न्यायालयों के चक्कर में पिसते निवासी
दिल्ली-एनसीआर में पिछले दस वर्षों का लेखा-जोखा
दिल्ली-एनसीआर में पिछले एक दशक में बहुमंजिला आवासीय परिसरों का जिस तेजी से विस्तार हुआ है, उसी तेजी से इनके प्रबंधन से जुड़े विवाद भी बढ़े हैं। हजारों परिवारों ने जीवनभर की कमाई लगाकर इन परिसरों में अपना घर बनाया। उन्हें उम्मीद थी कि सुरक्षित वातावरण, स्वच्छता, बिजली-पानी, सुरक्षा, उद्यान, पार्किंग और अन्य सुविधाओं के साथ उन्हें शांतिपूर्ण सामुदायिक जीवन मिलेगा। लेकिन अनेक आवासीय परिसरों में अब स्थिति यह है कि चुनाव, पदाधिकारियों के कार्यकाल, सदस्यता, धन के हिसाब-किताब और रखरखाव को लेकर विवाद न्यायालयों तक पहुँच रहे हैं। जिस संस्था का उद्देश्य निवासियों के हितों की रक्षा करना और परिसर का सुचारु संचालन होना चाहिए, वही संस्था कई जगह गुटबाजी का केंद्र बन गई है। सवाल यह नहीं है कि चुनाव क्यों होते हैं। चुनाव तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा हैं। सवाल यह है कि चुनाव के बाद भी विवाद क्यों समाप्त नहीं होते और कई बार चुनाव स्वयं विवाद का कारण क्यों बन जाते हैं?
पिछले दस वर्षों के दिल्ली-एनसीआर के घटनाक्रम पर नजर डालें तो तस्वीर काफी कुछ कहती है।
2016 : चुनाव को लेकर गिरफ्तारी तक
दिसंबर 2016 में गाजियाबाद के राजनगर विस्तार स्थित रिवर हाइट्स आवासीय परिसर का मामला चर्चा में आया। यहाँ लगभग 760 आवासीय इकाइयाँ थीं। तत्कालीन अपार्टमेंट स्वामी संघ की कार्यकारिणी का कार्यकाल 27 सितंबर 2016 को समाप्त हो चुका था और चुनाव प्रस्तावित थे। चुनाव की घोषणा को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि तत्कालीन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को गिरफ्तार तक किया गया। बाद में दोनों को जमानत मिल गई। इसी दौर में गाजियाबाद की शिप्रा रिवेरा, एंजेल मर्क्युरी, शिप्रा सन सिटी और शिप्रा विंडसर नोवा जैसी आवासीय सोसायटियों के चुनाव भी विवादों में रहे। यह पहला संकेत था कि आवासीय परिसरों के चुनाव अब केवल आंतरिक मामला नहीं रह गए हैं। प्रशासन और पुलिस तक को हस्तक्षेप करना पड़ रहा था।
2018 : बार-बार टलते चुनाव
नोएडा के मधुवन अपार्टमेंट में वर्ष 2018 में चुनाव चौथी बार स्थगित हुआ। इस परिसर में लगभग 240 आवासीय इकाइयाँ थीं और करीब 220 सदस्य बताए गए थे। चुनाव की प्रक्रिया को लेकर असहमति इतनी बढ़ी कि मतदान बार-बार टलता रहा। यह घटना उस समस्या की ओर संकेत करती है जो आने वाले वर्षों में और व्यापक हुई—चुनाव कराने से पहले ही मतदाता सूची, सदस्यता और चुनाव प्रक्रिया पर विवाद।
2019 : तीन वर्षों से चुनाव नहीं
ग्रेटर नोएडा के एनआरआई सिटी आवासीय परिसर में वर्ष 2019 में सामने आया कि लगभग तीन वर्षों से चुनाव नहीं हुए थे। निवासियों ने पानी, बिजली और अग्नि-सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर भी शिकायतें कीं। यहाँ सवाल केवल चुनाव का नहीं था। प्रश्न यह था कि जब निर्वाचित संस्था का कार्यकाल समाप्त हो जाए और नई संस्था का गठन न हो तो परिसर की व्यवस्था और वित्तीय निर्णयों के लिए जिम्मेदार कौन होगा? यही प्रश्न बाद में दिल्ली-एनसीआर की अनेक आवासीय सोसायटियों में उठता रहा।
2020-21 : महामारी के बीच सदस्यता का सवाल
कोरोना महामारी के कारण 2020 में सामान्य सामाजिक और प्रशासनिक गतिविधियाँ प्रभावित हुईं। इसका असर आवासीय परिसरों के चुनाव पर भी पड़ा। 2021 में नोएडा में नोएडा निवासी कल्याण संघों के महासंघ के चुनाव को लेकर मतदान के अधिकार पर बहस हुई। केवल निर्वाचित निवासी कल्याण संघ के सदस्यों को मतदान का अधिकार देने की व्यवस्था सामने आई। इससे एक मूल प्रश्न सामने आया—किसे सदस्य माना जाए और किसे मतदान का अधिकार मिले? फ्लैट पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर हो तो मतदान कौन करे? सह-मालिक का अधिकार क्या हो? बकाया रखरखाव शुल्क वाले सदस्य का मतदान अधिकार रहेगा या नहीं? किरायेदार की भूमिका क्या होगी? ऐसे सवाल बाद के वर्षों में अनेक विवादों का कारण बने।
2022-23 : निर्माणकर्ता से लेकर निवासी संघ तक संघर्ष
इस अवधि में दिल्ली-एनसीआर के कई आवासीय परिसरों में निर्माणकर्ताओं से सामुदायिक क्षेत्र का हस्तांतरण, रखरखाव, पार्किंग और सुविधाओं को लेकर विवाद सामने आते रहे। कई स्थानों पर निवासियों ने पहले निर्माणकर्ता के विरुद्ध संघर्ष किया। निर्माणकर्ता से परिसर का नियंत्रण निवासी संस्था को मिलने के बाद विवाद का केंद्र बदलकर स्वयं निवासी संस्था बन गया। यानी लड़ाई पहले निर्माणकर्ता बनाम निवासी थी, बाद में कई जगह निवासी बनाम निवासी हो गई।
2024 : लोकतंत्र बाहर भी और भीतर भी
वर्ष 2024 का एक दिलचस्प तथ्य सामने आया। लोकसभा चुनाव के दौरान नोएडा और गाजियाबाद की 103 आवासीय सोसायटियों में 152 मतदान केंद्र बनाए गए। नोएडा की 34 बहुमंजिला आवासीय सोसायटियों में 52 और दादरी क्षेत्र की 33 सोसायटियों में 49 मतदान केंद्र बनाए गए। देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनाव के लिए इन सोसायटियों में मतदान की व्यवस्था हो गई, लेकिन इन्हीं में से अनेक परिसरों के अपने निवासी संघ के चुनाव विवादों में फँसे रहे। इसी वर्ष गाजियाबाद की गौर होम्स सोसायटी में 150 से अधिक निवासियों ने प्रदर्शन किया। निवासियों ने कई वर्षों से सामान्य सभा की बैठक न होने और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए। यहाँ एक बड़ा प्रश्न सामने आया—क्या निवासियों को केवल चुनाव के समय याद किया जाना चाहिए या पूरे कार्यकाल में उन्हें निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए?
2025 : प्रशासन को चुनाव में उतरना पड़ा
वर्ष 2025 तक स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि नोएडा प्रशासन को लंबित चुनावों में सक्रिय भूमिका निभानी पड़ी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार नोएडा में लगभग 50 ऐसी सोसायटियों को चिन्हित किया गया, जहाँ निवासी कल्याण संघ के चुनाव लंबे समय से लंबित थे। इनमें से लगभग 20 सोसायटियों में प्रशासन की निगरानी में चुनाव कराए गए। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार नोएडा और ग्रेटर नोएडा के अनेक क्षेत्रों में कुछ निवासी संस्थाओं के चुनाव तीन वर्ष से अधिक समय से लंबित थे। ग्रेटर नोएडा में करीब 45 निवासी कल्याण संघों से जुड़े एक महासंघ के पदाधिकारी ने भी कई संस्थाओं में वर्षों से चुनाव न होने की बात कही थी। यहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक विचित्र रूप दिखाई दिया—जिस संस्था को स्वयं लोकतांत्रिक प्रक्रिया चलानी थी, उसके चुनाव कराने के लिए प्रशासन को आगे आना पड़ा।
2026 : समस्या का दायरा और बड़ा
वर्ष 2026 में स्थिति और स्पष्ट हुई। नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में 1,000 से अधिक पंजीकृत निवासी कल्याण संघ और अपार्टमेंट स्वामी संघ होने की जानकारी सामने आई। प्रशासन के सामने शिकायतें थीं कि कुछ संस्थाओं के पदाधिकारी निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी वर्षों तक पद पर बने हुए हैं। कुछ मामलों में चुनाव पाँच से छह वर्ष तक नहीं हुए। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार केवल पिछले आठ महीनों में नोएडा में लगभग 30 और गाजियाबाद में लगभग 20 आवासीय परिसरों में प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद चुनाव कराए गए। लेकिन चुनाव करा देना ही समाधान नहीं है।
ग्रेटर नोएडा के अल्फा-1 क्षेत्र में वर्ष 2026 में लगभग 15 वर्ष बाद निवासी कल्याण संघ के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई। वहाँ भी मतदाता सूची विवाद का कारण बन गई। लगभग 226 लोगों ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया, जबकि कुछ निवासियों ने आरोप लगाया कि करीब 78 ऐसे लोगों के नाम अब भी सूची में हैं, जिन्होंने अपनी संपत्ति बेच दी थी। यह घटना बताती है कि चुनाव की असली बुनियाद ही मतदाता सूची है। यदि सूची सही नहीं है तो चुनाव की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
गाजियाबाद में न्यायालय तक पहुँचे विवाद
गाजियाबाद की क्लासिक रेजिडेंसी का चुनाव विवाद 2026 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक पहुँचा। चुनाव को निर्धारित समय के बाद कराया गया मानकर उसकी वैधता पर प्रश्न उठाया गया। न्यायालय के सामने यह सवाल भी आया कि निर्धारित समय सीमा के बाद हुए चुनावों की वैधता किस प्रकार तय की जाए। गाजियाबाद प्रशासन को निवासी संघों से संबंधित शिकायतों की जाँच के लिए विशेष समिति तक बनानी पड़ी। शिकायतों में चुनावी विवाद के साथ वित्तीय अनियमितता, रखरखाव, पद के अधिकारों के दुरुपयोग और निवासियों के उत्पीड़न जैसे विषय भी शामिल थे।
गुरुग्राम भी अछूता नहीं
गुरुग्राम में भी तस्वीर बहुत अलग नहीं है। 2026 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष सेक्टर-17बी निवासी कल्याण संघ का मामला पहुँचा। न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार संबंधित कार्यकारिणी का कार्यकाल 31 मार्च 2023 को समाप्त हो चुका था। इसके बाद फरवरी 2024 में अस्थायी समिति बनाई गई और चुनाव अधिकारी नियुक्त किया गया, लेकिन चुनाव नहीं हो सके। अंततः प्रशासक-सह-निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करने की स्थिति बनी। गुरुग्राम में 2026 में 40 से अधिक अपार्टमेंट स्वामी संघों के प्रतिनिधियों की बैठक में अलग जिला पंजीयक, विवाद निवारण की तेज व्यवस्था और नियमों में सुधार की माँग भी सामने आई।
आखिर समस्या कहाँ है?
पिछले दस वर्षों के घटनाक्रम को देखें तो विवाद के कारण लगभग समान दिखाई देते हैं—
समय पर चुनाव न होना।
कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी पद पर बने रहना।
सदस्यता को लेकर विवाद।
मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोप।
रखरखाव राशि के हिसाब-किताब पर सवाल।
निर्माणकर्ता से सामुदायिक संपत्तियों का हस्तांतरण।
बड़े ठेकों और खर्चों में पारदर्शिता की माँग।
और अंततः न्यायालय की शरण।
लेकिन यहाँ एक सावधानी भी जरूरी है। पूरे दिल्ली-एनसीआर के लिए पिछले दस वर्षों में हुए सभी निवासी संघ विवादों, मुकदमों और लंबित चुनावों की एकीकृत सरकारी संख्या उपलब्ध नहीं है। इसलिए अलग-अलग जिलों और सोसायटियों के आँकड़ों को जोड़कर कोई काल्पनिक कुल संख्या बताना उचित नहीं होगा।
पिसता कौन है?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। विवाद में एक पक्ष वकील करता है, दूसरा पक्ष भी वकील करता है। शिकायतें होती हैं, जवाब आते हैं, अधिकारी जाँच करते हैं और न्यायालय में तारीखें पड़ती हैं। लेकिन आम निवासी? उसे तो हर महीने रखरखाव शुल्क देना है। लिफ्ट चलनी चाहिए। सुरक्षा बनी रहनी चाहिए। पानी आना चाहिए। बिजली की व्यवस्था होनी चाहिए। बच्चों के खेलने की जगह सुरक्षित रहनी चाहिए। यदि विवाद वर्षों चलता रहा तो उसकी कीमत अंततः सभी निवासी चुकाते हैं—धन से भी और मानसिक तनाव से भी।
समाधान क्या है?
जरूरत है कि प्रत्येक आवासीय परिसर में चुनाव की निश्चित समय-सीमा हो। मतदाता सूची समय से प्रकाशित हो। सदस्यता के नियम स्पष्ट हों। आय-व्यय का नियमित लेखा परीक्षण कराया जाए और उसकी जानकारी निवासियों को दी जाए। बड़े ठेकों में पारदर्शिता हो। कार्यकारिणी का कार्यकाल समाप्त होते ही चुनाव की स्वचालित प्रक्रिया शुरू हो। विवाद की स्थिति में न्यायालय जाने से पहले प्रभावी मध्यस्थता और शिकायत निवारण की व्यवस्था हो। निवासियों की भी जिम्मेदारी है। केवल शिकायत करने से काम नहीं चलेगा। उन्हें बैठकों में भाग लेना होगा, नियम पढ़ने होंगे, हिसाब माँगना होगा और मतदान करना होगा। क्योंकि लोकतंत्र केवल मत डालने का नाम नहीं है; जवाबदेही सुनिश्चित करने का नाम भी है।
दस वर्षों का सबसे बड़ा सबक
2016 से 2026 तक दिल्ली-एनसीआर की घटनाएँ एक बात स्पष्ट करती हैं—आवासीय सोसायटी की समिति की कुर्सी सत्ता की कुर्सी नहीं, सेवा की कुर्सी है। जिस पद के लिए पड़ोसी अपने पड़ोसी से लड़ने लगे, जिस चुनाव को कराने के लिए प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़े और जिस विवाद को अंततः न्यायालय तक जाना पड़े, वहाँ जीत किसी व्यक्ति या गुट की हो सकती है, लेकिन नुकसान पूरे समुदाय का होता है। आखिर सोसायटी किसी अध्यक्ष, सचिव या कार्यकारिणी की निजी संपत्ति नहीं है। वह उन सभी परिवारों का साझा घर है, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई लगाकर वहाँ आशियाना बनाया है। इसलिए आवश्यकता कुर्सी पाने की नहीं, व्यवस्था बचाने की है। यदि अगले दस वर्षों में आवासीय परिसरों में चुनाव पारदर्शी, समयबद्ध और नियमबद्ध हो पाए, तो शायद निवासी न्यायालयों के चक्कर लगाने के बजाय अपने परिवार के साथ उसी घर में चैन की साँस ले सकेंगे, जिसे उन्होंने कभी सुकून का आशियाना समझकर खरीदा था।
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

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