, वही दूसरी पीढ़ी के लिए सामान्य मनोरंजन हो सकती है। डिजिटल मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म ने इस बहस को और व्यापक बना दिया है, क्योंकि अब दर्शक अपनी प्रतिक्रिया तुरंत व्यक्त कर सकते हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारतीय फिल्मों और गीतों में बोल्डनेस को लेकर होने वाले विवाद केवल मनोरंजन की सीमा का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि वे समाज में चल रहे सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत भी हैं। भविष्य में भी यह बहस जारी रहने की संभावना है, क्योंकि मनोरंजन उद्योग निरंतर नए प्रयोग करेगा और समाज अपनी संवेदनशीलताओं के अनुसार प्रतिक्रिया देता रहेगा। इसलिए आवश्यक है कि रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाकर ही स्वस्थ और समृद्ध सांस्कृतिक वातावरण तैयार किया जा सके।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार

नाराजगी के बीच डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति

 समसामयिक लेख-

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का कार्यकाल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसे दौर के रूप में देखा जाता है जिसने पारंपरिक वैश्विक संबंधों को नई दिशा दी। उनकी नीतियाँ, निर्णय लेने की शैली और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण ने दुनिया के कई देशों को प्रभावित किया। कुछ देशों ने उनके कदमों का समर्थन किया, तो अनेक देशों में असंतोष और चिंता भी दिखाई दी। इस कारण वैश्विक स्तर पर यह चर्चा तेज हुई कि ट्रम्प के दौर में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा और टकराव की राजनीति को बढ़ावा मिला।
“अमेरिका फर्स्ट” की नीति और उसका प्रभाव
ट्रम्प प्रशासन की सबसे प्रमुख नीति अमेरिका फर्स्ट वाली रही, जिसका उद्देश्य अमेरिकी उद्योग, रोजगार और सुरक्षा को प्राथमिकता देना था। यह नीति घरेलू स्तर पर लोकप्रिय रही, लेकिन कई देशों को लगा कि इससे वैश्विक सहयोग की भावना कमजोर होगी। यूरोप और एशिया के कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और बहुपक्षीय समझौतों से दूरी बनाने की दिशा में कदम माना। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अमेरिका की पारंपरिक वैश्विक नेतृत्व भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा।
चीन के साथ व्यापार युद्ध
ट्रम्प के कार्यकाल में सबसे बड़ा आर्थिक विवाद चीन के साथ व्यापार युद्ध को लेकर हुआ। अमेरिका ने चीन से आयातित वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाए और तकनीकी कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाए। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क बढ़ा दिए। इस टकराव का असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्ख्विक आपूर्ति श्रृंखला और बाजारों में अस्थिरता फैल गई। कई विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर भी इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संघर्ष ने वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस को जन्म दिया।
यूरोप के साथ मतभेद
यूरोप के प्रमुख देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ भी ट्रम्प प्रशासन के संबंधों में तनाव देखा गया। विशेष रूप से रक्षा खर्च और सैन्य सहयोग को लेकर दिए गए बयानों ने असहजता पैदा की। ट्रम्प ने कई बार कहा कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए और अमेरिका पर निर्भरता कम करनी चाहिए। इससे पारंपरिक सैन्य गठबंधन नाटो के भविष्य को लेकर भी चर्चा तेज हुई। इसके अलावा पर्यावरण नीति और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भी मतभेद सामने आए। यूरोपीय देशों ने वैश्विक पर्यावरणीय प्रयासों में अमेरिका की भूमिका को कमजोर पड़ता हुआ महसूस किया।
कनाडा और मैक्सिको के साथ आर्थिक विवाद
उत्तर अमेरिका के पड़ोसी देशों कनाडा और मैक्सिको के साथ भी ट्रम्प प्रशासन के संबंध पूरी तरह सहज नहीं रहे। स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए शुल्क से कनाडा में नाराज़गी देखी गई। मैक्सिको के साथ सीमा दीवार और प्रवासन नीति को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। हालाँकि बाद में नए व्यापार समझौतों के जरिए संबंधों को संतुलित करने की कोशिश की गई।
ईरान और मध्य-पूर्व की राजनीति
ट्रम्प प्रशासन का एक महत्वपूर्ण निर्णय ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका का बाहर निकलना था। इसके बाद आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य तनाव बढ़ने से दोनों देशों के संबंध बेहद खराब हो गए। मध्य-पूर्व की राजनीति में लिए गए कुछ फैसलों ने फ़िलिस्तीन सहित कई देशों में असंतोष पैदा किया। हालांकि दूसरी ओर, कुछ अरब देशों के साथ नए कूटनीतिक समझौते भी हुए, जिन्हें क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में सकारात्मक कदम माना गया।
एशियाई सहयोगियों के साथ संतुलन
जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की जैसे सहयोगी देशों के साथ भी समय-समय पर व्यापार और रक्षा खर्च के मुद्दों पर मतभेद सामने आए। ट्रम्प का मानना था कि अमेरिका लंबे समय से अपने सहयोगियों की सुरक्षा पर अत्यधिक खर्च कर रहा है। रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस  दृष्टिकोण ने सहयोगी देशों को अपनी रक्षा नीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया, लेकिन साथ ही असुरक्षा की भावना भी पैदा की।
कूटनीतिक शैली और वैश्विक प्रतिक्रिया
ट्रम्प की व्यक्तिगत राजनीतिक शैली भी वैश्विक चर्चा का विषय रही। वे अक्सर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर सीधे और तीखे बयान देते थे। इससे पारंपरिक कूटनीतिक प्रक्रियाओं की जगह सार्वजनिक संवाद और विवाद बढ़ते दिखाई दिए। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अनिश्चितता का माहौल बना, क्योंकि कई बार अचानक दिए गए बयानों से नीतिगत दिशा स्पष्ट नहीं रहती थी।
समर्थन और सकारात्मक पहलू
हालाँकि यह भी सच है कि ट्रम्प की नीतियों का पूरी दुनिया ने विरोध नहीं किया। कुछ देशों ने आतंकवाद के खिलाफ कठोर रुख और चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देने की रणनीति का समर्थन किया। अमेरिका के भीतर भी उद्योगों को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन के प्रयासों को सराहा गया। कई लोगों ने इसे वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभावों के खिलाफ एक आवश्यक कदम माना।
भारत के दृष्टिकोण से प्रभाव
भारत के लिए ट्रम्प का दौर मिश्रित अनुभव वाला रहा। रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई, लेकिन व्यापार और वीज़ा नीति को लेकर चुनौतियाँ भी सामने आईं। विदेश नीति के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने संतुलित कूटनीति अपनाकर अमेरिका के साथ सहयोग बनाए रखने के साथ-साथ अपने राष्ट्रीय हितों को भी प्राथमिकता दी।
डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति ने वैश्विक राजनीति में एक नए युग की शुरुआत की, जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक पुनर्संतुलन प्रमुख विषय बन गए। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि पूरी दुनिया उनसे नाराज़ थी, लेकिन यह निश्चित है कि उनकी नीतियों ने पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों को चुनौती दी और नए समीकरणों को जन्म दिया। आज भी जब अमेरिकी राजनीति में उनकी संभावित वापसी की चर्चा होती है, तब दुनिया के कई देश उनके रुख और नीतिगत प्राथमिकताओं पर ध्यानपूर्वक नजर रखते हैं। आने वाले समय में यह तय करेगा कि वैश्विक व्यवस्था सहयोग और संवाद की दिशा में आगे बढ़ेगी या प्रतिस्पर्धा और शक्ति संतुलन की राजनीति और गहराएगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार


रविवार, 15 मार्च 2026

मृत्यु के पार की कथा : अनुभव, विज्ञान और साहित्य की साझा पड़ताल

 विशेष लेख-

मृत्यु मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है। जन्म से लेकर अंतिम सांस तक मनुष्य जीवन को समझने का प्रयास करता है, पर मृत्यु के बाद क्या होता है, यह प्रश्न सदियों से अनुत्तरित ही बना हुआ है। कभी-कभी ऐसे अद्भुत अनुभव सामने आते हैं जब कोई व्यक्ति मृत्यु-समान अवस्था में पहुँचकर फिर जीवन में लौट आता है। आधुनिक विज्ञान इन्हें निकट-मृत्यु अनुभव कहता है, जबकि आध्यात्मिक परंपराएँ इन्हें आत्मा की यात्रा का संकेत मानती हैं। यही कारण है कि यह विषय केवल चिकित्सा विज्ञान तक सीमित नहीं, बल्कि दर्शन, मनोविज्ञान और साहित्य सभी में गहरी रुचि का केंद्र रहा है।
अनुभवों की दुनिया : भय से शांति तक
निकट-मृत्यु अनुभवों का वर्णन करने वाले लोग प्रायः कुछ समान बातें बताते हैं। उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे अपने शरीर से अलग हो गए हों और अपने ही जीवन को बाहर से देख रहे हों। कई लोग एक उज्ज्वल प्रकाश, सुरंग या अद्भुत शांति का अनुभव करते हैं। कुछ के अनुसार उस क्षण उन्हें अपने जीवन की घटनाएँ चलचित्र की तरह दिखाई देती हैं, मानो जीवन स्वयं उनका मूल्यांकन कर रहा हो। भारत और विदेशों में अनेक ऐसे उदाहरण दर्ज हैं, जहाँ गंभीर दुर्घटना, हृदयाघात या ऑपरेशन के दौरान कुछ समय के लिए जीवन-चिह्न समाप्त होने के बाद व्यक्ति पुनः जीवित हो गया। कई लोगों ने लौटकर कहा कि उस अनुभव ने उनका जीवन बदल दिया। वे अधिक संवेदनशील, अधिक आध्यात्मिक और जीवन के प्रति अधिक कृतज्ञ हो गए।
विज्ञान की दृष्टि : मस्तिष्क और चेतना का रहस्य
चिकित्सा विशेषज्ञ इन अनुभवों को जैविक और न्यूरोलॉजिकल प्रक्रियाओं से जोड़कर देखते हैं। उनके अनुसार जब मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती या अत्यधिक तनाव की स्थिति होती है, तब चेतना की अवस्था में असामान्य परिवर्तन हो सकते हैं। मस्तिष्क कुछ ऐसे रसायन छोड़ता है जो दर्द को कम कर देते हैं और व्यक्ति को शांति या आनंद का अनुभव होता है। कुछ मनोवैज्ञानिक इसे मन की रक्षात्मक प्रक्रिया मानते हैं। संकट की चरम अवस्था में मन स्वयं को भय से बचाने के लिए सांत्वनादायक अनुभूति पैदा करता है। हालांकि कई शोधकर्ता यह भी स्वीकार करते हैं कि चेतना का रहस्य अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। इसलिए निकट-मृत्यु अनुभव विज्ञान के लिए भी एक खुली चुनौती बने हुए हैं।
साहित्य में मृत्यु-चेतना का चित्रण
रूसी लेखक लियो टॉल्स्टॉय के प्रसिद्ध लघु-उपन्यास “द डेथ ऑफ इवान इलिच” में मृत्यु के निकट खड़े व्यक्ति की मानसिक पीड़ा और आत्मबोध का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। यह कृति बताती है कि मृत्यु का सामना करते समय मनुष्य अपने जीवन के अर्थ को किस तरह नए दृष्टिकोण से देखता है। अमेरिकी लेखिका एलिस सीबोल्ड के उपन्यास “द लवली बोन्स” में एक मृत लड़की की आत्मा के दृष्टिकोण से कहानी कही गई है। यह उपन्यास मृत्यु के बाद भी भावनात्मक संबंधों के बने रहने की कल्पना को साहित्यिक रूप देता है। समकालीन लेखक जॉर्ज सॉन्डर्स की कृति “लिंकन इन द बार्डो” जीवन और मृत्यु के बीच की एक प्रतीकात्मक चेतन अवस्था का प्रयोगधर्मी चित्रण करती है। वहीं केट एटकिंसन के उपन्यास “लाइफ आफ्टर लाइफ” में नायिका बार-बार मृत्यु का अनुभव कर जीवन में लौटती है, जिससे नियति और संभावना के प्रश्न उठते हैं। अंग्रेज़ी साहित्य की महत्वपूर्ण लेखिका वर्जीनिया वुल्फ ने अपने उपन्यास “मिसेज़ डैलोवे” में जीवन-मृत्यु के मनोवैज्ञानिक तनाव और अस्तित्वगत संकट को सूक्ष्म संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है।
भारतीय दृष्टि : आत्मा और अनश्वरता
भारतीय दर्शन में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन माना गया है। प्राचीन ग्रंथ कठोपनिषद में नचिकेता और यमराज का संवाद जीवन-मृत्यु के रहस्य को समझने का गहन प्रयास है। हिंदी साहित्य में भगवती चरण वर्मा का उपन्यास “चित्रलेखा” भी जीवन, पाप-पुण्य और अस्तित्व के प्रश्नों को दार्शनिक दृष्टि से उठाता है। निकट-मृत्यु अनुभव से लौटे लोगों के जीवन में अक्सर गहरा परिवर्तन देखा जाता है। वे भौतिक उपलब्धियों की अपेक्षा रिश्तों, सेवा और आत्मिक शांति को अधिक महत्व देने लगते हैं। यह अनुभव उन्हें जीवन की क्षणभंगुरता और उसके मूल्य का गहरा बोध कराता है। विज्ञान, साहित्य और आध्यात्मिक चिंतन, तीनों मिलकर हमें यह संकेत देते हैं कि मृत्यु का रहस्य चाहे जितना गहरा हो, जीवन का अर्थ उससे कहीं अधिक व्यापक है। शायद मरकर लौट आने वालों की कहानियाँ हमें यही संदेश देती हैं-जीवन को जागरूकता, प्रेम और कृतज्ञता के साथ जीना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

हमारी देवगढ़ यात्रा

 

आत्मीयता, साहित्य और पारिवारिक संस्कृति का संस्मरण


जीवन में कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं, जो केवल दूरी तय करने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे मन, विचार और आत्मा को समृद्ध कर जाती हैं। सोनभद्र ज़िले के देवगढ़ की मेरी दो दिवसीय यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही। यह यात्रा पर्यटन, भ्रमण या दर्शनीय स्थलों की नहीं थी, बल्कि आत्मीयता, साहित्यिक संवाद, ज्ञान और भारतीय पारिवारिक संस्कृति के जीवंत अनुभव की यात्रा थी। इस पूरे प्रवास के केंद्र में रहे देवगढ़ निवासी परम ज्ञानी, विद्वान और कवि श्री जितेंद्र कुमार सिंह ‘संजय’।

मिर्जापुर से देवगढ़ : आत्मीय साथ की शुरुआत
इस यात्रा की सबसे सुंदर शुरुआत तब हुई, जब संजय जी स्वयं हमें मिर्जापुर से अपने साथ देवगढ़ लेकर गए। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की यात्रा नहीं थी, बल्कि आत्मीयता से भरा एक आमंत्रण था-अपने घर, अपने संसार और अपने परिवार में शामिल करने का। मिर्जापुर से देवगढ़ की यात्रा के दौरान रास्ते भर बातचीत चलती रही। साहित्य, समाज, संस्कृति, शिक्षा और वर्तमान समय की चुनौतियों पर उनके विचार सुनना अत्यंत प्रेरणादायक था। उनकी बातों में गहराई, संतुलन और अनुभव की परिपक्वता स्पष्ट दिखाई देती थी। यात्रा के दौरान यह महसूस ही नहीं हुआ कि हम पहली बार उनके साथ जा रहे हैं, ऐसा लग रहा था जैसे वर्षों पुराना परिचय हो।
देवगढ़ आगमन : घर जैसा स्वागत
देवगढ़ पहुँचते ही जिस आत्मीयता के साथ स्वागत हुआ, वह अविस्मरणीय है। संजय जी के घर का वातावरण गरिमामय होने के साथ-साथ अत्यंत स्नेहपूर्ण था। वहाँ औपचारिकता नहीं, बल्कि अपनापन था। उनके परिवार का व्यवहार भी अत्यंत विनम्र और सौम्य था।
भव्य अतिथि गृह में हमारा ठहराव
रात में हम सभी, कुल नौ लोग, संजय जी के भव्य अतिथि गृह में ठहरे। अतिथि गृह अत्यंत सुंदर, स्वच्छ और सुव्यवस्थित था। वहाँ हर सुविधा उपलब्ध थी, परंतु सबसे विशेष बात यह थी कि उसमें घर जैसी आत्मीयता थी। कमरों की व्यवस्था, स्वच्छता और सुविधा देखकर स्पष्ट था कि अतिथि उनके लिए अत्यंत सम्मानित स्थान रखते हैं। यह अनुभव किसी होटल जैसा नहीं, बल्कि परिवार के घर में ठहरने जैसा था।
घर का भोजन : स्वाद और स्नेह का अद्भुत संगम
रात्रि भोजन हमने उनके घर पर ही किया। घर का बना पारंपरिक भोजन अत्यंत स्वादिष्ट था। दाल, ताज़ी सब्जियाँ, कचौड़ियां, चावल, अचार और पारंपरिक व्यंजन, सब कुछ प्रेम से परोसा गया। भोजन के दौरान जो पारिवारिक माहौल था, वह अत्यंत सुखद था। बातचीत में औपचारिकता नहीं, बल्कि अपनापन था। भोजन में केवल स्वाद नहीं था, बल्कि उसमें भावनाएँ और संस्कार भी थे।
समृद्ध निजी पुस्तकालय : ज्ञान का खजाना

भोजन के बाद संजय जी हमें अपने निजी पुस्तकालय में ले गए। यह पुस्तकालय वास्तव में ज्ञान का खजाना था। साहित्य, इतिहास, दर्शन, धर्म, संस्कृति, समाजशास्त्र, राजनीति और कविता, लगभग हर विषय की पुस्तकें वहाँ व्यवस्थित रूप से सजी हुई थीं। कई दुर्लभ और महत्वपूर्ण पुस्तकें भी देखने को मिलीं। यह स्पष्ट था कि संजय जी केवल कवि ही नहीं, बल्कि गंभीर अध्ययनशील व्यक्तित्व के धनी हैं। पुस्तकालय में बिताया गया समय अत्यंत प्रेरणादायक था।
अतिथि गृह के पोर्च में पारिवारिक काव्य गोष्ठी

अगले दिन का सबसे यादगार और भावनात्मक क्षण था-अतिथि गृह के पोर्च में आयोजित पारिवारिक काव्य गोष्ठी। खुले वातावरण में, शांत और हल्की ठंडी हवा के बीच, हम सभी और उनका परिवार एक साथ बैठे। यह कोई औपचारिक मंचीय कार्यक्रम नहीं था, बल्कि परिवार और मित्रों के बीच साहित्य का आत्मीय उत्सव था। संजय जी ने अपनी कविताएँ सुनाईं। उनकी कविताओं में जीवन दर्शन, भारतीय संस्कृति, ग्रामीण जीवन और मानवीय संवेदनाओं की गहराई स्पष्ट झलकती है। हम सभी ने भी अपनी-अपनी रचनाएँ और विचार साझा किए। यह गोष्ठी केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि भावनात्मक संवाद का सुंदर माध्यम बन गई। काफी देर तक यह क्रम चलता रहा और वह वातावरण आज भी स्मृतियों में जीवंत है।
दूसरा दिन : संवाद और आत्मीय समय
दूसरे दिन सुबह अत्यंत शांत और सकारात्मक वातावरण में शुरुआत हुई। चाय के साथ साहित्य, समाज और समसामयिक विषयों पर चर्चा हुई। यह उल्लेखनीय रहा कि इस पूरे प्रवास के दौरान हम कहीं घूमने नहीं गए। परंतु इसका कोई अभाव महसूस नहीं हुआ, क्योंकि जो अनुभव हमें घर और परिवार के बीच मिला, वह किसी पर्यटन से कम नहीं था।
विचारों का गहन आदान-प्रदान
दिन का अधिकांश समय चर्चा और संवाद में बीता। हमने साहित्य की वर्तमान स्थिति, समाज की दिशा, भारतीय संस्कृति और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से विचार किया। संजय जी के विचारों में संतुलन और गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
पारिवारिक संस्कृति का जीवंत अनुभव
उनके परिवार का व्यवहार अत्यंत स्नेहपूर्ण और सहज था। ऐसा लग रहा था कि हम अतिथि नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा हैं। यह अनुभव भारतीय पारिवारिक संस्कृति की सुंदरता को दर्शाता है-जहाँ सम्मान, स्नेह और अपनापन स्वाभाविक रूप से मौजूद होता है।
दोपहर का भोजन और भावनात्मक विदाई
दोपहर का भोजन भी घर पर ही हुआ। भोजन के साथ बातचीत और हँसी-मज़ाक चलता रहा। शाम को जब विदाई का समय आया, तो मन भावुक हो गया। यह केवल यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक आत्मीय संबंध की शुरुआत जैसा लगा। यह दो दिन का प्रवास कई मायनों में विशेष और यादगार रहा। मिर्जापुर से देवगढ़ तक आत्मीय साथ की यात्रा, भव्य अतिथि गृह में सम्मानपूर्वक ठहराव, घर का स्वादिष्ट और स्नेहपूर्ण भोजन, समृद्ध निजी पुस्तकालय का अवलोकन, पारिवारिक काव्य गोष्ठी में सहभागिता, बिना कहीं घूमे भी गहरा सांस्कृतिक अनुभव। वापसी में शिवद्वार मंदिर में रखी ग्यारहवीं शताब्दी की खुदाई के दौरान नहीं निकली ऐतिहासिक और दुर्लभ भगवान शिव-पार्वती की मूर्ति के दर्शन। मन प्रसन्न हो गया। जितेन्द्र जी ने बताया कि शिव-पार्वती की मूर्ति की ऐसी मुस्कान कहीं नहीं मिलती। हालांकि तीन दर्जन से अधिक मंदिरों में इस प्रकार की मूर्ति बनाकर प्रतिष्ठापित की गई है, लेकिन ऐसी मोहक मुस्कान नहीं है उन मूर्तियों में। गजब होगा वह मुर्तिकार जिसने 11वीं शदी में ऐसी दुर्लभ मूर्ति बनाकर इसमें प्राण फूंक दिये। वापसी में जितेन्द्र जी ने हमारी गाड़ियों को मिर्जापुर के बरकछा इलाके में रुकवा लिया। वहां के जग प्रसिद्ध गुलाब जामुन खिलाये। अद्भुत। ऐसे गुलाब जामुन मैने दुनिया में कहीं नहीं खाये थे। मलाई जैसे मुलायम, चाशनी एकदम पतली मगर मीठी। आज भी यह लेख लिखते हुए मुंह में पानी आ रहा है। मेरे लिए यह यात्रा आत्मिक रूप से अत्यंत समृद्ध करने वाली रही। संजय जी का ज्ञान, उनकी सादगी, उनका साहित्यिक दृष्टिकोण और उनका पारिवारिक संस्कार अत्यंत प्रेरणादायक रहा। इदेवगढ़ का यह प्रवास यह सिखाता है कि सबसे सुंदर यात्राएँ वे होती हैं, जो दिलों के बीच होती हैं, जहाँ संबंध बनते हैं, विचार विकसित होते हैं और स्मृतियाँ जीवन भर साथ रहती हैं। यह यात्रा मेरे लिए केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत बन गई है, जो मेरी लेखनी और विचारों में लंबे समय तक जीवित रहेगी। इसके लिए मैं विशेष रूप मशहूर गजलकार श्रभ् अनिल मीत जी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं। हालांकि उनके लिए आभार शब्द बहुत छोटा पड़ रहा है। मगर देवगढ़ यात्रा मेरे लिए किसी तीर्थ से कम नहीं रही।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार 


बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

मज़हब, जाति और क्षेत्र से परे एक भारत

 विशेष लेख-

आज मैं जिस भारत की बात कर रहा हूँ, वह किसी एक मज़हब, किसी एक जाति या किसी एक क्षेत्र का भारत नहीं है। वह भारत है, जिसकी आत्मा सह-अस्तित्व, साझी विरासत और समन्वय में बसती है। एक ऐसा भारत, जो न तो हिन्दू है, न मुस्लिम, न सिख, न ईसाई, बल्कि इन सबका सम्मिलित स्वरूप है। यदि हम भारत को समझना चाहते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि मज़हब, जातिवाद और क्षेत्रवाद से मुक्त हुए बिना किसी विकसित राष्ट्र की कल्पना बेमानी है। विकास केवल सड़कों, इमारतों और तकनीक से नहीं होता, बल्कि मानसिक उदारता, सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक चेतना से होता है।
भारत : केवल भूगोल नहीं, एक साझा सभ्यता
भारत एक राष्ट्र बनने से पहले एक सभ्यता था। यहाँ आर्य और अनार्य मिले, शैव और वैष्णव संवाद में रहे, सूफी और संत एक ही सत्य की तलाश में निकले। यहाँ विविधता कभी विघटन का कारण नहीं बनी, बल्कि शक्ति बनी। आज जब हम “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की बात करते हैं, तो यह कोई नया नारा नहीं, बल्कि हमारी हज़ारों वर्षों पुरानी जीवन-दृष्टि है।
मध्यकालीन भारत : टकराव नहीं, सहयोग का इतिहास
दुर्भाग्यवश, मध्यकालीन इतिहास को अक्सर केवल हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष के चश्मे से देखा गया। जबकि सच्चाई यह है कि यह काल सहयोग, विश्वास और साझी लड़ाइयों का भी रहा है।
1.महाराणा प्रताप और मुस्लिम सेनानायक-जब हम महाराणा प्रताप का नाम लेते हैं, तो स्वतः वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की छवि उभरती है। पर इतिहास यह भी बताता है कि महाराणा प्रताप की सेना में हाकिम ख़ान सूर जैसे मुस्लिम सेनानायक थे, जिन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में प्राणों की आहुति दी। यह तथ्य बताता है कि उस युद्ध में मज़हब नहीं, मातृभूमि सर्वोपरि थी।
2.शिवाजी महाराज और मुस्लिम सेनापति-मराठा स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज को भी केवल एक धर्म विशेष से जोड़कर देखना ऐतिहासिक भूल है। उनकी नौसेना के प्रमुख दौलत ख़ान, तोपखाने के अध्यक्ष इब्राहिम ख़ान और कई क़िले मुस्लिम सेनानायकों के संरक्षण में थे। शिवाजी महाराज ने मस्जिदों और क़ुरआन का सम्मान किया, क्योंकि उनका संघर्ष किसी धर्म से नहीं, अत्याचार से था।
3.रानी लक्ष्मीबाई और गंगा-जमुनी तहज़ीब-1857 की क्रांति की अमर नायिका रानी लक्ष्मीबाई के साथ उनके विश्वासपात्र सेनानायक ग़ुलाम ग़ौस ख़ान थे, जिन्होंने झांसी की रक्षा करते हुए वीरगति पाई। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि भारत की आज़ादी की लड़ाई साझी थी, उसमें किसी मज़हब की दीवार नहीं थी।
भक्तिकाल : जहाँ ईश्वर मज़हब से ऊपर था
भक्तिकाल भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जहाँ ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम और भक्ति बना, न कि कर्मकांड।
1.अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना-अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना जिन्हें हम रहीम के नाम से जानते हैं, कृष्णभक्त थे। उनके दोहे आज भी मंदिरों, पाठ्यक्रमों और जनमानस में गूंजते हैंः
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।”
यह पंक्ति बताती है कि प्रेम का धर्म सार्वभौमिक है।
2.कबीर-मज़हब की दीवारों के विरुद्ध स्वर-कबीर न हिन्दू थे, न मुस्लिम, वे मानवता के कवि थे। उन्होंने मंदिर और मस्जिद दोनों की रूढ़ियों पर प्रश्न उठाए और कहा-
“कंकर-पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय।”
कबीर का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना पाँच सौ वर्ष पहले था।
जातिवाद और क्षेत्रवाद : विकास की सबसे बड़ी बाधाएँ
यदि मज़हब समाज को बाँटता है, तो जातिवाद उसे भीतर से खोखला करता है। जाति के नाम पर श्रेष्ठता और हीनता का भाव न केवल असंवैधानिक है, बल्कि अमानवीय भी है। इसी प्रकार क्षेत्रवाद, उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, भारत की एकता को चुनौती देता है। जबकि सच्चाई यह है कि भारत की पहचान उसकी समग्रता में है, न कि किसी एक हिस्से में।
व्यक्ति के अपराध से कौम या जाति का निर्णय नहीं
इतिहास और वर्तमान, दोनों में, एक बड़ी भूल बार-बार दोहराई गई है। कुछ व्यक्तियों के कृत्यों के आधार पर पूरी कौम, पूरी जाति या पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा कर देना।
यह न तो न्याय है,
न इतिहास है,
और न ही राष्ट्र निर्माण का मार्ग।
इतिहास साक्षी है कि हर समाज, हर धर्म और हर जाति में
संत भी हुए हैं और अत्याचारी भी,
बलिदानी भी हुए हैं और स्वार्थी भी।
लेकिन किसी एक का अपराध, पूरे समाज की पहचान नहीं बन सकता।
इतिहास का कड़वा लेकिन ज़रूरी सत्य
मध्यकाल हो या आधुनिक काल, कुछ शासकों, सरदारों या समूहों ने सत्ता, लालच या कट्टरता के कारण अन्याय, हिंसा और दमन किया। पर यह भी उतना ही सच है कि उन्हीं कालखंडों में उसी समाज से ऐसे लोग भी निकले, जिन्होंने अन्याय का विरोध किया, पीड़ितों की रक्षा की और मानवीय मूल्यों को बचाए रखा। इसलिए यह कहना कि “फलाँ कौम ऐसी है” या “फलाँ जाति वैसी है”, इतिहास के साथ सबसे बड़ा धोखा है। स्वयं को महान दिखाने के लिए दूसरे को कलंकित करना राष्ट्रद्रोह है, जो लोग किसी एक समुदाय को गाली देकर अपने आपको देशभक्त, श्रेष्ठ या रक्षक सिद्ध करना चाहते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि आप किसी कौम को नीचा दिखाकर ऊँचे नहीं हो सकते। किसी धर्म को बदनाम करके धर्म की रक्षा नहीं होती। किसी जाति को अपमानित करके सामाजिक न्याय नहीं मिलता। और किसी क्षेत्र को हेय बताकर राष्ट्रीय एकता नहीं बनती। यह केवल राजनीतिक स्वार्थ, मानसिक असुरक्षा और इतिहास की अधूरी समझ का परिणाम होता है।
भारत की परंपरा : दोष का विरोध, समूह का सम्मान
भारतीय परंपरा ने कभी यह नहीं सिखाया कि गलती को छुपाया जाए। लेकिन उसने यह भी नहीं सिखाया कि गलती करने वाले व्यक्ति को भगवान बना दिया जाए और निर्दोष समाज को अपराधी। हमने हमेशा कहा कि पाप का विरोध करो, पापी के सुधार का मार्ग खोलो और निर्दोष को दोषी न ठहराओ। यही राम का धर्म है, यही कृष्ण की नीति है, यही कबीर और रहीम की चेतना है।
आज की सबसे बड़ी ज़रूरत : विवेक
आज भारत को न नफ़रत की ज़रूरत है, न बदले की, न इतिहास को हथियार बनाने की। भारत को ज़रूरत है विवेक की, संतुलन की और सत्य को पूरे संदर्भ में देखने की। जो समाज अपने अतीत की गलतियों को स्वीकार करता है लेकिन उन्हें सामूहिक घृणा में नहीं बदलता वही समाज आगे बढ़ता है। व्यक्ति गलत हो सकता है, व्यवस्था गलत हो सकती है, लेकिन पूरी कौम कभी गलत नहीं होती। यदि हम सचमुच मज़हब, जातिवाद और क्षेत्रवाद से मुक्त भारत चाहते हैं, तो हमें यह नैतिक साहस दिखाना होगा कि न हम अपने दोष छुपाएँ, न दूसरों को बदनाम करके अपने आपको महान सिद्ध करें। यही भारत की आत्मा है। यही भारत का भविष्य है।
विकसित भारत की शर्त : सामाजिक समरसता
आज हम विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। लेकिन प्रश्न यह है, क्या हम सामाजिक रूप से भी विकसित हैं? एक विकसित राष्ट्र वही होता है, जहाँ नागरिक को मज़हब से नहीं, नागरिकता से पहचाना जाए, प्रतिभा को जाति से नहीं, योग्यता से आँका जाए और व्यक्ति को क्षेत्र से नहीं, मानवता से जोड़ा जाए। भारत का इतिहास हमें लड़ना नहीं, साथ चलना सिखाता है। महाराणा प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, ये सब किसी एक धर्म के नहीं, भारत के नायक हैं। रहीम और कबीर किसी एक मज़हब के नहीं, मानव चेतना के स्वर हैं। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम भारत को मज़हब, जाति और क्षेत्र की संकीर्णताओं से ऊपर उठाकर, साझी संस्कृति, साझा संघर्ष और साझा भविष्य का राष्ट्र बनाएँगे। क्योंकि भारत तभी महान था, है और रहेगा, जब वह सबका होगा। (समाप्त)
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)



बुधवार, 28 जनवरी 2026

यूजीसी का नया नियम बना सत्ता के गले की फाँस

 विशेष लेख-

सियासत गर्म, सवर्णों में उबाल, क्या है निदान?
भारत में शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, सत्ता-संतुलन और भविष्य-निर्माण का औज़ार भी रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में लागू अथवा प्रस्तावित नए नियमों ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि शिक्षा नीति का हर बदलाव केवल अकादमिक नहीं होता, वह गहरे सामाजिक और राजनीतिक परिणाम भी लेकर आता है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं, उनसे स्पष्ट है कि यह विषय अब शैक्षिक परिसरों से निकलकर राजनीतिक गलियारों और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ चुका है।
नया नियम : सुधार या असंतुलन?
यूजीसी द्वारा लाए गए नए प्रावधान, चाहे वे शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े हों, योग्यता मानकों में परिवर्तन हो या प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर, सरकार की मंशा के अनुसार “गुणवत्ता सुधार” के नाम पर प्रस्तुत किए गए हैं। किंतु आलोचकों का मानना है कि ये नियम समान अवसर की भावना को कमजोर करते हैं और पहले से मौजूद सामाजिक असंतुलन को और गहरा कर सकते हैं। एक वरिष्ठ शिक्षाविद् का कथन है “जब शिक्षा नीति समाज की वास्तविक विविधता को ध्यान में रखे बिना बनाई जाती है, तब वह सुधार नहीं, प्रतिरोध को जन्म देती है।”
सत्ता के गले की फाँस क्यों?
राजनीतिक दृष्टि से यह नया नियम सरकार के लिए दोधारी तलवार बन गया है। एक ओर सत्ता प्रतिष्ठान इसे ‘मेरिट’ और ‘गुणवत्ता’ का प्रश्न बताकर बचाव कर रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और शिक्षाविद्ों का एक बड़ा वर्ग इसे सामाजिक न्याय के विरुद्ध कदम मान रहा है। शिक्षा हमेशा से मतदाता चेतना को प्रभावित करने वाला विषय रही है। विश्वविद्यालयों में असंतोष, शिक्षकों का विरोध और छात्रों की लामबंदी किसी भी सरकार के लिए खतरे की घंटी होती है। यही कारण है कि यूजीसी का यह निर्णय सत्ता के लिए “गले की फाँस” बनता दिख रहा है। न तो इसे पूरी तरह वापस लिया जा सकता है और न ही बिना संवाद के आगे बढ़ाया जा सकता है।
सियासत क्यों हुई गर्म?
राजनीति वहाँ प्रवेश करती है जहाँ नीति जनभावनाओं को छूती है। यूजीसी के नए नियमों ने ठीक यही किया है। विपक्ष इसे “शिक्षा का केंद्रीकरण” और “संवैधानिक मूल्यों से विचलन” बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “पुरानी व्यवस्था की जड़ता तोड़ने का साहसिक कदम” कह रहा है। एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार “जब शिक्षा नीति वोट बैंक से टकराती है, तब वह नीति नहीं रहती, वह सियासत बन जाती है।” यही कारण है कि संसद से लेकर सड़क तक और सोशल मीडिया से लेकर अकादमिक मंचों तक, यह मुद्दा तीखे बहस का विषय बन चुका है।
सवर्णों में उबाल : वास्तविकता या राजनीतिक आख्यान?
इस पूरे विवाद में एक प्रमुख कोण ‘सवर्ण असंतोष’ का है। एक वर्ग का मानना है कि नए नियमों से योग्यता आधारित अवसरों पर आघात हुआ है, जबकि दूसरा वर्ग इसे सदियों से चले आ रहे विशेषाधिकारों में आ रही दरार के रूप में देखता है। एक समाजशास्त्री का मत है-“सवर्ण असंतोष को केवल प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक संक्रमण की पीड़ा के रूप में देखना चाहिए।” यह उबाल केवल किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का भी है जो बदलते सामाजिक ढाँचे के साथ स्वयं को समायोजित करने में कठिनाई महसूस कर रही है।
शिक्षा बनाम सामाजिक न्याय : टकराव या संतुलन?
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि यूजीसी का नया नियम सही है या गलत, बल्कि यह है कि क्या वह संतुलित है? क्या वह गुणवत्ता और सामाजिक न्याय दोनों को साथ लेकर चलता है? संविधान शिक्षा को केवल योग्यता का विषय नहीं, बल्कि समान अवसर का माध्यम भी मानता है। जब नीति इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बना पाती, तब असंतोष स्वाभाविक है। एक संवैधानिक विद्वान के शब्दों में “मेरिट और सामाजिक न्याय विरोधी नहीं हैं; समस्या तब होती है जब नीति उन्हें विरोधी बना देती है।”
निदान क्या है?
इस पूरे विवाद का समाधान न तो केवल विरोध में है, न ही केवल समर्थन में। निदान संवाद, पारदर्शिता और समावेशी पुनर्विचार में निहित है।
व्यापक संवाद-यूजीसी को शिक्षकों, छात्रों, सामाजिक समूहों और राज्यों के साथ खुला संवाद करना चाहिए।
चरणबद्ध लागूकरण-नियमों को एक साथ थोपने के बजाय चरणों में लागू किया जाए।
समीक्षा तंत्र-स्वतंत्र विद्वानों की समिति द्वारा नियमों की सामाजिक प्रभाव समीक्षा हो।
संवैधानिक संतुलन-गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ सामाजिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित हो। एक शिक्षा नीति विशेषज्ञ के अनुसार “नीति वही टिकाऊ होती है, जिसमें सुधार का साहस और सुधार की गुंजाइश दोनों मौजूद हों।”
यूजीसी का नया नियम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारत की शिक्षा, समाज और राजनीति के चौराहे पर खड़ा प्रश्न है। यदि इसे केवल सत्ता के अहं या विरोध की राजनीति से देखा गया, तो यह टकराव बढ़ाएगा। किंतु यदि इसे आत्ममंथन और सुधार के अवसर के रूप में लिया गया, तो यही विवाद भविष्य की अधिक न्यायपूर्ण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था की नींव बन सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को युद्धभूमि नहीं, संवाद का मंच बनाया जाए। यही इस संकट का वास्तविक निदान है।

-डॉ. चेतन आनंद 
(लेखक वरिष्ठ कवि और पत्रकार है।)


मंगलवार, 6 जनवरी 2026

दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलनों और मुशायरों में गुटबाज़ी

 विशेष लेख-

दिल्ली-एनसीआर लंबे समय से हिंदी कवि सम्मेलनों और उर्दू मुशायरों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ की महफ़िलों ने देश को अनेक बड़े कवि, शायर और साहित्यिक आंदोलन दिए हैं। कभी ये मंच विचारों की उर्वर भूमि हुआ करते थे, जहाँ रचना की गुणवत्ता, संवेदना और वैचारिक गहराई ही कवि की पहचान होती थी। किंतु आज के संदर्भ में यदि ईमानदारी से देखा जाए, तो दिल्ली-एनसीआर के अधिकांश कवि सम्मेलनों और मुशायरों पर गुटबाज़ी की छाया गहराती जा रही है। यह गुटबाज़ी साहित्य से अधिक संबंधों, समीकरणों और स्वार्थों पर आधारित होती जा रही है।
गुटबाज़ी का बदलता स्वरूप
आज की गुटबाज़ी वैचारिक बहस या साहित्यिक मतभेद तक सीमित नहीं है। यह अब व्यक्तिगत निकटताओं, आयोजकों से रिश्तों, मंच संचालकों की पसंद-नापसंद और सोशल मीडिया नेटवर्किंग पर टिकी हुई है। किसी कवि या शायर का मंच पर आना कई बार उसकी रचना की ताकत से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि वह किस गुट का हिस्सा है। “आप हमारे कार्यक्रम में आइए, हम आपको अपने कार्यक्रम में बुलाएँगे”, यह आपसी लेन-देन आज मंच चयन की सबसे प्रचलित कसौटी बन गई है।
वही चेहरे, वही आवाज़ें
दिल्ली, गाज़ियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद और गुरुग्राम, लगभग हर साहित्यिक आयोजन में बार-बार वही चेहरे दिखाई देते हैं। श्रोता कई बार यह महसूस करता है कि कार्यक्रम बदल गया है, पर कवि-सूची वही है। इससे न केवल मंच की विविधता समाप्त होती है, बल्कि नए और युवा रचनाकारों के लिए दरवाज़े भी बंद हो जाते हैं। अनेक प्रतिभाशाली कवि वर्षों तक मंच के बाहर खड़े रह जाते हैं, जबकि औसत रचनाएँ लिखने वाले लोग केवल गुटीय पहचान के कारण मंच पर बने रहते हैं।
युवा कवियों के लिए कठिन राह
गुटबाज़ी का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव युवा कवियों पर पड़ता है। कई आयोजनों में उनसे या तो अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की जाती है, या फिर यह संकेत दिया जाता है कि पहले “हमारे लोगों” के कार्यक्रमों में नियमित उपस्थिति दर्ज कराइए। कई युवा कवि निराश होकर मंचीय कविता से दूरी बना लेते हैं और कुछ साहित्य से ही विमुख हो जाते हैं। यह स्थिति साहित्यिक भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।
विचारधारा की राजनीति
दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलनों में अब विचारधारात्मक गुट भी स्पष्ट दिखने लगे हैं। कुछ मंच केवल एक खास सोच या विचारधारा से जुड़े कवियों को ही आमंत्रित करते हैं। जो कवि उस वैचारिक खांचे में फिट नहीं बैठता, उसे भले ही उसकी रचना उत्कृष्ट क्यों न हो, मंच नहीं मिलता। साहित्य, जो प्रश्न पूछने और विविध दृष्टियों को स्वीकार करने की परंपरा रहा है, वह आज कई जगह संकीर्णता का शिकार होता दिख रहा है।
मंच संचालन भी गुटीय
मंच संचालन की भूमिका कभी कार्यक्रम की आत्मा हुआ करती थी। आज कई आयोजनों में मंच संचालक स्वयं किसी गुट विशेष का प्रतिनिधि बन जाता है। परिणामस्वरूप समय-वितरण असंतुलित हो जाता है। कुछ कवियों को आवश्यकता से अधिक समय, बार-बार वाहवाही और भूमिका मिलती है, जबकि कुछ को औपचारिक दो-तीन मिनट देकर निपटा दिया जाता है। श्रोता भले ही इसे सहज प्रवाह समझे, लेकिन मंच के भीतर की राजनीति साफ़ दिखाई देती है।
सम्मान और पुरस्कारों की सच्चाई
आज कवि सम्मेलनों में दिए जाने वाले अनेक सम्मान और स्मृति-चिह्न भी गुटबाज़ी की भेंट चढ़ चुके हैं। वही नाम बार-बार सम्मानित किए जाते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि सम्मान साहित्यिक योगदान का नहीं, बल्कि आयोजक से संबंधों का पुरस्कार बन गया है। इससे सम्मान की गरिमा कम होती है और वास्तविक साहित्यिक मूल्यांकन की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है।
सोशल मीडिया और गुटबाज़ी
सोशल मीडिया ने इस गुटीय संस्कृति को और मज़बूत किया है। अपने गुट के कवियों की प्रस्तुतियों को जमकर प्रचार मिलता है, जबकि दूसरे गुट की अच्छी प्रस्तुति भी अनदेखी रह जाती है। तारीफ़, साझा करना और समर्थन, सब कुछ आपसी दायरे में सिमट गया है। डिजिटल मंच, जो लोकतांत्रिक होना चाहिए था, वह भी कई बार गुटीय प्रचार का औज़ार बन गया है।
साहित्य का मंच या मनोरंजन का मेला?
गुटबाज़ी का सीधा असर कविता की प्रकृति पर भी पड़ा है। गंभीर, विचारोत्तेजक और संवेदनशील रचनाओं की जगह अब त्वरित तालियाँ बटोरने वाली रचनाएँ अधिक पसंद की जाने लगी हैं। कविता धीरे-धीरे साहित्य से खिसककर केवल मंचीय मनोरंजन बनती जा रही है। शोर, चुटकुले और सतही भावुकता कई जगह कविता पर हावी हो गए हैं।
क्या हर जगह स्थिति एक-सी है?
यह कहना भी अनुचित होगा कि हर कवि सम्मेलन या मुशायरा इसी बीमारी से ग्रस्त है। दिल्ली-एनसीआर में आज भी कुछ आयोजन ऐसे हैं जो बिना गुट, बिना शर्त और बिना पक्षपात के मंच प्रदान करते हैं। वहाँ रचना, प्रस्तुति और संवेदना को प्राथमिकता दी जाती है। किंतु ऐसे आयोजन अपवाद बनते जा रहे हैं, जबकि गुटबाज़ी धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का रूप लेती जा रही है।
दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलन और मुशायरे आज भी जीवित हैं, सक्रिय हैं और श्रोताओं को आकर्षित करते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गुटबाज़ी ने इनके साहित्यिक चरित्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। जब तक आयोजक निष्पक्षता नहीं अपनाते, मंच संचालक ईमानदार नहीं होता और कवि स्वयं गुटों से ऊपर उठकर साहित्य को प्राथमिकता नहीं देते, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। साहित्य का मंच केवल तालियों और पहचान का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और चेतना का वाहक होता है। यदि यह मंच संकीर्णताओं में कैद हो गया, तो नुकसान केवल कवियों का नहीं, बल्कि पूरी साहित्यिक परंपरा का होगा। आज ज़रूरत इस बात की है कि कवि सम्मेलन और मुशायरे फिर से रचना की गरिमा, विचार की स्वतंत्रता और साहित्यिक ईमानदारी की ओर लौटें।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


सोमवार, 5 जनवरी 2026

दिल्ली की कवि गोष्ठियों का सच

 विशेष लेख-

भारत की सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान में दिल्ली का विशेष स्थान रहा है। यहाँ की कवि गोष्ठियाँ कभी विचार, संवेदना और सामाजिक सरोकार की जीवंत प्रयोगशालाएँ मानी जाती थीं। हिंदी-उर्दू कविता की अनेक धाराएँ यहीं से आगे बढ़ीं। परंतु बीते एक दशक में दिल्ली की कवि गोष्ठियों का स्वरूप जिस तेजी से बदला है, उसने साहित्य प्रेमियों और गंभीर रचनाकारों को आत्ममंथन के लिए विवश कर दिया है।

आयोजन की भरमार, विचारों की कमी

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आज दिल्ली में लगभग हर सप्ताह सैकड़ों कवि गोष्ठियाँ होती हैं। सभागारों में, पार्कों में, सोसायटियों में और यहां तक कि रेस्तरां व कैफे में भी। संख्या के इस विस्फोट ने गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। कई आयोजनों में कविता का उद्देश्य आत्म-अभिव्यक्ति न होकर केवल मंच-प्रदर्शन बनकर रह गया है। कविता सुनी कम जाती है, दिखाई अधिक जाती है।

वही चेहरे, वही तालियाँ

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दिल्ली की अनेक कवि गोष्ठियों में वर्षों से घूमते वही परिचित चेहरे दिखाई देते हैं। वही रचनाएँ, वही लय, वही ठहरे हुए मुहावरे। नए और युवा कवियों के लिए मंच सीमित है। अक्सर उन्हें या तो अंतिम समय में बोलने का अवसर मिलता है या बिल्कुल नहीं। इससे साहित्य का स्वाभाविक विकास बाधित होता है और कविता एक बंद दायरे में घूमती रहती है।

श्रोता : रसिक से दर्शक तक

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पहले कवि गोष्ठी का श्रोता ‘रसिक’ होता था, जो कविता को सुनता, समझता और आत्मसात करता था। आज वह कई बार ‘दर्शक’ बन गया है, जो तालियाँ बजाता है, वीडियो बनाता है और सोशल मीडिया पर साझा करता है। गंभीर और विचारोत्तेजक कविताओं के समय बेचैनी दिखती है, जबकि तुकांत, तात्कालिक और चुटीली पंक्तियों पर तुरंत प्रतिक्रिया मिल जाती है।

साहित्य से व्यापार की ओर

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दिल्ली की कुछ कवि गोष्ठियाँ अब आस्था से अधिक आयोजन-व्यवसाय का रूप ले चुकी हैं। कहीं ‘सहयोग राशि’ के नाम पर मंच तक पहुँच सुनिश्चित की जाती है, तो कहीं प्रायोजकों के बैनर कविता से बड़े दिखाई देते हैं। यह स्थिति साहित्य की आत्मा के लिए चिंताजनक है, क्योंकि कविता का मूल्य उसकी संवेदना में होना चाहिए, न कि उसकी मार्केटिंग में।

सोशल मीडिया का दबाव

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रील और शॉर्ट वीडियो संस्कृति ने कविता की संरचना तक को प्रभावित किया है। अब कविताएँ इस सोच के साथ लिखी जा रही हैं कि कौन-सी पंक्ति वायरल होगी। गहराई, धैर्य और दीर्घ अनुभूति की जगह त्वरित प्रभाव ने ले ली है। कविता की यात्रा ‘पंक्ति’ तक सिमटती जा रही है।

दिल्ली-एनसीआर की स्थिति

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ग़ाज़ियाबाद, हापुड़ और दिल्ली-एनसीआर के अन्य क्षेत्रों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। यहाँ मुहल्ला-स्तरीय कवि गोष्ठियाँ सामाजिक मेल-जोल का माध्यम तो बन रही हैं, पर साहित्यिक कसौटी पर सब खरा नहीं उतरता। प्रतिस्पर्धा अब रचना की नहीं, आयोजन की हो गई है।

आशा की किरण

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इस चित्र का दूसरा पहलू भी है। दिल्ली में कुछ संस्थाएँ, विश्वविद्यालयों के साहित्यिक मंच और स्वतंत्र समूह आज भी गंभीर कविताओं के लिए स्थान बना रहे हैं। यहाँ नए रचनाकारों को सुना जाता है, आलोचना होती है और संवाद जीवित रहता है। ये आयोजन कम प्रचारित होते हैं, पर साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान हैं।

क्या किया जाना चाहिए

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1.कवि गोष्ठियों में चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो

2.नवोदित कवियों के लिए निश्चित अवसर तय हों

3.श्रोताओं में कविता सुनने की संस्कृति विकसित की जाए

4.कविता को सोशल मीडिया कंटेंट से ऊपर रखा जाए

5.आयोजक साहित्य को उद्देश्य मानें, साधन नहीं

दिल्ली की कवि गोष्ठियाँ आज एक चौराहे पर खड़ी हैं। एक रास्ता बाजार, भीड़ और तात्कालिक लोकप्रियता की ओर जाता है, दूसरा साहित्यिक ईमानदारी, साधना और संवाद की ओर। यह तय करना कवियों, आयोजकों और श्रोताओं तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि कविता मंच की शोभा भर न बने, बल्कि समाज की चेतना की आवाज़ बनी रहे।

लेखक

डॉ. चेतन आनंद

(कवि-पत्रकार)