रविवार, 2 नवंबर 2025

भारत के मंदिरों में भगदड़, आस्था में अव्यवस्था का अभिशाप

 विशेष लेख-

 -कारण, आँकड़े और निवारण पर एक गहन विश्लेषण

हाल ही में एक नवंबर 2025 को कांठिका मास की अकादमी पर आंध्र प्रदेश के जिला श्रीकाकुलम के कासीबुग्गा स्थित श्री वेंक्टेश्वर मंदिर में मची भगदड़ में नौ लोगों की मौत हो गई तो अनेक घायल हुए। भारत की आध्यात्मिक भूमि पर मंदिर केवल उपासना के स्थल नहीं, बल्कि सामूहिक श्रद्धा और सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं। यहाँ हर दिन लाखों लोग दर्शन और पूजा के लिए आते हैं। किंतु जब यही आस्था नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो वह विनाश का रूप ले लेती है। देश में समय-समय पर मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में हुई भगदड़ की घटनाएँ इस कटु सत्य को सामने रखती हैं कि हमारी भक्ति कितनी असंगठित और प्रशासनिक तैयारी कितनी अपर्याप्त है।
बढ़ते हादसे, घटती संवेदनशीलता-पिछले दो दशकों में भारत ने कई भयावह भगदड़ें देखीं। सरकारी और स्वतंत्र रिपोर्टों के अनुसार, 2001 से 2014 के बीच ही 3,200 से अधिक घटनाओं में लगभग 2,400 लोगों की मौत हुई। 2025 तक यह संख्या 3,000 से ऊपर पहुँच चुकी है।

कुछ प्रमुख उदाहरण
1.मांधारदेवी मंदिर, महाराष्ट्र (2005)ः भीड़ के दबाव में लगभग 350 श्रद्धालुओं की मृत्यु।
2.नैना देवी, हिमाचल प्रदेश (2008)ः अफवाह से मची अफरा-तफरी में 146 लोग मारे गए।
3.चामुंडा देवी, जोधपुर (2008)ः रेलिंग टूटने से 224 लोगों की जान गई।
4.रतनगढ़ माता मंदिर, मध्य प्रदेश (2013)ः पुल पर भगदड़, 115 श्रद्धालु मृत।
5.वैष्णो देवी, जम्मू-कश्मीर (2022)ः नववर्ष की रात 12 श्रद्धालु मारे गए।
6.हाथरस, उत्तर प्रदेश (2024)ः धार्मिक प्रवचन के दौरान भगदड़ में 120 से अधिक मौतें।
7.मानसा देवी, हरिद्वार (2025)ः सावन में भीड़ के दबाव से 6 लोगों की मौत, दर्जनों घायल।
हर घटना के बाद संवेदना तो उमड़ती है, मगर कुछ सप्ताहों में सब भूल जाते हैं। व्यवस्था फिर वैसी ही ढर्रे पर लौट आती है.

मूल कारणः श्रद्धा से अधिक अव्यवस्था
1. भीड़-प्रबंधन की कमी-अधिकांश हादसों में यह पहली और मुख्य वजह होती है। आयोजक एवं प्रशासन अनुमान नहीं लगा पाते कि कितने लोग आएंगे, और सीमित स्थान में अत्यधिक भीड़ घुस जाती है।
2. संकीर्ण मार्ग और ढाँचे की कमजोरी-कई मंदिर पुराने हैं, जिनमें प्रवेश और निकासी के मार्ग संकरे हैं। रेलिंग, सीढ़ियाँ या पुल पुराने और कमजोर हो जाते हैं।
3. अफवाह और घबराहट-“बिजली गिरी”, “भूकंप आया” या “साँप निकला” जैसी अफवाहें भगदड़ का तात्कालिक कारण बनती हैं।
4. प्रशासनिक समन्वय का अभाव-पुलिस, नगर निकाय और मंदिर प्रबंधन में अक्सर पूर्व-योजना की कमी रहती है। आपात स्थिति में कोई तय जिम्मेदारी नहीं होती।
5. श्रद्धालुओं का अनुशासनहीन व्यवहार-जल्दी दर्शन या प्रसाद के लिए लाइन तोड़ना, धक्का देना, ये छोटे कदम बड़े हादसों का रूप ले लेते हैं।
मानवीय और सामाजिक असर-भगदड़ के दृश्य भयावह होते हैं। जमीन पर बिखरे जूते, टूटी चप्पलें, शवों के ढेर और चीखते परिवार। इनमें सबसे ज़्यादा जानें महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की जाती हैं। इन घटनाओं से न केवल समाज की व्यवस्था पर प्रश्न उठता है, बल्कि धार्मिक पर्यटन की साख को भी धक्का पहुँचता है। मंदिर-प्रबंधन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

निवारणः आस्था के साथ व्यवस्था
1. भीड़-प्रबंधन योजना-हर बड़े धार्मिक स्थल के लिए नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट की गाइडलाइन के अनुसार विस्तृत योजना बनाई जाए, जिसमें एंट्री, एग्ज़िट, आपात मार्ग और भीड़ की अधिकतम सीमा तय हो।
2. संरचनात्मक सुधार-पुराने पुलों, सीढ़ियों और रेलिंग की नियमित जाँच हो। जरूरत पड़ने पर पुनर्निर्माण किया जाए।
3. डिजिटल निगरानी-सीसीटीवी, ड्रोन और भीड़-गणना तकनीक से वास्तविक समय में निगरानी रखी जाए।
4. ऑनलाइन स्लॉट और ई-टिकट व्यवस्था-जैसे तिरुपति या सबरीमाला में किया गया है, उसी प्रकार बड़े मंदिरों में दर्शन के लिए ऑनलाइन स्लॉट निर्धारित किए जाएँ।
5. आपातकालीन चिकित्सा और प्रशिक्षण-हर मंदिर में मेडिकल टीम, एम्बुलेंस और प्रशिक्षित स्वयंसेवक तैनात हों। त्योहारों से पहले ‘मॉक ड्रिल’ की जाए।
6. जन-जागरूकता अभियान-श्रद्धालुओं को समझाया जाए कि संयम और अनुशासन भी पूजा का हिस्सा हैं। धक्का-मुक्की या लाइन तोड़ना पाप के समान है।
7. अफवाह नियंत्रण और सूचना प्रणाली-मंदिरों में लाउडस्पीकर और स्क्रीन के माध्यम से सही सूचना तत्काल दी जाए ताकि अफवाहें न फैलें।
8. जवाबदेही तय हो-हर हादसे के बाद जांच हो, लेकिन उसके निष्कर्षों को लागू करना सबसे जरूरी है। लापरवाही पर कठोर दंड हो।
भविष्य की दिशा-भारत में धार्मिक पर्यटन निरंतर बढ़ रहा है। 2023 में करीब 65 करोड़ लोग किसी न किसी धार्मिक स्थल पर गए। इतने विशाल प्रवाह को सुरक्षित बनाने के लिए अब राष्ट्रीय धार्मिक सुरक्षा नीति की आवश्यकता है। इसमें मंदिर प्रबंधन को ‘स्मार्ट टेम्पल मिशन’ के तहत तकनीकी रूप से सशक्त बनाया जाए। जहाँ सेंसर, डिजिटल क्यू-प्रणाली और रियल-टाइम मॉनिटरिंग हो।
भगदड़ केवल भीड़ की गलती नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है। हर वह मौत, जो मंदिरों की सीढ़ियों पर होती है, हमें यह याद दिलाती है कि श्रद्धा कभी भी विवेक से बड़ी नहीं हो सकती। यदि हम “श्रद्धा में अनुशासन” को अपना लें तो भारत के मंदिर केवल भक्ति के नहीं, सुरक्षा और संगठन के भी प्रतीक बन सकते हैं। समय आ गया है कि हम कहें-“भक्ति वही सच्ची है, जो जीवन बचाए, न कि उसे लील जाए।”

लेखक-
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

कृत्रिम वर्षा-विज्ञान से आसमान तक

 लेख-

जलवायु परिवर्तन और वैश्विक ऊष्मीकरण के इस दौर में जब प्राकृतिक वर्षा का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है, तब “कृत्रिम वर्षा” यानी क्लाउड सीडिंग तकनीक नई आशा की तरह सामने आई है। यह तकनीक बादलों में रासायनिक पदार्थ (जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या ड्राई आइस) छिड़ककर वर्षा की संभावना को बढ़ाने का प्रयास करती है। सरल शब्दों में कहें तो यह “आसमान को मनाना” है, ताकि बादल अपने जलकण बरसा दें।
 दुनिया में कृत्रिम वर्षा का इतिहास और प्रयोग
कृत्रिम वर्षा का पहला प्रयोग 1940 के दशक में अमेरिका में हुआ, जब वैज्ञानिक विन्सेंट शेफर ने सिल्वर आयोडाइड और ड्राई आइस के प्रयोग से हिमपात करवाने का दावा किया। इसके बाद से लगभग 50 से अधिक देशों ने इस तकनीक को आजमाया है। चीन इस क्षेत्र में सबसे बड़ा खिलाड़ी है। बीजिंग ओलंपिक (2008) के दौरान चीन ने बारिश को नियंत्रित करने के लिए क्लाउड सीडिंग तकनीक का व्यापक उपयोग किया था। अब चीन का लक्ष्य है कि वर्ष 2035 तक अपने देश में वर्षा की मात्रा को 5 से 10 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए। संयुक्त अरब अमीरात ने रेगिस्तानी मौसम के कारण वर्षा की कमी को दूर करने हेतु 2010 के दशक में बड़े पैमाने पर ड्रोन-आधारित सीडिंग प्रोग्राम शुरू किया। थाईलैंड में तो इसे “रॉयल रेनमेकिंग प्रोजेक्ट“ कहा गया, जो राजा भूमिबोल अदुल्यादेज के संरक्षण में चला। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और मेक्सिको जैसे देशों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इसका उपयोग किया है। इन प्रयासों से यह साबित होता है कि कृत्रिम वर्षा सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही, यह अब जल-संकटग्रस्त देशों की जलनीति का हिस्सा बन चुकी है।

भारत में कृत्रिम वर्षा, प्रयोग और अनुभव
भारत में भी इस दिशा में कई प्रयोग हुए हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम की अनिश्चितता, सूखे और जल संकट को देखते हुए राज्य सरकारों ने समय-समय पर क्लाउड सीडिंग कार्यक्रम चलाए। तमिलनाडु ने सबसे पहले 1983-84 में कृत्रिम वर्षा का प्रयोग किया। बाद में 1993-94 में फिर से प्रयास किया गया। कर्नाटक ने 2003 में बड़े पैमाने पर यह कार्यक्रम चलाया, जिसे “वर्षा योजना” कहा गया। इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र को राहत देना था। महाराष्ट्र में 2015 के आसपास “वार्म क्लाउड मॉडिफिकेशन एक्सपेरिमेंट” किया गया, जो 11 वर्षों तक चला। वैज्ञानिकों ने पाया कि वर्षा की मात्रा में लगभग 18 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई। दिल्ली में हाल ही में (2025) क्लाउड सीडिंग की तैयारी की जा रही है, ताकि वायु प्रदूषण कम किया जा सके और वायुमंडल की नमी बढ़े। हालाँकि, भारत में इस तकनीक का कोई स्थायी या केंद्रीकृत कार्यक्रम नहीं है। विभिन्न राज्यों ने इसे अस्थायी उपाय के रूप में अपनाया है, लेकिन इसका राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन अभी नहीं हुआ।
यह तकनीक कैसे काम करती है-क्लाउड सीडिंग के लिए विशेष विमान या रॉकेट का उपयोग किया जाता है। इनसे रासायनिक पदार्थ बादलों में छोड़े जाते हैं, जिससे जलकण संघनित होकर बारिश की बूंदों में बदलते हैं।

इस प्रक्रिया के तीन प्रमुख तरीके हैं-
1.स्टैटिक सीडिंग-बादलों में सिल्वर आयोडाइड डालकर संघनन प्रक्रिया तेज करना।
2.डायनामिक सीडिंग-वायु धाराओं की गति को प्रभावित कर बारिश को बढ़ाना।
3.हाइड्रोस्कोपिक सीडिंग-सोडियम क्लोराइड (नमक) से बादलों के जलकणों को बड़ा करना।

संभावित फायदे
क्लाउड सीडिंग के कई वैज्ञानिक और सामाजिक लाभ हो सकते हैं-
1.वर्षा बढ़ाना, सूखे या शुष्क क्षेत्रों में जलस्रोतों को पुनः भरने में मदद।
2.कृषि लाभ, बारिश पर निर्भर फसलों को आवश्यक पानी उपलब्ध हो सकता है।
3.भूजल स्तर में सुधार, कृत्रिम वर्षा से तालाब, झीलें और बांध पुनः भर सकते हैं।
4.धूल और प्रदूषण नियंत्रण, बारिश से हवा में मौजूद प्रदूषक तत्व धुल सकते हैं (जैसे दिल्ली में योजना)।
5.बिजली उत्पादन, जलाशयों में पानी बढ़ने से हाइड्रो पावर प्लांट की कार्यक्षमता बढ़ सकती है।

नुकसान और सीमाएँ
हालाँकि इसके लाभ अनेक हैं, पर इसके जोखिम और सीमाएँ भी कम नहीं-
1.वैज्ञानिक अनिश्चितता, विशेषज्ञ मानते हैं कि कृत्रिम वर्षा की सफलता दर लगभग 60-70 प्रतिशत है, और कई बार यह काम नहीं करती क्योंकि उपयुक्त बादल न हों तो रासायनिक छिड़काव बेअसर रहता है।
2.उच्च लागत, एक-एक अभियान में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं।
3.पर्यावरणीय खतरे, सिल्वर आयोडाइड जैसे रसायनों का दीर्घकालिक प्रभाव मिट्टी और जल पर अभी स्पष्ट नहीं है।
4.न्यायसंगतता का प्रश्न, अगर एक क्षेत्र में वर्षा बढ़ाई जाती है, तो दूसरे क्षेत्र के बादल “चुराए” जा सकते हैं, जिससे असंतुलन पैदा होता है।
5.सीमित प्रभाव क्षेत्र, यह तकनीक केवल मौजूदा बादलों पर ही काम करती है; नए बादल नहीं बना सकती।
भारत में सफलता बनाम असफलता-अब तक भारत में हुई सभी क्लाउड सीडिंग परियोजनाओं के बारे में कोई केन्द्रीय डेटाबेस उपलब्ध नहीं है। हालाँकि विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, कुछ प्रयोग आंशिक रूप से सफल रहे हैं, जबकि कुछ में वर्षा अपेक्षा से बहुत कम हुई। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के प्रयोग में वर्षा में औसतन 15-18 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। लेकिन कर्नाटक के कुछ अभियानों में अपेक्षित बारिश नहीं हुई और वैज्ञानिकों ने इसे “मौसमी परिस्थितियों पर निर्भर” बताया। कुल मिलाकर, भारत में अब तक दर्जनों प्रयोग किए जा चुके हैं, लेकिन “असफलता की सटीक संख्या” सार्वजनिक रूप से दर्ज नहीं है।
भविष्य की दिशा-भारत में बढ़ते जल संकट और अनिश्चित मानसून को देखते हुए, कृत्रिम वर्षा भविष्य में एक सहायक तकनीक साबित हो सकती है। हालाँकि, इसके लिए सरकार को चाहिए कि इस पर राष्ट्रीय नीति तैयार करे, वैज्ञानिक संस्थानों को संयुक्त रूप से अनुसंधान करने दे, पर्यावरणीय सुरक्षा के मानक तय करे और इसके सामाजिक-आर्थिक लाभ-हानि का पारदर्शी मूल्यांकन करे। कृत्रिम वर्षा एक ऐसी तकनीक है जिसमें विज्ञान, पर्यावरण और उम्मीद  तीनों का संगम है। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि संभावनाओं की प्रयोगशाला है। अगर इसका सही, पारदर्शी और पर्यावरण-सुरक्षित उपयोग किया जाए, तो यह सूखे, जल-संकट और प्रदूषण जैसी आधुनिक समस्याओं का एक महत्वपूर्ण समाधान बन सकती है। परंतु इसे अपनाने से पहले हमें यह समझना होगा कि आसमान को मनाने से पहले, धरती को समझना भी उतना ही ज़रूरी है। भारत में कृत्रिम वर्षा के प्रयोग अभी शुरुआती दौर में हैं। इसके लिए दीर्घकालिक योजना, वैज्ञानिक निवेश और पर्यावरणीय दृष्टि से सावधानी आवश्यक है। तभी यह तकनीक हमारे सूखते जल-संसाधनों को फिर से जीवन दे सकेगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

दिल्ली-एनसीआर बढ़ता प्रदूषण, व्यवस्था लाचार

 विशेष लेख-

भारत की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर क्षेत्र (गाज़ियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम आदि) पिछले एक दशक से लगातार प्रदूषण के चंगुल में फंसे हुए हैं। सर्दियाँ आते ही हवा जहरीली हो जाती है, साँस लेना कठिन और दृश्यता धुँधली हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दिल्ली विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में शीर्ष स्थान पर बनी हुई है। यह सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों का संकट बन चुका है।

पिछले 10 वर्षों का प्रदूषण परिदृश्य (वर्षवार आँकड़े)
वर्ष पीएम10 माइकोग्राम) पीएम 2.5 (माइकोग्राम) स्थिति

2015      295            133          अत्यंत गंभीर
2016      303            137 विश्व के सबसे खराब शहरों में
2017      277            130 कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं
2018      277            128      स्थिर प्रदूषण स्तर
2019      230            112 कुछ सुधार, पर सीमा से ऊपर
2020      187            101 लॉकडाउन का सकारात्मक प्रभाव
2021      221            113             फिर वृद्धि
2022      223            103      औसत स्तर समान
2023      219            106 डब्ल्यूएचओ मानक से 20 गुना अधिक
2024 (प्रारंभिक) 210             98 मामूली गिरावट, पर असुरक्षित स्तर
(स्रोतः डीपीसीसी 2023-24)
डब्ल्यूएचओ मानक के अनुसार पीएम 2.5 की अधिकतम स्वीकृत सीमा 5 माइकोग्राम है, जबकि भारतीय मानक 40 माइकोग्राम है। इस दृष्टि से दिल्ली की हवा 2023 में भी 20 गुना ज्यादा जहरीली थी।

प्रदूषण के मुख्य कारण
वाहन प्रदूषण (40 प्रतिशत)-दिल्ली की सड़कों पर प्रतिदिन लगभग 1.3 करोड़ वाहन चलते हैं। डीज़ल वाहन और ट्रैफिक जाम से निकलने वाला धुआँ सबसे बड़ा कारक है।
निर्माण और सड़क धूल (20 प्रतिशत)-निर्माण कार्यों, सड़कों की धूल और खुले में खुदाई से बड़ी मात्रा में पीएम 10 कण उड़ते हैं।
कृषि अवशेष (पराली) जलाना (15 प्रतिशत)-हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने से सर्दियों में दिल्ली की हवा में ज़हरीले तत्व 30-40 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं।
औद्योगिक उत्सर्जन (10 प्रतिशत)-एनसीआर में फैक्ट्रियाँ और थर्मल पावर स्टेशन गंधक ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड छोड़ते हैं।
घरेलू प्रदूषण और कूड़ा जलाना (10 प्रतिशत)-खुले में कचरा जलाना और ठोस ईंधन के प्रयोग से भी हवा दूषित होती है।

स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
फेफड़ों की बीमारियाँ-अस्थमा, सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़) और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियाँ तेजी से बढ़ी हैं।
हृदय रोग और स्ट्रोक-लगातार प्रदूषित हवा में रहने से हृदयाघात और स्ट्रोक का खतरा 30 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
कैंसर-डब्ल्यूएचओ ने बताया है कि पीएम 2.5 के लंबे समय तक संपर्क से फेफड़ों के कैंसर की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर प्रभाव-दिल्ली में जन्म लेने वाले बच्चे अपने फेफड़ों की क्षमता का औसतन 10 प्रतिशत हिस्सा खो देते हैं। गर्भस्थ शिशुओं में जन्म से पहले मृत्यु और कम वजन के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है।

मौतों का भयावह आँकड़ा
2019 में लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 17 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं। अकेले दिल्ली में हर वर्ष 10,000-12,000 लोगों की असामयिक मृत्यु का अनुमान है। स्टेट ऑफ ग्लोबल एअर रिपोर्ट 2023 के अनुसार, दिल्ली में वायु प्रदूषण से औसतन जीवन प्रत्याशा 11.9 वर्ष घट जाती है। 2021 में प्रकाशित आईआईटी दिल्ली अध्ययन के अनुसार, वायु प्रदूषण के कारण राजधानी के अस्पतालों में श्वसन रोगी 30 प्रतिशत बढ़े। बच्चों की मृत्यु दर में भी बढ़ोतरी हुई। 2022 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में पाँच वर्ष से कम उम्र के हर 1000 बच्चों में से 9 की मृत्यु प्रदूषणजन्य कारणों से हुई।

सरकारी प्रयास और योजनाएँ
(1) ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (जीआरएपी)
दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण के स्तर के अनुसार चार चरणों में कार्रवाई-
स्टेज वन (एक्यूआई 201-300)-सड़कों पर पानी का छिड़काव।
स्टेज टू (एक्यूआई 301-400)-निर्माण गतिविधियाँ सीमित।
स्टेज थ्री ((एक्यूआई 401-450)-स्कूल बंद, डीज़ल जेनरेटर प्रतिबंधित।
स्टेज फॉर ((एक्यूआई 450 से कम)-ट्रक एंट्री बंद, निर्माण पूर्ण प्रतिबंध।
(2) राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी)
2019 में शुरू हुआ। लक्ष्य 2017 के स्तर की तुलना में 2024 तक प्रदूषण में 30 प्रतिशत कमी लाना। लेकिन 2023 तक दिल्ली में पीएम 2.5 में औसत कमी मात्र 12 प्रतिशत रही।
(3) वाहन नीति और ईंधन सुधार
बीएस फोर ईंधन लागू किया गया। पुराने 15 साल से अधिक वाहनों पर प्रतिबंध। इलेक्ट्रिक वाहन नीति (ईवी पॉलिसी 2020) से अब तक 1 लाख से अधिक ई-वाहन पंजीकृत हुए।
(4) पराली प्रबंधन योजना
दिल्ली सरकार ने पूसकंपोस्ट बायो-डीकंपोजर का उपयोग किया, जिससे खेतों में पराली जलाने की आवश्यकता घटे। फिर भी हरियाणा-पंजाब में पराली जलाने के 60,000 से अधिक मामले 2024 में दर्ज हुए।
(5) कचरा प्रबंधन
कूड़ा जलाने पर सख्ती, तीन वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट सक्रिय किए गए हैं, लेकिन क्षमता अभी भी आधी ही उपयोग हो पा रही है.

आर्थिक और सामाजिक असर
2022 के एक वर्ल्ड बैंक अध्ययन के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से सालाना 2.6 अरब डॉलर (लगभग 21,000 करोड रुपये़) का आर्थिक नुकसान होता है। उत्पादकता में गिरावट और स्वास्थ्य खर्चों में वृद्धि इसके मुख्य कारण हैं। गरीब वर्ग सबसे अधिक प्रभावित है, जो खुले में रहते हैं और जिनके पास एयर प्यूरिफायर या बंद आवास की सुविधा नहीं है।

निवारण के उपाय
1.सार्वजनिक परिवहन का विस्तार और निजी वाहन उपयोग पर नियंत्रण।
2.निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और हरित पट्टी बढ़ाना।
3.पराली के लिए किसानों को वैकल्पिक मशीनें व आर्थिक सहायता। 4.थर्मल पावर संयंत्रों में आधुनिक उत्सर्जन नियंत्रण तकनीक लागू करना।
5.नागरिक स्तर पर पर्यावरण शिक्षा, वृक्षारोपण और “ग्रीन डेज़” का पालन।
दिल्ली-एनसीआर की हवा हर वर्ष हजारों लोगों की जान ले रही है। पिछले दस वर्षों में सरकारों ने नीतियाँ बनाईं, योजनाएँ लागू कीं, लेकिन परिणाम सीमित रहे हैं। पीएम 2.5 का स्तर आज भी 100 माइकोग्राम के आसपास है, जो सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। वायु प्रदूषण सिर्फ पर्यावरणीय नहीं बल्कि मानवीय आपदा है। जब तक केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर ठोस, निरंतर और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कार्य नहीं करतीं, तब तक दिल्ली की साँसों में जहर बना रहेगा। नागरिकों को भी यह समझना होगा कि यह संकट हमारे अपने जीवन का प्रश्न है कृ तभी “दिल्ली की हवा” सच में सुधर सकेगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)



किन्नर समाज, अस्तित्व की स्वीकार्यता की लड़ाई

 विशेष लेख-

-पुरुष और स्त्री के बीच किन्नर समुदाय की सामाजिक स्थिति
-कानूनी अधिकार, संख्या और सरकारों के प्रयासों पर एक समग्र दृष्टि

मानव सभ्यता की लिंग-धारणा सदियों तक केवल “पुरुष” और “स्त्री” तक सीमित रही। लेकिन प्रकृति ने इन दो सीमाओं के बीच एक और सच्चाई रची किन्नर समाज। भारतीय संस्कृति में इन्हें कभी आशीर्वाद देने वाला तो कभी अपशकुन मानकर तिरस्कृत करने वाला व्यवहार मिला। आज यह समुदाय शिक्षा, रोजगार, सम्मान और समान अवसर की माँग को लेकर विश्वभर में संघर्षरत है।

भारत में किन्नर समुदाय का सामाजिक स्थान
भारतीय परंपरा में किन्नरों का उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। शिखंडी और अर्धनारीश्वर जैसे पात्र बताते हैं कि तीसरा लिंग सृष्टि का अभिन्न हिस्सा है। विवाह, जन्म या उत्सव में इनके आशीर्वाद को मंगलकारी माना जाता है, फिर भी सामाजिक जीवन में इन्हें हाशिए पर रखा गया।

कानूनी मान्यता : अधिकार की पहली जीत
भारत में किन्नर समुदाय को संवैधानिक मान्यता वर्ष 2014 में मिली,
जब सर्वोच्च न्यायालय ने नालसा बनाम भारत संघ प्रकरण में इन्हें तीसरा लिंग घोषित किया। न्यायालय ने कहा, “लिंग पहचान हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।” इसके बाद 2019 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम लागू हुआ, जिसने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आवास में भेदभाव को अपराध घोषित किया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट (2021) बताती है कि भारत में 92 प्रतिशत किन्नरों को स्थायी रोजगार नहीं मिलता और 50 प्रतिशत से अधिक अपने परिवारों से बेदखल हैं।

विश्व में स्थिति और संख्या
विश्व जनसंख्या समीक्षा (2024) के अनुसार, विश्व में लगभग 34 लाख 40 हज़ार (3.44 मिलियन) तृतीय लिंग व्यक्ति हैं।
देश                    अनुमानित संख्या        वर्ष
अमेरिका               10,00,000           2018
ब्राज़ील                 10,00,000           2018
फिलीपीन्स             3,17,000           2024
दक्षिण अफ्रीका        1,02,300           2024
कनाडा                   1,01,000           2021
भारत                       96,200           2022
पाकिस्तान               52,400            2016
नेपाल                      21,500            2016
बांग्लादेश                 12,600            2023
भारत में 2011 की जनगणना में 4.9 लाख लोग “ट्रांसजेंडर” के रूप में दर्ज हुए थे, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार वास्तविक संख्या कई गुना अधिक है।

आंदोलन और संघर्ष की कहानी
1969 के स्टोनवॉल आंदोलन (अमेरिका) ने विश्व में समानता की लड़ाई को स्वर दिया। दक्षिण एशिया में नेपाल ने 2007 में, पाकिस्तान ने 2009 में और भारत ने 2014 में तीसरे लिंग की कानूनी मान्यता दी। भारत में गौरव यात्राएँ, मिस ट्रांस क्वीन प्रतियोगिता और किन्नर परिषदों की स्थापना ने इस समुदाय को आत्मसम्मान और दृश्यता प्रदान की।

भारत सरकार के प्रयास
गरिमा गृह योजना (2020)-सामाजिक न्याय मंत्रालय की इस योजना के तहत बेघर या हिंसा पीड़ित किन्नरों को आवास, भोजन और कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है। अब तक 12 गरिमा गृह स्थापित हो चुके हैं।
राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर पोर्टल और हेल्पलाइन (2021)-इस पोर्टल के माध्यम से पहचान पत्र, प्रमाणपत्र और योजनाओं की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध है। हेल्पलाइन 14567 पर परामर्श और शिकायत सुविधा दी जा रही है।
शिक्षा और रोजगार योजनाएँ-यूजीसी ने तृतीय लिंग विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति और प्रवेश में आरक्षण का प्रावधान किया। कर्नाटक ने सरकारी सेवाओं में 1 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। कौशल विकास मंत्रालय के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अब तक 4000 से अधिक किन्नर लाभान्वित हुए हैं।
स्वास्थ्य सेवाएँ-तमिलनाडु और केरल में लिंग परिवर्तन सर्जरी निःशुल्क कराई जा रही है। दिल्ली, महाराष्ट्र और केरल में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र कार्यरत हैं।

राज्य सरकारों की पहलें
-केरल : 2015 में भारत की पहली ट्रांसजेंडर नीति लागू।
-तमिलनाडु : पहचान पत्र, पेंशन और छात्रवृत्ति योजना प्रारंभ।
-दिल्ली : “गौरव योजना” के अंतर्गत मासिक पेंशन और बीमा सुविधा।
-महाराष्ट्र : “किन्नर कल्याण निधि” से ब्याज-मुक्त ऋण।
-मध्य प्रदेश : “किन्नर सम्मान योजना” के अंतर्गत राज्य सम्मान।

अंतरराष्ट्रीय प्रयास
-अर्जेंटीना : 2012 में लिंग पहचान कानून लागू; सरकारी नौकरियों में 1 प्रतिशत आरक्षण।
-नेपाल : पासपोर्ट में “अन्य” श्रेणी और नागरिकता अधिकार।
-बांग्लादेश : सामाजिक सुरक्षा भत्ता योजना।
-पाकिस्तान : ट्रांसजेंडर आयोग और शिक्षा-स्वास्थ्य योजनाएँ।
-ब्राज़ील व मेक्सिको : हिंसा-निरोधक निगरानी तंत्र की स्थापना।

चुनौतियाँ अब भी बरकरार
कानूनी मान्यता के बावजूद किन्नर समाज को समाज में बराबरी का दर्जा मिलना अभी दूर है। ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाएँ नहीं पहुँच पातीं, बहुत-से लोग सामाजिक तिरस्कार के भय से अपनी पहचान छिपा लेते हैं और स्वास्थ्य सेवाएँ सीमित हैं। समाधान के रूप में सरकारों को शिक्षा पाठ्यक्रम में लिंग संवेदनशीलता, निजी क्षेत्र में रोजगार अवसर और ग्राम स्तर पर पुनर्वास योजनाएँ सशक्त करनी होंगी।

समानता की ओर एक कदम और
किन्नर समाज की लड़ाई केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि अस्तित्व की स्वीकार्यता की है। भारत और विश्व के 70 से अधिक देशों में तीसरे लिंग को मान्यता मिल चुकी है, पर वास्तविक समानता तभी आएगी जब समाज उन्हें स्नेह, सम्मान और अवसर देगा। “हम सब समान हैं, चाहे हमारा लिंग कुछ भी हो।” यही संदेश आज हर सरकार और हर नागरिक के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)



बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसायटियों में बढ़ते विवाद

 कारण, उदाहरण, निवारण और सरकारी प्रयास


भा
रत की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर (नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद, गाजियाबाद) क्षेत्र आज देश के सबसे विकसित शहरी इलाकों में गिने जाते हैं। यहाँ लाखों लोग बहुमंज़िला हाउसिंग सोसायटियों में रहते हैं। ये सोसायटियाँ आधुनिक जीवनशैली का प्रतीक तो बन गई हैं, लेकिन इनके भीतर उठते विवाद अब एक गंभीर सामाजिक व प्रशासनिक समस्या का रूप ले चुके हैं। आमतौर पर इन सोसायटियों में “साझा जीवन, सुविधाएँ और सुरक्षा” का सपना देखा जाता है, लेकिन व्यवहार में आए दिन मेंटेनेंस फीस, पार्किंग, पानी-बिजली, समिति चुनाव, भ्रष्टाचार और सदस्य-असहमति जैसे विवाद सुर्खियाँ बनते रहते हैं।


विवादों के प्रमुख कारण
1.मेंटेनेंस और शुल्क विवाद-दिल्ली और गुरुग्राम की कई सोसायटियों में मेंटेनेंस चार्ज को लेकर विवाद आम हैं। उदाहरण के तौर पर नोएडा सेक्टर 137 की पाम ओलंपिया सोसायटी में निवासियों ने समिति के खिलाफ धरना दिया क्योंकि मेंटेनेंस चार्ज हर वर्ष बिना स्पष्ट लेखे बढ़ा दिया गया था। कई परिवारों का आरोप था कि उन्हें सुरक्षा और सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी पूरी नहीं मिल रहीं। इसी तरह, गुरुग्राम की निर्वाणा कंट्री सोसायटी में बिजली बैकअप और मेंटेनेंस चार्ज को लेकर निवासी और प्रबंधन में टकराव इतना बढ़ा कि मामला अदालत तक पहुँचा। गोविन्दपुरम गाजियाबाद की गौड़ होम्स सोसायटी में चुनाव, रखरखाव और गबन का मुद्दा गर्माया हुआ है। आरोप है कि प्रशासन द्वारा चुनाव कराने के बाद भी पूर्व पदाधिकारी अपने पद छोड़ने के बजाय कोर्ट कचहरी के चक्कर काट रहे हैं। इससे सोसायटी का आम जनमानस तो परेशान है ही नई कार्यकारिणी सदस्य भी आर्थिक अभाव में अपने कर्तव्यों को सही से अंजाम नहीं दे पा रहे।
2.प्रबंधन समितियों की पारदर्शिता की कमी-अक्सर सोसायटी के मैनेजिंग कमेटी पर भ्रष्टाचार, फर्जी बिलिंग और ठेकेदारों से सांठगांठ के आरोप लगते हैं। दिल्ली वसंत कुंज की ए-2 ब्लॉक कोऑपरेटिव सोसायटी में सदस्यों ने शिकायत की कि प्रबंधन समिति ने लाखों रुपये के पेंटिंग और लिफ्ट रिपेयर के बिल बिना जनरल बॉडी की मंजूरी के पास कर दिए। इन मामलों में चुनाव समय पर न होना, लेखा पुस्तकों का न दिखाया जाना और सदस्यों को वोट का अधिकार न मिलना, विवाद को जन्म देता है।
3.अवैध निर्माण और नियमों का उल्लंघन-एनसीआर की कई सोसायटियों में सदस्य अपने फ्लैटों में अवैध विस्तार, बालकनी बंद करना या टेरेस पर कमरे बनाना शुरू कर देते हैं, जिससे न केवल सौंदर्य बिगड़ता है बल्कि सुरक्षा पर भी असर पड़ता है। गाजियाबाद की इंदिरापुरम की एक सोसायटी में ऐसे ही एक मामले में लिफ्ट शाफ्ट में अवैध निर्माण से संरचना कमजोर हो गई थी और स्थानीय विकास प्राधिकरण को हस्तक्षेप करना पड़ा।
4.सदस्यों के आपसी विवाद और अनुशासनहीनता-कई बार विवाद समिति से नहीं, बल्कि निवासियों के आपसी टकराव से शुरू होते हैं। जैसे पार्किंग स्लॉट, पालतू जानवरों का व्यवहार, रात का शोर या सामुदायिक स्थानों के उपयोग पर असहमति। नोएडा सेक्टर 75 की एक सोसायटी में पालतू कुत्ते को लेकर दो परिवारों में झगड़ा इतना बढ़ा कि मामला पुलिस थाने तक पहुँचा। इस प्रकार के छोटे विवादों की बढ़ती घटनाएँ “साझा समुदाय” की भावना को कमजोर कर रही हैं।
5.भ्रष्टाचार और सरकारी निगरानी की कमी-दिल्ली की कई पुरानी हाउसिंग सोसायटियाँ जैसे द्वारका सेक्टर-6 और 11 की कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसायटियाँ में सदस्यों ने शिकायत की कि समिति और रजिस्ट्रार ऑफिस के बीच मिलीभगत से फर्जी ऑडिट रिपोर्टें बनाई गईं। कई बार शिकायतें वर्षों तक लंबित रहती हैं, जिससे निवासियों में सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ता है।

विवाद निवारण के उपाय
विवादों को रोकने और हल करने के लिए सोसायटी स्तर पर कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं-
1.स्पष्ट नियमावली और पारदर्शिता-हर सोसायटी को अपने बायलॉज को समय-समय पर अपडेट करना चाहिए। नियमों की प्रति हर सदस्य को दी जानी चाहिए। यदि शुल्क, पार्किंग, मेंटेनेंस के नियम पहले से लिखित रूप में हों तो विवाद की संभावना घट जाती है।
2.लेखा-जांच और जवाबदेही-समिति को सालाना ऑडिट कराना चाहिए और खर्च का लेखा सभी सदस्यों के लिए पारदर्शी बनाना चाहिए। दिल्ली में कई सोसायटियों ने अब “ऑनलाइन अकाउंटिंग सिस्टम” शुरू किया है ताकि कोई अनियमितता छिप न सके।
3.नियमित चुनाव और सामूहिक निर्णय-जनरल बॉडी मीटिंग्स (जीबीएम) नियमित अंतराल पर आयोजित होनी चाहिए। प्रत्येक बड़े निर्णय जैसे ठेके देना, शुल्क बढ़ाना या मेंटेनेंस कंपनी बदलना सदस्यों की आम सहमति से होना चाहिए।
4.मध्यस्थता और संवाद-छोटे विवादों को अदालत में ले जाने की बजाय सोसायटी के भीतर या किसी निष्पक्ष मध्यस्थ के जरिए सुलझाया जा सकता है। दिल्ली डिस्प्यूट रेजॉल्यूशन सोसाइटी इस तरह की मध्यस्थता को प्रोत्साहन देती है। यहाँ ट्रेंड मध्यस्थों के माध्यम से बिना खर्च विवाद सुलझाए जा सकते हैं।
5.सदस्यों की शिक्षा और जिम्मेदारी-सदस्यों को अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए। अक्सर किरायेदारों और नए निवासियों को नियमों की जानकारी नहीं होती, जिससे विवाद बढ़ते हैं। कुछ सोसायटियों ने अब “सोसायटी इंडक्शन मीटिंग” शुरू की है ताकि नए सदस्य सभी नियमों को समझ लें।

सरकारी प्रयास और विधिक प्रावधान
1.दिल्ली में कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों को संचालित करने के लिए यह दिल्ली कॉपरेटिव सोसायटीज एक्ट 2003 और रूल्स 2007 कानून लागू है। इसमें सोसायटी के गठन, चुनाव, वित्तीय अनुशासन और विवाद निवारण की विस्तृत प्रक्रिया दी गई है। इस अधिनियम के तहत रजिस्ट्रार ऑफ कॉपरेटिव सोसायटीज यानी आरसीएस सोसायटियों की निगरानी करता है।
2.दिल्ली सरकार ने आरसीएस की वेबसाइट पर ऑनलाइन शिकायत प्रणाली शुरू की है, जिससे सदस्य अपने विवाद दर्ज कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, 2024 में दिल्ली सरकार ने आरसीएस पॉर्टल लॉन्च किया, जिसमें सोसायटियों से जुड़ी फाइलें, ऑडिट रिपोर्ट और शिकायतें ऑनलाइन ट्रैक की जा सकती हैं।
3.दिल्ली डिस्प्युट रिसोलेशन सोसायटी यानी डीडीआरएस “विवाद सुलझाओ, अदालत मत जाओ” की भावना के तहत कार्य करती है। यहाँ हाउसिंग सोसायटी विवाद, पारिवारिक विवाद, मकान-मालिक और किरायेदार विवाद मध्यस्थता द्वारा हल किए जाते हैं। इस संस्था ने 2024 तक लगभग 35,000 से अधिक मामलों में सफल समाधान किया है।
4.नोएडा और ग्रेटर नोएडा में नॉएडा अथॉरिटी और जीएनआईडीए, जबकि गुरुग्राम में डिपार्टमेंट ऑफ टाउन एंड कंट्री प्लानिंग सोसायटियों के निर्माण और रखरखाव की निगरानी करते हैं। इन प्राधिकरणों ने “रेसिडेंट ग्रिवांस पोर्टल” शुरू किए हैं जहाँ निवासी शिकायतें दर्ज कर सकते हैं।
5.यदि सोसायटी विवाद आंतरिक रूप से नहीं सुलझता, तो दिल्ली कॉ-ऑॅपरेटिव ट्रिब्यूनल या कंज्यूमर कोर्ट में मामला ले जाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर 2023 में नोएडा की एमरल्ड कोर्ट सोसायटी के निवासियों ने बिल्डर के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में केस जीता और मेंटेनेंस चार्ज में राहत पाई।

भविष्य की दिशा : सुधार की राह
हाउसिंग सोसायटियों को “साझा समाज” के रूप में विकसित करने के लिए प्रशासनिक सुधार और नागरिक सहयोग, दोनों आवश्यक हैं।
कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं-
ई-गर्वनेंस प्रणाली-सभी सोसायटियों में डिजिटल वोटिंग, ऑनलाइन ऑडिट और शिकायत ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जाए।
सोसायटी ओम्बड्समैन की नियुक्ति-हर जिले में एक स्वतंत्र अधिकारी नियुक्त किया जाए जो सोसायटी मामलों की त्वरित सुनवाई करे।
समिति प्रशिक्षण कार्यक्रम-प्रबंधन समिति के सदस्यों को प्रशिक्षण दिया जाए कि वे कानून, वित्त और संवाद-कौशल में दक्ष बनें।
निवासी भागीदारी को बढ़ावा-प्रत्येक निर्णय में पारदर्शी जनमत या ऑनलाइन सर्वे के माध्यम से सदस्य की भागीदारी सुनिश्चित हो।
राज्य स्तरीय निरीक्षण अभियान-समय-समय पर सरकार द्वारा सोसायटियों के ऑडिट और निरीक्षण किए जाएँ ताकि भ्रष्टाचार पर रोक लगे।
दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसायटियाँ आधुनिक भारत की शहरी जीवनशैली का आईना हैं, जहाँ विविध समुदाय एक साथ रहते हैं। लेकिन जब पारदर्शिता, संवाद और ईमानदारी कमजोर पड़ जाती है, तो यही सहजीवन विवाद का केंद्र बन जाता है। जरूरत है कि सरकार, सोसायटी प्रबंधन और निवासी तीनों मिलकर साझा जिम्मेदारी निभाएँ। जहाँ नियमों का पालन, पारदर्शिता और संवाद की संस्कृति मजबूत होगी, वहीं ये सोसायटियाँ वास्तव में “नए भारत की शहरी सभ्यता” की मिसाल बन सकेंगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

दिल्ली-एनसीआर में महंगे स्वास्थ्य का फैलता जाल

 विशेष लेख-


(स्वास्थ्य के नाम पर बढ़ती व्यावसायिकता और आमजन की पीड़ा)
भारत की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर (नोएडा, गुरुग्राम, ग़ाज़ियाबाद, फरीदाबाद) देश के सबसे विकसित और आधुनिक क्षेत्रों में गिने जाते हैं। यहाँ की चमक-दमक, ऊँची इमारतें और आधुनिक अस्पताल देखने में तो विश्वस्तरीय लगते हैं, परंतु इस चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है, “महंगे स्वास्थ्य का फैलता जाल”, जो धीरे-धीरे आम नागरिक को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। स्वास्थ्य, जो संविधान के अनुसार हर नागरिक का मौलिक अधिकार होना चाहिए, अब एक “व्यापार” बनता जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर में यह व्यापार इतना विशाल हो चुका है कि आज इलाज का खर्च मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक रीढ़ तोड़ रहा है।
बढ़ती लागत, घटती राहत-हाल ही में राष्ट्रीय स्वास्थ्य खाता (एनएचए) रिपोर्ट 2024 में बताया गया कि भारत में एक व्यक्ति का औसतन वार्षिक स्वास्थ्य व्यय पिछले दस वर्षों में तीन गुना बढ़ गया है। दिल्ली-एनसीआर में यह वृद्धि देश के औसत से भी कहीं अधिक है। यहाँ प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च प्रति दिन 15,000 रुपये से 60,000 रुपये तक पहुँच चुका है, जबकि सरकारी अस्पतालों की क्षमता सीमित है। एक साधारण डेंगू या वायरल बुखार का निजी अस्पताल में इलाज 70,000 से एक लाख रुपये तक में होता है। हार्ट स्टेंट सर्जरी, जो कुछ वर्ष पहले 1.5 लाख में हो जाती थी, अब 3-5 लाख रुपये तक पहुँच गई है। आईसीयू का एक दिन का खर्च कई अस्पतालों में 25,000 रुपये से अधिक है।
स्वास्थ्य का कॉरपोरेटकरण-दिल्ली-एनसीआर में स्वास्थ्य सेवाएँ अब “कॉरपोरेट हेल्थ सेक्टर” के नियंत्रण में हैं। फोर्टिस, अपोलो, मणिपाल, मैक्स, मेट्रो, यशोदा, पारस, ब्लडचेन जैसी श्रृंखलाएँ अब एक “हेल्थ इंडस्ट्री” बना चुकी हैं। आरोप है कि इनकी कार्यप्रणाली में सेवा भावना से अधिक व्यवसायिक रणनीति देखने को मिलती है। रोगी अब “पेशेंट” नहीं बल्कि “कस्टमर” कहलाने लगा है। अस्पतालों में “ट्रीटमेंट पैकेज” और “रूम अपग्रेड” योजनाएँ ऐसे प्रस्तुत की जाती हैं जैसे यह कोई पर्यटन सेवा हो। 2025 के एक सर्वे के अनुसार, एनसीआर के 10 प्रमुख निजी अस्पतालों में 78 प्रतिशत मरीजों को “अनावश्यक जांच” या “अतिरिक्त दवाओं” की सिफारिश की गई थी। इसका उद्देश्य अक्सर बिलिंग बढ़ाना होता है, न कि रोगी के उपचार में वास्तविक सुधार।

मध्यम वर्ग पर आर्थिक बोझ-मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अब स्वास्थ्य संकट आर्थिक आपदा बन गया है। इंश्योरेंस होने के बावजूद अस्पतालों के “कैशलेस क्लेम” जटिल प्रक्रिया में फँस जाते हैं और मरीज के परिवार को तत्काल भुगतान करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली के ग़ाज़ियाबाद निवासी अमित तिवारी के पिता की एक सामान्य हृदय सर्जरी का बिल 4.8 लाख रुपये आया, जिसमें से बीमा कंपनी ने मात्र 2.3 लाख रुपये का भुगतान किया। शेष 2.5 लाख नकद देने पड़े। यह एक सामान्य परिवार के लिए विनाशकारी बोझ है। ऐसे कई उदाहरण बताते हैं कि बीमा और अस्पताल के बीच के जाल में आम आदमी सबसे कमजोर कड़ी बन गया है।
सरकारी अस्पतालों की सीमाएँ-दिल्ली में एम्स, सफदरजंग, आरएमएल जैसे बड़े सरकारी संस्थान हैं, परंतु इनकी क्षमता कुल मरीजों की माँग के मुकाबले बहुत सीमित है। एम्स में एक गंभीर मरीज को बिस्तर मिलने में औसतन 7 से 10 दिन लग जाते हैं। सरकारी अस्पतालों की भीड़ और संसाधनों की कमी के कारण आम जनता को मजबूर होकर निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। एनसीआर के ज़िला अस्पतालों (जैसे ग़ाज़ियाबाद, फरीदाबाद, गुरुग्राम) की रिपोर्ट बताती है कि 70 प्रतिशत तक सुविधाएँ या तो पुरानी हैं या कम स्टाफ के कारण उपयोग में नहीं हैं।
दवाइयों और जांचों का मुनाफ़ा खेल-महंगे इलाज का एक बड़ा हिस्सा डायग्नोस्टिक टेस्ट और फार्मेसी बिल से आता है। एनसीआर के कई अस्पतालों में 30-40 प्रतिशत तक कमीशन की व्यवस्था जांच केंद्रों और दवा कंपनियों के बीच होती है। डॉक्टरों को “टारगेट” पूरा करने के लिए कहा जाता है। यानी हर माह इतनी जांचें या दवाइयाँ लिखनी ही होंगी। इससे स्वास्थ्य सेवा “उपचार” से अधिक “व्यवसाय मॉडल” में बदल रही है।

कानूनी व नियामक ढिलाई-भारत में निजी अस्पतालों पर नियंत्रण के लिए क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 2010 है, परंतु दिल्ली और कई एनसीआर राज्यों में इसका पालन आधा-अधूरा है। राज्य स्वास्थ्य नियामक प्राधिकरणों के पास पर्याप्त निरीक्षण क्षमता नहीं है, और अस्पतालों की लॉबी इतनी शक्तिशाली है कि शिकायतें अक्सर लंबित रह जाती हैं। महंगे इलाज के मामलों में अदालतें भी कई बार हस्तक्षेप करती हैं। जैसे मणिपाल हॉस्पिटल और फोर्टिस गुरुग्राम पर अधिक बिलिंग के मामले सामने आए, परंतु दंडात्मक कार्रवाई दुर्लभ है।

क्या है समाधान
स्वास्थ्य नीति में संतुलन-सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्वास्थ्य सेवाएँ “सेवा” और “व्यापार” के बीच संतुलन बनाए रखें।
बीमा प्रणाली का पारदर्शी ढाँचा-हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों और अस्पतालों के बीच पारदर्शी दरें तय की जाएँ। बीमा क्लेम में मरीज को कभी नुकसान न हो।
नियामक सख्ती-क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट को पूरे एनसीआर में पूर्ण रूप से लागू किया जाए। बिलिंग, जांच और दवा मूल्य निर्धारण पर नियमित निरीक्षण हो।
सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण-एम्स जैसे मॉडल को जिला स्तर तक विस्तार दिया जाए। डॉक्टरों की संख्या, बिस्तरों और सुविधाओं में भारी वृद्धि आवश्यक है।
जनजागरूकता और डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म-नागरिकों को अपने अधिकारों और मान्य शुल्क संरचना की जानकारी हो। “राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल” पर हर अस्पताल की फीस और शिकायत व्यवस्था सार्वजनिक की जाए।
दिल्ली-एनसीआर का स्वास्थ्य परिदृश्य दो चेहरों वाला है। एक तरफ अत्याधुनिक सुविधाएँ, विश्वस्तरीय अस्पताल और उन्नत तकनीक है; दूसरी तरफ, इन सुविधाओं तक पहुँचने की कीमत इतनी अधिक है कि आम नागरिक बीमार होने से भी डरने लगा है। यदि सरकार, चिकित्सा संस्थान और समाज मिलकर स्वास्थ्य को “मानव अधिकार” की तरह देखें, न कि “मुनाफ़े के साधन” की तरह, तो दिल्ली-एनसीआर न केवल देश बल्कि पूरे एशिया में “स्वास्थ्य राजधानी” बन सकता है। “इलाज का उद्देश्य जीवन बचाना होना चाहिए, न कि बिल बढ़ाना।”

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

जीएसटी की दरें घटीं, फिर भी राहत क्यों नहीं

 लेख-


दीवाली का पर्व भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा अवसर होता है। यह केवल दीपों का त्योहार नहीं, बल्कि खपत और बाजार की रौनक का प्रतीक भी है। हर साल इस मौसम में करोड़ों रुपये की खरीदारी होती है, दुकानों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर ऑफर की बाढ़ आ जाती है। फिर भी उपभोक्ता के मन में एक सवाल लगातार बना हुआ है-“सरकार ने तो कई वस्तुओं पर जीएसटी घटाया है, फिर भी बाजार में चीजें सस्ती क्यों नहीं हुईं?” इस सवाल का जवाब भारत की टैक्स प्रणाली, सप्लाई चेन और मूल्य निर्धारण की वास्तविकता में छिपा है।
1.दीवाली का अर्थशास्त्र, खपत का मौसम-भारत की जीडीपी में निजी उपभोग व्यय का हिस्सा लगभग 60 प्रतिशत है। त्योहारी सीजन, विशेषकर दीवाली, इस खपत को चरम पर ले जाता है। 2024 में भारतीय उपभोक्ताओं ने दीवाली के अवसर पर लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपये की खरीदारी की थी, जो पिछले वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक थी। फिर भी उपभोक्ता को राहत का एहसास नहीं हुआ, क्योंकि अधिकांश वस्तुओं की कीमतों में अपेक्षित गिरावट नहीं दिखी।
2.सरकार ने दरें घटाईं, लेकिन असर सीमित-जब जुलाई 2017 में वस्तु एवं सेवा कर लागू हुआ था, तब इसका उद्देश्य था-“एक राष्ट्र, एक टैक्स, एक बाजार।” समय के साथ सरकार ने कई वस्तुओं पर टैक्स घटाया-
वस्तु पहले की दर      अब की दर
मोबाइल फोन 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
इलेक्ट्रिक वाहन 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
एलईडी बल्ब 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
सोलर उपकरण 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
वस्त्र (1000 रुपये तक) 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
किताबें, खाद्यान्न 5 प्रतिशत या 0 प्रतिशत 0 प्रतिशत
वित्त मंत्रालय के अनुसार, 2025 में औसत मासिक जीएसटी संग्रह  1.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है, जो दर्शाता है कि टैक्स प्रणाली स्थिर और सफल है। लेकिन कीमतों में राहत उतनी स्पष्ट नहीं है जितनी उम्मीद की गई थी।
3.सप्लाई चेन की लागत ने खाया लाभ-जीएसटी घटने के बावजूद उपभोक्ता को राहत क्यों नहीं मिली, इसका बड़ा कारण है-सप्लाई चेन की बढ़ी हुई लागत। पिछले कुछ वर्षों में  ईंधन की कीमतें लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ीं। परिवहन लागत 25-30 प्रतिशत तक बढ़ी। मजदूरी और किराया औसतन 20 प्रतिशत बढ़ा। पैकेजिंग और विज्ञापन खर्च में 15 प्रतिशत वृद्धि हुई। इन सबके कारण उत्पाद की आधार कीमत इतनी बढ़ गई कि जीएसटी घटने का प्रभाव नगण्य रह गया।
4.व्यापारी “लाभ पास ऑन” नहीं करते-सरकार ने एंटी प्रॉफिटिंग कानून बनाया ताकि टैक्स में कमी का लाभ उपभोक्ता तक पहुँचे। लेकिन व्यवहार में, व्यापारी और निर्माता इस लाभ को अपने मार्जिन में जोड़ लेते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी रेफ्रिजरेटर की कीमत 30,000 रुपये थी और जीएसटी 18 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत किया गया, तो कीमत लगभग 1,500 रुपये कम होनी चाहिए थी। परंतु व्यापारी या ब्रांड ने अपनी लागत या मार्जिन बढ़ाकर अंतिम कीमत 29,800 रुपये ही रखी, यानी उपभोक्ता को केवल 200 रुपये की राहत। इस तरह का व्यवहार पूरे बाजार में आम है, जिससे सरकार का लाभ जनता तक नहीं पहुँच पाता।
5.जटिलता और इनपुट टैक्स क्रेडिट का जाल-जीएसटी प्रणाली में “इनपुट टैक्स क्रेडिट” की सुविधा है, यानी निर्माता या व्यापारी, जो टैक्स उसने कच्चे माल पर दिया, वह अपने आउटपुट टैक्स से घटा सकता है। लेकिन यह प्रक्रिया अत्यंत तकनीकी और जटिल है। कई छोटे व्यापारी आईटीसी क्लेम करने में सक्षम नहीं हैं, जिससे उनकी कुल लागत बढ़ जाती है, और वे उपभोक्ता से अधिक वसूलने को मजबूर हो जाते हैं।
6.महँगाई का दबाव-जीएसटी की दरें घटीं जरूर हैं, लेकिन महँगाई दर लगातार 5 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। अर्थात हर साल सामान्य कीमतों में बढ़ोतरी होती ही है। 2023 में औसत महँगाई दर 5.7 प्रतिशत, 2024 में 5.3 प्रतिशत और 2025 में अनुमानित 5.2 प्रतिशत रही। इस महँगाई का असर यह है कि टैक्स में कमी की राहत मूल्य वृद्धि के दबाव में गुम हो जाती है।
7.छोटे बनाम बड़े व्यापारी-जीएसटी का सबसे बड़ा प्रभाव छोटे व्यापारियों पर पड़ा है। बड़ी कंपनियाँ ऑटोमेटेड सिस्टम, सॉफ्टवेयर और अकाउंटिंग टीम के जरिए टैक्स मैनेज कर लेती हैं। लेकिन छोटे दुकानदारों को हर महीने रिटर्न, बिलिंग और इनवॉइस की झंझट में समय और पैसा दोनों खर्च करना पड़ता है। इन अतिरिक्त खर्चों को वे कीमत में जोड़ देते हैं। इससे छोटे बाजारों में सामान महँगा और ऑनलाइन पोर्टल पर अपेक्षाकृत सस्ता दिखता है।
8.उपभोक्ता के अनुभव की सच्चाई-गाज़ियाबाद की गृहिणी रीना गुप्ता बताती हैं “सरकार कहती है टैक्स घटा है, लेकिन बाजार में सब चीज़ें महँगी ही लगती हैं। मिठाई, कपड़े, सजावट किसी पर भी वास्तविक राहत महसूस नहीं होती।” दिल्ली के इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापारी अमित खुराना कहते हैं “हमारी मार्जिन 7-8 प्रतिशत रह गई है। अगर हम ग्राहक को छूट दें तो टैक्स का बोझ हमारे सिर पर आता है। इसलिए जीएसटी घटने के बावजूद हम कीमत कम नहीं कर पाते।”
9.विशेषज्ञों की राय-आर्थिक विश्लेषक डॉ. अरुण कुमार कहते हैं “जीएसटी का मूल उद्देश्य सरलता था, पर आज यह पाँच दरों वाली जटिल प्रणाली बन गई है। जब तक टैक्स दरें एक समान और प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होंगी, राहत अधूरी रहेगी।” वित्त विशेषज्ञ मीरा रस्तोगी का कहना है “जीएसटी दरों में कमी दीर्घकालिक लाभ देती है, राजस्व स्थिरता, कर चोरी में कमी, लेकिन तत्काल उपभोक्ता राहत महँगाई और व्यापारी व्यवहार के कारण नहीं पहुँचती।”
आगे का रास्ता : सुधार और उम्मीद
सरकार अब जीएसटी 2.0 की दिशा में सोच रही है, जहाँ 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत के तीन स्लैब को मिलाकर एक समान दर बनाने की चर्चा है। यदि ऐसा हुआ, तो कर संरचना और सरल हो सकती है, और उपभोक्ता को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। साथ ही डिजिटल रिटर्न प्रक्रिया और ई-इनवॉइसिंग प्रणाली को सरल बनाना भी जरूरी है, ताकि छोटे व्यापारियों पर अनुपालन का बोझ घटे।
टैक्स घटा, लेकिन राहत अधूरी
जीएसटी ने भारत की टैक्स प्रणाली को एकीकृत और पारदर्शी बनाया है। सरकार ने कई वस्तुओं पर दरें घटाईं, ताकि उपभोक्ता को राहत मिले। लेकिन बढ़ती लागत, महँगाई, और बाजार की व्यवहारिक कठिनाइयों के कारण वह राहत जमीन तक पहुँच नहीं पा रही। दीवाली जैसे पर्वों पर जब उपभोक्ता अपनी मेहनत की कमाई से खरीदारी करने निकलता है तो उसे सबसे पहले मूल्य की पारदर्शिता चाहिए, न कि केवल विज्ञापन में लिखी जीएसटी ऑफ की पंक्ति। जब टैक्स प्रणाली सचमुच सरल, समान और उपभोक्ता-केंद्रित बनेगी, तभी कहा जा सकेगा कि जीएसटी की दरें घटीं और राहत सचमुच आम जनता तक पहुँची। जीएसटी भारत के आर्थिक सुधार का बड़ा कदम है, लेकिन इसे “जन-हित” का रूप देने के लिए अब अगला चरण जरूरी है, जहाँ सरकार, व्यापारी और उपभोक्ता तीनों की साझेदारी से वास्तविक आर्थिक राहत आम लोगों तक पहुँचे।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)