शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

एथनॉल मिश्रित पेट्रोल-आत्मनिर्भर भारत का ईंधन या नई चुनौतियों की शुरुआत?

 महत्वपूर्ण लेख-

भारत में पिछले कुछ वर्षों से पेट्रोल में एथनॉल मिलाने की नीति तेजी से लागू की जा रही है। अब देश के अधिकांश पेट्रोल पंपों पर ई-20 अर्थात 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रित पेट्रोल उपलब्ध है। सरकार इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम बता रही है, जबकि वाहन मालिकों, पर्यावरणविदों और अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग इससे जुड़ी कुछ आशंकाएँ भी व्यक्त कर रहा है। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि एथनॉल मिश्रण की यह नीति आखिर है क्या, इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी, दुनिया के अन्य देशों का अनुभव क्या रहा है और भारत के लिए इसके क्या मायने हैं। एथनॉल एक प्रकार का एथिल अल्कोहल है, जिसे मुख्य रूप से गन्ने के शीरे, गन्ने के रस, मक्का, टूटे चावल तथा अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। जब इसे पेट्रोल में निर्धारित अनुपात में मिलाया जाता है तो उसे एथनॉल मिश्रित पेट्रोल कहा जाता है। उदाहरण के लिए, 20 प्रतिशत एथनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल वाले ईंधन को ई-20 कहा जाता है। भारत सरकार ने एथनॉल मिश्रण कार्यक्रम को कई उद्देश्यों के साथ लागू किया है। सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है। भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता पर पड़ता है। सरकार का मानना है कि यदि पेट्रोल का एक हिस्सा देश में उत्पादित एथनॉल से प्रतिस्थापित किया जाए तो विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होगी, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और किसानों को भी अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा।
एथनॉल मिश्रण का एक बड़ा आधार कृषि भी है। गन्ना उत्पादक किसानों को अक्सर चीनी मिलों से भुगतान में देरी का सामना करना पड़ता है। एथनॉल उत्पादन बढ़ने से चीनी मिलों को अतिरिक्त बाजार मिलता है और किसानों को अपेक्षाकृत बेहतर भुगतान मिलने की संभावना बढ़ती है। हाल के वर्षों में मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से भी एथनॉल बनाया जा रहा है, जिससे कृषि क्षेत्र को नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं।
दुनिया के कई देशों ने भारत से बहुत पहले एथनॉल मिश्रण अपनाया था। ब्राजील इसका सबसे सफल उदाहरण माना जाता है। वहाँ 1970 के दशक से पेट्रोल में लगभग 27 प्रतिशत एथनॉल मिलाया जा रहा है और बड़ी संख्या में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन ऐसे हैं जो शुद्ध एथनॉल पर भी चल सकते हैं। अमेरिका में सामान्यतः ई-10 का उपयोग होता है, जबकि कुछ राज्यों में ई-15 और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए ई-85 भी उपलब्ध है। कनाडा, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अनेक देशों में भी विभिन्न स्तरों पर एथनॉल मिश्रण अपनाया गया है।
यदि लाभों की बात करें तो पहला लाभ विदेशी मुद्रा की बचत है। तेल आयात कम होने से देश की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। दूसरा लाभ किसानों और ग्रामीण उद्योगों को मिलता है। तीसरा लाभ पर्यावरण से जुड़ा है। एथनॉल एक जैव-ईंधन है और इसके उपयोग से कुछ हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कम हो सकता है। सरकार का दावा है कि ई-20 के अनुरूप विकसित वाहनों में प्रदूषण कम होता है और इंजन का प्रदर्शन भी बेहतर हो सकता है। लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
सबसे पहले माइलेज का प्रश्न आता है। एथनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। इसी कारण अनेक वाहन विशेषज्ञों का मानना है कि ई-20 के उपयोग से माइलेज में लगभग 2 से 4 प्रतिशत, कुछ परिस्थितियों में इससे थोड़ा अधिक भी, कमी महसूस हो सकती है। वाहन निर्माता भी स्वीकार करते हैं कि ईंधन दक्षता पर कुछ प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि उनका कहना है कि यह सुरक्षा का नहीं बल्कि दक्षता का विषय है।
दूसरी चिंता पुराने वाहनों को लेकर है। भारत की सड़कों पर करोड़ों ऐसे वाहन हैं जिनका निर्माण उस समय हुआ था जब ई-20 ईंधन उपलब्ध नहीं था। ऐसे वाहनों में रबर की पाइप, सील, गैस्केट तथा ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों पर लंबे समय में प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त की जाती रही है। हालांकि सरकार और वाहन निर्माता कहते हैं कि व्यापक स्तर पर इंजन फेल होने जैसी घटनाएँ सामने नहीं आई हैं, फिर भी पुराने वाहन मालिकों की शंकाओं का पूरी तरह समाधान होना अभी बाकी है।
तीसरी चुनौती खाद्य सुरक्षा की है। यदि बड़ी मात्रा में मक्का, गन्ना और अन्य कृषि उत्पाद ईंधन बनाने में लगेंगे, तो भविष्य में खाद्यान्न की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है। अमेरिका में वर्षों से ‘फूड बनाम फ्यूल’ की बहस चलती रही है। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में इस पहलू पर विशेष सावधानी बरतनी होगी।
चैथा प्रश्न जल संसाधनों से जुड़ा है। गन्ना अत्यधिक पानी लेने वाली फसल है। भारत पहले से ही कई राज्यों में भूजल संकट का सामना कर रहा है। यदि एथनॉल उत्पादन मुख्यतः गन्ने पर आधारित रहेगा, तो जल प्रबंधन की चुनौती और बढ़ सकती है। इसलिए विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भविष्य में कृषि अवशेषों और दूसरी पीढ़ी के जैव-ईंधनों को अधिक बढ़ावा दिया जाए।
भारत में नई कारों और दोपहिया वाहनों को धीरे-धीरे ई-20 के अनुरूप बनाया जा रहा है। यदि किसी उपभोक्ता ने पिछले कुछ वर्षों में नया वाहन खरीदा है, तो उसके लिए चिंता अपेक्षाकृत कम है। लेकिन पुराने वाहन मालिकों को अपने वाहन निर्माता की सलाह के अनुसार ही ईंधन का उपयोग करना चाहिए और समय-समय पर वाहन की सर्विस कराते रहना चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि ई-20 कार्यक्रम अभी भी एक प्रकार का प्रायोगिक चरण है और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन जारी है। इससे स्पष्ट है कि सरकार स्वयं भी इस नीति के परिणामों पर लगातार नजर रखे हुए है।
वास्तव में एथनॉल मिश्रित पेट्रोल न तो कोई चमत्कारी समाधान है और न ही ऐसी नीति जिसे पूरी तरह खारिज कर दिया जाए। ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा की बचत, किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य इसके पक्ष में हैं। वहीं माइलेज, पुराने वाहनों की अनुकूलता, जल संकट और खाद्य सुरक्षा जैसे प्रश्न इसके सामने चुनौती बनकर खड़े हैं।
भारत को ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों से सीख लेते हुए अपनी परिस्थितियों के अनुरूप संतुलित नीति अपनानी होगी। उपभोक्ताओं को सही जानकारी देना, वाहनों की तकनीकी तैयारी सुनिश्चित करना, जल संरक्षण पर ध्यान देना और कृषि नीति में संतुलन बनाए रखना इस कार्यक्रम की सफलता की शर्तें हैं। यदि ऐसा किया गया, तो एथनॉल मिश्रित पेट्रोल भारत की ऊर्जा यात्रा में मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। लेकिन यदि इन चुनौतियों की उपेक्षा की गई, तो यही नीति भविष्य में नए विवादों और समस्याओं का कारण भी बन सकती है। इसलिए आवश्यकता किसी अंध-समर्थन या अंध-विरोध की नहीं, बल्कि तथ्यों, विज्ञान और दूरदर्शिता के आधार पर आगे बढ़ने की है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


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