शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

दीपावली की खुशियों में सावधानी भी जरूरी

 आवश्यक लेख-

दीपावली भारतीय संस्कृति का ऐसा महापर्व है, जिसका इंतजार हर उम्र के लोगों को वर्ष भर रहता है। दीपों की जगमगाहट, घरों की सजावट, रंग-बिरंगी रंगोलियां, मिठाइयों की खुशबू, पूजा-अर्चना और अपनों से मिलने-जुलने की परंपरा इस त्योहार को विशेष बनाती है। दीपावली केवल रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक भी है। यह पर्व हमें प्रेम, सद्भाव, भाईचारे और सकारात्मकता का संदेश देता है। लेकिन बदलते समय के साथ दीपावली मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया है। आतिशबाजी, महंगे उपहारों, दिखावे और अत्यधिक खर्च ने त्योहार की परंपरागत सादगी को काफी हद तक प्रभावित किया है। उत्साह और उल्लास के बीच कई बार हम उन सावधानियों को नजरअंदाज कर देते हैं, जिनका ध्यान रखना बेहद आवश्यक है। आज जब दिल्ली-एनसीआर जैसे महानगर पहले से ही प्रदूषण, यातायात और अग्नि दुर्घटनाओं की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तब दीपावली की खुशियों के साथ जिम्मेदारी का भाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
अग्निकांड के आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं
दीपावली के अवसर पर पटाखे और रोशनी जहां उत्सव का आकर्षण होते हैं, वहीं थोड़ी सी लापरवाही बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। दिल्ली अग्निशमन सेवा के आंकड़े इस चिंता को गंभीर बनाते हैं। वर्ष 2021 में दीपावली पर 152 आपातकालीन कॉल दर्ज की गईं, वर्ष 2022 में यह संख्या 201 और 2023 में 208 रही। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 318 तक पहुंच गया। इनमें 280 कॉल आग लगने की घटनाओं से संबंधित थीं। दिल्ली अग्निशमन सेवा के अनुसार, यह वर्ष 2012 के बाद दीपावली पर प्राप्त सर्वाधिक आपातकालीन कॉल का आंकड़ा था। गाजियाबाद की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं रही। वर्ष 2024 की दीपावली पर जिले के अग्निशमन विभाग को आग से संबंधित 60 कॉल मिलीं, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या केवल 23 थी। अधिकारियों के अनुसार, अधिकांश घटनाओं के पीछे पटाखे, लापरवाही से जलाए गए दीपक और मोमबत्तियां तथा कुछ मामलों में शॉर्ट सर्किट जैसे कारण थे। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि दीपावली पर अग्नि सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सतर्कता की आवश्यकता है। पटाखे चलाते समय बच्चों को अकेला न छोड़ें। खुले स्थान का चुनाव करें और घरों, दुकानों, वाहनों तथा ज्वलनशील वस्तुओं से पर्याप्त दूरी रखें। पानी की बाल्टी और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था रखें। अधजले पटाखों को दोबारा जलाने का प्रयास न करें। आतिशबाजी के दौरान सूती कपड़े पहनना अधिक सुरक्षित है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पटाखों की खुशी किसी दूसरे के लिए भय और परेशानी का कारण न बने।
प्रदूषण उत्सव के बाद की सबसे बड़ी चुनौती
दिल्ली-एनसीआर में दीपावली के आसपास वायु प्रदूषण का स्तर चिंता का विषय बन जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के आंकड़े इस स्थिति को समझने में मदद करते हैं। दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक दीपावली से पहले, दीपावली के दिन और उसके अगले दिन इस प्रकार दर्ज किया गया-

वर्ष       दीपावली से पहले   दीपावली के दिन    अगले दिन
 2018         338               281            390
2019          287               337            368
2020          339               414            435
2021         314                382             462
2022         229                312             302
2023         220                218             358
इन आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2020 में दीपावली के अगले दिन दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक 435 और वर्ष 2021 में वायु गुणवत्ता सूचकांक 462 तक पहुंच गया था। वर्ष 2023 में दीपावली के दिन वायु गुणवत्ता सूचकांक 218 रहा, लेकिन अगले दिन यह बढ़कर 358 हो गया। इससे स्पष्ट होता है कि दीपावली के आसपास वायु गुणवत्ता में कई बार तेजी से गिरावट आती है। हालांकि यह समझना भी आवश्यक है कि प्रदूषण का एकमात्र कारण पटाखे नहीं हैं। पराली जलाना, वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और मौसम की परिस्थितियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
वैज्ञानिक शोध भी कर रहे हैं आगाह
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के शोधकर्ताओं ने दीपावली के दौरान और उसके बाद दिल्ली की वायु गुणवत्ता पर एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि दीपावली के दौरान पीएम 2.5 में धातुओं की मात्रा में लगभग 1100 प्रतिशत तक वृद्धि हुई और उस समय मौजूद धातु संबंधी  पीएम 2.5 का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा आतिशबाजी से जुड़ा था। इस शोध के प्रमुख लेखक चिराग मनचंदा ने बताया कि आतिशबाजी का प्रभाव लगभग 12 घंटे बाद काफी कम हो जाता है। वहीं शोध दल के सदस्य और आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर विक्रम सिंह ने बताया कि दीपावली के बाद पराली तथा अन्य जैविक ईंधन के जलने से निकलने वाले उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इस अध्ययन के प्रमुख अन्वेषक प्रोफेसर मयंक कुमार ने भी स्पष्ट किया कि दिल्ली में दीपावली के बाद वायु प्रदूषण को समझने के लिए उसके विभिन्न स्रोतों का वैज्ञानिक विश्लेषण जरूरी है। यह शोध हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि प्रदूषण की समस्या बहुआयामी है। इसके समाधान के लिए पटाखों पर नियंत्रण के साथ-साथ पराली प्रबंधन, स्वच्छ ईंधन, सार्वजनिक परिवहन और औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण भी आवश्यक है।
स्वास्थ्य से बड़ा कोई उत्सव नहीं
पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इनका प्रभाव विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों, हृदय रोगियों और सांस संबंधी समस्याओं से परेशान लोगों पर पड़ता है। पटाखों का धुआं आंखों में जलन, खांसी, सांस लेने में परेशानी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है। तेज आवाज वाले पटाखे पशु-पक्षियों के लिए भी कष्टदायक होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी वायु प्रदूषण को मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम मानता है। उसके अनुसार सूक्ष्म कणों का संपर्क हृदय और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। हमें यह समझना होगा कि उत्सव मनाने का अर्थ प्रकृति और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना नहीं है। मिट्टी के दीपक जलाएं, पारंपरिक सजावट को प्रोत्साहन दें, बिजली की अनावश्यक खपत कम करें और पटाखों से यथासंभव दूरी बनाएं। यदि आतिशबाजी करें तो निर्धारित नियमों और समय-सीमा का पालन करें तथा केवल अनुमत और प्रमाणित ग्रीन पटाखों का ही इस्तेमाल करें।
सामाजिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता भी जरूरी
दीपावली खुशियों का पर्व है, प्रतिस्पर्धा और दिखावे का नहीं। अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार खर्च करें और जरूरतमंदों की सहायता करें। गरीब बच्चों को मिठाइयां, वस्त्र और उपहार देकर उनके जीवन में भी खुशियों का दीप जलाएं। पटाखों के शोर से परेशान होने वाले बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और छोटे बच्चों का ध्यान रखें। पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता दिखाएं। सोशल मीडिया पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाओं और ऑनलाइन ठगी से भी सावधान रहें। महात्मा गांधी का विचार था कि पृथ्वी हर मनुष्य की आवश्यकता पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन देती है, लेकिन हर मनुष्य के लालच के लिए नहीं। यह विचार आज के उपभोक्तावादी दौर और पर्यावरण संकट के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल घरों में दीप जलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर सद्भाव, संवेदना और मानवता का प्रकाश जगाना भी है। रवींद्रनाथ टैगोर की साहित्यिक दृष्टि में प्रकाश आशा, चेतना और जीवन की सकारात्मकता का प्रतीक रहा है। दीपावली का प्रकाश भी तभी सार्थक है, जब वह हमारे भीतर संवेदना, विवेक और जिम्मेदारी का उजाला पैदा करे। आइए, इस दीपावली पर संकल्प लें कि खुशियां मनाएंगे, लेकिन किसी के स्वास्थ्य और सुरक्षा को खतरे में डालकर नहीं। पर्यावरण का संरक्षण करेंगे, जरूरतमंदों की सहायता करेंगे और अपनी परंपराओं को आधुनिक जिम्मेदारियों के साथ आगे बढ़ाएंगे। ’’क्योंकि दीपावली की सार्थकता पटाखों के शोर में नहीं, बल्कि जीवन में खुशियों, प्रेम, सद्भाव और स्वच्छ वातावरण के प्रकाश में है।’’

-डॉ. चेतन आनंद
(कवि, पत्रकार एवं प्रकाशक)

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

9 दिन, 9 शक्तियाँ, 9 संकल्प


नवरात्रि : आत्मशक्ति के जागरण से व्यक्तित्व निर्माण तक

नवरात्रि केवल पूजा, उपवास, व्रत और उत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि स्वयं को पहचानने, अपनी आंतरिक शक्तियों को जागृत करने और जीवन को श्रेष्ठ दिशा देने का अवसर भी है। भारतीय संस्कृति में शक्ति की उपासना का अर्थ केवल देवी के समक्ष शीश झुकाना नहीं, बल्कि अपने भीतर विद्यमान साहस, विवेक, करुणा, धैर्य, अनुशासन और सृजनशीलता को पहचानना भी है। नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना हमें यह संदेश देती है कि मनुष्य अपने जीवन में नौ ऐसे संकल्प धारण करे, जो उसके व्यक्तित्व को निखारें और समाज को बेहतर बनाने में योगदान दें।

शक्ति की अवधारणा भारतीय दर्शन में व्यापक है। यहाँ शक्ति केवल बाहुबल नहीं, बल्कि आत्मबल, ज्ञानबल, इच्छाशक्ति और सद्कर्म की सामर्थ्य भी है। जिस प्रकार दीपक स्वयं जलकर अंधकार दूर करता है, उसी प्रकार जागृत चेतना वाला मनुष्य अपने आचरण से निराशा, अज्ञान और नकारात्मकता को दूर कर सकता है।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।” — भगवद्गीता, अध्याय 6, श्लोक 5

अर्थात मनुष्य को स्वयं अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए। यह संदेश नवरात्रि के मूल भाव से जुड़ता है। देवी की आराधना के साथ यदि हम अपने भीतर सुधार का प्रयास करें, तो यह पर्व हमारे जीवन में वास्तविक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।

नौ दिन, नौ शक्तियाँ और नौ संकल्प

प्रथम दिन : माँ शैलपुत्री—दृढ़ता और संकल्प

माँ शैलपुत्री पर्वत की दृढ़ता और स्थिरता की प्रतीक मानी जाती हैं। उनका स्वरूप हमें सिखाता है कि किसी भी महान कार्य की शुरुआत मजबूत संकल्प से होती है। जीवन में परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, लेकिन लक्ष्य के प्रति निष्ठा बनी रहनी चाहिए।

पहला संकल्प: मैं कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और दृढ़ता बनाए रखूँगा तथा अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होऊँगा।

द्वितीय दिन : माँ ब्रह्मचारिणी—अनुशासन और साधना

माँ ब्रह्मचारिणी तप, त्याग, संयम और साधना का संदेश देती हैं। कोई भी व्यक्ति केवल इच्छाएँ करने से सफल नहीं होता। सफलता के लिए निरंतर अभ्यास, समय का सदुपयोग और आत्मानुशासन आवश्यक हैं। विद्यार्थी हों, लेखक हों, कर्मचारी हों अथवा उद्यमी—हर क्षेत्र में निरंतर साधना ही श्रेष्ठता का मार्ग बनती है।

दूसरा संकल्प: मैं समय का सम्मान करूँगा, आलस्य से बचूँगा और प्रतिदिन अपने ज्ञान तथा कौशल में वृद्धि करूँगा।

तृतीय दिन : माँ चंद्रघंटा—साहस और न्याय

माँ चंद्रघंटा का स्वरूप साहस, सजगता और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। साहस का अर्थ किसी को दबाना नहीं, बल्कि निर्बल की रक्षा करना और सत्य के पक्ष में खड़े होना है। समाज में अन्याय तब बढ़ता है, जब सज्जन लोग मौन रहना ही अपनी सुरक्षा समझने लगते हैं।

तीसरा संकल्प: मैं अन्याय का समर्थन नहीं करूँगा, निर्बल की सहायता करूँगा और सत्य के पक्ष में विवेकपूर्ण ढंग से आवाज उठाऊँगा।

चतुर्थ दिन : माँ कूष्मांडा—सृजन और सकारात्मकता

माँ कूष्मांडा को सृजन और ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। मनुष्य की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि उसने कितनी कठिनाइयाँ झेलीं, बल्कि इससे भी होती है कि उसने उन परिस्थितियों में कितना सृजन किया। एक विचार, एक कविता, एक पुस्तक, एक उपयोगी आविष्कार अथवा किसी जरूरतमंद की सहायता—ये सभी सकारात्मक सृजन के रूप हैं।

चौथा संकल्प: मैं नकारात्मकता फैलाने के स्थान पर सकारात्मक विचारों, रचनात्मक कार्यों और उपयोगी प्रयासों को प्राथमिकता दूँगा।

पंचम दिन : माँ स्कंदमाता—प्रेम और जिम्मेदारी

माँ स्कंदमाता मातृत्व, स्नेह और संरक्षण का प्रतीकात्मक संदेश देती हैं। परिवार और समाज का वास्तविक आधार प्रेम, संवेदना और जिम्मेदारी है। केवल अधिकार माँगने से रिश्ते मजबूत नहीं होते; दूसरों की आवश्यकताओं को समझना और उनके सुख-दुःख में साथ खड़ा होना भी जरूरी है।

पाँचवाँ संकल्प: मैं अपने परिवार, मित्रों और समाज के प्रति संवेदनशील रहूँगा तथा अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाऊँगा।

षष्ठम दिन : माँ कात्यायनी—आत्मसम्मान और कर्मठता

माँ कात्यायनी का स्वरूप शक्ति, पराक्रम और अन्याय के प्रतिरोध की प्रेरणा देता है। आत्मसम्मान का अर्थ अहंकार नहीं, बल्कि अपने मूल्यों पर दृढ़ रहना है। जीवन में लक्ष्य प्राप्त करने के लिए साहस के साथ कर्मठता भी आवश्यक है। भगवद्गीता का कर्मयोग हमें फल की चिंता में उलझने के बजाय अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करने की शिक्षा देता है।

छठा संकल्प: मैं अपने आत्मसम्मान की रक्षा करूँगा, कर्तव्यनिष्ठ रहूँगा और कठिनाइयों से भागने के बजाय उनका समाधान खोजूँगा।

सप्तम दिन : माँ कालरात्रि—भय पर विजय

माँ कालरात्रि का उग्र स्वरूप भय और नकारात्मक शक्तियों के विनाश का प्रतीक माना जाता है। मनुष्य के जीवन में कई बार असफलता, आलोचना, अनिश्चितता और परिवर्तन का भय उसे आगे बढ़ने से रोकता है। भय से मुक्त होने का अर्थ खतरे को अनदेखा करना नहीं, बल्कि उसका सामना विवेक और तैयारी के साथ करना है।

सातवाँ संकल्प: मैं असफलता के भय से अपने प्रयास नहीं रोकूँगा और अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करूँगा।

अष्टम दिन : माँ महागौरी—शुद्धता और क्षमा

माँ महागौरी का स्वरूप पवित्रता, शांति और निर्मलता का प्रतीक है। जीवन की वास्तविक सुंदरता केवल बाहरी रूप में नहीं, बल्कि विचारों की स्वच्छता, व्यवहार की विनम्रता और हृदय की उदारता में होती है। ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध की भावना मनुष्य की आंतरिक शांति को नष्ट करती है।

आठवाँ संकल्प: मैं अपने विचारों और व्यवहार को शुद्ध रखने का प्रयास करूँगा, अपनी गलतियों को स्वीकार करूँगा तथा जहाँ उचित होगा, वहाँ क्षमा और संवाद का मार्ग अपनाऊँगा।

नवम दिन : माँ सिद्धिदात्री—ज्ञान और लोककल्याण

माँ सिद्धिदात्री को सिद्धि और पूर्णता प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। इस स्वरूप का एक व्यावहारिक संदेश यह भी है कि ज्ञान और सामर्थ्य का सर्वोत्तम उपयोग लोककल्याण में होना चाहिए। केवल व्यक्तिगत उपलब्धियाँ पर्याप्त नहीं हैं; हमारी सफलता से दूसरों को क्या लाभ मिला, यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।

नौवाँ संकल्प: मैं अपने ज्ञान, अनुभव, संसाधनों और सामर्थ्य का उपयोग समाज की भलाई तथा जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए करूँगा।

नौ संकल्पों से जीवन में परिवर्तन

केवल संकल्प लेना पर्याप्त नहीं है। उसे व्यवहार में उतारना ही वास्तविक साधना है। यदि हम प्रतिदिन अपने आचरण की समीक्षा करें, अपनी एक कमजोरी पहचानें और उसमें सुधार का छोटा-सा प्रयास करें, तो नौ दिन की साधना जीवनभर की आदत बन सकती है।

इसके लिए प्रतिदिन स्वयं से तीन प्रश्न पूछे जा सकते हैं—आज मैंने कौन-सा अच्छा कार्य किया? आज मुझसे कौन-सी गलती हुई और मैं उससे क्या सीख सकता हूँ? कल मैं अपने व्यवहार में कौन-सा एक सुधार करूँगा?

इन प्रश्नों के उत्तर हमें आत्ममंथन की दिशा में ले जाते हैं। यह प्रक्रिया किसी धार्मिक कर्मकांड का विकल्प नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़ने वाली आत्मानुशासन की एक उपयोगी विधि है।

निष्कर्ष : देवी की आराधना से आत्मजागरण तक

नवरात्रि हमें स्मरण कराती है कि शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल विजय प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाना भी है। जिस व्यक्ति में साहस है, लेकिन करुणा नहीं, उसकी शक्ति अधूरी है। जिसके पास ज्ञान है, लेकिन विनम्रता नहीं, उसका विवेक अधूरा है। जिसके पास सफलता है, लेकिन समाज के प्रति उत्तरदायित्व नहीं, उसकी उपलब्धियाँ भी अधूरी हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है—

“आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।” — भगवद्गीता, अध्याय 6, श्लोक 5

अर्थात मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी बन सकता है और अपना शत्रु भी। हमारे विचार, आदतें और कर्म ही हमारे उत्थान अथवा पतन का मार्ग तैयार करते हैं।

आइए, इस नवरात्रि हम केवल देवी के नौ स्वरूपों की पूजा ही न करें, बल्कि उनसे प्रेरित नौ गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी करें। दृढ़ता, अनुशासन, साहस, सृजनशीलता, करुणा, आत्मसम्मान, निर्भयता, निर्मलता और लोककल्याण—ये नौ गुण हमारी व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।

नौ दिन, नौ शक्तियाँ, नौ संकल्प—और लक्ष्य केवल एक: अपने भीतर के श्रेष्ठ मनुष्य को जागृत करना।

जय माता दी! 🙏


लेखक-

डॉ. चेतन आनंद

(कवि एवं पत्रकार)

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

साहित्यिक संस्थाओं की भरमार, साहित्य कहाँ?

 लेख-

भारत को यदि भाषाओं, बोलियों और साहित्य की विविधता का देश कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। देश के लगभग हर छोटे-बड़े शहर में साहित्यिक संस्थाएँ, साहित्य परिषदें, काव्य मंच, लेखक संगठन और सांस्कृतिक संस्थाएँ सक्रिय दिखाई देती हैं। कहीं कवि सम्मेलन हो रहे हैं, कहीं पुस्तक लोकार्पण, कहीं सम्मान समारोह तो कहीं साहित्यिक गोष्ठियाँ। सामाजिक माध्यमों ने भी ऐसी संस्थाओं की गतिविधियों को व्यापक दृश्यता प्रदान कर दी है। लेकिन एक बुनियादी सवाल आज भी अनुत्तरित है-भारत में कुल कितनी साहित्यिक संस्थाएँ हैं और उनमें से वास्तव में कितनी साहित्य के लिए स्थायी और सार्थक काम कर रही हैं? इस प्रश्न का सीधा उत्तर सरकारी अभिलेखों में उपलब्ध नहीं है। भारत सरकार के पास ऐसी कोई एकीकृत राष्ट्रीय सूची नहीं है जिसमें देश की सभी साहित्यिक संस्थाओं की संख्या अलग से दर्ज हो। साहित्यिक संस्थाएँ अलग-अलग राज्यों में सोसायटी, न्यास, गैर-लाभकारी कंपनी अथवा अन्य संस्थागत स्वरूपों में पंजीकृत होती हैं। इसलिए केवल सरकारी पंजीकरण के आधार पर साहित्यिक संस्थाओं की कुल संख्या निकालना संभव नहीं है।
नीति आयोग के एनजीओ-दर्पण से पता चलता है कि देश में गैर-लाभकारी संस्थाओं का नेटवर्क बहुत बड़ा है। 2024 के अंत तक एनजीओ-दर्पण पर लगभग 2.78 लाख संस्थाएँ दर्ज थीं। लेकिन यह संख्या केवल साहित्यिक संस्थाओं की नहीं है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, महिला एवं बाल विकास, पर्यावरण, सामाजिक कल्याण, संस्कृति और अन्य क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाएँ भी शामिल हैं। इसलिए इस संख्या को साहित्यिक संस्थाओं की संख्या मानना तथ्यात्मक भूल होगी। यही स्थिति साहित्यिक संस्थाओं की वास्तविक सक्रियता को लेकर भी है। सरकारी स्तर पर ऐसा कोई राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है जो बताए कि पंजीकृत साहित्यिक संस्थाओं में कितनी नियमित रूप से काम कर रही हैं, कितनी वर्षों से निष्क्रिय हैं और कितनी केवल कागजों में अस्तित्व रखती हैं।
पंजीकरण और साहित्यिक योगदान में अंतर
किसी संस्था का पंजीकृत होना उसकी वैधानिक स्थिति बताता है, साहित्यिक उपलब्धि नहीं। साहित्यिक संस्था का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि वह साहित्य के लिए क्या कर रही है? क्या वह नए रचनाकारों को अवसर दे रही है? क्या वह पुस्तकें प्रकाशित कर रही है? क्या वह साहित्यिक पत्रिका निकाल रही है? क्या वह भारतीय भाषाओं और बोलियों के साहित्य का संरक्षण कर रही है? क्या वह अनुवाद को प्रोत्साहित कर रही है? क्या वह विद्यालयों और महाविद्यालयों में पठन संस्कृति विकसित कर रही है? क्या वह साहित्य को समाज के प्रश्नों से जोड़ रही है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर तलाशे जाएँ तो साहित्यिक संस्थाओं की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
कार्यक्रम जरूरी हैं, लेकिन केवल कार्यक्रम ही साहित्य नहीं
साहित्यिक गतिविधियों में कवि सम्मेलन, मुशायरे, कहानी-पाठ, पुस्तक लोकार्पण और संगोष्ठियाँ महत्वपूर्ण हैं। ये साहित्यकारों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं और पाठकों तक साहित्य पहुँचाते हैं। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब संस्था की पूरी सक्रियता केवल मंचीय कार्यक्रमों तक सीमित हो जाती है। एक संस्था यदि वर्ष में दर्जनों समारोह करती है, लेकिन नई प्रतिभाओं को प्रकाशित करने, पुस्तकालय बनाने, साहित्यिक शोध को बढ़ावा देने या दुर्लभ साहित्य को सुरक्षित रखने का कोई प्रयास नहीं करती, तो उसके योगदान का मूल्यांकन केवल कार्यक्रमों की संख्या से नहीं किया जा सकता। आज कई जगह साहित्यिक आयोजन भी एक प्रकार के सामाजिक समारोह में बदलते दिखाई देते हैं। मंच पर अतिथियों की लंबी सूची, सम्मान-पत्रों की भरमार और तस्वीरों की अधिकता के बीच साहित्यिक विमर्श पीछे छूट जाता है। सम्मान साहित्यकार का मनोबल बढ़ाता है, लेकिन सम्मान अपने आप में साहित्यिक योगदान का प्रमाण नहीं है।
साहित्य अकादेमी और संस्थागत साहित्य
राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य के क्षेत्र में साहित्य अकादेमी की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह भारतीय भाषाओं के साहित्य को बढ़ावा देने, लेखकों को जोड़ने, अनुवाद, संगोष्ठियों, पाठ और साहित्यिक संवाद जैसी गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक आदान-प्रदान का कार्य करती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों में साहित्य अकादमियाँ, साहित्य परिषदें और सांस्कृतिक संस्थाएँ भी कार्यरत हैं। संस्कृति मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से साहित्य एवं संस्कृति से संबंधित संस्थाओं को भी सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इससे स्पष्ट है कि भारत में साहित्य के लिए संस्थागत ढाँचा मौजूद है। प्रश्न उसके विस्तार से अधिक उसके प्रभाव और गुणवत्ता का है।
साहित्य और समाज का रिश्ता
साहित्यिक संस्था का काम केवल साहित्यकारों को एक मंच पर लाना नहीं होना चाहिए। साहित्य समाज की संवेदना का दर्पण है। इसलिए साहित्यिक संस्थाओं की सामाजिक भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बाल साहित्य को बढ़ावा देना, युवाओं को पुस्तकों से जोड़ना, ग्रामीण और छोटे शहरों के रचनाकारों को मंच देना, लोक भाषाओं और बोलियों का संरक्षण करना, वरिष्ठ साहित्यकारों की रचनाओं का दस्तावेजीकरण करना और विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच संवाद स्थापित करना, ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ साहित्यिक संस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। साहित्य समाज में संवाद पैदा करता है। वह प्रश्न पूछता है, संवेदना जगाता है और मनुष्य को दूसरे मनुष्य के दुख-सुख से जोड़ता है। इसलिए साहित्यिक संस्थाओं का सामाजिक दायित्व किसी अन्य सामाजिक संस्था से कम नहीं है।
नई प्रतिभाओं के लिए खुलें दरवाजे
आज साहित्य के क्षेत्र में एक बड़ी आवश्यकता नई प्रतिभाओं को अवसर देने की है। छोटे शहरों और कस्बों में अनेक युवा लिख रहे हैं, लेकिन उन्हें सही मंच और मार्गदर्शन नहीं मिलता। साहित्यिक संस्थाएँ यदि वरिष्ठ और स्थापित रचनाकारों के साथ नए लेखकों के लिए नियमित पाठ, कार्यशाला, संपादन प्रशिक्षण, प्रकाशन और संवाद की व्यवस्था करें तो इसका दीर्घकालीन प्रभाव दिखाई दे सकता है। सिर्फ मंच पर बुलाकर कविता पढ़वा देना पर्याप्त नहीं है। नए लेखक को यह भी बताया जाना चाहिए कि रचना को कैसे परिष्कृत किया जाए, भाषा और शिल्प की कमियों को कैसे दूर किया जाए और साहित्यिक अनुशासन क्या होता है।
पुरस्कारों की संस्कृति पर भी विचार जरूरी
साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मान और पुरस्कार दिए जाना अच्छी परंपरा है। इससे रचनाकारों का उत्साह बढ़ता है। लेकिन पुरस्कारों की संख्या बढ़ना साहित्य की गुणवत्ता बढ़ने का प्रमाण नहीं हो सकता। आवश्यक है कि पुरस्कारों के लिए पारदर्शी और स्पष्ट मानदंड हों। चयन समिति में योग्य साहित्यकार हों और पुरस्कार रचना तथा साहित्यिक योगदान को देखकर दिए जाएँ। यदि सम्मान केवल परिचय, संपर्क अथवा मंचीय उपस्थिति का विस्तार बन जाए तो इससे पुरस्कार की गरिमा प्रभावित होती है।
डिजिटल युग में नई संभावनाएँ
सामाजिक माध्यमों और डिजिटल मंचों ने साहित्यिक संस्थाओं के सामने नई संभावनाएँ भी खोली हैं। अब किसी छोटे शहर की गोष्ठी को देश के दूसरे हिस्सों के लोग भी देख सकते हैं। दुर्लभ पुस्तकों और पुराने साहित्य को डिजिटल रूप दिया जा सकता है। ऑनलाइन व्याख्यान और साहित्यिक पाठ आयोजित किए जा सकते हैं। लेकिन डिजिटल दृश्यता को भी साहित्यिक उपलब्धि का पर्याय नहीं बनाया जाना चाहिए। किसी कार्यक्रम के बहुत अधिक दर्शक होना और उस कार्यक्रम का साहित्यिक प्रभाव होना दो अलग बातें हैं।
संस्थाओं का मूल्यांकन क्यों नहीं?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि देश में इतनी बड़ी संख्या में साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ सक्रिय होने के बावजूद इनके काम का कोई व्यवस्थित राष्ट्रीय मूल्यांकन क्यों नहीं होता? एक ऐसा सार्वजनिक अभिलेख तैयार किया जा सकता है जिसमें संस्था का नाम, पंजीकरण, स्थापना वर्ष, सक्रिय सदस्य, साहित्यिक गतिविधियाँ, प्रकाशित पुस्तकें, पत्रिकाएँ, अनुदान और पिछले कुछ वर्षों की प्रमुख उपलब्धियाँ दर्ज हों। इससे साहित्यिक संस्थाओं की पारदर्शिता भी बढ़ेगी और अच्छी संस्थाओं को पहचान भी मिलेगी।
अब संख्या से अधिक गुणवत्ता पर बात हो
भारत को केवल अधिक साहित्यिक संस्थाओं की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता ऐसी संस्थाओं की है जो साहित्य को समाज से जोड़ें और साहित्यकार को पाठक से। एक संस्था की पहचान उसके भवन, पदाधिकारियों, समारोहों या सम्मान-पत्रों से नहीं, बल्कि उसके स्थायी साहित्यिक कार्य से होनी चाहिए। किसी संस्था ने कितने कवि सम्मेलन किए, यह एक आँकड़ा हो सकता है लेकिन कितने नए लेखक तैयार किए, कितनी पुस्तकें प्रकाशित कीं, कितने दुर्लभ ग्रंथ सुरक्षित किए, कितने पाठकों को पुस्तक से जोड़ा और समाज में साहित्य के प्रति कितनी रुचि पैदा की-ये उसके वास्तविक योगदान के अधिक महत्वपूर्ण संकेतक हैं। आज आवश्यकता साहित्यिक संस्थाओं की संख्या गिनने से अधिक उनके काम का मूल्यांकन करने की है। क्योंकि सवाल यह नहीं है कि देश में साहित्यिक संस्थाएँ कितनी हैं। सवाल यह है कि उनके होने से साहित्य कितना समृद्ध हुआ है और शायद इससे भी बड़ा सवाल- साहित्यिक संस्थाओं की भरमार के बीच साहित्य कहाँ है?

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

स्वयं को जीतने की 10 ट्रिक्स

 

मनुष्य की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा अक्सर दूसरों से आगे निकलने की होती है। कोई धन में आगे बढ़ना चाहता है, कोई पद में, कोई प्रतिष्ठा में और कोई प्रसिद्धि में। हम दुनिया को जीतने के लिए अनेक योजनाएँ बनाते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि सबसे कठिन विजय बाहर नहीं, भीतर की होती है। अपने क्रोध, भय, आलस्य, अहंकार, लालच, निराशा और नकारात्मक विचारों पर नियंत्रण पाना ही वास्तविक आत्मविजय है। महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, गौतम बुद्ध, चाणक्य, सुकरात और मार्कस ऑरेलियस जैसे चिंतकों ने अलग-अलग ढंग से आत्मसंयम, आत्मनिरीक्षण और अनुशासन को जीवन की महत्वपूर्ण शक्तियाँ माना। वास्तव में जिसने स्वयं को जीत लिया, उसके लिए बाहरी परिस्थितियों से संघर्ष करना कहीं आसान हो जाता है। आइए जानते हैं स्वयं को जीतने की दस ऐसी ट्रिक्स, जिन्हें जीवन में उतारकर हम अपने व्यक्तित्व को अधिक मजबूत और संतुलित बना सकते हैं।

1. प्रतिक्रिया देने से पहले रुकिए

हमारे जीवन की अनेक परेशानियाँ परिस्थितियों से कम और हमारी तत्काल प्रतिक्रियाओं से अधिक पैदा होती हैं। किसी ने कुछ कह दिया, हमें बुरा लगा और हमने उसी क्षण जवाब दे दिया। बाद में पछतावा हुआ कि थोड़ा रुक जाते तो बात बिगड़ती नहीं।

महात्मा गांधी के जीवन में आत्मसंयम का विशेष महत्व था। उनका जीवन यह सिखाता है कि किसी भी परिस्थिति में प्रतिक्रिया से पहले विवेक को अवसर देना चाहिए।

जब भी क्रोध आए, तुरंत उत्तर न दें। दस तक गिनें, गहरी साँस लें और फिर सोचकर बोलें। कई बार कुछ क्षणों का मौन वर्षों के रिश्ते बचा लेता है।

2. अपने मन को नियंत्रित करना सीखिए

स्वामी विवेकानंद ने मन की शक्ति और एकाग्रता को जीवन की सफलता से जोड़ा। मन यदि हमारे नियंत्रण में है तो वह हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन यदि हम मन के नियंत्रण में हैं तो वही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है।

मन कभी कहेगा कि आज काम मत करो, कल कर लेना। कभी कहेगा कि यह काम तुमसे नहीं होगा। कभी दूसरों की सफलता देखकर निराश करेगा।

ऐसे समय में मन से कहिए—“निर्णय मैं करूँगा, मेरा मन नहीं।”

3. हर विचार को सच मत मानिए

गौतम बुद्ध की शिक्षाओं में विचारों और मन की गतिविधियों को देखने की विशेष महत्ता है। हमारे मन में दिनभर हजारों विचार आते हैं, लेकिन हर विचार सत्य नहीं होता।

कभी हमें लगता है कि सब लोग हमारे विरुद्ध हैं। कभी लगता है कि हम असफल हो जाएँगे। कभी किसी छोटी समस्या को हम बहुत बड़ा बना लेते हैं।

जब कोई नकारात्मक विचार आए तो स्वयं से पूछिए—“क्या यह तथ्य है या केवल मेरी आशंका?”

यह छोटा-सा प्रश्न आपको कई अनावश्यक चिंताओं से बचा सकता है।

4. दूसरों से नहीं, स्वयं से प्रतिस्पर्धा कीजिए

आज के समय में तुलना मनुष्य की मानसिक शांति की बड़ी दुश्मन बन गई है। किसी की बड़ी उपलब्धि देखकर हमें अपनी उपलब्धियाँ छोटी लगने लगती हैं। किसी की संपत्ति देखकर अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर लगती है और किसी की प्रसिद्धि देखकर अपनी पहचान कम लगती है।

लेकिन हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। डेल कार्नेगी ने भी मानवीय व्यवहार के संदर्भ में तुलना और अनावश्यक चिंता से बचने की बात कही है।

इसलिए दूसरों से तुलना छोड़कर स्वयं से पूछिए—“क्या मैं आज कल से थोड़ा बेहतर हूँ?”

यदि उत्तर हाँ है, तो आप सही दिशा में हैं।

5. जरूरत पड़ने पर ‘नहीं’ कहना सीखिए

हर व्यक्ति को खुश करना संभव नहीं है। फिर भी हम अक्सर दूसरों की अपेक्षाओं के बोझ में अपनी जरूरतों और इच्छाओं को पीछे कर देते हैं।

चाणक्य के विचारों में समय, ऊर्जा और विवेक के उचित उपयोग को विशेष महत्व मिलता है। जीवन में यह समझना आवश्यक है कि कहाँ हमारा समय लगना चाहिए और कहाँ नहीं।

विनम्रता से ‘नहीं’ कहना सीखिए। हर निमंत्रण स्वीकार करना, हर समस्या अपने सिर लेना और हर व्यक्ति को प्रसन्न करना आपकी जिम्मेदारी नहीं है।

6. आलोचना को अपने विकास का माध्यम बनाइए

आलोचना सुनना किसी को पसंद नहीं होता। लेकिन हर आलोचना शत्रुता नहीं होती। कई बार आलोचना हमारे व्यक्तित्व का वह पक्ष दिखा देती है जिसे हम स्वयं नहीं देख पाते।

सुकरात का दर्शन आत्मपरीक्षण और स्वयं को जानने पर आधारित था। इसलिए आलोचना सुनते समय पहले यह देखिए कि उसमें कितनी सच्चाई है।

यदि आलोचना सही है तो सुधार कीजिए। यदि गलत है तो उसे अपने मन पर बोझ मत बनने दीजिए। हर आलोचक को जवाब देना जरूरी नहीं है। कई बार आपका बेहतर व्यवहार ही सबसे अच्छा उत्तर होता है।

7. काम टालने की आदत पर विजय पाइए

‘कल से शुरू करेंगे’—यह छोटा-सा वाक्य हमारी अनेक संभावनाओं को खत्म कर देता है। काम कठिन लगता है तो मन बहाने बनाने लगता है।

बेंजामिन फ्रैंकलिन ने समय और अनुशासन के महत्व पर बहुत जोर दिया। जीवन में सफलता का एक महत्वपूर्ण नियम है—काम को टालिए मत, शुरुआत कीजिए।

यदि कोई काम बहुत बड़ा लग रहा है तो उसे छोटे हिस्सों में बाँटिए। स्वयं से कहिए—“मैं केवल पाँच मिनट शुरू करता हूँ।” अक्सर शुरुआत होते ही काम आसान लगने लगता है।

8. अपनी कमजोरियों को स्वीकार कीजिए

हर व्यक्ति में कुछ खूबियाँ होती हैं और कुछ कमजोरियाँ। समस्या कमजोरी होने में नहीं, उसे स्वीकार न करने में है।

मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग के विचारों में व्यक्ति के भीतर छिपे पक्षों को पहचानने और समझने की बात महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति अपनी कमजोरी पहचान लेता है, वह उसे सुधारने की दिशा में पहला कदम उठा चुका होता है।

अपनी तीन प्रमुख कमजोरियाँ लिखिए और प्रत्येक के लिए एक छोटा सुधारात्मक कदम तय कीजिए। आत्मस्वीकार आत्मविकास की पहली सीढ़ी है।

9. प्रतिदिन स्वयं से संवाद कीजिए

हम दिनभर दूसरों की बातें सुनते हैं—समाचार, मोबाइल, सामाजिक माध्यम, मित्र, परिवार और कार्यस्थल। लेकिन क्या हम कभी स्वयं की आवाज सुनते हैं?

मार्कस ऑरेलियस जैसे दार्शनिकों ने आत्मनिरीक्षण और आत्मअनुशासन को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।

रात को दस मिनट अकेले बैठिए और तीन प्रश्न पूछिए—

आज मैंने क्या अच्छा किया?
आज मुझसे कहाँ गलती हुई?
कल मैं क्या बेहतर कर सकता हूँ?

यदि इन तीन प्रश्नों का ईमानदारी से उत्तर देने की आदत पड़ जाए तो व्यक्तित्व में धीरे-धीरे बड़ा परिवर्तन आ सकता है।

10. अपने सिद्धांतों और आत्मसम्मान से समझौता मत कीजिए

जीवन में धन, पद और प्रसिद्धि महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन इनसे बड़ा है आत्मसम्मान। यदि किसी सफलता के लिए हमें अपने सिद्धांत बेचने पड़ें तो वह सफलता वास्तव में असफलता है।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन हमें लक्ष्य, अनुशासन और मूल्यों के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

किसी भी बड़े निर्णय से पहले स्वयं से एक सवाल पूछिए—“क्या इस निर्णय के बाद भी मैं अपनी नजरों में सम्मानित रहूँगा?”

यदि उत्तर ‘हाँ’ है तो आगे बढ़िए। यदि भीतर से आवाज ‘नहीं’ कह रही है तो एक बार फिर विचार कीजिए।

सबसे बड़ी जीत स्वयं पर विजय है

स्वयं को जीतना एक दिन का काम नहीं है। यह प्रतिदिन का अभ्यास है। कभी हम क्रोध पर विजय पाएँगे, कभी आलस्य पर, कभी भय पर और कभी अपनी नकारात्मक सोच पर। कई बार हम असफल भी होंगे। लेकिन असली आत्मविजय यह है कि असफल होने के बाद भी हम स्वयं को फिर संभाल लें।

दूसरों को जीतने के लिए शक्ति की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन स्वयं को जीतने के लिए अनुशासन, धैर्य और आत्मबोध चाहिए।

दुनिया में सबसे कठिन मुकाबला किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं, अपने ही मन से होता है। जिस दिन मनुष्य अपने मन का स्वामी बन जाता है, उस दिन बाहरी परिस्थितियों का प्रभाव बहुत कम हो जाता है।

इसलिए अगली बार जब आप किसी को हराने या किसी से आगे निकलने की कोशिश करें, तो कुछ क्षण रुककर अपने भीतर झाँकिए और स्वयं से पूछिए—

“क्या मैंने स्वयं को जीत लिया है?”

क्योंकि जिसने स्वयं को जीत लिया, उसके लिए दुनिया को जीतना उतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता।

अपने मन को आदेश देना सीखिए, मन के आदेश पर चलना नहीं—यही आत्मविजय का सबसे सरल सूत्र है।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों में चुनावी उठापटक

 

न्यायालयों के चक्कर में पिसते निवासी

दिल्ली-एनसीआर में पिछले दस वर्षों का लेखा-जोखा 

दिल्ली-एनसीआर में पिछले एक दशक में बहुमंजिला आवासीय परिसरों का जिस तेजी से विस्तार हुआ है, उसी तेजी से इनके प्रबंधन से जुड़े विवाद भी बढ़े हैं। हजारों परिवारों ने जीवनभर की कमाई लगाकर इन परिसरों में अपना घर बनाया। उन्हें उम्मीद थी कि सुरक्षित वातावरण, स्वच्छता, बिजली-पानी, सुरक्षा, उद्यान, पार्किंग और अन्य सुविधाओं के साथ उन्हें शांतिपूर्ण सामुदायिक जीवन मिलेगा। लेकिन अनेक आवासीय परिसरों में अब स्थिति यह है कि चुनाव, पदाधिकारियों के कार्यकाल, सदस्यता, धन के हिसाब-किताब और रखरखाव को लेकर विवाद न्यायालयों तक पहुँच रहे हैं। जिस संस्था का उद्देश्य निवासियों के हितों की रक्षा करना और परिसर का सुचारु संचालन होना चाहिए, वही संस्था कई जगह गुटबाजी का केंद्र बन गई है। सवाल यह नहीं है कि चुनाव क्यों होते हैं। चुनाव तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा हैं। सवाल यह है कि चुनाव के बाद भी विवाद क्यों समाप्त नहीं होते और कई बार चुनाव स्वयं विवाद का कारण क्यों बन जाते हैं?

पिछले दस वर्षों के दिल्ली-एनसीआर के घटनाक्रम पर नजर डालें तो तस्वीर काफी कुछ कहती है।

2016 : चुनाव को लेकर गिरफ्तारी तक

दिसंबर 2016 में गाजियाबाद के राजनगर विस्तार स्थित रिवर हाइट्स आवासीय परिसर का मामला चर्चा में आया। यहाँ लगभग 760 आवासीय इकाइयाँ थीं। तत्कालीन अपार्टमेंट स्वामी संघ की कार्यकारिणी का कार्यकाल 27 सितंबर 2016 को समाप्त हो चुका था और चुनाव प्रस्तावित थे। चुनाव की घोषणा को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि तत्कालीन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को गिरफ्तार तक किया गया। बाद में दोनों को जमानत मिल गई। इसी दौर में गाजियाबाद की शिप्रा रिवेरा, एंजेल मर्क्युरी, शिप्रा सन सिटी और शिप्रा विंडसर नोवा जैसी आवासीय सोसायटियों के चुनाव भी विवादों में रहे। यह पहला संकेत था कि आवासीय परिसरों के चुनाव अब केवल आंतरिक मामला नहीं रह गए हैं। प्रशासन और पुलिस तक को हस्तक्षेप करना पड़ रहा था।

2018 : बार-बार टलते चुनाव

नोएडा के मधुवन अपार्टमेंट में वर्ष 2018 में चुनाव चौथी बार स्थगित हुआ। इस परिसर में लगभग 240 आवासीय इकाइयाँ थीं और करीब 220 सदस्य बताए गए थे। चुनाव की प्रक्रिया को लेकर असहमति इतनी बढ़ी कि मतदान बार-बार टलता रहा। यह घटना उस समस्या की ओर संकेत करती है जो आने वाले वर्षों में और व्यापक हुई—चुनाव कराने से पहले ही मतदाता सूची, सदस्यता और चुनाव प्रक्रिया पर विवाद।

2019 : तीन वर्षों से चुनाव नहीं

ग्रेटर नोएडा के एनआरआई सिटी आवासीय परिसर में वर्ष 2019 में सामने आया कि लगभग तीन वर्षों से चुनाव नहीं हुए थे। निवासियों ने पानी, बिजली और अग्नि-सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें कीं। यहाँ सवाल केवल चुनाव का नहीं था। प्रश्न यह था कि जब निर्वाचित संस्था का कार्यकाल समाप्त हो जाए और नई संस्था का गठन न हो तो परिसर की व्यवस्था और वित्तीय निर्णयों के लिए जिम्मेदार कौन होगा? यही प्रश्न बाद में दिल्ली-एनसीआर की अनेक आवासीय सोसायटियों में उठता रहा।

2020-21 : महामारी के बीच सदस्यता का सवाल

कोरोना महामारी के कारण 2020 में सामान्य सामाजिक और प्रशासनिक गतिविधियाँ प्रभावित हुईं। इसका असर आवासीय परिसरों के चुनाव पर भी पड़ा। 2021 में नोएडा में नोएडा निवासी कल्याण संघों के महासंघ के चुनाव को लेकर मतदान के अधिकार पर बहस हुई। केवल निर्वाचित निवासी कल्याण संघ के सदस्यों को मतदान का अधिकार देने की व्यवस्था सामने आई। इससे एक मूल प्रश्न सामने आया—किसे सदस्य माना जाए और किसे मतदान का अधिकार मिले? फ्लैट पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर हो तो मतदान कौन करे? सह-मालिक का अधिकार क्या हो? बकाया रखरखाव शुल्क वाले सदस्य का मतदान अधिकार रहेगा या नहीं? किरायेदार की भूमिका क्या होगी? ऐसे सवाल बाद के वर्षों में अनेक विवादों का कारण बने।

2022-23 : निर्माणकर्ता से लेकर निवासी संघ तक संघर्ष

इस अवधि में दिल्ली-एनसीआर के कई आवासीय परिसरों में निर्माणकर्ताओं से सामुदायिक क्षेत्र का हस्तांतरण, रखरखाव, पार्किंग और सुविधाओं को लेकर विवाद सामने आते रहे। कई स्थानों पर निवासियों ने पहले निर्माणकर्ता के विरुद्ध संघर्ष किया। निर्माणकर्ता से परिसर का नियंत्रण निवासी संस्था को मिलने के बाद विवाद का केंद्र बदलकर स्वयं निवासी संस्था बन गया। यानी लड़ाई पहले निर्माणकर्ता बनाम निवासी थी, बाद में कई जगह निवासी बनाम निवासी हो गई।

2024 : लोकतंत्र बाहर भी और भीतर भी

वर्ष 2024 का एक दिलचस्प तथ्य सामने आया। लोकसभा चुनाव के दौरान नोएडा और गाजियाबाद की 103 आवासीय सोसायटियों में 152 मतदान केंद्र बनाए गए। नोएडा की 34 बहुमंजिला आवासीय सोसायटियों में 52 और दादरी क्षेत्र की 33 सोसायटियों में 49 मतदान केंद्र बनाए गए। देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनाव के लिए इन सोसायटियों में मतदान की व्यवस्था हो गई, लेकिन इन्हीं में से अनेक परिसरों के अपने निवासी संघ के चुनाव विवादों में फँसे रहे। इसी वर्ष गाजियाबाद की गौर होम्स सोसायटी में 150 से अधिक निवासियों ने प्रदर्शन किया। निवासियों ने कई वर्षों से सामान्य सभा की बैठक न होने और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए। यहाँ एक बड़ा प्रश्न सामने आया—क्या निवासियों को केवल चुनाव के समय याद किया जाना चाहिए या पूरे कार्यकाल में उन्हें निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए?

2025 : प्रशासन को चुनाव में उतरना पड़ा

वर्ष 2025 तक स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि नोएडा प्रशासन को लंबित चुनावों में सक्रिय भूमिका निभानी पड़ी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार नोएडा में लगभग 50 ऐसी सोसायटियों को चिन्हित किया गया, जहाँ निवासी कल्याण संघ के चुनाव लंबे समय से लंबित थे। इनमें से लगभग 20 सोसायटियों में प्रशासन की निगरानी में चुनाव कराए गए। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार नोएडा और ग्रेटर नोएडा के अनेक क्षेत्रों में कुछ निवासी संस्थाओं के चुनाव तीन वर्ष से अधिक समय से लंबित थे। ग्रेटर नोएडा में करीब 45 निवासी कल्याण संघों से जुड़े एक महासंघ के पदाधिकारी ने भी कई संस्थाओं में वर्षों से चुनाव न होने की बात कही थी। यहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक विचित्र रूप दिखाई दिया—जिस संस्था को स्वयं लोकतांत्रिक प्रक्रिया चलानी थी, उसके चुनाव कराने के लिए प्रशासन को आगे आना पड़ा।

2026 : समस्या का दायरा और बड़ा

वर्ष 2026 में स्थिति और स्पष्ट हुई। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में 1,000 से अधिक पंजीकृत निवासी कल्याण संघ और अपार्टमेंट स्वामी संघ होने की जानकारी सामने आई। प्रशासन के सामने शिकायतें थीं कि कुछ संस्थाओं के पदाधिकारी निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी वर्षों तक पद पर बने हुए हैं। कुछ मामलों में चुनाव पाँच से छह वर्ष तक नहीं हुए। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार केवल पिछले आठ महीनों में नोएडा में लगभग 30 और गाजियाबाद में लगभग 20 आवासीय परिसरों में प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद चुनाव कराए गए। लेकिन चुनाव करा देना ही समाधान नहीं है।

ग्रेटर नोएडा के अल्फा-1 क्षेत्र में वर्ष 2026 में लगभग 15 वर्ष बाद निवासी कल्याण संघ के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई। वहाँ भी मतदाता सूची विवाद का कारण बन गई। लगभग 226 लोगों ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया, जबकि कुछ निवासियों ने आरोप लगाया कि करीब 78 ऐसे लोगों के नाम अब भी सूची में हैं, जिन्होंने अपनी संपत्ति बेच दी थी। यह घटना बताती है कि चुनाव की असली बुनियाद ही मतदाता सूची है। यदि सूची सही नहीं है तो चुनाव की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

गाजियाबाद में न्यायालय तक पहुँचे विवाद

गाजियाबाद की क्लासिक रेजिडेंसी का चुनाव विवाद 2026 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक पहुँचा। चुनाव को निर्धारित समय के बाद कराया गया मानकर उसकी वैधता पर प्रश्न उठाया गया। न्यायालय के सामने यह सवाल भी आया कि निर्धारित समय सीमा के बाद हुए चुनावों की वैधता किस प्रकार तय की जाए। गाजियाबाद प्रशासन को निवासी संघों से संबंधित शिकायतों की जाँच के लिए विशेष समिति तक बनानी पड़ी। शिकायतों में चुनावी विवाद के साथ वित्तीय अनियमितता, रखरखाव, पद के अधिकारों के दुरुपयोग और निवासियों के उत्पीड़न जैसे विषय भी शामिल थे।

गुरुग्राम भी अछूता नहीं

गुरुग्राम में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। 2026 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष सेक्टर-17बी निवासी कल्याण संघ का मामला पहुँचा। न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित कार्यकारिणी का कार्यकाल 31 मार्च 2023 को समाप्त हो चुका था। इसके बाद फरवरी 2024 में अस्थायी समिति बनाई गई और चुनाव अधिकारी नियुक्त किया गया, लेकिन चुनाव नहीं हो सके। अंततः प्रशासक-सह-निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करने की स्थिति बनी। गुरुग्राम में 2026 में 40 से अधिक अपार्टमेंट स्वामी संघों के प्रतिनिधियों की बैठक में अलग जिला पंजीयक, विवाद निवारण की तेज व्यवस्था और नियमों में सुधार की माँग भी सामने आई।

आखिर समस्या कहाँ है?

पिछले दस वर्षों के घटनाक्रम को देखें तो विवाद के कारण लगभग समान दिखाई देते हैं—

समय पर चुनाव न होना।
कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी पद पर बने रहना।
सदस्यता को लेकर विवाद।
मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप।
रखरखाव राशि के हिसाब-किताब पर सवाल।
निर्माणकर्ता से सामुदायिक संपत्तियों का हस्तांतरण।
बड़े ठेकों और खर्चों में पारदर्शिता की माँग।
और अंततः न्यायालय की शरण।

लेकिन यहाँ एक सावधानी भी जरूरी है। पूरे दिल्ली-एनसीआर के लिए पिछले दस वर्षों में हुए सभी निवासी संघ विवादों, मुकदमों और लंबित चुनावों की एकीकृत सरकारी संख्या उपलब्ध नहीं है। इसलिए अलग-अलग जिलों और सोसायटियों के आँकड़ों को जोड़कर कोई काल्पनिक कुल संख्या बताना उचित नहीं होगा।

पिसता कौन है?

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। विवाद में एक पक्ष वकील करता है, दूसरा पक्ष भी वकील करता है। शिकायतें होती हैं, जवाब आते हैं, अधिकारी जाँच करते हैं और न्यायालय में तारीखें पड़ती हैं। लेकिन आम निवासी? उसे तो हर महीने रखरखाव शुल्क देना है। लिफ्ट चलनी चाहिए। सुरक्षा बनी रहनी चाहिए। पानी आना चाहिए। बिजली की व्यवस्था होनी चाहिए। बच्चों के खेलने की जगह सुरक्षित रहनी चाहिए। यदि विवाद वर्षों चलता रहा तो उसकी कीमत अंततः सभी निवासी चुकाते हैं—धन से भी और मानसिक तनाव से भी।

समाधान क्या है?

जरूरत है कि प्रत्येक आवासीय परिसर में चुनाव की निश्चित समय-सीमा हो। मतदाता सूची समय से प्रकाशित हो। सदस्यता के नियम स्पष्ट हों। आय-व्यय का नियमित लेखा परीक्षण कराया जाए और उसकी जानकारी निवासियों को दी जाए। बड़े ठेकों में पारदर्शिता हो। कार्यकारिणी का कार्यकाल समाप्त होते ही चुनाव की स्वचालित प्रक्रिया शुरू हो। विवाद की स्थिति में न्यायालय जाने से पहले प्रभावी मध्यस्थता और शिकायत निवारण की व्यवस्था हो। निवासियों की भी जिम्मेदारी है। केवल शिकायत करने से काम नहीं चलेगा। उन्हें बैठकों में भाग लेना होगा, नियम पढ़ने होंगे, हिसाब माँगना होगा और मतदान करना होगा। क्योंकि लोकतंत्र केवल मत डालने का नाम नहीं है; जवाबदेही सुनिश्चित करने का नाम भी है।

दस वर्षों का सबसे बड़ा सबक

2016 से 2026 तक दिल्ली-एनसीआर की घटनाएँ एक बात स्पष्ट करती हैं—आवासीय सोसायटी की समिति की कुर्सी सत्ता की कुर्सी नहीं, सेवा की कुर्सी है। जिस पद के लिए पड़ोसी अपने पड़ोसी से लड़ने लगे, जिस चुनाव को कराने के लिए प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़े और जिस विवाद को अंततः न्यायालय तक जाना पड़े, वहाँ जीत किसी व्यक्ति या गुट की हो सकती है, लेकिन नुकसान पूरे समुदाय का होता है। आखिर सोसायटी किसी अध्यक्ष, सचिव या कार्यकारिणी की निजी संपत्ति नहीं है। वह उन सभी परिवारों का साझा घर है, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई लगाकर वहाँ आशियाना बनाया है। इसलिए आवश्यकता कुर्सी पाने की नहीं, व्यवस्था बचाने की है। यदि अगले दस वर्षों में आवासीय परिसरों में चुनाव पारदर्शी, समयबद्ध और नियमबद्ध हो पाए, तो शायद निवासी न्यायालयों के चक्कर लगाने के बजाय अपने परिवार के साथ उसी घर में चैन की साँस ले सकेंगे, जिसे उन्होंने कभी सुकून का आशियाना समझकर खरीदा था।


लेखक 

डॉ. चेतन आनंद

(कवि एवं पत्रकार)



कवि सम्मेलन पिकनिक नहीं, पाठशाला है

 लेख-

 कवि सम्मेलन साहित्य का अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली मंच रहा है। यह केवल कविता सुनने-सुनाने का आयोजन नहीं, बल्कि भाषा, साहित्य, संस्कार, संवेदना और सामाजिक चेतना का जीवंत उत्सव हुआ करता था। कवि सम्मेलन में कवि अपनी रचना लेकर आता था, लेकिन साथ ही वह दूसरे कवियों को सुनने, उनसे सीखने और अच्छी कविता पर दाद देने का संस्कार भी लेकर आता था। लेकिन आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे कवि सम्मेलन अपनी मूल आत्मा से दूर होते जा रहे हैं? क्या साहित्य का मंच धीरे-धीरे ऐसा स्थान बनता जा रहा है जहाँ कवि आते हैं, अपनी कविता सुनाते हैं, तस्वीर खिंचवाते हैं और फिर बिना किसी दूसरे कवि को सुने चले जाते हैं? कहीं-कहीं तो स्थिति इतनी विचित्र दिखाई देती है कि कवि सम्मेलन में शामिल कवि ही एक-दूसरे को सुनने के लिए उपलब्ध नहीं होते। प्रत्येक को अपनी बारी का इंतजार रहता है। अपनी बारी आई, कविता सुनाई, तालियाँ बटोरीं और फिर प्रस्थान। मानो साहित्यिक आयोजन नहीं, कोई ऐसी यात्रा हो जिसमें प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए आया हो। इसीलिए कभी-कभी मन में सवाल उठता है कि क्या मंच अब पिकनिक स्पॉट बनने लगे हैं?

मंच कविता से बड़ा नहीं

कवि सम्मेलन का सबसे पहला अनुशासन यह होना चाहिए कि मंच कविता से बड़ा नहीं है और कवि मंच से बड़ा नहीं है। मंच साहित्य का है। वहाँ आने वाला प्रत्येक कवि साहित्य का प्रतिनिधि बनकर आता है। इसलिए उसका दायित्व केवल अपनी कविता सुनाकर समाप्त नहीं हो जाता। वह जिस मंच पर बैठा है, वहाँ किसी अन्य कवि की रचना भी साहित्य ही है। उसे सुनना, समझना और सम्मान देना भी उसकी जिम्मेदारी है। पहले के कवि सम्मेलनों की एक बड़ी खूबसूरती यही थी कि कवि स्वयं अच्छे श्रोता भी होते थे। वरिष्ठ कवि कनिष्ठ को सुनते थे। एक विधा का कवि दूसरी विधा के कवि को सुनता था। हास्य कवि गंभीर कविता का आनंद लेता था और गीतकार मुक्तक पर दाद देता था। किसी की पंक्ति अच्छी लगी तो तालियाँ बजती थीं, चाहे वह पंक्ति किसी बड़े नाम की हो या किसी नए रचनाकार की। कविता के प्रति सम्मान, कवि के प्रति सम्मान से भी बड़ा था।
पहले मंच सीखने की जगह थे
कवि सम्मेलन वास्तव में साहित्य की पाठशाला हुआ करते थे। नया कवि मंच पर आता था तो उसके लिए केवल तालियाँ महत्वपूर्ण नहीं होती थीं। वह देखता था कि वरिष्ठ कवि श्रोताओं से कैसे संवाद कर रहा है, कविता का चयन कैसे कर रहा है, प्रस्तुति में ठहराव कहाँ है, शब्दों का उच्चारण कैसा है और मंच की गरिमा कैसे बनाए रखी जाती है। कई बार किसी वरिष्ठ कवि की दो पंक्तियाँ भी नए कवि के लिए पूरी पाठशाला बन जाती थीं। आज भी वरिष्ठ रचनाकारों से सीखने की उतनी ही आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए पहले सुनने का धैर्य चाहिए। जो व्यक्ति केवल स्वयं बोलना चाहता है, वह सीख नहीं सकता।
अपनी सुनाओ और भाग जाओ
आज अनेक आयोजनों में एक प्रवृत्ति दिखाई देती है-“अपनी सुनाओ और भाग जाओ।” कवि कार्यक्रम में पहुँचा। मंच पर गया। संचालक ने परिचय दिया। कवि ने अपनी दो-चार रचनाएँ सुनाईं। फोटो खिंची। वीडियो बना। सोशल मीडिया के लिए सामग्री तैयार हुई और कवि अगले कार्यक्रम के लिए निकल गया। दूसरी ओर मंच पर बैठा अगला कवि भी शायद यही सोच रहा है कि कब उसकी बारी आए और कब वह अपनी प्रस्तुति देकर चला जाए। यदि सभी यही करने लगें तो कवि सम्मेलन में सामूहिक साहित्यिक अनुभव कहाँ बचेगा? कवि सम्मेलन का अर्थ केवल “मेरा पाठ” नहीं, बल्कि “हमारा साहित्य” होना चाहिए।
मंच का अनुशासन क्यों आवश्यक है?
कवि सम्मेलन में मंचीय अनुशासन अत्यंत आवश्यक है। सबसे पहले समय का सम्मान होना चाहिए। प्रत्येक कवि को निर्धारित समय दिया जाए और संचालक निष्पक्षता से उसका पालन कराए। किसी बड़े नाम के कारण समय की सीमा समाप्त हो जाए और नए कवि को जल्दी-जल्दी कविता पढ़नी पड़े, यह उचित नहीं। दूसरा है क्रम का सम्मान। कार्यक्रम का क्रम आयोजक और संचालक तय करते हैं। बार-बार अपनी सुविधा के अनुसार क्रम बदलवाना मंचीय अनुशासन के अनुकूल नहीं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण है दूसरे कवि को सुनना। जब कोई कवि कविता पढ़ रहा हो तो बाकी कवियों का बातचीत करना, मोबाइल में व्यस्त रहना, मंच के पीछे आना-जाना या आपस में चर्चा करना उसकी रचना और श्रोताओं दोनों का अपमान है। चैथा है संचालक का सम्मान। संचालक केवल नाम पुकारने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह पूरे कार्यक्रम की गति, गरिमा और संतुलन का जिम्मेदार होता है। उसे भी निष्पक्ष और संयमित रहना चाहिए।
हास्य हो, लेकिन मर्यादा के साथ
कवि सम्मेलन में हास्य और व्यंग्य की अपनी विशेष जगह है। हास्य कविता वातावरण को हल्का करती है और श्रोताओं को जोड़ती है। लेकिन हास्य के नाम पर व्यक्तिगत टिप्पणी, अश्लीलता, किसी की निजी जिंदगी पर कटाक्ष या किसी कवि का सार्वजनिक उपहास मंच की गरिमा को कम करता है। हँसाना कला है, लेकिन किसी को अपमानित किए बिना हँसाना उससे बड़ी कला है। इसी प्रकार राजनीतिक या सामाजिक विषयों पर कविता कही जा सकती है, व्यंग्य किया जा सकता है, लेकिन व्यक्तिगत द्वेष को साहित्य का नाम देना उचित नहीं।
तालियों की भूख या कविता की साधना?
आज सोशल मीडिया ने कवि सम्मेलन को एक नया आयाम दिया है। कविता के साथ वीडियो, रील, फोटो और लाइव प्रसारण भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। यह तकनीक बुरी नहीं है। इससे कविता दूर-दूर तक पहुँच सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब कविता माध्यम न रहकर केवल कंटेंट बन जाती है। कवि की चिंता कविता से अधिक यह हो जाए कि किस पंक्ति पर कितनी तालियाँ मिलीं, कितने वीडियो बने और कितने लोगों ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी, तो साहित्य की साधना पीछे छूटने लगती है। कवि को तालियाँ मिलें, यह अच्छी बात है। लेकिन तालियों से बड़ी उपलब्धि यह है कि श्रोता कविता की कोई पंक्ति अपने मन में लेकर घर जाए।
कवि सम्मेलन पिकनिक नहीं, पाठशाला है
कवि सम्मेलन में आना, कविता सुनाना और चले जाना आसान है। लेकिन कविता सुनना, दूसरे की सफलता पर प्रसन्न होना, अच्छी पंक्ति पर खुलकर दाद देना और अपनी बारी का इंतजार करना-यही वास्तविक मंचीय संस्कार है। मंच कोई पिकनिक स्पॉट नहीं है। मंच साहित्य की पाठशाला है। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति विद्यार्थी भी है और शिक्षक भी। कोई अपनी कविता से सिखाता है, कोई अपनी प्रस्तुति से, कोई अपने व्यवहार से और कोई अपनी विनम्रता से। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कवि सम्मेलन की सफलता केवल मंच पर बैठे कवियों से तय नहीं होती, बल्कि इस बात से तय होती है कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद श्रोता साहित्य के कितने करीब पहुँचे।
आखिर हम कैसा मंच चाहते हैं?
हमें ऐसा मंच चाहिए जहाँ वरिष्ठता का सम्मान हो, लेकिन नए कवि के लिए दरवाजा खुला रहे। ऐसा मंच चाहिए जहाँ हास्य हो, लेकिन मर्यादा भी हो। ऐसा मंच चाहिए जहाँ तालियाँ हों, लेकिन साहित्य तालियों का गुलाम न हो। ऐसा मंच चाहिए जहाँ कवि अपनी कविता सुनाए, लेकिन दूसरे की कविता सुनने का संस्कार भी रखे। ऐसा मंच चाहिए जहाँ फोटो खिंचें, वीडियो बनें, सोशल मीडिया पर प्रसारण हो लेकिन इन सबके बीच कविता कहीं खो न जाए। और सबसे महत्वपूर्ण, ऐसा मंच चाहिए जहाँ कवि यह न सोचे कि “मेरी बारी कब आएगी?”, बल्कि यह भी सोचे कि “अभी कौन-सी अच्छी कविता सुनने को मिल रही है?” क्योंकि सच्चा कवि केवल अच्छा वक्ता नहीं होता, वह अच्छा श्रोता भी होता है। मंच पर आने की जल्दी से अधिक, मंच के योग्य बनने की तैयारी होनी चाहिए। और शायद आज के कवि सम्मेलनों के लिए इससे बड़ी सीख और कोई नहीं। अपनी सुनाना ही कवि का धर्म नहीं, अच्छी कविता को सुनना भी साहित्य का सम्मान है। यदि हम यह संस्कार बचा पाए, तो कवि सम्मेलन केवल कार्यक्रम नहीं रहेंगे, वे फिर से साहित्य की जीवंत पाठशालाएँ बन सकेंगे।

-डॉ. चेतन आनंद
 (कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

सत्य निकेतन से गाजियाबाद-नोएडा तक

 आवश्यक लेख-

कब्जों और अवैध निर्माण ने कितनी बड़ी कीमत वसूली?
सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी भवन का भरभराकर गिरना केवल एक इमारत का हादसा नहीं है। यह दिल्ली-एनसीआर के उस शहरी विकास मॉडल पर गंभीर सवाल है, जिसमें आवासीय मकान पीजी बन जाते हैं, स्वीकृत नक्शे से अधिक मंजिलें खड़ी हो जाती हैं, बेसमेंट का उपयोग बदल जाता है और सरकारी अथवा ग्रीन बेल्ट की जमीन पर कब्जे धीरे-धीरे स्थायी निर्माण में बदल जाते हैं। सत्य निकेतन में सात लोगों की मौत और पांच लोगों के घायल होने के बाद यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या प्रशासन अवैध निर्माण को हादसे से पहले पहचानता है या हादसे के बाद जागता है?
सत्य निकेतन-चेतावनी नहीं, आईना
7 सितंबर को दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में लगभग 50-55 वर्ष पुरानी पांच मंजिला इमारत अचानक ढह गई। इसमें मुख्यतः विद्यार्थी रहते थे। बचाव अभियान में 12 लोगों को मलबे से निकाला गया, जिनमें सात की मृत्यु हो गई और पांच घायल हुए। भवन में निर्माण-मरम्मत का काम चल रहा था और बेसमेंट में भी काम होने की जानकारी सामने आई है।  एमसीडी की प्रारंभिक जांच के अनुसार भवन के पास स्वीकृत नक्शा नहीं था, बेसमेंट अनधिकृत था, फायर एनओसी नहीं थी और पांचवीं मंजिल भी नियमों के अनुरूप स्वीकृत नहीं थी। सबसे चैंकाने वाली बात यह है कि इस भवन को इस साल के मानसून-पूर्व सर्वे में खतरनाक घोषित भवनों की सूची में शामिल नहीं किया गया था। दिल्ली में 2020 से 2024 के बीच ढांचे गिरने से लगभग 170 मौतें दर्ज हुईं। इसलिए सत्य निकेतन को एक अलग-थलग दुर्घटना मानना मुश्किल है।
दिल्ली में कार्रवाई के आंकड़े भी कम गंभीर नहीं
सत्य निकेतन जैसी घटनाओं के बीच दिल्ली में अवैध निर्माण के विरुद्ध अभियान के आंकड़े बताते हैं कि समस्या कितनी व्यापक है। जून 2026 में एमसीडी ने एक अभियान में 217 अनधिकृत ढांचे गिराए और 237 संपत्तियां सील कीं। इसके अलावा 330 कारण बताओ नोटिस, 151 सीलिंग नोटिस और 91 ध्वस्तीकरण आदेश जारी किए गए। राजस्व विभाग ने केवल 5 से 15 जून के बीच दिल्ली में 773 स्थानों का निरीक्षण किया। पश्चिमी दिल्ली में 165, दक्षिण दिल्ली में 93, उत्तर दिल्ली में 89 और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में 70 निरीक्षण हुए। इन निरीक्षणों में अनधिकृत निर्माण, अग्नि सुरक्षा और भूमि-उपयोग से जुड़े उल्लंघन मिले।  लेकिन सवाल यह है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करनी पड़ रही है, तो ये निर्माण बनते समय दिखाई क्यों नहीं दिए?
पीजी संस्कृति ने बढ़ाया खतरा
दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों के आसपास निजी पीजी की मांग बहुत अधिक है। इसी मांग ने कई आवासीय इलाकों में मकानों को बहुमंजिला पीजी में बदलने का रास्ता खोला है। सत्य निकेतन में जिस इमारत के गिरने से सात जानें गईं, उसके आसपास भी कई भवन पीजी के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। जांच में आसपास के कुछ पीजी में संकरे रास्ते, सीमित प्रवेश-निकास और बिजली व्यवस्था से जुड़े सुरक्षा सवाल सामने आए हैं। यही स्थिति गुरुग्राम में भी दिखाई देती है। वहां 453 पीजी चिन्हित किए गए हैं और 18 को सील किया जा चुका है। डीएलएफ फेज-3 में कार्रवाई के दौरान चार पीजी भवनों के 181 कमरे सील किए गए और 29 अवैध व्यावसायिक इकाइयों पर भी ताले लगाए गए। यानी सत्य निकेतन का सवाल केवल दिल्ली का नहीं, बल्कि पूरे एनसीआर के पीजी मॉडल का सवाल बन चुका है।
गुरुग्राम-घर से पीजी और पीजी से व्यावसायिक परिसर
गुरुग्राम में कई आवासीय क्षेत्रों में अतिरिक्त मंजिलों और स्टिल्ट पार्किंग के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से विवाद है। डीएलएफ फेज-3 में कार्रवाई के दौरान ऐसे भवन भी मिले जिनमें स्वीकृत सीमा से अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं। एक अभियान में 13 अनधिकृत निर्माण ध्वस्त किए गए और 18 भवन सील किए गए। साथ ही लगभग डेढ़ एकड़ एमसीजी जमीन कब्जामुक्त कराई गई।  यहां सवाल केवल भवन का नहीं है। जब आवासीय प्लॉट पर अतिरिक्त मंजिल बनती है, दर्जनों लोग रहने लगते हैं और नीचे व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं तो सड़क, पार्किंग, सीवर, पानी और अग्नि सुरक्षा सभी पर दबाव बढ़ता है।
गाजियाबाद-हिंडन के किनारे 258 अवैध कॉलोनियां
गाजियाबाद की तस्वीर और भी चिंताजनक है। प्रशासन के अनुसार हिंडन नदी के किनारे 258 अवैध कॉलोनियां बसी हुई हैं। जिलाधिकारी ने यमुना और हिंडन नदी क्षेत्रों में सरकारी जमीनों पर हुए अतिक्रमण का सर्वे कराकर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यह केवल जमीन कब्जाने का मामला नहीं है। नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण होने का सीधा असर जलनिकासी और बाढ़ के जोखिम पर पड़ता है। जुलाई 2026 में भी हिंडन के बाढ़ क्षेत्र में नए मकान, पशुशालाएं, शौचालय और अन्य निर्माण दिखाई देने की रिपोर्ट सामने आई। यानी जिस जमीन को प्राकृतिक जल प्रवाह और बाढ़ नियंत्रण के लिए खुला रहना चाहिए, वहां धीरे-धीरे आबादी और निर्माण खड़ा हो रहा है।
नोएडा-5,903 करोड़ की जमीन कब्जामुक्त
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में अतिक्रमण का पैमाना जमीन के आंकड़ों से समझा जा सकता है। गौतमबुद्धनगर पुलिस के अनुसार 2025 से जून 2026 तक 13 लाख 25 हजार 960 वर्ग गज सरकारी और प्राधिकरण की जमीन अतिक्रमण से मुक्त कराई गई। इसकी अनुमानित कीमत 5,903 करोड़ 95 लाख रुपये से अधिक बताई गई है। इसमें सेंट्रल नोएडा 8,89,127 वर्ग गज, ग्रेटर नोएडा 4,21,833 वर्ग गज, नोएडा 15,000 वर्ग गज जमीन शामिल है। कई मामलों में भूमाफियाओं ने सरकारी जमीन पर बाउंड्रीवाल, निर्माण या अवैध प्लॉटिंग की थी और कुछ मामलों में एफआईआर भी दर्ज हुई। यह आंकड़ा बताता है कि नोएडा में मामला केवल सड़क या फुटपाथ के कब्जे तक सीमित नहीं है। यहां हजारों करोड़ रुपये मूल्य की जमीन भी अतिक्रमण के निशाने पर रही है।
फरीदाबाद-ग्रीन बेल्ट भी सुरक्षित नहीं
फरीदाबाद में भी नगर निगम, एफएमडीए और एचएसवीपी को लगातार अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाने पड़ रहे हैं। पिछले एक वर्ष में शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में हजारों अस्थायी और स्थायी अतिक्रमण हटाए जाने की जानकारी सामने आई है। समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एफएमडीए ने सेक्टर-88 की ग्रीन बेल्ट और सरकारी जमीन को दोबारा कब्जे से बचाने के लिए लगभग 1.53 करोड़ रुपये की फेंसिंग परियोजना शुरू की है। प्रशासन को कई स्थानों पर एक ही जगह बार-बार अतिक्रमण हटाना पड़ता है। ग्रीन बेल्ट पर कब्जा केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं है। इससे बारिश के पानी की निकासी भी प्रभावित होती है और जलभराव बढ़ सकता है।
क्या मास्टर प्लान की धज्जियां उड़ रही हैं?
इस प्रश्न का उत्तर अब टालना मुश्किल है। दिल्ली की सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमेटी ने जुलाई 2026 में ही आवासीय परिसरों में मिश्रित उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियों के कारण अग्नि सुरक्षा नियमों, यूबीबीएल-2016 और मास्टर प्लान-2021 के उल्लंघन पर रिपोर्ट दर्ज की है। अर्थात समस्या केवल यह नहीं कि किसी ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया। असली समस्या यह है कि आवासीय मकान पीजी बन गया। पीजी बहुमंजिला हो गया। बेसमेंट का उपयोग बदल गया। पार्किंग व्यावसायिक गतिविधि में चली गई। ग्रीन बेल्ट पर निर्माण हो गया। नदी के बाढ़ क्षेत्र में कॉलोनी बस गई। इन सबका संयुक्त परिणाम शहर की नियोजित संरचना को कमजोर करता है।
सबसे बड़ा सवाल, प्रशासन पहले क्यों नहीं जागता
सत्य निकेतन हादसे के बाद भवन मालिक परिवार के तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया गया और पांच एमसीडी अधिकारियों को निलंबित किया गया। सभी पीजी और हॉस्टल भवनों के संरचनात्मक ऑडिट की मांग भी तेज हुई है। लेकिन असली कसौटी यही होगी कि क्या यह कार्रवाई हादसे के बाद तक सीमित रहती है या व्यवस्था बदलती है? दिल्ली-एनसीआर में एक साझा डिजिटल रजिस्टर होना चाहिए, जिसमें प्रत्येक पीजी, गेस्ट हाउस और बहुमंजिला आवासीय भवन की स्थिति दर्ज हो, स्वीकृत नक्शा, वास्तविक मंजिलें, फायर एनओसी, संरचनात्मक ऑडिट, भूमि उपयोग और कार्रवाई की स्थिति।
कब्जे का इलाज बुलडोजर नहीं, रोकथाम है
सत्य निकेतन की सात मौतें हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि शहरों में अवैध निर्माण आखिर बनता कैसे है। 13 लाख वर्ग गज जमीन कब्जामुक्त कराने के बाद भी यदि नए कब्जे होते रहें, 258 अवैध कॉलोनियां नदी किनारे बनी रहें और 453 पीजी में से 18 को हादसे के डर के बीच सील करना पड़े, तो समस्या केवल अतिक्रमणकारियों की नहीं है। यह निगरानी और नियोजन की भी समस्या है। दिल्ली-एनसीआर को अब केवल यह बताने की जरूरत नहीं कि कितने कब्जे हटाए गए। उसे यह बताना होगा कि कितने कब्जे बनने से पहले रोके गए, कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, कितने अवैध पीजी बंद हुए और कितनी जानें बचाई गईं। क्योंकि सत्य निकेतन के मलबे के नीचे केवल सात लोग नहीं दबे, उसके नीचे हमारी शहरी नियोजन व्यवस्था की कई कमजोरियां भी उजागर हुई हैं।


लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


बुधवार, 2 सितंबर 2026

हिमालय की पीड़ा, आपदाएं, पिघलते ग्लेशियर और हमारी विकास-दृष्टि

 समसामयिक लेख-

भारत का हिमालय केवल बर्फ से ढके पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है। वह देश की नदियों का उद्गम, करोड़ों लोगों के जीवन का आधार, जैव-विविधता का भंडार और जलवायु-संतुलन की एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था है। लेकिन पिछले एक दशक से हिमालय बार-बार हमें चेतावनी दे रहा है। कहीं बादल फट रहे हैं, कहीं पहाड़ दरक रहे हैं, कहीं ग्लेशियल झीलें फैल रही हैं और कहीं अचानक आने वाली बाढ़ पूरे गांव और सड़कें बहा ले जा रही है। हाल की नेपाल त्रासदी ने इस चेतावनी को फिर बेहद भयावह बना दिया है। सबसे पहले 2013 की केदारनाथ त्रासदी को याद करना जरूरी है। जून 2013 में उत्तराखंड में 14 से 18 जून के बीच असाधारण वर्षा हुई। सामान्य 71.3 मिलीमीटर के मुकाबले 385.1 मिलीमीटर वर्षा दर्ज हुई, अर्थात सामान्य से लगभग 440 प्रतिशत अधिक। सरकारी आकलन में 169 लोगों की मृत्यु और 4,021 लोगों के लापता होने की सूचना थी, जिन्हें बाद में मृत मानने की स्थिति बनी। 50 हजार करोड़ रुपये के आसपास बुनियादी ढांचे के नुकसान का अनुमान लगाया गया। केदारनाथ, गौरीकुंड, मंदाकिनी और अलकनंदा घाटियां सबसे अधिक प्रभावित हुईं। केदारनाथ ने हमें बताया था कि पहाड़ में प्रकृति की छोटी-सी अतिरिक्त मार भी कितनी बड़ी त्रासदी बन सकती है। लेकिन उसके बाद के वर्षों में घटनाओं का सिलसिला थमा नहीं।
लगातार बढ़ता खतरा
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से लेकर नेपाल और तिब्बत तक हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन, अचानक बाढ़, बादल फटना और ग्लेशियल झीलों के फटने की घटनाएं लगातार सामने आई हैं। उत्तराखंड में 2015 से 2024 के बीच 4,600 से अधिक भूस्खलन दर्ज किए गए और इनमें कम से कम 316 लोगों की मृत्यु हुई। पिथौरागढ़ में अकेले लगभग 100 मौतें दर्ज हुईं। फरवरी 2021 में चमोली की ऋषिगंगा-धौलीगंगा घाटी में हुई त्रासदी ने एक नया खतरा सामने रखा। रौंती क्षेत्र से भारी मात्रा में चट्टान और बर्फ नीचे आई और अचानक जलप्रवाह ने ऋषिगंगा तथा धौलीगंगा घाटियों को अपनी चपेट में ले लिया। दो जलविद्युत परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और 200 से अधिक लोगों की मृत्यु या लापता होने की सूचना सामने आई। यह घटना इस बात का प्रमाण थी कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर, चट्टान, पानी और मानव निर्माण मिलकर कितनी भयावह स्थिति पैदा कर सकते हैं। अक्टूबर 2023 में सिक्किम में दक्षिण ल्होनाक झील के फटने से तीस्ता नदी में अचानक भीषण बाढ़ आई। सरकारी स्थिति रिपोर्ट के अनुसार सिक्किम में 42 शव बरामद किए गए, तीस्ता नदी के क्षेत्र में पश्चिम बंगाल पुलिस ने 62 अज्ञात शव बरामद किए और 77 लोग लापता थे। 88,400 लोग प्रभावित हुए, 2,563 लोगों को बचाया गया और 5,665 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।  यह केवल बाढ़ नहीं थी। यह ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ थी। दक्षिण ल्होनाक झील का आधे से अधिक पानी अचानक निकल गया था। यही वह खतरा है जो आने वाले वर्षों में हिमालय के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन सकता है।
ग्लेशियरों की बदलती दुनिया
भारतीय हिमालय के ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव अब केवल वैज्ञानिक शोध का विषय नहीं रह गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर औसतन लगभग 14.9 मीटर प्रतिवर्ष पीछे हट रहे हैं। गंगा बेसिन में यह औसत लगभग 15.5 मीटर और ब्रह्मपुत्र बेसिन में लगभग 20.2 मीटर प्रतिवर्ष है। 1975 से 2023 तक भारतीय हिमालयी ग्लेशियरों में संचयी बर्फ-द्रव्यमान हानि का अनुमान लगभग 26 मीटर जल-समतुल्य लगाया गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के उपग्रह अध्ययन ने भी गंभीर संकेत दिए हैं। 1984 से 2023 के बीच 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 हिमनदीय झीलों का अध्ययन किया गया। इनमें 676 झीलों का उल्लेखनीय विस्तार पाया गया। इन 676 में 130 झीलें भारत में हैं, 65 सिंधु नदी क्षेत्र में, 7 गंगा क्षेत्र में और 58 ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में। इनमें 601 झीलों का आकार दोगुने से भी अधिक बढ़ चुका था। हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाटी की एक हिमनदीय झील का आकार 1989 से 2022 के बीच 36.49 हेक्टेयर से बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया, यानी लगभग 178 प्रतिशत की वृद्धि।  इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि हर बढ़ती झील कल ही फट जाएगी। लेकिन इसका अर्थ यह अवश्य है कि जो खतरे पहले छोटे और दूर थे, वे अब बड़े और अधिक संवेदनशील हो रहे हैं।
हिमाचल की लगातार त्रासदियां
2023 में हिमाचल प्रदेश ने अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन की भयावह स्थिति देखी। राज्य सरकार द्वारा केंद्र को दी गई रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 में जल-मौसम संबंधी आपदाओं में 556 लोगों की जान गई, 21,506 पशु मारे गए और 15,792 मकान क्षतिग्रस्त हुए। 2024-25 में 408 लोगों की मृत्यु हुई और 1,089 मकान क्षतिग्रस्त हुए। 2025-26 में उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में 195 मौतें और 10,525 मकानों के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है। इन आंकड़ों में अलग-अलग प्रकार की घटनाएं शामिल हैं और इन्हें केवल भूस्खलन या बाढ़ की मौतें मानना उचित नहीं होगा। फिर भी ये बताते हैं कि पहाड़ी राज्यों में आपदा का आर्थिक और मानवीय बोझ कितना बड़ा हो गया है। उत्तराखंड में 2025 में भी बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन की कई घटनाएं हुईं। धराली जैसी घटनाओं ने दिखाया कि कुछ ही मिनटों में नदी और मलबा पूरे बस्ती क्षेत्र का स्वरूप बदल सकते हैं।
और अब नेपाल की त्रासदी
अगस्त 2026 की नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र की त्रासदी ने पूरे हिमालय को फिर झकझोर दिया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार नेपाल के रसुवा क्षेत्र में हिमालयी क्षेत्र से जुड़े अचानक आए बाढ़ के प्रकोप में 1243 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता थे। नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार 85 सुरक्षाकर्मी भी लापता थे। विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े 60 लोग, 391 विदेशी पर्यटक और 93 नेपाली पर्यटक भी संपर्क से बाहर बताए गए। बाढ़ में 19 मोटर योग्य पुल और लगभग 40 किलोमीटर सड़क क्षतिग्रस्त हुई। ये आंकड़े 26 अगस्त 2026 तक की स्थिति के हैं और बचाव अभियान जारी रहने के कारण बदल सकते हैं। अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में नेपाल और तिब्बत को मिलाकर मृतकों और लापता लोगों की संख्या इससे कहीं अधिक बताई गई है। इसलिए अंतिम आंकड़ा राहत एवं खोज अभियान पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगा। नेपाल की यह त्रासदी भारत के लिए भी सीधी चेतावनी है। हिमालय किसी राजनीतिक सीमा से बंटा हुआ पर्वत नहीं है। उसकी बर्फ, नदियां, ग्लेशियर और भूगर्भीय प्रक्रियाएं भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत के बीच साझा प्राकृतिक व्यवस्था हैं।
केवल प्रकृति दोषी नहीं
प्राकृतिक आपदा को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन प्राकृतिक खतरे को मानवीय त्रासदी बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है। हिमालय में अनियंत्रित सड़क चैड़ीकरण, पहाड़ों की कटाई, नदी के प्राकृतिक मार्ग में निर्माण, अत्यधिक पर्यटन, जलविद्युत परियोजनाओं का दबाव, कमजोर जल-निकासी व्यवस्था और भूगर्भीय संवेदनशीलता की अनदेखी जोखिम को बढ़ाती है। सरकार की ओर से भी कई महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं। उपग्रह निगरानी, भूस्खलन मानचित्रण, हिमनदीय झीलों की निगरानी, चेतावनी प्रणालियां, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजनाएं और बचाव बलों की क्षमता में वृद्धि हुई है। हिमाचल सहित पर्वतीय राज्यों के लिए केंद्र ने आपदा जोखिम कम करने, समुदाय आधारित तैयारी और प्रारंभिक चेतावनी को मजबूत करने के कार्यक्रम चलाए हैं। भू-स्थान आधारित चेतावनी व्यवस्था के माध्यम से मौसम विभाग, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और अन्य संस्थाओं की चेतावनियों को जोड़ने की व्यवस्था भी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब पर्याप्त है?
हिमालय के लिए नई विकास नीति जरूरी
अब समय राहत और पुनर्वास से आगे बढ़कर आपदा रोकथाम आधारित विकास का है। हर पहाड़ी जिले की वहन क्षमता वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित की जानी चाहिए। जहां भूस्खलन का खतरा अधिक है, वहां निर्माण पर स्पष्ट प्रतिबंध होना चाहिए। नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में निर्माण रोकना होगा। बड़ी सड़क, सुरंग और जलविद्युत परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल एक परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि पूरी घाटी पर उनके संयुक्त प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। हर संवेदनशील हिमनदीय झील की चैबीसों घंटे निगरानी हो। उपग्रह, ड्रोन, स्वचालित सेंसर, मौसम केंद्र और स्थानीय लोगों की सूचनाओं को एक साथ जोड़कर वास्तविक समय की चेतावनी व्यवस्था बनाई जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात, चेतावनी केवल सरकारी कार्यालय तक नहीं पहुंचनी चाहिए। वह गांव के अंतिम घर तक पहुंचे। सायरन हो, मोबाइल संदेश हो, सुरक्षित मार्ग पहले से तय हों और स्थानीय युवाओं को बचाव का प्रशिक्षण मिले। सरकार को हिमालयी आपदाओं का एक सार्वजनिक राष्ट्रीय आंकड़ा केंद्र भी बनाना चाहिए, जिसमें प्रत्येक घटना के मृतक, घायल, लापता, विस्थापित, आर्थिक नुकसान, सड़क बंद होने की अवधि और पुनर्निर्माण की स्थिति दर्ज हो। आज केंद्र स्वयं स्वीकार करता है कि देशभर की आपदाओं में जान-माल के नुकसान का कोई केंद्रीय समेकित आंकड़ा उसके पास नहीं है और आंकड़े राज्यों से प्राप्त रिपोर्टों पर आधारित हैं।
केदारनाथ से चमोली, सिक्किम से हिमाचल और अब नेपाल तक हिमालय लगातार हमें एक ही संदेश दे रहा है, पहाड़ को केवल संसाधन समझकर उसके साथ व्यवहार नहीं किया जा सकता। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। सैकड़ों हिमनदीय झीलों का विस्तार हो रहा है। अत्यधिक वर्षा की घटनाएं गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं। भूस्खलन लगातार जीवन और बुनियादी ढांचे को प्रभावित कर रहे हैं। हिमालय को विकास से अलग करना समाधान नहीं है। समाधान है-हिमालय की प्रकृति के अनुरूप विकास। सड़कें बनें, लेकिन पहाड़ काटकर नहींय बिजली बने, लेकिन घाटियों की वहन क्षमता को नष्ट करके नहींय पर्यटन बढ़े, लेकिन प्रकृति की सीमा तोड़कर नहीं। क्योंकि सवाल यह नहीं है कि अगली आपदा आएगी या नहीं। सवाल यह है कि जब अगली आपदा आएगी, तब हम कितनी जानें बचाने के लिए तैयार होंगे। और उससे भी बड़ा सवाल है-’’क्या हम हिमालय को बचाने के लिए अपनी विकास की परिभाषा बदलने को तैयार हैं?’’

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 1 सितंबर 2026

कविता का स्तर-मंच से सोशल मीडिया तक

 लेख-

कविता मनुष्य की संवेदना, कल्पना और विचार की सबसे सघन अभिव्यक्तियों में से एक है। वह केवल तुकबंदी या भावुक शब्दों का समूह नहीं, बल्कि अपने समय, समाज और मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व को शब्द देने की कला है। इसलिए कविता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसे कितनी तालियाँ मिलीं, कितने लोगों ने उसे सुना या सोशल मीडिया पर कितने लोगों ने उसे लाइक और शेयर किया। आज कविता एक दिलचस्प संक्रमण के दौर से गुजर रही है। एक ओर कवि सम्मेलन और साहित्यिक मंच हैं, जहाँ कविता सामूहिक रूप से सुनी जाती है, दूसरी ओर फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल मंच हैं, जहाँ कविता कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक पहुँच जाती है। माध्यम बदला है, पाठक बदला है और प्रस्तुति का ढंग भी बदला है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न है-क्या कविता का स्तर भी बदल गया है?
मंच की कविता और उसका साहित्यिक अनुशासन
कभी कवि सम्मेलन केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं होते थे। वे साहित्यिक संस्कार के सार्वजनिक मंच थे। कवि अपनी रचना को बार-बार सँवारकर श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करता था। भाषा, छंद, लय, बिंब, प्रतीक और कथ्य पर पर्याप्त मेहनत की जाती थी। श्रोता भी कविता को सुनने और समझने की तैयारी के साथ आते थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य के संबंध को व्यापक सामाजिक जीवन और लोकमंगल से जोड़कर देखने पर जोर दिया। उनके आलोचनात्मक चिंतन में साहित्य का मूल्य केवल मनोरंजन में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के व्यापक हित से भी जुड़ता है। यही दृष्टि आज भी कविता के मूल्यांकन के लिए उपयोगी है। कविता कितनी लोकप्रिय है, यह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे पहले यह देखना जरूरी है कि कविता मनुष्य के अनुभव को कितनी गहराई से व्यक्त करती है। मंचीय कविता में हास्य, व्यंग्य, वीर रस, श्रृंगार और सामाजिक सरोकार सभी के लिए स्थान रहा है। समस्या हास्य या मनोरंजन में नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कविता का उद्देश्य केवल तत्काल तालियाँ प्राप्त करना रह जाए। तालियाँ कविता का पुरस्कार हो सकती हैं, लेकिन कविता की गुणवत्ता का प्रमाणपत्र नहीं।
तालियों से लोकप्रियता तक
मंच पर कवि की लोकप्रियता का एक बड़ा आधार उसकी प्रस्तुति होती है। प्रभावशाली आवाज, चेहरे के भाव, मंच संचालन और श्रोताओं से संवाद कविता के प्रभाव को बढ़ाते हैं। कई बार साधारण पंक्ति भी शानदार प्रस्तुति के कारण खूब तालियाँ बटोर लेती है और गंभीर कविता अपेक्षाकृत शांत प्रतिक्रिया के साथ समाप्त हो जाती है। यहाँ हमें लोकप्रियता और श्रेष्ठता के बीच का अंतर समझना होगा। हर लोकप्रिय कविता श्रेष्ठ नहीं होती और हर श्रेष्ठ कविता तत्काल लोकप्रिय हो, यह भी आवश्यक नहीं। साहित्य का प्रभाव कई बार धीरे-धीरे विकसित होता है। कुछ कविताएँ सुनते ही तालियाँ पाती हैं, जबकि कुछ कविताएँ सुनने के बाद पाठक के भीतर लंबे समय तक काम करती रहती हैं। नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने कविता के नए प्रतिमान के माध्यम से समकालीन कविता को परखने के लिए नए मानदंडों की आवश्यकता पर बल दिया था। उनके अनुसार आलोचना का काम केवल रचना की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसके रचनात्मक और वैचारिक पक्षों की पड़ताल करना भी है। इसलिए कविता को केवल मंचीय प्रभाव से नहीं, उसके कथ्य और शिल्प से भी परखा जाना चाहिए।
सोशल मीडिया ने बदली कविता की दुनिया
सोशल मीडिया ने कविता के सामने अभूतपूर्व संभावनाएँ खोल दी हैं। अब किसी कवि को अपनी कविता प्रकाशित कराने के लिए किसी पत्रिका के संपादकीय कार्यालय के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं। वह अपनी कविता स्वयं प्रकाशित कर सकता है और कुछ ही समय में देश-दुनिया के पाठकों तक पहुँच सकता है। डिजिटल माध्यम ने कविता को अधिक लोकतांत्रिक बनाया है। छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों से लिखने वाले अनेक रचनाकारों को पाठक मिले हैं। कविता की वीडियो प्रस्तुति ने उन लोगों को भी कविता से जोड़ा है, जो शायद पारंपरिक साहित्यिक गोष्ठियों तक कभी नहीं पहुँच पाते। हाल के एक आलोचनात्मक लेख में डॉ. सुशील कुमार शर्मा ने भी रेखांकित किया है कि डिजिटल युग ने साहित्य को बहुत तेजी से आम पाठक तक पहुँचाया है, लेकिन अनुशासन और आत्मचिंतन के अभाव में यही लोकतांत्रिक मंच साहित्य के लिए चुनौती भी बन सकता है। यही सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों है। यहाँ प्रवेश सबके लिए खुला है, लेकिन साहित्यिक कसौटी का द्वार स्वयं लेखक को बनाना पड़ता है।
लाइक-शेयर बनाम साहित्यिक गुणवत्ता
सोशल मीडिया ने कविता के मूल्यांकन की एक नई समस्या पैदा की है। कविता के नीचे हजारों लाइक दिखाई देते हैं तो हम उसे स्वतः अच्छी कविता मान लेते हैं। कोई कविता लाखों बार देखी जाती है तो उसे सफल समझ लिया जाता है। लेकिन क्या व्यूज साहित्यिक गुणवत्ता का पैमाना हैं? निश्चित रूप से नहीं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उस सामग्री को अधिक लोगों तक पहुँचाता है, जो तुरंत ध्यान आकर्षित करती है। छोटी, भावुक, चैंकाने वाली या आसानी से साझा की जा सकने वाली पंक्तियाँ तेजी से फैलती हैं। गंभीर और विचारप्रधान कविता को कई बार उतनी तत्काल लोकप्रियता नहीं मिलती। यहीं से एक दूसरी समस्या पैदा होती है। कविता और कथन के बीच का अंतर मिटने लगता है। किसी सामान्य जीवन-सूक्ति को चार पंक्तियों में तोड़ देना कविता नहीं बन जाता। प्रेम, अकेलापन, सफलता, असफलता या रिश्तों पर भावुक वाक्य लिख देना अभिव्यक्ति हो सकती है, लेकिन साहित्यिक कविता बनने के लिए उसमें भाषा का सौंदर्य, अनुभव की प्रामाणिकता, कल्पना और कलात्मक संरचना भी आवश्यक है। कविता लिखना आसान हो सकता है, अच्छी कविता लिखना कठिन है।
कविता का भविष्य, माध्यम नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण
आधुनिक हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह का उदाहरण यहाँ विशेष रूप से प्रासंगिक है। उनके काव्य में सामान्य जीवन, गाँव-कस्बे की संवेदना, सामाजिक यथार्थ और प्रकृति के प्रति गहरी चिंता दिखाई देती है। एक शोध-अध्ययन उन्हें आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख कवियों में रखते हुए उनकी कविता में ग्रामीण-कस्बाई संवेदना, यथार्थबोध और पर्यावरणीय चेतना को विशेष रूप से रेखांकित करता है। केदारनाथ सिंह का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने साधारण जीवन के अनुभवों को साधारण भाषा में लिखते हुए भी कविता को साधारण नहीं होने दिया। यही अंतर सोशल मीडिया की अनेक लोकप्रिय कविताओं और टिकाऊ साहित्य के बीच दिखाई देता है। नंदकिशोर नवल ने केदारनाथ सिंह की कविता में सुंदर और मूल्यवान चीजों के प्रति आकर्षण तथा दुनिया को बेहतर बनाने वाली शक्ति के प्रति आशावाद को महत्वपूर्ण माना है। आज के कवि के सामने चुनौती यही है कि वह सोशल मीडिया की तात्कालिक लोकप्रियता के दबाव में अपनी कविता की गंभीरता न खो दे। सोशल मीडिया को कविता का दुश्मन मानना भी गलत होगा और उसे कविता का अंतिम मानदंड मान लेना भी। मंच और सोशल मीडिया दोनों की अपनी उपयोगिता है। मंच कविता को सामूहिक श्रवण और जीवंत संवाद देता है। सोशल मीडिया उसे व्यापक पहुँच और नए पाठक देता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि माध्यम कविता पर हावी न हो जाए। कविता का स्तर लाइक, शेयर और व्यूज से नहीं तय होना चाहिए। उसे भाषा, संवेदना, विचार, शिल्प और समय की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। आलोचना की भूमिका भी इसी कारण आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर नामवर सिंह तक हिंदी आलोचना की परंपरा हमें यही सिखाती है कि साहित्य को उसके व्यापक संदर्भ, रचनात्मकता और सामाजिक अर्थों के साथ पढ़ा जाना चाहिए। नामवर सिंह स्वयं आलोचना को रचना के साथ गंभीर संवाद की प्रक्रिया मानते थे। अंततः कविता का माध्यम बदल सकता है, उसका पाठक बदल सकता है और उसकी प्रस्तुति का तरीका भी बदल सकता है, लेकिन अच्छी कविता की पहचान नहीं बदलती। वह मनुष्य के भीतर कुछ जगाती है, उसे सोचने पर विवश करती है और पढ़े या सुने जाने के बाद भी भीतर बनी रहती है। मंच की तालियाँ क्षणिक हैं, सोशल मीडिया के व्यूज भी। लेकिन सच्ची कविता समय से संवाद करती है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कविता मंच पर बेहतर है या सोशल मीडिया पर। असली प्रश्न यह है कि हम कविता को लोकप्रिय बनाने के साथ-साथ श्रेष्ठ बनाने की चिंता भी कर रहे हैं या नहीं। यदि कविता के साथ साहित्यिक अनुशासन, आत्मालोचन और भाषा के प्रति ईमानदारी बनी रहती है तो सोशल मीडिया कविता के पतन का माध्यम नहीं, उसके विस्तार का सबसे शक्तिशाली माध्यम सिद्ध हो सकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 18 अगस्त 2026

बदलते समय में रक्षा के अर्थ की तलाश

 रक्षाबंधन पर्व 28 अगस्त पर विशेष लेख-

रक्षाबंधन को सामान्यतः भाई-बहन के प्रेम का पर्व कहा जाता है। बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन यदि हम इस पर्व को केवल इसी परंपरा तक सीमित कर दें तो शायद उसके व्यापक अर्थ को समझने से चूक जाएँगे। रक्षाबंधन की यात्रा बहुत लंबी है। इसका मूल रक्षा-सूत्र की प्राचीन परंपरा में दिखाई देता है, पुराणों ने इसे धार्मिक आख्यानों से जोड़ा, लोकजीवन ने इसे भाई-बहन के रिश्ते का पर्व बनाया और आधुनिक भारत में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे सामाजिक एकता का प्रतीक तक बना दिया। आज जब परिवारों के भीतर संवाद कम हो रहा है, सामाजिक तनाव बढ़ रहे हैं और रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिक होते जा रहे हैं, तब रक्षाबंधन की उपयोगिता पहले से कहीं अधिक दिखाई देती है। जरूरत केवल इस बात की है कि हम “रक्षा” शब्द का अर्थ समय के साथ बदलकर समझें।
रक्षा-सूत्र की प्राचीन परंपरा
रक्षाबंधन का कोई एक निश्चित ऐतिहासिक आरंभ-वर्ष बताना कठिन है। इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय परंपरा के रक्षा-सूत्र में मिलती हैं। वैदिक और उत्तरवैदिक परंपराओं में अनिष्ट से बचाने और मंगलकामना के लिए पवित्र सूत्र बाँधने की परंपरा रही है। बाद के ग्रंथों में श्रावण पूर्णिमा को रक्षा-सूत्र बाँधने की परंपरा के उल्लेख मिलते हैं। भविष्य पुराण से जुड़ी प्रसिद्ध कथा में देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी द्वारा इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधने का उल्लेख आता है। यहाँ राखी भाई-बहन के संबंध का प्रतीक नहीं, बल्कि संकट से रक्षा और विजय की कामना का प्रतीक है। यही बात रक्षाबंधन के मूल अर्थ की ओर संकेत करती है। रक्षा का अर्थ प्रारंभ से ही केवल किसी एक व्यक्ति की रक्षा करना नहीं था, यह कल्याण और सुरक्षा की व्यापक कामना थी।
कृष्ण-द्रौपदी से लेकर लोकजीवन तक
कृष्ण और द्रौपदी की कथा रक्षाबंधन के साथ सबसे लोकप्रिय रूप से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार कृष्ण की उँगली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। कृष्ण ने इस स्नेह को स्वीकार किया और द्रौपदी के प्रति संरक्षण का भाव रखा। ऐतिहासिक दृष्टि से इसे आधुनिक रक्षाबंधन की शुरुआत का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन भारतीय लोकमानस ने इस कथा में राखी के भाव को पहचान लिया यानी संकट में साथ खड़े होना। लक्ष्मी-बलि और यम-यमुना जैसी कथाएँ भी इस पर्व के अर्थ को अलग-अलग रूपों में सामने लाती हैं। इन कथाओं की ऐतिहासिकता से अलग उनका सांस्कृतिक संदेश स्पष्ट है यानी रिश्ते केवल नाम के नहीं होते, उनमें दायित्व भी जुड़े होते हैं।
भाई-बहन का पर्व कैसे बना
समय के साथ रक्षा-सूत्र की व्यापक परंपरा का एक महत्वपूर्ण रूप भाई-बहन के संबंध से जुड़ गया। विशेष रूप से उत्तर भारतीय सामाजिक जीवन में विवाह के बाद बहन का मायके से संबंध बनाए रखने में भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्ष में एक बार बहन का मायके आना, भाई की कलाई पर राखी बाँधना और दोनों का एक-दूसरे के प्रति दायित्व दोहराना सामाजिक संबंधों को मजबूत करता था। इस दृष्टि से राखी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी। वह परिवार की स्मृति और संबंधों की पुनर्पुष्टि का अवसर भी थी। लेकिन आज इस परंपरा को एक नए अर्थ की आवश्यकता है। यदि हम अब भी यह मानें कि केवल भाई ही रक्षक है और बहन केवल संरक्षण पाने वाली है, तो हम आधुनिक सामाजिक वास्तविकता से पीछे रह जाएँगे। आज बहन भी भाई की उतनी ही बड़ी ताकत बन सकती है। इसलिए आधुनिक राखी का संदेश होना चाहिए-“हम एक-दूसरे की रक्षा और सहायता करेंगे।”
कर्णावती और हुमायूँ की कहानी
रक्षाबंधन के साथ रानी कर्णावती और हुमायूँ की कहानी भी लोकप्रिय है। कहा जाता है कि मेवाड़ पर संकट के समय कर्णावती ने हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता माँगी थी। हालांकि इतिहासकार इस कथा के विवरण और प्रमाणों को लेकर सावधानी बरतते हैं, इसलिए इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य कहना उचित नहीं होगा। फिर भी इस कथा का सांस्कृतिक महत्व है। यह बताती है कि राखी की कल्पना रक्त संबंधों से आगे जाकर विश्वास और संरक्षण के रिश्ते के रूप में भी की गई।
जब ठाकुर ने राखी को बना दिया एकता का प्रतीक
रक्षाबंधन का आधुनिक इतिहास 1905 में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेता है। ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया। इस विभाजन के विरोध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राखी को हिंदू-मुस्लिम एकता और बंगाल की अखंडता का प्रतीक बनाया। उन्होंने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बाँधने का आह्वान किया। इस तरह राखी का अर्थ परिवार से निकलकर समाज तक पहुँच गया। एक हिंदू दूसरे मुसलमान की कलाई पर राखी बाँध सकता था और दोनों यह कह सकते थे कि हम एक-दूसरे के साथ हैं। यह प्रसंग आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। जब धर्म, जाति, भाषा और राजनीतिक विचारों के आधार पर समाज में दूरी पैदा होती दिखाई देती है, तब ठाकुर का संदेश हमें याद दिलाता है कि रक्षा केवल व्यक्ति की नहीं, सामाजिक सद्भाव की भी करनी होती है।
भारत में हर जगह एक जैसी राखी क्यों नहीं?
भारत की विविधता के कारण श्रावण पूर्णिमा का स्वरूप भी हर क्षेत्र में समान नहीं रहा। महाराष्ट्र और कोंकण के तटीय क्षेत्रों में नारली पूर्णिमा प्रमुख है। मछुआरा समुदाय समुद्र और वरुण की पूजा करता है तथा नारियल अर्पित करता है। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इसी समय अवनि अवित्तम या उपाकर्म की परंपरा प्रमुख है, जिसमें यज्ञोपवीत परिवर्तन और वैदिक अध्ययन से जुड़े संस्कार होते हैं। ओडिशा में गम्हा पूर्णिमा का अपना सांस्कृतिक महत्व है, जिसका संबंध स्थानीय धार्मिक, कृषि और पशुधन परंपराओं से है। पश्चिम बंगाल में इसी समय झूलन पूर्णिमा की वैष्णव परंपरा भी महत्वपूर्ण रही है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इन क्षेत्रों में रक्षाबंधन “मनाया ही नहीं जाता।” अधिक सटीक बात यह है कि एक ही तिथि को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग सांस्कृतिक परंपराएँ प्रमुख रही हैं।
आज के संदर्भ में रक्षा का अर्थ
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज रक्षाबंधन की उपयोगिता क्या है? आज महिला को केवल पुरुष की शारीरिक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। उसे सम्मान, समान अवसर, स्वतंत्र निर्णय, शिक्षा और सुरक्षित सामाजिक वातावरण चाहिए। इसी तरह पुरुष भी भावनात्मक सुरक्षा, पारिवारिक सहयोग और विश्वास चाहता है। इसलिए आज राखी का अर्थ होना चाहिए-सुरक्षा नहीं, पारस्परिक सहारा। भाई बहन के साथ खड़ा हो और बहन भाई के साथ। एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझना, बीमारी या आर्थिक संकट में साथ देना, अकेलेपन में बातचीत करना और जीवन के निर्णयों में सम्मान देना, यही आज की वास्तविक रक्षा है।
परिवार में संवाद का पर्व
आज परिवार एक छत के नीचे रहते हुए भी कई बार एक-दूसरे से दूर हैं। मोबाइल, सामाजिक माध्यम और व्यस्त जीवन ने संवाद का स्थान कम कर दिया है। ऐसे समय में रक्षाबंधन परिवार को फिर से एक साथ बैठने का बहाना देता है। जरूरी नहीं कि राखी के साथ महँगा उपहार दिया जाए। कभी-कभी एक घंटा साथ बैठना, पुराने दिनों को याद करना और यह पूछ लेना कि “तुम सचमुच ठीक हो?” किसी भी महँगे उपहार से अधिक मूल्यवान हो सकता है।
रक्षा केवल बहन की नहीं
आज हमें यह भी समझना होगा कि समाज में अनेक लोग भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा की जरूरत महसूस करते हैं। बुजुर्ग, अकेले रहने वाले लोग, आर्थिक कठिनाइयों से गुजरते परिवार, बच्चे और वे लोग जो किसी कारण से समाज के हाशिए पर हैं। यदि रक्षाबंधन हमें किसी कमजोर व्यक्ति के साथ खड़े होने की प्रेरणा देता है तो यह पर्व अपने मूल अर्थ के और निकट पहुँचता है। रक्षाबंधन की हजारों वर्षों की यात्रा में इसका अर्थ लगातार विस्तृत हुआ है। प्राचीन रक्षा-सूत्र से शुरू होकर यह पुराणिक कथाओं, लोकजीवन, भाई-बहन के संबंध और फिर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के माध्यम से सामाजिक एकता तक पहुँचा। रक्षा का अर्थ अब केवल यह नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा। रक्षा का अर्थ यह है कि मनुष्य मनुष्य के साथ खड़ा होगा। रिश्तों की रक्षा होगी। सम्मान की रक्षा होगी। स्त्री की गरिमा की रक्षा होगी। बुजुर्गों की उपेक्षा से रक्षा होगी। बच्चों के भविष्य की रक्षा होगी। समाज में सद्भाव की रक्षा होगी और सबसे बढ़कर मानवीय संवेदना की रक्षा होगी। राखी का धागा बहुत पतला होता है, लेकिन वह हमें एक बहुत मजबूत बात याद दिलाता है कि रिश्ते खून से बन सकते हैं, पर विश्वास और जिम्मेदारी से टिकते हैं। इसलिए इस रक्षाबंधन पर यदि भाई बहन की कलाई पर राखी बाँधते हुए केवल इतना कह दे-“जब भी जरूरत होगी, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा” और बहन भी यही वचन भाई को दे दे, तो शायद सदियों पुरानी इस परंपरा को आज के समय का सबसे सुंदर अर्थ मिल जाए। क्योंकि वास्तविक रक्षा कलाई पर बँधे धागे से नहीं, मुश्किल समय में थामे गए हाथ से होती है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)