बुधवार, 10 जून 2026

कामकाजी माता-पिता और बच्चों के बीच घटता समय

 लेख-

सामाजिक प्रभाव और समाधान
बदलती जीवनशैली का नया प्रश्न

आधुनिक भारत में परिवारों की संरचना और जीवनशैली तेजी से बदल रही है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक, अब ऐसे परिवारों की संख्या बढ़ रही है जहाँ पति और पत्नी दोनों कामकाजी हैं। बढ़ती महंगाई, बेहतर जीवन स्तर की आकांक्षा और करियर की चुनौतियों ने दोहरी आय वाले परिवारों को सामान्य बना दिया है। लेकिन इस बदलाव के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उभर रहा है-क्या माता-पिता अपने बच्चों को पर्याप्त समय दे पा रहे हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक रूप से मजबूत होते परिवारों के सामने अब भावनात्मक समय की कमी एक नई चुनौती बनकर खड़ी हो गई है। बच्चे भौतिक सुविधाएँ तो पा रहे हैं, लेकिन कई बार उन्हें माता-पिता का साथ और संवाद अपेक्षित मात्रा में नहीं मिल पाता।
समय की कमी क्यों बढ़ रही है?
आज अधिकांश कामकाजी दंपतियों का दिन सुबह से ही भागदौड़ में शुरू होता है। कार्यालय आने-जाने में लगने वाला समय, बढ़ता ट्रैफिक, कार्यस्थल का दबाव और डिजिटल दुनिया की निरंतर व्यस्तता परिवार के समय को प्रभावित कर रही है। विशेषकर महानगरों में कई माता-पिता सुबह घर से निकलते हैं और शाम को देर से लौटते हैं। ऐसे में बच्चों के साथ उनका प्रत्यक्ष संवाद सीमित रह जाता है। सप्ताहांत भी कई बार सामाजिक कार्यक्रमों, अतिरिक्त कार्य या घरेलू जिम्मेदारियों में निकल जाता है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों से संकेत मिलता है कि शहरी कामकाजी परिवारों में माता-पिता बच्चों के साथ प्रतिदिन औसतन 1 से 3 घंटे का प्रत्यक्ष समय बिता पाते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि माता-पिता बच्चों की शिक्षा और गतिविधियों को लेकर पहले की तुलना में अधिक चिंतित हैं, लेकिन उनके पास समय अपेक्षाकृत कम है। कई अभिभावक स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे बच्चों के साथ पर्याप्त समय न बिता पाने के कारण अपराधबोध महसूस करते हैं।
बच्चों पर क्या पड़ रहा है प्रभाव?
1. भावनात्मक दूरी-बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। जब संवाद कम होता है तो बच्चे अपनी भावनाएँ साझा करने में संकोच करने लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे बच्चे कई बार अपनी समस्याएँ दोस्तों, सोशल मीडिया या इंटरनेट पर तलाशने लगते हैं, जबकि उन्हें सबसे पहले परिवार से मार्गदर्शन मिलना चाहिए।
2. बढ़ती अकेलेपन की भावना-संयुक्त परिवारों के कम होते जाने और परमाणु परिवारों के बढ़ने से कई बच्चे घर में अकेले समय बिताते हैं। स्कूल से लौटने के बाद यदि घर में कोई बड़ा सदस्य मौजूद न हो तो बच्चों में अकेलेपन की भावना विकसित हो सकती है। यह स्थिति लंबे समय में मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
3. स्क्रीन पर बढ़ती निर्भरता-समय की कमी का सबसे बड़ा प्रभाव डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग के रूप में दिखाई देता है। मोबाइल फोन, वीडियो गेम, सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म बच्चों के प्रमुख साथी बनते जा रहे हैं। कई परिवारों में स्क्रीन बच्चों को व्यस्त रखने का माध्यम बन गई है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से ध्यान क्षमता, नींद और सामाजिक व्यवहार प्रभावित हो सकते हैं।
4. व्यवहार संबंधी चुनौतियाँ-अध्ययन बताते हैं कि जिन बच्चों को परिवार के साथ नियमित संवाद और सहभागिता मिलती है, उनमें आत्मविश्वास अधिक होता है। इसके विपरीत, संवाद की कमी कई बार चिड़चिड़ापन, गुस्सा, असुरक्षा और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं को जन्म दे सकती है।
क्या केवल समय की मात्रा ही महत्वपूर्ण है?
विशेषज्ञों का उत्तर है नहीं। बच्चों के विकास में ‘क्वालिटी टाइम’ यानी गुणवत्तापूर्ण समय अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि माता-पिता प्रतिदिन केवल एक घंटा भी बच्चों के साथ पूरी एकाग्रता से बिताते हैं, उनकी बातें सुनते हैं, खेलते हैं या पढ़ाई में सहयोग करते हैं, तो उसका प्रभाव कई घंटों की औपचारिक उपस्थिति से अधिक हो सकता है।
परिवार के साथ समय बिताने के लाभ
1-संवाद बेहतर होता है
2-आत्मविश्वास बढ़ता है
3-शैक्षणिक प्रदर्शन सुधरता है
4-मानसिक स्वास्थ्य मजबूत होता है

विशेषज्ञों के सुझाव
साथ भोजन करें-दिन में कम से कम एक बार पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन करें। यह संवाद का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम माना जाता है।
मोबाइल-मुक्त समय तय करें-घर में प्रतिदिन कुछ समय ऐसा निर्धारित किया जाए जब सभी सदस्य मोबाइल और टीवी से दूर रहें।
बच्चों की बात सुनें-सिर्फ सलाह देने के बजाय बच्चों की बातें ध्यान से सुनना भी उतना ही आवश्यक है।
सप्ताहांत परिवार के नाम-सप्ताह में एक दिन परिवार के साथ किसी गतिविधि, भ्रमण या खेल के लिए निर्धारित किया जा सकता है।
सोने से पहले संवाद-विशेषज्ञों के अनुसार, सोने से पहले 15-20 मिनट की बातचीत बच्चों के भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत लाभकारी होती है।
तकनीक और आर्थिक विकास ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ नई सामाजिक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा, बेहतर सुविधाएँ और सुरक्षित भविष्य देना आवश्यक है, परंतु उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें समय, स्नेह और संवाद देना। बच्चों के लिए माता-पिता केवल अभिभावक नहीं, बल्कि पहले शिक्षक, मार्गदर्शक और मित्र भी होते हैं। इसलिए समय की गुणवत्ता और पारिवारिक संवाद को प्राथमिकता देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।
तथ्य बॉक्स
कामकाजी परिवार और बच्चे

1.शहरी परिवारों में माता-पिता बच्चों को औसतन 1-3 घंटे प्रतिदिन दे पाते हैं।
2.कई बच्चे प्रतिदिन 3-5 घंटे तक स्क्रीन का उपयोग करते हैं।
3.विशेषज्ञ प्रतिदिन कम से कम 30-60 मिनट गुणवत्तापूर्ण पारिवारिक समय की सलाह देते हैं।
4.साथ भोजन करने वाले परिवारों में बच्चों का भावनात्मक जुड़ाव अधिक पाया गया है।
5.संवाद और सहभागिता बच्चों के आत्मविश्वास तथा मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाते हैं।

आज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि माता-पिता बच्चों से प्रेम कम करते हैं, बल्कि यह है कि व्यस्त जीवनशैली के बीच उस प्रेम को समय में कैसे बदला जाए। आने वाले वर्षों में सफल समाज वही होगा जो आर्थिक प्रगति के साथ-साथ परिवार और बच्चों के लिए समय बचाने की संस्कृति भी विकसित कर सके।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 9 जून 2026

साहित्य में बढ़ रही है ‘कॉकरोची प्रवृत्ति’?

 लेख-

सृजन से अधिक दिखावे और नेटवर्किंग के दौर पर एक विमर्श
साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं, संघर्षों और समय की चेतना का दस्तावेज होता है। किंतु पिछले कुछ दशकों में साहित्य की दुनिया को लेकर अनेक गंभीर प्रश्न उठे हैं। क्या साहित्य अब भी समाज की पीड़ा और यथार्थ का प्रतिनिधित्व कर रहा है, या वह पुरस्कारों, प्रतिष्ठानों, गुटों और प्रचार के जाल में उलझता जा रहा है? इसी संदर्भ में कुछ आलोचक और पाठक व्यंग्य में ‘कॉकरोची साहित्य’ जैसी संज्ञा का प्रयोग करने लगे हैं। यह शब्द भले ही साहित्यिक शब्दावली का हिस्सा न हो, किंतु इसके पीछे की चिंता गंभीर है। आशय उस लेखन से है जो किसी भी परिस्थिति में स्वयं को बचाए रखने, हर सत्ता और हर प्रवृत्ति के साथ तालमेल बैठाने तथा सृजनात्मक जोखिम लेने के बजाय सुविधाजनक रास्ते चुनने लगता है।
साहित्य के बाजारीकरण पर पुरानी चिंताएँ
साहित्य में बाजार के हस्तक्षेप को लेकर चिंता कोई नई नहीं है। हिंदी के महान आलोचक रामविलास शर्मा ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का संबंध जनता के जीवन से होना चाहिए, न कि केवल प्रतिष्ठा और उपभोग से। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने भी कई अवसरों पर कहा कि साहित्य में विचार और रचना की जगह यदि केवल खेमेबाजी और प्रतिष्ठानवाद ले लें, तो साहित्य की स्वायत्तता संकट में पड़ जाती है। विश्व साहित्य में भी ऐसी चिंताएँ व्यक्त हुई हैं। प्रसिद्ध लेखक जाॅर्ज ओरवल ने लिखा था कि लेखक का सबसे बड़ा दायित्व सत्य के प्रति ईमानदार रहना है। जब लेखन सत्ता, प्रचार या निजी लाभ का उपकरण बन जाता है, तब उसकी नैतिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है।
पुरस्कार, प्रतिष्ठा और गुटबाजी
समकालीन साहित्य की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक गुटबाजी है। कई साहित्यिक मंचों, पत्रिकाओं और पुरस्कारों को लेकर समय-समय पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। वरिष्ठ हिंदी कवि केदारनाथ सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था कि साहित्य में संवाद आवश्यक है, किंतु जब समूह रचना से बड़ा हो जाए तो समस्या पैदा होती है। साहित्यिक इतिहास बताता है कि हर युग में गुट बने हैं, परंतु सोशल मीडिया के दौर में यह प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। अब लेखक की रचना से पहले उसकी डिजिटल उपस्थिति, प्रचार-क्षमता और नेटवर्क पर चर्चा होने लगी है। इससे नए और गंभीर लेखकों के सामने अतिरिक्त चुनौतियाँ खड़ी होती हैं।
सोशल मीडिया का साहित्य
डिजिटल युग ने लेखन को लोकतांत्रिक बनाया है। अब कोई भी व्यक्ति अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर सकता है। यह सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन इसके साथ कुछ समस्याएँ भी सामने आई हैं। तत्काल प्रसिद्धि की चाह में कई बार अधपकी रचनाएँ भी व्यापक प्रचार पा जाती हैं। लाइक, शेयर और फॉलोअर्स को साहित्यिक गुणवत्ता का पैमाना मान लिया जाता है। परिणामस्वरूप गहन अध्ययन, भाषा की साधना और वैचारिक तैयारी जैसी प्रक्रियाएँ पीछे छूटने लगती हैं। प्रख्यात चिंतक टीएस इलियट का मानना था कि परंपरा और अध्ययन के बिना साहित्यिक उत्कृष्टता संभव नहीं। आज यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है।
क्या पाठक भी जिम्मेदार हैं?
साहित्य की स्थिति के लिए केवल लेखक या संस्थाएँ ही जिम्मेदार नहीं हैं। पाठक समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जब पाठक गंभीर पुस्तकों के बजाय केवल चर्चित नामों तक सीमित हो जाते हैं, तब प्रकाशक और साहित्यिक संस्थाएँ भी उसी दिशा में झुकने लगती हैं। बाजार अंततः मांग का अनुसरण करता है। भारत में पुस्तक-पठन की संस्कृति पर कई अध्ययन बताते हैं कि मनोरंजन और त्वरित सामग्री की खपत बढ़ी है, जबकि गंभीर साहित्य का पाठक वर्ग अपेक्षाकृत सीमित हुआ है। ऐसे में साहित्यिक गुणवत्ता और लोकप्रियता के बीच संतुलन का प्रश्न और जटिल हो जाता है।
फिर भी उम्मीद बाकी है
समकालीन साहित्य की आलोचना जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उसके सकारात्मक पक्ष को भी देखना। आज हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में अनेक युवा लेखक ग्रामीण जीवन, पर्यावरण, स्त्री-अनुभव, दलित प्रश्न, आदिवासी समाज, प्रवासी जीवन और तकनीकी बदलावों पर गंभीर लेखन कर रहे हैं। अनेक छोटी पत्रिकाएँ और स्वतंत्र प्रकाशन संस्थाएँ भी गुणवत्तापूर्ण साहित्य को मंच दे रही हैं। ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी जैसे मंचों से सम्मानित अनेक रचनाएँ यह साबित करती हैं कि साहित्य की मुख्य धारा में अभी भी गंभीरता और सृजनात्मकता जीवित है।
कॉकरोची साहित्य’-एक रूपक, एक चेतावनी
यदि ‘कॉकरोची साहित्य’ शब्द का प्रयोग किया जाए तो उसे पूरे साहित्य की परिभाषा नहीं, बल्कि एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह उस प्रवृत्ति की आलोचना है जिसमें रचना की जगह संबंध, विचार की जगह प्रचार, और साहित्य की जगह साहित्यिक कारोबार प्रमुख हो जाता है। सच्चा साहित्य हमेशा जोखिम उठाता है। वह सत्ता से प्रश्न करता है, समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करता है और मनुष्य की संवेदनाओं को विस्तार देता है। इसके विपरीत सुविधाजनक लेखन हर परिस्थिति में स्वयं को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है। साहित्य का संकट केवल साहित्य का संकट नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक चेतना का संकट भी है। यदि हम चाहते हैं कि साहित्य अपनी गरिमा बनाए रखे, तो लेखकों को ईमानदार सृजन, आलोचकों को निष्पक्ष मूल्यांकन, संस्थाओं को पारदर्शिता और पाठकों को गंभीर पठन की संस्कृति अपनानी होगी। अन्यथा वह समय दूर नहीं जब रचना की गुणवत्ता से अधिक उसकी मार्केटिंग पर चर्चा होगी, और साहित्य के बारे में यह व्यंग्य बार-बार सुनाई देगा कि यहाँ शब्दों से अधिक ‘जीवित बने रहने की कला’ का सम्मान हो रहा है।
आज का साहित्य-एक नजर में
 1-साहित्य में गुटबाजी और पुरस्कार राजनीति पर बहस नई नहीं है।
2-सोशल मीडिया ने लेखन को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन तात्कालिकता भी बढ़ाई।
3-हिंदी के कई वरिष्ठ आलोचक साहित्य की स्वायत्तता और गुणवत्ता पर चिंता जता चुके हैं।
4-गंभीर साहित्य का पाठक वर्ग सीमित होने से बाजार-प्रधान प्रवृत्तियाँ मजबूत हुई हैं।
5-आज भी भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता का साहित्य निरंतर लिखा जा रहा है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(पत्रकार एवं लेखक)


महंगाई पर भारी शौक

 महत्वपूर्ण लेख-

खाने और घूमने पर खुलकर खर्च कर रहे भारतीय
कोरोना के बाद बदला खर्च का गणित,
अनुभवों पर बढ़ रहा निवेश

महंगाई बढ़ रही है, पेट्रोल-डीजल महंगे हैं, खाद्य पदार्थों की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं, फिर भी भारतीयों के घूमने-फिरने और खाने-पीने के शौक में कमी नहीं आई है। कोरोना महामारी के बाद देश में घरेलू पर्यटन, धार्मिक यात्राओं और बाहर भोजन करने की प्रवृत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। अब भारतीय केवल बचत करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीवन के अनुभवों पर भी खुलकर खर्च कर रहे हैं।
भारतीयों की बदलती प्राथमिकताएं
ए-2024 में घरेलू पर्यटन खर्च महामारी पूर्व स्तर से अधिक
बी-बिरयानी लगातार सबसे अधिक ऑर्डर किया जाने वाला भोजन
सी-धार्मिक पर्यटन सबसे तेजी से बढ़ता क्षेत्र
डी-युवा वर्ग आय का बड़ा हिस्सा अनुभवों पर खर्च कर रहा
ई-वीकेंड ट्रिप और शॉर्ट वेकेशन का चलन बढ़ा
एफ-ऑनलाइन फूड डिलीवरी बाजार में लगातार विस्तार
जी-डिजिटल भुगतान ने खर्च को आसान बनाया
खानपान-स्वाद पर बढ़ता खर्च
पिछले दस वर्षों में भारतीयों के खानपान की आदतों में बड़ा बदलाव आया है। पारंपरिक भोजन आज भी पसंदीदा है, लेकिन उसके साथ-साथ फास्ट फूड, कैफे संस्कृति और फूड डिलीवरी सेवाओं ने बाजार का आकार कई गुना बढ़ा दिया है।
सबसे लोकप्रिय व्यंजन
✔ बिरयानी
✔ डोसा
✔ छोले-भटूरे
✔ पिज्जा
✔ मोमोज
✔ पावभाजी
✔ बटर चिकन
विशेषज्ञों के अनुसार शहरी भारत में बाहर खाने का खर्च पहले की तुलना में दोगुना तक बढ़ा है।
घूमने की नई संस्कृति
पहले परिवार साल में एक बार लंबी छुट्टी पर जाते थे। अब लोग छोटी-छोटी यात्राएं अधिक करने लगे हैं।
सबसे लोकप्रिय पर्यटन श्रेणियां

धार्मिक पर्यटन

काशी
अयोध्या
वैष्णो देवी
उज्जैन
तिरुपति

पर्वतीय पर्यटन
मनाली
शिमला
नैनीताल
मसूरी

विरासत पर्यटन
जयपुर
उदयपुर
जोधपुर

समुद्री पर्यटन
गोवा
पुडुचेरी
कोच्चि
कोरोना के बाद क्या बदला?
महामारी ने लोगों को यह एहसास कराया कि जीवन अनिश्चित है। यही कारण है कि महामारी के बाद लोगों ने अनुभवों पर खर्च बढ़ा दिया।
पहले
विदेश यात्राओं का आकर्षण
बड़ी समूह यात्राएं
लंबी छुट्टियां
अब
घरेलू पर्यटन
परिवार केंद्रित यात्राएं
वीकेंड ट्रिप
रोड ट्रिप
धार्मिक यात्राएं
महंगाई का असर कितना?
महंगाई का असर साफ दिखाई देता है, लेकिन उसने यात्रा और खानपान की इच्छा को कम नहीं किया।
लोगों ने क्या बदला?
✔ महंगे होटल की जगह बजट होटल
✔ लंबी यात्रा की जगह छोटी यात्रा
✔ हवाई यात्रा की जगह रेल या सड़क यात्रा
✔ महंगे रेस्तरां की जगह मूल्य आधारित विकल्प
✔ ऑफ-सीजन पर्यटन
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
पर्यटन विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय उपभोक्ता अब अनुभवों को प्राथमिकता दे रहा है। युवा वर्ग अपनी आय का बड़ा हिस्सा यात्रा और मनोरंजन पर खर्च करने को तैयार है। अर्थशास्त्रियों की राय में महंगाई ने खर्च की दिशा बदली है, लेकिन खर्च की इच्छा नहीं। भारतीय उपभोक्ता खर्च रोकने की बजाय उसे पुनर्गठित कर रहा है।
युवा बने बदलाव के वाहक
18 से 35 वर्ष आयु वर्ग आज सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग है। सोशल मीडिया के प्रभाव से लोग नई जगहें खोज रहे हैं, स्थानीय व्यंजन आजमा रहे हैं, यात्रा अनुभव साझा कर रहे हैं, ‘वर्क फ्रॉम एनीवेयर’ का लाभ उठा रहे हैं।
फैक्ट फाइल
पिछले दशक की प्रमुख प्रवृत्तियां

क्षेत्र                            2015                                     2025-26
बाहर खाना                  सीमित                           सामान्य जीवनशैली
ऑनलाइन फूड ऑर्डर    शुरुआती चरण                     व्यापक उपयोग
धार्मिक पर्यटन               स्थिर                                        तेज वृद्धि
वीकेंड ट्रिप                    कम                               अत्यधिक लोकप्रिय
डिजिटल भुगतान           सीमित                              लगभग सर्वव्यापी
भारतीय समाज एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। बचत और सुरक्षा के साथ-साथ अब आनंद और अनुभव भी जीवन की प्राथमिकताओं में शामिल हो चुके हैं। यही कारण है कि बढ़ती महंगाई के बावजूद पर्यटन स्थलों पर भीड़ है, रेस्तरां भरे हुए हैं और यात्रा उद्योग लगातार विस्तार कर रहा है। आने वाले वर्षों में यह प्रवृत्ति भारतीय अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाली साबित हो सकती है। महंगाई जेब पर असर डाल सकती है, लेकिन घूमने और अच्छा खाने की इच्छा पर नहीं। आज का भारतीय उपभोक्ता वस्तुओं से अधिक अनुभवों में निवेश कर रहा है। कोरोना ने लोगों को जीवन जीने का महत्व समझाया, और यही पर्यटन व खानपान क्षेत्र की नई ऊर्जा का आधार बना है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

सोमवार, 8 जून 2026

हर साल बारिश में क्यों खुल जाती है सड़कों की पोल?

 लेख-

दिल्ली-एनसीआर देश का सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र है। यहां रोजाना करोड़ों लोग सड़कों पर सफर करते हैं। पिछले दस वर्षों में एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर और चैड़ी सड़कों का जाल बिछा है, लेकिन मानसून की पहली तेज बारिश के साथ ही विकास के दावों की परीक्षा शुरू हो जाती है। कहीं गड्ढे उभर आते हैं, कहीं सड़क धंस जाती है और कहीं जलभराव घंटों तक यातायात को जाम कर देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल सड़क निर्माण की नहीं, बल्कि ड्रेनेज सिस्टम, रखरखाव और एजेंसियों के बीच समन्वय की भी है।
दिल्ली की सबसे संवेदनशील सड़कें
पिछले कई वर्षों से कुछ सड़कें मानसून के दौरान विशेष रूप से परेशानी का कारण बनती रही हैं।
1. आउटर रिंग रोड-दिल्ली की सबसे व्यस्त सड़कों में शामिल आउटर रिंग रोड पर बारिश के दौरान गड्ढे, जलभराव और दुर्घटनाएं लगातार चिंता का विषय रहे हैं। 2025 में भी यह राजधानी की सबसे खतरनाक सड़कों में शामिल रही।
2. रिंग रोड (इनर रिंग रोड)-दिल्ली की जीवनरेखा कही जाने वाली इस सड़क पर 2025 में सर्वाधिक सड़क मौतें दर्ज की गईं। चैड़ी सड़क और तेज रफ्तार वाहनों के कारण दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
3. मथुरा रोड-बारिश के दौरान गड्ढों और जलभराव की शिकायतें लगातार आती रही हैं। सड़क की सतह कई बार टूटने के कारण यातायात प्रभावित हुआ है।
4. आईटीओ और मिंटो ब्रिज क्षेत्र-यह इलाका जलभराव के लिए वर्षों से बदनाम है। तेज बारिश के दौरान यहां वाहन फंसने और लंबा जाम लगने की घटनाएं आम रही हैं।
5. एनएच-48 (दिल्ली-गुरुग्राम मार्ग)-गुरुग्राम सीमा तक फैला यह कॉरिडोर हर मानसून में जलभराव और ट्रैफिक जाम का सामना करता है।
पिछले 10 वर्षों में सबसे खतरनाक बने सड़क क्षेत्र
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग की रिपोर्टों के अनुसार निम्न स्थान लगातार दुर्घटना-प्रवण रहे हैं-
आजादपुर मंडी जंक्शन
वजीराबाद क्षेत्र
कश्मीरी गेट-आईएसबीटी
भलस्वा चैक
मुकरबा चैक
लिबासपुर बस स्टैंड
राजोकरी फ्लाईओवर
अक्षरधाम एक्सप्रेसवे क्षेत्र
इन स्थानों पर सड़क की स्थिति, तेज रफ्तार, निर्माण कार्य और अव्यवस्थित यातायात दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण रहे हैं।
जान-माल का नुकसान
दिल्ली में सड़क दुर्घटनाएं लगातार बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
2024
111 ब्लैक स्पॉट्स पर 1,132 दुर्घटनाएं
483 लोगों की मौत
649 लोग घायल
2025
25 नए ब्लैक स्पॉट चिन्हित
176 दुर्घटनाएं
88 मौतें केवल इन नए ब्लैक स्पॉट्स पर
कुल सड़क दुर्घटनाएं
2024 में 5,657 दुर्घटनाएं
1,504 घातक दुर्घटनाएं
2025 में सड़क दुर्घटना मौतें बढ़कर 1,617 तक पहुंच गईं।
हालांकि हर दुर्घटना सीधे गड्ढों से नहीं जुड़ी होती, लेकिन मानसून में खराब सड़कें, जलभराव और दृश्यता की कमी दुर्घटनाओं का जोखिम काफी बढ़ा देती हैं।
बारिश से पहले किन सड़कों को प्राथमिकता पर सुधारना चाहिए?
विशेषज्ञों के अनुसार निम्न सड़कों पर तत्काल ध्यान आवश्यक है-
प्रथम श्रेणी
आउटर रिंग रोड
मथुरा रोड
एनएच-48
आईटीओ कॉरिडोर
वजीराबाद रोड
द्वितीय श्रेणी
आजादपुर-मुकरबा चैक क्षेत्र
भलस्वा चैक
कश्मीरी गेट क्षेत्र
राजोकरी फ्लाईओवर
तृतीय श्रेणी
विभिन्न अंडरपास
कॉलोनी कनेक्टिंग रोड
औद्योगिक क्षेत्रों की सड़कें
सरकारी प्रयास कितना असर?
गड्ढा-मुक्त अभियान-दिल्ली सरकार ने 2025 में एक ही दिन में 3,433 गड्ढे भरने का दावा किया। लगभग 1,400 किलोमीटर सड़क नेटवर्क पर मरम्मत अभियान चलाया गया।
जियो-टैगिंग और ड्रोन सर्वे-गड्ढों और खराब सड़कों की पहचान के लिए ड्रोन सर्वे और जियो-टैगिंग का उपयोग शुरू किया गया।
डिजिटल रोड मॉनिटरिंग-पीडब्ल्यूडी ने सड़क, जलभराव, अंधेरे क्षेत्रों और दुर्घटना-प्रवण स्थलों की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड विकसित करने की पहल की है।
नई तकनीक-सीएसआईआर और सीआरआरआई द्वारा विकसित ईकोफिक्स तकनीक का परीक्षण किया गया, जिससे पानी भरे गड्ढों की भी त्वरित मरम्मत संभव है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की अधिकांश सड़कें निर्माण गुणवत्ता से अधिक खराब ड्रेनेज व्यवस्था की वजह से क्षतिग्रस्त होती हैं। पानी का लगातार जमाव सड़क की ऊपरी परत को कमजोर कर देता है, जिससे गड्ढे बनते हैं और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। सड़कों के साथ-साथ नालों और वर्षा जल निकासी तंत्र के आधुनिकीकरण पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
फैक्ट बॉक्स
दिल्ली-एनसीआर सड़क सुरक्षा-एक नजर

2024 के ब्लैक स्पॉट
111 ब्लैक स्पॉट दुर्घटनाएं (2024) 1,132, मौतें (2024) 483
2025 में चिन्हित नए ब्लैक स्पॉट
25, 2025 सड़क दुर्घटना मौतें 1,617, 2025 में भरे गए गड्ढे 3,433
सबसे खतरनाक सड़कें
रिंग रोड, आउटर रिंग रोड, मथुरा रोड, एनएच-48
दिल्ली-एनसीआर की सड़कें देश की आर्थिक गतिविधियों की धुरी हैं, लेकिन मानसून हर वर्ष उनकी वास्तविक स्थिति उजागर कर देता है। यदि आउटर रिंग रोड, मथुरा रोड, आईटीओ, वजीराबाद और एनएच-48 जैसे संवेदनशील मार्गों पर समय रहते व्यापक मरम्मत, बेहतर ड्रेनेज और नियमित निगरानी सुनिश्चित नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में दुर्घटनाओं और आर्थिक नुकसान की कीमत और अधिक चुकानी पड़ सकती है। सड़क निर्माण के साथ-साथ सड़क रखरखाव को भी समान प्राथमिकता देना समय की मांग है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


रविवार, 7 जून 2026

छह साल में 114 काले हिरणों का शिकार

 लेख-

संरक्षण के बावजूद शिकार की चुनौती बरकरार
भारत की जैव विविधता में काला हिरण एक विशिष्ट स्थान रखता है। अपनी आकर्षक काया, घुमावदार सींगों और अद्भुत गति के कारण यह देश के सबसे सुंदर वन्यजीवों में गिना जाता है। कभी भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल घास के मैदानों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले काले हिरणों की आबादी बीसवीं शताब्दी के दौरान तेजी से घटने लगी थी। इसका प्रमुख कारण अंधाधुंध शिकार, कृषि विस्तार, घासभूमियों का विनाश और मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव था। हालांकि स्वतंत्र भारत में बनाए गए कठोर वन्यजीव कानूनों और समाज की बढ़ती जागरूकता ने इस प्रजाति को नया जीवन दिया है, लेकिन आज भी इसका अस्तित्व पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। हाल में सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. रंजन तोमर द्वारा प्राप्त सूचना ने एक बार फिर काले हिरणों की सुरक्षा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु अथवा शिकार से संबंधित 114 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा बताता है कि कानूनी संरक्षण के बावजूद वन्यजीव अपराधों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगाया जा सका है।
कहां-कहां पाए जाते हैं काले हिरण
काला हिरण मुख्य रूप से भारत के खुले घास के मैदानों और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। राजस्थान आज भी इसका सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है, जहां इनकी संख्या 25 हजार से अधिक आंकी गई है। इसके अतिरिक्त ओडिशा के गंजाम क्षेत्र में लगभग 9 हजार, पंजाब और हरियाणा में हजारों की संख्या में तथा गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी इनकी महत्वपूर्ण आबादी पाई जाती है। गुजरात का वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान और राजस्थान का ताल छापर अभयारण्य काले हिरणों के प्रमुख संरक्षण केंद्र हैं।
क्यों खास है यह वन्यजीव
काले हिरण का वैज्ञानिक नाम एंटीलोप सर्विकापर है। नर काले हिरण अपने काले-भूरे रंग और सर्पिलाकार सींगों के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि मादाएं हल्के भूरे रंग की होती हैं। यह दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले खुरदार जीवों में शामिल है और लगभग 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि इसे भारतीय घासभूमियों का धावक भी कहा जाता है।
कानून देता है सर्वोच्च सुरक्षा
भारत सरकार ने काले हिरण को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल किया है। यह श्रेणी देश के सबसे अधिक संरक्षित वन्यजीवों के लिए आरक्षित है। काले हिरण का शिकार, उसे घायल करना, पकड़ना या उसका अवैध व्यापार करना गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर तीन से सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
शिकार की घटनाएं क्यों नहीं रुक रहीं
विशेषज्ञों के अनुसार अवैध शिकार के पीछे कई कारण हैं। कुछ क्षेत्रों में मांस के लिए, कुछ स्थानों पर मनोरंजन अथवा ट्रॉफी शिकार के लिए और कहीं-कहीं स्थानीय संघर्षों के कारण काले हिरणों को निशाना बनाया जाता है। इसके अलावा सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले, कृषि विस्तार और प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना भी इनके अस्तित्व के लिए खतरा बने हुए हैं।
देश का सबसे चर्चित शिकार मामला
काले हिरण शिकार की चर्चा जब भी होती है तो 1998 का जोधपुर प्रकरण सबसे पहले याद किया जाता है। फिल्म ‘हम साथ-साथ हैं’ की शूटिंग के दौरान दो काले हिरणों के शिकार के आरोप में अभिनेता सलमान खान और अन्य कलाकारों के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ था। यह मुकदमा दो दशक से अधिक समय तक देश की सबसे चर्चित वन्यजीव कानूनी लड़ाइयों में शामिल रहा और इसने वन्यजीव संरक्षण कानूनों को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
वन्यजीव जीवविज्ञानी अमित गोस्वामी का मानना है कि काले हिरणों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों, विशेषकर बिश्नोई समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उनके अनुसार राजस्थान के अनेक क्षेत्रों में अभयारण्यों के बाहर भी काले हिरण सुरक्षित दिखाई देते हैं।
वन अधिकारी और शोधकर्ता गीतांजलि मेरियासेल्वम का कहना है कि संरक्षण को केवल सामाजिक आस्था पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए समुदाय आधारित संरक्षण योजनाओं और सरकारी सहयोग की आवश्यकता है। संरक्षण विशेषज्ञ टी. मुरुगावेल के अनुसार भारत में घासभूमियों के संरक्षण पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। यदि घासभूमियां सिकुड़ती रहीं तो काले हिरणों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
संरक्षण की असली कुंजी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं। वन्यजीव अपराधों की निगरानी, त्वरित न्यायिक प्रक्रिया, आधुनिक तकनीक का उपयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही दीर्घकालिक समाधान प्रदान कर सकती है। साथ ही घासभूमियों को भी उतना ही महत्व देना होगा जितना जंगलों को दिया जाता है।
साझा जिम्मेदारी
काला हिरण केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसकी बढ़ती आबादी संरक्षण की सफलता का संकेत देती है, वहीं शिकार और आवास विनाश की घटनाएं हमें सावधान भी करती हैं। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, वन विभाग और समाज मिलकर प्रयास करें तो आने वाली पीढ़ियां भी भारतीय घासभूमियों में दौड़ते हुए इस सुंदर जीव को देख सकेंगी। प्रकृति की इस अनमोल धरोहर की रक्षा करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

फैक्ट बॉक्स
    काला हिरण एक नजर में

► सामान्य नाम-काला हिरण
► वैज्ञानिक नाम-एंटीलोप सर्विकापर
► प्राकृतिक आवास-घासभूमियां, अर्द्ध-शुष्क मैदान, खुले वन क्षेत्र
► अधिकतम गति- 70-80 किलोमीटर प्रति घंटा
► विशेष पहचान-नर के लंबे सर्पिलाकार सींग और गहरा काला-भूरा रंग
► भारत में कहां पाये जाते हैं-राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश
► सबसे बड़ी आबादी-राजस्थान
► संरक्षण दर्जा-वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल
► शिकार पर सजा-3 से 7 वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना
► प्रमुख खतरे-अवैध शिकार, घासभूमियों का विनाश, सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले और मानव-वन्यजीव संघर्ष
► विशेष समुदाय-बिश्नोई समाज, जिसने सदियों से काले हिरणों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है
► प्रमुख संरक्षित क्षेत्र-ताल छापर अभयारण्य (राजस्थान), वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान (गुजरात), अबोहर क्षेत्र (पंजाब), रानीबेन्नूर ब्लैकबक अभयारण्य (कर्नाटक)
► सबसे चर्चित मामला-1998 का जोधपुर काला हिरण शिकार प्रकरण
► हालिया चिंता-आरटीआई के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु-शिकार से जुड़ी 114 घटनाएं दर्ज होने का दावा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि और पत्रकार)


शनिवार, 6 जून 2026

युवा लिख रहे हैं भारत में नए परिवर्तन की पटकथा!

 समसामयिक लेख-

रोजगार, शिक्षा और व्यवस्था से जुड़े सवालों ने युवाओं को एक बार फिर सड़कों पर ला खड़ा किया है। जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़, सोशल मीडिया पर बढ़ती सक्रियता और पारंपरिक राजनीति से मोहभंग के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत किसी नए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा है? भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जेपी आंदोलन, मंडल-कमंडल की राजनीति, अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन और किसान आंदोलन तक, समय-समय पर जनभावनाओं ने सत्ता और व्यवस्था को नई दिशा दी है। इन आंदोलनों में एक बात समान रही है, जब युवाओं ने किसी मुद्दे को अपना मुद्दा बना लिया, तब परिवर्तन की संभावना भी बढ़ी। इन दिनों कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बैनर तले युवाओं का आंदोलन चर्चा में है। बेरोजगारी, परीक्षा-पत्र लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रही आवाजों ने एक बार फिर देश का ध्यान युवाओं की ओर खींचा है।

अन्ना आंदोलन जब भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ था देश
वर्ष 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली जनआंदोलनों में गिना जाता है। उस समय राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम विवाद और अन्य भ्रष्टाचार के मामलों ने जनता में गहरा असंतोष पैदा कर दिया था। अन्ना हजारे ने जनलोकपाल कानून की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। देखते ही देखते यह आंदोलन राष्ट्रीय जनभावना का प्रतीक बन गया। दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर देश के छोटे-बड़े शहरों तक लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि इस आंदोलन का चेहरा युवा वर्ग बन गया। सोशल मीडिया के माध्यम से पहली बार किसी आंदोलन ने इतनी व्यापक जनभागीदारी देखी। बाद में इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ।

नेपाल के युवाओं ने बदला राजनीतिक विमर्श
नेपाल का हालिया राजनीतिक इतिहास भी युवाओं की भूमिका का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक चुनौतियों, भ्रष्टाचार और बढ़ते पलायन ने वहाँ के युवाओं को निराश किया। युवाओं ने सोशल मीडिया और जनसभाओं के माध्यम से अपनी नाराजगी व्यक्त की। परिणामस्वरूप राजनीतिक दलों को युवाओं के मुद्दों पर खुलकर बात करनी पड़ी। नेपाल का अनुभव यह बताता है कि जब युवाओं का असंतोष संगठित रूप ले लेता है, तो वह केवल आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक एजेंडा तय करने की क्षमता भी प्राप्त कर लेता है।

कॉकरोच जनता पार्टी-सोशल मीडिया से सड़क तक
कॉकरोच जनता पार्टी का उदय परंपरागत राजनीतिक दलों की तरह नहीं हुआ। इसकी शुरुआत सोशल मीडिया के माध्यम से हुई और धीरे-धीरे यह युवाओं की आकांक्षाओं और असंतोष का मंच बनती दिखाई देने लगी। हाल में जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ ने यह संकेत दिया कि यह केवल ऑनलाइन चर्चा भर नहीं है। युवाओं का एक वर्ग अब अपनी समस्याओं को सीधे सार्वजनिक मंचों पर उठाना चाहता है। यह आंदोलन किसी विचारधारा की बजाय युवाओं के रोजमर्रा के संघर्षों पर केंद्रित दिखाई देता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता और ताकत मानी जा रही है।

क्या हैं युवाओं की प्रमुख मांगें?
1. रोजगार के अवसर बढ़ें-देश में लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। कई वर्षों तक तैयारी करने के बावजूद नौकरी न मिल पाने की समस्या लगातार चर्चा में रही है।
2. भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता-युवाओं की मांग है कि सरकारी भर्ती प्रक्रियाएँ समयबद्ध और निष्पक्ष हों तथा नियुक्तियों में अनावश्यक देरी न हो।
3. पेपर लीक पर सख्ती-विभिन्न राज्यों में समय-समय पर परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने अभ्यर्थियों का भरोसा कमजोर किया है। युवा कठोर कानून और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
4. शिक्षा और रोजगार में बेहतर समन्वय-युवाओं का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को बाजार और उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप बनाया जाए ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार के अवसर बढ़ सकें।

अन्ना आंदोलन और सीजेपी आंदोलन की समानताएँ
दोनों आंदोलनों के मुद्दे अलग हो सकते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति में कई समानताएँ दिखाई देती हैं। युवाओं की केंद्रीय भूमिका, दोनों आंदोलनों की असली ताकत युवा वर्ग रहा है। सोशल मीडिया का प्रभाव, अन्ना आंदोलन के दौर में फेसबुक और ट्विटर ने भूमिका निभाई थी। आज इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म आंदोलन को गति दे रहे हैं। व्यवस्था से असंतोष, दोनों आंदोलनों की जड़ में व्यवस्था के प्रति असंतोष और सुधार की मांग निहित है। राजनीतिक विमर्श पर असर, इन आंदोलनों ने उन मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया जिन पर पहले अपेक्षाकृत कम चर्चा होती थी।

फिर भी कई मायनों में अलग है यह आंदोलन
अन्ना आंदोलन का केंद्र बिंदु भ्रष्टाचार और जनलोकपाल था। उसके पास स्पष्ट नेतृत्व और एक ठोस विधायी मांग थी। इसके विपरीत सीजेपी आंदोलन रोजगार, शिक्षा और अवसरों से जुड़े अनेक प्रश्नों को एक साथ उठा रहा है। यह अभी संगठनात्मक रूप से विकसित हो रहा है और इसकी दिशा आने वाले समय में अधिक स्पष्ट होगी।

क्या यह नए राजनीतिक विकल्प का संकेत है?
भारतीय राजनीति में कई बार आंदोलनों ने नए राजनीतिक विकल्पों को जन्म दिया है। अन्ना आंदोलन से आम आदमी पार्टी निकली, जबकि जेपी आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक बदलाव का रास्ता बनाया। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या सीजेपी आंदोलन भी भविष्य में किसी राजनीतिक विकल्प का आधार बन सकता है? इस प्रश्न का उत्तर अभी समय के गर्भ में है। लेकिन इतना निश्चित है कि यदि यह आंदोलन व्यापक जनसमर्थन बनाए रखता है और मजबूत संगठन विकसित करता है, तो इसका राजनीतिक प्रभाव अवश्य दिखाई देगा।

भारत का भविष्य और युवा शक्ति
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। आने वाले दशकों में देश की आर्थिक और सामाजिक दिशा इसी युवा आबादी से तय होगी। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और अवसर मिलते हैं तो भारत विश्व मंच पर और अधिक मजबूत स्थिति में पहुँच सकता है। लेकिन यदि उनकी अपेक्षाएँ लगातार अधूरी रह जाती हैं, तो असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि युवाओं की आवाज को केवल आंदोलन या विरोध के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी और संभावना दोनों के रूप में देखा जाना चाहिए।

बदलाव की दस्तक या क्षणिक उभार
अन्ना आंदोलन, नेपाल के युवा आंदोलनों और कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले उभर रहे आंदोलन की परिस्थितियाँ अलग हैं, लेकिन इन सबका मूल संदेश एक ही है-युवा अपने भविष्य को लेकर गंभीर हैं और अब अपनी बात अधिक मुखरता से कहना चाहते हैं। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह आंदोलन भारत में कोई बड़ा राजनीतिक परिवर्तन ले आएगा। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि इसने रोजगार, शिक्षा, भर्ती व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। लोकतंत्र में परिवर्तन हमेशा सत्ता परिवर्तन से नहीं आते। कई बार परिवर्तन की शुरुआत उन सवालों से होती है जिन्हें अनदेखा करना अब संभव नहीं रह जाता। जंतर-मंतर से उठती युवाओं की आवाज शायद ऐसे ही किसी नए अध्याय की प्रस्तावना हो।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


शुक्रवार, 5 जून 2026

गाजियाबाद के भी होटल, स्कूल और कॉलेज सुरक्षित नहीं!

 विशेष लेख-

दस वर्षों के अग्निकांड, प्रशासनिक कार्रवाई 
और सुरक्षा व्यवस्था की पड़ताल
तेजी से विकसित होते शहरों में सुरक्षा व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का प्रमुख शहर गाजियाबाद भी इससे अछूता नहीं है। पिछले एक दशक में शहर में बहुमंजिला इमारतों, होटलों, मॉलों, स्कूलों और कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। विकास की इस रफ्तार ने जहां नई सुविधाएं प्रदान की हैं, वहीं अग्नि सुरक्षा और आपदा प्रबंधन से जुड़े अनेक सवाल भी खड़े किए हैं। हाल के वर्षों में गाजियाबाद में हुई आग की घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या शहर के होटल, स्कूल और कॉलेज वास्तव में सुरक्षित हैं? क्या इन संस्थानों में सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है? और यदि कोई दुर्घटना हो जाए तो उससे निपटने की तैयारी कितनी है?
बढ़ती आग की घटनाएं बढ़ा रहीं चिंता
गाजियाबाद में आग लगने की घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। फायर विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 के शुरुआती चार महीनों में ही जिले में लगभग 580 अग्निकांड सामने आए। इनमें जनवरी में 79, फरवरी में 97, मार्च में 128 तथा अप्रैल में 286 घटनाएं दर्ज की गईं। विशेषज्ञों के अनुसार इनमें लगभग 90 प्रतिशत मामलों का कारण विद्युत शॉर्ट सर्किट रहा। बढ़ती गर्मी, ओवरलोड बिजली व्यवस्था, जर्जर वायरिंग और सुरक्षा मानकों की अनदेखी ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देती है। अग्निशमन विभाग का मानना है कि अधिकांश हादसे रोके जा सकते हैं, यदि भवन मालिक समय-समय पर विद्युत व्यवस्था और अग्निशमन उपकरणों की जांच कराएं।
होटलों की सुरक्षा पर सबसे अधिक सवाल
यदि सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो गाजियाबाद में होटल क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील माना जा रहा है। यहां छोटे-बड़े सैकड़ों होटल संचालित हैं, जिनमें प्रतिदिन हजारों लोग ठहरते हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्रशासनिक जांच के दौरान अनेक होटलों में फायर एनओसी, आपातकालीन निकास मार्ग और अग्निशमन उपकरणों से संबंधित कमियां सामने आईं। कुछ प्रतिष्ठानों के पास वैध फायर एनओसी तक नहीं थी, जबकि कई स्थानों पर फायर एग्जिट अवरुद्ध पाए गए। होटलों में खतरा इसलिए भी अधिक होता है क्योंकि यहां रसोईघर, गैस कनेक्शन, एयर कंडीशनिंग सिस्टम और बड़ी संख्या में विद्युत उपकरण लगातार संचालित होते हैं। यदि आग लग जाए तो मेहमान भवन की संरचना से अनजान होते हैं, जिससे निकासी और भी कठिन हो जाती है। दिल्ली-एनसीआर में हाल के वर्षों में हुए कई होटल अग्निकांड यह बता चुके हैं कि बंद खिड़कियां, संकरी सीढ़ियां और खराब अग्निशमन व्यवस्था किसी भी दुर्घटना को भयावह बना सकती हैं।
स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि
स्कूलों में प्रतिदिन हजारों बच्चे पढ़ने आते हैं। इसलिए यहां सुरक्षा के मानक अन्य संस्थानों की तुलना में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। देश में समय-समय पर हुए स्कूल अग्निकांडों और भवन दुर्घटनाओं के बाद गाजियाबाद प्रशासन ने भी विद्यालयों की सुरक्षा जांच पर विशेष ध्यान दिया है। हाल के वर्षों में सरकारी और निजी स्कूलों की इमारतों, विद्युत व्यवस्था, प्रयोगशालाओं, सीढ़ियों और अग्निशमन उपकरणों का निरीक्षण कराया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में केवल फायर एक्सटिंग्विशर लगा देना पर्याप्त नहीं है। छात्रों और शिक्षकों को यह भी पता होना चाहिए कि आग लगने की स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया करनी है। नियमित मॉक ड्रिल और आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण इसलिए अत्यंत आवश्यक हैं। कई विद्यालयों में ऐसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन अनेक पुराने संस्थानों में अब भी सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
कॉलेजों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर
गाजियाबाद में अनेक विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान संचालित हैं। इनमें इंजीनियरिंग, प्रबंधन, चिकित्सा और अन्य व्यावसायिक शिक्षा संस्थान शामिल हैं। कॉलेजों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है क्योंकि उन्हें विभिन्न नियामक संस्थाओं के सुरक्षा मानकों का पालन करना पड़ता है। अधिकांश बड़े परिसरों में फायर अलार्म, आपातकालीन निकास, सुरक्षा कर्मी और अग्निशमन उपकरण उपलब्ध होते हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि केवल उपकरणों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। उनका नियमित रखरखाव और कर्मचारियों का प्रशिक्षण भी उतना ही आवश्यक है। कई संस्थानों में मॉक ड्रिल केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है, जो किसी बड़ी दुर्घटना की स्थिति में गंभीर समस्या पैदा कर सकती है।
पिछले दस वर्षों की प्रमुख घटनाएं
गाजियाबाद में पिछले दशक के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को सामने ला दिया। खोड़ा क्षेत्र की एक बहुमंजिला इमारत में लगी भीषण आग में कई लोगों की जान चली गई। आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला। इंदिरापुरम की एक हाईराइज सोसायटी में लगी आग ने ऊंची इमारतों में सुरक्षा प्रबंधन की चुनौतियों को उजागर किया। कई फ्लैट जल गए और दमकल कर्मियों को आग पर काबू पाने में लंबा समय लगा। वैशाली स्थित एक बड़े मॉल परिसर में लगी आग ने यह दिखाया कि आधुनिक और अत्याधुनिक भवन भी जोखिम से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। साहिबाबाद और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में समय-समय पर हुए बड़े फैक्ट्री अग्निकांडों ने भी जिले की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
क्या कहते हैं दमकल अधिकारी
गाजियाबाद के मुख्य अग्निशमन अधिकारी राहुल पाल का मानना है कि अधिकांश अग्निकांड मानवीय लापरवाही का परिणाम होते हैं। उनके अनुसार, “अधिकांश आग की घटनाओं के पीछे शॉर्ट सर्किट और सुरक्षा मानकों की अनदेखी प्रमुख कारण हैं। भवनों में अग्निशमन व्यवस्था का नियमित रखरखाव अत्यंत आवश्यक है।” राहुल पाल का कहना है कि कई संस्थानों में अग्निशमन उपकरण तो लगे होते हैं, लेकिन वर्षों तक उनकी जांच नहीं होती। आपात स्थिति आने पर वे उपकरण काम ही नहीं करते। वहीं गाजियाबाद के पूर्व मुख्य अग्निशमन अधिकारी सुनील कुमार सिंह ने भी कई बार कहा था कि अनेक भवनों में अग्निशमन प्रणालियों की गंभीर कमियां पाई गईं और कई संस्थानों ने अपने एनओसी का नवीनीकरण समय पर नहीं कराया। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा केवल कागजी औपचारिकता नहीं बल्कि जीवन रक्षा का विषय है।
आग लगने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों और अग्निशमन अधिकारियों के अनुसार अधिकांश घटनाओं के पीछे कुछ सामान्य कारण जिम्मेदार होते हैं, जैसे-विद्युत शॉर्ट सर्किट, पुरानी और जर्जर वायरिंग, अग्निशमन उपकरणों का अनुपयोगी होना, आपातकालीन निकास मार्गों का अवरुद्ध होना, सुरक्षा नियमों की अनदेखी, भवनों का नियमित निरीक्षण न होना, मॉक ड्रिल और प्रशिक्षण का अभाव। इन कारणों से छोटी आग भी कुछ ही मिनटों में बड़ी दुर्घटना का रूप ले लेती है।
प्रशासन की कार्रवाई
सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए गाजियाबाद प्रशासन और अग्निशमन विभाग ने हाल के वर्षों में कई अभियान चलाए हैं। होटलों, मॉलों, अस्पतालों, स्कूलों और अन्य सार्वजनिक भवनों का फायर ऑडिट कराया गया। नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों को नोटिस जारी किए गए और कई मामलों में कार्रवाई भी की गई।
स्कूलों तथा कॉलेजों में आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल को बढ़ावा दिया गया। फायर विभाग लगातार जागरूकता कार्यक्रम भी चला रहा है ताकि लोग दुर्घटना से पहले ही सावधानी बरत सकें।
आगे क्या किया जाना चाहिए
विशेषज्ञों का मानना है कि गाजियाबाद जैसे तेजी से बढ़ते शहर में सुरक्षा को विकास का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि सभी होटलों का वार्षिक फायर ऑडिट अनिवार्य हो। स्कूलों और कॉलेजों में नियमित मॉक ड्रिल कराई जाए। पुरानी इमारतों की संरचनात्मक जांच हो। विद्युत वायरिंग का समय-समय पर परीक्षण कराया जाए। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो। नागरिकों को भी अग्नि सुरक्षा के प्रति जागरूक बनाया जाए।
पिछले दस वर्षों का अनुभव बताता है कि गाजियाबाद के होटल, स्कूल और कॉलेज पूरी तरह असुरक्षित नहीं हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं कहा जा सकता। होटलों में अग्नि सुरक्षा संबंधी कमियां सबसे अधिक चिंता का विषय हैं, जबकि स्कूलों और कॉलेजों में आपदा प्रबंधन और नियमित प्रशिक्षण को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। बढ़ती आग की घटनाएं यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि सुरक्षा को केवल सरकारी जिम्मेदारी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। संस्थानों, प्रशासन और नागरिकों तीनों को मिलकर सुरक्षा संस्कृति विकसित करनी होगी। क्योंकि किसी भी दुर्घटना के बाद होने वाली क्षति की भरपाई संभव नहीं होती, लेकिन समय रहते बरती गई सावधानी अनेक जिंदगियां बचा सकती है।
गाजियाबाद की सुरक्षा तस्वीर

अध्ययन अवधि- 2016-2026
2026 के पहले चार महीनों में आग की घटनाएं-लगभग 580
प्रमुख कारण-लगभग 90 प्रतिशत मामलों में शॉर्ट सर्किट
चिन्हित असुरक्षित भवन- 42
फायर ऑडिट के दायरे में आए स्कूल-लगभग 400
सबसे संवेदनशील क्षेत्र-होटल, हाईराइज भवन और भीड़भाड़ वाले व्यावसायिक परिसर
प्रमुख संदेश-“सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, आवश्यकता है।”

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)