मंगलवार, 8 सितंबर 2026

सत्य निकेतन से गाजियाबाद-नोएडा तक

 आवश्यक लेख-

कब्जों और अवैध निर्माण ने कितनी बड़ी कीमत वसूली?
सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी भवन का भरभराकर गिरना केवल एक इमारत का हादसा नहीं है। यह दिल्ली-एनसीआर के उस शहरी विकास मॉडल पर गंभीर सवाल है, जिसमें आवासीय मकान पीजी बन जाते हैं, स्वीकृत नक्शे से अधिक मंजिलें खड़ी हो जाती हैं, बेसमेंट का उपयोग बदल जाता है और सरकारी अथवा ग्रीन बेल्ट की जमीन पर कब्जे धीरे-धीरे स्थायी निर्माण में बदल जाते हैं। सत्य निकेतन में सात लोगों की मौत और पांच लोगों के घायल होने के बाद यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या प्रशासन अवैध निर्माण को हादसे से पहले पहचानता है या हादसे के बाद जागता है?
सत्य निकेतन-चेतावनी नहीं, आईना
7 सितंबर को दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में लगभग 50-55 वर्ष पुरानी पांच मंजिला इमारत अचानक ढह गई। इसमें मुख्यतः विद्यार्थी रहते थे। बचाव अभियान में 12 लोगों को मलबे से निकाला गया, जिनमें सात की मृत्यु हो गई और पांच घायल हुए। भवन में निर्माण-मरम्मत का काम चल रहा था और बेसमेंट में भी काम होने की जानकारी सामने आई है।  एमसीडी की प्रारंभिक जांच के अनुसार भवन के पास स्वीकृत नक्शा नहीं था, बेसमेंट अनधिकृत था, फायर एनओसी नहीं थी और पांचवीं मंजिल भी नियमों के अनुरूप स्वीकृत नहीं थी। सबसे चैंकाने वाली बात यह है कि इस भवन को इस साल के मानसून-पूर्व सर्वे में खतरनाक घोषित भवनों की सूची में शामिल नहीं किया गया था। दिल्ली में 2020 से 2024 के बीच ढांचे गिरने से लगभग 170 मौतें दर्ज हुईं। इसलिए सत्य निकेतन को एक अलग-थलग दुर्घटना मानना मुश्किल है।
दिल्ली में कार्रवाई के आंकड़े भी कम गंभीर नहीं
सत्य निकेतन जैसी घटनाओं के बीच दिल्ली में अवैध निर्माण के विरुद्ध अभियान के आंकड़े बताते हैं कि समस्या कितनी व्यापक है। जून 2026 में एमसीडी ने एक अभियान में 217 अनधिकृत ढांचे गिराए और 237 संपत्तियां सील कीं। इसके अलावा 330 कारण बताओ नोटिस, 151 सीलिंग नोटिस और 91 ध्वस्तीकरण आदेश जारी किए गए। राजस्व विभाग ने केवल 5 से 15 जून के बीच दिल्ली में 773 स्थानों का निरीक्षण किया। पश्चिमी दिल्ली में 165, दक्षिण दिल्ली में 93, उत्तर दिल्ली में 89 और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में 70 निरीक्षण हुए। इन निरीक्षणों में अनधिकृत निर्माण, अग्नि सुरक्षा और भूमि-उपयोग से जुड़े उल्लंघन मिले।  लेकिन सवाल यह है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करनी पड़ रही है, तो ये निर्माण बनते समय दिखाई क्यों नहीं दिए?
पीजी संस्कृति ने बढ़ाया खतरा
दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों के आसपास निजी पीजी की मांग बहुत अधिक है। इसी मांग ने कई आवासीय इलाकों में मकानों को बहुमंजिला पीजी में बदलने का रास्ता खोला है। सत्य निकेतन में जिस इमारत के गिरने से सात जानें गईं, उसके आसपास भी कई भवन पीजी के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। जांच में आसपास के कुछ पीजी में संकरे रास्ते, सीमित प्रवेश-निकास और बिजली व्यवस्था से जुड़े सुरक्षा सवाल सामने आए हैं। यही स्थिति गुरुग्राम में भी दिखाई देती है। वहां 453 पीजी चिन्हित किए गए हैं और 18 को सील किया जा चुका है। डीएलएफ फेज-3 में कार्रवाई के दौरान चार पीजी भवनों के 181 कमरे सील किए गए और 29 अवैध व्यावसायिक इकाइयों पर भी ताले लगाए गए। यानी सत्य निकेतन का सवाल केवल दिल्ली का नहीं, बल्कि पूरे एनसीआर के पीजी मॉडल का सवाल बन चुका है।
गुरुग्राम-घर से पीजी और पीजी से व्यावसायिक परिसर
गुरुग्राम में कई आवासीय क्षेत्रों में अतिरिक्त मंजिलों और स्टिल्ट पार्किंग के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से विवाद है। डीएलएफ फेज-3 में कार्रवाई के दौरान ऐसे भवन भी मिले जिनमें स्वीकृत सीमा से अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं। एक अभियान में 13 अनधिकृत निर्माण ध्वस्त किए गए और 18 भवन सील किए गए। साथ ही लगभग डेढ़ एकड़ एमसीजी जमीन कब्जामुक्त कराई गई।  यहां सवाल केवल भवन का नहीं है। जब आवासीय प्लॉट पर अतिरिक्त मंजिल बनती है, दर्जनों लोग रहने लगते हैं और नीचे व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं तो सड़क, पार्किंग, सीवर, पानी और अग्नि सुरक्षा सभी पर दबाव बढ़ता है।
गाजियाबाद-हिंडन के किनारे 258 अवैध कॉलोनियां
गाजियाबाद की तस्वीर और भी चिंताजनक है। प्रशासन के अनुसार हिंडन नदी के किनारे 258 अवैध कॉलोनियां बसी हुई हैं। जिलाधिकारी ने यमुना और हिंडन नदी क्षेत्रों में सरकारी जमीनों पर हुए अतिक्रमण का सर्वे कराकर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यह केवल जमीन कब्जाने का मामला नहीं है। नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण होने का सीधा असर जलनिकासी और बाढ़ के जोखिम पर पड़ता है। जुलाई 2026 में भी हिंडन के बाढ़ क्षेत्र में नए मकान, पशुशालाएं, शौचालय और अन्य निर्माण दिखाई देने की रिपोर्ट सामने आई। यानी जिस जमीन को प्राकृतिक जल प्रवाह और बाढ़ नियंत्रण के लिए खुला रहना चाहिए, वहां धीरे-धीरे आबादी और निर्माण खड़ा हो रहा है।
नोएडा-5,903 करोड़ की जमीन कब्जामुक्त
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में अतिक्रमण का पैमाना जमीन के आंकड़ों से समझा जा सकता है। गौतमबुद्धनगर पुलिस के अनुसार 2025 से जून 2026 तक 13 लाख 25 हजार 960 वर्ग गज सरकारी और प्राधिकरण की जमीन अतिक्रमण से मुक्त कराई गई। इसकी अनुमानित कीमत 5,903 करोड़ 95 लाख रुपये से अधिक बताई गई है। इसमें सेंट्रल नोएडा 8,89,127 वर्ग गज, ग्रेटर नोएडा 4,21,833 वर्ग गज, नोएडा 15,000 वर्ग गज जमीन शामिल है। कई मामलों में भूमाफियाओं ने सरकारी जमीन पर बाउंड्रीवाल, निर्माण या अवैध प्लॉटिंग की थी और कुछ मामलों में एफआईआर भी दर्ज हुई। यह आंकड़ा बताता है कि नोएडा में मामला केवल सड़क या फुटपाथ के कब्जे तक सीमित नहीं है। यहां हजारों करोड़ रुपये मूल्य की जमीन भी अतिक्रमण के निशाने पर रही है।
फरीदाबाद-ग्रीन बेल्ट भी सुरक्षित नहीं
फरीदाबाद में भी नगर निगम, एफएमडीए और एचएसवीपी को लगातार अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाने पड़ रहे हैं। पिछले एक वर्ष में शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में हजारों अस्थायी और स्थायी अतिक्रमण हटाए जाने की जानकारी सामने आई है। समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एफएमडीए ने सेक्टर-88 की ग्रीन बेल्ट और सरकारी जमीन को दोबारा कब्जे से बचाने के लिए लगभग 1.53 करोड़ रुपये की फेंसिंग परियोजना शुरू की है। प्रशासन को कई स्थानों पर एक ही जगह बार-बार अतिक्रमण हटाना पड़ता है। ग्रीन बेल्ट पर कब्जा केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं है। इससे बारिश के पानी की निकासी भी प्रभावित होती है और जलभराव बढ़ सकता है।
क्या मास्टर प्लान की धज्जियां उड़ रही हैं?
इस प्रश्न का उत्तर अब टालना मुश्किल है। दिल्ली की सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमेटी ने जुलाई 2026 में ही आवासीय परिसरों में मिश्रित उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियों के कारण अग्नि सुरक्षा नियमों, यूबीबीएल-2016 और मास्टर प्लान-2021 के उल्लंघन पर रिपोर्ट दर्ज की है। अर्थात समस्या केवल यह नहीं कि किसी ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया। असली समस्या यह है कि आवासीय मकान पीजी बन गया। पीजी बहुमंजिला हो गया। बेसमेंट का उपयोग बदल गया। पार्किंग व्यावसायिक गतिविधि में चली गई। ग्रीन बेल्ट पर निर्माण हो गया। नदी के बाढ़ क्षेत्र में कॉलोनी बस गई। इन सबका संयुक्त परिणाम शहर की नियोजित संरचना को कमजोर करता है।
सबसे बड़ा सवाल, प्रशासन पहले क्यों नहीं जागता
सत्य निकेतन हादसे के बाद भवन मालिक परिवार के तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया गया और पांच एमसीडी अधिकारियों को निलंबित किया गया। सभी पीजी और हॉस्टल भवनों के संरचनात्मक ऑडिट की मांग भी तेज हुई है। लेकिन असली कसौटी यही होगी कि क्या यह कार्रवाई हादसे के बाद तक सीमित रहती है या व्यवस्था बदलती है? दिल्ली-एनसीआर में एक साझा डिजिटल रजिस्टर होना चाहिए, जिसमें प्रत्येक पीजी, गेस्ट हाउस और बहुमंजिला आवासीय भवन की स्थिति दर्ज हो, स्वीकृत नक्शा, वास्तविक मंजिलें, फायर एनओसी, संरचनात्मक ऑडिट, भूमि उपयोग और कार्रवाई की स्थिति।
कब्जे का इलाज बुलडोजर नहीं, रोकथाम है
सत्य निकेतन की सात मौतें हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि शहरों में अवैध निर्माण आखिर बनता कैसे है। 13 लाख वर्ग गज जमीन कब्जामुक्त कराने के बाद भी यदि नए कब्जे होते रहें, 258 अवैध कॉलोनियां नदी किनारे बनी रहें और 453 पीजी में से 18 को हादसे के डर के बीच सील करना पड़े, तो समस्या केवल अतिक्रमणकारियों की नहीं है। यह निगरानी और नियोजन की भी समस्या है। दिल्ली-एनसीआर को अब केवल यह बताने की जरूरत नहीं कि कितने कब्जे हटाए गए। उसे यह बताना होगा कि कितने कब्जे बनने से पहले रोके गए, कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, कितने अवैध पीजी बंद हुए और कितनी जानें बचाई गईं। क्योंकि सत्य निकेतन के मलबे के नीचे केवल सात लोग नहीं दबे, उसके नीचे हमारी शहरी नियोजन व्यवस्था की कई कमजोरियां भी उजागर हुई हैं।


लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


बुधवार, 2 सितंबर 2026

हिमालय की पीड़ा, आपदाएं, पिघलते ग्लेशियर और हमारी विकास-दृष्टि

 समसामयिक लेख-

भारत का हिमालय केवल बर्फ से ढके पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है। वह देश की नदियों का उद्गम, करोड़ों लोगों के जीवन का आधार, जैव-विविधता का भंडार और जलवायु-संतुलन की एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था है। लेकिन पिछले एक दशक से हिमालय बार-बार हमें चेतावनी दे रहा है। कहीं बादल फट रहे हैं, कहीं पहाड़ दरक रहे हैं, कहीं ग्लेशियल झीलें फैल रही हैं और कहीं अचानक आने वाली बाढ़ पूरे गांव और सड़कें बहा ले जा रही है। हाल की नेपाल त्रासदी ने इस चेतावनी को फिर बेहद भयावह बना दिया है। सबसे पहले 2013 की केदारनाथ त्रासदी को याद करना जरूरी है। जून 2013 में उत्तराखंड में 14 से 18 जून के बीच असाधारण वर्षा हुई। सामान्य 71.3 मिलीमीटर के मुकाबले 385.1 मिलीमीटर वर्षा दर्ज हुई, अर्थात सामान्य से लगभग 440 प्रतिशत अधिक। सरकारी आकलन में 169 लोगों की मृत्यु और 4,021 लोगों के लापता होने की सूचना थी, जिन्हें बाद में मृत मानने की स्थिति बनी। 50 हजार करोड़ रुपये के आसपास बुनियादी ढांचे के नुकसान का अनुमान लगाया गया। केदारनाथ, गौरीकुंड, मंदाकिनी और अलकनंदा घाटियां सबसे अधिक प्रभावित हुईं। केदारनाथ ने हमें बताया था कि पहाड़ में प्रकृति की छोटी-सी अतिरिक्त मार भी कितनी बड़ी त्रासदी बन सकती है। लेकिन उसके बाद के वर्षों में घटनाओं का सिलसिला थमा नहीं।
लगातार बढ़ता खतरा
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से लेकर नेपाल और तिब्बत तक हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन, अचानक बाढ़, बादल फटना और ग्लेशियल झीलों के फटने की घटनाएं लगातार सामने आई हैं। उत्तराखंड में 2015 से 2024 के बीच 4,600 से अधिक भूस्खलन दर्ज किए गए और इनमें कम से कम 316 लोगों की मृत्यु हुई। पिथौरागढ़ में अकेले लगभग 100 मौतें दर्ज हुईं। फरवरी 2021 में चमोली की ऋषिगंगा-धौलीगंगा घाटी में हुई त्रासदी ने एक नया खतरा सामने रखा। रौंती क्षेत्र से भारी मात्रा में चट्टान और बर्फ नीचे आई और अचानक जलप्रवाह ने ऋषिगंगा तथा धौलीगंगा घाटियों को अपनी चपेट में ले लिया। दो जलविद्युत परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और 200 से अधिक लोगों की मृत्यु या लापता होने की सूचना सामने आई। यह घटना इस बात का प्रमाण थी कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर, चट्टान, पानी और मानव निर्माण मिलकर कितनी भयावह स्थिति पैदा कर सकते हैं। अक्टूबर 2023 में सिक्किम में दक्षिण ल्होनाक झील के फटने से तीस्ता नदी में अचानक भीषण बाढ़ आई। सरकारी स्थिति रिपोर्ट के अनुसार सिक्किम में 42 शव बरामद किए गए, तीस्ता नदी के क्षेत्र में पश्चिम बंगाल पुलिस ने 62 अज्ञात शव बरामद किए और 77 लोग लापता थे। 88,400 लोग प्रभावित हुए, 2,563 लोगों को बचाया गया और 5,665 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।  यह केवल बाढ़ नहीं थी। यह ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ थी। दक्षिण ल्होनाक झील का आधे से अधिक पानी अचानक निकल गया था। यही वह खतरा है जो आने वाले वर्षों में हिमालय के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन सकता है।
ग्लेशियरों की बदलती दुनिया
भारतीय हिमालय के ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव अब केवल वैज्ञानिक शोध का विषय नहीं रह गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर औसतन लगभग 14.9 मीटर प्रतिवर्ष पीछे हट रहे हैं। गंगा बेसिन में यह औसत लगभग 15.5 मीटर और ब्रह्मपुत्र बेसिन में लगभग 20.2 मीटर प्रतिवर्ष है। 1975 से 2023 तक भारतीय हिमालयी ग्लेशियरों में संचयी बर्फ-द्रव्यमान हानि का अनुमान लगभग 26 मीटर जल-समतुल्य लगाया गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के उपग्रह अध्ययन ने भी गंभीर संकेत दिए हैं। 1984 से 2023 के बीच 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 हिमनदीय झीलों का अध्ययन किया गया। इनमें 676 झीलों का उल्लेखनीय विस्तार पाया गया। इन 676 में 130 झीलें भारत में हैं, 65 सिंधु नदी क्षेत्र में, 7 गंगा क्षेत्र में और 58 ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में। इनमें 601 झीलों का आकार दोगुने से भी अधिक बढ़ चुका था। हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाटी की एक हिमनदीय झील का आकार 1989 से 2022 के बीच 36.49 हेक्टेयर से बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया, यानी लगभग 178 प्रतिशत की वृद्धि।  इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि हर बढ़ती झील कल ही फट जाएगी। लेकिन इसका अर्थ यह अवश्य है कि जो खतरे पहले छोटे और दूर थे, वे अब बड़े और अधिक संवेदनशील हो रहे हैं।
हिमाचल की लगातार त्रासदियां
2023 में हिमाचल प्रदेश ने अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन की भयावह स्थिति देखी। राज्य सरकार द्वारा केंद्र को दी गई रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 में जल-मौसम संबंधी आपदाओं में 556 लोगों की जान गई, 21,506 पशु मारे गए और 15,792 मकान क्षतिग्रस्त हुए। 2024-25 में 408 लोगों की मृत्यु हुई और 1,089 मकान क्षतिग्रस्त हुए। 2025-26 में उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में 195 मौतें और 10,525 मकानों के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है। इन आंकड़ों में अलग-अलग प्रकार की घटनाएं शामिल हैं और इन्हें केवल भूस्खलन या बाढ़ की मौतें मानना उचित नहीं होगा। फिर भी ये बताते हैं कि पहाड़ी राज्यों में आपदा का आर्थिक और मानवीय बोझ कितना बड़ा हो गया है। उत्तराखंड में 2025 में भी बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन की कई घटनाएं हुईं। धराली जैसी घटनाओं ने दिखाया कि कुछ ही मिनटों में नदी और मलबा पूरे बस्ती क्षेत्र का स्वरूप बदल सकते हैं।
और अब नेपाल की त्रासदी
अगस्त 2026 की नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र की त्रासदी ने पूरे हिमालय को फिर झकझोर दिया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार नेपाल के रसुवा क्षेत्र में हिमालयी क्षेत्र से जुड़े अचानक आए बाढ़ के प्रकोप में 1243 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता थे। नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार 85 सुरक्षाकर्मी भी लापता थे। विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े 60 लोग, 391 विदेशी पर्यटक और 93 नेपाली पर्यटक भी संपर्क से बाहर बताए गए। बाढ़ में 19 मोटर योग्य पुल और लगभग 40 किलोमीटर सड़क क्षतिग्रस्त हुई। ये आंकड़े 26 अगस्त 2026 तक की स्थिति के हैं और बचाव अभियान जारी रहने के कारण बदल सकते हैं। अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में नेपाल और तिब्बत को मिलाकर मृतकों और लापता लोगों की संख्या इससे कहीं अधिक बताई गई है। इसलिए अंतिम आंकड़ा राहत एवं खोज अभियान पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगा। नेपाल की यह त्रासदी भारत के लिए भी सीधी चेतावनी है। हिमालय किसी राजनीतिक सीमा से बंटा हुआ पर्वत नहीं है। उसकी बर्फ, नदियां, ग्लेशियर और भूगर्भीय प्रक्रियाएं भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत के बीच साझा प्राकृतिक व्यवस्था हैं।
केवल प्रकृति दोषी नहीं
प्राकृतिक आपदा को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन प्राकृतिक खतरे को मानवीय त्रासदी बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है। हिमालय में अनियंत्रित सड़क चैड़ीकरण, पहाड़ों की कटाई, नदी के प्राकृतिक मार्ग में निर्माण, अत्यधिक पर्यटन, जलविद्युत परियोजनाओं का दबाव, कमजोर जल-निकासी व्यवस्था और भूगर्भीय संवेदनशीलता की अनदेखी जोखिम को बढ़ाती है। सरकार की ओर से भी कई महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं। उपग्रह निगरानी, भूस्खलन मानचित्रण, हिमनदीय झीलों की निगरानी, चेतावनी प्रणालियां, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजनाएं और बचाव बलों की क्षमता में वृद्धि हुई है। हिमाचल सहित पर्वतीय राज्यों के लिए केंद्र ने आपदा जोखिम कम करने, समुदाय आधारित तैयारी और प्रारंभिक चेतावनी को मजबूत करने के कार्यक्रम चलाए हैं। भू-स्थान आधारित चेतावनी व्यवस्था के माध्यम से मौसम विभाग, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और अन्य संस्थाओं की चेतावनियों को जोड़ने की व्यवस्था भी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब पर्याप्त है?
हिमालय के लिए नई विकास नीति जरूरी
अब समय राहत और पुनर्वास से आगे बढ़कर आपदा रोकथाम आधारित विकास का है। हर पहाड़ी जिले की वहन क्षमता वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित की जानी चाहिए। जहां भूस्खलन का खतरा अधिक है, वहां निर्माण पर स्पष्ट प्रतिबंध होना चाहिए। नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में निर्माण रोकना होगा। बड़ी सड़क, सुरंग और जलविद्युत परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल एक परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि पूरी घाटी पर उनके संयुक्त प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। हर संवेदनशील हिमनदीय झील की चैबीसों घंटे निगरानी हो। उपग्रह, ड्रोन, स्वचालित सेंसर, मौसम केंद्र और स्थानीय लोगों की सूचनाओं को एक साथ जोड़कर वास्तविक समय की चेतावनी व्यवस्था बनाई जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात, चेतावनी केवल सरकारी कार्यालय तक नहीं पहुंचनी चाहिए। वह गांव के अंतिम घर तक पहुंचे। सायरन हो, मोबाइल संदेश हो, सुरक्षित मार्ग पहले से तय हों और स्थानीय युवाओं को बचाव का प्रशिक्षण मिले। सरकार को हिमालयी आपदाओं का एक सार्वजनिक राष्ट्रीय आंकड़ा केंद्र भी बनाना चाहिए, जिसमें प्रत्येक घटना के मृतक, घायल, लापता, विस्थापित, आर्थिक नुकसान, सड़क बंद होने की अवधि और पुनर्निर्माण की स्थिति दर्ज हो। आज केंद्र स्वयं स्वीकार करता है कि देशभर की आपदाओं में जान-माल के नुकसान का कोई केंद्रीय समेकित आंकड़ा उसके पास नहीं है और आंकड़े राज्यों से प्राप्त रिपोर्टों पर आधारित हैं।
केदारनाथ से चमोली, सिक्किम से हिमाचल और अब नेपाल तक हिमालय लगातार हमें एक ही संदेश दे रहा है, पहाड़ को केवल संसाधन समझकर उसके साथ व्यवहार नहीं किया जा सकता। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। सैकड़ों हिमनदीय झीलों का विस्तार हो रहा है। अत्यधिक वर्षा की घटनाएं गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं। भूस्खलन लगातार जीवन और बुनियादी ढांचे को प्रभावित कर रहे हैं। हिमालय को विकास से अलग करना समाधान नहीं है। समाधान है-हिमालय की प्रकृति के अनुरूप विकास। सड़कें बनें, लेकिन पहाड़ काटकर नहींय बिजली बने, लेकिन घाटियों की वहन क्षमता को नष्ट करके नहींय पर्यटन बढ़े, लेकिन प्रकृति की सीमा तोड़कर नहीं। क्योंकि सवाल यह नहीं है कि अगली आपदा आएगी या नहीं। सवाल यह है कि जब अगली आपदा आएगी, तब हम कितनी जानें बचाने के लिए तैयार होंगे। और उससे भी बड़ा सवाल है-’’क्या हम हिमालय को बचाने के लिए अपनी विकास की परिभाषा बदलने को तैयार हैं?’’

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 1 सितंबर 2026

कविता का स्तर-मंच से सोशल मीडिया तक

 लेख-

कविता मनुष्य की संवेदना, कल्पना और विचार की सबसे सघन अभिव्यक्तियों में से एक है। वह केवल तुकबंदी या भावुक शब्दों का समूह नहीं, बल्कि अपने समय, समाज और मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व को शब्द देने की कला है। इसलिए कविता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसे कितनी तालियाँ मिलीं, कितने लोगों ने उसे सुना या सोशल मीडिया पर कितने लोगों ने उसे लाइक और शेयर किया। आज कविता एक दिलचस्प संक्रमण के दौर से गुजर रही है। एक ओर कवि सम्मेलन और साहित्यिक मंच हैं, जहाँ कविता सामूहिक रूप से सुनी जाती है, दूसरी ओर फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल मंच हैं, जहाँ कविता कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक पहुँच जाती है। माध्यम बदला है, पाठक बदला है और प्रस्तुति का ढंग भी बदला है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न है-क्या कविता का स्तर भी बदल गया है?
मंच की कविता और उसका साहित्यिक अनुशासन
कभी कवि सम्मेलन केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं होते थे। वे साहित्यिक संस्कार के सार्वजनिक मंच थे। कवि अपनी रचना को बार-बार सँवारकर श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करता था। भाषा, छंद, लय, बिंब, प्रतीक और कथ्य पर पर्याप्त मेहनत की जाती थी। श्रोता भी कविता को सुनने और समझने की तैयारी के साथ आते थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य के संबंध को व्यापक सामाजिक जीवन और लोकमंगल से जोड़कर देखने पर जोर दिया। उनके आलोचनात्मक चिंतन में साहित्य का मूल्य केवल मनोरंजन में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के व्यापक हित से भी जुड़ता है। यही दृष्टि आज भी कविता के मूल्यांकन के लिए उपयोगी है। कविता कितनी लोकप्रिय है, यह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे पहले यह देखना जरूरी है कि कविता मनुष्य के अनुभव को कितनी गहराई से व्यक्त करती है। मंचीय कविता में हास्य, व्यंग्य, वीर रस, श्रृंगार और सामाजिक सरोकार सभी के लिए स्थान रहा है। समस्या हास्य या मनोरंजन में नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कविता का उद्देश्य केवल तत्काल तालियाँ प्राप्त करना रह जाए। तालियाँ कविता का पुरस्कार हो सकती हैं, लेकिन कविता की गुणवत्ता का प्रमाणपत्र नहीं।
तालियों से लोकप्रियता तक
मंच पर कवि की लोकप्रियता का एक बड़ा आधार उसकी प्रस्तुति होती है। प्रभावशाली आवाज, चेहरे के भाव, मंच संचालन और श्रोताओं से संवाद कविता के प्रभाव को बढ़ाते हैं। कई बार साधारण पंक्ति भी शानदार प्रस्तुति के कारण खूब तालियाँ बटोर लेती है और गंभीर कविता अपेक्षाकृत शांत प्रतिक्रिया के साथ समाप्त हो जाती है। यहाँ हमें लोकप्रियता और श्रेष्ठता के बीच का अंतर समझना होगा। हर लोकप्रिय कविता श्रेष्ठ नहीं होती और हर श्रेष्ठ कविता तत्काल लोकप्रिय हो, यह भी आवश्यक नहीं। साहित्य का प्रभाव कई बार धीरे-धीरे विकसित होता है। कुछ कविताएँ सुनते ही तालियाँ पाती हैं, जबकि कुछ कविताएँ सुनने के बाद पाठक के भीतर लंबे समय तक काम करती रहती हैं। नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने कविता के नए प्रतिमान के माध्यम से समकालीन कविता को परखने के लिए नए मानदंडों की आवश्यकता पर बल दिया था। उनके अनुसार आलोचना का काम केवल रचना की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसके रचनात्मक और वैचारिक पक्षों की पड़ताल करना भी है। इसलिए कविता को केवल मंचीय प्रभाव से नहीं, उसके कथ्य और शिल्प से भी परखा जाना चाहिए।
सोशल मीडिया ने बदली कविता की दुनिया
सोशल मीडिया ने कविता के सामने अभूतपूर्व संभावनाएँ खोल दी हैं। अब किसी कवि को अपनी कविता प्रकाशित कराने के लिए किसी पत्रिका के संपादकीय कार्यालय के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं। वह अपनी कविता स्वयं प्रकाशित कर सकता है और कुछ ही समय में देश-दुनिया के पाठकों तक पहुँच सकता है। डिजिटल माध्यम ने कविता को अधिक लोकतांत्रिक बनाया है। छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों से लिखने वाले अनेक रचनाकारों को पाठक मिले हैं। कविता की वीडियो प्रस्तुति ने उन लोगों को भी कविता से जोड़ा है, जो शायद पारंपरिक साहित्यिक गोष्ठियों तक कभी नहीं पहुँच पाते। हाल के एक आलोचनात्मक लेख में डॉ. सुशील कुमार शर्मा ने भी रेखांकित किया है कि डिजिटल युग ने साहित्य को बहुत तेजी से आम पाठक तक पहुँचाया है, लेकिन अनुशासन और आत्मचिंतन के अभाव में यही लोकतांत्रिक मंच साहित्य के लिए चुनौती भी बन सकता है। यही सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों है। यहाँ प्रवेश सबके लिए खुला है, लेकिन साहित्यिक कसौटी का द्वार स्वयं लेखक को बनाना पड़ता है।
लाइक-शेयर बनाम साहित्यिक गुणवत्ता
सोशल मीडिया ने कविता के मूल्यांकन की एक नई समस्या पैदा की है। कविता के नीचे हजारों लाइक दिखाई देते हैं तो हम उसे स्वतः अच्छी कविता मान लेते हैं। कोई कविता लाखों बार देखी जाती है तो उसे सफल समझ लिया जाता है। लेकिन क्या व्यूज साहित्यिक गुणवत्ता का पैमाना हैं? निश्चित रूप से नहीं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उस सामग्री को अधिक लोगों तक पहुँचाता है, जो तुरंत ध्यान आकर्षित करती है। छोटी, भावुक, चैंकाने वाली या आसानी से साझा की जा सकने वाली पंक्तियाँ तेजी से फैलती हैं। गंभीर और विचारप्रधान कविता को कई बार उतनी तत्काल लोकप्रियता नहीं मिलती। यहीं से एक दूसरी समस्या पैदा होती है। कविता और कथन के बीच का अंतर मिटने लगता है। किसी सामान्य जीवन-सूक्ति को चार पंक्तियों में तोड़ देना कविता नहीं बन जाता। प्रेम, अकेलापन, सफलता, असफलता या रिश्तों पर भावुक वाक्य लिख देना अभिव्यक्ति हो सकती है, लेकिन साहित्यिक कविता बनने के लिए उसमें भाषा का सौंदर्य, अनुभव की प्रामाणिकता, कल्पना और कलात्मक संरचना भी आवश्यक है। कविता लिखना आसान हो सकता है, अच्छी कविता लिखना कठिन है।
कविता का भविष्य, माध्यम नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण
आधुनिक हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह का उदाहरण यहाँ विशेष रूप से प्रासंगिक है। उनके काव्य में सामान्य जीवन, गाँव-कस्बे की संवेदना, सामाजिक यथार्थ और प्रकृति के प्रति गहरी चिंता दिखाई देती है। एक शोध-अध्ययन उन्हें आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख कवियों में रखते हुए उनकी कविता में ग्रामीण-कस्बाई संवेदना, यथार्थबोध और पर्यावरणीय चेतना को विशेष रूप से रेखांकित करता है। केदारनाथ सिंह का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने साधारण जीवन के अनुभवों को साधारण भाषा में लिखते हुए भी कविता को साधारण नहीं होने दिया। यही अंतर सोशल मीडिया की अनेक लोकप्रिय कविताओं और टिकाऊ साहित्य के बीच दिखाई देता है। नंदकिशोर नवल ने केदारनाथ सिंह की कविता में सुंदर और मूल्यवान चीजों के प्रति आकर्षण तथा दुनिया को बेहतर बनाने वाली शक्ति के प्रति आशावाद को महत्वपूर्ण माना है। आज के कवि के सामने चुनौती यही है कि वह सोशल मीडिया की तात्कालिक लोकप्रियता के दबाव में अपनी कविता की गंभीरता न खो दे। सोशल मीडिया को कविता का दुश्मन मानना भी गलत होगा और उसे कविता का अंतिम मानदंड मान लेना भी। मंच और सोशल मीडिया दोनों की अपनी उपयोगिता है। मंच कविता को सामूहिक श्रवण और जीवंत संवाद देता है। सोशल मीडिया उसे व्यापक पहुँच और नए पाठक देता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि माध्यम कविता पर हावी न हो जाए। कविता का स्तर लाइक, शेयर और व्यूज से नहीं तय होना चाहिए। उसे भाषा, संवेदना, विचार, शिल्प और समय की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। आलोचना की भूमिका भी इसी कारण आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर नामवर सिंह तक हिंदी आलोचना की परंपरा हमें यही सिखाती है कि साहित्य को उसके व्यापक संदर्भ, रचनात्मकता और सामाजिक अर्थों के साथ पढ़ा जाना चाहिए। नामवर सिंह स्वयं आलोचना को रचना के साथ गंभीर संवाद की प्रक्रिया मानते थे। अंततः कविता का माध्यम बदल सकता है, उसका पाठक बदल सकता है और उसकी प्रस्तुति का तरीका भी बदल सकता है, लेकिन अच्छी कविता की पहचान नहीं बदलती। वह मनुष्य के भीतर कुछ जगाती है, उसे सोचने पर विवश करती है और पढ़े या सुने जाने के बाद भी भीतर बनी रहती है। मंच की तालियाँ क्षणिक हैं, सोशल मीडिया के व्यूज भी। लेकिन सच्ची कविता समय से संवाद करती है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कविता मंच पर बेहतर है या सोशल मीडिया पर। असली प्रश्न यह है कि हम कविता को लोकप्रिय बनाने के साथ-साथ श्रेष्ठ बनाने की चिंता भी कर रहे हैं या नहीं। यदि कविता के साथ साहित्यिक अनुशासन, आत्मालोचन और भाषा के प्रति ईमानदारी बनी रहती है तो सोशल मीडिया कविता के पतन का माध्यम नहीं, उसके विस्तार का सबसे शक्तिशाली माध्यम सिद्ध हो सकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)