मंगलवार, 18 अगस्त 2026

बदलते समय में रक्षा के अर्थ की तलाश

 रक्षाबंधन पर्व 28 अगस्त पर विशेष लेख-

रक्षाबंधन को सामान्यतः भाई-बहन के प्रेम का पर्व कहा जाता है। बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन यदि हम इस पर्व को केवल इसी परंपरा तक सीमित कर दें तो शायद उसके व्यापक अर्थ को समझने से चूक जाएँगे। रक्षाबंधन की यात्रा बहुत लंबी है। इसका मूल रक्षा-सूत्र की प्राचीन परंपरा में दिखाई देता है, पुराणों ने इसे धार्मिक आख्यानों से जोड़ा, लोकजीवन ने इसे भाई-बहन के रिश्ते का पर्व बनाया और आधुनिक भारत में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे सामाजिक एकता का प्रतीक तक बना दिया। आज जब परिवारों के भीतर संवाद कम हो रहा है, सामाजिक तनाव बढ़ रहे हैं और रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिक होते जा रहे हैं, तब रक्षाबंधन की उपयोगिता पहले से कहीं अधिक दिखाई देती है। जरूरत केवल इस बात की है कि हम “रक्षा” शब्द का अर्थ समय के साथ बदलकर समझें।
रक्षा-सूत्र की प्राचीन परंपरा
रक्षाबंधन का कोई एक निश्चित ऐतिहासिक आरंभ-वर्ष बताना कठिन है। इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय परंपरा के रक्षा-सूत्र में मिलती हैं। वैदिक और उत्तरवैदिक परंपराओं में अनिष्ट से बचाने और मंगलकामना के लिए पवित्र सूत्र बाँधने की परंपरा रही है। बाद के ग्रंथों में श्रावण पूर्णिमा को रक्षा-सूत्र बाँधने की परंपरा के उल्लेख मिलते हैं। भविष्य पुराण से जुड़ी प्रसिद्ध कथा में देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी द्वारा इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधने का उल्लेख आता है। यहाँ राखी भाई-बहन के संबंध का प्रतीक नहीं, बल्कि संकट से रक्षा और विजय की कामना का प्रतीक है। यही बात रक्षाबंधन के मूल अर्थ की ओर संकेत करती है। रक्षा का अर्थ प्रारंभ से ही केवल किसी एक व्यक्ति की रक्षा करना नहीं था, यह कल्याण और सुरक्षा की व्यापक कामना थी।
कृष्ण-द्रौपदी से लेकर लोकजीवन तक
कृष्ण और द्रौपदी की कथा रक्षाबंधन के साथ सबसे लोकप्रिय रूप से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार कृष्ण की उँगली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। कृष्ण ने इस स्नेह को स्वीकार किया और द्रौपदी के प्रति संरक्षण का भाव रखा। ऐतिहासिक दृष्टि से इसे आधुनिक रक्षाबंधन की शुरुआत का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन भारतीय लोकमानस ने इस कथा में राखी के भाव को पहचान लिया यानी संकट में साथ खड़े होना। लक्ष्मी-बलि और यम-यमुना जैसी कथाएँ भी इस पर्व के अर्थ को अलग-अलग रूपों में सामने लाती हैं। इन कथाओं की ऐतिहासिकता से अलग उनका सांस्कृतिक संदेश स्पष्ट है यानी रिश्ते केवल नाम के नहीं होते, उनमें दायित्व भी जुड़े होते हैं।
भाई-बहन का पर्व कैसे बना
समय के साथ रक्षा-सूत्र की व्यापक परंपरा का एक महत्वपूर्ण रूप भाई-बहन के संबंध से जुड़ गया। विशेष रूप से उत्तर भारतीय सामाजिक जीवन में विवाह के बाद बहन का मायके से संबंध बनाए रखने में भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्ष में एक बार बहन का मायके आना, भाई की कलाई पर राखी बाँधना और दोनों का एक-दूसरे के प्रति दायित्व दोहराना सामाजिक संबंधों को मजबूत करता था। इस दृष्टि से राखी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी। वह परिवार की स्मृति और संबंधों की पुनर्पुष्टि का अवसर भी थी। लेकिन आज इस परंपरा को एक नए अर्थ की आवश्यकता है। यदि हम अब भी यह मानें कि केवल भाई ही रक्षक है और बहन केवल संरक्षण पाने वाली है, तो हम आधुनिक सामाजिक वास्तविकता से पीछे रह जाएँगे। आज बहन भी भाई की उतनी ही बड़ी ताकत बन सकती है। इसलिए आधुनिक राखी का संदेश होना चाहिए-“हम एक-दूसरे की रक्षा और सहायता करेंगे।”
कर्णावती और हुमायूँ की कहानी
रक्षाबंधन के साथ रानी कर्णावती और हुमायूँ की कहानी भी लोकप्रिय है। कहा जाता है कि मेवाड़ पर संकट के समय कर्णावती ने हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता माँगी थी। हालांकि इतिहासकार इस कथा के विवरण और प्रमाणों को लेकर सावधानी बरतते हैं, इसलिए इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य कहना उचित नहीं होगा। फिर भी इस कथा का सांस्कृतिक महत्व है। यह बताती है कि राखी की कल्पना रक्त संबंधों से आगे जाकर विश्वास और संरक्षण के रिश्ते के रूप में भी की गई।
जब ठाकुर ने राखी को बना दिया एकता का प्रतीक
रक्षाबंधन का आधुनिक इतिहास 1905 में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेता है। ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया। इस विभाजन के विरोध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राखी को हिंदू-मुस्लिम एकता और बंगाल की अखंडता का प्रतीक बनाया। उन्होंने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बाँधने का आह्वान किया। इस तरह राखी का अर्थ परिवार से निकलकर समाज तक पहुँच गया। एक हिंदू दूसरे मुसलमान की कलाई पर राखी बाँध सकता था और दोनों यह कह सकते थे कि हम एक-दूसरे के साथ हैं। यह प्रसंग आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। जब धर्म, जाति, भाषा और राजनीतिक विचारों के आधार पर समाज में दूरी पैदा होती दिखाई देती है, तब ठाकुर का संदेश हमें याद दिलाता है कि रक्षा केवल व्यक्ति की नहीं, सामाजिक सद्भाव की भी करनी होती है।
भारत में हर जगह एक जैसी राखी क्यों नहीं?
भारत की विविधता के कारण श्रावण पूर्णिमा का स्वरूप भी हर क्षेत्र में समान नहीं रहा। महाराष्ट्र और कोंकण के तटीय क्षेत्रों में नारली पूर्णिमा प्रमुख है। मछुआरा समुदाय समुद्र और वरुण की पूजा करता है तथा नारियल अर्पित करता है। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इसी समय अवनि अवित्तम या उपाकर्म की परंपरा प्रमुख है, जिसमें यज्ञोपवीत परिवर्तन और वैदिक अध्ययन से जुड़े संस्कार होते हैं। ओडिशा में गम्हा पूर्णिमा का अपना सांस्कृतिक महत्व है, जिसका संबंध स्थानीय धार्मिक, कृषि और पशुधन परंपराओं से है। पश्चिम बंगाल में इसी समय झूलन पूर्णिमा की वैष्णव परंपरा भी महत्वपूर्ण रही है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इन क्षेत्रों में रक्षाबंधन “मनाया ही नहीं जाता।” अधिक सटीक बात यह है कि एक ही तिथि को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग सांस्कृतिक परंपराएँ प्रमुख रही हैं।
आज के संदर्भ में रक्षा का अर्थ
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज रक्षाबंधन की उपयोगिता क्या है? आज महिला को केवल पुरुष की शारीरिक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। उसे सम्मान, समान अवसर, स्वतंत्र निर्णय, शिक्षा और सुरक्षित सामाजिक वातावरण चाहिए। इसी तरह पुरुष भी भावनात्मक सुरक्षा, पारिवारिक सहयोग और विश्वास चाहता है। इसलिए आज राखी का अर्थ होना चाहिए-सुरक्षा नहीं, पारस्परिक सहारा। भाई बहन के साथ खड़ा हो और बहन भाई के साथ। एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझना, बीमारी या आर्थिक संकट में साथ देना, अकेलेपन में बातचीत करना और जीवन के निर्णयों में सम्मान देना, यही आज की वास्तविक रक्षा है।
परिवार में संवाद का पर्व
आज परिवार एक छत के नीचे रहते हुए भी कई बार एक-दूसरे से दूर हैं। मोबाइल, सामाजिक माध्यम और व्यस्त जीवन ने संवाद का स्थान कम कर दिया है। ऐसे समय में रक्षाबंधन परिवार को फिर से एक साथ बैठने का बहाना देता है। जरूरी नहीं कि राखी के साथ महँगा उपहार दिया जाए। कभी-कभी एक घंटा साथ बैठना, पुराने दिनों को याद करना और यह पूछ लेना कि “तुम सचमुच ठीक हो?” किसी भी महँगे उपहार से अधिक मूल्यवान हो सकता है।
रक्षा केवल बहन की नहीं
आज हमें यह भी समझना होगा कि समाज में अनेक लोग भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा की जरूरत महसूस करते हैं। बुजुर्ग, अकेले रहने वाले लोग, आर्थिक कठिनाइयों से गुजरते परिवार, बच्चे और वे लोग जो किसी कारण से समाज के हाशिए पर हैं। यदि रक्षाबंधन हमें किसी कमजोर व्यक्ति के साथ खड़े होने की प्रेरणा देता है तो यह पर्व अपने मूल अर्थ के और निकट पहुँचता है। रक्षाबंधन की हजारों वर्षों की यात्रा में इसका अर्थ लगातार विस्तृत हुआ है। प्राचीन रक्षा-सूत्र से शुरू होकर यह पुराणिक कथाओं, लोकजीवन, भाई-बहन के संबंध और फिर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के माध्यम से सामाजिक एकता तक पहुँचा। रक्षा का अर्थ अब केवल यह नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा। रक्षा का अर्थ यह है कि मनुष्य मनुष्य के साथ खड़ा होगा। रिश्तों की रक्षा होगी। सम्मान की रक्षा होगी। स्त्री की गरिमा की रक्षा होगी। बुजुर्गों की उपेक्षा से रक्षा होगी। बच्चों के भविष्य की रक्षा होगी। समाज में सद्भाव की रक्षा होगी और सबसे बढ़कर मानवीय संवेदना की रक्षा होगी। राखी का धागा बहुत पतला होता है, लेकिन वह हमें एक बहुत मजबूत बात याद दिलाता है कि रिश्ते खून से बन सकते हैं, पर विश्वास और जिम्मेदारी से टिकते हैं। इसलिए इस रक्षाबंधन पर यदि भाई बहन की कलाई पर राखी बाँधते हुए केवल इतना कह दे-“जब भी जरूरत होगी, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा” और बहन भी यही वचन भाई को दे दे, तो शायद सदियों पुरानी इस परंपरा को आज के समय का सबसे सुंदर अर्थ मिल जाए। क्योंकि वास्तविक रक्षा कलाई पर बँधे धागे से नहीं, मुश्किल समय में थामे गए हाथ से होती है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 11 अगस्त 2026

रूस की फैक्ट्रियों में ‘गुलाम ब्रिगेड’

 समसामयिक लेख-

दुनिया के सबसे बंद और दमनकारी देशों में गिने जाने वाले उत्तर कोरिया की तस्वीर आमतौर पर मिसाइलों, परमाणु हथियारों और तानाशाह किम जोंग उन की सैन्य परेडों के साथ सामने आती है। लेकिन इस चमकदार सैन्य शक्ति के पीछे एक और भयावह व्यवस्था चलती है, अपने नागरिकों को विदेशों में काम करने भेजना और उनके श्रम से विदेशी मुद्रा अर्जित करना। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यह व्यवस्था एक नए और अधिक चिंताजनक रूप में दिखाई दे रही है। रूस में श्रमिकों की कमी और उत्तर कोरिया-रूस के बढ़ते सैन्य गठजोड़ के बीच उत्तर कोरियाई नागरिकों के रूस पहुंचने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। निर्माण स्थलों से लेकर माल-वितरण केंद्रों और दूसरे श्रम-प्रधान क्षेत्रों तक उत्तर कोरियाई कामगारों की मौजूदगी दर्ज की गई है। इनमें महिलाओं की मौजूदगी ने विशेष चिंता पैदा की है। वर्ष 2025 में रूस की ऑनलाइन खरीद-बिक्री कंपनी ‘वाइल्डबेरीज’ के एक माल-वितरण केंद्र में सैकड़ों उत्तर कोरियाई महिलाओं के कथित रूप से काम करने की खबर सामने आई थी। हालांकि कंपनी ने विदेशी श्रमिकों के एक परीक्षण कार्यक्रम की बात स्वीकार की थी, लेकिन इन महिलाओं की उत्तर कोरियाई पहचान और उनकी वास्तविक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई थी।
पासपोर्ट से लेकर मजदूरी तक पर नियंत्रण
वर्ष 2026 में ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ की एक महत्वपूर्ण जांच ने इस पूरे तंत्र की भयावहता पर नया प्रकाश डाला है। संगठन ने रूस के तीन शहरों में निर्माण स्थलों पर काम कर चुके 21 उत्तर कोरियाई श्रमिकों के साक्षात्कार किए। उनके अनुसार रूस पहुंचने के बाद उनके पासपोर्ट जब्त कर लिए गए और उन्हें प्रतिदिन 12 से 16 घंटे तक काम करना पड़ा। कुछ श्रमिकों ने वर्ष में 364 दिन तक काम करने की बात कही। यहां सवाल सिर्फ लंबे काम के घंटों का नहीं है। असली सवाल है, क्या इन श्रमिकों को अपने श्रम और अपनी कमाई पर अधिकार है? ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ की रिपोर्ट के अनुसार कुछ श्रमिक लगभग 800 डॉलर अर्थात करीब 67 हजार रुपये प्रतिमाह की मजदूरी अर्जित करते थे, लेकिन उत्तर कोरियाई सरकार अनिवार्य कोटे और दूसरी कटौतियों के जरिए लगभग 600 डॉलर तक ले लेती थी। कुछ मामलों में श्रमिक के हाथ में महीने के अंत में केवल लगभग 10 डॉलर यानी करीब 850 रुपये ही बचते थे। उत्तर कोरिया विशेषज्ञ येझी किम ने एक बातचीत में बताया कि कुछ श्रमिकों को प्रतिदिन 16 घंटे तक काम करना पड़ता है, उन्हें छुट्टी नहीं मिलती और उनके हाथ में महीने के अंत में बहुत मामूली रकम बचती है। उनका आकलन इस बात की ओर संकेत करता है कि विदेश भेजे गए श्रमिकों की कमाई पर प्योंगयांग का नियंत्रण बेहद कठोर है।
‘गुलामी’ शब्द क्यों इस्तेमाल हो रहा है?
यहां ‘गुलाम’ शब्द केवल भावनात्मक विशेषण नहीं है। मानवाधिकार संगठनों ने जिन परिस्थितियों का वर्णन किया है, उनमें जबरन श्रम के कई संकेत दिखाई देते हैं। जैसे, आवागमन पर प्रतिबंध, दस्तावेजों पर नियंत्रण, लगातार निगरानी, अत्यधिक लंबे काम के घंटे और मजदूरी का बड़ा हिस्सा राज्य द्वारा अपने नियंत्रण में लेना। मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की वरिष्ठ शोधकर्ता लीना यून ने उत्तर कोरिया के विदेश भेजे जाने वाले श्रमिकों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनके अनुसार उत्तर कोरियाई सरकार देश के भीतर और विदेशों में श्रम तथा निगरानी के जरिए अपने नागरिकों का शोषण करती है। लीना यून का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उत्तर कोरिया के साथ संबंधों में केवल मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और विदेशों में तैनात उत्तर कोरियाई नागरिकों की स्थिति को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।
किम जोंग उन के लिए मजदूर भी विदेशी मुद्रा का स्रोत
उत्तर कोरिया पर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हैं। इसलिए विदेशी मुद्रा हासिल करना उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। विदेशों में श्रमिक भेजना प्योंगयांग के लिए इसी आर्थिक रणनीति का हिस्सा रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने पहले भी रूस की कंपनियों और उत्तर कोरियाई संस्थाओं पर कार्रवाई करते हुए कहा था कि वे उत्तर कोरियाई जबरन श्रम के विदेशों में निर्यात में शामिल थे और इससे प्राप्त आय उत्तर कोरियाई सरकार अथवा सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी तक पहुंचती थी। वर्ष 2026 में ‘सिटिजन्स अलायंस फॉर नॉर्थ कोरियन ह्यूमन राइट्स’ की एक जांच ने रूस में उत्तर कोरिया से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का दावा किया। संगठन के अनुसार रूस में उत्तर कोरिया से जुड़ी अनेक सैन्य एवं सुरक्षा कंपनियों तथा बड़ी संख्या में रूसी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों और वित्तीय संस्थाओं के बीच ऐसा नेटवर्क मौजूद है, जो श्रमिकों की तैनाती से मिलने वाले राजस्व को उत्तर कोरिया के सैन्य और परमाणु कार्यक्रमों से जोड़ता है। इसका अर्थ यह है कि किसी रूसी निर्माण स्थल पर ईंट लगाने वाला मजदूर केवल एक मजदूर नहीं रह जाता। उसके श्रम से उत्पन्न धन का एक हिस्सा उस शासन की आर्थिक क्षमता बढ़ा सकता है, जो परमाणु हथियार और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम चला रहा है।
यूक्रेन युद्ध ने बदली पूरी तस्वीर
रूस के लिए भी यह व्यवस्था सुविधाजनक है। यूक्रेन युद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी पैदा की है। निर्माण, माल-वितरण, कारखानों और दूसरे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में अतिरिक्त हाथों की जरूरत बढ़ी है। रूस और उत्तर कोरिया के बीच वर्ष 2024 में हुई व्यापक रणनीतिक साझेदारी ने दोनों देशों को एक-दूसरे की जरूरतों के और करीब ला दिया। उत्तर कोरिया रूस को हथियार और सैनिक उपलब्ध करा रहा है, जबकि रूस के साथ आर्थिक और राजनीतिक सहयोग प्योंगयांग को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दबाव से राहत देता दिखाई देता है। रॉयटर्स की 6 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार रूस के युद्ध प्रयासों में उत्तर कोरिया की भूमिका काफी बढ़ गई है। हजारों उत्तर कोरियाई सैनिकों के अलावा निर्माण और अन्य कार्यों के लिए भी उत्तर कोरियाई कर्मियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। इसलिए रूस में उत्तर कोरियाई श्रमिकों का प्रश्न अब केवल ‘मजदूरों की कमी’ का प्रश्न नहीं है। यह रूस-उत्तर कोरिया की व्यापक रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध और रूस की भूमिका
सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि उत्तर कोरियाई नागरिकों को विदेशों में रोजगार दिलाने की व्यवस्था पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रतिबंध लगाए हैं। सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 2397 के तहत उत्तर कोरियाई नागरिकों को विदेशों में आय अर्जित करने के लिए भेजने की व्यवस्था पर रोक लगाई गई थी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि विदेशों में काम करने वाले उत्तर कोरियाई नागरिकों से प्राप्त विदेशी मुद्रा प्योंगयांग के हथियार कार्यक्रमों तक न पहुंचे। लेकिन आज स्थिति यह है कि उसी रूस के साथ उत्तर कोरिया का संबंध इतना गहरा हो गया है कि इन प्रतिबंधों को लागू कराना बेहद कठिन हो गया है। यही कारण है कि इस पूरे मामले को केवल ‘मजदूरों के शोषण’ के रूप में देखना अधूरा होगा। यह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध व्यवस्था की कमजोरी और बदलती वैश्विक राजनीति का भी उदाहरण है।
महिलाएं सबसे आसान निशाना?
उत्तर कोरियाई महिलाओं की स्थिति इस कहानी को और गंभीर बनाती है। ‘वाइल्डबेरीज’ के मामले में सामने आई तस्वीरों और रिपोर्टों में एक जैसी पोशाक पहने महिलाओं को समूहों में काम करते दिखाया गया था। उनके साथ पुरुष पर्यवेक्षकों की मौजूदगी और नियंत्रित आवागमन की खबरों ने सवाल खड़े किए। हालांकि इन दावों का हर हिस्सा स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है, इसलिए इन्हें अंतिम तथ्य के बजाय आरोप और रिपोर्ट के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन व्यापक उत्तर कोरियाई श्रम व्यवस्था को लेकर उपलब्ध प्रमाण कहीं अधिक मजबूत हैं। ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ के अनुसार उत्तर कोरिया के भीतर भी महिलाओं समेत विभिन्न वर्गों से जबरन श्रम कराया जाता है। विदेशों में भेजे गए श्रमिकों के मामले में पासपोर्ट, आवाजाही और संपर्क पर नियंत्रण इस व्यवस्था को और कठोर बनाता है।
परिवार बन जाता है ‘गारंटी’
इस व्यवस्था का सबसे भयावह पक्ष शायद वह है जो कारखाने की दीवारों के बाहर दिखाई ही नहीं देता। ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ के अनुसार रूस में काम करने वाले उत्तर कोरियाई श्रमिकों पर केवल व्यक्तिगत निगरानी ही नहीं रहती। भागने या विरोध करने की स्थिति में उत्तर कोरिया में उनके परिवारों को भी रोजगार, आवास, आर्थिक दंड, पूछताछ और अन्य दमन का सामना करना पड़ सकता है। अर्थात एक श्रमिक रूस में बंद है तो उसके परिवार की जिंदगी उत्तर कोरिया में बंधक बनी रहती है। यही वह तंत्र है जो श्रमिक को भागने से रोकता है, भले ही वह स्वयं रूस की किसी फैक्ट्री या निर्माण स्थल से बाहर निकलना चाहता हो।
दो सरकारों का हित, मजदूर का नुकसान
यह पूरा मॉडल तीन स्तरों पर काम करता दिखाई देता है। पहला, रूस को सस्ते और अनुशासित श्रमिक मिलते हैं। दूसरा, उत्तर कोरियाई शासन को विदेशी मुद्रा मिलती है। तीसरा, दोनों देशों के बीच बढ़ता रणनीतिक गठजोड़ प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बावजूद मजबूत होता है।
नुकसान किसका है?
उस मजदूर का, जो 12-16 घंटे काम करता है। उस महिला का, जिसकी आवाजाही नियंत्रित है। उस परिवार का, जो उत्तर कोरिया में रहकर किसी संभावित विद्रोह की कीमत चुका सकता है। और अंततः उस वैश्विक व्यवस्था का, जिसने जबरन श्रम को रोकने के लिए नियम बनाए थे।
क्या यह आधुनिक गुलामी है?
कानूनी और मानवाधिकार विशेषज्ञों के लिए आधुनिक गुलामी की पहचान केवल यह नहीं है कि मजदूरी कम है। सवाल है-क्या व्यक्ति अपनी नौकरी छोड़ सकता है? क्या वह अपने दस्तावेज अपने पास रख सकता है? क्या वह स्वतंत्र रूप से घूम सकता है? क्या उसे अपनी कमाई पर अधिकार है? क्या वह विरोध करने पर सुरक्षित रहता है? रूस में उत्तर कोरियाई श्रमिकों के संबंध में उपलब्ध वर्ष 2026 की जांचों में इन सवालों के जवाब बेहद चिंताजनक हैं। ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ ने अपने शोध में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के जबरन श्रम के संकेतकों का इस्तेमाल किया और निगरानी, दबाव तथा राज्य नियंत्रण की व्यापक व्यवस्था का उल्लेख किया है। इसलिए ‘आधुनिक गुलामी’ शब्द को केवल सनसनी पैदा करने वाला शब्द मानकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा। रूस को मजदूर चाहिए और उत्तर कोरिया को विदेशी मुद्रा। यूक्रेन युद्ध ने दोनों की जरूरतों को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। लेकिन सवाल यह है कि इस सौदे में मजदूर की स्वतंत्रता कहां है? एक लोकतांत्रिक दुनिया के लिए यह बेहद असहज सवाल है कि 21वीं सदी में कोई सरकार अपने नागरिकों को हजारों किलोमीटर दूर भेजे, उनके दस्तावेज अपने पास रखे, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा ले और उनके परिवारों को नियंत्रण के साधन के रूप में इस्तेमाल करे और फिर भी यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय राजनीति की परतों में छिपी रहे। किम जोंग उन के लिए यह विदेशी मुद्रा का कारोबार हो सकता है। रूस के लिए यह श्रमिकों की कमी दूर करने का रास्ता हो सकता है। लेकिन उन महिलाओं और पुरुषों के लिए, जो इन कारखानों और निर्माण स्थलों में काम कर रहे हैं, यह उनकी जिंदगी, मेहनत और स्वतंत्रता की कीमत पर होने वाला सौदा है। और शायद इस कहानी का सबसे भयावह पहलू यही है इन मजदूरों का श्रम दिखाई देता है, लेकिन उनका अधिकार नहीं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

विष पीने वाला ही कहलाता है शिव

 महाशिवरात्रि पर विशेष लेख-

आज के दौर में शिवत्व का वास्तविक अर्थ
महाशिवरात्रि केवल व्रत, जलाभिषेक और मंदिरों में दर्शन का पर्व नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर भी है। भगवान शिव का सम्पूर्ण व्यक्तित्व त्याग, धैर्य, करुणा, न्याय और लोककल्याण का प्रतीक है। समुद्र मंथन के समय जब अमृत से पहले कालकूट विष निकला और उसके प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई, तब देवता और दानव दोनों पीछे हट गए। ऐसे समय में भगवान शिव ने वह विष स्वयं ग्रहण कर लिया। उन्होंने विष को न तो निगला और न ही उगला, बल्कि अपने कंठ में धारण किया। तभी से वे नीलकंठ कहलाए। यह प्रसंग आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि आज संसार में विष का स्वरूप बदल गया है। अब यह विष नफरत, हिंसा, असहिष्णुता, झूठ, स्वार्थ, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और मानसिक तनाव के रूप में हमारे सामने है। शिवपुराण, भागवत पुराण और महाभारत में समुद्र मंथन का वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों में स्पष्ट संकेत है कि समाज के कल्याण के लिए त्याग करने वाला ही सच्चा नेतृत्व करता है। भारतीय दर्शन में भगवान शिव को संहारक नहीं, बल्कि परिवर्तन के देवता माना गया है। उनका विषपान यह संदेश देता है कि समाज में उत्पन्न नकारात्मकता को समाप्त करने के लिए किसी को उसका भार उठाना ही पड़ता है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-‘लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि।’ अर्थात समाज के हित को ध्यान में रखकर कर्म करना ही श्रेष्ठ है। यद्यपि यह श्लोक सीधे शिव से संबंधित नहीं है, लेकिन लोककल्याण की वही भावना शिव के विषपान में दिखाई देती है। अक्सर लोग विष पीने का अर्थ केवल अन्याय सहना समझ लेते हैं, जबकि धर्मग्रंथ ऐसा नहीं कहते। शिव करुणा के साथ-साथ न्याय के भी प्रतीक हैं। जब अधर्म बढ़ता है तो वही शिव रौद्र रूप धारण करते हैं। अर्थात शिव का संदेश यह है कि समाज की कटुता को अपने भीतर घृणा न बनने दें, लेकिन अन्याय का साहसपूर्वक प्रतिकार अवश्य करें।
आज का विष कैसा है?
आज समाज अनेक प्रकार के विष से घिरा है, जैसे-
1.सोशल मीडिया पर झूठी खबरें और नफरत फैलाने वाले संदेश।
2.छोटी-छोटी बातों पर हिंसा और असहिष्णुता।
3.राजनीतिक कटुता का सामाजिक संबंधों पर प्रभाव।
4.परिवारों में संवाद का अभाव।
5.पर्यावरण प्रदूषण और प्रकृति का दोहन।
6.युवाओं में अवसाद, अकेलापन और मानसिक तनाव।
7.भ्रष्टाचार और नैतिक मूल्यों का हृास।
इन परिस्थितियों में जो व्यक्ति धैर्य, विवेक और संयम बनाए रखकर समाज को जोड़ने का प्रयास करता है, वही आधुनिक अर्थों में शिवत्व का पालन कर रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में देश ने अनेक ऐसी घटनाएँ देखी हैं, जहाँ धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक मतभेदों ने तनाव का रूप लिया। सोशल मीडिया पर अफवाहों ने कई बार वास्तविक जीवन में हिंसा को जन्म दिया। सड़क पर मामूली विवाद भी कभी-कभी गंभीर संघर्ष में बदल जाते हैं। ऐसे समय में समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि समाधान का मार्ग चुनें। जो कटु भाषा का उत्तर कटुता से न दें, बल्कि विवेक और संवाद से दें। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे, ‘शक्ति वही है जो दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझे।’ शिव का विषपान इसी करुणा का सर्वोच्च उदाहरण है। महात्मा गांधी का मानना था कि घृणा का उत्तर घृणा से नहीं दिया जा सकता। यद्यपि गांधीजी ने शिव के विषपान पर विशेष टिप्पणी नहीं की, पर उनका अहिंसा का सिद्धांत इसी भावना से जुड़ता है कि नकारात्मकता का उत्तर सकारात्मकता से दिया जाए। आध्यात्मिक गुरु स्वामी चिन्मयानंद ने कहा था कि समुद्र मंथन मनुष्य के मन का प्रतीक है। जब मन का मंथन होता है तो पहले भीतर का विष यानी क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार बाहर आता है। जो उसे नियंत्रित कर लेता है, वही आत्मविकास की ओर बढ़ता है। श्री श्री रविशंकर भी अनेक अवसरों पर कह चुके हैं कि शिव का अर्थ है असीम चेतना। भीतर के क्रोध और तनाव को साध लेना ही शिवत्व की दिशा है।
शिवरात्रि हमें क्या सिखाती है?
शिवरात्रि केवल पूरी रात जागने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर जागने का अवसर है। यदि इस दिन हम यह संकल्प लें-मैं झूठ नहीं फैलाऊँगा। मैं कटु भाषा का प्रयोग नहीं करूँगा। मैं पर्यावरण की रक्षा करूँगा। मैं परिवार और समाज में संवाद बढ़ाऊँगा। मैं कठिन परिस्थितियों में भी संयम रखूँगा तो यही सच्ची शिवभक्ति होगी। मंदिर में जल चढ़ाना आस्था है, लेकिन किसी प्यासे को जल पिलाना शिव के संदेश को जीवन में उतारना है। बेलपत्र अर्पित करना पूजा है, लेकिन समाज से ईष्र्या, द्वेष और हिंसा का विष कम करना उससे भी बड़ी साधना है।
आज समाज को शिव क्यों चाहिए?
आज दुनिया तकनीकी रूप से जितनी विकसित हुई है, मानसिक रूप से उतनी ही बेचैन भी दिखाई देती है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संतोष घटा है। संवाद बढ़ा है, पर समझ कम हुई है। ऐसे समय में शिव का संदेश केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय आवश्यकता बन गया है। आज हमें ऐसे शिक्षक चाहिएं जो छात्रों का तनाव समझें, ऐसे माता-पिता चाहिएं जो बच्चों को समय दें, ऐसे नेता चाहिएं जो समाज को जोड़ें, ऐसे पत्रकार चाहिएं जो सत्य और संतुलन का पालन करें और ऐसे नागरिक चाहिएं जो मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करें। यही आधुनिक शिवत्व है।
भगवान शिव का विषपान केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए एक शाश्वत आदर्श है। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय को स्वीकार कर लिया जाए, बल्कि यह है कि समाज के हित में अपने अहंकार, क्रोध और स्वार्थ पर नियंत्रण रखा जाए तथा आवश्यकता पड़ने पर धर्म और न्याय की रक्षा के लिए साहसपूर्वक खड़ा हुआ जाए। महाशिवरात्रि हमें यही संदेश देती है कि यदि हम अपने भीतर के विष यानी क्रोध, ईष्र्या, द्वेष, असत्य और अहंकार का मंथन कर उसे नियंत्रित कर लें, तो प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में शिवत्व का स्पर्श पा सकता है। सच तो यह है कि आज समाज को मंदिरों में जितने शिव चाहिएं, उससे कहीं अधिक चरित्र में शिव चाहिएं। क्योंकि विष पीने वाला ही नहीं, बल्कि विष को समाज में फैलने से रोकने वाला ही वास्तव में शिव कहलाने का अधिकारी है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

बुधवार, 5 अगस्त 2026

कांवड़ यात्रा-आस्था का सम्मान, आमजन परेशान, समाधान कब

 आवश्यक लेख-

हर वर्ष स्कूलों की बंदी, यातायात अव्यवस्था और जनजीवन पर असर के बीच संतुलित व्यवस्था की जरूरत

भारत विविध आस्थाओं और सांस्कृतिक परंपराओं का देश है। इन्हीं परंपराओं में श्रावण मास में आयोजित होने वाली कांवड़ यात्रा सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में से एक है। हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख, सुल्तानगंज सहित विभिन्न तीर्थों से करोड़ों शिवभक्त गंगाजल लेकर अपने-अपने शिवालयों तक पहुँचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय लोक आस्था का विराट स्वरूप भी है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा के दौरान स्कूल-कॉलेजों की बंदी, लंबा ट्रैफिक जाम, व्यापार पर असर, मरीजों की परेशानी और कानून-व्यवस्था से जुड़े प्रश्न लगातार चर्चा का विषय बने हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आस्था और सामान्य जनजीवन के बीच बेहतर संतुलन स्थापित नहीं किया जा सकता?
पिछले एक दशक में बढ़ा यात्रा का दायरा
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दस वर्षों में कांवड़ यात्रा का स्वरूप पहले की तुलना में कहीं अधिक विशाल हुआ है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और बिहार सहित अनेक राज्यों से करोड़ों श्रद्धालु इसमें भाग लेने लगे हैं। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था, यातायात नियंत्रण और प्रशासनिक चुनौतियाँ भी कई गुना बढ़ गई हैं। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के अनेक जिलों में यात्रा के दौरान कई दिनों तक स्कूल-कॉलेज बंद रखने के आदेश जारी किए जाते रहे हैं। प्रशासन का तर्क है कि लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ और मार्ग परिवर्तन के कारण विद्यार्थियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। वहीं अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि हर वर्ष शिक्षा प्रभावित होना दीर्घकालीन समाधान नहीं हो सकता। कांवड़ यात्रा के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यातायात व्यवस्था होती है। राष्ट्रीय राजमार्गों और प्रमुख सड़कों पर कई किलोमीटर लंबे जाम आम बात बन जाते हैं। कार्यालय जाने वाले कर्मचारियों, व्यापारियों और दैनिक यात्रियों को घंटों सड़क पर बिताने पड़ते हैं। इसके अलावा स्कूल और कॉलेज कई दिनों तक बंद रहते हैं। अस्पताल पहुँचने में मरीजों और एम्बुलेंस को कठिनाई होती है। छोटे व्यापारियों और दैनिक मजदूरों की आय प्रभावित होती है। सार्वजनिक परिवहन बाधित होने से यात्रियों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। कई स्थानों पर छोटी-छोटी घटनाएँ भी कानून-व्यवस्था की चुनौती बन जाती हैं। हालाँकि यह भी सच है कि अधिकांश कांवड़िये पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ यात्रा पूरी करते हैं। विवाद और हिंसा की घटनाएँ सीमित संख्या में होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है।
पिछले दस वर्षों की प्रमुख घटनाएँ
-वर्ष 2016 और 2017 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ स्थानों पर कांवड़ियों और वाहन चालकों के बीच विवाद तथा तोड़फोड़ की घटनाएँ सामने आईं।
-2018 और 2019 में दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे तथा अन्य मार्गों पर कई घंटे तक जाम लगा। कई जिलों में विद्यालयों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
-2020 और 2021 में कोविड-19 महामारी के कारण यात्रा सीमित रही और कई राज्यों ने प्रतिबंध लगाए।
-2022 से यात्रा फिर सामान्य रूप से प्रारंभ हुई और करोड़ों श्रद्धालुओं की भागीदारी दर्ज की गई। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था और यातायात प्रबंधन फिर बड़ी चुनौती बनकर सामने आया।
-2023, 2024 और 2025 में उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के कई जिलों में स्कूल-कॉलेजों को कई दिनों तक बंद रखने या ऑनलाइन कक्षाएँ संचालित करने के आदेश जारी किए गए।
क्या स्कूल-कॉलेज बंद करना उचित है?
यह प्रश्न दो दृष्टिकोणों से देखा जाना चाहिए। प्रशासन का कहना है कि जब करोड़ों श्रद्धालु सड़कों पर हों और प्रमुख मार्ग पूरी तरह कांवड़ मार्ग घोषित कर दिए जाएँ, तब विद्यार्थियों की सुरक्षा सर्वोपरि हो जाती है। ऐसे में अस्थायी बंदी व्यावहारिक निर्णय माना जाता है। दूसरी ओर शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि केवल कुछ मार्ग प्रभावित हैं, तो पूरे जिले के सभी शिक्षण संस्थानों को बंद करना आवश्यक नहीं होना चाहिए। वैकल्पिक मार्ग, समय परिवर्तन या ऑनलाइन कक्षाओं जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। प्रख्यात शिक्षाविद डॉ. राकेश सिन्हा का मानना है कि धार्मिक आस्था का सम्मान लोकतंत्र की पहचान है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था बार-बार बाधित होना उचित नहीं। प्रशासन को तकनीक और बेहतर प्रबंधन का सहारा लेना चाहिए। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. एस. वाई. कुरैशी ने कई अवसरों पर सार्वजनिक आयोजनों के संदर्भ में कहा है कि लोकतंत्र में सभी नागरिकों के अधिकार समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि किसी एक गतिविधि के कारण दूसरे नागरिकों के अधिकार अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों। प्रबंधन विशेषज्ञ प्रो. अनुज धर का कहना है के भीड़ प्रबंधन केवल पुलिस का विषय नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक योजना, ट्रैफिक इंजीनियरिंग और नागरिक सहभागिता का संयुक्त परिणाम होता है। यातायात विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि पहले से विस्तृत योजना बनाई जाए तो अधिकांश समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
क्या है स्थायी समाधान
हर वर्ष एक जैसी समस्याएँ सामने आने का अर्थ है कि अब अस्थायी नहीं बल्कि दीर्घकालिक समाधान तलाशने होंगे।
1.सबसे पहले प्रमुख कांवड़ मार्गों पर स्थायी कांवड़ कॉरिडोर विकसित किए जाने चाहिए ताकि सामान्य यातायात प्रभावित न हो। 2.यात्रा को चरणबद्ध या क्षेत्रवार व्यवस्थित करने पर विचार किया जा सकता है जिससे एक समय में अत्यधिक भीड़ न हो।
3.केवल कांवड़ मार्ग से जुड़े क्षेत्रों के स्कूलों में अवकाश दिया जाए, जबकि अन्य क्षेत्रों में नियमित पढ़ाई जारी रहे। आवश्यकता पड़ने पर ऑनलाइन या हाइब्रिड कक्षाएँ संचालित की जा सकती हैं।
4.अस्पतालों के लिए चैबीसों घंटे ग्रीन कॉरिडोर सुनिश्चित किया जाए ताकि एम्बुलेंस कभी न रुके।
5.जीपीएस आधारित ट्रैफिक प्रबंधन, वैकल्पिक मार्गों की अग्रिम सूचना, पर्याप्त पार्किंग, अस्थायी शिविर और विश्राम स्थलों का निर्माण भी आवश्यक है।
6.धार्मिक संगठनों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए ताकि श्रद्धालुओं को भी अनुशासन और यातायात नियमों के पालन के लिए प्रेरित किया जा सके।
7.किसी भी प्रकार की तोड़फोड़, हिंसा या कानून हाथ में लेने की घटना पर निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई हो, ताकि पूरी यात्रा की गरिमा बनी रहे।
आस्था और अधिकार-दोनों का सम्मान आवश्यक
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। साथ ही शिक्षा, आवागमन और सुरक्षित जीवन का अधिकार भी सुनिश्चित करता है। इसलिए किसी भी नीति का उद्देश्य इन अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। कांवड़ यात्रा भारत की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान हर नागरिक का दायित्व है। वहीं प्रशासन का यह दायित्व भी है कि आम नागरिकों, विद्यार्थियों, मरीजों और व्यापारियों का जीवन अनावश्यक रूप से प्रभावित न हो।
कांवड़ यात्रा को समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक विशाल सार्वजनिक आयोजन के रूप में देखने की आवश्यकता है, जिसके लिए आधुनिक प्रबंधन, वैज्ञानिक योजना और संवेदनशील प्रशासन अनिवार्य है। हर वर्ष स्कूलों की बंदी, यातायात अव्यवस्था और जनजीवन में बाधा यदि दोहराई जा रही है, तो यह संकेत है कि अब स्थायी समाधान की दिशा में गंभीर पहल की जानी चाहिए। आस्था और व्यवस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि सरकार, प्रशासन, धार्मिक संगठन और समाज मिलकर दूरदर्शी योजना बनाएँ, तो करोड़ों श्रद्धालुओं की यात्रा भी सुचारु रूप से संपन्न हो सकती है और आम नागरिकों का जीवन भी सामान्य बना रह सकता है। यही संतुलन भारत की लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक परंपरा की वास्तविक पहचान है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि और पत्रकार)


मंगलवार, 4 अगस्त 2026

जंतर-मंतर का जनांदोलन बनाम कांवड़ यात्रा

 लेख-

भारत एक ऐसा लोकतांत्रिक राष्ट्र है जहाँ संविधान नागरिकों को एक ओर अपनी बात कहने, विरोध दर्ज कराने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार देता है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक आस्था के अनुरूप पूजा-पाठ, यात्रा और अनुष्ठान करने की भी पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करता है। इसलिए जंतर-मंतर पर होने वाले जनांदोलन और सावन के महीने में निकलने वाली कांवड़ यात्रा दोनों ही भारतीय लोकतंत्र और संस्कृति की स्वाभाविक अभिव्यक्तियाँ हैं। किंतु जब इन गतिविधियों का प्रभाव आम नागरिकों के जीवन, यातायात, कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक संसाधनों पर पड़ने लगता है, तब जनहित का प्रश्न सर्वोपरि हो जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और एकत्र होने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। किंतु संविधान यह भी स्पष्ट करता है कि इन अधिकारों का प्रयोग लोक व्यवस्था, नैतिकता और दूसरे नागरिकों के अधिकारों के अधीन होगा। यही वह संवैधानिक संतुलन है जिसे आज सबसे अधिक समझने की आवश्यकता है। जंतर-मंतर पर जुटने वाले अधिकांश युवा रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती में देरी, शिक्षा व्यवस्था और अन्य जनसरोकारों से जुड़े प्रश्न उठाते हैं। लोकतंत्र में ऐसे आंदोलनों की अपनी महत्ता है। इतिहास गवाह है कि अनेक नीतिगत परिवर्तन जनता के शांतिपूर्ण दबाव के बाद ही संभव हुए हैं। दूसरी ओर कांवड़ यात्रा करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। उत्तर भारत में लाखों शिवभक्त गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अभिषेक करते हैं। यात्रा के दौरान हजारों सेवा शिविर, निःशुल्क भोजन, चिकित्सा सहायता और सामाजिक सहयोग देखने को मिलता है। यह भारतीय संस्कृति की सेवा-परंपरा का भी महत्वपूर्ण उदाहरण है। लेकिन दोनों ही गतिविधियों के साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ जुड़ी हुई हैं। बड़े आंदोलनों के दौरान सड़क जाम, प्रशासनिक दबाव और कभी-कभी हिंसा की घटनाएँ सामने आती हैं। वहीं विशाल धार्मिक यात्राओं के समय लंबा ट्रैफिक जाम, ध्वनि प्रदूषण, दुर्घटनाएँ तथा कुछ स्थानों पर कानून-व्यवस्था संबंधी घटनाएँ भी समाचारों में आती रही हैं। अधिकांश श्रद्धालु और प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण रहते हैं, किंतु कुछ लोगों की अनुशासनहीनता पूरे आयोजन की छवि को प्रभावित कर देती है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के नवीनतम आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में भारत में लगभग 1.99 लाख लोगों की मृत्यु यातायात दुर्घटनाओं में हुई, अर्थात औसतन प्रतिदिन 546 लोगों की जान सड़क दुर्घटनाओं में गई। ऐसे आँकड़े यह संकेत देते हैं कि किसी भी बड़े सार्वजनिक आयोजन में सड़क सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी कारण विभिन्न राज्यों की पुलिस और प्रशासन अब बड़े आयोजनों के दौरान दुर्घटनामुक्त व्यवस्था पर विशेष बल दे रहे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस ने कांवड़ यात्रा के लिए अधिकारियों को जीरो इंसिडेंट, जीरो एक्सीडेंट को संचालन का लक्ष्य बनाने का निर्देश दिया, जिससे श्रद्धालुओं और आम नागरिकों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। संवैधानिक विशेषज्ञ प्रो. उपेन्द्र बक्षी का कहना है कि मौलिक अधिकार कभी निरपेक्ष नहीं होते, प्रत्येक अधिकार के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। इसका अर्थ है कि न तो प्रदर्शन के नाम पर हिंसा स्वीकार्य हो सकती है और न ही धार्मिक आस्था के नाम पर कानून हाथ में लेना। लोक प्रशासन के विद्वान डॉ. पॉल एच. एप्पलबी ने प्रशासन का मूल उद्देश्य जनसुविधा और लोककल्याण बताया था। इसी भावना के अनुरूप प्रशासन का दायित्व है कि वह आंदोलनों और धार्मिक आयोजनों दोनों का ऐसा प्रबंधन करे जिससे नागरिक जीवन न्यूनतम प्रभावित हो। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमत्र्य सेन लोकतंत्र को केवल मतदान नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श की व्यवस्था मानते हैं। उनके अनुसार नागरिकों की आवाज सुनना और समस्याओं का समाधान करना लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। दूसरी ओर धार्मिक स्वतंत्रता भी तभी सार्थक है जब वह सामाजिक सौहार्द्र और पारस्परिक सम्मान को मजबूत करे। महात्मा गांधी ने कहा था, अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य हैं। यदि प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य का पालन करे तो अधिकारों के टकराव की नौबत बहुत कम आएगी। यही संदेश जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों और कांवड़ यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया ने दोनों प्रकार की घटनाओं को तीव्र गति से प्रसारित किया है। दुर्भाग्य से कुछ हिंसक या विवादास्पद घटनाएँ पूरे समुदाय की छवि पर हावी हो जाती हैं। किसी एक प्रदर्शन में हुई तोड़फोड़ से सभी प्रदर्शनकारियों को हिंसक नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार कुछ कांवड़ियों की अनुशासनहीनता के आधार पर पूरी कांवड़ यात्रा का मूल्यांकन भी न्यायसंगत नहीं होगा। मीडिया और समाज दोनों को इस संतुलन का ध्यान रखना चाहिए। जनहित का मूल सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहाँ से दूसरे नागरिक की स्वतंत्रता प्रारंभ होती है। यदि कोई आंदोलन अस्पताल जाने वाले व्यक्ति को घंटों जाम में फँसा दे या कोई धार्मिक आयोजन आम नागरिकों की सुरक्षा और आवागमन को गंभीर रूप से प्रभावित करे, तो प्रशासन को संवैधानिक दायित्व निभाते हुए संतुलित हस्तक्षेप करना ही चाहिए।
जनहित में आवश्यक कदम
1.आंदोलनों के लिए पूर्व निर्धारित स्थान और समय का पालन अनिवार्य बनाया जाए।
2.धार्मिक यात्राओं के लिए वैज्ञानिक ट्रैफिक प्रबंधन, वैकल्पिक मार्ग, चिकित्सा शिविर और आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था हो।
3.सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों पर, चाहे वे किसी भी विचारधारा या धर्म से जुड़े हों, समान कानूनी कार्रवाई हो।
4.सरकार युवाओं के रोजगार, भर्ती और शिक्षा संबंधी मुद्दों पर समयबद्ध संवाद स्थापित करे।
5.धार्मिक संगठनों को स्वयंसेवकों के माध्यम से अनुशासन, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण का अभियान चलाना चाहिए।
6.मीडिया सनसनी से अधिक तथ्यपरक और संतुलित रिपोर्टिंग को प्राथमिकता दे।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। यहाँ विरोध भी है, विश्वास भी, आंदोलन भी हैं और आस्था भी। लोकतंत्र और धर्म दोनों का सम्मान तभी सुरक्षित रहेगा जब दोनों कानून, अनुशासन और जनहित की मर्यादा में संचालित हों। जंतर-मंतर का उद्देश्य यदि जनसमस्याओं का समाधान है और कांवड़ यात्रा का उद्देश्य आध्यात्मिक आस्था की अभिव्यक्ति, तो दोनों का स्वागत होना चाहिए। किंतु यदि किसी भी पक्ष से हिंसा, तोड़फोड़, अराजकता या दूसरे नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह जनहित नहीं, बल्कि संविधान की भावना के विपरीत है। आज आवश्यकता किसी एक पक्ष का समर्थन या विरोध करने की नहीं, बल्कि ऐसी नागरिक संस्कृति विकसित करने की है जहाँ अधिकार और उत्तरदायित्व साथ-साथ चलें। यही भारत के लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही जनहित की सर्वोच्च कसौटी भी।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि और पत्रकार)

सोमवार, 3 अगस्त 2026

जिगोलो नेटवर्क-डिजिटल दौर का उभरता कारोबार

 लेख-

डिजिटल क्रांति ने हमारे जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। संचार, व्यापार, शिक्षा और मनोरंजन के साथ-साथ मानव संबंधों की प्रकृति भी बदल रही है। इसी परिवर्तन के बीच एक ऐसा विषय भी तेजी से चर्चा में आया है, जिसे कभी समाज के हाशिए का मुद्दा माना जाता था-पुरुष एस्कॉर्ट या जिगोलो नेटवर्क। इंटरनेट, सोशल मीडिया, डेटिंग ऐप्स और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म ने इस क्षेत्र को पहले की तुलना में अधिक गोपनीय और सुलभ बना दिया है। हालांकि, इसके साथ साइबर ठगी, मानव शोषण और मानसिक स्वास्थ्य जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी जुड़ गई हैं।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारत में जिगोलो शब्द किसी कानून या सरकारी आँकड़ों की अलग श्रेणी नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो भी इस नाम से कोई पृथक आँकड़ा प्रकाशित नहीं करता। इसलिए इंटरनेट पर दिखाई देने वाले करोड़ों रुपये के कारोबार या लाखों ग्राहकों जैसे दावों का कोई आधिकारिक आधार उपलब्ध नहीं है।
बदलता सामाजिक परिदृश्य
समाजशास्त्रियों का मानना है कि शहरीकरण, एकल परिवारों की बढ़ती संख्या, व्यस्त जीवनशैली, आर्थिक स्वतंत्रता और डिजिटल माध्यमों ने व्यक्तिगत संबंधों की प्रकृति को प्रभावित किया है। आज अनेक लोग ऑनलाइन मित्रता और संगति की तलाश करते हैं। इसी वातावरण में कुछ लोग भुगतान आधारित संगति या एस्कॉर्ट सेवाओं की ओर भी आकर्षित होते हैं। यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक देशों में इंटरनेट आधारित एस्कॉर्ट नेटवर्क विकसित हुए हैं।
जिगोलो कौन होता है?
सामान्यतः जिगोलो उस पुरुष को कहा जाता है जो आर्थिक प्रतिफल के बदले किसी ग्राहक को संगति या एस्कॉर्ट सेवा प्रदान करता है। व्यवहार में यह व्यवस्था कई रूपों में दिखाई देती है और हर मामले की प्रकृति अलग हो सकती है। इसलिए सभी मामलों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।
मांग किन वर्गों में?
लोकप्रिय धारणा है कि ऐसी सेवाओं की मांग केवल संपन्न महिलाएँ करती हैं। उपलब्ध शोध इससे अधिक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार पुरुष एस्कॉर्ट सेवाओं के ग्राहक महिलाओं के साथ-साथ पुरुष भी हो सकते हैं। भारत में इस विषय पर व्यापक शोध उपलब्ध नहीं है, इसलिए किसी एक वर्ग को प्रमुख ग्राहक बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। जहाँ महिला ग्राहकों का उल्लेख मिलता है, वहाँ अक्सर निम्न परिस्थितियाँ सामने आती हैं-
1.आर्थिक रूप से स्वतंत्र और अकेली रहने वाली महिलाएँ।
2.तलाकशुदा या अलग रह रही महिलाएँ।
3.कुछ मामलों में वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट महिलाएँ।
4.महानगरों में रहने वाला उच्च आय वर्ग।
फिर भी इन वर्गों की संख्या या अनुपात पर कोई आधिकारिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है।
किन शहरों में अधिक सक्रियता?
मीडिया रिपोर्टों और विभिन्न अध्ययनों में दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता और गोवा जैसे शहरों का उल्लेख अपेक्षाकृत अधिक मिलता है। इसके पीछे बड़ी आबादी, कॉर्पोरेट संस्कृति, पर्यटन और डिजिटल प्लेटफॉर्म का व्यापक उपयोग प्रमुख कारण माने जाते हैं। लेकिन यह दोहराना आवश्यक है कि इन शहरों के लिए भी कोई आधिकारिक सरकारी आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
सबसे बड़ा कारोबार-साइबर ठगी
विशेषज्ञों के अनुसार आज सबसे बड़ी समस्या वास्तविक एस्कॉर्ट नेटवर्क से अधिक जिगोलो जॉब के नाम पर होने वाली ऑनलाइन ठगी है। सोशल मीडिया, फेसबुक, टेलीग्राम, व्हाट्सऐप और वेबसाइटों पर आकर्षक विज्ञापन देकर युवाओं को मोटी कमाई का लालच दिया जाता है। उनसे पहले पंजीकरण शुल्क, सदस्यता शुल्क, सुरक्षा जमा, होटल बुकिंग या प्रोफाइल सत्यापन के नाम पर पैसे जमा कराए जाते हैं। भुगतान के बाद या तो संपर्क समाप्त कर दिया जाता है या बार-बार नए शुल्क की मांग की जाती है। दिल्ली और गुरुग्राम सहित कई मामलों में पुलिस ने ऐसे गिरोहों का पर्दाफाश किया है।
क्यों फँस जाते हैं युवा?
इस प्रश्न का उत्तर केवल आर्थिक नहीं है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि त्वरित धन कमाने की इच्छा, बेरोजगारी, सोशल मीडिया का प्रभाव, अकेलापन और जोखिमों की अनदेखी, ये सभी कारण युवाओं को ऐसे झाँसों की ओर धकेलते हैं। अपराधी इन्हीं कमजोरियों का लाभ उठाते हैं।
कानूनी स्थिति
भारतीय कानून में जिगोलो शब्द की अलग कानूनी परिभाषा नहीं है। लेकिन यदि किसी गतिविधि में मानव तस्करी, दलाली, जबरन शोषण, नाबालिगों का उपयोग, संगठित अपराध या अवैध आर्थिक लाभ शामिल हो, तो विभिन्न कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है। इस कारण यह विषय केवल नैतिक नहीं, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी जटिल है।
स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव
विशेषज्ञ इस पूरे विषय को सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा से भी जोड़कर देखते हैं। असुरक्षित यौन व्यवहार, मानसिक तनाव, ब्लैकमेल, साइबर उगाही और मानव तस्करी जैसे जोखिम इससे जुड़े हो सकते हैं। भारत में किए गए एक राष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि वाणिज्यिक यौन सेवाएँ लेने वाले अनेक पुरुष नियमित सुरक्षा उपायों का पालन नहीं करते थे, जिससे संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है।
समाज के लिए संदेश
इस विषय पर चर्चा करते समय दो अतियों से बचना चाहिए। पहली, बिना प्रमाण के सनसनीखेज दावे करना। दूसरी, समस्या के अस्तित्व से पूरी तरह इनकार करना। वास्तविकता यह है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने ऐसे नेटवर्कों और उनसे जुड़ी ठगी दोनों को नई गति दी है। इसलिए जागरूकता, साइबर साक्षरता, रोजगार के अवसर और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।
जिगोलो नेटवर्क का विषय केवल जिज्ञासा या मनोरंजन का नहीं है। यह बदलते सामाजिक ढाँचे, डिजिटल अपराध, मानव संबंधों, कानून और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। भारत में इसके बारे में आधिकारिक आँकड़ों का अभाव है, इसलिए किसी भी दावे को सावधानी से परखना चाहिए। साथ ही, युवाओं को यह समझना होगा कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाले आसान पैसे के अधिकांश प्रस्ताव धोखाधड़ी भी हो सकते हैं। समाज, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म को मिलकर ऐसी ठगी और शोषण पर अंकुश लगाने के लिए अधिक प्रभावी प्रयास करने होंगे।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)