विशेष लेख-
आज मैं जिस भारत की बात कर रहा हूँ, वह किसी एक मज़हब, किसी एक जाति या किसी एक क्षेत्र का भारत नहीं है। वह भारत है, जिसकी आत्मा सह-अस्तित्व, साझी विरासत और समन्वय में बसती है। एक ऐसा भारत, जो न तो हिन्दू है, न मुस्लिम, न सिख, न ईसाई, बल्कि इन सबका सम्मिलित स्वरूप है। यदि हम भारत को समझना चाहते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि मज़हब, जातिवाद और क्षेत्रवाद से मुक्त हुए बिना किसी विकसित राष्ट्र की कल्पना बेमानी है। विकास केवल सड़कों, इमारतों और तकनीक से नहीं होता, बल्कि मानसिक उदारता, सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक चेतना से होता है।
भारत : केवल भूगोल नहीं, एक साझा सभ्यता
भारत एक राष्ट्र बनने से पहले एक सभ्यता था। यहाँ आर्य और अनार्य मिले, शैव और वैष्णव संवाद में रहे, सूफी और संत एक ही सत्य की तलाश में निकले। यहाँ विविधता कभी विघटन का कारण नहीं बनी, बल्कि शक्ति बनी। आज जब हम “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की बात करते हैं, तो यह कोई नया नारा नहीं, बल्कि हमारी हज़ारों वर्षों पुरानी जीवन-दृष्टि है।
मध्यकालीन भारत : टकराव नहीं, सहयोग का इतिहास
दुर्भाग्यवश, मध्यकालीन इतिहास को अक्सर केवल हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष के चश्मे से देखा गया। जबकि सच्चाई यह है कि यह काल सहयोग, विश्वास और साझी लड़ाइयों का भी रहा है।
1.महाराणा प्रताप और मुस्लिम सेनानायक-जब हम महाराणा प्रताप का नाम लेते हैं, तो स्वतः वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की छवि उभरती है। पर इतिहास यह भी बताता है कि महाराणा प्रताप की सेना में हाकिम ख़ान सूर जैसे मुस्लिम सेनानायक थे, जिन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में प्राणों की आहुति दी। यह तथ्य बताता है कि उस युद्ध में मज़हब नहीं, मातृभूमि सर्वोपरि थी।
2.शिवाजी महाराज और मुस्लिम सेनापति-मराठा स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज को भी केवल एक धर्म विशेष से जोड़कर देखना ऐतिहासिक भूल है। उनकी नौसेना के प्रमुख दौलत ख़ान, तोपखाने के अध्यक्ष इब्राहिम ख़ान और कई क़िले मुस्लिम सेनानायकों के संरक्षण में थे। शिवाजी महाराज ने मस्जिदों और क़ुरआन का सम्मान किया, क्योंकि उनका संघर्ष किसी धर्म से नहीं, अत्याचार से था।
3.रानी लक्ष्मीबाई और गंगा-जमुनी तहज़ीब-1857 की क्रांति की अमर नायिका रानी लक्ष्मीबाई के साथ उनके विश्वासपात्र सेनानायक ग़ुलाम ग़ौस ख़ान थे, जिन्होंने झांसी की रक्षा करते हुए वीरगति पाई। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि भारत की आज़ादी की लड़ाई साझी थी, उसमें किसी मज़हब की दीवार नहीं थी।
भारत : केवल भूगोल नहीं, एक साझा सभ्यता
भारत एक राष्ट्र बनने से पहले एक सभ्यता था। यहाँ आर्य और अनार्य मिले, शैव और वैष्णव संवाद में रहे, सूफी और संत एक ही सत्य की तलाश में निकले। यहाँ विविधता कभी विघटन का कारण नहीं बनी, बल्कि शक्ति बनी। आज जब हम “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की बात करते हैं, तो यह कोई नया नारा नहीं, बल्कि हमारी हज़ारों वर्षों पुरानी जीवन-दृष्टि है।
मध्यकालीन भारत : टकराव नहीं, सहयोग का इतिहास
दुर्भाग्यवश, मध्यकालीन इतिहास को अक्सर केवल हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष के चश्मे से देखा गया। जबकि सच्चाई यह है कि यह काल सहयोग, विश्वास और साझी लड़ाइयों का भी रहा है।
1.महाराणा प्रताप और मुस्लिम सेनानायक-जब हम महाराणा प्रताप का नाम लेते हैं, तो स्वतः वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की छवि उभरती है। पर इतिहास यह भी बताता है कि महाराणा प्रताप की सेना में हाकिम ख़ान सूर जैसे मुस्लिम सेनानायक थे, जिन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में प्राणों की आहुति दी। यह तथ्य बताता है कि उस युद्ध में मज़हब नहीं, मातृभूमि सर्वोपरि थी।
2.शिवाजी महाराज और मुस्लिम सेनापति-मराठा स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज को भी केवल एक धर्म विशेष से जोड़कर देखना ऐतिहासिक भूल है। उनकी नौसेना के प्रमुख दौलत ख़ान, तोपखाने के अध्यक्ष इब्राहिम ख़ान और कई क़िले मुस्लिम सेनानायकों के संरक्षण में थे। शिवाजी महाराज ने मस्जिदों और क़ुरआन का सम्मान किया, क्योंकि उनका संघर्ष किसी धर्म से नहीं, अत्याचार से था।
3.रानी लक्ष्मीबाई और गंगा-जमुनी तहज़ीब-1857 की क्रांति की अमर नायिका रानी लक्ष्मीबाई के साथ उनके विश्वासपात्र सेनानायक ग़ुलाम ग़ौस ख़ान थे, जिन्होंने झांसी की रक्षा करते हुए वीरगति पाई। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि भारत की आज़ादी की लड़ाई साझी थी, उसमें किसी मज़हब की दीवार नहीं थी।
भक्तिकाल : जहाँ ईश्वर मज़हब से ऊपर था
भक्तिकाल भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जहाँ ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम और भक्ति बना, न कि कर्मकांड।
1.अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना-अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना जिन्हें हम रहीम के नाम से जानते हैं, कृष्णभक्त थे। उनके दोहे आज भी मंदिरों, पाठ्यक्रमों और जनमानस में गूंजते हैंः
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।”
यह पंक्ति बताती है कि प्रेम का धर्म सार्वभौमिक है।
2.कबीर-मज़हब की दीवारों के विरुद्ध स्वर-कबीर न हिन्दू थे, न मुस्लिम, वे मानवता के कवि थे। उन्होंने मंदिर और मस्जिद दोनों की रूढ़ियों पर प्रश्न उठाए और कहा-
“कंकर-पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय।”
कबीर का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना पाँच सौ वर्ष पहले था।
जातिवाद और क्षेत्रवाद : विकास की सबसे बड़ी बाधाएँ
यदि मज़हब समाज को बाँटता है, तो जातिवाद उसे भीतर से खोखला करता है। जाति के नाम पर श्रेष्ठता और हीनता का भाव न केवल असंवैधानिक है, बल्कि अमानवीय भी है। इसी प्रकार क्षेत्रवाद, उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, भारत की एकता को चुनौती देता है। जबकि सच्चाई यह है कि भारत की पहचान उसकी समग्रता में है, न कि किसी एक हिस्से में।
व्यक्ति के अपराध से कौम या जाति का निर्णय नहीं
इतिहास और वर्तमान, दोनों में, एक बड़ी भूल बार-बार दोहराई गई है। कुछ व्यक्तियों के कृत्यों के आधार पर पूरी कौम, पूरी जाति या पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा कर देना।
यह न तो न्याय है,
न इतिहास है,
और न ही राष्ट्र निर्माण का मार्ग।
इतिहास साक्षी है कि हर समाज, हर धर्म और हर जाति में
संत भी हुए हैं और अत्याचारी भी,
बलिदानी भी हुए हैं और स्वार्थी भी।
लेकिन किसी एक का अपराध, पूरे समाज की पहचान नहीं बन सकता।
इतिहास का कड़वा लेकिन ज़रूरी सत्य
मध्यकाल हो या आधुनिक काल, कुछ शासकों, सरदारों या समूहों ने सत्ता, लालच या कट्टरता के कारण अन्याय, हिंसा और दमन किया। पर यह भी उतना ही सच है कि उन्हीं कालखंडों में उसी समाज से ऐसे लोग भी निकले, जिन्होंने अन्याय का विरोध किया, पीड़ितों की रक्षा की और मानवीय मूल्यों को बचाए रखा। इसलिए यह कहना कि “फलाँ कौम ऐसी है” या “फलाँ जाति वैसी है”, इतिहास के साथ सबसे बड़ा धोखा है। स्वयं को महान दिखाने के लिए दूसरे को कलंकित करना राष्ट्रद्रोह है, जो लोग किसी एक समुदाय को गाली देकर अपने आपको देशभक्त, श्रेष्ठ या रक्षक सिद्ध करना चाहते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि आप किसी कौम को नीचा दिखाकर ऊँचे नहीं हो सकते। किसी धर्म को बदनाम करके धर्म की रक्षा नहीं होती। किसी जाति को अपमानित करके सामाजिक न्याय नहीं मिलता। और किसी क्षेत्र को हेय बताकर राष्ट्रीय एकता नहीं बनती। यह केवल राजनीतिक स्वार्थ, मानसिक असुरक्षा और इतिहास की अधूरी समझ का परिणाम होता है।
भारत की परंपरा : दोष का विरोध, समूह का सम्मान
भारतीय परंपरा ने कभी यह नहीं सिखाया कि गलती को छुपाया जाए। लेकिन उसने यह भी नहीं सिखाया कि गलती करने वाले व्यक्ति को भगवान बना दिया जाए और निर्दोष समाज को अपराधी। हमने हमेशा कहा कि पाप का विरोध करो, पापी के सुधार का मार्ग खोलो और निर्दोष को दोषी न ठहराओ। यही राम का धर्म है, यही कृष्ण की नीति है, यही कबीर और रहीम की चेतना है।
आज की सबसे बड़ी ज़रूरत : विवेक
आज भारत को न नफ़रत की ज़रूरत है, न बदले की, न इतिहास को हथियार बनाने की। भारत को ज़रूरत है विवेक की, संतुलन की और सत्य को पूरे संदर्भ में देखने की। जो समाज अपने अतीत की गलतियों को स्वीकार करता है लेकिन उन्हें सामूहिक घृणा में नहीं बदलता वही समाज आगे बढ़ता है। व्यक्ति गलत हो सकता है, व्यवस्था गलत हो सकती है, लेकिन पूरी कौम कभी गलत नहीं होती। यदि हम सचमुच मज़हब, जातिवाद और क्षेत्रवाद से मुक्त भारत चाहते हैं, तो हमें यह नैतिक साहस दिखाना होगा कि न हम अपने दोष छुपाएँ, न दूसरों को बदनाम करके अपने आपको महान सिद्ध करें। यही भारत की आत्मा है। यही भारत का भविष्य है।
विकसित भारत की शर्त : सामाजिक समरसता
आज हम विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। लेकिन प्रश्न यह है, क्या हम सामाजिक रूप से भी विकसित हैं? एक विकसित राष्ट्र वही होता है, जहाँ नागरिक को मज़हब से नहीं, नागरिकता से पहचाना जाए, प्रतिभा को जाति से नहीं, योग्यता से आँका जाए और व्यक्ति को क्षेत्र से नहीं, मानवता से जोड़ा जाए। भारत का इतिहास हमें लड़ना नहीं, साथ चलना सिखाता है। महाराणा प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, ये सब किसी एक धर्म के नहीं, भारत के नायक हैं। रहीम और कबीर किसी एक मज़हब के नहीं, मानव चेतना के स्वर हैं। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम भारत को मज़हब, जाति और क्षेत्र की संकीर्णताओं से ऊपर उठाकर, साझी संस्कृति, साझा संघर्ष और साझा भविष्य का राष्ट्र बनाएँगे। क्योंकि भारत तभी महान था, है और रहेगा, जब वह सबका होगा। (समाप्त)
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
भक्तिकाल भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जहाँ ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम और भक्ति बना, न कि कर्मकांड।
1.अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना-अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना जिन्हें हम रहीम के नाम से जानते हैं, कृष्णभक्त थे। उनके दोहे आज भी मंदिरों, पाठ्यक्रमों और जनमानस में गूंजते हैंः
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।”
यह पंक्ति बताती है कि प्रेम का धर्म सार्वभौमिक है।
2.कबीर-मज़हब की दीवारों के विरुद्ध स्वर-कबीर न हिन्दू थे, न मुस्लिम, वे मानवता के कवि थे। उन्होंने मंदिर और मस्जिद दोनों की रूढ़ियों पर प्रश्न उठाए और कहा-
“कंकर-पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय।”
कबीर का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना पाँच सौ वर्ष पहले था।
जातिवाद और क्षेत्रवाद : विकास की सबसे बड़ी बाधाएँ
यदि मज़हब समाज को बाँटता है, तो जातिवाद उसे भीतर से खोखला करता है। जाति के नाम पर श्रेष्ठता और हीनता का भाव न केवल असंवैधानिक है, बल्कि अमानवीय भी है। इसी प्रकार क्षेत्रवाद, उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, भारत की एकता को चुनौती देता है। जबकि सच्चाई यह है कि भारत की पहचान उसकी समग्रता में है, न कि किसी एक हिस्से में।
व्यक्ति के अपराध से कौम या जाति का निर्णय नहीं
इतिहास और वर्तमान, दोनों में, एक बड़ी भूल बार-बार दोहराई गई है। कुछ व्यक्तियों के कृत्यों के आधार पर पूरी कौम, पूरी जाति या पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा कर देना।
यह न तो न्याय है,
न इतिहास है,
और न ही राष्ट्र निर्माण का मार्ग।
इतिहास साक्षी है कि हर समाज, हर धर्म और हर जाति में
संत भी हुए हैं और अत्याचारी भी,
बलिदानी भी हुए हैं और स्वार्थी भी।
लेकिन किसी एक का अपराध, पूरे समाज की पहचान नहीं बन सकता।
इतिहास का कड़वा लेकिन ज़रूरी सत्य
मध्यकाल हो या आधुनिक काल, कुछ शासकों, सरदारों या समूहों ने सत्ता, लालच या कट्टरता के कारण अन्याय, हिंसा और दमन किया। पर यह भी उतना ही सच है कि उन्हीं कालखंडों में उसी समाज से ऐसे लोग भी निकले, जिन्होंने अन्याय का विरोध किया, पीड़ितों की रक्षा की और मानवीय मूल्यों को बचाए रखा। इसलिए यह कहना कि “फलाँ कौम ऐसी है” या “फलाँ जाति वैसी है”, इतिहास के साथ सबसे बड़ा धोखा है। स्वयं को महान दिखाने के लिए दूसरे को कलंकित करना राष्ट्रद्रोह है, जो लोग किसी एक समुदाय को गाली देकर अपने आपको देशभक्त, श्रेष्ठ या रक्षक सिद्ध करना चाहते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि आप किसी कौम को नीचा दिखाकर ऊँचे नहीं हो सकते। किसी धर्म को बदनाम करके धर्म की रक्षा नहीं होती। किसी जाति को अपमानित करके सामाजिक न्याय नहीं मिलता। और किसी क्षेत्र को हेय बताकर राष्ट्रीय एकता नहीं बनती। यह केवल राजनीतिक स्वार्थ, मानसिक असुरक्षा और इतिहास की अधूरी समझ का परिणाम होता है।
भारत की परंपरा : दोष का विरोध, समूह का सम्मान
भारतीय परंपरा ने कभी यह नहीं सिखाया कि गलती को छुपाया जाए। लेकिन उसने यह भी नहीं सिखाया कि गलती करने वाले व्यक्ति को भगवान बना दिया जाए और निर्दोष समाज को अपराधी। हमने हमेशा कहा कि पाप का विरोध करो, पापी के सुधार का मार्ग खोलो और निर्दोष को दोषी न ठहराओ। यही राम का धर्म है, यही कृष्ण की नीति है, यही कबीर और रहीम की चेतना है।
आज की सबसे बड़ी ज़रूरत : विवेक
आज भारत को न नफ़रत की ज़रूरत है, न बदले की, न इतिहास को हथियार बनाने की। भारत को ज़रूरत है विवेक की, संतुलन की और सत्य को पूरे संदर्भ में देखने की। जो समाज अपने अतीत की गलतियों को स्वीकार करता है लेकिन उन्हें सामूहिक घृणा में नहीं बदलता वही समाज आगे बढ़ता है। व्यक्ति गलत हो सकता है, व्यवस्था गलत हो सकती है, लेकिन पूरी कौम कभी गलत नहीं होती। यदि हम सचमुच मज़हब, जातिवाद और क्षेत्रवाद से मुक्त भारत चाहते हैं, तो हमें यह नैतिक साहस दिखाना होगा कि न हम अपने दोष छुपाएँ, न दूसरों को बदनाम करके अपने आपको महान सिद्ध करें। यही भारत की आत्मा है। यही भारत का भविष्य है।
विकसित भारत की शर्त : सामाजिक समरसता
आज हम विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। लेकिन प्रश्न यह है, क्या हम सामाजिक रूप से भी विकसित हैं? एक विकसित राष्ट्र वही होता है, जहाँ नागरिक को मज़हब से नहीं, नागरिकता से पहचाना जाए, प्रतिभा को जाति से नहीं, योग्यता से आँका जाए और व्यक्ति को क्षेत्र से नहीं, मानवता से जोड़ा जाए। भारत का इतिहास हमें लड़ना नहीं, साथ चलना सिखाता है। महाराणा प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, ये सब किसी एक धर्म के नहीं, भारत के नायक हैं। रहीम और कबीर किसी एक मज़हब के नहीं, मानव चेतना के स्वर हैं। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम भारत को मज़हब, जाति और क्षेत्र की संकीर्णताओं से ऊपर उठाकर, साझी संस्कृति, साझा संघर्ष और साझा भविष्य का राष्ट्र बनाएँगे। क्योंकि भारत तभी महान था, है और रहेगा, जब वह सबका होगा। (समाप्त)
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

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