सोमवार, 29 जून 2026

गाजियाबाद के सिटीजन चार्टर का सच

 विशेष लेख-

यदि आपकी गली का सीवर जाम हो जाए, स्ट्रीट लाइट खराब हो जाए या कई दिनों तक कूड़ा न उठे, तो क्या आपको पता है कि नगर निगम को इसे कितने दिनों में ठीक करना चाहिए? अधिकांश नागरिक इसका उत्तर नहीं जानते। जबकि इसके लिए बाकायदा ‘सिटीजन चार्टर’ बना हुआ है, जिसमें हर सेवा की समय-सीमा तय है। सवाल यह है कि क्या इन समय-सीमाओं का पालन भी हो रहा है? यही है सिटीजन चार्टर का सच। सरकारी कार्यालयों में वर्षों तक आम नागरिक की सबसे बड़ी शिकायत रही है-‘आज नहीं, कल आइए’, ‘फाइल चल रही है’, ‘साहब मीटिंग में हैं।’ इन समस्याओं से निजात दिलाने के उद्देश्य से सिटीजन चार्टर की अवधारणा सामने आई। इसका उद्देश्य था कि सरकार स्वयं यह घोषित करे कि कौन-सी सेवा कितने समय में उपलब्ध कराई जाएगी और यदि निर्धारित अवधि में सेवा नहीं मिलती है, तो संबंधित अधिकारी जवाबदेह होगा।
गाजियाबाद में नगर निगम ने लगभग दो दशक पहले सिटीजन चार्टर लागू किया और बाद में इसे उत्तर प्रदेश सरकार की समयबद्ध सेवा व्यवस्था के अनुरूप और व्यवस्थित बनाया गया। आज नगर निगम के अलावा जिला प्रशासन, तहसील, राजस्व, खाद्य एवं रसद, समाज कल्याण, परिवहन, विद्युत तथा अन्य विभाग भी नागरिक सेवाओं के लिए समय-सीमा निर्धारित करने का दावा करते हैं। लेकिन नगर निगम का सिटीजन चार्टर सबसे विस्तृत और स्पष्ट रूप में उपलब्ध है।
चार्टर के अनुसार सड़क, नाली और सार्वजनिक स्थानों की सफाई, कूड़ा न उठने, सीवर जाम, गंदे पेयजल और स्ट्रीट लाइट खराब होने जैसी शिकायतों का निस्तारण 24 घंटे के भीतर होना चाहिए। सड़क पर गड्ढा भरने के लिए चार दिन, सड़क और नाली की मरम्मत के लिए सात दिन, अस्थायी अतिक्रमण हटाने के लिए पाँच दिन, स्थायी अतिक्रमण पर कार्रवाई के लिए दस दिन, सड़क पर सीवर का पानी भरने की समस्या के लिए तीन दिन, सीवर लाइन की मरम्मत के लिए 15 दिन, नामांतरण (म्यूटेशन) के लिए 45 दिन, जबकि संपत्ति कर एवं ट्रेड लाइसेंस संबंधी मामलों के लिए लगभग 48 दिन की समय-सीमा निर्धारित की गई है। यदि इन समय-सीमाओं का ईमानदारी से पालन हो, तो नागरिकों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता ही न पड़े। लेकिन जमीनी हकीकत इससे कुछ अलग दिखाई देती है।
पिछले दस वर्षों में गाजियाबाद में सबसे अधिक शिकायतें सफाई, कूड़ा उठान, सीवर जाम, जलभराव, गंदे पेयजल, स्ट्रीट लाइट, अतिक्रमण, आवारा पशुओं और संपत्ति कर से संबंधित रही हैं। हर मानसून में जलभराव और सीवर की समस्या सुर्खियाँ बनती है। कई इलाकों में सफाई और कूड़ा उठान को लेकर स्थानीय निवासी बार-बार शिकायत दर्ज कराते हैं। नगर निगम ने मोबाइल ऐप, ऑनलाइन पोर्टल, हेल्पलाइन और जनसुनवाई जैसी डिजिटल व्यवस्थाएँ शुरू की हैं, जिससे शिकायत दर्ज कराना पहले की तुलना में आसान हुआ है। यह एक सकारात्मक बदलाव है।
फिर भी सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता का है। यदि किसी नागरिक से पूछा जाए कि पिछले दस वर्षों में नगर निगम को कुल कितनी शिकायतें मिलीं, उनमें से कितनी निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित हुईं, कितनी अभी भी लंबित हैं और कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, तो इसका स्पष्ट उत्तर उपलब्ध नहीं है। विभिन्न विभाग अपने-अपने स्तर पर आँकड़े रखते हैं, लेकिन पूरे जिले का समेकित सिटीजन चार्टर रिपोर्ट कार्ड सार्वजनिक नहीं किया जाता। जब तक परिणाम जनता के सामने नहीं होंगे, तब तक किसी भी व्यवस्था की सफलता का निष्पक्ष मूल्यांकन संभव नहीं है।
रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए), व्यापारी संगठन और सामाजिक संस्थाएँ समय-समय पर यह शिकायत उठाती रही हैं कि कई मामलों में शिकायतों का समाधान केवल कागजों में दिखा दिया जाता है, जबकि वास्तविक समस्या बनी रहती है। कुछ नागरिकों का कहना है कि उन्हें एक ही शिकायत कई बार दर्ज करनी पड़ती है। विशेषकर सीवर, सफाई, जलभराव और स्ट्रीट लाइट जैसी समस्याओं में यह शिकायत अक्सर सुनने को मिलती है। उनका मानना है कि यदि निर्धारित समय-सीमा का पालन नहीं होता, तो संबंधित अधिकारी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
दूसरी ओर प्रशासन का पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अधिकारियों का कहना है कि पहले की तुलना में शिकायत निस्तारण व्यवस्था कहीं अधिक पारदर्शी हुई है। ऑनलाइन जनसुनवाई, मोबाइल ऐप और नियमित समीक्षा बैठकों के माध्यम से शिकायतों की निगरानी की जाती है। उनका दावा है कि अधिकांश शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण किया जाता है और जिन मामलों में देरी होती है, उनकी समीक्षा कर आवश्यक निर्देश दिए जाते हैं। प्रशासन का यह भी कहना है कि डिजिटल तकनीक के कारण अब शिकायतों की ट्रैकिंग संभव हो गई है और जवाबदेही पहले से बेहतर हुई है।
जनप्रतिनिधियों की राय भी इस मुद्दे पर विचारणीय है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों इस बात पर सहमत हैं कि सिटीजन चार्टर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्था है। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब इसका पूरी ईमानदारी से पालन हो। कई पार्षद नगर निगम की बैठकों में यह मुद्दा उठा चुके हैं कि शिकायतों का केवल ऑनलाइन निस्तारण दिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौके पर समस्या का वास्तविक समाधान होना चाहिए। विधायकों और जनप्रतिनिधियों ने भी समय-समय पर सफाई, सीवर, जलभराव और अतिक्रमण जैसी समस्याओं पर अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
दरअसल, सिटीजन चार्टर केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि सरकार और नागरिक के बीच विश्वास का एक अनुबंध है। यदि सरकार स्वयं यह घोषणा करती है कि अमुक सेवा एक दिन, तीन दिन या सात दिन में उपलब्ध होगी, तो नागरिक को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह उस समय-सीमा का पालन न होने पर जवाब मांग सके। दुर्भाग्य से आज भी अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं है कि उनके अधिकार क्या हैं और शिकायत के निस्तारण की तय समय-सीमा क्या है।
समय आ गया है कि प्रत्येक विभाग हर महीने अपनी वेबसाइट पर यह प्रकाशित करे कि कितनी शिकायतें प्राप्त हुईं, कितनी निर्धारित समय-सीमा में निस्तारित हुईं, कितनी लंबित हैं और किन मामलों में अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। इससे न केवल प्रशासन की जवाबदेही बढ़ेगी, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी मजबूत होगा। इसके साथ ही प्रत्येक सरकारी कार्यालय में सिटीजन चार्टर को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाना चाहिए और नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए।
गाजियाबाद जैसे तेजी से विकसित हो रहे महानगर में सुशासन की पहचान केवल चैड़ी सड़कों, ऊँची इमारतों और नई परियोजनाओं से नहीं होगी, बल्कि इस बात से होगी कि एक सामान्य नागरिक की शिकायत कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से सुनी और सुलझाई जाती है। सिटीजन चार्टर इसी कसौटी का नाम है।
सरकारी सेवाएँ किसी की कृपा नहीं, बल्कि नागरिक का संवैधानिक अधिकार हैं। यदि सिटीजन चार्टर केवल दीवार पर टंगा एक पोस्टर बनकर रह जाए, तो उसका कोई अर्थ नहीं। लेकिन यदि उसकी हर समय-सीमा का पालन हो, हर शिकायत का वास्तविक समाधान मिले और हर अधिकारी अपनी जवाबदेही स्वीकार करे, तभी कहा जा सकेगा कि सिटीजन चार्टर का सच वास्तव में नागरिक के पक्ष में खड़ा है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 23 जून 2026

कोचिंग सेंटरों में अग्निकांड

 आवश्यक लेख-

शिक्षा के मंदिर या मौत के जाल?
22 जून 2026 को लखनऊ के अलीगंज स्थित एक व्यावसायिक भवन में संचालित कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हादसे में कम से कम 15 लोगों की जान चली गई, जिनमें अधिकांश छात्र थे। कई छात्र जान बचाने के लिए पहली मंजिल से कूद पड़े। यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम भी थी। यह पहला अवसर नहीं है। पिछले दस वर्षों में देश के अनेक कोचिंग संस्थानों में आग लगने की घटनाओं ने दर्जनों छात्रों की जान ली है और सैकड़ों को घायल किया है। हर घटना के बाद जांच, आदेश और आश्वासन मिलते हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है। भारत सरकार के पास केवल कोचिंग सेंटरों में लगी आग का अलग राष्ट्रीय डेटाबेस उपलब्ध नहीं है, लेकिन प्रमुख घटनाओं का अध्ययन बताता है कि पिछले दस वर्षों में 15 से अधिक बड़ी आग की घटनाएँ सामने आईं। इनमें कम से कम 37-40 लोगों की मृत्यु हुई और 100 से अधिक छात्र घायल या झुलसे। वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि छोटे शहरों की अनेक घटनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज नहीं हो पातीं।
प्रमुख घटनाएँ
सूरत (2019)-तक्षशिला आर्केड के कोचिंग सेंटर में आग लगने से 22 छात्रों की मृत्यु हुई। जांच में सामने आया कि भवन में फायर एनओसी नहीं थी, लकड़ी की सीढ़ियाँ थीं और आपातकालीन निकास का अभाव था। तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया।
दिल्ली, मुखर्जी नगर (2023)-बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगने पर छात्र रस्सियों और बिजली के तारों के सहारे नीचे उतरे। 61 छात्र घायल हुए। घटना के बाद उच्च न्यायालय ने सुरक्षा ऑडिट के आदेश दिए।
नागपुर (2026)-एक कोचिंग संस्थान में आग लगने के बाद जांच में पता चला कि भवन में आवश्यक फायर सुरक्षा उपकरण ही नहीं थे। लगभग 150 छात्र बाल-बाल बचे।
लखनऊ (2026)-नवीनतम हादसे में 15 लोगों की मौत ने एक बार फिर देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हमारे कोचिंग संस्थान वास्तव में सुरक्षित हैं।
कितने कोचिंग सेंटर
भारत में कोचिंग उद्योग आज लगभग 60-70 हजार करोड़ रुपये का बाजार बन चुका है। विभिन्न उद्योग अध्ययनों के अनुसार देश में लगभग 1 से 1.5 लाख छोटे-बड़े कोचिंग संस्थान संचालित हैं। इनमें से बड़ी संख्या स्थानीय स्तर पर संचालित होती है, जिनका समुचित पंजीकरण या नियमित सुरक्षा निरीक्षण नहीं होता।
अवैध संचालन कितना बड़ा संकट?
दिल्ली में मुखर्जी नगर अग्निकांड के बाद किए गए निरीक्षणों में पाया गया कि अधिकांश संस्थानों में गंभीर कमियाँ थीं। सुरक्षा ऑडिट में संकरे प्रवेश-द्वार, आपातकालीन निकास का अभाव, फायर अलार्म और स्प्रिंकलर न होना तथा क्षमता से अधिक छात्रों को बैठाना जैसी अनियमितताएँ मिलीं। इसके बाद जुलाई 2024 से फरवरी 2026 तक चलाए गए अभियान में 89 कोचिंग सेंटर सील किए गए। 505 कोचिंग सेंटरों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। कुल 370 प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई हुई। लखनऊ हादसे के बाद कानपुर में भी 16 कोचिंग सेंटर सील कर दिए गए और 22 अन्य के विरुद्ध कार्रवाई शुरू हुई।
आखिर आग क्यों लगती है?
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश मामलों में कारण लगभग समान हैं। ओवरलोड विद्युत व्यवस्था और शॉर्ट सर्किट। बिना फायर एनओसी संचालन। बेसमेंट या अवैध मंजिलों में कक्षाएँ। केवल एक प्रवेश और निकास मार्ग। संकरी सीढ़ियाँ। अग्निशमन उपकरणों का अभाव। क्षमता से अधिक छात्रों की भीड़। नियमित सुरक्षा ऑडिट न होना।
सरकार कहाँ चूकी?
सरकारों ने नियम बनाए, लेकिन उनका पालन कराने में गंभीर कमी रही। सबसे बड़ी विफलताएँ रहीं-बिना अनुमति संस्थानों का वर्षों तक संचालन। नगर निगम, विकास प्राधिकरण और अग्निशमन विभाग के बीच समन्वय का अभाव। शिकायतों पर समय पर कार्रवाई न होना। राजनीतिक और स्थानीय दबाव में निरीक्षणों की अनदेखी। दुर्घटना के बाद ही अभियान चलाना। यही कारण है कि लगभग हर बड़ी दुर्घटना के बाद वही कमियाँ दोबारा सामने आती हैं।
सरकार ने क्या प्रयास किए
हाल के वर्षों में कई राज्यों ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए हैं- विशेष फायर सेफ्टी ऑडिट। अवैध संस्थानों की सीलिंग। संयुक्त निरीक्षण दलों का गठन। जिम्मेदार अधिकारियों का निलंबन। संचालकों के विरुद्ध एफआईआर और गिरफ्तारी। फायर सुरक्षा नियमों को और सख्ती से लागू करने की पहल। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ये कदम अधिकतर दुर्घटना के बाद उठाए जाते हैं, न कि पहले।
विशेषज्ञों की राय
आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों और अग्नि सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि अब केवल दिशा निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। वे सुझाव देते हैं-प्रत्येक कोचिंग सेंटर का अनिवार्य पंजीकरण हो। फायर एनओसी के बिना संचालन पूरी तरह प्रतिबंधित हो। हर भवन में कम-से-कम दो आपातकालीन निकास अनिवार्य हों। प्रत्येक छह माह में स्वतंत्र फायर ऑडिट कराया जाए। बेसमेंट में कक्षाएँ पूर्णतः प्रतिबंधित हों। छात्र संख्या के अनुसार भवन क्षमता तय हो। नियमों का उल्लंघन करने पर केवल संचालक ही नहीं, संबंधित अधिकारियों की भी व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो। छात्रों के लिए नियमित मॉक ड्रिल और आपदा प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।
कोचिंग सेंटर आज लाखों युवाओं के भविष्य का आधार हैं, लेकिन यदि वे स्वयं सुरक्षित नहीं हैं तो यह व्यवस्था गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। सूरत से लेकर मुखर्जी नगर और अब लखनऊ तक हर त्रासदी ने यही संदेश दिया है कि दुर्घटनाएँ केवल आग से नहीं होतीं, बल्कि नियमों की अनदेखी, प्रशासनिक ढिलाई और लालच से भी होती हैं। यदि अब भी कठोर और स्थायी सुधार नहीं किए गए, तो अगली त्रासदी केवल समय का प्रश्न होगी। शिक्षा का उद्देश्य भविष्य बनाना है, उसे छात्रों के लिए जोखिम का पर्याय नहीं बनने दिया जा सकता।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

सोमवार, 22 जून 2026

संवेदना के स्वर महाकवि डॉ. कुंअर बेचैन

 एक जुलाई जन्मदिन पर विशेष लेख-

‘हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए,
ज़िंदगी भोर है, सूरज से निकलते रहिए।’

इन दो पंक्तियों में महाकवि डॉ. कुंअर बेचैन का समूचा जीवन-दर्शन समाया हुआ है। निराशा के अंधकार में आशा का दीप जलाना, टूटते हुए मनुष्य को जीने का साहस देना और संवेदनाओं को शब्दों की गरिमा प्रदान करना, यही उनकी रचनात्मक साधना का मूल स्वर था। 1 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जनपद के उमरी गाँव में जन्मे डॉ. कुंअर बेचैन (वास्तविक नाम डॉ. कुंअर बहादुर सक्सेना) ने हिंदी कविता, गीत और गजल को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। वे लंबे समय तक गाजियाबाद के एम.एम.एच. कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे और देश-विदेश के कवि सम्मेलनों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। डॉ. कुंअर बेचैन का साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा का संगीत है। उन्होंने प्रेम को केवल निजी अनुभूति नहीं माना, बल्कि उसे मनुष्य और समाज के बीच विश्वास का सेतु बनाया। उनकी कविता में गाँव की मिट्टी की सोंधी गंध भी है और महानगर की बेचैनी भी। उनके गीतों में प्रकृति की कोमलता है तो गजलों में समय की तल्ख सच्चाइयों का साहसिक बयान। वे मानते थे कि कविता का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना भी है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं, जितनी अपने समय में थीं।
‘उसने फेंके मुझपे पत्थर और मैं पानी की तरह,
और ऊँचा, और ऊँचा, और ऊँचा हो गया।’

यह शेर केवल प्रतिकूल परिस्थितियों का उत्तर नहीं, बल्कि उनके जीवन-दर्शन का परिचय भी है। संघर्ष उनके जीवन में भी कम नहीं थे, किंतु उन्होंने विषमताओं को अपनी रचनात्मक ऊर्जा में बदल दिया। शायद यही कारण है कि उनकी कविता शिकायत नहीं करती, बल्कि जीवन का हाथ थामकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
डॉ. कुंअर बेचैन ने हिंदी मंचीय कविता को अभूतपूर्व गरिमा प्रदान की। वे उन विरले कवियों में थे, जिनकी लोकप्रियता कभी उनकी साहित्यिक गुणवत्ता पर भारी नहीं पड़ी। वे जब मंच पर आते थे तो शब्द अभिनय नहीं करते थे, बल्कि हृदय बोलता था। उनकी वाणी में विनम्रता थी, प्रस्तुति में सहजता और भावों में ऐसी आत्मीयता कि श्रोता स्वयं को कविता का हिस्सा महसूस करने लगते थे।
उनकी गजलों का एक बड़ा गुण उनकी संप्रेषणीयता है। वे कठिन से कठिन भाव को भी अत्यंत सरल भाषा में व्यक्त कर देते थे। इसलिए उनका साहित्य विश्वविद्यालयों के शोध का विषय भी बना और सामान्य पाठकों की प्रिय धरोहर भी। डॉ. कुंअर बेचैन केवल बड़े कवि नहीं थे, वे बड़े मनुष्य भी थे। साहित्य-जगत में उनकी पहचान एक स्नेही मार्गदर्शक के रूप में थी। असंख्य युवा कवियों को उन्होंने प्रोत्साहन दिया। मंच साझा करते समय वे नए रचनाकारों को उतना ही सम्मान देते थे, जितना वरिष्ठों को। यही कारण है कि उनके शिष्यों और प्रशंसकों का विशाल परिवार आज भी उन्हें केवल कवि नहीं, बल्कि एक संस्कार के रूप में याद करता है। उनकी रचनाओं में रिश्तों की ऊष्मा बार-बार दिखाई देती है। वे जानते थे कि आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी संवेदनाओं का क्षरण है। इसलिए उनकी कविताएँ मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं।
‘उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे,
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे।’

इन पंक्तियों में केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक संबंधों की पूरी कहानी छिपी है। यही उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे व्यक्तिगत अनुभव को सामाजिक संवेदना में बदल देते थे। डॉ. कुंअर बेचैन ने गीत, नवगीत, गजल, दोहा, कविता, उपन्यास और आलोचना, लगभग सभी विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया। उनकी अनेक कृतियाँ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने साहित्य को किसी विचारधारा की सीमाओं में नहीं बाँधा। उनके लिए मनुष्य सबसे बड़ा सत्य था और संवेदना सबसे बड़ा धर्म। आज जब समाज संवाद से अधिक विवाद में उलझा दिखाई देता है, जब तकनीक ने निकटता तो बढ़ाई है पर आत्मीयता कम कर दी है, तब डॉ. कुंअर बेचैन की कविताएँ हमें फिर से मनुष्य बनने का पाठ पढ़ाती हैं। उनकी रचनाएँ बताती हैं कि प्रेम, विश्वास, करुणा और सह-अस्तित्व केवल साहित्यिक शब्द नहीं, बल्कि सभ्यता की आधारशिलाएँ हैं।
उनकी भाषा का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी सहजता है। वे अलंकारों के मोह में नहीं उलझते, बल्कि सीधे हृदय तक पहुँचते हैं। यही कारण है कि उनकी पंक्तियाँ वर्षों बाद भी स्मृति में जीवित रहती हैं। उनकी कविता पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई आत्मीय व्यक्ति जीवन का अनुभव साझा कर रहा हो। 29 अप्रैल 2021 को उनका शारीरिक अवसान हुआ, किंतु कवि कभी नहीं मरता। वह अपनी रचनाओं में जीवित रहता है। आज भी देशभर के कवि सम्मेलन, साहित्यिक गोष्ठियाँ और युवा रचनाकार उनकी पंक्तियों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। गाजियाबाद की साहित्यिक पहचान का उल्लेख उनके बिना अधूरा माना जाता है। उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस संवेदनशील भारतीय मन को प्रणाम करना है जिसने कविता को जीवन की धड़कनों से जोड़ा। उनकी रचनाएँ हमें सिखाती हैं कि शब्द तभी सार्थक हैं जब वे मनुष्य के आँसू पोंछ सकें, उसके चेहरे पर मुस्कान ला सकें और अँधेरे समय में आशा का दीप जला सकें। और शायद इसलिए उनकी ये पंक्तियाँ आज भी हर पीढ़ी के लिए एक संदेश बनकर गूँजती हैं-
‘यह दुनिया सूखी मिट्टी है
तू प्यार के छींटें देता चल।’

डॉ. कुंअर बेचैन का साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल काव्य-संपदा नहीं, बल्कि संवेदना, संस्कृति और मनुष्यता की अमूल्य विरासत है। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उन्हें हिंदी साहित्य के आकाश में सदैव प्रकाशित रखने वाली ज्योति।


लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


गुरुवार, 18 जून 2026

आस्था पर डाका

 लेख-

धार्मिक स्थलों में चढ़ावे की चोरी और गबन के बढ़ते मामले
भारत में धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालु केवल धन नहीं चढ़ाते, बल्कि अपनी आस्था, विश्वास और मनोकामनाएँ भी समर्पित करते हैं। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च और अन्य धार्मिक संस्थाओं में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। लेकिन पिछले एक दशक में अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें इसी चढ़ावे की चोरी, गबन या वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। यह समस्या किसी एक धर्म या देश तक सीमित नहीं है, भारत से लेकर सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड और अमेरिका तक ऐसे मामलों ने लोगों का विश्वास झकझोरा है।
अयोध्या राम मंदिर-करोड़ों के चढ़ावे पर सवाल
जून 2026 में देश के सबसे चर्चित धार्मिक स्थल, राम मंदिर अयोध्या, में चढ़ावे के कथित गबन का मामला सामने आया। आरोपों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन सदस्यीय विशेष जांच दल लीनी एसआईटी गठित किया। जांच में ट्रस्ट सदस्यों, कर्मचारियों और नकदी गिनने की व्यवस्था से जुड़े लोगों से पूछताछ की गई। फिलहाल जांच जारी है और किसी अदालत ने अभी तक किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया है। इसलिए इसे अभी केवल आरोप और जांच का मामला माना जाएगा।
तिरुपति में कर्मचारी पर चोरी का आरोप
देश के सबसे समृद्ध मंदिरों में गिने जाने वाले तिरुमला तिरुपति देवस्थानम में भी दान गिनने वाले विभाग (पराकामनी) के एक कर्मचारी पर नकदी चोरी का आरोप लगा। सीसीटीवी और आंतरिक जांच के आधार पर कार्रवाई हुई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि अत्याधुनिक व्यवस्था वाले संस्थानों में भी निगरानी की निरंतर आवश्यकता है।
बेंगलुरु का गली आंजनेय स्वामी मंदिर
2025 में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में मंदिर कर्मचारियों पर दान राशि निकालने के आरोप लगे। जांच में वित्तीय अनियमितताएँ सामने आने के बाद कर्नाटक सरकार ने मंदिर का प्रशासन अपने नियंत्रण में ले लिया। जांच में वर्षों तक लेखा-जोखा ठीक से न रखने और दान राशि के प्रबंधन में गंभीर कमियाँ पाई गईं।
स्वरवेद महामंदिर का मामला
वाराणसी स्थित स्वरवेद महामंदिर में एक लेखाकार पर लगभग 60 लाख रुपये के गबन का आरोप लगा। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर आपराधिक विश्वासघात और जालसाजी जैसी धाराओं में मामला दर्ज किया। यह मामला बताता है कि धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय नियंत्रण और ऑडिट कितना आवश्यक है।
छोटे मंदिर भी सुरक्षित नहीं
मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और कर्नाटक सहित अनेक राज्यों में दानपात्र तोड़कर नकदी चोरी करने की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। कई मामलों में सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जबकि कुछ मामलों में चोरी की गई राशि भी बरामद हुई।
सबरीमला में सोने की अनियमितताओं की जांच
केरल के प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर में स्वर्ण-मंडित संरचनाओं से जुड़े कथित सोना गबन और वित्तीय अनियमितताओं की जांच ने भी व्यापक ध्यान आकर्षित किया। अदालत की निगरानी में जांच एजेंसियों ने कई पहलुओं की पड़ताल की। मामला अभी विभिन्न जांचों और न्यायिक प्रक्रियाओं में है।
विदेशों के चर्चित मामले
सिंगापुर-
सिटी हार्वेस्ट चर्च-सिंगापुर के प्रसिद्ध सिटी हार्वेस्ट चर्च में चर्च निधि के दुरुपयोग का मामला विश्वभर में चर्चा का विषय बना। चर्च के संस्थापक और अन्य अधिकारियों को दोषी ठहराया गया तथा उन्हें कारावास की सजा सुनाई गई। यह धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय जवाबदेही का बड़ा उदाहरण माना जाता है।
दक्षिण कोरिया-दक्षिण कोरिया के योइदो फुल गॉस्पेल चर्च से जुड़े वित्तीय गबन के मामले में चर्च नेतृत्व के विरुद्ध कार्रवाई हुई। अदालत ने दोषसिद्धि के बाद कारावास (कुछ मामलों में निलंबित) और आर्थिक दंड भी लगाया।
थाईलैंड-2017 से शुरू हुई थाई टेंपल फ्रॉड जांच में सरकारी अनुदानों और मंदिरों के धन के दुरुपयोग के आरोपों में कई वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं और अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई। जांच के बाद कानूनों में भी बदलाव किए गए ताकि वित्तीय निगरानी मजबूत हो सके।
अमेरिका-अमेरिका में भी पिछले दशक में अनेक चर्चों के पादरियों और वित्तीय अधिकारियों पर दान राशि के गबन के मामले दर्ज हुए। कई मामलों में अदालतों ने जेल, जुर्माना और धन की वसूली के आदेश दिए।
क्यों बढ़ रहे हैं ऐसे मामले
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं-
नकद चढ़ावे की बड़ी मात्रा।
नियमित स्वतंत्र ऑडिट का अभाव।
ट्रस्टों में पारदर्शिता की कमी।
सीमित तकनीकी निगरानी।
एक ही व्यक्ति या छोटे समूह के हाथों में वित्तीय नियंत्रण।
क्या कहता है कानून
भारत में यदि धार्मिक स्थल की दान राशि की चोरी या गबन सिद्ध होता है तो भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत चोरी, आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी और जालसाजी जैसी धाराओं में कार्रवाई की जा सकती है। अपराध की प्रकृति और राशि के अनुसार जुर्माना, संपत्ति की जब्ती और कई वर्षों के कारावास तक का प्रावधान है।
समाधान क्या है
विशेषज्ञ धार्मिक संस्थानों में निम्न सुधारों की सलाह देते हैं-
प्रत्येक दानपात्र पर 24×7 सीसीटीवी निगरानी।
नकद के स्थान पर डिजिटल दान को बढ़ावा।
वार्षिक स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करना।
ट्रस्टों की आय-व्यय वेबसाइट पर प्रकाशित करना।
नकदी गिनती में बहुस्तरीय निगरानी और बैंकिंग प्रणाली का उपयोग।
समय-समय पर सामाजिक और सरकारी लेखा परीक्षण।
धार्मिक संस्थाएँ केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं, बल्कि समाज के विश्वास की धुरी भी हैं। जब चढ़ावे की चोरी या गबन के मामले सामने आते हैं, तो आर्थिक नुकसान से अधिक आस्था को चोट पहुँचती है। इसलिए धार्मिक संस्थानों के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और आधुनिक वित्तीय प्रबंधन अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


न विजन, न मिशन, एजुकेशन बनी धंधा!

 लेख-

बीस वर्षों में बदलती शिक्षा व्यवस्था की पड़ताल
कभी शिक्षा को समाज निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता था। गुरु-शिष्य परंपरा से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, संस्कार और राष्ट्र निर्माण था। लेकिन पिछले दो दशकों में शिक्षा के स्वरूप में ऐसा परिवर्तन आया है कि आज अक्सर यह सवाल पूछा जाने लगा है ‘क्या शिक्षा सेवा है या व्यवसाय?’, यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेश ने अभूतपूर्व विस्तार किया है, वहीं बढ़ती फीस, फर्जी संस्थानों, प्रवेश घोटालों और परीक्षा-पत्र लीक जैसी घटनाओं ने व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाए हैं।
साल 2005 के बाद भारत में निजी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी। उच्च शिक्षा में आज अधिकांश नामांकन निजी संस्थानों में होता है। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, चिकित्सा, नर्सिंग, फार्मेसी और व्यावसायिक शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथों में है। सरकार की सीमित क्षमता और बढ़ती मांग के बीच निजी निवेश ने लाखों विद्यार्थियों को अवसर उपलब्ध कराए। आधुनिक प्रयोगशालाएँ, डिजिटल कक्षाएँ, उद्योग आधारित पाठ्यक्रम और बेहतर आधारभूत सुविधाएँ निजी संस्थानों की बड़ी उपलब्धियाँ मानी जाती हैं। लेकिन इसी दौर में शिक्षा के बाजारीकरण की आलोचना भी तेज हुई। कई निजी संस्थानों पर मनमानी फीस वसूलने, शिक्षकों को कम वेतन देने, प्लेसमेंट के बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने और गुणवत्ता से समझौता करने के आरोप लगे। अनेक राज्यों में अभिभावकों ने फीस वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन किए और सरकारों को फीस नियमन संबंधी कानून बनाने पड़े।
घटनाक्रम जिन्होंने व्यवस्था पर सवाल खड़े किए
पिछले बीस वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था की साख को प्रभावित किया-
वर्ष 2009 में लागू शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम ने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया। इससे शिक्षा का दायरा बढ़ा, लेकिन निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच गुणवत्ता की बहस भी तेज हुई।
वर्ष 2010-2015 के दौरान देश के अनेक राज्यों में फर्जी विश्वविद्यालयों और बिना मान्यता वाले संस्थानों के मामले सामने आए। समय-समय पर नियामक संस्थाओं ने ऐसे संस्थानों की सूची जारी कर विद्यार्थियों को सतर्क किया।
वर्ष 2016 में निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश और शुल्क व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हुई। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से नीट को एक समान प्रवेश परीक्षा के रूप में लागू किया गया। इससे कई अनियमितताओं पर अंकुश लगा, हालांकि नई चुनौतियाँ भी सामने आईं।
वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। ऑनलाइन शिक्षा सामान्य हो गई। निजी संस्थानों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी ने डिजिटल असमानता को उजागर कर दिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 लागू हुई, जिसने बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और लचीले पाठ्यक्रम की नई दिशा दी।
वर्ष 2023 और 2024 में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और विशेष रूप से नीट-यूजी 2024 और 2026 को लेकर उठे विवाद ने देशभर में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। लाखों छात्र और अभिभावक सड़कों पर उतरे। अदालतों तक मामले पहुँचे और सरकार को परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़े। यह स्पष्ट हुआ कि केवल संस्थान ही नहीं, बल्कि परीक्षा संचालन और नियामक तंत्र की मजबूती भी उतनी ही आवश्यक है।
निजी क्षेत्र का योगदान भी कम नहीं
यदि केवल नकारात्मक पक्ष देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रहेगी। देश के अनेक निजी विश्वविद्यालय और संस्थान शोध, नवाचार, स्टार्टअप संस्कृति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और उद्योग आधारित शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। कई निजी संस्थानों ने विदेशी विश्वविद्यालयों से समझौते किए, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएँ स्थापित कीं और विद्यार्थियों को वैश्विक अवसर उपलब्ध कराए। यही कारण है कि लाखों विद्यार्थी आज भी निजी संस्थानों को प्राथमिकता देते हैं।
फिर समस्या कहाँ है?
समस्या तब उत्पन्न होती है जब शिक्षा का उद्देश्य केवल लाभ कमाना रह जाता है। कई संस्थानों में शिक्षकों को अनुबंध पर कम वेतन पर रखा जाता है, जबकि विद्यार्थियों से लाखों रुपये फीस ली जाती है। कुछ संस्थानों में शोध केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। दूसरी ओर सरकारी संस्थानों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, रिक्त पद, धीमी नियुक्तियाँ और प्रशासनिक जटिलताएँ भी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। इसलिए दोष केवल किसी एक पक्ष का नहीं है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
प्रो. कृष्ण कुमार, पूर्व निदेशक, एनसीईआरटी, का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। उनके अनुसार यदि शिक्षा केवल बाजार की मांग के अनुसार ढल जाएगी तो उसका मानवीय पक्ष कमजोर पड़ जाएगा। शिक्षाविद् प्रो. अनिल सदगोपाल लंबे समय से शिक्षा के बढ़ते निजीकरण पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा को सामाजिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि केवल आर्थिक गतिविधि के रूप में। उनके अनुसार गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् प्रो. वाई. एस. राजन का मत था कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो नवाचार, अनुसंधान और रोजगार तीनों के बीच संतुलन स्थापित करे। केवल डिग्री आधारित शिक्षा देश को आगे नहीं ले जा सकती।
जिम्मेदार कौन?
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक संस्था या वर्ग में नहीं मिलता। सरकारों ने पर्याप्त सार्वजनिक निवेश नहीं किया, नियामक संस्थाएँ कई बार समय पर कार्रवाई नहीं कर सकीं, कुछ निजी संस्थानों ने शिक्षा को लाभ का माध्यम बना दिया और समाज ने भी कई बार केवल चमकदार परिसर और ऊँची फीस को गुणवत्ता का पर्याय मान लिया। परिणामस्वरूप शिक्षा का मूल उद्देश्य धीरे-धीरे पीछे छूटता गया।
आगे का रास्ता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने सुधार की दिशा अवश्य दिखाई है, लेकिन केवल नीति पर्याप्त नहीं होगी। नियमन में पारदर्शिता, शिक्षकों का सम्मानजनक वेतन, शोध को प्रोत्साहन, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, फर्जी संस्थानों पर कठोर कार्रवाई और फीस में संतुलन जैसे कदम समान रूप से आवश्यक हैं। शिक्षा को सेवा और उत्तरदायित्व दोनों के रूप में देखने की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने की है कि यदि शिक्षा केवल बाजार की वस्तु बन गई तो सबसे बड़ा नुकसान राष्ट्र के भविष्य का होगा। निजी क्षेत्र की ऊर्जा, सरकारी उत्तरदायित्व और समाज की अपेक्षाओं, इन तीनों के संतुलन से ही ऐसी शिक्षा व्यवस्था बन सकती है जो डिग्री ही नहीं, चरित्र, कौशल और नागरिकता भी गढ़े। यही भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 16 जून 2026

विकास की दौड़ में ढांचों की दरारें

 लेख-

डेढ़ दशक में रिकॉर्ड निर्माण, फिर क्यों टूट रहे हैं पुल, सड़कें और बांध?
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। नई सड़कें, एक्सप्रेसवे, पुल, सुरंगें, मेट्रो रेल और बांध विकास के प्रतीक बन चुके हैं। पिछले डेढ़ दशक में देश ने बुनियादी ढांचे के निर्माण में जो छलांग लगाई है, वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभूतपूर्व मानी जा रही है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पुलों के ढहने, सड़कों के धंसने और पुराने बांधों की सुरक्षा को लेकर उठते सवाल बता रहे हैं कि विकास की रफ्तार के साथ सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
रिकॉर्ड निर्माण का दशक
वर्ष 2014 में भारत का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क लगभग 91 हजार किलोमीटर था, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 1.46 लाख किलोमीटर हो गया। यानी करीब 61 प्रतिशत की वृद्धि। इसी अवधि में एक्सप्रेसवे नेटवर्क 93 किलोमीटर से बढ़कर 3 हजार किलोमीटर से अधिक हो गया। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, द्वारका एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और समृद्धि महामार्ग जैसी परियोजनाएं आधुनिक भारत की पहचान बन गई हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की गति 2013-14 में लगभग 12 किलोमीटर प्रतिदिन थी, जो बाद के वर्षों में बढ़कर 30 किलोमीटर प्रतिदिन से अधिक तक पहुंच गई। यह वृद्धि केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, व्यापार और रोजगार से भी सीधे जुड़ी हुई है।
पुलों का नया भारत
गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा और अन्य बड़ी नदियों पर अनेक विशाल पुल बने। बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वाेत्तर राज्यों में पुल निर्माण ने दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा। कई राज्यों में रेलवे ओवरब्रिज और फ्लाईओवरों के निर्माण ने यातायात दबाव कम किया। लेकिन जितनी तेजी से नए पुल बने, उतनी ही तेजी से पुराने पुलों की जर्जरता सामने आने लगी। पिछले कुछ वर्षों में पुलों के ढहने की घटनाओं ने विकास मॉडल पर सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2022 में गुजरात के मोरबी में मच्छु नदी पर बना झूला पुल टूट गया। इस हादसे में 141 लोगों की जान चली गई। मरम्मत के बाद कुछ ही दिनों में पुल का टूटना देश के लिए बड़ा झटका था।वर्ष 2018 में वाराणसी में निर्माणाधीन फ्लाईओवर गिरने से 18 लोगों की मौत हुई। उसी वर्ष कोलकाता का माजेरहाट पुल भी ढह गया। वर्ष 2025 में गुजरात के गम्भीरा पुल हादसे में 22 लोगों की मृत्यु हुई। इसके बाद राज्य सरकार ने 1,800 से अधिक पुलों का विशेष निरीक्षण कराया। विशेषज्ञों के अनुसार केवल दुर्घटनाएं ही समस्या नहीं हैं। असली समस्या यह है कि देश में हजारों पुल अपनी निर्धारित आयु के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं।
सड़कें बन रही हैं, टूट भी रही हैं
भारत में हर मानसून के दौरान सड़कों के धंसने और गड्ढों की खबरें सामान्य हो चुकी हैं। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, पटना, जयपुर और लखनऊ जैसे बड़े शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। भारतीय सड़क कांग्रेस से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क क्षति के प्रमुख कारण हैं-खराब ड्रेनेज व्यवस्था, निम्न गुणवत्ता की निर्माण सामग्री, भारी वाहनों का दबाव, रखरखाव में लापरवाही, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती अतिवृष्टि। सड़क बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उसे वर्षों तक सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखना कहीं अधिक कठिन कार्य है।
बांधों पर बढ़ती उम्र का दबाव
भारत में 5,700 से अधिक बड़े बांध हैं। इनमें से लगभग 250 बांध 100 वर्ष से अधिक पुराने हो चुके हैं। अगले दो दशकों में एक हजार से अधिक बांध ‘एजिंग इंफ्रास्ट्रक्चर’ की श्रेणी में पहुंच जाएंगे। बांध विशेषज्ञों का कहना है कि बांधों का टूटना दुर्लभ घटना है, लेकिन उनकी उम्र बढ़ने के साथ जोखिम भी बढ़ता है। इसलिए समय-समय पर संरचनात्मक जांच और सुरक्षा ऑडिट आवश्यक हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु की प्रसिद्ध भू-तकनीकी विशेषज्ञ जी माधवी लता का मानना है कि भारत में नई परियोजनाओं के निर्माण पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि रखरखाव को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिलती। कई सिविल इंजीनियरों का मत है कि पुलों की नियमित हेल्थ मॉनिटरिंग अनिवार्य की जानी चाहिए। जिस प्रकार मनुष्य का स्वास्थ्य परीक्षण होता है, उसी प्रकार पुलों और बांधों का भी समय-समय पर तकनीकी परीक्षण होना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार पहले जहां 50 वर्षों में एक बार आने वाली बाढ़ अब 10-15 वर्षों में देखने को मिल रही है। इससे पुलों की नींव और सड़कों की स्थिरता पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
सरकार ने क्या कदम उठाए?
1.इंडियन ब्रिज मैनेजमेंट सिस्टम-देश के लाखों पुलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया गया है। इससे पुलों की आयु, स्थिति और जोखिम का आकलन किया जा सकता है।
2.ड्रोन निगरानी-राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अब ड्रोन आधारित निरीक्षण प्रणाली का उपयोग कर रहा है। इससे छोटी-छोटी दरारों और क्षतियों का भी समय रहते पता लगाया जा सकता है।
3.डैम सेफ्टी एक्ट 2021-इस कानून के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बांध सुरक्षा संस्थाओं का गठन किया गया है। नियमित निरीक्षण और आपदा प्रबंधन योजना को अनिवार्य बनाया गया है।
4.स्ट्रक्चरल ऑडिट-कई राज्यों में 15 से 20 वर्ष से अधिक पुराने पुलों का विशेष ऑडिट कराया जा रहा है। जोखिम वाले पुलों पर भार सीमा निर्धारित की जा रही है।
दुनिया से क्या सीखें?
जापान, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में बड़ी संरचनाओं की डिजिटल निगरानी की जाती है। पुलों में सेंसर लगाए जाते हैं जो कंपन, झुकाव और दरारों की जानकारी तुरंत नियंत्रण केंद्र तक पहुंचाते हैं। भारत में भी अब स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में कदम बढ़ रहे हैं, लेकिन इसे व्यापक स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है।
डेढ़ दशक की तस्वीर
✔ राष्ट्रीय राजमार्ग: 91,000 किमी से बढ़कर 1.46 लाख किमी
✔ एक्सप्रेसवे नेटवर्क: 93 किमी से बढ़कर 3,000 किमी से अधिक
✔ बड़े बांध: 5,700 से अधिक
✔ 100 वर्ष से अधिक पुराने बांध: लगभग 250
✔ 2021-25 के बीच पुल दुर्घटनाएं: लगभग 170
✔ मोरबी हादसे में मृतक: 141
✔ गम्भीरा पुल हादसे में मृतक: 22
भारत विकास के उस दौर से गुजर रहा है जहां सड़कें, पुल और बांध केवल निर्माण परियोजनाएं नहीं, बल्कि आर्थिक प्रगति की जीवनरेखा हैं। लेकिन यदि रखरखाव, निरीक्षण और जवाबदेही को समान महत्व नहीं दिया गया तो विकास की यही संरचनाएं भविष्य में बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। देश को अब केवल कितना बनाया? से आगे बढ़कर कितना सुरक्षित रखा? का जवाब भी तलाशना होगा। क्योंकि मजबूत राष्ट्र केवल ऊंचे पुलों से नहीं, बल्कि सुरक्षित पुलों से बनता है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

सोमवार, 15 जून 2026

आइसक्रीम दवा नहीं, दावत है!

 आवश्यक लेख-

गर्मी का मौसम आते ही आइसक्रीम की बिक्री बढ़ जाती है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर वर्ग के लोगों की यह प्रिय मिठाई है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण एक प्रश्न बार-बार पूछा जाने लगा है-क्या आइसक्रीम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है? क्या इसे नियमित रूप से खाना चाहिए? और बाजार में उपलब्ध विभिन्न ब्रांडों में से कौन-सी आइसक्रीम अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा सकती है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने से पहले एक बात स्पष्ट कर लेना आवश्यक है कि आइसक्रीम कोई स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन या दवा नहीं है। यह मुख्यतः स्वाद और आनंद के लिए खाई जाने वाली वस्तु है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि ‘आइसक्रीम दवा नहीं, दावत है।’
आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट का अंतर
भारत में बहुत से लोग यह मानते हैं कि बाजार में मिलने वाली हर आइसक्रीम वास्तव में आइसक्रीम ही होती है, जबकि ऐसा नहीं है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के अनुसार ‘आइसक्रीम’ और ‘फ्रोजन डेजर्ट’ दो अलग-अलग श्रेणियाँ हैं। वास्तविक आइसक्रीम में दूध की वसा का प्रयोग किया जाता है, जबकि फ्रोजन डेजर्ट में वनस्पति वसा या वनस्पति तेल का उपयोग किया जा सकता है। इसलिए पैकेट पर आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट लिखा होना उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।
डॉक्टर क्या कहते हैं?
दिल्ली के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञों और पोषण विशेषज्ञों का सामान्य मत है कि आइसक्रीम का सबसे बड़ा स्वास्थ्य जोखिम उसमें मौजूद अतिरिक्त चीनी और संतृप्त वसा है। अत्यधिक चीनी का सेवन मोटापा, टाइप-2 मधुमेह, फैटी लीवर और दंत रोगों का जोखिम बढ़ा सकता है। वहीं संतृप्त वसा का अत्यधिक सेवन हृदय रोगों के जोखिम कारकों को प्रभावित कर सकता है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार समस्या आइसक्रीम के कभी-कभार सेवन से नहीं, बल्कि उसके नियमित और अधिक मात्रा में सेवन से उत्पन्न होती है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन मीठे पेय, मिठाइयाँ और आइसक्रीम का सेवन करता है, तो उसके शरीर में अतिरिक्त कैलोरी जमा होने लगती है, जिसका परिणाम मोटापे के रूप में सामने आता है।
आइसक्रीम में आखिर होता क्या है?
एक सामान्य आइसक्रीम में दूध, क्रीम, चीनी, दूध पाउडर, फ्लेवर, स्टेबलाइजर और इमल्सीफायर शामिल होते हैं। प्रीमियम श्रेणी की आइसक्रीम में दूध और क्रीम की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है, जबकि कम कीमत वाले उत्पादों में विभिन्न प्रकार के विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है। आइसक्रीम उद्योग में ‘ओवररन’ नामक एक तकनीक भी प्रयोग की जाती है, जिसमें आइसक्रीम में हवा मिलाई जाती है। यही कारण है कि एक लीटर आइसक्रीम का वास्तविक वजन कई बार अपेक्षा से कम होता है। अधिक हवा वाली आइसक्रीम हल्की और सस्ती पड़ती है, जबकि कम हवा वाली प्रीमियम आइसक्रीम अधिक गाढ़ी और समृद्ध स्वाद वाली होती है।
क्या आइसक्रीम के कोई लाभ भी हैं?
हाँ, सीमित मात्रा में खाई जाने वाली वास्तविक डेयरी आइसक्रीम कुछ पोषण भी प्रदान करती है। इसमें कैल्शियम, प्रोटीन और कुछ विटामिन होते हैं, जो दूध से प्राप्त होते हैं। लेकिन यह लाभ इतने अधिक नहीं हैं कि आइसक्रीम को स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन माना जाए। यदि कोई व्यक्ति केवल कैल्शियम प्राप्त करना चाहता है तो दूध, दही, छाछ और पनीर कहीं बेहतर विकल्प हैं।
बच्चों और युवाओं के लिए सावधानी
बाल रोग विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को पूरी तरह आइसक्रीम से वंचित करना भी उचित नहीं है, क्योंकि इससे उनके मन में इसके प्रति अनावश्यक आकर्षण पैदा हो सकता है। लेकिन नियमित रूप से बड़ी मात्रा में आइसक्रीम खिलाना भी सही नहीं है। सप्ताह में एक या दो बार सीमित मात्रा में आइसक्रीम पर्याप्त मानी जा सकती है। युवाओं में बढ़ती मोटापे की समस्या को देखते हुए डॉक्टर सलाह देते हैं कि आइसक्रीम को भोजन का विकल्प नहीं, बल्कि कभी-कभार मिलने वाले स्वादिष्ट व्यंजन के रूप में देखा जाना चाहिए।
कौन-सी आइसक्रीम चुनें?
यदि आप बाजार से आइसक्रीम खरीद रहे हैं तो कुछ बातों पर ध्यान दें-
1.पैकेट पर आइसक्रीम लिखा हो, केवल फ्रोजन डेजर्ट नहीं।
2.सामग्री सूची में दूध, क्रीम और मिल्क सॉलिड्स प्रमुख घटक हों।
3.चीनी की मात्रा कम हो तो बेहतर।
4.कृत्रिम रंग और फ्लेवर कम हों।
5.विश्वसनीय और गुणवत्ता नियंत्रण रखने वाले ब्रांड का चयन करें।
भारत में डेयरी आधारित आइसक्रीम उपलब्ध कराने वाले प्रमुख ब्रांडों में अमूल, मदर डेयरी, विरका, हेवमोर, वाडीलाल, क्वालिटी वाल्स  जैसे स्थापित नाम शामिल हैं। उपभोक्ताओं को किसी ब्रांड का चुनाव करने से पहले उसके लेबल और सामग्री सूची को अवश्य पढ़ना चाहिए। आइसक्रीम को लेकर सबसे बड़ी भूल यह है कि लोग इसे सामान्य खाद्य पदार्थ की तरह खाने लगते हैं। वास्तव में यह एक मिठाई है, जिसका उद्देश्य स्वाद और आनंद देना है, पोषण की पूर्ति करना नहीं। यदि आप स्वस्थ हैं, नियमित व्यायाम करते हैं और संतुलित भोजन लेते हैं, तो कभी-कभार एक स्कूप आइसक्रीम का आनंद लेने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन यदि आइसक्रीम आपकी दैनिक आदत बन जाए तो यही स्वाद धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकता है। इसलिए याद रखिए-आइसक्रीम दवा नहीं, दावत है। दावत का आनंद कभी-कभार लिया जाता है, रोज नहीं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


शनिवार, 13 जून 2026

ढाबे से फूड प्लाजा तक

 लेख-

हाईवे के ढाबे और रेस्टोरेंट स्वाद
का सफर या सुरक्षा की चुनौती?

भारत में सड़क यात्रा और ढाबों का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना राजमार्गों का इतिहास। कभी ट्रक चालकों और लंबी दूरी तय करने वाले यात्रियों की जरूरत के रूप में विकसित हुए ढाबे आज भारतीय खानपान संस्कृति की पहचान बन चुके हैं। मुरथल के परांठों से लेकर पंजाब की लस्सी, राजस्थान की दाल-बाटी और उत्तर प्रदेश के तंदूरी व्यंजनों तक, ढाबों ने न केवल यात्रियों की भूख मिटाई है बल्कि स्थानीय व्यंजनों को राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई है। दूसरी ओर, शहरों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधुनिक रेस्टोरेंट, फूड कोर्ट और हाईवे प्लाजा तेजी से बढ़े हैं, जिन्होंने यात्रा के दौरान भोजन की परंपरा को नया रूप दिया है। लेकिन पिछले एक दशक की तस्वीर केवल स्वाद और सुविधा की कहानी नहीं है। यह स्वच्छता, सुरक्षा, आगजनी, खाद्य गुणवत्ता, ढांचागत मजबूती और बदलती उपभोक्ता अपेक्षाओं की भी कहानी है।
बदलता हुआ हाईवे भारत
पिछले दस वर्षों में भारत के सड़क नेटवर्क में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। नए एक्सप्रेस-वे और राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के साथ हाईवे पर भोजनालयों का स्वरूप भी बदला है। पहले जहाँ अधिकांश ढाबे साधारण खाटों और खुले चूल्हों पर आधारित होते थे, वहीं अब अनेक ढाबे वातानुकूलित हॉल, डिजिटल भुगतान, बच्चों के खेलने की जगह और आधुनिक शौचालय जैसी सुविधाएँ देने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आय, पारिवारिक पर्यटन और निजी वाहनों की संख्या में वृद्धि ने ढाबों और रेस्टोरेंटों को अपनी सेवाएँ बेहतर करने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज कई प्रसिद्ध ढाबे छोटे उद्योगों का रूप ले चुके हैं और उनका वार्षिक कारोबार करोड़ों रुपये तक पहुँच गया है।
आखिर ढाबे इतने लोकप्रिय क्यों हैं?
ढाबों की सबसे बड़ी ताकत उनका स्वाद और आत्मीयता है। यात्रियों को घर जैसा भोजन, ताजा रोटियाँ और स्थानीय व्यंजन अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध हो जाते हैं। ट्रक चालक समुदाय के लिए तो ढाबे वर्षों से दूसरे घर की तरह रहे हैं। इसके अतिरिक्त, लंबी यात्रा के दौरान ढाबे विश्राम का भी अवसर प्रदान करते हैं। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि हर दो से तीन घंटे की ड्राइविंग के बाद कुछ समय का विश्राम दुर्घटनाओं की संभावना कम करता है। इस दृष्टि से ढाबे केवल भोजनालय नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा के अप्रत्यक्ष सहयोगी भी हैं।
रेस्टोरेंट और फूड प्लाजा की बढ़ती लोकप्रियता
हाल के वर्षों में यात्रियों की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। अब परिवार केवल स्वाद नहीं बल्कि स्वच्छता, सुरक्षित पार्किंग, साफ शौचालय और आरामदायक वातावरण को भी महत्व देते हैं। इसी कारण राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधुनिक रेस्टोरेंट और फूड प्लाजा तेजी से विकसित हुए हैं। इन स्थानों पर भोजन के साथ-साथ स्वच्छ शौचालय, प्राथमिक चिकित्सा, बच्चों के लिए स्थान, ईवी चार्जिंग और सुरक्षित पार्किंग जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं। यही वजह है कि परिवारों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच इनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
कोविड काल-सबसे बड़ा झटका
वर्ष 2020 और 2021 ढाबा और रेस्टोरेंट उद्योग के लिए बेहद कठिन साबित हुए। कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण यातायात लगभग ठप हो गया। हजारों ढाबों और छोटे भोजनालयों की आय अचानक समाप्त हो गई। कई स्थानों पर कर्मचारियों को हटाना पड़ा, जबकि अनेक छोटे ढाबे स्थायी रूप से बंद हो गए। उद्योग संगठनों के अनुसार महामारी के दौरान भोजन सेवा क्षेत्र को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हालांकि महामारी के बाद घरेलू पर्यटन और सड़क यात्राओं में तेजी आने से इस क्षेत्र में फिर से जान लौटी।
स्वाद के साथ बढ़ते खतरे
ढाबों और रेस्टोरेंटों की लोकप्रियता जितनी बढ़ी है, उतनी ही तेजी से उनसे जुड़े जोखिम भी सामने आए हैं। खाद्य सुरक्षा विभागों द्वारा समय-समय पर की गई जांचों में भोजन की गुणवत्ता, रसोई की सफाई और पेयजल की शुद्धता से जुड़े गंभीर सवाल उठे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भोजन में कीड़े, दूषित सामग्री और अस्वच्छ रसोई से जुड़ी शिकायतों में वृद्धि हुई है। कई मामलों में उपभोक्ता अदालतों ने ग्राहकों को मुआवजा देने के आदेश भी दिए। विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नियमित निरीक्षण और कठोर निगरानी की आवश्यकता है।
आग और ढांचागत हादसे-सबसे बड़ी चिंता
पिछले दशक में ढाबों और रेस्टोरेंटों से जुड़ी सबसे चिंताजनक घटनाएँ आगजनी और ढांचागत दुर्घटनाएँ रही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में रेस्टोरेंटों में लगी आग ने कई लोगों की जान ली। जांचों में बार-बार सामने आया कि अग्निशमन उपकरणों का अभाव, अवैध निर्माण, गैस सिलेंडरों का असुरक्षित उपयोग और आपात निकास मार्गों की कमी ऐसी घटनाओं के प्रमुख कारण रहे। 2024 में पटना में गैस सिलेंडर विस्फोट से लगी आग ने कई लोगों की जान ले ली। वहीं 2025 में जयपुर के एक ढाबे की छत गिरने से एक व्यक्ति की मृत्यु हुई और कई घायल हुए। हाल के वर्षों में दिल्ली समेत कई शहरों में हुई आग की घटनाओं ने यह सवाल उठाया कि क्या भोजनालय सुरक्षा मानकों का वास्तव में पालन कर रहे हैं।
हाईवे पर सुरक्षा की अलग चुनौती
हाईवे ढाबों से जुड़ी समस्याएँ केवल भोजन तक सीमित नहीं हैं। कई स्थानों पर अव्यवस्थित पार्किंग, सड़क किनारे अतिक्रमण और अचानक वाहन रुकने की प्रवृत्ति दुर्घटनाओं का कारण बनती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ढाबों के सामने सुरक्षित प्रवेश और निकास मार्ग, पर्याप्त पार्किंग और स्पष्ट संकेतक होना जरूरी है। कई दुर्घटनाएँ केवल इसलिए हुईं क्योंकि तेज गति से चल रहे वाहन अचानक ढाबे की ओर मुड़ गए या सड़क किनारे खड़े वाहनों से टकरा गए।
सरकार के नए प्रयास
इन चुनौतियों को देखते हुए सरकार और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने आधुनिक ‘वे-साइड अमेनिटी’ केंद्र विकसित करने की योजना शुरू की है। इन केंद्रों का उद्देश्य केवल भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि यात्रियों को एक सुरक्षित और सुविधाजनक पड़ाव प्रदान करना है। इन सुविधाओं में स्वच्छ शौचालय, मेडिकल सहायता, ड्राइवर विश्राम कक्ष, सुरक्षित पार्किंग, फूड कोर्ट, ईवी चार्जिंग स्टेशन और डिजिटल सुविधाएँ शामिल हैं। आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्गों पर बड़ी संख्या में ऐसे केंद्र विकसित किए जाने की योजना है।
क्या ढाबे खत्म हो जाएंगे?
इस प्रश्न का उत्तर अधिकांश विशेषज्ञ ‘नहीं’ में देते हैं। उनका मानना है कि ढाबे भारतीय सड़क संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। आधुनिक फूड प्लाजा सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन ढाबों का स्वाद, आत्मीयता और स्थानीय पहचान आसानी से प्रतिस्थापित नहीं की जा सकती। हाँ, यह अवश्य है कि भविष्य का सफल ढाबा वही होगा जो स्वाद के साथ स्वच्छता, सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं का संतुलन बना सके। जो ढाबे बदलती अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को ढाल लेंगे, वे आने वाले वर्षों में और अधिक लोकप्रिय होंगे।
पिछले दस वर्षों में भारतीय ढाबों और रेस्टोरेंटों ने लंबा सफर तय किया है। वे पारंपरिक भोजनालयों से विकसित होकर आधुनिक आतिथ्य उद्योग का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। एक ओर उन्होंने करोड़ों यात्रियों को स्वाद, आराम और स्थानीय संस्कृति का अनुभव कराया है, तो दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा, आग, स्वच्छता और ढांचागत सुरक्षा जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्वाद और परंपरा के साथ सुरक्षा और गुणवत्ता को भी समान महत्व दिया जाए। यदि ऐसा हुआ, तो भारतीय हाईवे के ढाबे और रेस्टोरेंट न केवल यात्रियों के पसंदीदा पड़ाव बने रहेंगे, बल्कि सुरक्षित और विश्वसनीय यात्रा संस्कृति के प्रतीक भी बन सकेंगे।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

गुरुवार, 11 जून 2026

जनसंख्या विस्फोट से जनसंख्या संकट तक

 लेख-

क्या दुनिया बच्चों के अभाव की ओर बढ़ रही है?
सन् 1968 में अमेरिकी जीवविज्ञानी पॉल  एहरलीच  ने अपनी चर्चित पुस्तक द पापुलेशन  बम  में चेतावनी दी थी कि बढ़ती जनसंख्या मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। उस समय दुनिया की आबादी लगभग 3.5 अरब थी और आशंका व्यक्त की जा रही थी कि पृथ्वी के संसाधन बढ़ती आबादी का बोझ नहीं उठा पाएंगे। आज, लगभग छह दशक बाद, दुनिया की आबादी 8 अरब को पार कर चुकी है, लेकिन चिंता का विषय बदल चुका है। अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि दुनिया में लोग बहुत अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया पर्याप्त बच्चे पैदा कर रही है? संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक जनसांख्यिकीय अध्ययनों के अनुसार 1950 के दशक में विश्व की कुल प्रजनन दर (टोटल  फर्टिलिटी  रेट ) लगभग 5 बच्चे प्रति महिला थी। 2023 तक यह घटकर लगभग 2.3 रह गई है और सदी के मध्य तक इसके प्रतिस्थापन स्तर 2.1 तक पहुँचने या उससे नीचे जाने का अनुमान है। मानव इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि जन्मदर इतनी तेजी से गिरी हो। वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि 1950 में औसत महिला लगभग 5 बच्चों को जन्म देती थी। आज दुनिया के अधिकांश देशों में यह संख्या आधी से भी कम रह गई है। 2026 के विश्लेषणों के अनुसार विश्व की लगभग 71 प्रतिशत आबादी ऐसे देशों में रहती है जहाँ जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है।  यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन भी है। जिन देशों को कभी जनसंख्या विस्फोट से डर था, वे आज बच्चों की कमी से चिंतित हैं।
जापान-भविष्य की एक झलक
यदि कोई देश दुनिया को भविष्य की चेतावनी देता है तो वह जापान है। जापान में लगातार घटती जन्मदर और बढ़ती आयु ने समाज की संरचना बदल दी है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल बंद हो रहे हैं क्योंकि वहाँ पर्याप्त बच्चे नहीं बचे। लाखों घर खाली पड़े हैं। बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जबकि कामकाजी युवाओं की संख्या घट रही है। जापानी सरकार विवाह प्रोत्साहन, बाल-पालन सहायता, कर छूट और नकद प्रोत्साहन जैसी योजनाएँ चला रही है, लेकिन जन्मदर में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
दक्षिण कोरिया का संकट
दक्षिण कोरिया आज दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर वाले देशों में शामिल है। वहाँ महंगे घर, अत्यधिक प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था, लंबी कार्य संस्कृति और बढ़ती जीवन-यापन लागत के कारण युवा विवाह और मातृत्व-पितृत्व से दूर होते जा रहे हैं। सरकार अरबों डॉलर खर्च कर चुकी है, लेकिन सामाजिक प्रवृत्तियों को बदलना आसान नहीं साबित हुआ।
चीन-नीति का ऐतिहासिक उलटफेर
1979 में चीन ने एक-बच्चा नीति लागू की थी। उस समय उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि को रोकना था। लेकिन चार दशक बाद स्थिति बदल गई। अब चीन लोगों को दो और तीन बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। लगातार घटती जन्मदर और सिकुड़ती कार्यशील आबादी ने चीन की आर्थिक योजनाओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। जिस देश ने कभी जन्म को नियंत्रित किया था, वही आज जन्म बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यह इतिहास का एक अनोखा मोड़ है।
भारत की बदलती कहानी
भारत आज दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है, लेकिन भारत की जन्मदर भी तेजी से गिर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफसी-5) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 तक पहुँच चुकी है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। 1992 में एनएचएफसी-1 के दौरान भारत की प्रजनन दर लगभग 3.4 थी। अर्थात् तीन दशकों में देश ने अपनी प्रजनन दर में लगभग 40 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की है। ताजा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार भारत की प्रजनन दर 1.9 तक पहुँच चुकी है। केवल कुछ राज्य ही अब प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर बचे हैं।
दिल्ली, पंजाब और दक्षिण भारत की तस्वीर
दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जन्मदर काफी नीचे जा चुकी है। दिल्ली की प्रजनन दर देश में सबसे कम स्तरों में गिनी जाती है। दूसरी ओर बिहार और उत्तर प्रदेश अभी भी राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं। यह अंतर बताता है कि शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की कार्य भागीदारी और जीवनशैली का जन्मदर पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
कामकाजी दम्पत्तियों की नई दुनिया
आज का युवा दम्पत्ति अपने माता-पिता की पीढ़ी से अलग सोचता है। पहले विवाह जल्दी होते थे, परिवार जल्दी बनता था और तीन-चार बच्चों का होना सामान्य माना जाता था। आज स्थिति बदल गई है। उच्च शिक्षा में अधिक समय लग रहा है। करियर प्राथमिकता बन चुका है। घर खरीदना कठिन हो गया है। बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ गया है। महिलाएँ आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र हैं। महानगरों में जीवन-यापन महंगा हो गया है। परिणामस्वरूप लाखों दम्पत्ति परिवार विस्तार का निर्णय टाल रहे हैं या केवल एक बच्चे तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं।
जनसंख्या घटेगी तो समस्या क्या होगी?
सामान्य धारणा यह है कि कम जनसंख्या हमेशा अच्छी होती है। लेकिन अर्थशास्त्री इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। जब जन्म कम होते हैं तो कुछ दशकों बाद कार्यशील आयु की आबादी घटती है, उद्योगों को श्रमिकों की कमी होती है, पेंशन व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है, आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। इसी कारण जापान, जर्मनी, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे देश कम जन्मदर को राष्ट्रीय चुनौती मानते हैं।
क्या भारत को डरना चाहिए?
फिलहाल भारत दुनिया का सबसे युवा बड़ा देश है। भारत की औसत आयु लगभग 29 वर्ष के आसपास है जबकि जापान और यूरोप के अनेक देशों में यह 45 से 50 वर्ष तक पहुँच चुकी है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। इसे ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ कहा जाता है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि जन्मदर लगातार नीचे जाती रही तो 2040-2050 के बाद भारत को भी वृद्ध होती आबादी और घटते कार्यबल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
20वीं और 21वीं सदी का अंतर
20वीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न था-‘जनसंख्या को कैसे नियंत्रित किया जाए?’, मगर 21वीं सदी का उभरता हुआ प्रश्न है-‘पर्याप्त जनसंख्या कैसे बनाए रखी जाए?’, यही वह परिवर्तन है जो दुनिया की जनसांख्यिकीय बहस को नई दिशा दे रहा है।
दुनिया एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। कभी जनसंख्या विस्फोट मानवता का सबसे बड़ा डर था। आज अनेक देशों के सामने जनसंख्या संकट खड़ा है। घटती जन्मदर, बढ़ती बुजुर्ग आबादी और सिकुड़ता कार्यबल नई चुनौतियाँ बनकर उभर रहे हैं। भारत अभी युवा शक्ति के स्वर्णकाल में है, लेकिन बदलती जीवनशैली, छोटे परिवारों की प्रवृत्ति और गिरती प्रजनन दर संकेत दे रही है कि आने वाले दशकों में हमें भी जनसंख्या संतुलन पर गंभीरता से विचार करना होगा। कल तक दुनिया बच्चों की बढ़ती संख्या से डरती थी, आज कई देश बच्चों की घटती संख्या से चिंतित हैं। इतिहास का यह शायद सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय उलटफेर है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


बुधवार, 10 जून 2026

कामकाजी माता-पिता और बच्चों के बीच घटता समय

 लेख-

सामाजिक प्रभाव और समाधान
बदलती जीवनशैली का नया प्रश्न

आधुनिक भारत में परिवारों की संरचना और जीवनशैली तेजी से बदल रही है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक, अब ऐसे परिवारों की संख्या बढ़ रही है जहाँ पति और पत्नी दोनों कामकाजी हैं। बढ़ती महंगाई, बेहतर जीवन स्तर की आकांक्षा और करियर की चुनौतियों ने दोहरी आय वाले परिवारों को सामान्य बना दिया है। लेकिन इस बदलाव के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उभर रहा है-क्या माता-पिता अपने बच्चों को पर्याप्त समय दे पा रहे हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक रूप से मजबूत होते परिवारों के सामने अब भावनात्मक समय की कमी एक नई चुनौती बनकर खड़ी हो गई है। बच्चे भौतिक सुविधाएँ तो पा रहे हैं, लेकिन कई बार उन्हें माता-पिता का साथ और संवाद अपेक्षित मात्रा में नहीं मिल पाता।
समय की कमी क्यों बढ़ रही है?
आज अधिकांश कामकाजी दंपतियों का दिन सुबह से ही भागदौड़ में शुरू होता है। कार्यालय आने-जाने में लगने वाला समय, बढ़ता ट्रैफिक, कार्यस्थल का दबाव और डिजिटल दुनिया की निरंतर व्यस्तता परिवार के समय को प्रभावित कर रही है। विशेषकर महानगरों में कई माता-पिता सुबह घर से निकलते हैं और शाम को देर से लौटते हैं। ऐसे में बच्चों के साथ उनका प्रत्यक्ष संवाद सीमित रह जाता है। सप्ताहांत भी कई बार सामाजिक कार्यक्रमों, अतिरिक्त कार्य या घरेलू जिम्मेदारियों में निकल जाता है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से संकेत मिलता है कि शहरी कामकाजी परिवारों में माता-पिता बच्चों के साथ प्रतिदिन औसतन 1 से 3 घंटे का प्रत्यक्ष समय बिता पाते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि माता-पिता बच्चों की शिक्षा और गतिविधियों को लेकर पहले की तुलना में अधिक चिंतित हैं, लेकिन उनके पास समय अपेक्षाकृत कम है। कई अभिभावक स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे बच्चों के साथ पर्याप्त समय न बिता पाने के कारण अपराधबोध महसूस करते हैं।
बच्चों पर क्या पड़ रहा है प्रभाव?
1. भावनात्मक दूरी-बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। जब संवाद कम होता है तो बच्चे अपनी भावनाएँ साझा करने में संकोच करने लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे बच्चे कई बार अपनी समस्याएँ दोस्तों, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर तलाशने लगते हैं, जबकि उन्हें सबसे पहले परिवार से मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
2. बढ़ती अकेलेपन की भावना-संयुक्त परिवारों के कम होते जाने और परमाणु परिवारों के बढ़ने से कई बच्चे घर में अकेले समय बिताते हैं। स्कूल से लौटने के बाद यदि घर में कोई बड़ा सदस्य मौजूद न हो तो बच्चों में अकेलेपन की भावना विकसित हो सकती है। यह स्थिति लंबे समय में मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
3. स्क्रीन पर बढ़ती निर्भरता-समय की कमी का सबसे बड़ा प्रभाव डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग के रूप में दिखाई देता है। मोबाइल फोन, वीडियो गेम, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म बच्चों के प्रमुख साथी बनते जा रहे हैं। कई परिवारों में स्क्रीन बच्चों को व्यस्त रखने का माध्यम बन गई है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से ध्यान क्षमता, नींद और सामाजिक व्यवहार प्रभावित हो सकते हैं।
4. व्यवहार संबंधी चुनौतियाँ-अध्ययन बताते हैं कि जिन बच्चों को परिवार के साथ नियमित संवाद और सहभागिता मिलती है, उनमें आत्मविश्वास अधिक होता है। इसके विपरीत, संवाद की कमी कई बार चिड़चिड़ापन, गुस्सा, असुरक्षा और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं को जन्म दे सकती है।
क्या केवल समय की मात्रा ही महत्वपूर्ण है?
विशेषज्ञों का उत्तर है नहीं। बच्चों के विकास में ‘क्वालिटी टाइम’ यानी गुणवत्तापूर्ण समय अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि माता-पिता प्रतिदिन केवल एक घंटा भी बच्चों के साथ पूरी एकाग्रता से बिताते हैं, उनकी बातें सुनते हैं, खेलते हैं या पढ़ाई में सहयोग करते हैं, तो उसका प्रभाव कई घंटों की औपचारिक उपस्थिति से अधिक हो सकता है।
परिवार के साथ समय बिताने के लाभ
1-संवाद बेहतर होता है
2-आत्मविश्वास बढ़ता है
3-शैक्षणिक प्रदर्शन सुधरता है
4-मानसिक स्वास्थ्य मजबूत होता है

विशेषज्ञों के सुझाव
साथ भोजन करें-दिन में कम से कम एक बार पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन करें। यह संवाद का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम माना जाता है।
मोबाइल-मुक्त समय तय करें-घर में प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित किया जाए जब सभी सदस्य मोबाइल और टीवी से दूर रहें।
बच्चों की बात सुनें-सिर्फ सलाह देने के बजाय बच्चों की बातें ध्यान से सुनना भी उतना ही आवश्यक है।
सप्ताहांत परिवार के नाम-सप्ताह में एक दिन परिवार के साथ किसी गतिविधि, भ्रमण या खेल के लिए निर्धारित किया जा सकता है।
सोने से पहले संवाद-विशेषज्ञों के अनुसार, सोने से पहले 15-20 मिनट की बातचीत बच्चों के भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत लाभकारी होती है।
तकनीक और आर्थिक विकास ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ नई सामाजिक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा, बेहतर सुविधाएँ और सुरक्षित भविष्य देना आवश्यक है, परंतु उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें समय, स्नेह और संवाद देना। बच्चों के लिए माता-पिता केवल अभिभावक नहीं, बल्कि पहले शिक्षक, मार्गदर्शक और मित्र भी होते हैं। इसलिए समय की गुणवत्ता और पारिवारिक संवाद को प्राथमिकता देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।
तथ्य बॉक्स
कामकाजी परिवार और बच्चे

1.शहरी परिवारों में माता-पिता बच्चों को औसतन 1-3 घंटे प्रतिदिन दे पाते हैं।
2.कई बच्चे प्रतिदिन 3-5 घंटे तक स्क्रीन का उपयोग करते हैं।
3.विशेषज्ञ प्रतिदिन कम से कम 30-60 मिनट गुणवत्तापूर्ण पारिवारिक समय की सलाह देते हैं।
4.साथ भोजन करने वाले परिवारों में बच्चों का भावनात्मक जुड़ाव अधिक पाया गया है।
5.संवाद और सहभागिता बच्चों के आत्मविश्वास तथा मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाते हैं।

आज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि माता-पिता बच्चों से प्रेम कम करते हैं, बल्कि यह है कि व्यस्त जीवनशैली के बीच उस प्रेम को समय में कैसे बदला जाए। आने वाले वर्षों में सफल समाज वही होगा जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ परिवार और बच्चों के लिए समय बचाने की संस्कृति भी विकसित कर सके।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 9 जून 2026

साहित्य में बढ़ रही है ‘कॉकरोची प्रवृत्ति’?

 लेख-

सृजन से अधिक दिखावे और नेटवर्किंग के दौर पर एक विमर्श
साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं, संघर्षों और समय की चेतना का दस्तावेज होता है। किंतु पिछले कुछ दशकों में साहित्य की दुनिया को लेकर अनेक गंभीर प्रश्न उठे हैं। क्या साहित्य अब भी समाज की पीड़ा और यथार्थ का प्रतिनिधित्व कर रहा है, या वह पुरस्कारों, प्रतिष्ठानों, गुटों और प्रचार के जाल में उलझता जा रहा है? इसी संदर्भ में कुछ आलोचक और पाठक व्यंग्य में ‘कॉकरोची साहित्य’ जैसी संज्ञा का प्रयोग करने लगे हैं। यह शब्द भले ही साहित्यिक शब्दावली का हिस्सा न हो, किंतु इसके पीछे की चिंता गंभीर है। आशय उस लेखन से है जो किसी भी परिस्थिति में स्वयं को बचाए रखने, हर सत्ता और हर प्रवृत्ति के साथ तालमेल बैठाने तथा सृजनात्मक जोखिम लेने के बजाय सुविधाजनक रास्ते चुनने लगता है।
साहित्य के बाजारीकरण पर पुरानी चिंताएँ
साहित्य में बाजार के हस्तक्षेप को लेकर चिंता कोई नई नहीं है। हिंदी के महान आलोचक रामविलास शर्मा ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का संबंध जनता के जीवन से होना चाहिए, न कि केवल प्रतिष्ठा और उपभोग से। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने भी कई अवसरों पर कहा कि साहित्य में विचार और रचना की जगह यदि केवल खेमेबाजी और प्रतिष्ठानवाद ले लें, तो साहित्य की स्वायत्तता संकट में पड़ जाती है। विश्व साहित्य में भी ऐसी चिंताएँ व्यक्त हुई हैं। प्रसिद्ध लेखक जाॅर्ज ओरवल ने लिखा था कि लेखक का सबसे बड़ा दायित्व सत्य के प्रति ईमानदार रहना है। जब लेखन सत्ता, प्रचार या निजी लाभ का उपकरण बन जाता है, तब उसकी नैतिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है।
पुरस्कार, प्रतिष्ठा और गुटबाजी
समकालीन साहित्य की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक गुटबाजी है। कई साहित्यिक मंचों, पत्रिकाओं और पुरस्कारों को लेकर समय-समय पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। वरिष्ठ हिंदी कवि केदारनाथ सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था कि साहित्य में संवाद आवश्यक है, किंतु जब समूह रचना से बड़ा हो जाए तो समस्या पैदा होती है। साहित्यिक इतिहास बताता है कि हर युग में गुट बने हैं, परंतु सोशल मीडिया के दौर में यह प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। अब लेखक की रचना से पहले उसकी डिजिटल उपस्थिति, प्रचार-क्षमता और नेटवर्क पर चर्चा होने लगी है। इससे नए और गंभीर लेखकों के सामने अतिरिक्त चुनौतियाँ खड़ी होती हैं।
सोशल मीडिया का साहित्य
डिजिटल युग ने लेखन को लोकतांत्रिक बनाया है। अब कोई भी व्यक्ति अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर सकता है। यह सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन इसके साथ कुछ समस्याएँ भी सामने आई हैं। तत्काल प्रसिद्धि की चाह में कई बार अधपकी रचनाएँ भी व्यापक प्रचार पा जाती हैं। लाइक, शेयर और फॉलोअर्स को साहित्यिक गुणवत्ता का पैमाना मान लिया जाता है। परिणामस्वरूप गहन अध्ययन, भाषा की साधना और वैचारिक तैयारी जैसी प्रक्रियाएँ पीछे छूटने लगती हैं। प्रख्यात चिंतक टीएस इलियट का मानना था कि परंपरा और अध्ययन के बिना साहित्यिक उत्कृष्टता संभव नहीं। आज यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है।
क्या पाठक भी जिम्मेदार हैं?
साहित्य की स्थिति के लिए केवल लेखक या संस्थाएँ ही जिम्मेदार नहीं हैं। पाठक समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जब पाठक गंभीर पुस्तकों के बजाय केवल चर्चित नामों तक सीमित हो जाते हैं, तब प्रकाशक और साहित्यिक संस्थाएँ भी उसी दिशा में झुकने लगती हैं। बाजार अंततः मांग का अनुसरण करता है। भारत में पुस्तक-पठन की संस्कृति पर कई अध्ययन बताते हैं कि मनोरंजन और त्वरित सामग्री की खपत बढ़ी है, जबकि गंभीर साहित्य का पाठक वर्ग अपेक्षाकृत सीमित हुआ है। ऐसे में साहित्यिक गुणवत्ता और लोकप्रियता के बीच संतुलन का प्रश्न और जटिल हो जाता है।
फिर भी उम्मीद बाकी है
समकालीन साहित्य की आलोचना जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उसके सकारात्मक पक्ष को भी देखना। आज हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में अनेक युवा लेखक ग्रामीण जीवन, पर्यावरण, स्त्री-अनुभव, दलित प्रश्न, आदिवासी समाज, प्रवासी जीवन और तकनीकी बदलावों पर गंभीर लेखन कर रहे हैं। अनेक छोटी पत्रिकाएँ और स्वतंत्र प्रकाशन संस्थाएँ भी गुणवत्तापूर्ण साहित्य को मंच दे रही हैं। ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी जैसे मंचों से सम्मानित अनेक रचनाएँ यह साबित करती हैं कि साहित्य की मुख्य धारा में अभी भी गंभीरता और सृजनात्मकता जीवित है।
कॉकरोची साहित्य’-एक रूपक, एक चेतावनी
यदि ‘कॉकरोची साहित्य’ शब्द का प्रयोग किया जाए तो उसे पूरे साहित्य की परिभाषा नहीं, बल्कि एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह उस प्रवृत्ति की आलोचना है जिसमें रचना की जगह संबंध, विचार की जगह प्रचार, और साहित्य की जगह साहित्यिक कारोबार प्रमुख हो जाता है। सच्चा साहित्य हमेशा जोखिम उठाता है। वह सत्ता से प्रश्न करता है, समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करता है और मनुष्य की संवेदनाओं को विस्तार देता है। इसके विपरीत सुविधाजनक लेखन हर परिस्थिति में स्वयं को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है। साहित्य का संकट केवल साहित्य का संकट नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक चेतना का संकट भी है। यदि हम चाहते हैं कि साहित्य अपनी गरिमा बनाए रखे, तो लेखकों को ईमानदार सृजन, आलोचकों को निष्पक्ष मूल्यांकन, संस्थाओं को पारदर्शिता और पाठकों को गंभीर पठन की संस्कृति अपनानी होगी। अन्यथा वह समय दूर नहीं जब रचना की गुणवत्ता से अधिक उसकी मार्केटिंग पर चर्चा होगी, और साहित्य के बारे में यह व्यंग्य बार-बार सुनाई देगा कि यहाँ शब्दों से अधिक ‘जीवित बने रहने की कला’ का सम्मान हो रहा है।
आज का साहित्य-एक नजर में
 1-साहित्य में गुटबाजी और पुरस्कार राजनीति पर बहस नई नहीं है।
2-सोशल मीडिया ने लेखन को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन तात्कालिकता भी बढ़ाई।
3-हिंदी के कई वरिष्ठ आलोचक साहित्य की स्वायत्तता और गुणवत्ता पर चिंता जता चुके हैं।
4-गंभीर साहित्य का पाठक वर्ग सीमित होने से बाजार-प्रधान प्रवृत्तियाँ मजबूत हुई हैं।
5-आज भी भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता का साहित्य निरंतर लिखा जा रहा है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(पत्रकार एवं लेखक)


महंगाई पर भारी शौक

 महत्वपूर्ण लेख-

खाने और घूमने पर खुलकर खर्च कर रहे भारतीय
कोरोना के बाद बदला खर्च का गणित,
अनुभवों पर बढ़ रहा निवेश

महंगाई बढ़ रही है, पेट्रोल-डीजल महंगे हैं, खाद्य पदार्थों की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं, फिर भी भारतीयों के घूमने-फिरने और खाने-पीने के शौक में कमी नहीं आई है। कोरोना महामारी के बाद देश में घरेलू पर्यटन, धार्मिक यात्राओं और बाहर भोजन करने की प्रवृत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। अब भारतीय केवल बचत करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीवन के अनुभवों पर भी खुलकर खर्च कर रहे हैं।
भारतीयों की बदलती प्राथमिकताएं
ए-2024 में घरेलू पर्यटन खर्च महामारी पूर्व स्तर से अधिक
बी-बिरयानी लगातार सबसे अधिक ऑर्डर किया जाने वाला भोजन
सी-धार्मिक पर्यटन सबसे तेजी से बढ़ता क्षेत्र
डी-युवा वर्ग आय का बड़ा हिस्सा अनुभवों पर खर्च कर रहा
ई-वीकेंड ट्रिप और शॉर्ट वेकेशन का चलन बढ़ा
एफ-ऑनलाइन फूड डिलीवरी बाजार में लगातार विस्तार
जी-डिजिटल भुगतान ने खर्च को आसान बनाया
खानपान-स्वाद पर बढ़ता खर्च
पिछले दस वर्षों में भारतीयों के खानपान की आदतों में बड़ा बदलाव आया है। पारंपरिक भोजन आज भी पसंदीदा है, लेकिन उसके साथ-साथ फास्ट फूड, कैफे संस्कृति और फूड डिलीवरी सेवाओं ने बाजार का आकार कई गुना बढ़ा दिया है।
सबसे लोकप्रिय व्यंजन
✔ बिरयानी
✔ डोसा
✔ छोले-भटूरे
✔ पिज्जा
✔ मोमोज
✔ पावभाजी
✔ बटर चिकन
विशेषज्ञों के अनुसार शहरी भारत में बाहर खाने का खर्च पहले की तुलना में दोगुना तक बढ़ा है।
घूमने की नई संस्कृति
पहले परिवार साल में एक बार लंबी छुट्टी पर जाते थे। अब लोग छोटी-छोटी यात्राएं अधिक करने लगे हैं।
सबसे लोकप्रिय पर्यटन श्रेणियां

धार्मिक पर्यटन

काशी
अयोध्या
वैष्णो देवी
उज्जैन
तिरुपति

पर्वतीय पर्यटन
मनाली
शिमला
नैनीताल
मसूरी

विरासत पर्यटन
जयपुर
उदयपुर
जोधपुर

समुद्री पर्यटन
गोवा
पुडुचेरी
कोच्चि
कोरोना के बाद क्या बदला?
महामारी ने लोगों को यह एहसास कराया कि जीवन अनिश्चित है। यही कारण है कि महामारी के बाद लोगों ने अनुभवों पर खर्च बढ़ा दिया।
पहले
विदेश यात्राओं का आकर्षण
बड़ी समूह यात्राएं
लंबी छुट्टियां
अब
घरेलू पर्यटन
परिवार केंद्रित यात्राएं
वीकेंड ट्रिप
रोड ट्रिप
धार्मिक यात्राएं
महंगाई का असर कितना?
महंगाई का असर साफ दिखाई देता है, लेकिन उसने यात्रा और खानपान की इच्छा को कम नहीं किया।
लोगों ने क्या बदला?
✔ महंगे होटल की जगह बजट होटल
✔ लंबी यात्रा की जगह छोटी यात्रा
✔ हवाई यात्रा की जगह रेल या सड़क यात्रा
✔ महंगे रेस्तरां की जगह मूल्य आधारित विकल्प
✔ ऑफ-सीजन पर्यटन
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
पर्यटन विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय उपभोक्ता अब अनुभवों को प्राथमिकता दे रहा है। युवा वर्ग अपनी आय का बड़ा हिस्सा यात्रा और मनोरंजन पर खर्च करने को तैयार है। अर्थशास्त्रियों की राय में महंगाई ने खर्च की दिशा बदली है, लेकिन खर्च की इच्छा नहीं। भारतीय उपभोक्ता खर्च रोकने की बजाय उसे पुनर्गठित कर रहा है।
युवा बने बदलाव के वाहक
18 से 35 वर्ष आयु वर्ग आज सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है। सोशल मीडिया के प्रभाव से लोग नई जगहें खोज रहे हैं, स्थानीय व्यंजन आजमा रहे हैं, यात्रा अनुभव साझा कर रहे हैं, ‘वर्क फ्रॉम एनीवेयर’ का लाभ उठा रहे हैं।
फैक्ट फाइल
पिछले दशक की प्रमुख प्रवृत्तियां

क्षेत्र                            2015                                     2025-26
बाहर खाना                  सीमित                           सामान्य जीवनशैली
ऑनलाइन फूड ऑर्डर    शुरुआती चरण                     व्यापक उपयोग
धार्मिक पर्यटन               स्थिर                                        तेज वृद्धि
वीकेंड ट्रिप                    कम                               अत्यधिक लोकप्रिय
डिजिटल भुगतान           सीमित                              लगभग सर्वव्यापी
भारतीय समाज एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। बचत और सुरक्षा के साथ-साथ अब आनंद और अनुभव भी जीवन की प्राथमिकताओं में शामिल हो चुके हैं। यही कारण है कि बढ़ती महंगाई के बावजूद पर्यटन स्थलों पर भीड़ है, रेस्तरां भरे हुए हैं और यात्रा उद्योग लगातार विस्तार कर रहा है। आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति भारतीय अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाली साबित हो सकती है। महंगाई जेब पर असर डाल सकती है, लेकिन घूमने और अच्छा खाने की इच्छा पर नहीं। आज का भारतीय उपभोक्ता वस्तुओं से अधिक अनुभवों में निवेश कर रहा है। कोरोना ने लोगों को जीवन जीने का महत्व समझाया, और यही पर्यटन व खानपान क्षेत्र की नई ऊर्जा का आधार बना है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

सोमवार, 8 जून 2026

हर साल बारिश में क्यों खुल जाती है सड़कों की पोल?

 लेख-

दिल्ली-एनसीआर देश का सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र है। यहां रोजाना करोड़ों लोग सड़कों पर सफर करते हैं। पिछले दस वर्षों में एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर और चैड़ी सड़कों का जाल बिछा है, लेकिन मानसून की पहली तेज बारिश के साथ ही विकास के दावों की परीक्षा शुरू हो जाती है। कहीं गड्ढे उभर आते हैं, कहीं सड़क धंस जाती है और कहीं जलभराव घंटों तक यातायात को जाम कर देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल सड़क निर्माण की नहीं, बल्कि ड्रेनेज सिस्टम, रखरखाव और एजेंसियों के बीच समन्वय की भी है।
दिल्ली की सबसे संवेदनशील सड़कें
पिछले कई वर्षों से कुछ सड़कें मानसून के दौरान विशेष रूप से परेशानी का कारण बनती रही हैं।
1. आउटर रिंग रोड-दिल्ली की सबसे व्यस्त सड़कों में शामिल आउटर रिंग रोड पर बारिश के दौरान गड्ढे, जलभराव और दुर्घटनाएं लगातार चिंता का विषय रहे हैं। 2025 में भी यह राजधानी की सबसे खतरनाक सड़कों में शामिल रही।
2. रिंग रोड (इनर रिंग रोड)-दिल्ली की जीवनरेखा कही जाने वाली इस सड़क पर 2025 में सर्वाधिक सड़क मौतें दर्ज की गईं। चैड़ी सड़क और तेज रफ्तार वाहनों के कारण दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
3. मथुरा रोड-बारिश के दौरान गड्ढों और जलभराव की शिकायतें लगातार आती रही हैं। सड़क की सतह कई बार टूटने के कारण यातायात प्रभावित हुआ है।
4. आईटीओ और मिंटो ब्रिज क्षेत्र-यह इलाका जलभराव के लिए वर्षों से बदनाम है। तेज बारिश के दौरान यहां वाहन फंसने और लंबा जाम लगने की घटनाएं आम रही हैं।
5. एनएच-48 (दिल्ली-गुरुग्राम मार्ग)-गुरुग्राम सीमा तक फैला यह कॉरिडोर हर मानसून में जलभराव और ट्रैफिक जाम का सामना करता है।
पिछले 10 वर्षों में सबसे खतरनाक बने सड़क क्षेत्र
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग की रिपोर्टों के अनुसार निम्न स्थान लगातार दुर्घटना-प्रवण रहे हैं-
आजादपुर मंडी जंक्शन
वजीराबाद क्षेत्र
कश्मीरी गेट-आईएसबीटी
भलस्वा चैक
मुकरबा चैक
लिबासपुर बस स्टैंड
राजोकरी फ्लाईओवर
अक्षरधाम एक्सप्रेसवे क्षेत्र
इन स्थानों पर सड़क की स्थिति, तेज रफ्तार, निर्माण कार्य और अव्यवस्थित यातायात दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण रहे हैं।
जान-माल का नुकसान
दिल्ली में सड़क दुर्घटनाएं लगातार बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
2024
111 ब्लैक स्पॉट्स पर 1,132 दुर्घटनाएं
483 लोगों की मौत
649 लोग घायल
2025
25 नए ब्लैक स्पॉट चिन्हित
176 दुर्घटनाएं
88 मौतें केवल इन नए ब्लैक स्पॉट्स पर
कुल सड़क दुर्घटनाएं
2024 में 5,657 दुर्घटनाएं
1,504 घातक दुर्घटनाएं
2025 में सड़क दुर्घटना मौतें बढ़कर 1,617 तक पहुंच गईं।
हालांकि हर दुर्घटना सीधे गड्ढों से नहीं जुड़ी होती, लेकिन मानसून में खराब सड़कें, जलभराव और दृश्यता की कमी दुर्घटनाओं का जोखिम काफी बढ़ा देती हैं।
बारिश से पहले किन सड़कों को प्राथमिकता पर सुधारना चाहिए?
विशेषज्ञों के अनुसार निम्न सड़कों पर तत्काल ध्यान आवश्यक है-
प्रथम श्रेणी
आउटर रिंग रोड
मथुरा रोड
एनएच-48
आईटीओ कॉरिडोर
वजीराबाद रोड
द्वितीय श्रेणी
आजादपुर-मुकरबा चैक क्षेत्र
भलस्वा चैक
कश्मीरी गेट क्षेत्र
राजोकरी फ्लाईओवर
तृतीय श्रेणी
विभिन्न अंडरपास
कॉलोनी कनेक्टिंग रोड
औद्योगिक क्षेत्रों की सड़कें
सरकारी प्रयास कितना असर?
गड्ढा-मुक्त अभियान-दिल्ली सरकार ने 2025 में एक ही दिन में 3,433 गड्ढे भरने का दावा किया। लगभग 1,400 किलोमीटर सड़क नेटवर्क पर मरम्मत अभियान चलाया गया।
जियो-टैगिंग और ड्रोन सर्वे-गड्ढों और खराब सड़कों की पहचान के लिए ड्रोन सर्वे और जियो-टैगिंग का उपयोग शुरू किया गया।
डिजिटल रोड मॉनिटरिंग-पीडब्ल्यूडी ने सड़क, जलभराव, अंधेरे क्षेत्रों और दुर्घटना-प्रवण स्थलों की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड विकसित करने की पहल की है।
नई तकनीक-सीएसआईआर और सीआरआरआई द्वारा विकसित ईकोफिक्स तकनीक का परीक्षण किया गया, जिससे पानी भरे गड्ढों की भी त्वरित मरम्मत संभव है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की अधिकांश सड़कें निर्माण गुणवत्ता से अधिक खराब ड्रेनेज व्यवस्था की वजह से क्षतिग्रस्त होती हैं। पानी का लगातार जमाव सड़क की ऊपरी परत को कमजोर कर देता है, जिससे गड्ढे बनते हैं और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। सड़कों के साथ-साथ नालों और वर्षा जल निकासी तंत्र के आधुनिकीकरण पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
फैक्ट बॉक्स
दिल्ली-एनसीआर सड़क सुरक्षा-एक नजर

2024 के ब्लैक स्पॉट
111 ब्लैक स्पॉट दुर्घटनाएं (2024) 1,132, मौतें (2024) 483
2025 में चिन्हित नए ब्लैक स्पॉट
25, 2025 सड़क दुर्घटना मौतें 1,617, 2025 में भरे गए गड्ढे 3,433
सबसे खतरनाक सड़कें
रिंग रोड, आउटर रिंग रोड, मथुरा रोड, एनएच-48
दिल्ली-एनसीआर की सड़कें देश की आर्थिक गतिविधियों की धुरी हैं, लेकिन मानसून हर वर्ष उनकी वास्तविक स्थिति उजागर कर देता है। यदि आउटर रिंग रोड, मथुरा रोड, आईटीओ, वजीराबाद और एनएच-48 जैसे संवेदनशील मार्गों पर समय रहते व्यापक मरम्मत, बेहतर ड्रेनेज और नियमित निगरानी सुनिश्चित नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में दुर्घटनाओं और आर्थिक नुकसान की कीमत और अधिक चुकानी पड़ सकती है। सड़क निर्माण के साथ-साथ सड़क रखरखाव को भी समान प्राथमिकता देना समय की मांग है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


रविवार, 7 जून 2026

छह साल में 114 काले हिरणों का शिकार

 लेख-

संरक्षण के बावजूद शिकार की चुनौती बरकरार
भारत की जैव विविधता में काला हिरण एक विशिष्ट स्थान रखता है। अपनी आकर्षक काया, घुमावदार सींगों और अद्भुत गति के कारण यह देश के सबसे सुंदर वन्यजीवों में गिना जाता है। कभी भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल घास के मैदानों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले काले हिरणों की आबादी बीसवीं शताब्दी के दौरान तेजी से घटने लगी थी। इसका प्रमुख कारण अंधाधुंध शिकार, कृषि विस्तार, घासभूमियों का विनाश और मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव था। हालांकि स्वतंत्र भारत में बनाए गए कठोर वन्यजीव कानूनों और समाज की बढ़ती जागरूकता ने इस प्रजाति को नया जीवन दिया है, लेकिन आज भी इसका अस्तित्व पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। हाल में सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. रंजन तोमर द्वारा प्राप्त सूचना ने एक बार फिर काले हिरणों की सुरक्षा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु अथवा शिकार से संबंधित 114 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा बताता है कि कानूनी संरक्षण के बावजूद वन्यजीव अपराधों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगाया जा सका है।
कहां-कहां पाए जाते हैं काले हिरण
काला हिरण मुख्य रूप से भारत के खुले घास के मैदानों और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। राजस्थान आज भी इसका सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है, जहां इनकी संख्या 25 हजार से अधिक आंकी गई है। इसके अतिरिक्त ओडिशा के गंजाम क्षेत्र में लगभग 9 हजार, पंजाब और हरियाणा में हजारों की संख्या में तथा गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी इनकी महत्वपूर्ण आबादी पाई जाती है। गुजरात का वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान और राजस्थान का ताल छापर अभयारण्य काले हिरणों के प्रमुख संरक्षण केंद्र हैं।
क्यों खास है यह वन्यजीव
काले हिरण का वैज्ञानिक नाम एंटीलोप सर्विकापर है। नर काले हिरण अपने काले-भूरे रंग और सर्पिलाकार सींगों के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि मादाएं हल्के भूरे रंग की होती हैं। यह दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले खुरदार जीवों में शामिल है और लगभग 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि इसे भारतीय घासभूमियों का धावक भी कहा जाता है।
कानून देता है सर्वोच्च सुरक्षा
भारत सरकार ने काले हिरण को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल किया है। यह श्रेणी देश के सबसे अधिक संरक्षित वन्यजीवों के लिए आरक्षित है। काले हिरण का शिकार, उसे घायल करना, पकड़ना या उसका अवैध व्यापार करना गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर तीन से सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
शिकार की घटनाएं क्यों नहीं रुक रहीं
विशेषज्ञों के अनुसार अवैध शिकार के पीछे कई कारण हैं। कुछ क्षेत्रों में मांस के लिए, कुछ स्थानों पर मनोरंजन अथवा ट्रॉफी शिकार के लिए और कहीं-कहीं स्थानीय संघर्षों के कारण काले हिरणों को निशाना बनाया जाता है। इसके अलावा सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले, कृषि विस्तार और प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना भी इनके अस्तित्व के लिए खतरा बने हुए हैं।
देश का सबसे चर्चित शिकार मामला
काले हिरण शिकार की चर्चा जब भी होती है तो 1998 का जोधपुर प्रकरण सबसे पहले याद किया जाता है। फिल्म ‘हम साथ-साथ हैं’ की शूटिंग के दौरान दो काले हिरणों के शिकार के आरोप में अभिनेता सलमान खान और अन्य कलाकारों के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ था। यह मुकदमा दो दशक से अधिक समय तक देश की सबसे चर्चित वन्यजीव कानूनी लड़ाइयों में शामिल रहा और इसने वन्यजीव संरक्षण कानूनों को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
वन्यजीव जीवविज्ञानी अमित गोस्वामी का मानना है कि काले हिरणों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों, विशेषकर बिश्नोई समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उनके अनुसार राजस्थान के अनेक क्षेत्रों में अभयारण्यों के बाहर भी काले हिरण सुरक्षित दिखाई देते हैं।
वन अधिकारी और शोधकर्ता गीतांजलि मेरियासेल्वम का कहना है कि संरक्षण को केवल सामाजिक आस्था पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए समुदाय आधारित संरक्षण योजनाओं और सरकारी सहयोग की आवश्यकता है। संरक्षण विशेषज्ञ टी. मुरुगावेल के अनुसार भारत में घासभूमियों के संरक्षण पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। यदि घासभूमियां सिकुड़ती रहीं तो काले हिरणों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
संरक्षण की असली कुंजी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं। वन्यजीव अपराधों की निगरानी, त्वरित न्यायिक प्रक्रिया, आधुनिक तकनीक का उपयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही दीर्घकालिक समाधान प्रदान कर सकती है। साथ ही घासभूमियों को भी उतना ही महत्व देना होगा जितना जंगलों को दिया जाता है।
साझा जिम्मेदारी
काला हिरण केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसकी बढ़ती आबादी संरक्षण की सफलता का संकेत देती है, वहीं शिकार और आवास विनाश की घटनाएं हमें सावधान भी करती हैं। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, वन विभाग और समाज मिलकर प्रयास करें तो आने वाली पीढ़ियां भी भारतीय घासभूमियों में दौड़ते हुए इस सुंदर जीव को देख सकेंगी। प्रकृति की इस अनमोल धरोहर की रक्षा करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

फैक्ट बॉक्स
    काला हिरण एक नजर में

► सामान्य नाम-काला हिरण
► वैज्ञानिक नाम-एंटीलोप सर्विकापर
► प्राकृतिक आवास-घासभूमियां, अर्द्ध-शुष्क मैदान, खुले वन क्षेत्र
► अधिकतम गति- 70-80 किलोमीटर प्रति घंटा
► विशेष पहचान-नर के लंबे सर्पिलाकार सींग और गहरा काला-भूरा रंग
► भारत में कहां पाये जाते हैं-राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश
► सबसे बड़ी आबादी-राजस्थान
► संरक्षण दर्जा-वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल
► शिकार पर सजा-3 से 7 वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना
► प्रमुख खतरे-अवैध शिकार, घासभूमियों का विनाश, सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले और मानव-वन्यजीव संघर्ष
► विशेष समुदाय-बिश्नोई समाज, जिसने सदियों से काले हिरणों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है
► प्रमुख संरक्षित क्षेत्र-ताल छापर अभयारण्य (राजस्थान), वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान (गुजरात), अबोहर क्षेत्र (पंजाब), रानीबेन्नूर ब्लैकबक अभयारण्य (कर्नाटक)
► सबसे चर्चित मामला-1998 का जोधपुर काला हिरण शिकार प्रकरण
► हालिया चिंता-आरटीआई के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु-शिकार से जुड़ी 114 घटनाएं दर्ज होने का दावा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि और पत्रकार)


शनिवार, 6 जून 2026

युवा लिख रहे हैं भारत में नए परिवर्तन की पटकथा!

 समसामयिक लेख-

रोजगार, शिक्षा और व्यवस्था से जुड़े सवालों ने युवाओं को एक बार फिर सड़कों पर ला खड़ा किया है। जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़, सोशल मीडिया पर बढ़ती सक्रियता और पारंपरिक राजनीति से मोहभंग के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत किसी नए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा है? भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जेपी आंदोलन, मंडल-कमंडल की राजनीति, अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन और किसान आंदोलन तक, समय-समय पर जनभावनाओं ने सत्ता और व्यवस्था को नई दिशा दी है। इन आंदोलनों में एक बात समान रही है, जब युवाओं ने किसी मुद्दे को अपना मुद्दा बना लिया, तब परिवर्तन की संभावना भी बढ़ी। इन दिनों कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बैनर तले युवाओं का आंदोलन चर्चा में है। बेरोजगारी, परीक्षा-पत्र लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रही आवाजों ने एक बार फिर देश का ध्यान युवाओं की ओर खींचा है।

अन्ना आंदोलन जब भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ था देश
वर्ष 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली जनआंदोलनों में गिना जाता है। उस समय राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम विवाद और अन्य भ्रष्टाचार के मामलों ने जनता में गहरा असंतोष पैदा कर दिया था। अन्ना हजारे ने जनलोकपाल कानून की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। देखते ही देखते यह आंदोलन राष्ट्रीय जनभावना का प्रतीक बन गया। दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर देश के छोटे-बड़े शहरों तक लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि इस आंदोलन का चेहरा युवा वर्ग बन गया। सोशल मीडिया के माध्यम से पहली बार किसी आंदोलन ने इतनी व्यापक जनभागीदारी देखी। बाद में इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ।

नेपाल के युवाओं ने बदला राजनीतिक विमर्श
नेपाल का हालिया राजनीतिक इतिहास भी युवाओं की भूमिका का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक चुनौतियों, भ्रष्टाचार और बढ़ते पलायन ने वहाँ के युवाओं को निराश किया। युवाओं ने सोशल मीडिया और जनसभाओं के माध्यम से अपनी नाराजगी व्यक्त की। परिणामस्वरूप राजनीतिक दलों को युवाओं के मुद्दों पर खुलकर बात करनी पड़ी। नेपाल का अनुभव यह बताता है कि जब युवाओं का असंतोष संगठित रूप ले लेता है, तो वह केवल आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक एजेंडा तय करने की क्षमता भी प्राप्त कर लेता है।

कॉकरोच जनता पार्टी-सोशल मीडिया से सड़क तक
कॉकरोच जनता पार्टी का उदय परंपरागत राजनीतिक दलों की तरह नहीं हुआ। इसकी शुरुआत सोशल मीडिया के माध्यम से हुई और धीरे-धीरे यह युवाओं की आकांक्षाओं और असंतोष का मंच बनती दिखाई देने लगी। हाल में जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ ने यह संकेत दिया कि यह केवल ऑनलाइन चर्चा भर नहीं है। युवाओं का एक वर्ग अब अपनी समस्याओं को सीधे सार्वजनिक मंचों पर उठाना चाहता है। यह आंदोलन किसी विचारधारा की बजाय युवाओं के रोजमर्रा के संघर्षों पर केंद्रित दिखाई देता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता और ताकत मानी जा रही है।

क्या हैं युवाओं की प्रमुख मांगें?
1. रोजगार के अवसर बढ़ें-देश में लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। कई वर्षों तक तैयारी करने के बावजूद नौकरी न मिल पाने की समस्या लगातार चर्चा में रही है।
2. भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता-युवाओं की मांग है कि सरकारी भर्ती प्रक्रियाएँ समयबद्ध और निष्पक्ष हों तथा नियुक्तियों में अनावश्यक देरी न हो।
3. पेपर लीक पर सख्ती-विभिन्न राज्यों में समय-समय पर परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने अभ्यर्थियों का भरोसा कमजोर किया है। युवा कठोर कानून और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
4. शिक्षा और रोजगार में बेहतर समन्वय-युवाओं का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को बाजार और उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप बनाया जाए ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार के अवसर बढ़ सकें।

अन्ना आंदोलन और सीजेपी आंदोलन की समानताएँ
दोनों आंदोलनों के मुद्दे अलग हो सकते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति में कई समानताएँ दिखाई देती हैं। युवाओं की केंद्रीय भूमिका, दोनों आंदोलनों की असली ताकत युवा वर्ग रहा है। सोशल मीडिया का प्रभाव, अन्ना आंदोलन के दौर में फेसबुक और ट्विटर ने भूमिका निभाई थी। आज इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म आंदोलन को गति दे रहे हैं। व्यवस्था से असंतोष, दोनों आंदोलनों की जड़ में व्यवस्था के प्रति असंतोष और सुधार की मांग निहित है। राजनीतिक विमर्श पर असर, इन आंदोलनों ने उन मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया जिन पर पहले अपेक्षाकृत कम चर्चा होती थी।

फिर भी कई मायनों में अलग है यह आंदोलन
अन्ना आंदोलन का केंद्र बिंदु भ्रष्टाचार और जनलोकपाल था। उसके पास स्पष्ट नेतृत्व और एक ठोस विधायी मांग थी। इसके विपरीत सीजेपी आंदोलन रोजगार, शिक्षा और अवसरों से जुड़े अनेक प्रश्नों को एक साथ उठा रहा है। यह अभी संगठनात्मक रूप से विकसित हो रहा है और इसकी दिशा आने वाले समय में अधिक स्पष्ट होगी।

क्या यह नए राजनीतिक विकल्प का संकेत है?
भारतीय राजनीति में कई बार आंदोलनों ने नए राजनीतिक विकल्पों को जन्म दिया है। अन्ना आंदोलन से आम आदमी पार्टी निकली, जबकि जेपी आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक बदलाव का रास्ता बनाया। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या सीजेपी आंदोलन भी भविष्य में किसी राजनीतिक विकल्प का आधार बन सकता है? इस प्रश्न का उत्तर अभी समय के गर्भ में है। लेकिन इतना निश्चित है कि यदि यह आंदोलन व्यापक जनसमर्थन बनाए रखता है और मजबूत संगठन विकसित करता है, तो इसका राजनीतिक प्रभाव अवश्य दिखाई देगा।

भारत का भविष्य और युवा शक्ति
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। आने वाले दशकों में देश की आर्थिक और सामाजिक दिशा इसी युवा आबादी से तय होगी। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और अवसर मिलते हैं तो भारत विश्व मंच पर और अधिक मजबूत स्थिति में पहुँच सकता है। लेकिन यदि उनकी अपेक्षाएँ लगातार अधूरी रह जाती हैं, तो असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि युवाओं की आवाज को केवल आंदोलन या विरोध के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी और संभावना दोनों के रूप में देखा जाना चाहिए।

बदलाव की दस्तक या क्षणिक उभार
अन्ना आंदोलन, नेपाल के युवा आंदोलनों और कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले उभर रहे आंदोलन की परिस्थितियाँ अलग हैं, लेकिन इन सबका मूल संदेश एक ही है-युवा अपने भविष्य को लेकर गंभीर हैं और अब अपनी बात अधिक मुखरता से कहना चाहते हैं। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह आंदोलन भारत में कोई बड़ा राजनीतिक परिवर्तन ले आएगा। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि इसने रोजगार, शिक्षा, भर्ती व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। लोकतंत्र में परिवर्तन हमेशा सत्ता परिवर्तन से नहीं आते। कई बार परिवर्तन की शुरुआत उन सवालों से होती है जिन्हें अनदेखा करना अब संभव नहीं रह जाता। जंतर-मंतर से उठती युवाओं की आवाज शायद ऐसे ही किसी नए अध्याय की प्रस्तावना हो।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)