सोमवार, 1 जून 2026

सुमन कल्याणपुर : एक स्वर जो लता के साये में रहकर भी अमर हो गया

 

-डॉ. चेतन आनंद
भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी लोकप्रियता और योगदान निर्विवाद है, लेकिन जिनके हिस्से वह पहचान नहीं आ सकी जिसकी वे पूरी तरह अधिकारी थे। पार्श्वगायिका सुमन कल्याणपुर ऐसा ही एक नाम हैं। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग में जब लता मंगेशकर का स्वर लगभग हर नायिका की आवाज़ बन चुका था, तब सुमन कल्याणपुर ने अपनी असाधारण प्रतिभा, मधुरता और अनुशासित गायन के बल पर एक विशिष्ट स्थान बनाया। विडंबना यह रही कि उनकी आवाज़ की सबसे बड़ी विशेषता उसकी कोमलता और लता मंगेशकर से मिलती-जुलती गुणवत्ता ही उनकी पहचान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा भी बन गई।
28 जनवरी 1937 को जन्मी सुमन कल्याणपुर का मूल नाम सुमन हेमाडी था। उन्होंने बचपन से ही शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया और संगीत के प्रति उनकी रुचि ने शीघ्र ही उन्हें आकाशवाणी और फिर फिल्मी दुनिया तक पहुँचा दिया। 1950 के दशक में उन्होंने फिल्मों में गाना शुरू किया, लेकिन उस समय फिल्म संगीत के आकाश पर लता मंगेशकर का सूर्य पूरी चमक के साथ उपस्थित था। ऐसे दौर में किसी नई गायिका के लिए अपनी जगह बनाना अत्यंत कठिन था।
फिर भी सुमन कल्याणपुर ने हार नहीं मानी। उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास, शुद्धता और भावनात्मक गहराई थी कि बड़े-बड़े संगीतकार उनसे प्रभावित हुए। शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, रोशन, नौशाद, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और वसंत देसाई जैसे संगीतकारों ने उन्हें अवसर दिए। यह इस बात का प्रमाण था कि वे केवल किसी की प्रतिछाया नहीं, बल्कि स्वयं में एक समर्थ और पूर्ण कलाकार थीं।
सुमन कल्याणपुर के जीवन का सबसे चर्चित पहलू उनकी तुलना लता मंगेशकर से रहा। उनकी आवाज़ इतनी समान प्रतीत होती थी कि श्रोता ही नहीं, कभी-कभी संगीत के जानकार भी भ्रमित हो जाते थे। रेडियो पर बजने वाले अनेक गीतों को लोग वर्षों तक लता मंगेशकर का गीत समझते रहे। बाद में जब पता चला कि उन्हें सुमन कल्याणपुर ने गाया है तो लोग आश्चर्यचकित रह गए।
फिल्म ब्रह्मचारी का प्रसिद्ध गीत “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे” इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मोहम्मद रफ़ी के साथ गाए इस गीत को आज भी अनेक लोग पहली बार सुनकर लता मंगेशकर का गीत समझ बैठते हैं। इसी प्रकार “तुमने पुकारा और हम चले आए”, “ना ना करते प्यार”, “परबतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है” और “दिल एक मंदिर है” जैसे गीतों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊँचाइयाँ दीं।
संगीत समीक्षकों का मानना है कि यदि सुमन कल्याणपुर किसी अन्य युग में होतीं, तो वे निस्संदेह शीर्ष गायिकाओं में गिनी जातीं। लेकिन उनका दुर्भाग्य यह था कि वे ऐसे समय में सक्रिय थीं जब लता मंगेशकर का प्रभुत्व लगभग अजेय था। तुलना का यह सिलसिला उनके पूरे करियर के साथ जुड़ा रहा। फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की और न ही किसी प्रकार की कटुता व्यक्त की।
सुमन कल्याणपुर की सफलता का एक महत्वपूर्ण अध्याय मोहम्मद रफ़ी के साथ उनकी जोड़ी है। 1960 के दशक में रॉयल्टी के मुद्दे पर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के बीच मतभेद हो गए थे। कुछ वर्षों तक दोनों ने साथ में गीत नहीं गाए। इस दौरान कई संगीतकारों ने रफ़ी साहब के साथ सुमन कल्याणपुर को चुना। परिणामस्वरूप हिंदी फिल्म संगीत को अनेक यादगार युगल गीत मिले।
स्वयं सुमन कल्याणपुर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि रफ़ी साहब के साथ गाना किसी विद्यालय में शिक्षा पाने जैसा था। वे रिकॉर्डिंग के दौरान अत्यंत विनम्र और सहयोगी रहते थे। रफ़ी साहब की यह विशेषता थी कि वे नए कलाकारों को सहज महसूस कराते थे। सुमन जी हमेशा उनके प्रति गहरा सम्मान व्यक्त करती रहीं।
प्रसिद्ध गीतकार और फिल्मकार गुलज़ार ने एक बार कहा था कि हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम संगीत केवल बड़े नामों का परिणाम नहीं था, बल्कि उन अनेक प्रतिभाओं का भी योगदान था जो अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहीं। यद्यपि यह टिप्पणी किसी एक कलाकार के लिए नहीं थी, लेकिन सुमन कल्याणपुर का नाम उन कलाकारों में अवश्य लिया जा सकता है जिनके बिना उस युग का संगीत अधूरा होता।
संगीत इतिहासकार राजू भारतन ने भी कई अवसरों पर लिखा कि सुमन कल्याणपुर को उनकी वास्तविक क्षमता के अनुरूप अवसर नहीं मिले। वे मानते थे कि उनकी आवाज़ की समानता ने संगीत कंपनियों और निर्माताओं को लाभ तो पहुँचाया, लेकिन कलाकार के रूप में सुमन जी की स्वतंत्र पहचान को सीमित भी किया।
इसके बावजूद सुमन कल्याणपुर का योगदान अत्यंत व्यापक है। उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी, भोजपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी गीत गाए। फिल्मी गीतों के साथ-साथ भजन, ग़ज़ल और गैर-फिल्मी संगीत में भी उनकी उपस्थिति उल्लेखनीय रही। अनुमानतः उन्होंने सात सौ से अधिक गीत रिकॉर्ड किए।
उनके व्यक्तित्व का एक और उल्लेखनीय पक्ष उनकी सादगी और विनम्रता थी। उन्होंने कभी प्रचार-प्रसार की दौड़ में स्वयं को शामिल नहीं किया। मीडिया में विवादों से दूर रहना और केवल अपने काम पर ध्यान देना उनकी आदत थी। शायद यही कारण है कि वे अपने समय की सबसे सम्मानित कलाकारों में गिनी जाती हैं।
जब उनसे बार-बार लता मंगेशकर से तुलना के बारे में पूछा जाता था, तो वे हमेशा आदरपूर्वक उत्तर देती थीं। उन्होंने अनेक अवसरों पर कहा कि युवावस्था में वे स्वयं लता जी के गीत गाकर अभ्यास करती थीं। उनके भीतर किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धात्मक कटुता नहीं थी। यह उनकी उदारता और संस्कारों का परिचायक है।
समय बीतता गया, संगीत की दुनिया बदलती गई, लेकिन सुमन कल्याणपुर के गीतों का आकर्षण कम नहीं हुआ। डिजिटल युग में जब पुराने गीतों को नई पीढ़ी ने फिर से सुनना शुरू किया, तब लोगों ने महसूस किया कि जिन गीतों को वे वर्षों से लता मंगेशकर का मानते आए थे, उनमें से कई वास्तव में सुमन कल्याणपुर के स्वर में थे। यह खोज अपने-आप में उनकी प्रतिभा की सबसे बड़ी स्वीकृति है।
भारत सरकार ने वर्ष 2023 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। संगीत जगत ने इसे एक ऐसे कलाकार को मिला सम्मान माना, जिसे बहुत पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल जानी चाहिए थी। यह सम्मान केवल एक गायिका का नहीं, बल्कि उस पूरे वर्ग का सम्मान था जो उत्कृष्ट कार्य करने के बावजूद अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा।
आज जब हम हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग को याद करते हैं, तो यह आवश्यक है कि सुमन कल्याणपुर को केवल लता मंगेशकर की समकालीन गायिका के रूप में न देखें। उन्हें उनके अपने योगदान, उनकी अपनी शैली और उनकी अपनी उपलब्धियों के आधार पर याद किया जाना चाहिए। उन्होंने यह सिद्ध किया कि महानता केवल शीर्ष स्थान प्राप्त करने में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी गरिमा और गुणवत्ता बनाए रखने में निहित होती है।
सुमन कल्याणपुर का स्वर भारतीय संगीत की उस मधुर नदी की तरह है, जो बिना शोर किए निरंतर बहती रही। शायद इसी कारण वह आज भी संगीत प्रेमियों के हृदय में उतनी ही ताज़गी और आत्मीयता के साथ गूँजता है। इतिहास भले ही उन्हें वह स्थान देने में देर कर गया हो, लेकिन संगीत के सच्चे रसिकों ने उन्हें हमेशा सम्मान और प्रेम से याद रखा है। यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
(समाप्त)

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