विशेष लेख-
-पुरुष और स्त्री के बीच किन्नर समुदाय की सामाजिक स्थिति
-कानूनी अधिकार, संख्या और सरकारों के प्रयासों पर एक समग्र दृष्टि
मानव सभ्यता की लिंग-धारणा सदियों तक केवल “पुरुष” और “स्त्री” तक सीमित रही। लेकिन प्रकृति ने इन दो सीमाओं के बीच एक और सच्चाई रची किन्नर समाज। भारतीय संस्कृति में इन्हें कभी आशीर्वाद देने वाला तो कभी अपशकुन मानकर तिरस्कृत करने वाला व्यवहार मिला। आज यह समुदाय शिक्षा, रोजगार, सम्मान और समान अवसर की माँग को लेकर विश्वभर में संघर्षरत है।
-कानूनी अधिकार, संख्या और सरकारों के प्रयासों पर एक समग्र दृष्टि
मानव सभ्यता की लिंग-धारणा सदियों तक केवल “पुरुष” और “स्त्री” तक सीमित रही। लेकिन प्रकृति ने इन दो सीमाओं के बीच एक और सच्चाई रची किन्नर समाज। भारतीय संस्कृति में इन्हें कभी आशीर्वाद देने वाला तो कभी अपशकुन मानकर तिरस्कृत करने वाला व्यवहार मिला। आज यह समुदाय शिक्षा, रोजगार, सम्मान और समान अवसर की माँग को लेकर विश्वभर में संघर्षरत है।
भारत में किन्नर समुदाय का सामाजिक स्थान
भारतीय परंपरा में किन्नरों का उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। शिखंडी और अर्धनारीश्वर जैसे पात्र बताते हैं कि तीसरा लिंग सृष्टि का अभिन्न हिस्सा है। विवाह, जन्म या उत्सव में इनके आशीर्वाद को मंगलकारी माना जाता है, फिर भी सामाजिक जीवन में इन्हें हाशिए पर रखा गया।
कानूनी मान्यता : अधिकार की पहली जीत
भारत में किन्नर समुदाय को संवैधानिक मान्यता वर्ष 2014 में मिली,
जब सर्वोच्च न्यायालय ने नालसा बनाम भारत संघ प्रकरण में इन्हें तीसरा लिंग घोषित किया। न्यायालय ने कहा, “लिंग पहचान हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।” इसके बाद 2019 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम लागू हुआ, जिसने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आवास में भेदभाव को अपराध घोषित किया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट (2021) बताती है कि भारत में 92 प्रतिशत किन्नरों को स्थायी रोजगार नहीं मिलता और 50 प्रतिशत से अधिक अपने परिवारों से बेदखल हैं।
विश्व में स्थिति और संख्या
विश्व जनसंख्या समीक्षा (2024) के अनुसार, विश्व में लगभग 34 लाख 40 हज़ार (3.44 मिलियन) तृतीय लिंग व्यक्ति हैं।
देश अनुमानित संख्या वर्ष
अमेरिका 10,00,000 2018
ब्राज़ील 10,00,000 2018
फिलीपीन्स 3,17,000 2024
दक्षिण अफ्रीका 1,02,300 2024
कनाडा 1,01,000 2021
भारत 96,200 2022
पाकिस्तान 52,400 2016
नेपाल 21,500 2016
बांग्लादेश 12,600 2023
भारत में 2011 की जनगणना में 4.9 लाख लोग “ट्रांसजेंडर” के रूप में दर्ज हुए थे, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार वास्तविक संख्या कई गुना अधिक है।
आंदोलन और संघर्ष की कहानी
1969 के स्टोनवॉल आंदोलन (अमेरिका) ने विश्व में समानता की लड़ाई को स्वर दिया। दक्षिण एशिया में नेपाल ने 2007 में, पाकिस्तान ने 2009 में और भारत ने 2014 में तीसरे लिंग की कानूनी मान्यता दी। भारत में गौरव यात्राएँ, मिस ट्रांस क्वीन प्रतियोगिता और किन्नर परिषदों की स्थापना ने इस समुदाय को आत्मसम्मान और दृश्यता प्रदान की।
भारत सरकार के प्रयास
गरिमा गृह योजना (2020)-सामाजिक न्याय मंत्रालय की इस योजना के तहत बेघर या हिंसा पीड़ित किन्नरों को आवास, भोजन और कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है। अब तक 12 गरिमा गृह स्थापित हो चुके हैं।
राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर पोर्टल और हेल्पलाइन (2021)-इस पोर्टल के माध्यम से पहचान पत्र, प्रमाणपत्र और योजनाओं की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध है। हेल्पलाइन 14567 पर परामर्श और शिकायत सुविधा दी जा रही है।
शिक्षा और रोजगार योजनाएँ-यूजीसी ने तृतीय लिंग विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति और प्रवेश में आरक्षण का प्रावधान किया। कर्नाटक ने सरकारी सेवाओं में 1 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। कौशल विकास मंत्रालय के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अब तक 4000 से अधिक किन्नर लाभान्वित हुए हैं।
स्वास्थ्य सेवाएँ-तमिलनाडु और केरल में लिंग परिवर्तन सर्जरी निःशुल्क कराई जा रही है। दिल्ली, महाराष्ट्र और केरल में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र कार्यरत हैं।
राज्य सरकारों की पहलें
-केरल : 2015 में भारत की पहली ट्रांसजेंडर नीति लागू।
-तमिलनाडु : पहचान पत्र, पेंशन और छात्रवृत्ति योजना प्रारंभ।
-दिल्ली : “गौरव योजना” के अंतर्गत मासिक पेंशन और बीमा सुविधा।
-महाराष्ट्र : “किन्नर कल्याण निधि” से ब्याज-मुक्त ऋण।
-मध्य प्रदेश : “किन्नर सम्मान योजना” के अंतर्गत राज्य सम्मान।
अंतरराष्ट्रीय प्रयास
-अर्जेंटीना : 2012 में लिंग पहचान कानून लागू; सरकारी नौकरियों में 1 प्रतिशत आरक्षण।
-नेपाल : पासपोर्ट में “अन्य” श्रेणी और नागरिकता अधिकार।
-बांग्लादेश : सामाजिक सुरक्षा भत्ता योजना।
-पाकिस्तान : ट्रांसजेंडर आयोग और शिक्षा-स्वास्थ्य योजनाएँ।
-ब्राज़ील व मेक्सिको : हिंसा-निरोधक निगरानी तंत्र की स्थापना।
चुनौतियाँ अब भी बरकरार
कानूनी मान्यता के बावजूद किन्नर समाज को समाज में बराबरी का दर्जा मिलना अभी दूर है। ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाएँ नहीं पहुँच पातीं, बहुत-से लोग सामाजिक तिरस्कार के भय से अपनी पहचान छिपा लेते हैं और स्वास्थ्य सेवाएँ सीमित हैं। समाधान के रूप में सरकारों को शिक्षा पाठ्यक्रम में लिंग संवेदनशीलता, निजी क्षेत्र में रोजगार अवसर और ग्राम स्तर पर पुनर्वास योजनाएँ सशक्त करनी होंगी।
समानता की ओर एक कदम और
किन्नर समाज की लड़ाई केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि अस्तित्व की स्वीकार्यता की है। भारत और विश्व के 70 से अधिक देशों में तीसरे लिंग को मान्यता मिल चुकी है, पर वास्तविक समानता तभी आएगी जब समाज उन्हें स्नेह, सम्मान और अवसर देगा। “हम सब समान हैं, चाहे हमारा लिंग कुछ भी हो।” यही संदेश आज हर सरकार और हर नागरिक के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

Doctor chetan
जवाब देंहटाएंकिन्नरों को तीसरा लिंग लिखना मुझे सही लगा क्योंकि लिंग प्रजनन से संबंधित है. सही शब्द मुझे भी नहीं मालूम। इसके अलावा इनकी काम संबंध भावनाओं का भी वर्णन होता है तो लेख पूरा होता। 🙏
लेख बहुत बढ़िया लिखा है🙏
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