गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

साहित्यिक संस्थाओं की भरमार, साहित्य कहाँ?

 लेख-

भारत को यदि भाषाओं, बोलियों और साहित्य की विविधता का देश कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। देश के लगभग हर छोटे-बड़े शहर में साहित्यिक संस्थाएँ, साहित्य परिषदें, काव्य मंच, लेखक संगठन और सांस्कृतिक संस्थाएँ सक्रिय दिखाई देती हैं। कहीं कवि सम्मेलन हो रहे हैं, कहीं पुस्तक लोकार्पण, कहीं सम्मान समारोह तो कहीं साहित्यिक गोष्ठियाँ। सामाजिक माध्यमों ने भी ऐसी संस्थाओं की गतिविधियों को व्यापक दृश्यता प्रदान कर दी है। लेकिन एक बुनियादी सवाल आज भी अनुत्तरित है-भारत में कुल कितनी साहित्यिक संस्थाएँ हैं और उनमें से वास्तव में कितनी साहित्य के लिए स्थायी और सार्थक काम कर रही हैं? इस प्रश्न का सीधा उत्तर सरकारी अभिलेखों में उपलब्ध नहीं है। भारत सरकार के पास ऐसी कोई एकीकृत राष्ट्रीय सूची नहीं है जिसमें देश की सभी साहित्यिक संस्थाओं की संख्या अलग से दर्ज हो। साहित्यिक संस्थाएँ अलग-अलग राज्यों में सोसायटी, न्यास, गैर-लाभकारी कंपनी अथवा अन्य संस्थागत स्वरूपों में पंजीकृत होती हैं। इसलिए केवल सरकारी पंजीकरण के आधार पर साहित्यिक संस्थाओं की कुल संख्या निकालना संभव नहीं है।
नीति आयोग के एनजीओ-दर्पण से पता चलता है कि देश में गैर-लाभकारी संस्थाओं का नेटवर्क बहुत बड़ा है। 2024 के अंत तक एनजीओ-दर्पण पर लगभग 2.78 लाख संस्थाएँ दर्ज थीं। लेकिन यह संख्या केवल साहित्यिक संस्थाओं की नहीं है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, महिला एवं बाल विकास, पर्यावरण, सामाजिक कल्याण, संस्कृति और अन्य क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाएँ भी शामिल हैं। इसलिए इस संख्या को साहित्यिक संस्थाओं की संख्या मानना तथ्यात्मक भूल होगी। यही स्थिति साहित्यिक संस्थाओं की वास्तविक सक्रियता को लेकर भी है। सरकारी स्तर पर ऐसा कोई राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है जो बताए कि पंजीकृत साहित्यिक संस्थाओं में कितनी नियमित रूप से काम कर रही हैं, कितनी वर्षों से निष्क्रिय हैं और कितनी केवल कागजों में अस्तित्व रखती हैं।
पंजीकरण और साहित्यिक योगदान में अंतर
किसी संस्था का पंजीकृत होना उसकी वैधानिक स्थिति बताता है, साहित्यिक उपलब्धि नहीं। साहित्यिक संस्था का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि वह साहित्य के लिए क्या कर रही है? क्या वह नए रचनाकारों को अवसर दे रही है? क्या वह पुस्तकें प्रकाशित कर रही है? क्या वह साहित्यिक पत्रिका निकाल रही है? क्या वह भारतीय भाषाओं और बोलियों के साहित्य का संरक्षण कर रही है? क्या वह अनुवाद को प्रोत्साहित कर रही है? क्या वह विद्यालयों और महाविद्यालयों में पठन संस्कृति विकसित कर रही है? क्या वह साहित्य को समाज के प्रश्नों से जोड़ रही है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर तलाशे जाएँ तो साहित्यिक संस्थाओं की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
कार्यक्रम जरूरी हैं, लेकिन केवल कार्यक्रम ही साहित्य नहीं
साहित्यिक गतिविधियों में कवि सम्मेलन, मुशायरे, कहानी-पाठ, पुस्तक लोकार्पण और संगोष्ठियाँ महत्वपूर्ण हैं। ये साहित्यकारों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं और पाठकों तक साहित्य पहुँचाते हैं। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब संस्था की पूरी सक्रियता केवल मंचीय कार्यक्रमों तक सीमित हो जाती है। एक संस्था यदि वर्ष में दर्जनों समारोह करती है, लेकिन नई प्रतिभाओं को प्रकाशित करने, पुस्तकालय बनाने, साहित्यिक शोध को बढ़ावा देने या दुर्लभ साहित्य को सुरक्षित रखने का कोई प्रयास नहीं करती, तो उसके योगदान का मूल्यांकन केवल कार्यक्रमों की संख्या से नहीं किया जा सकता। आज कई जगह साहित्यिक आयोजन भी एक प्रकार के सामाजिक समारोह में बदलते दिखाई देते हैं। मंच पर अतिथियों की लंबी सूची, सम्मान-पत्रों की भरमार और तस्वीरों की अधिकता के बीच साहित्यिक विमर्श पीछे छूट जाता है। सम्मान साहित्यकार का मनोबल बढ़ाता है, लेकिन सम्मान अपने आप में साहित्यिक योगदान का प्रमाण नहीं है।
साहित्य अकादेमी और संस्थागत साहित्य
राष्ट्रीय स्तर पर साहित्य के क्षेत्र में साहित्य अकादेमी की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह भारतीय भाषाओं के साहित्य को बढ़ावा देने, लेखकों को जोड़ने, अनुवाद, संगोष्ठियों, पाठ और साहित्यिक संवाद जैसी गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक आदान-प्रदान का कार्य करती है। इसके अतिरिक्त विभिन्न राज्यों में साहित्य अकादमियाँ, साहित्य परिषदें और सांस्कृतिक संस्थाएँ भी कार्यरत हैं। संस्कृति मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से साहित्य एवं संस्कृति से संबंधित संस्थाओं को भी सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इससे स्पष्ट है कि भारत में साहित्य के लिए संस्थागत ढाँचा मौजूद है। प्रश्न उसके विस्तार से अधिक उसके प्रभाव और गुणवत्ता का है।
साहित्य और समाज का रिश्ता
साहित्यिक संस्था का काम केवल साहित्यकारों को एक मंच पर लाना नहीं होना चाहिए। साहित्य समाज की संवेदना का दर्पण है। इसलिए साहित्यिक संस्थाओं की सामाजिक भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बाल साहित्य को बढ़ावा देना, युवाओं को पुस्तकों से जोड़ना, ग्रामीण और छोटे शहरों के रचनाकारों को मंच देना, लोक भाषाओं और बोलियों का संरक्षण करना, वरिष्ठ साहित्यकारों की रचनाओं का दस्तावेजीकरण करना और विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच संवाद स्थापित करना, ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ साहित्यिक संस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। साहित्य समाज में संवाद पैदा करता है। वह प्रश्न पूछता है, संवेदना जगाता है और मनुष्य को दूसरे मनुष्य के दुख-सुख से जोड़ता है। इसलिए साहित्यिक संस्थाओं का सामाजिक दायित्व किसी अन्य सामाजिक संस्था से कम नहीं है।
नई प्रतिभाओं के लिए खुलें दरवाजे
आज साहित्य के क्षेत्र में एक बड़ी आवश्यकता नई प्रतिभाओं को अवसर देने की है। छोटे शहरों और कस्बों में अनेक युवा लिख रहे हैं, लेकिन उन्हें सही मंच और मार्गदर्शन नहीं मिलता। साहित्यिक संस्थाएँ यदि वरिष्ठ और स्थापित रचनाकारों के साथ नए लेखकों के लिए नियमित पाठ, कार्यशाला, संपादन प्रशिक्षण, प्रकाशन और संवाद की व्यवस्था करें तो इसका दीर्घकालीन प्रभाव दिखाई दे सकता है। सिर्फ मंच पर बुलाकर कविता पढ़वा देना पर्याप्त नहीं है। नए लेखक को यह भी बताया जाना चाहिए कि रचना को कैसे परिष्कृत किया जाए, भाषा और शिल्प की कमियों को कैसे दूर किया जाए और साहित्यिक अनुशासन क्या होता है।
पुरस्कारों की संस्कृति पर भी विचार जरूरी
साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मान और पुरस्कार दिए जाना अच्छी परंपरा है। इससे रचनाकारों का उत्साह बढ़ता है। लेकिन पुरस्कारों की संख्या बढ़ना साहित्य की गुणवत्ता बढ़ने का प्रमाण नहीं हो सकता। आवश्यक है कि पुरस्कारों के लिए पारदर्शी और स्पष्ट मानदंड हों। चयन समिति में योग्य साहित्यकार हों और पुरस्कार रचना तथा साहित्यिक योगदान को देखकर दिए जाएँ। यदि सम्मान केवल परिचय, संपर्क अथवा मंचीय उपस्थिति का विस्तार बन जाए तो इससे पुरस्कार की गरिमा प्रभावित होती है।
डिजिटल युग में नई संभावनाएँ
सामाजिक माध्यमों और डिजिटल मंचों ने साहित्यिक संस्थाओं के सामने नई संभावनाएँ भी खोली हैं। अब किसी छोटे शहर की गोष्ठी को देश के दूसरे हिस्सों के लोग भी देख सकते हैं। दुर्लभ पुस्तकों और पुराने साहित्य को डिजिटल रूप दिया जा सकता है। ऑनलाइन व्याख्यान और साहित्यिक पाठ आयोजित किए जा सकते हैं। लेकिन डिजिटल दृश्यता को भी साहित्यिक उपलब्धि का पर्याय नहीं बनाया जाना चाहिए। किसी कार्यक्रम के बहुत अधिक दर्शक होना और उस कार्यक्रम का साहित्यिक प्रभाव होना दो अलग बातें हैं।
संस्थाओं का मूल्यांकन क्यों नहीं?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि देश में इतनी बड़ी संख्या में साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाएँ सक्रिय होने के बावजूद इनके काम का कोई व्यवस्थित राष्ट्रीय मूल्यांकन क्यों नहीं होता? एक ऐसा सार्वजनिक अभिलेख तैयार किया जा सकता है जिसमें संस्था का नाम, पंजीकरण, स्थापना वर्ष, सक्रिय सदस्य, साहित्यिक गतिविधियाँ, प्रकाशित पुस्तकें, पत्रिकाएँ, अनुदान और पिछले कुछ वर्षों की प्रमुख उपलब्धियाँ दर्ज हों। इससे साहित्यिक संस्थाओं की पारदर्शिता भी बढ़ेगी और अच्छी संस्थाओं को पहचान भी मिलेगी।
अब संख्या से अधिक गुणवत्ता पर बात हो
भारत को केवल अधिक साहित्यिक संस्थाओं की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता ऐसी संस्थाओं की है जो साहित्य को समाज से जोड़ें और साहित्यकार को पाठक से। एक संस्था की पहचान उसके भवन, पदाधिकारियों, समारोहों या सम्मान-पत्रों से नहीं, बल्कि उसके स्थायी साहित्यिक कार्य से होनी चाहिए। किसी संस्था ने कितने कवि सम्मेलन किए, यह एक आँकड़ा हो सकता है लेकिन कितने नए लेखक तैयार किए, कितनी पुस्तकें प्रकाशित कीं, कितने दुर्लभ ग्रंथ सुरक्षित किए, कितने पाठकों को पुस्तक से जोड़ा और समाज में साहित्य के प्रति कितनी रुचि पैदा की-ये उसके वास्तविक योगदान के अधिक महत्वपूर्ण संकेतक हैं। आज आवश्यकता साहित्यिक संस्थाओं की संख्या गिनने से अधिक उनके काम का मूल्यांकन करने की है। क्योंकि सवाल यह नहीं है कि देश में साहित्यिक संस्थाएँ कितनी हैं। सवाल यह है कि उनके होने से साहित्य कितना समृद्ध हुआ है और शायद इससे भी बड़ा सवाल- साहित्यिक संस्थाओं की भरमार के बीच साहित्य कहाँ है?

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें