शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

सख़्त कानून के साथ करनी होगी सख़्त कार्रवाई भी

 विशेष लेख-

पेपरलीक माफिया पर निर्णायक प्रहार का समय
राजस्थान सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपरलीक रोकने के लिए देश के सबसे कठोर कानूनों में से एक लागू करने का निर्णय लिया है। इस कानून के अंतर्गत पेपरलीक कराने वाले संगठित गिरोहों के लिए आजीवन कारावास और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। केंद्र सरकार भी सार्वजनिक परीक्षाओं की सुरक्षा को और सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से कानून को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। निस्संदेह यह एक स्वागतयोग्य पहल है। किन्तु सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल कानून सख़्त कर देने से पेपरलीक की घटनाएँ रुक जाएँगी? पिछले दो दशकों का अनुभव बताता है कि उत्तर है नहीं। कठोर कानून जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक है उसका कठोर, निष्पक्ष और समयबद्ध क्रियान्वयन। प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों, संघर्ष और भविष्य की आधारशिला हैं। एक पेपरलीक लाखों अभ्यर्थियों की वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देता है। परीक्षा निरस्त होती है, नियुक्तियाँ टल जाती हैं, युवाओं की आयु सीमा प्रभावित होती है और व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास डगमगा जाता है।
पेपरलीक का फैलता दायरा
विभिन्न अध्ययनों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पिछले एक दशक में देशभर में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े अनेक बड़े पेपरलीक सामने आए हैं। इन घटनाओं से करोड़ों अभ्यर्थी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित हुए। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन घटनाओं का कोई समेकित राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, जिससे समस्या की वास्तविक व्यापकता का आकलन करना कठिन हो जाता है।
किन राज्यों में सबसे अधिक पेपरलीक हुए
यद्यपि राज्यवार कोई आधिकारिक सूची उपलब्ध नहीं है, फिर भी सार्वजनिक अभिलेखों और चर्चित मामलों के आधार पर निम्नलिखित राज्य सबसे अधिक प्रभावित माने जाते हैं-
1. राजस्थान-राजस्थान पिछले कुछ वर्षों में पेपरलीक की सबसे अधिक घटनाओं के कारण चर्चा में रहा। रीट, द्वितीय श्रेणी शिक्षक भर्ती, उपनिरीक्षक भर्ती, पटवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष, कनिष्ठ अभियन्ता तथा अन्य अनेक भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएँ सामने आईं। हजारों गिरफ्तारियाँ हुईं, अनेक परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं और लाखों अभ्यर्थी प्रभावित हुए। यही कारण है कि राज्य ने अब सबसे कठोर कानून बनाने का निर्णय लिया है।
2. उत्तर प्रदेश-उत्तर प्रदेश में पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा, समीक्षा अधिकारी तथा सहायक समीक्षा अधिकारी परीक्षा सहित कई भर्ती परीक्षाओं में पेपरलीक के आरोप लगे। वर्ष 2024 में लगभग 48 लाख अभ्यर्थियों की पुलिस भर्ती परीक्षा निरस्त करनी पड़ी। यह देश के सबसे बड़े परीक्षा संकटों में से एक था।
3. बिहार-बिहार में बीपीएससी की संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा, सिपाही भर्ती तथा राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) से जुड़े मामलों ने राष्ट्रीय स्तर पर चिंता उत्पन्न की। जाँच एजेंसियों ने अंतरराज्यीय गिरोहों की सक्रियता की ओर संकेत किया।
4. मध्य प्रदेश-व्यापम घोटाला भारतीय इतिहास के सबसे बड़े परीक्षा घोटालों में गिना जाता है। चिकित्सा, अभियांत्रिकी और सरकारी नौकरियों से जुड़ी अनेक परीक्षाएँ वर्षों तक इसकी चपेट में रहीं। यह केवल पेपरलीक का मामला नहीं था, बल्कि पूरे भर्ती तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गया।
5. गुजरात-प्रधान लिपिक, कनिष्ठ लिपिक तथा अन्य भर्ती परीक्षाओं में पेपरलीक की घटनाओं ने राज्य सरकार को कठोर कानून बनाने के लिए विवश किया।
6. उत्तराखंड-उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की भर्ती परीक्षा में पेपरलीक के बाद राज्य ने देश के सबसे कठोर नकल विरोधी कानूनों में से एक लागू किया।
7. महाराष्ट्र-शिक्षक पात्रता परीक्षा तथा अन्य भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाए। स्पष्ट है कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। पेपरलीक अब संगठित अपराध का रूप ले चुका है, जिसकी जड़ें अनेक राज्यों तक फैली हुई हैं।
कठोर कानून के बावजूद सफलता क्यों नहीं
देश के अनेक राज्यों ने समय-समय पर कठोर कानून बनाए। सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया। हजारों पृष्ठों की विवेचनाएँ तैयार हुईं। फिर भी दोषसिद्धि के मामले अपेक्षाकृत बहुत कम दिखाई देते हैं।
इसका कारण है-
1.विवेचना में अत्यधिक विलम्ब।
2.वर्षों तक लंबित न्यायिक प्रक्रिया।
3.मुख्य सूत्रधारों तक पहुँचने में कठिनाई।
4.तकनीकी साक्ष्यों का अभाव।
5.विभिन्न राज्यों की जाँच एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी।
6.कई मामलों में प्रभावशाली लोगों के संरक्षण की आशंकाएँ।
जब अपराधी यह समझ जाता है कि मुकदमा वर्षों तक चलेगा और दण्ड की सम्भावना अनिश्चित है, तब कानून का भय स्वतः कम हो जाता है।
शिक्षा विशेषज्ञ क्या कहते हैं
राष्ट्रीय परीक्षा सुधार समिति के अध्यक्ष तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. के. राधाकृष्णन ने परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों की अनुशंसा करते हुए स्पष्ट कहा था कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। परीक्षा प्रक्रिया को प्रौद्योगिकी आधारित, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना होगा। अनेक शिक्षाविदों का मत है कि परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता ही शिक्षा व्यवस्था की आत्मा है। यदि अभ्यर्थियों का विश्वास समाप्त हो जाए तो पूरी व्यवस्था खोखली हो जाती है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा कि परीक्षा की पवित्रता और विश्वसनीयता सर्वोपरि है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि परीक्षा प्रणाली पर से विश्वास उठ गया तो इसका दुष्प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा। यह टिप्पणी केवल एक मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण परीक्षा व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है।
केवल दण्ड नहीं, व्यवस्था भी बदले
पेपरलीक रोकने के लिए केवल कठोर दण्ड पर्याप्त नहीं होगा। कुछ बुनियादी सुधार अनिवार्य हैं-
1.प्रश्नपत्रों की बहुस्तरीय डिजिटल सुरक्षा। परीक्षा केन्द्रों की सतत निगरानी।
2.प्रत्येक मामले की अधिकतम तीन माह में विवेचना।
3.एक वर्ष के भीतर न्यायिक निर्णय।
4.दोषियों की संपत्ति की कुर्की।
5.परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की व्यक्तिगत जवाबदेही।
6.अंतरराज्यीय गिरोहों के विरुद्ध संयुक्त अभियान।
7.कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी व्यवस्था का उपयोग।
राजनीतिक इच्छाशक्ति सबसे आवश्यक
पेपरलीक केवल प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम नहीं है। इसके पीछे करोड़ों रुपये का अवैध कारोबार सक्रिय रहता है। जब तक इस आर्थिक तंत्र को ध्वस्त नहीं किया जाएगा और किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। कानून तभी प्रभावी होता है जब अपराधी को यह विश्वास हो जाए कि अपराध करने के बाद बच निकलना असंभव है।
युवाओं का विश्वास लौटाना होगा
आज देश का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, बल्कि निष्पक्ष अवसर चाहता है। वह चाहता है कि उसकी मेहनत का मूल्य किसी दलाल, गिरोह या भ्रष्ट अधिकारी की मिलीभगत से न छीना जाए। यदि बार-बार परीक्षाएँ रद्द होंगी, परिणाम रुकेंगे और वर्षों तक मुकदमे चलते रहेंगे, तो युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है। राजस्थान का नया कानून निश्चित रूप से देश के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। अन्य राज्यों को भी इससे सीख लेनी चाहिए। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि कानून की कठोरता से अधिक महत्त्वपूर्ण उसका निष्पक्ष और त्वरित क्रियान्वयन है। पेपरलीक केवल प्रश्नपत्र की चोरी नहीं है, यह करोड़ों युवाओं के सपनों, उनके परिश्रम और उनके भविष्य की चोरी है। इसलिए अब समय केवल कठोर कानून बनाने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करने का है जिसमें अपराधी को शीघ्र दण्ड मिले, गिरोहों की आर्थिक कमर टूटे और प्रत्येक अभ्यर्थी को यह विश्वास हो कि उसकी सफलता केवल उसकी प्रतिभा और परिश्रम पर निर्भर करेगी। देश को अब सख़्त कानून के साथ सख़्त कार्रवाई भी चाहिए। यही युवाओं के विश्वास, शिक्षा व्यवस्था की गरिमा और राष्ट्र के भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

मूल मुद्दों से भटकी केंद्र सरकार!

 लेख-

रोजगार, शिक्षा और युवाओं की
उम्मीदों के बीच बढ़ता असंतोष

‘युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। यदि उनके सपनों को दिशा मिले तो वे देश का भविष्य बदल देते हैं, लेकिन यदि वे निराश हो जाएँ तो वही ऊर्जा असंतोष का रूप ले लेती है।’ भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यह स्थिति हमारे लिए एक अभूतपूर्व अवसर भी है और एक बड़ी चुनौती भी। हर वर्ष लाखों युवा विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं से निकलकर रोजगार की दुनिया में प्रवेश करते हैं। उनके मन में एक ही सपना होता है-सम्मानजनक रोजगार, सुरक्षित भविष्य और अपनी मेहनत के अनुरूप अवसर। लेकिन जब उन्हें बार-बार परीक्षा स्थगित होने, पेपर लीक, भर्ती में देरी या सीमित रोजगार के अवसरों का सामना करना पड़ता है, तो स्वाभाविक रूप से व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास डगमगाने लगता है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने बुनियादी ढाँचे, डिजिटल इंडिया, विदेशी निवेश, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, रक्षा आधुनिकीकरण और कल्याणकारी योजनाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। एक्सप्रेस-वे, वंदे भारत ट्रेनें, डिजिटल भुगतान प्रणाली, स्टार्टअप संस्कृति और वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका इसके उदाहरण हैं। किंतु इसके साथ ही एक प्रश्न लगातार उठता रहा है-क्या विकास की इस यात्रा में युवाओं की सबसे बड़ी चिंताओं को पर्याप्त प्राथमिकता मिली है?
रोजगार-सबसे बड़ा सवाल
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन रोजगार का प्रश्न अब भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। लाखों शिक्षित युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिताते हैं। निजी क्षेत्र में अवसर बढ़े हैं, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता, वेतन और स्थायित्व को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं। सरकारी नौकरियाँ सीमित हैं और उनके लिए प्रतिस्पर्धा लगातार कठिन होती जा रही है। युवाओं की शिकायत केवल नौकरियों की संख्या को लेकर नहीं है, बल्कि भर्ती प्रक्रिया की गति और पारदर्शिता को लेकर भी है।
पेपर लीक और टूटता विश्वास
हाल के वर्षों में नीट-यूजी, यूजीसी-नेट और कई भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। लाखों अभ्यर्थियों ने वर्षों की तैयारी, भारी आर्थिक निवेश और मानसिक संघर्ष के बाद परीक्षाएँ दीं। जब परीक्षाएँ रद्द हुईं या उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठे, तो उनके भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक था। आज का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, वह निष्पक्ष अवसर चाहता है। उसे विश्वास होना चाहिए कि उसकी मेहनत का परिणाम किसी भ्रष्ट तंत्र की भेंट नहीं चढ़ेगा।
भर्ती में देरी भी बड़ी समस्या
रेलवे, एसएससी और अन्य सरकारी विभागों की कई भर्तियों में वर्षों तक परिणाम और नियुक्ति प्रक्रिया लंबित रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई उम्मीदवार आयु सीमा पार कर जाते हैं। वर्षों की तैयारी और संघर्ष के बाद भी नियुक्ति न मिलना युवाओं में गहरी निराशा पैदा करता है।
अग्निपथ योजना और युवा
अग्निपथ योजना भी युवाओं के बीच व्यापक बहस का विषय रही। सरकार ने इसे सेना के आधुनिकीकरण और युवा प्रोफाइल तैयार करने की दिशा में बड़ा सुधार बताया, जबकि अनेक सैन्य अभ्यर्थियों ने इसे स्थायी रोजगार के अवसर कम होने के रूप में देखा। यह विवाद इस बात का उदाहरण है कि किसी भी नीति की सफलता केवल उसके उद्देश्य पर नहीं, बल्कि समाज द्वारा उसकी स्वीकार्यता पर भी निर्भर करती है।
महँगाई और बढ़ता आर्थिक दबाव
महँगाई का प्रभाव केवल गरीबों तक सीमित नहीं रहता। शिक्षित मध्यम वर्ग और युवा भी इससे प्रभावित होते हैं। किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और दैनिक जीवन का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में नौकरी मिलने के बाद भी आर्थिक सुरक्षा का एहसास कम होता जा रहा है।
क्या सरकार का पक्ष नहीं है?
निश्चित रूप से है। केंद्र सरकार का कहना है कि उसने स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन जैसी योजनाओं के माध्यम से रोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। सरकार का तर्क है कि बड़े आर्थिक सुधारों के परिणाम समय के साथ अधिक स्पष्ट होंगे और भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह भी सच है कि देश में सड़क, रेल, हवाई अड्डे, डिजिटल भुगतान और सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। इसलिए पूरे परिदृश्य को एक ही दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं होगा।
विद्वानों की राय
प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ. रघुराम राजन का मानना है कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित करना है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमत्र्य सेन लगातार शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश को विकास की सबसे मजबूत नींव बताते रहे हैं। वहीं प्रो. अभिजीत बनर्जी का मत है कि आर्थिक विकास तभी सार्थक होगा जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति और युवाओं तक पहुँचे। इन विचारों से स्पष्ट है कि आर्थिक विकास का वास्तविक मूल्यांकन तभी होगा जब वह युवाओं के जीवन में अवसर, सुरक्षा और सम्मान का रूप ले।
भविष्य की राह
यदि सरकार युवाओं का विश्वास और अधिक मजबूत करना चाहती है तो कुछ कदम अत्यंत आवश्यक हैं-
1.भर्ती परीक्षाओं को पूरी तरह पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जाए।
2.पेपर लीक पर कठोरतम दंड सुनिश्चित हो।
3.सरकारी भर्तियों को समयबद्ध बनाया जाए।
4.कौशल विकास को उद्योगों की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ा जाए।
5. एमएसएमई और स्टार्टअप को अधिक प्रोत्साहन मिले।
6.शिक्षा व्यवस्था को रोजगारोन्मुख बनाया जाए।
7.महँगाई नियंत्रण और रोजगार सृजन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार ने कुछ भी नहीं किया, और यह कहना भी सही नहीं होगा कि युवाओं की सभी समस्याएँ समाप्त हो चुकी हैं। वास्तविकता इन दोनों के बीच है। युवाओं का असंतोष लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि एक संदेश है। ऐसा संदेश जिसे सुनना और समझना आवश्यक है। यदि भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनना है तो उसकी सबसे बड़ी शक्ति, अर्थात् उसके युवाओं के विश्वास, प्रतिभा और परिश्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। सरकार, विपक्ष, शिक्षण संस्थान और समाज, सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ हर युवा यह विश्वास कर सके कि उसकी मेहनत का सम्मान होगा और उसका भविष्य केवल उसके परिश्रम से तय होगा, किसी व्यवस्था की कमजोरी से नहीं। जब युवाओं के सपनों को उड़ान मिलेगी, तभी भारत का भविष्य वास्तव में स्वर्णिम होगा।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार

बुधवार, 8 जुलाई 2026

क्या भारत को एक नए जनांदोलन की जरूरत है?

 लेख-

इतिहास के आईने में विश्व और
भारत के आंदोलनों का प्रभाव

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब समाज में अन्याय, असमानता, शोषण या व्यवस्था के प्रति असंतोष बढ़ा है, तब-तब आंदोलनों ने परिवर्तन की राह दिखाई है। कोई भी बड़ा सामाजिक या राजनीतिक बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि जनचेतना के जागरण से आता है। भारत हो या विश्व, अनेक आंदोलनों ने अनेक देशों की दिशा और दशा बदल दी। प्रश्न यह है कि क्या आज के भारत को भी किसी नए आंदोलन की आवश्यकता है?
आंदोलन केवल विरोध नहीं, परिवर्तन का माध्यम
आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार का विरोध करना नहीं होता। उसका वास्तविक लक्ष्य समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना, लोगों को जागरूक करना और व्यवस्था को बेहतर बनाना होता है। सफल आंदोलन वही माना जाता है जो हिंसा नहीं, बल्कि जनसहभागिता और नैतिक शक्ति के आधार पर परिवर्तन लाए। महात्मा गांधी ने कहा था, ‘आप स्वयं वह परिवर्तन बनिए, जिसे आप दुनिया में देखना चाहते हैं।’ यही किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी प्रेरणा है।
विश्व के वे आंदोलन जिन्होंने इतिहास बदल दिया
विश्व इतिहास में फ्रांसीसी क्रांति (1789) ने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का विचार पूरी दुनिया को दिया। अमेरिकी स्वतंत्रता आंदोलन ने लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी। रूसी क्रांति (1917) ने विश्व राजनीति की दिशा बदल दी और समाजवादी विचारधारा को नई शक्ति दी। दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में रंगभेद विरोधी आंदोलन ने नस्लीय भेदभाव की जड़ों को हिला दिया। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में चले सिविल राइट्स आंदोलन ने अश्वेत नागरिकों को समान अधिकार दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। इन आंदोलनों ने केवल अपने देशों को नहीं बदला, बल्कि पूरी दुनिया को लोकतंत्र, मानवाधिकार और समानता का नया दृष्टिकोण दिया।
भारत के आंदोलन-जनशक्ति का अद्भुत उदाहरण
भारत का स्वतंत्रता संग्राम विश्व का सबसे बड़ा अहिंसक जन आंदोलन माना जाता है। 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अंग्रेजी शासन के विरुद्ध पहला व्यापक विद्रोह था। इसके बाद स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन ने करोड़ों भारतीयों को एक सूत्र में बाँध दिया। महात्मा गांधी ने यह सिद्ध कर दिया कि सत्य और अहिंसा भी किसी साम्राज्य को झुका सकते हैं। यही कारण है कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विश्वभर के अनेक देशों के लिए प्रेरणा बना।
स्वतंत्र भारत के महत्वपूर्ण आंदोलन
आजादी के बाद भी अनेक जन आंदोलनों ने देश को नई दिशा दी। विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भूमि सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास था। जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए जनजागरण का कार्य किया। चिपको आंदोलन ने पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने विकास और विस्थापन के बीच संतुलन का प्रश्न उठाया। सूचना के अधिकार आंदोलन ने शासन में पारदर्शिता की नींव मजबूत की, जबकि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने देश में जवाबदेही और जनभागीदारी पर व्यापक बहस छेड़ी।
सबसे बड़ा आंदोलन कौन सा?
यदि प्रभाव की दृष्टि से देखा जाए तो भारत का स्वतंत्रता आंदोलन विश्व के सबसे सफल जन आंदोलनों में गिना जाता है, क्योंकि इसने बिना व्यापक सशस्त्र संघर्ष के ब्रिटिश साम्राज्य को सत्ता छोड़ने पर विवश कर दिया। वहीं फ्रांसीसी क्रांति ने आधुनिक लोकतंत्र की अवधारणा को जन्म दिया, जबकि दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद विरोधी आंदोलन मानव समानता का वैश्विक प्रतीक बन गया। प्रत्येक आंदोलन अपने समय और उद्देश्य के अनुसार ऐतिहासिक महत्व रखता है। इतिहासकार रामचंद्र गुहा मानते हैं कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी लोकतांत्रिक परंपरा और शांतिपूर्ण जन भागीदारी रही है। वहीं अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन का मत है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और सार्वजनिक विमर्श पर निर्भर करती है।
क्या आज भारत को नए आंदोलन की आवश्यकता है?
आज भारत स्वतंत्र है, लोकतांत्रिक है और विकास की नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा है। फिर भी अनेक चुनौतियाँ सामने हैं जैसे-शिक्षा की गुणवत्ता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सौहार्द्र, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, डिजिटल भ्रामक सूचना, नैतिक मूल्यों का ह्रास और नागरिक जिम्मेदारी जैसे विषय गंभीर चिंता का कारण हैं। ऐसी स्थिति में देश को हिंसक या टकराव वाले आंदोलनों की नहीं, बल्कि जनजागरण आंदोलनों की आवश्यकता है। ऐसा आंदोलन जो लोगों में संविधान के प्रति सम्मान, ईमानदारी, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, महिला सम्मान, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने कहा था, ‘संपूर्ण क्रांति केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन है।’ यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
आंदोलन की नई दिशा
आज का आंदोलन सड़कों पर संघर्ष से अधिक समाज के भीतर जागरूकता का अभियान होना चाहिए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, मीडिया, साहित्य, सामाजिक संगठनों और युवाओं को इसमें प्रमुख भूमिका निभानी होगी। सोशल मीडिया का उपयोग भी सकारात्मक जनचेतना के लिए किया जा सकता है। डॉ. भीमराव आंबेडकर का संदेश-‘शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो’। आज भी सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी सूत्र है। इतिहास बताता है कि बड़े आंदोलन केवल सत्ता नहीं बदलते, वे समाज की सोच बदलते हैं। विश्व और भारत के आंदोलनों ने मानवता को स्वतंत्रता, समानता और न्याय की नई राह दिखाई है। आज भारत को किसी हिंसक क्रांति की नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, संवैधानिक मूल्यों और नागरिक कर्तव्यों पर आधारित राष्ट्रीय जनजागरण आंदोलन की आवश्यकता है। यदि प्रत्येक नागरिक स्वयं से परिवर्तन की शुरुआत करे, तो वही सबसे बड़ा और सबसे सफल आंदोलन सिद्ध होगा। यही भविष्य के भारत की सबसे मजबूत नींव बन सकती है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


रविवार, 5 जुलाई 2026

युवाओं में बढ़ती क्रूरता और हिंसा

 विशेष लेख-

आखिर समाज किस दिशा में जा रहा है?
चिंता का विषय बनती युवा मानसिकता

भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। यही युवा देश के विकास की सबसे बड़ी शक्ति माने जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह युवाओं से जुड़े जघन्य अपराध सामने आए हैं, उन्होंने पूरे समाज को चिंता में डाल दिया है। मामूली विवाद में हत्या, प्रेम संबंधों में बर्बरता, सड़क पर हिंसा, गैंग संस्कृति और सोशल मीडिया के लिए अपराध जैसी घटनाएँ यह सोचने पर विवश करती हैं कि आखिर युवाओं के एक वर्ग में संवेदनहीनता और क्रूरता क्यों बढ़ रही है? यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज, परिवार, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय है।
जब घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया
पिछले दस वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ हुईं जिन्होंने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। वर्ष 2017 का गुरुग्राम का प्रद्युम्न हत्याकांड, 2019 में हैदराबाद की महिला पशु चिकित्सक के साथ सामूहिक दुष्कर्म और हत्या, 2022 का श्रद्धा वालकर हत्याकांड, 2023 में दिल्ली की साक्षी की सरेआम हत्या, 2024 का पुणे पोर्शे कार हादसा, 2025 का चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड तथा हाल के समय में सिया गोयल-केतन अग्रवाल प्रकरण और बेंगलुरु में सामने आईं कई क्रूर घटनाएँ इस बात का संकेत देती हैं कि कुछ मामलों में हिंसा पहले से अधिक निर्मम और संवेदनहीन होती जा रही है। घटनाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन हर घटना समाज से यही सवाल पूछती है क्या हम अपनी युवा पीढ़ी को सही दिशा दे पा रहे हैं?
आँकड़े भी बढ़ा रहे हैं चिंता
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि किशोरों और युवाओं से जुड़े गंभीर अपराध चिंता का विषय बने हुए हैं। हत्या, गंभीर हमला, महिलाओं के विरुद्ध अपराध और किशोर अपराधों के मामलों में लगातार सतर्क रहने की आवश्यकता बनी हुई है। यह भी सच है कि देश के अधिकांश युवा कानून का सम्मान करने वाले और समाज के निर्माण में लगे हुए हैं, लेकिन कुछ जघन्य घटनाएँ पूरी पीढ़ी की छवि पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं।
मनोचिकित्सक क्या कहते हैं
प्रख्यात मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख का मानना है कि आज का युवा पहले की तुलना में कहीं अधिक मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, अकेलेपन और असफलता के भय से जूझ रहा है। यदि उसे समय पर भावनात्मक सहयोग और मनोवैज्ञानिक परामर्श नहीं मिलता, तो कुछ मामलों में यह आक्रामक व्यवहार का रूप ले सकता है। मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी के अनुसार बच्चों और युवाओं को केवल अच्छी शिक्षा नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा, संवाद और अपनापन भी चाहिए। जब परिवार में संवाद कम होता है, तब कई समस्याएँ भीतर ही भीतर पनपने लगती हैं। वहीं डॉ. संजय चुघ का कहना है कि क्रोध पर नियंत्रण न होना, आवेग में निर्णय लेना और नशे की बढ़ती प्रवृत्ति हिंसक अपराधों की पृष्ठभूमि तैयार करती है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा और स्वास्थ्य नीति का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
परिवार की बदलती तस्वीर
संयुक्त परिवारों का टूटना, माता-पिता की व्यस्त दिनचर्या, बच्चों के साथ संवाद में कमी और मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता ने पारिवारिक संबंधों को प्रभावित किया है। अनेक बच्चे अपनी परेशानियाँ किसी से साझा नहीं कर पाते। धीरे-धीरे यह अकेलापन कुंठा, अवसाद और आक्रोश में बदल सकता है। परिवार यदि समय रहते बच्चे के व्यवहार में आ रहे बदलावों को समझ ले, तो कई समस्याओं को शुरुआत में ही रोका जा सकता है।
क्या सोशल मीडिया भी जिम्मेदार है
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया स्वयं अपराध नहीं कराता, लेकिन हिंसक वीडियो, वेब सीरीज, ऑनलाइन गेम और लगातार डिजिटल दुनिया में डूबे रहने का असर कुछ युवाओं के व्यवहार पर पड़ सकता है। वायरल होने की मानसिकता, त्वरित प्रसिद्धि की चाह और आक्रामक सामग्री के लगातार संपर्क से कुछ युवाओं की संवेदनशीलता कम हो जाती है। इसलिए डिजिटल साक्षरता भी समय की मांग बन चुकी है।
नशा और गैंग संस्कृति का बढ़ता असर
शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थ निर्णय क्षमता को प्रभावित करते हैं। कई अपराधों में नशा एक महत्वपूर्ण कारक पाया गया है। इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में गैंग संस्कृति, हथियारों का आकर्षण और सोशल मीडिया पर अपराधियों का महिमामंडन भी युवाओं को गलत दिशा में प्रेरित कर रहा है।
सफलता का बढ़ता दबाव
समाजशास्त्रियों का कहना है कि आज का समाज सफलता को केवल धन, प्रसिद्धि और दिखावे से जोड़कर देखता है। असफलता को स्वीकार करने का धैर्य कम होता जा रहा है। प्रतियोगिता इतनी तीव्र हो गई है कि अनेक युवा मानसिक दबाव में जी रहे हैं। जब भावनात्मक संतुलन कमजोर होता है, तो छोटी-सी बात भी बड़े विवाद का कारण बन सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान लगातार इस बात पर बल देता रहा है कि किशोरावस्था और युवावस्था में मानसिक स्वास्थ्य की समय पर पहचान और परामर्श अत्यंत आवश्यक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी युवाओं में हिंसा को केवल अपराध नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती मानता है। विशेषज्ञों के अनुसार स्कूलों और कॉलेजों में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक उपलब्ध होना अब विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता है।
क्या है समाधान
समस्या जटिल है, इसलिए समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए।
1.प्रत्येक विद्यालय और महाविद्यालय में मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता नियुक्त किए जाएँ।
2.जीवन-कौशल, नैतिक शिक्षा, सहानुभूति और क्रोध-प्रबंधन को शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए।
3.माता-पिता प्रतिदिन बच्चों से खुलकर बातचीत करें और उनके व्यवहार में आने वाले बदलावों पर ध्यान दें।
4.खेल, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए ताकि युवाओं की ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगे।
5.नशा-विरोधी अभियानों को और प्रभावी बनाया जाए।
6.सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग की शिक्षा दी जाए।
7.गंभीर अपराधों में त्वरित न्याय और प्रभावी कानून-व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
सिर्फ सरकार नहीं, समाज भी जिम्मेदार
हिंसा केवल पुलिस या अदालतों से नहीं रुकेगी। इसके लिए परिवार, विद्यालय, समाज, मीडिया और सरकार सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। बच्चों को बचपन से ही संवेदनशीलता, सहिष्णुता, संवाद और मानवीय मूल्यों का संस्कार देना होगा। यदि हम केवल आर्थिक सफलता को ही उपलब्धि मानते रहेंगे और चरित्र निर्माण की उपेक्षा करेंगे, तो ऐसी घटनाएँ बार-बार सामने आती रहेंगी। यह सही नहीं होगा कि कुछ अपराधों के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। आज भी देश के करोड़ों युवा विज्ञान, शिक्षा, सेना, चिकित्सा, खेल, साहित्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अद्भुत कार्य कर रहे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बढ़ती हिंसा हमें समय रहते सचेत होने का संदेश दे रही है। यदि परिवार संवाद का वातावरण बनाए, शिक्षा व्यवस्था संवेदनशील नागरिक तैयार करे, मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिले और समाज सकारात्मक मूल्यों को पुनः स्थापित करे, तो निश्चित ही इस चुनौती का समाधान संभव है। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में होता है, और उन हाथों में किताब, कौशल और करुणा होनी चाहिए, हथियार और हिंसा नहीं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

एथनॉल मिश्रित पेट्रोल-आत्मनिर्भर भारत का ईंधन या नई चुनौतियों की शुरुआत?

 महत्वपूर्ण लेख-

भारत में पिछले कुछ वर्षों से पेट्रोल में एथनॉल मिलाने की नीति तेजी से लागू की जा रही है। अब देश के अधिकांश पेट्रोल पंपों पर ई-20 अर्थात 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रित पेट्रोल उपलब्ध है। सरकार इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम बता रही है, जबकि वाहन मालिकों, पर्यावरणविदों और अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग इससे जुड़ी कुछ आशंकाएँ भी व्यक्त कर रहा है। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि एथनॉल मिश्रण की यह नीति आखिर है क्या, इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी, दुनिया के अन्य देशों का अनुभव क्या रहा है और भारत के लिए इसके क्या मायने हैं। एथनॉल एक प्रकार का एथिल अल्कोहल है, जिसे मुख्य रूप से गन्ने के शीरे, गन्ने के रस, मक्का, टूटे चावल तथा अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। जब इसे पेट्रोल में निर्धारित अनुपात में मिलाया जाता है तो उसे एथनॉल मिश्रित पेट्रोल कहा जाता है। उदाहरण के लिए, 20 प्रतिशत एथनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल वाले ईंधन को ई-20 कहा जाता है। भारत सरकार ने एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम को कई उद्देश्यों के साथ लागू किया है। सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है। भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता पर पड़ता है। सरकार का मानना है कि यदि पेट्रोल का एक हिस्सा देश में उत्पादित एथनॉल से प्रतिस्थापित किया जाए तो विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होगी, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और किसानों को भी अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा।
एथनॉल मिश्रण का एक बड़ा आधार कृषि भी है। गन्ना उत्पादक किसानों को अक्सर चीनी मिलों से भुगतान में देरी का सामना करना पड़ता है। एथनॉल उत्पादन बढ़ने से चीनी मिलों को अतिरिक्त बाजार मिलता है और किसानों को अपेक्षाकृत बेहतर भुगतान मिलने की संभावना बढ़ती है। हाल के वर्षों में मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से भी एथनॉल बनाया जा रहा है, जिससे कृषि क्षेत्र को नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं।
दुनिया के कई देशों ने भारत से बहुत पहले एथनॉल मिश्रण अपनाया था। ब्राजील इसका सबसे सफल उदाहरण माना जाता है। वहाँ 1970 के दशक से पेट्रोल में लगभग 27 प्रतिशत एथनॉल मिलाया जा रहा है और बड़ी संख्या में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन ऐसे हैं जो शुद्ध एथनॉल पर भी चल सकते हैं। अमेरिका में सामान्यतः ई-10 का उपयोग होता है, जबकि कुछ राज्यों में ई-15 और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए ई-85 भी उपलब्ध है। कनाडा, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देशों में भी विभिन्न स्तरों पर एथनॉल मिश्रण अपनाया गया है।
यदि लाभों की बात करें तो पहला लाभ विदेशी मुद्रा की बचत है। तेल आयात कम होने से देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। दूसरा लाभ किसानों और ग्रामीण उद्योगों को मिलता है। तीसरा लाभ पर्यावरण से जुड़ा है। एथनॉल एक जैव-ईंधन है और इसके उपयोग से कुछ हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कम हो सकता है। सरकार का दावा है कि ई-20 के अनुरूप विकसित वाहनों में प्रदूषण कम होता है और इंजन का प्रदर्शन भी बेहतर हो सकता है। लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
सबसे पहले माइलेज का प्रश्न आता है। एथनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। इसी कारण अनेक वाहन विशेषज्ञों का मानना है कि ई-20 के उपयोग से माइलेज में लगभग 2 से 4 प्रतिशत, कुछ परिस्थितियों में इससे थोड़ा अधिक भी, कमी महसूस हो सकती है। वाहन निर्माता भी स्वीकार करते हैं कि ईंधन दक्षता पर कुछ प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि उनका कहना है कि यह सुरक्षा का नहीं बल्कि दक्षता का विषय है।
दूसरी चिंता पुराने वाहनों को लेकर है। भारत की सड़कों पर करोड़ों ऐसे वाहन हैं जिनका निर्माण उस समय हुआ था जब ई-20 ईंधन उपलब्ध नहीं था। ऐसे वाहनों में रबर की पाइप, सील, गैस्केट तथा ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों पर लंबे समय में प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त की जाती रही है। हालांकि सरकार और वाहन निर्माता कहते हैं कि व्यापक स्तर पर इंजन फेल होने जैसी घटनाएँ सामने नहीं आई हैं, फिर भी पुराने वाहन मालिकों की शंकाओं का पूरी तरह समाधान होना अभी बाकी है।
तीसरी चुनौती खाद्य सुरक्षा की है। यदि बड़ी मात्रा में मक्का, गन्ना और अन्य कृषि उत्पाद ईंधन बनाने में लगेंगे, तो भविष्य में खाद्यान्न की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है। अमेरिका में वर्षों से ‘फूड बनाम फ्यूल’ की बहस चलती रही है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में इस पहलू पर विशेष सावधानी बरतनी होगी।
चैथा प्रश्न जल संसाधनों से जुड़ा है। गन्ना अत्यधिक पानी लेने वाली फसल है। भारत पहले से ही कई राज्यों में भूजल संकट का सामना कर रहा है। यदि एथनॉल उत्पादन मुख्यतः गन्ने पर आधारित रहेगा, तो जल प्रबंधन की चुनौती और बढ़ सकती है। इसलिए विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भविष्य में कृषि अवशेषों और दूसरी पीढ़ी के जैव-ईंधनों को अधिक बढ़ावा दिया जाए।
भारत में नई कारों और दोपहिया वाहनों को धीरे-धीरे ई-20 के अनुरूप बनाया जा रहा है। यदि किसी उपभोक्ता ने पिछले कुछ वर्षों में नया वाहन खरीदा है, तो उसके लिए चिंता अपेक्षाकृत कम है। लेकिन पुराने वाहन मालिकों को अपने वाहन निर्माता की सलाह के अनुसार ही ईंधन का उपयोग करना चाहिए और समय-समय पर वाहन की सर्विस कराते रहना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि ई-20 कार्यक्रम अभी भी एक प्रकार का प्रायोगिक चरण है और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन जारी है। इससे स्पष्ट है कि सरकार स्वयं भी इस नीति के परिणामों पर लगातार नजर रखे हुए है।
वास्तव में एथनॉल मिश्रित पेट्रोल न तो कोई चमत्कारी समाधान है और न ही ऐसी नीति जिसे पूरी तरह खारिज कर दिया जाए। ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य इसके पक्ष में हैं। वहीं माइलेज, पुराने वाहनों की अनुकूलता, जल संकट और खाद्य सुरक्षा जैसे प्रश्न इसके सामने चुनौती बनकर खड़े हैं।
भारत को ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों से सीख लेते हुए अपनी परिस्थितियों के अनुरूप संतुलित नीति अपनानी होगी। उपभोक्ताओं को सही जानकारी देना, वाहनों की तकनीकी तैयारी सुनिश्चित करना, जल संरक्षण पर ध्यान देना और कृषि नीति में संतुलन बनाए रखना इस कार्यक्रम की सफलता की शर्तें हैं। यदि ऐसा किया गया, तो एथनॉल मिश्रित पेट्रोल भारत की ऊर्जा यात्रा में मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। लेकिन यदि इन चुनौतियों की उपेक्षा की गई, तो यही नीति भविष्य में नए विवादों और समस्याओं का कारण भी बन सकती है। इसलिए आवश्यकता किसी अंध-समर्थन या अंध-विरोध की नहीं, बल्कि तथ्यों, विज्ञान और दूरदर्शिता के आधार पर आगे बढ़ने की है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


सोमवार, 29 जून 2026

गाजियाबाद के सिटीजन चार्टर का सच

 विशेष लेख-

यदि आपकी गली का सीवर जाम हो जाए, स्ट्रीट लाइट खराब हो जाए या कई दिनों तक कूड़ा न उठे, तो क्या आपको पता है कि नगर निगम को इसे कितने दिनों में ठीक करना चाहिए? अधिकांश नागरिक इसका उत्तर नहीं जानते। जबकि इसके लिए बाकायदा ‘सिटीजन चार्टर’ बना हुआ है, जिसमें हर सेवा की समय-सीमा तय है। सवाल यह है कि क्या इन समय-सीमाओं का पालन भी हो रहा है? यही है सिटीजन चार्टर का सच। सरकारी कार्यालयों में वर्षों तक आम नागरिक की सबसे बड़ी शिकायत रही है-‘आज नहीं, कल आइए’, ‘फाइल चल रही है’, ‘साहब मीटिंग में हैं।’ इन समस्याओं से निजात दिलाने के उद्देश्य से सिटीजन चार्टर की अवधारणा सामने आई। इसका उद्देश्य था कि सरकार स्वयं यह घोषित करे कि कौन-सी सेवा कितने समय में उपलब्ध कराई जाएगी और यदि निर्धारित अवधि में सेवा नहीं मिलती है, तो संबंधित अधिकारी जवाबदेह होगा।
गाजियाबाद में नगर निगम ने लगभग दो दशक पहले सिटीजन चार्टर लागू किया और बाद में इसे उत्तर प्रदेश सरकार की समयबद्ध सेवा व्यवस्था के अनुरूप और व्यवस्थित बनाया गया। आज नगर निगम के अलावा जिला प्रशासन, तहसील, राजस्व, खाद्य एवं रसद, समाज कल्याण, परिवहन, विद्युत तथा अन्य विभाग भी नागरिक सेवाओं के लिए समय-सीमा निर्धारित करने का दावा करते हैं। लेकिन नगर निगम का सिटीजन चार्टर सबसे विस्तृत और स्पष्ट रूप में उपलब्ध है।
चार्टर के अनुसार सड़क, नाली और सार्वजनिक स्थानों की सफाई, कूड़ा न उठने, सीवर जाम, गंदे पेयजल और स्ट्रीट लाइट खराब होने जैसी शिकायतों का निस्तारण 24 घंटे के भीतर होना चाहिए। सड़क पर गड्ढा भरने के लिए चार दिन, सड़क और नाली की मरम्मत के लिए सात दिन, अस्थायी अतिक्रमण हटाने के लिए पाँच दिन, स्थायी अतिक्रमण पर कार्रवाई के लिए दस दिन, सड़क पर सीवर का पानी भरने की समस्या के लिए तीन दिन, सीवर लाइन की मरम्मत के लिए 15 दिन, नामांतरण (म्यूटेशन) के लिए 45 दिन, जबकि संपत्ति कर एवं ट्रेड लाइसेंस संबंधी मामलों के लिए लगभग 48 दिन की समय-सीमा निर्धारित की गई है। यदि इन समय-सीमाओं का ईमानदारी से पालन हो, तो नागरिकों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता ही न पड़े। लेकिन जमीनी हकीकत इससे कुछ अलग दिखाई देती है।
पिछले दस वर्षों में गाजियाबाद में सबसे अधिक शिकायतें सफाई, कूड़ा उठान, सीवर जाम, जलभराव, गंदे पेयजल, स्ट्रीट लाइट, अतिक्रमण, आवारा पशुओं और संपत्ति कर से संबंधित रही हैं। हर मानसून में जलभराव और सीवर की समस्या सुर्खियाँ बनती है। कई इलाकों में सफाई और कूड़ा उठान को लेकर स्थानीय निवासी बार-बार शिकायत दर्ज कराते हैं। नगर निगम ने मोबाइल ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, हेल्पलाइन और जनसुनवाई जैसी डिजिटल व्यवस्थाएँ शुरू की हैं, जिससे शिकायत दर्ज कराना पहले की तुलना में आसान हुआ है। यह एक सकारात्मक बदलाव है।
फिर भी सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता का है। यदि किसी नागरिक से पूछा जाए कि पिछले दस वर्षों में नगर निगम को कुल कितनी शिकायतें मिलीं, उनमें से कितनी निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित हुईं, कितनी अभी भी लंबित हैं और कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, तो इसका स्पष्ट उत्तर उपलब्ध नहीं है। विभिन्न विभाग अपने-अपने स्तर पर आँकड़े रखते हैं, लेकिन पूरे जिले का समेकित सिटीजन चार्टर रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक नहीं किया जाता। जब तक परिणाम जनता के सामने नहीं होंगे, तब तक किसी भी व्यवस्था की सफलता का निष्पक्ष मूल्यांकन संभव नहीं है।
रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए), व्यापारी संगठन और सामाजिक संस्थाएँ समय-समय पर यह शिकायत उठाती रही हैं कि कई मामलों में शिकायतों का समाधान केवल कागजों में दिखा दिया जाता है, जबकि वास्तविक समस्या बनी रहती है। कुछ नागरिकों का कहना है कि उन्हें एक ही शिकायत कई बार दर्ज करनी पड़ती है। विशेषकर सीवर, सफाई, जलभराव और स्ट्रीट लाइट जैसी समस्याओं में यह शिकायत अक्सर सुनने को मिलती है। उनका मानना है कि यदि निर्धारित समय-सीमा का पालन नहीं होता, तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
दूसरी ओर प्रशासन का पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि पहले की तुलना में शिकायत निस्तारण व्यवस्था कहीं अधिक पारदर्शी हुई है। ऑनलाइन जनसुनवाई, मोबाइल ऐप और नियमित समीक्षा बैठकों के माध्यम से शिकायतों की निगरानी की जाती है। उनका दावा है कि अधिकांश शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण किया जाता है और जिन मामलों में देरी होती है, उनकी समीक्षा कर आवश्यक निर्देश दिए जाते हैं। प्रशासन का यह भी कहना है कि डिजिटल तकनीक के कारण अब शिकायतों की ट्रैकिंग संभव हो गई है और जवाबदेही पहले से बेहतर हुई है।
जनप्रतिनिधियों की राय भी इस मुद्दे पर विचारणीय है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों इस बात पर सहमत हैं कि सिटीजन चार्टर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्था है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब इसका पूरी ईमानदारी से पालन हो। कई पार्षद नगर निगम की बैठकों में यह मुद्दा उठा चुके हैं कि शिकायतों का केवल ऑनलाइन निस्तारण दिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौके पर समस्या का वास्तविक समाधान होना चाहिए। विधायकों और जनप्रतिनिधियों ने भी समय-समय पर सफाई, सीवर, जलभराव और अतिक्रमण जैसी समस्याओं पर अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
दरअसल, सिटीजन चार्टर केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि सरकार और नागरिक के बीच विश्वास का एक अनुबंध है। यदि सरकार स्वयं यह घोषणा करती है कि अमुक सेवा एक दिन, तीन दिन या सात दिन में उपलब्ध होगी, तो नागरिक को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह उस समय-सीमा का पालन न होने पर जवाब मांग सके। दुर्भाग्य से आज भी अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं है कि उनके अधिकार क्या हैं और शिकायत के निस्तारण की तय समय-सीमा क्या है।
समय आ गया है कि प्रत्येक विभाग हर महीने अपनी वेबसाइट पर यह प्रकाशित करे कि कितनी शिकायतें प्राप्त हुईं, कितनी निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित हुईं, कितनी लंबित हैं और किन मामलों में अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। इससे न केवल प्रशासन की जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा। इसके साथ ही प्रत्येक सरकारी कार्यालय में सिटीजन चार्टर को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाना चाहिए और नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए।
गाजियाबाद जैसे तेजी से विकसित हो रहे महानगर में सुशासन की पहचान केवल चैड़ी सड़कों, ऊँची इमारतों और नई परियोजनाओं से नहीं होगी, बल्कि इस बात से होगी कि एक सामान्य नागरिक की शिकायत कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से सुनी और सुलझाई जाती है। सिटीजन चार्टर इसी कसौटी का नाम है।
सरकारी सेवाएँ किसी की कृपा नहीं, बल्कि नागरिक का संवैधानिक अधिकार हैं। यदि सिटीजन चार्टर केवल दीवार पर टंगा एक पोस्टर बनकर रह जाए, तो उसका कोई अर्थ नहीं। लेकिन यदि उसकी हर समय-सीमा का पालन हो, हर शिकायत का वास्तविक समाधान मिले और हर अधिकारी अपनी जवाबदेही स्वीकार करे, तभी कहा जा सकेगा कि सिटीजन चार्टर का सच वास्तव में नागरिक के पक्ष में खड़ा है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 23 जून 2026

कोचिंग सेंटरों में अग्निकांड

 आवश्यक लेख-

शिक्षा के मंदिर या मौत के जाल?
22 जून 2026 को लखनऊ के अलीगंज स्थित एक व्यावसायिक भवन में संचालित कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हादसे में कम से कम 15 लोगों की जान चली गई, जिनमें अधिकांश छात्र थे। कई छात्र जान बचाने के लिए पहली मंजिल से कूद पड़े। यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम भी थी। यह पहला अवसर नहीं है। पिछले दस वर्षों में देश के अनेक कोचिंग संस्थानों में आग लगने की घटनाओं ने दर्जनों छात्रों की जान ली है और सैकड़ों को घायल किया है। हर घटना के बाद जांच, आदेश और आश्वासन मिलते हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है। भारत सरकार के पास केवल कोचिंग सेंटरों में लगी आग का अलग राष्ट्रीय डेटाबेस उपलब्ध नहीं है, लेकिन प्रमुख घटनाओं का अध्ययन बताता है कि पिछले दस वर्षों में 15 से अधिक बड़ी आग की घटनाएँ सामने आईं। इनमें कम से कम 37-40 लोगों की मृत्यु हुई और 100 से अधिक छात्र घायल या झुलसे। वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि छोटे शहरों की अनेक घटनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज नहीं हो पातीं।
प्रमुख घटनाएँ
सूरत (2019)-तक्षशिला आर्केड के कोचिंग सेंटर में आग लगने से 22 छात्रों की मृत्यु हुई। जांच में सामने आया कि भवन में फायर एनओसी नहीं थी, लकड़ी की सीढ़ियाँ थीं और आपातकालीन निकास का अभाव था। तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया।
दिल्ली, मुखर्जी नगर (2023)-बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगने पर छात्र रस्सियों और बिजली के तारों के सहारे नीचे उतरे। 61 छात्र घायल हुए। घटना के बाद उच्च न्यायालय ने सुरक्षा ऑडिट के आदेश दिए।
नागपुर (2026)-एक कोचिंग संस्थान में आग लगने के बाद जांच में पता चला कि भवन में आवश्यक फायर सुरक्षा उपकरण ही नहीं थे। लगभग 150 छात्र बाल-बाल बचे।
लखनऊ (2026)-नवीनतम हादसे में 15 लोगों की मौत ने एक बार फिर देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हमारे कोचिंग संस्थान वास्तव में सुरक्षित हैं।
कितने कोचिंग सेंटर
भारत में कोचिंग उद्योग आज लगभग 60-70 हजार करोड़ रुपये का बाजार बन चुका है। विभिन्न उद्योग अध्ययनों के अनुसार देश में लगभग 1 से 1.5 लाख छोटे-बड़े कोचिंग संस्थान संचालित हैं। इनमें से बड़ी संख्या स्थानीय स्तर पर संचालित होती है, जिनका समुचित पंजीकरण या नियमित सुरक्षा निरीक्षण नहीं होता।
अवैध संचालन कितना बड़ा संकट?
दिल्ली में मुखर्जी नगर अग्निकांड के बाद किए गए निरीक्षणों में पाया गया कि अधिकांश संस्थानों में गंभीर कमियाँ थीं। सुरक्षा ऑडिट में संकरे प्रवेश-द्वार, आपातकालीन निकास का अभाव, फायर अलार्म और स्प्रिंकलर न होना तथा क्षमता से अधिक छात्रों को बैठाना जैसी अनियमितताएँ मिलीं। इसके बाद जुलाई 2024 से फरवरी 2026 तक चलाए गए अभियान में 89 कोचिंग सेंटर सील किए गए। 505 कोचिंग सेंटरों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। कुल 370 प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई हुई। लखनऊ हादसे के बाद कानपुर में भी 16 कोचिंग सेंटर सील कर दिए गए और 22 अन्य के विरुद्ध कार्रवाई शुरू हुई।
आखिर आग क्यों लगती है?
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश मामलों में कारण लगभग समान हैं। ओवरलोड विद्युत व्यवस्था और शॉर्ट सर्किट। बिना फायर एनओसी संचालन। बेसमेंट या अवैध मंजिलों में कक्षाएँ। केवल एक प्रवेश और निकास मार्ग। संकरी सीढ़ियाँ। अग्निशमन उपकरणों का अभाव। क्षमता से अधिक छात्रों की भीड़। नियमित सुरक्षा ऑडिट न होना।
सरकार कहाँ चूकी?
सरकारों ने नियम बनाए, लेकिन उनका पालन कराने में गंभीर कमी रही। सबसे बड़ी विफलताएँ रहीं-बिना अनुमति संस्थानों का वर्षों तक संचालन। नगर निगम, विकास प्राधिकरण और अग्निशमन विभाग के बीच समन्वय का अभाव। शिकायतों पर समय पर कार्रवाई न होना। राजनीतिक और स्थानीय दबाव में निरीक्षणों की अनदेखी। दुर्घटना के बाद ही अभियान चलाना। यही कारण है कि लगभग हर बड़ी दुर्घटना के बाद वही कमियाँ दोबारा सामने आती हैं।
सरकार ने क्या प्रयास किए
हाल के वर्षों में कई राज्यों ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए हैं- विशेष फायर सेफ्टी ऑडिट। अवैध संस्थानों की सीलिंग। संयुक्त निरीक्षण दलों का गठन। जिम्मेदार अधिकारियों का निलंबन। संचालकों के विरुद्ध एफआईआर और गिरफ्तारी। फायर सुरक्षा नियमों को और सख्ती से लागू करने की पहल। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ये कदम अधिकतर दुर्घटना के बाद उठाए जाते हैं, न कि पहले।
विशेषज्ञों की राय
आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों और अग्नि सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि अब केवल दिशा निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। वे सुझाव देते हैं-प्रत्येक कोचिंग सेंटर का अनिवार्य पंजीकरण हो। फायर एनओसी के बिना संचालन पूरी तरह प्रतिबंधित हो। हर भवन में कम-से-कम दो आपातकालीन निकास अनिवार्य हों। प्रत्येक छह माह में स्वतंत्र फायर ऑडिट कराया जाए। बेसमेंट में कक्षाएँ पूर्णतः प्रतिबंधित हों। छात्र संख्या के अनुसार भवन क्षमता तय हो। नियमों का उल्लंघन करने पर केवल संचालक ही नहीं, संबंधित अधिकारियों की भी व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो। छात्रों के लिए नियमित मॉक ड्रिल और आपदा प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।
कोचिंग सेंटर आज लाखों युवाओं के भविष्य का आधार हैं, लेकिन यदि वे स्वयं सुरक्षित नहीं हैं तो यह व्यवस्था गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। सूरत से लेकर मुखर्जी नगर और अब लखनऊ तक हर त्रासदी ने यही संदेश दिया है कि दुर्घटनाएँ केवल आग से नहीं होतीं, बल्कि नियमों की अनदेखी, प्रशासनिक ढिलाई और लालच से भी होती हैं। यदि अब भी कठोर और स्थायी सुधार नहीं किए गए, तो अगली त्रासदी केवल समय का प्रश्न होगी। शिक्षा का उद्देश्य भविष्य बनाना है, उसे छात्रों के लिए जोखिम का पर्याय नहीं बनने दिया जा सकता।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

सोमवार, 22 जून 2026

संवेदना के स्वर महाकवि डॉ. कुंअर बेचैन

 एक जुलाई जन्मदिन पर विशेष लेख-

‘हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए,
ज़िंदगी भोर है, सूरज से निकलते रहिए।’

इन दो पंक्तियों में महाकवि डॉ. कुंअर बेचैन का समूचा जीवन-दर्शन समाया हुआ है। निराशा के अंधकार में आशा का दीप जलाना, टूटते हुए मनुष्य को जीने का साहस देना और संवेदनाओं को शब्दों की गरिमा प्रदान करना, यही उनकी रचनात्मक साधना का मूल स्वर था। 1 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जनपद के उमरी गाँव में जन्मे डॉ. कुंअर बेचैन (वास्तविक नाम डॉ. कुंअर बहादुर सक्सेना) ने हिंदी कविता, गीत और गजल को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। वे लंबे समय तक गाजियाबाद के एम.एम.एच. कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे और देश-विदेश के कवि सम्मेलनों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। डॉ. कुंअर बेचैन का साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा का संगीत है। उन्होंने प्रेम को केवल निजी अनुभूति नहीं माना, बल्कि उसे मनुष्य और समाज के बीच विश्वास का सेतु बनाया। उनकी कविता में गाँव की मिट्टी की सोंधी गंध भी है और महानगर की बेचैनी भी। उनके गीतों में प्रकृति की कोमलता है तो गजलों में समय की तल्ख सच्चाइयों का साहसिक बयान। वे मानते थे कि कविता का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना भी है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं, जितनी अपने समय में थीं।
‘उसने फेंके मुझपे पत्थर और मैं पानी की तरह,
और ऊँचा, और ऊँचा, और ऊँचा हो गया।’

यह शेर केवल प्रतिकूल परिस्थितियों का उत्तर नहीं, बल्कि उनके जीवन-दर्शन का परिचय भी है। संघर्ष उनके जीवन में भी कम नहीं थे, किंतु उन्होंने विषमताओं को अपनी रचनात्मक ऊर्जा में बदल दिया। शायद यही कारण है कि उनकी कविता शिकायत नहीं करती, बल्कि जीवन का हाथ थामकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
डॉ. कुंअर बेचैन ने हिंदी मंचीय कविता को अभूतपूर्व गरिमा प्रदान की। वे उन विरले कवियों में थे, जिनकी लोकप्रियता कभी उनकी साहित्यिक गुणवत्ता पर भारी नहीं पड़ी। वे जब मंच पर आते थे तो शब्द अभिनय नहीं करते थे, बल्कि हृदय बोलता था। उनकी वाणी में विनम्रता थी, प्रस्तुति में सहजता और भावों में ऐसी आत्मीयता कि श्रोता स्वयं को कविता का हिस्सा महसूस करने लगते थे।
उनकी गजलों का एक बड़ा गुण उनकी संप्रेषणीयता है। वे कठिन से कठिन भाव को भी अत्यंत सरल भाषा में व्यक्त कर देते थे। इसलिए उनका साहित्य विश्वविद्यालयों के शोध का विषय भी बना और सामान्य पाठकों की प्रिय धरोहर भी। डॉ. कुंअर बेचैन केवल बड़े कवि नहीं थे, वे बड़े मनुष्य भी थे। साहित्य-जगत में उनकी पहचान एक स्नेही मार्गदर्शक के रूप में थी। असंख्य युवा कवियों को उन्होंने प्रोत्साहन दिया। मंच साझा करते समय वे नए रचनाकारों को उतना ही सम्मान देते थे, जितना वरिष्ठों को। यही कारण है कि उनके शिष्यों और प्रशंसकों का विशाल परिवार आज भी उन्हें केवल कवि नहीं, बल्कि एक संस्कार के रूप में याद करता है। उनकी रचनाओं में रिश्तों की ऊष्मा बार-बार दिखाई देती है। वे जानते थे कि आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी संवेदनाओं का क्षरण है। इसलिए उनकी कविताएँ मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं।
‘उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे,
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे।’

इन पंक्तियों में केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक संबंधों की पूरी कहानी छिपी है। यही उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे व्यक्तिगत अनुभव को सामाजिक संवेदना में बदल देते थे। डॉ. कुंअर बेचैन ने गीत, नवगीत, गजल, दोहा, कविता, उपन्यास और आलोचना, लगभग सभी विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया। उनकी अनेक कृतियाँ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने साहित्य को किसी विचारधारा की सीमाओं में नहीं बाँधा। उनके लिए मनुष्य सबसे बड़ा सत्य था और संवेदना सबसे बड़ा धर्म। आज जब समाज संवाद से अधिक विवाद में उलझा दिखाई देता है, जब तकनीक ने निकटता तो बढ़ाई है पर आत्मीयता कम कर दी है, तब डॉ. कुंअर बेचैन की कविताएँ हमें फिर से मनुष्य बनने का पाठ पढ़ाती हैं। उनकी रचनाएँ बताती हैं कि प्रेम, विश्वास, करुणा और सह-अस्तित्व केवल साहित्यिक शब्द नहीं, बल्कि सभ्यता की आधारशिलाएँ हैं।
उनकी भाषा का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी सहजता है। वे अलंकारों के मोह में नहीं उलझते, बल्कि सीधे हृदय तक पहुँचते हैं। यही कारण है कि उनकी पंक्तियाँ वर्षों बाद भी स्मृति में जीवित रहती हैं। उनकी कविता पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई आत्मीय व्यक्ति जीवन का अनुभव साझा कर रहा हो। 29 अप्रैल 2021 को उनका शारीरिक अवसान हुआ, किंतु कवि कभी नहीं मरता। वह अपनी रचनाओं में जीवित रहता है। आज भी देशभर के कवि सम्मेलन, साहित्यिक गोष्ठियाँ और युवा रचनाकार उनकी पंक्तियों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। गाजियाबाद की साहित्यिक पहचान का उल्लेख उनके बिना अधूरा माना जाता है। उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस संवेदनशील भारतीय मन को प्रणाम करना है जिसने कविता को जीवन की धड़कनों से जोड़ा। उनकी रचनाएँ हमें सिखाती हैं कि शब्द तभी सार्थक हैं जब वे मनुष्य के आँसू पोंछ सकें, उसके चेहरे पर मुस्कान ला सकें और अँधेरे समय में आशा का दीप जला सकें। और शायद इसलिए उनकी ये पंक्तियाँ आज भी हर पीढ़ी के लिए एक संदेश बनकर गूँजती हैं-
‘यह दुनिया सूखी मिट्टी है
तू प्यार के छींटें देता चल।’

डॉ. कुंअर बेचैन का साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल काव्य-संपदा नहीं, बल्कि संवेदना, संस्कृति और मनुष्यता की अमूल्य विरासत है। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उन्हें हिंदी साहित्य के आकाश में सदैव प्रकाशित रखने वाली ज्योति।


लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


गुरुवार, 18 जून 2026

आस्था पर डाका

 लेख-

धार्मिक स्थलों में चढ़ावे की चोरी और गबन के बढ़ते मामले
भारत में धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालु केवल धन नहीं चढ़ाते, बल्कि अपनी आस्था, विश्वास और मनोकामनाएँ भी समर्पित करते हैं। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च और अन्य धार्मिक संस्थाओं में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। लेकिन पिछले एक दशक में अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें इसी चढ़ावे की चोरी, गबन या वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। यह समस्या किसी एक धर्म या देश तक सीमित नहीं है, भारत से लेकर सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड और अमेरिका तक ऐसे मामलों ने लोगों का विश्वास झकझोरा है।
अयोध्या राम मंदिर-करोड़ों के चढ़ावे पर सवाल
जून 2026 में देश के सबसे चर्चित धार्मिक स्थल, राम मंदिर अयोध्या, में चढ़ावे के कथित गबन का मामला सामने आया। आरोपों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन सदस्यीय विशेष जांच दल लीनी एसआईटी गठित किया। जांच में ट्रस्ट सदस्यों, कर्मचारियों और नकदी गिनने की व्यवस्था से जुड़े लोगों से पूछताछ की गई। फिलहाल जांच जारी है और किसी अदालत ने अभी तक किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया है। इसलिए इसे अभी केवल आरोप और जांच का मामला माना जाएगा।
तिरुपति में कर्मचारी पर चोरी का आरोप
देश के सबसे समृद्ध मंदिरों में गिने जाने वाले तिरुमला तिरुपति देवस्थानम में भी दान गिनने वाले विभाग (पराकामनी) के एक कर्मचारी पर नकदी चोरी का आरोप लगा। सीसीटीवी और आंतरिक जांच के आधार पर कार्रवाई हुई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि अत्याधुनिक व्यवस्था वाले संस्थानों में भी निगरानी की निरंतर आवश्यकता है।
बेंगलुरु का गली आंजनेय स्वामी मंदिर
2025 में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में मंदिर कर्मचारियों पर दान राशि निकालने के आरोप लगे। जांच में वित्तीय अनियमितताएँ सामने आने के बाद कर्नाटक सरकार ने मंदिर का प्रशासन अपने नियंत्रण में ले लिया। जांच में वर्षों तक लेखा-जोखा ठीक से न रखने और दान राशि के प्रबंधन में गंभीर कमियाँ पाई गईं।
स्वरवेद महामंदिर का मामला
वाराणसी स्थित स्वरवेद महामंदिर में एक लेखाकार पर लगभग 60 लाख रुपये के गबन का आरोप लगा। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर आपराधिक विश्वासघात और जालसाजी जैसी धाराओं में मामला दर्ज किया। यह मामला बताता है कि धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय नियंत्रण और ऑडिट कितना आवश्यक है।
छोटे मंदिर भी सुरक्षित नहीं
मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और कर्नाटक सहित अनेक राज्यों में दानपात्र तोड़कर नकदी चोरी करने की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। कई मामलों में सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जबकि कुछ मामलों में चोरी की गई राशि भी बरामद हुई।
सबरीमला में सोने की अनियमितताओं की जांच
केरल के प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर में स्वर्ण-मंडित संरचनाओं से जुड़े कथित सोना गबन और वित्तीय अनियमितताओं की जांच ने भी व्यापक ध्यान आकर्षित किया। अदालत की निगरानी में जांच एजेंसियों ने कई पहलुओं की पड़ताल की। मामला अभी विभिन्न जांचों और न्यायिक प्रक्रियाओं में है।
विदेशों के चर्चित मामले
सिंगापुर-
सिटी हार्वेस्ट चर्च-सिंगापुर के प्रसिद्ध सिटी हार्वेस्ट चर्च में चर्च निधि के दुरुपयोग का मामला विश्वभर में चर्चा का विषय बना। चर्च के संस्थापक और अन्य अधिकारियों को दोषी ठहराया गया तथा उन्हें कारावास की सजा सुनाई गई। यह धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय जवाबदेही का बड़ा उदाहरण माना जाता है।
दक्षिण कोरिया-दक्षिण कोरिया के योइदो फुल गॉस्पेल चर्च से जुड़े वित्तीय गबन के मामले में चर्च नेतृत्व के विरुद्ध कार्रवाई हुई। अदालत ने दोषसिद्धि के बाद कारावास (कुछ मामलों में निलंबित) और आर्थिक दंड भी लगाया।
थाईलैंड-2017 से शुरू हुई थाई टेंपल फ्रॉड जांच में सरकारी अनुदानों और मंदिरों के धन के दुरुपयोग के आरोपों में कई वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं और अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई। जांच के बाद कानूनों में भी बदलाव किए गए ताकि वित्तीय निगरानी मजबूत हो सके।
अमेरिका-अमेरिका में भी पिछले दशक में अनेक चर्चों के पादरियों और वित्तीय अधिकारियों पर दान राशि के गबन के मामले दर्ज हुए। कई मामलों में अदालतों ने जेल, जुर्माना और धन की वसूली के आदेश दिए।
क्यों बढ़ रहे हैं ऐसे मामले
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं-
नकद चढ़ावे की बड़ी मात्रा।
नियमित स्वतंत्र ऑडिट का अभाव।
ट्रस्टों में पारदर्शिता की कमी।
सीमित तकनीकी निगरानी।
एक ही व्यक्ति या छोटे समूह के हाथों में वित्तीय नियंत्रण।
क्या कहता है कानून
भारत में यदि धार्मिक स्थल की दान राशि की चोरी या गबन सिद्ध होता है तो भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत चोरी, आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी और जालसाजी जैसी धाराओं में कार्रवाई की जा सकती है। अपराध की प्रकृति और राशि के अनुसार जुर्माना, संपत्ति की जब्ती और कई वर्षों के कारावास तक का प्रावधान है।
समाधान क्या है
विशेषज्ञ धार्मिक संस्थानों में निम्न सुधारों की सलाह देते हैं-
प्रत्येक दानपात्र पर 24×7 सीसीटीवी निगरानी।
नकद के स्थान पर डिजिटल दान को बढ़ावा।
वार्षिक स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करना।
ट्रस्टों की आय-व्यय वेबसाइट पर प्रकाशित करना।
नकदी गिनती में बहुस्तरीय निगरानी और बैंकिंग प्रणाली का उपयोग।
समय-समय पर सामाजिक और सरकारी लेखा परीक्षण।
धार्मिक संस्थाएँ केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं, बल्कि समाज के विश्वास की धुरी भी हैं। जब चढ़ावे की चोरी या गबन के मामले सामने आते हैं, तो आर्थिक नुकसान से अधिक आस्था को चोट पहुँचती है। इसलिए धार्मिक संस्थानों के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और आधुनिक वित्तीय प्रबंधन अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


न विजन, न मिशन, एजुकेशन बनी धंधा!

 लेख-

बीस वर्षों में बदलती शिक्षा व्यवस्था की पड़ताल
कभी शिक्षा को समाज निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता था। गुरु-शिष्य परंपरा से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, संस्कार और राष्ट्र निर्माण था। लेकिन पिछले दो दशकों में शिक्षा के स्वरूप में ऐसा परिवर्तन आया है कि आज अक्सर यह सवाल पूछा जाने लगा है ‘क्या शिक्षा सेवा है या व्यवसाय?’, यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेश ने अभूतपूर्व विस्तार किया है, वहीं बढ़ती फीस, फर्जी संस्थानों, प्रवेश घोटालों और परीक्षा-पत्र लीक जैसी घटनाओं ने व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाए हैं।
साल 2005 के बाद भारत में निजी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी। उच्च शिक्षा में आज अधिकांश नामांकन निजी संस्थानों में होता है। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, चिकित्सा, नर्सिंग, फार्मेसी और व्यावसायिक शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथों में है। सरकार की सीमित क्षमता और बढ़ती मांग के बीच निजी निवेश ने लाखों विद्यार्थियों को अवसर उपलब्ध कराए। आधुनिक प्रयोगशालाएँ, डिजिटल कक्षाएँ, उद्योग आधारित पाठ्यक्रम और बेहतर आधारभूत सुविधाएँ निजी संस्थानों की बड़ी उपलब्धियाँ मानी जाती हैं। लेकिन इसी दौर में शिक्षा के बाजारीकरण की आलोचना भी तेज हुई। कई निजी संस्थानों पर मनमानी फीस वसूलने, शिक्षकों को कम वेतन देने, प्लेसमेंट के बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने और गुणवत्ता से समझौता करने के आरोप लगे। अनेक राज्यों में अभिभावकों ने फीस वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन किए और सरकारों को फीस नियमन संबंधी कानून बनाने पड़े।
घटनाक्रम जिन्होंने व्यवस्था पर सवाल खड़े किए
पिछले बीस वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था की साख को प्रभावित किया-
वर्ष 2009 में लागू शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम ने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया। इससे शिक्षा का दायरा बढ़ा, लेकिन निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच गुणवत्ता की बहस भी तेज हुई।
वर्ष 2010-2015 के दौरान देश के अनेक राज्यों में फर्जी विश्वविद्यालयों और बिना मान्यता वाले संस्थानों के मामले सामने आए। समय-समय पर नियामक संस्थाओं ने ऐसे संस्थानों की सूची जारी कर विद्यार्थियों को सतर्क किया।
वर्ष 2016 में निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश और शुल्क व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हुई। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से नीट को एक समान प्रवेश परीक्षा के रूप में लागू किया गया। इससे कई अनियमितताओं पर अंकुश लगा, हालांकि नई चुनौतियाँ भी सामने आईं।
वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। ऑनलाइन शिक्षा सामान्य हो गई। निजी संस्थानों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी ने डिजिटल असमानता को उजागर कर दिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 लागू हुई, जिसने बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और लचीले पाठ्यक्रम की नई दिशा दी।
वर्ष 2023 और 2024 में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और विशेष रूप से नीट-यूजी 2024 और 2026 को लेकर उठे विवाद ने देशभर में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। लाखों छात्र और अभिभावक सड़कों पर उतरे। अदालतों तक मामले पहुँचे और सरकार को परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़े। यह स्पष्ट हुआ कि केवल संस्थान ही नहीं, बल्कि परीक्षा संचालन और नियामक तंत्र की मजबूती भी उतनी ही आवश्यक है।
निजी क्षेत्र का योगदान भी कम नहीं
यदि केवल नकारात्मक पक्ष देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रहेगी। देश के अनेक निजी विश्वविद्यालय और संस्थान शोध, नवाचार, स्टार्टअप संस्कृति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और उद्योग आधारित शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। कई निजी संस्थानों ने विदेशी विश्वविद्यालयों से समझौते किए, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएँ स्थापित कीं और विद्यार्थियों को वैश्विक अवसर उपलब्ध कराए। यही कारण है कि लाखों विद्यार्थी आज भी निजी संस्थानों को प्राथमिकता देते हैं।
फिर समस्या कहाँ है?
समस्या तब उत्पन्न होती है जब शिक्षा का उद्देश्य केवल लाभ कमाना रह जाता है। कई संस्थानों में शिक्षकों को अनुबंध पर कम वेतन पर रखा जाता है, जबकि विद्यार्थियों से लाखों रुपये फीस ली जाती है। कुछ संस्थानों में शोध केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। दूसरी ओर सरकारी संस्थानों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, रिक्त पद, धीमी नियुक्तियाँ और प्रशासनिक जटिलताएँ भी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। इसलिए दोष केवल किसी एक पक्ष का नहीं है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
प्रो. कृष्ण कुमार, पूर्व निदेशक, एनसीईआरटी, का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। उनके अनुसार यदि शिक्षा केवल बाजार की मांग के अनुसार ढल जाएगी तो उसका मानवीय पक्ष कमजोर पड़ जाएगा। शिक्षाविद् प्रो. अनिल सदगोपाल लंबे समय से शिक्षा के बढ़ते निजीकरण पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा को सामाजिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि केवल आर्थिक गतिविधि के रूप में। उनके अनुसार गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् प्रो. वाई. एस. राजन का मत था कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो नवाचार, अनुसंधान और रोजगार तीनों के बीच संतुलन स्थापित करे। केवल डिग्री आधारित शिक्षा देश को आगे नहीं ले जा सकती।
जिम्मेदार कौन?
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक संस्था या वर्ग में नहीं मिलता। सरकारों ने पर्याप्त सार्वजनिक निवेश नहीं किया, नियामक संस्थाएँ कई बार समय पर कार्रवाई नहीं कर सकीं, कुछ निजी संस्थानों ने शिक्षा को लाभ का माध्यम बना दिया और समाज ने भी कई बार केवल चमकदार परिसर और ऊँची फीस को गुणवत्ता का पर्याय मान लिया। परिणामस्वरूप शिक्षा का मूल उद्देश्य धीरे-धीरे पीछे छूटता गया।
आगे का रास्ता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने सुधार की दिशा अवश्य दिखाई है, लेकिन केवल नीति पर्याप्त नहीं होगी। नियमन में पारदर्शिता, शिक्षकों का सम्मानजनक वेतन, शोध को प्रोत्साहन, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, फर्जी संस्थानों पर कठोर कार्रवाई और फीस में संतुलन जैसे कदम समान रूप से आवश्यक हैं। शिक्षा को सेवा और उत्तरदायित्व दोनों के रूप में देखने की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने की है कि यदि शिक्षा केवल बाजार की वस्तु बन गई तो सबसे बड़ा नुकसान राष्ट्र के भविष्य का होगा। निजी क्षेत्र की ऊर्जा, सरकारी उत्तरदायित्व और समाज की अपेक्षाओं, इन तीनों के संतुलन से ही ऐसी शिक्षा व्यवस्था बन सकती है जो डिग्री ही नहीं, चरित्र, कौशल और नागरिकता भी गढ़े। यही भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 16 जून 2026

विकास की दौड़ में ढांचों की दरारें

 लेख-

डेढ़ दशक में रिकॉर्ड निर्माण, फिर क्यों टूट रहे हैं पुल, सड़कें और बांध?
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। नई सड़कें, एक्सप्रेसवे, पुल, सुरंगें, मेट्रो रेल और बांध विकास के प्रतीक बन चुके हैं। पिछले डेढ़ दशक में देश ने बुनियादी ढांचे के निर्माण में जो छलांग लगाई है, वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभूतपूर्व मानी जा रही है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पुलों के ढहने, सड़कों के धंसने और पुराने बांधों की सुरक्षा को लेकर उठते सवाल बता रहे हैं कि विकास की रफ्तार के साथ सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
रिकॉर्ड निर्माण का दशक
वर्ष 2014 में भारत का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क लगभग 91 हजार किलोमीटर था, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 1.46 लाख किलोमीटर हो गया। यानी करीब 61 प्रतिशत की वृद्धि। इसी अवधि में एक्सप्रेसवे नेटवर्क 93 किलोमीटर से बढ़कर 3 हजार किलोमीटर से अधिक हो गया। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, द्वारका एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और समृद्धि महामार्ग जैसी परियोजनाएं आधुनिक भारत की पहचान बन गई हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की गति 2013-14 में लगभग 12 किलोमीटर प्रतिदिन थी, जो बाद के वर्षों में बढ़कर 30 किलोमीटर प्रतिदिन से अधिक तक पहुंच गई। यह वृद्धि केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, व्यापार और रोजगार से भी सीधे जुड़ी हुई है।
पुलों का नया भारत
गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा और अन्य बड़ी नदियों पर अनेक विशाल पुल बने। बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वाेत्तर राज्यों में पुल निर्माण ने दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा। कई राज्यों में रेलवे ओवरब्रिज और फ्लाईओवरों के निर्माण ने यातायात दबाव कम किया। लेकिन जितनी तेजी से नए पुल बने, उतनी ही तेजी से पुराने पुलों की जर्जरता सामने आने लगी। पिछले कुछ वर्षों में पुलों के ढहने की घटनाओं ने विकास मॉडल पर सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2022 में गुजरात के मोरबी में मच्छु नदी पर बना झूला पुल टूट गया। इस हादसे में 141 लोगों की जान चली गई। मरम्मत के बाद कुछ ही दिनों में पुल का टूटना देश के लिए बड़ा झटका था।वर्ष 2018 में वाराणसी में निर्माणाधीन फ्लाईओवर गिरने से 18 लोगों की मौत हुई। उसी वर्ष कोलकाता का माजेरहाट पुल भी ढह गया। वर्ष 2025 में गुजरात के गम्भीरा पुल हादसे में 22 लोगों की मृत्यु हुई। इसके बाद राज्य सरकार ने 1,800 से अधिक पुलों का विशेष निरीक्षण कराया। विशेषज्ञों के अनुसार केवल दुर्घटनाएं ही समस्या नहीं हैं। असली समस्या यह है कि देश में हजारों पुल अपनी निर्धारित आयु के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं।
सड़कें बन रही हैं, टूट भी रही हैं
भारत में हर मानसून के दौरान सड़कों के धंसने और गड्ढों की खबरें सामान्य हो चुकी हैं। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, पटना, जयपुर और लखनऊ जैसे बड़े शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। भारतीय सड़क कांग्रेस से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क क्षति के प्रमुख कारण हैं-खराब ड्रेनेज व्यवस्था, निम्न गुणवत्ता की निर्माण सामग्री, भारी वाहनों का दबाव, रखरखाव में लापरवाही, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती अतिवृष्टि। सड़क बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उसे वर्षों तक सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखना कहीं अधिक कठिन कार्य है।
बांधों पर बढ़ती उम्र का दबाव
भारत में 5,700 से अधिक बड़े बांध हैं। इनमें से लगभग 250 बांध 100 वर्ष से अधिक पुराने हो चुके हैं। अगले दो दशकों में एक हजार से अधिक बांध ‘एजिंग इंफ्रास्ट्रक्चर’ की श्रेणी में पहुंच जाएंगे। बांध विशेषज्ञों का कहना है कि बांधों का टूटना दुर्लभ घटना है, लेकिन उनकी उम्र बढ़ने के साथ जोखिम भी बढ़ता है। इसलिए समय-समय पर संरचनात्मक जांच और सुरक्षा ऑडिट आवश्यक हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु की प्रसिद्ध भू-तकनीकी विशेषज्ञ जी माधवी लता का मानना है कि भारत में नई परियोजनाओं के निर्माण पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि रखरखाव को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिलती। कई सिविल इंजीनियरों का मत है कि पुलों की नियमित हेल्थ मॉनिटरिंग अनिवार्य की जानी चाहिए। जिस प्रकार मनुष्य का स्वास्थ्य परीक्षण होता है, उसी प्रकार पुलों और बांधों का भी समय-समय पर तकनीकी परीक्षण होना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार पहले जहां 50 वर्षों में एक बार आने वाली बाढ़ अब 10-15 वर्षों में देखने को मिल रही है। इससे पुलों की नींव और सड़कों की स्थिरता पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
सरकार ने क्या कदम उठाए?
1.इंडियन ब्रिज मैनेजमेंट सिस्टम-देश के लाखों पुलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया गया है। इससे पुलों की आयु, स्थिति और जोखिम का आकलन किया जा सकता है।
2.ड्रोन निगरानी-राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अब ड्रोन आधारित निरीक्षण प्रणाली का उपयोग कर रहा है। इससे छोटी-छोटी दरारों और क्षतियों का भी समय रहते पता लगाया जा सकता है।
3.डैम सेफ्टी एक्ट 2021-इस कानून के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बांध सुरक्षा संस्थाओं का गठन किया गया है। नियमित निरीक्षण और आपदा प्रबंधन योजना को अनिवार्य बनाया गया है।
4.स्ट्रक्चरल ऑडिट-कई राज्यों में 15 से 20 वर्ष से अधिक पुराने पुलों का विशेष ऑडिट कराया जा रहा है। जोखिम वाले पुलों पर भार सीमा निर्धारित की जा रही है।
दुनिया से क्या सीखें?
जापान, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में बड़ी संरचनाओं की डिजिटल निगरानी की जाती है। पुलों में सेंसर लगाए जाते हैं जो कंपन, झुकाव और दरारों की जानकारी तुरंत नियंत्रण केंद्र तक पहुंचाते हैं। भारत में भी अब स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में कदम बढ़ रहे हैं, लेकिन इसे व्यापक स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है।
डेढ़ दशक की तस्वीर
✔ राष्ट्रीय राजमार्ग: 91,000 किमी से बढ़कर 1.46 लाख किमी
✔ एक्सप्रेसवे नेटवर्क: 93 किमी से बढ़कर 3,000 किमी से अधिक
✔ बड़े बांध: 5,700 से अधिक
✔ 100 वर्ष से अधिक पुराने बांध: लगभग 250
✔ 2021-25 के बीच पुल दुर्घटनाएं: लगभग 170
✔ मोरबी हादसे में मृतक: 141
✔ गम्भीरा पुल हादसे में मृतक: 22
भारत विकास के उस दौर से गुजर रहा है जहां सड़कें, पुल और बांध केवल निर्माण परियोजनाएं नहीं, बल्कि आर्थिक प्रगति की जीवनरेखा हैं। लेकिन यदि रखरखाव, निरीक्षण और जवाबदेही को समान महत्व नहीं दिया गया तो विकास की यही संरचनाएं भविष्य में बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। देश को अब केवल कितना बनाया? से आगे बढ़कर कितना सुरक्षित रखा? का जवाब भी तलाशना होगा। क्योंकि मजबूत राष्ट्र केवल ऊंचे पुलों से नहीं, बल्कि सुरक्षित पुलों से बनता है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

सोमवार, 15 जून 2026

आइसक्रीम दवा नहीं, दावत है!

 आवश्यक लेख-

गर्मी का मौसम आते ही आइसक्रीम की बिक्री बढ़ जाती है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर वर्ग के लोगों की यह प्रिय मिठाई है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण एक प्रश्न बार-बार पूछा जाने लगा है-क्या आइसक्रीम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है? क्या इसे नियमित रूप से खाना चाहिए? और बाजार में उपलब्ध विभिन्न ब्रांडों में से कौन-सी आइसक्रीम अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा सकती है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने से पहले एक बात स्पष्ट कर लेना आवश्यक है कि आइसक्रीम कोई स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन या दवा नहीं है। यह मुख्यतः स्वाद और आनंद के लिए खाई जाने वाली वस्तु है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि ‘आइसक्रीम दवा नहीं, दावत है।’
आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट का अंतर
भारत में बहुत से लोग यह मानते हैं कि बाजार में मिलने वाली हर आइसक्रीम वास्तव में आइसक्रीम ही होती है, जबकि ऐसा नहीं है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के अनुसार ‘आइसक्रीम’ और ‘फ्रोजन डेजर्ट’ दो अलग-अलग श्रेणियाँ हैं। वास्तविक आइसक्रीम में दूध की वसा का प्रयोग किया जाता है, जबकि फ्रोजन डेजर्ट में वनस्पति वसा या वनस्पति तेल का उपयोग किया जा सकता है। इसलिए पैकेट पर आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट लिखा होना उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।
डॉक्टर क्या कहते हैं?
दिल्ली के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञों और पोषण विशेषज्ञों का सामान्य मत है कि आइसक्रीम का सबसे बड़ा स्वास्थ्य जोखिम उसमें मौजूद अतिरिक्त चीनी और संतृप्त वसा है। अत्यधिक चीनी का सेवन मोटापा, टाइप-2 मधुमेह, फैटी लीवर और दंत रोगों का जोखिम बढ़ा सकता है। वहीं संतृप्त वसा का अत्यधिक सेवन हृदय रोगों के जोखिम कारकों को प्रभावित कर सकता है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार समस्या आइसक्रीम के कभी-कभार सेवन से नहीं, बल्कि उसके नियमित और अधिक मात्रा में सेवन से उत्पन्न होती है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन मीठे पेय, मिठाइयाँ और आइसक्रीम का सेवन करता है, तो उसके शरीर में अतिरिक्त कैलोरी जमा होने लगती है, जिसका परिणाम मोटापे के रूप में सामने आता है।
आइसक्रीम में आखिर होता क्या है?
एक सामान्य आइसक्रीम में दूध, क्रीम, चीनी, दूध पाउडर, फ्लेवर, स्टेबलाइजर और इमल्सीफायर शामिल होते हैं। प्रीमियम श्रेणी की आइसक्रीम में दूध और क्रीम की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है, जबकि कम कीमत वाले उत्पादों में विभिन्न प्रकार के विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है। आइसक्रीम उद्योग में ‘ओवररन’ नामक एक तकनीक भी प्रयोग की जाती है, जिसमें आइसक्रीम में हवा मिलाई जाती है। यही कारण है कि एक लीटर आइसक्रीम का वास्तविक वजन कई बार अपेक्षा से कम होता है। अधिक हवा वाली आइसक्रीम हल्की और सस्ती पड़ती है, जबकि कम हवा वाली प्रीमियम आइसक्रीम अधिक गाढ़ी और समृद्ध स्वाद वाली होती है।
क्या आइसक्रीम के कोई लाभ भी हैं?
हाँ, सीमित मात्रा में खाई जाने वाली वास्तविक डेयरी आइसक्रीम कुछ पोषण भी प्रदान करती है। इसमें कैल्शियम, प्रोटीन और कुछ विटामिन होते हैं, जो दूध से प्राप्त होते हैं। लेकिन यह लाभ इतने अधिक नहीं हैं कि आइसक्रीम को स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन माना जाए। यदि कोई व्यक्ति केवल कैल्शियम प्राप्त करना चाहता है तो दूध, दही, छाछ और पनीर कहीं बेहतर विकल्प हैं।
बच्चों और युवाओं के लिए सावधानी
बाल रोग विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को पूरी तरह आइसक्रीम से वंचित करना भी उचित नहीं है, क्योंकि इससे उनके मन में इसके प्रति अनावश्यक आकर्षण पैदा हो सकता है। लेकिन नियमित रूप से बड़ी मात्रा में आइसक्रीम खिलाना भी सही नहीं है। सप्ताह में एक या दो बार सीमित मात्रा में आइसक्रीम पर्याप्त मानी जा सकती है। युवाओं में बढ़ती मोटापे की समस्या को देखते हुए डॉक्टर सलाह देते हैं कि आइसक्रीम को भोजन का विकल्प नहीं, बल्कि कभी-कभार मिलने वाले स्वादिष्ट व्यंजन के रूप में देखा जाना चाहिए।
कौन-सी आइसक्रीम चुनें?
यदि आप बाजार से आइसक्रीम खरीद रहे हैं तो कुछ बातों पर ध्यान दें-
1.पैकेट पर आइसक्रीम लिखा हो, केवल फ्रोजन डेजर्ट नहीं।
2.सामग्री सूची में दूध, क्रीम और मिल्क सॉलिड्स प्रमुख घटक हों।
3.चीनी की मात्रा कम हो तो बेहतर।
4.कृत्रिम रंग और फ्लेवर कम हों।
5.विश्वसनीय और गुणवत्ता नियंत्रण रखने वाले ब्रांड का चयन करें।
भारत में डेयरी आधारित आइसक्रीम उपलब्ध कराने वाले प्रमुख ब्रांडों में अमूल, मदर डेयरी, विरका, हेवमोर, वाडीलाल, क्वालिटी वाल्स  जैसे स्थापित नाम शामिल हैं। उपभोक्ताओं को किसी ब्रांड का चुनाव करने से पहले उसके लेबल और सामग्री सूची को अवश्य पढ़ना चाहिए। आइसक्रीम को लेकर सबसे बड़ी भूल यह है कि लोग इसे सामान्य खाद्य पदार्थ की तरह खाने लगते हैं। वास्तव में यह एक मिठाई है, जिसका उद्देश्य स्वाद और आनंद देना है, पोषण की पूर्ति करना नहीं। यदि आप स्वस्थ हैं, नियमित व्यायाम करते हैं और संतुलित भोजन लेते हैं, तो कभी-कभार एक स्कूप आइसक्रीम का आनंद लेने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन यदि आइसक्रीम आपकी दैनिक आदत बन जाए तो यही स्वाद धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकता है। इसलिए याद रखिए-आइसक्रीम दवा नहीं, दावत है। दावत का आनंद कभी-कभार लिया जाता है, रोज नहीं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


शनिवार, 13 जून 2026

ढाबे से फूड प्लाजा तक

 लेख-

हाईवे के ढाबे और रेस्टोरेंट स्वाद
का सफर या सुरक्षा की चुनौती?

भारत में सड़क यात्रा और ढाबों का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना राजमार्गों का इतिहास। कभी ट्रक चालकों और लंबी दूरी तय करने वाले यात्रियों की जरूरत के रूप में विकसित हुए ढाबे आज भारतीय खानपान संस्कृति की पहचान बन चुके हैं। मुरथल के परांठों से लेकर पंजाब की लस्सी, राजस्थान की दाल-बाटी और उत्तर प्रदेश के तंदूरी व्यंजनों तक, ढाबों ने न केवल यात्रियों की भूख मिटाई है बल्कि स्थानीय व्यंजनों को राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई है। दूसरी ओर, शहरों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधुनिक रेस्टोरेंट, फूड कोर्ट और हाईवे प्लाजा तेजी से बढ़े हैं, जिन्होंने यात्रा के दौरान भोजन की परंपरा को नया रूप दिया है। लेकिन पिछले एक दशक की तस्वीर केवल स्वाद और सुविधा की कहानी नहीं है। यह स्वच्छता, सुरक्षा, आगजनी, खाद्य गुणवत्ता, ढांचागत मजबूती और बदलती उपभोक्ता अपेक्षाओं की भी कहानी है।
बदलता हुआ हाईवे भारत
पिछले दस वर्षों में भारत के सड़क नेटवर्क में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। नए एक्सप्रेस-वे और राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के साथ हाईवे पर भोजनालयों का स्वरूप भी बदला है। पहले जहाँ अधिकांश ढाबे साधारण खाटों और खुले चूल्हों पर आधारित होते थे, वहीं अब अनेक ढाबे वातानुकूलित हॉल, डिजिटल भुगतान, बच्चों के खेलने की जगह और आधुनिक शौचालय जैसी सुविधाएँ देने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आय, पारिवारिक पर्यटन और निजी वाहनों की संख्या में वृद्धि ने ढाबों और रेस्टोरेंटों को अपनी सेवाएँ बेहतर करने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज कई प्रसिद्ध ढाबे छोटे उद्योगों का रूप ले चुके हैं और उनका वार्षिक कारोबार करोड़ों रुपये तक पहुँच गया है।
आखिर ढाबे इतने लोकप्रिय क्यों हैं?
ढाबों की सबसे बड़ी ताकत उनका स्वाद और आत्मीयता है। यात्रियों को घर जैसा भोजन, ताजा रोटियाँ और स्थानीय व्यंजन अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध हो जाते हैं। ट्रक चालक समुदाय के लिए तो ढाबे वर्षों से दूसरे घर की तरह रहे हैं। इसके अतिरिक्त, लंबी यात्रा के दौरान ढाबे विश्राम का भी अवसर प्रदान करते हैं। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि हर दो से तीन घंटे की ड्राइविंग के बाद कुछ समय का विश्राम दुर्घटनाओं की संभावना कम करता है। इस दृष्टि से ढाबे केवल भोजनालय नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा के अप्रत्यक्ष सहयोगी भी हैं।
रेस्टोरेंट और फूड प्लाजा की बढ़ती लोकप्रियता
हाल के वर्षों में यात्रियों की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। अब परिवार केवल स्वाद नहीं बल्कि स्वच्छता, सुरक्षित पार्किंग, साफ शौचालय और आरामदायक वातावरण को भी महत्व देते हैं। इसी कारण राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधुनिक रेस्टोरेंट और फूड प्लाजा तेजी से विकसित हुए हैं। इन स्थानों पर भोजन के साथ-साथ स्वच्छ शौचालय, प्राथमिक चिकित्सा, बच्चों के लिए स्थान, ईवी चार्जिंग और सुरक्षित पार्किंग जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं। यही वजह है कि परिवारों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच इनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
कोविड काल-सबसे बड़ा झटका
वर्ष 2020 और 2021 ढाबा और रेस्टोरेंट उद्योग के लिए बेहद कठिन साबित हुए। कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण यातायात लगभग ठप हो गया। हजारों ढाबों और छोटे भोजनालयों की आय अचानक समाप्त हो गई। कई स्थानों पर कर्मचारियों को हटाना पड़ा, जबकि अनेक छोटे ढाबे स्थायी रूप से बंद हो गए। उद्योग संगठनों के अनुसार महामारी के दौरान भोजन सेवा क्षेत्र को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हालांकि महामारी के बाद घरेलू पर्यटन और सड़क यात्राओं में तेजी आने से इस क्षेत्र में फिर से जान लौटी।
स्वाद के साथ बढ़ते खतरे
ढाबों और रेस्टोरेंटों की लोकप्रियता जितनी बढ़ी है, उतनी ही तेजी से उनसे जुड़े जोखिम भी सामने आए हैं। खाद्य सुरक्षा विभागों द्वारा समय-समय पर की गई जांचों में भोजन की गुणवत्ता, रसोई की सफाई और पेयजल की शुद्धता से जुड़े गंभीर सवाल उठे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भोजन में कीड़े, दूषित सामग्री और अस्वच्छ रसोई से जुड़ी शिकायतों में वृद्धि हुई है। कई मामलों में उपभोक्ता अदालतों ने ग्राहकों को मुआवजा देने के आदेश भी दिए। विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नियमित निरीक्षण और कठोर निगरानी की आवश्यकता है।
आग और ढांचागत हादसे-सबसे बड़ी चिंता
पिछले दशक में ढाबों और रेस्टोरेंटों से जुड़ी सबसे चिंताजनक घटनाएँ आगजनी और ढांचागत दुर्घटनाएँ रही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में रेस्टोरेंटों में लगी आग ने कई लोगों की जान ली। जांचों में बार-बार सामने आया कि अग्निशमन उपकरणों का अभाव, अवैध निर्माण, गैस सिलेंडरों का असुरक्षित उपयोग और आपात निकास मार्गों की कमी ऐसी घटनाओं के प्रमुख कारण रहे। 2024 में पटना में गैस सिलेंडर विस्फोट से लगी आग ने कई लोगों की जान ले ली। वहीं 2025 में जयपुर के एक ढाबे की छत गिरने से एक व्यक्ति की मृत्यु हुई और कई घायल हुए। हाल के वर्षों में दिल्ली समेत कई शहरों में हुई आग की घटनाओं ने यह सवाल उठाया कि क्या भोजनालय सुरक्षा मानकों का वास्तव में पालन कर रहे हैं।
हाईवे पर सुरक्षा की अलग चुनौती
हाईवे ढाबों से जुड़ी समस्याएँ केवल भोजन तक सीमित नहीं हैं। कई स्थानों पर अव्यवस्थित पार्किंग, सड़क किनारे अतिक्रमण और अचानक वाहन रुकने की प्रवृत्ति दुर्घटनाओं का कारण बनती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ढाबों के सामने सुरक्षित प्रवेश और निकास मार्ग, पर्याप्त पार्किंग और स्पष्ट संकेतक होना जरूरी है। कई दुर्घटनाएँ केवल इसलिए हुईं क्योंकि तेज गति से चल रहे वाहन अचानक ढाबे की ओर मुड़ गए या सड़क किनारे खड़े वाहनों से टकरा गए।
सरकार के नए प्रयास
इन चुनौतियों को देखते हुए सरकार और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने आधुनिक ‘वे-साइड अमेनिटी’ केंद्र विकसित करने की योजना शुरू की है। इन केंद्रों का उद्देश्य केवल भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि यात्रियों को एक सुरक्षित और सुविधाजनक पड़ाव प्रदान करना है। इन सुविधाओं में स्वच्छ शौचालय, मेडिकल सहायता, ड्राइवर विश्राम कक्ष, सुरक्षित पार्किंग, फूड कोर्ट, ईवी चार्जिंग स्टेशन और डिजिटल सुविधाएँ शामिल हैं। आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्गों पर बड़ी संख्या में ऐसे केंद्र विकसित किए जाने की योजना है।
क्या ढाबे खत्म हो जाएंगे?
इस प्रश्न का उत्तर अधिकांश विशेषज्ञ ‘नहीं’ में देते हैं। उनका मानना है कि ढाबे भारतीय सड़क संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। आधुनिक फूड प्लाजा सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन ढाबों का स्वाद, आत्मीयता और स्थानीय पहचान आसानी से प्रतिस्थापित नहीं की जा सकती। हाँ, यह अवश्य है कि भविष्य का सफल ढाबा वही होगा जो स्वाद के साथ स्वच्छता, सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं का संतुलन बना सके। जो ढाबे बदलती अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को ढाल लेंगे, वे आने वाले वर्षों में और अधिक लोकप्रिय होंगे।
पिछले दस वर्षों में भारतीय ढाबों और रेस्टोरेंटों ने लंबा सफर तय किया है। वे पारंपरिक भोजनालयों से विकसित होकर आधुनिक आतिथ्य उद्योग का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। एक ओर उन्होंने करोड़ों यात्रियों को स्वाद, आराम और स्थानीय संस्कृति का अनुभव कराया है, तो दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा, आग, स्वच्छता और ढांचागत सुरक्षा जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्वाद और परंपरा के साथ सुरक्षा और गुणवत्ता को भी समान महत्व दिया जाए। यदि ऐसा हुआ, तो भारतीय हाईवे के ढाबे और रेस्टोरेंट न केवल यात्रियों के पसंदीदा पड़ाव बने रहेंगे, बल्कि सुरक्षित और विश्वसनीय यात्रा संस्कृति के प्रतीक भी बन सकेंगे।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

गुरुवार, 11 जून 2026

जनसंख्या विस्फोट से जनसंख्या संकट तक

 लेख-

क्या दुनिया बच्चों के अभाव की ओर बढ़ रही है?
सन् 1968 में अमेरिकी जीवविज्ञानी पॉल  एहरलीच  ने अपनी चर्चित पुस्तक द पापुलेशन  बम  में चेतावनी दी थी कि बढ़ती जनसंख्या मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। उस समय दुनिया की आबादी लगभग 3.5 अरब थी और आशंका व्यक्त की जा रही थी कि पृथ्वी के संसाधन बढ़ती आबादी का बोझ नहीं उठा पाएंगे। आज, लगभग छह दशक बाद, दुनिया की आबादी 8 अरब को पार कर चुकी है, लेकिन चिंता का विषय बदल चुका है। अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि दुनिया में लोग बहुत अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया पर्याप्त बच्चे पैदा कर रही है? संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक जनसांख्यिकीय अध्ययनों के अनुसार 1950 के दशक में विश्व की कुल प्रजनन दर (टोटल  फर्टिलिटी  रेट ) लगभग 5 बच्चे प्रति महिला थी। 2023 तक यह घटकर लगभग 2.3 रह गई है और सदी के मध्य तक इसके प्रतिस्थापन स्तर 2.1 तक पहुँचने या उससे नीचे जाने का अनुमान है। मानव इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि जन्मदर इतनी तेजी से गिरी हो। वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि 1950 में औसत महिला लगभग 5 बच्चों को जन्म देती थी। आज दुनिया के अधिकांश देशों में यह संख्या आधी से भी कम रह गई है। 2026 के विश्लेषणों के अनुसार विश्व की लगभग 71 प्रतिशत आबादी ऐसे देशों में रहती है जहाँ जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है।  यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन भी है। जिन देशों को कभी जनसंख्या विस्फोट से डर था, वे आज बच्चों की कमी से चिंतित हैं।
जापान-भविष्य की एक झलक
यदि कोई देश दुनिया को भविष्य की चेतावनी देता है तो वह जापान है। जापान में लगातार घटती जन्मदर और बढ़ती आयु ने समाज की संरचना बदल दी है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल बंद हो रहे हैं क्योंकि वहाँ पर्याप्त बच्चे नहीं बचे। लाखों घर खाली पड़े हैं। बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जबकि कामकाजी युवाओं की संख्या घट रही है। जापानी सरकार विवाह प्रोत्साहन, बाल-पालन सहायता, कर छूट और नकद प्रोत्साहन जैसी योजनाएँ चला रही है, लेकिन जन्मदर में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
दक्षिण कोरिया का संकट
दक्षिण कोरिया आज दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर वाले देशों में शामिल है। वहाँ महंगे घर, अत्यधिक प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था, लंबी कार्य संस्कृति और बढ़ती जीवन-यापन लागत के कारण युवा विवाह और मातृत्व-पितृत्व से दूर होते जा रहे हैं। सरकार अरबों डॉलर खर्च कर चुकी है, लेकिन सामाजिक प्रवृत्तियों को बदलना आसान नहीं साबित हुआ।
चीन-नीति का ऐतिहासिक उलटफेर
1979 में चीन ने एक-बच्चा नीति लागू की थी। उस समय उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि को रोकना था। लेकिन चार दशक बाद स्थिति बदल गई। अब चीन लोगों को दो और तीन बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। लगातार घटती जन्मदर और सिकुड़ती कार्यशील आबादी ने चीन की आर्थिक योजनाओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। जिस देश ने कभी जन्म को नियंत्रित किया था, वही आज जन्म बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यह इतिहास का एक अनोखा मोड़ है।
भारत की बदलती कहानी
भारत आज दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है, लेकिन भारत की जन्मदर भी तेजी से गिर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफसी-5) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 तक पहुँच चुकी है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। 1992 में एनएचएफसी-1 के दौरान भारत की प्रजनन दर लगभग 3.4 थी। अर्थात् तीन दशकों में देश ने अपनी प्रजनन दर में लगभग 40 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की है। ताजा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार भारत की प्रजनन दर 1.9 तक पहुँच चुकी है। केवल कुछ राज्य ही अब प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर बचे हैं।
दिल्ली, पंजाब और दक्षिण भारत की तस्वीर
दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जन्मदर काफी नीचे जा चुकी है। दिल्ली की प्रजनन दर देश में सबसे कम स्तरों में गिनी जाती है। दूसरी ओर बिहार और उत्तर प्रदेश अभी भी राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं। यह अंतर बताता है कि शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की कार्य भागीदारी और जीवनशैली का जन्मदर पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
कामकाजी दम्पत्तियों की नई दुनिया
आज का युवा दम्पत्ति अपने माता-पिता की पीढ़ी से अलग सोचता है। पहले विवाह जल्दी होते थे, परिवार जल्दी बनता था और तीन-चार बच्चों का होना सामान्य माना जाता था। आज स्थिति बदल गई है। उच्च शिक्षा में अधिक समय लग रहा है। करियर प्राथमिकता बन चुका है। घर खरीदना कठिन हो गया है। बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ गया है। महिलाएँ आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र हैं। महानगरों में जीवन-यापन महंगा हो गया है। परिणामस्वरूप लाखों दम्पत्ति परिवार विस्तार का निर्णय टाल रहे हैं या केवल एक बच्चे तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं।
जनसंख्या घटेगी तो समस्या क्या होगी?
सामान्य धारणा यह है कि कम जनसंख्या हमेशा अच्छी होती है। लेकिन अर्थशास्त्री इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। जब जन्म कम होते हैं तो कुछ दशकों बाद कार्यशील आयु की आबादी घटती है, उद्योगों को श्रमिकों की कमी होती है, पेंशन व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है, आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। इसी कारण जापान, जर्मनी, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे देश कम जन्मदर को राष्ट्रीय चुनौती मानते हैं।
क्या भारत को डरना चाहिए?
फिलहाल भारत दुनिया का सबसे युवा बड़ा देश है। भारत की औसत आयु लगभग 29 वर्ष के आसपास है जबकि जापान और यूरोप के अनेक देशों में यह 45 से 50 वर्ष तक पहुँच चुकी है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। इसे ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ कहा जाता है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि जन्मदर लगातार नीचे जाती रही तो 2040-2050 के बाद भारत को भी वृद्ध होती आबादी और घटते कार्यबल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
20वीं और 21वीं सदी का अंतर
20वीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न था-‘जनसंख्या को कैसे नियंत्रित किया जाए?’, मगर 21वीं सदी का उभरता हुआ प्रश्न है-‘पर्याप्त जनसंख्या कैसे बनाए रखी जाए?’, यही वह परिवर्तन है जो दुनिया की जनसांख्यिकीय बहस को नई दिशा दे रहा है।
दुनिया एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। कभी जनसंख्या विस्फोट मानवता का सबसे बड़ा डर था। आज अनेक देशों के सामने जनसंख्या संकट खड़ा है। घटती जन्मदर, बढ़ती बुजुर्ग आबादी और सिकुड़ता कार्यबल नई चुनौतियाँ बनकर उभर रहे हैं। भारत अभी युवा शक्ति के स्वर्णकाल में है, लेकिन बदलती जीवनशैली, छोटे परिवारों की प्रवृत्ति और गिरती प्रजनन दर संकेत दे रही है कि आने वाले दशकों में हमें भी जनसंख्या संतुलन पर गंभीरता से विचार करना होगा। कल तक दुनिया बच्चों की बढ़ती संख्या से डरती थी, आज कई देश बच्चों की घटती संख्या से चिंतित हैं। इतिहास का यह शायद सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय उलटफेर है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)