समसामयिक लेख-
फिल्मों के अश्लील गानों पर विवादबदलती संस्कृति, बाज़ार और अभिव्यक्ति की बहस
भारतीय फिल्म उद्योग लंबे समय से समाज के बदलते स्वरूप और नैतिक मान्यताओं का आईना रहा है। फिल्मों के गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे समाज की सोच, संवेदनाओं और सांस्कृतिक दिशा को भी प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर कुछ गीतों और फिल्मों को लेकर “अश्लीलता”, “अति बोल्ड प्रस्तुति” या “द्विअर्थी अभिव्यक्ति” के आरोप लगते रहे हैं। इन विवादों ने सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन की बहस को लगातार जीवित रखा है। अगर हम 1990 के दशक की ओर देखें तो यह विवाद मुख्यधारा में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। वर्ष 1993 में आई फिल्म खलनायक का गीत “चोली के पीछे क्या है” पूरे देश में चर्चा और विरोध का कारण बना। कई महिला संगठनों ने इसे स्त्री की गरिमा के विरुद्ध बताते हुए प्रदर्शन किए। अदालत तक मामला पहुँचा, लेकिन गीत पर प्रतिबंध नहीं लगा। इसके बावजूद यह गीत उस समय का सुपरहिट बन गया। इससे यह संकेत मिला कि दर्शकों की पसंद और सामाजिक नैतिकता के बीच एक दिलचस्प द्वंद्व मौजूद है।
इसके बाद के वर्षों में फिल्मों की विषय-वस्तु और प्रस्तुति अधिक ग्लैमरस और खुली होती चली गई। वर्ष 2011 में रिलीज़ हुई फिल्म द डर्टी पिक्चर और उसका चर्चित गीत “ऊ ला ला” इसी प्रवृत्ति का उदाहरण बने। फिल्म को सेंसर बोर्ड ने “ए” सर्टिफिकेट दिया, जबकि कुछ सामाजिक समूहों ने इसे युवाओं पर गलत प्रभाव डालने वाला बताया। इसके बावजूद फिल्म और गीत दोनों ने अपार लोकप्रियता हासिल की। इसी दौर में मनोरंजन उद्योग ने यह महसूस किया कि बोल्ड कंटेंट दर्शकों के एक बड़े वर्ग को आकर्षित कर रहा है।
युवा-केन्द्रित और कॉमेडी फिल्मों में भी इस प्रवृत्ति का असर दिखा। वर्ष 2013 में आई फिल्म ग्रैंड मस्ती पर अत्यधिक द्विअर्थी संवाद और अश्लीलता के आरोप लगे। मीडिया और फिल्म समीक्षकों ने सवाल उठाया कि क्या कॉमेडी के नाम पर मनोरंजन की सीमाएँ पार की जा रही हैं। इसके बाद 2014 में रिलीज़ हुई फिल्म रागिनी एमएमएस 2 का गीत “बेबी डॉल” भी अपनी बोल्ड प्रस्तुति के कारण विवादों में रहा। आलोचकों ने इसे महिलाओं के वस्तुकरण से जोड़कर देखा, जबकि समर्थकों का कहना था कि यह आधुनिक मनोरंजन की मांग है।
इसी क्रम में 2015 में आई फिल्म हंटर के कंटेंट और गीतों को लेकर भी बहस हुई। फिल्म के विषय और प्रस्तुति को लेकर कई लोगों ने कहा कि शहरी युवा संस्कृति के नाम पर यौन संकेतों को सामान्य बनाया जा रहा है। बाद में 2018 में रिलीज़ हुई फिल्म वीरे दी वेडिंग के कुछ गीतों और संवादों पर भी भाषा और अभिव्यक्ति की मर्यादा को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। इससे स्पष्ट हुआ कि डिजिटल युग में किसी भी फिल्म या गीत का विवाद कुछ ही समय में राष्ट्रीय चर्चा बन सकता है।
हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट हुई। वर्ष 2022 में रिलीज़ हुई फिल्म पठान के गीत “बेशरम रंग” को लेकर व्यापक विरोध देखने को मिला। गाने के कॉस्ट्यूम, डांस स्टेप्स और फिल्मांकन को लेकर कई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने आपत्ति जताई। कुछ राज्यों में फिल्म के बहिष्कार की मांग तक उठी। सेंसर बोर्ड द्वारा सुझाए गए बदलावों के बाद फिल्म रिलीज़ हुई और बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता भी हासिल की। इससे यह साबित हुआ कि विवाद कभी-कभी फिल्म की लोकप्रियता को और बढ़ा देते हैं।
इसके बाद 2023 में आई फिल्म डंकी के एक गीत की प्रस्तुति को लेकर भी सोशल मीडिया पर सीमित स्तर पर आलोचना हुई। हालांकि यह विवाद पहले की तुलना में कम तीव्र था, लेकिन इससे यह संकेत मिला कि दर्शकों की संवेदनशीलता और प्रतिक्रियाएँ अब पहले से अधिक त्वरित और मुखर हो गई हैं।
फिल्मों के अलावा पॉप संगीत और म्यूज़िक वीडियो में भी बोल्डनेस को लेकर बहस जारी रही है। वर्ष 2020 में रिलीज़ हुई फिल्म स्ट्रीट डांसर 3डी के गीत “गर्मी” ने युवाओं के बीच डांस ट्रेंड बना दिया, लेकिन इसके डांस मूव्स और कैमरा एंगल को लेकर आलोचना भी हुई। इसके बाद 2021 में आए स्वतंत्र म्यूज़िक वीडियो “पानी पानी” तथा उसी वर्ष फिल्म सत्यमेव जयते 2 के गीत “कुसु कुसु” ने भी ग्लैमरस प्रस्तुति के कारण चर्चा और विवाद दोनों अर्जित किए। इन गीतों ने यह दिखाया कि आज के मनोरंजन उद्योग में क्लब-संस्कृति, तेज़ बीट्स और आकर्षक विजुअल्स का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। इधर नोरा फतेही के डांस नंबर जैसे चुनरी चुनरी (सरके चुनर मेरी सरके) पर ग्लैमरस फिल्मांकन, गाने के आपत्तिजनक बोल और उत्तेजक डांस स्टेप्स को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना हो रही है। वहीं रैपर बादशाह के पार्टी-स्टाइल गीत टटीरी के कुछ बोलों और विजुअल प्रस्तुति को भी द्विअर्थी और क्लब-संस्कृति को बढ़ावा देने वाला बताया गया। इन सभी घटनाओं को समग्र रूप से देखें तो स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में मनोरंजन को लेकर दृष्टिकोण लगातार बदल रहा है। एक ओर युवा पीढ़ी वैश्विक ट्रेंड और आधुनिक अभिव्यक्ति को सहजता से स्वीकार कर रही है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक सोच रखने वाले वर्ग सांस्कृतिक मर्यादाओं की रक्षा की बात करते हैं। सेंसर बोर्ड और न्यायपालिका भी इस संतुलन को बनाए रखने के लिए समय-समय पर हस्तक्षेप करते रहे हैं, चाहे वह आयु-आधारित प्रमाणपत्र देना हो या कुछ दृश्यों में बदलाव सुझाना।
वास्तव में “अश्लीलता” की परिभाषा स्थिर नहीं है; यह समय, समाज और संदर्भ के साथ बदलती रहती है। जो प्रस्तुति एक पीढ़ी को अस्वीकार्य लगती है, वही दूसरी पीढ़ी के लिए सामान्य मनोरंजन हो सकती है। डिजिटल मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म ने इस बहस को और व्यापक बना दिया है, क्योंकि अब दर्शक अपनी प्रतिक्रिया तुरंत व्यक्त कर सकते हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारतीय फिल्मों और गीतों में बोल्डनेस को लेकर होने वाले विवाद केवल मनोरंजन की सीमा का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि वे समाज में चल रहे सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत भी हैं। भविष्य में भी यह बहस जारी रहने की संभावना है, क्योंकि मनोरंजन उद्योग निरंतर नए प्रयोग करेगा और समाज अपनी संवेदनशीलताओं के अनुसार प्रतिक्रिया देता रहेगा। इसलिए आवश्यक है कि रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाकर ही स्वस्थ और समृद्ध सांस्कृतिक वातावरण तैयार किया जा सके।
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार

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