लेख-
तकनीकी युग में इंसान ने अपने जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अंधाधुंध उपयोग शुरू किया। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी, रेफ्रिजरेटर, एसी से लेकर छोटे खिलौनों तक, हर वस्तु में अब सर्किट और माइक्रोचिप जुड़ गए हैं। लेकिन इन उपकरणों के अप्रचलित होते ही जो कचरा बचता है, वह “ई-वेस्ट” कहलाता है और यही आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र की “ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2024” रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनिया ने लगभग 62 मिलियन टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न किया, जिसमें से केवल 22 प्रतिशत ही रीसायकल हुआ। यह मात्रा हर साल लगभग 5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।
दुनिया के शीर्ष 10 ई-वेस्ट उत्पादक देश
(2024 के अनुमान अनुसार)
1.चीन-10,129 किलो टन यानी 16 प्रतिशत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार, जहां लाखों टन पुराने मोबाइल, टीवी और उपकरण फेंके जाते हैं।
2.संयुक्त राज्य अमेरिका-6,918 किलो टन यानी 15 प्रतिशत उपभोक्ता संस्कृति और अपग्रेड प्रवृत्ति के कारण भारी ई-वेस्ट।
3.भारत-3,230 किलो टन यानी 1 से 2 प्रतिशत अधिकतर कचरा अनौपचारिक रीसायक्लिंग सेक्टर में जाता है, जिससे स्वास्थ्य खतरे बढ़ते हैं।
4.जापान- 2,569 किलो टन 22 प्रतिशत उन्नत तकनीक से लैस, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक उपभोग बहुत अधिक।
5.ब्राज़ील- 2,143 किलो टन यानी 5 प्रतिशत लैटिन अमेरिका में सबसे बड़ा उत्पादक, रिसायकल ढांचा कमजोर।
6.रूस-1,631 किलो टन यानी प्रतिशत नीति सीमित, लेकिन उद्योग तेजी से बढ़ रहा।
7.इंडोनेशिया-1,618 किलो टन यानी 4 प्रतिशत सस्ते गैजेट्स के कारण ई-वेस्ट में बढ़ोतरी।
8.जर्मनी-1,607 किलो टन यानी 52 प्रतिशत यूरोप का अग्रणी देश, मजबूत औपचारिक रीसायक्लिंग सिस्टम।
9.यूनाइटेड किंगडम-1,598 किलो टन यानी 57 प्रतिशत प्रभावी कलेक्शन और नीति आधारित रिसायकल।
10.फ्रांस-1,362 किलो टन यानी 56 प्रतिशत उपभोक्ता जागरूकता और सशक्त रीसायक्लिंग नेटवर्क।
ई-वेस्ट की भयावहता
ई-वेस्ट में सीसा, पारा, कैडमियम, क्रोमियम और पॉलीविनाइल क्लोराइड जैसे जहरीले रसायन पाए जाते हैं, जो मिट्टी, पानी और वायु में मिलकर पर्यावरण को स्थायी नुकसान पहुंचाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अनौपचारिक ई-वेस्ट प्रोसेसिंग से हर वर्ष लाखों मजदूर, विशेषकर बच्चे, जहरीले धुएं और धातुओं के संपर्क में आते हैं। इससे कैंसर, त्वचा रोग, सांस की बीमारियां और तंत्रिका तंत्र की समस्याएं बढ़ रही हैं। भारत जैसे देशों में यह खतरा और बड़ा है क्योंकि यहाँ लगभग 95 प्रतिशत ई-वेस्ट अनौपचारिक क्षेत्र में रीसायकल किया जाता है, खुले में तार जलाकर तांबा निकालना, एसिड से धातु घोलना आदि प्रक्रियाएँ मानव जीवन और पर्यावरण दोनों के लिए घातक हैं।
निस्तारण और रीसायकल के मौजूदा तरीके
1.औपचारिक रीसायक्लिंग-इसमें पुराने उपकरणों को अधिकृत केंद्रों में जमा कर, धातु, प्लास्टिक और कांच को अलग-अलग किया जाता है। यह पर्यावरण-अनुकूल तरीका है, परंतु विश्व स्तर पर अभी केवल 22 प्रतिशत ई-वेस्ट ही इस प्रक्रिया से गुजरता है।
2.रीयूज़ और रिफर्बिशमेंट-कार्यशील उपकरणों को मरम्मत कर फिर से उपयोग में लाया जाता है। जापान और जर्मनी में यह नीति सफल है।
3.ऊर्जा पुनःप्राप्ति-कुछ ई-वेस्ट को जलाकर ऊर्जा बनाई जाती है, लेकिन यह प्रक्रिया कार्बन उत्सर्जन बढ़ा सकती है।
4.लैंडफिल या डंपिंग-विकसित देशों से अवैध रूप से ई-वेस्ट का निर्यात अफ्रीकी व एशियाई देशों में किया जाता है, जहाँ खुले में जलाने से मिट्टी और जल प्रदूषित होते हैं।
ई-वेस्ट संकट की जड़ें
तकनीकी अपग्रेड की तेज़ी-हर साल नए मॉडल आने से पुराने उपकरण ‘बेकार’ माने जाते हैं।
कम पुनर्चक्रण अवसंरचना-विकासशील देशों में पर्याप्त औपचारिक रीसायक्लिंग संयंत्रों की कमी।
कम उपभोक्ता जागरूकता-लोग जानते नहीं कि पुराना मोबाइल कहाँ जमा करें।
अवैध निर्यात और लूज रेगुलेशन-ई-वेस्ट का भारी हिस्सा एशिया और अफ्रीका में पहुँच जाता है।
सुधार और समाधान के सुझाव
1.नीति निर्माण-प्रत्येक देश को ई-टेन्डेड प्रॉड्यूसर रेस्पॉन्सिबिल्टी कानून को कड़ाई से लागू करना चाहिए ताकि निर्माता अपने उत्पादों के जीवन के अंत तक जिम्मेदार हों।
2.अवसंरचना-हर राज्य और जिले में ई-वेस्ट संग्रह केंद्र स्थापित किए जाएँ। स्वचालित व पर्यावरण-अनुकूल रीसायक्लिंग संयंत्रों की स्थापना आवश्यक है।
3.शिक्षा और जागरूकता-स्कूलों और कॉलेजों में ई-वेस्ट प्रबंधन पर कार्यक्रम चलाए जाएँ। “ई-वेस्ट डोनेशन ड्राइव” अभियान प्रभावी हो सकते हैं।
4.उद्योग जगत की भूमिका-कंपनियों को उत्पाद डिज़ाइन में “इको-डिज़ाइन” सिद्धांत अपनाने चाहिएं, ताकि उपकरण आसानी से डिसमेंटल होकर रीसायकल हो सकें।
5.नागरिक जिम्मेदारी-उपयोगकर्ता प्रमाणित रीसायक्लर को ही पुराने उपकरण दें, खुले में न फेंकें। सामाजिक स्तर पर पुनःप्रयोग संस्कृति को बढ़ावा दें।
1.नीति निर्माण-प्रत्येक देश को ई-टेन्डेड प्रॉड्यूसर रेस्पॉन्सिबिल्टी कानून को कड़ाई से लागू करना चाहिए ताकि निर्माता अपने उत्पादों के जीवन के अंत तक जिम्मेदार हों।
2.अवसंरचना-हर राज्य और जिले में ई-वेस्ट संग्रह केंद्र स्थापित किए जाएँ। स्वचालित व पर्यावरण-अनुकूल रीसायक्लिंग संयंत्रों की स्थापना आवश्यक है।
3.शिक्षा और जागरूकता-स्कूलों और कॉलेजों में ई-वेस्ट प्रबंधन पर कार्यक्रम चलाए जाएँ। “ई-वेस्ट डोनेशन ड्राइव” अभियान प्रभावी हो सकते हैं।
4.उद्योग जगत की भूमिका-कंपनियों को उत्पाद डिज़ाइन में “इको-डिज़ाइन” सिद्धांत अपनाने चाहिएं, ताकि उपकरण आसानी से डिसमेंटल होकर रीसायकल हो सकें।
5.नागरिक जिम्मेदारी-उपयोगकर्ता प्रमाणित रीसायक्लर को ही पुराने उपकरण दें, खुले में न फेंकें। सामाजिक स्तर पर पुनःप्रयोग संस्कृति को बढ़ावा दें।
भारत की स्थिति और संभावनाएँ
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ई-वेस्ट उत्पादक देश है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, देश में हर साल 3 मिलियन टन से अधिक ई-वेस्ट निकलता है। सरकार ने 2016 से ई-वेस्ट मैनेजमेंट नियम लागू किए हैं, लेकिन अभी भी लगभग 90-95 प्रतिशत कचरा अनौपचारिक सेक्टर में जाता है। यदि भारत अपने शहरी कचरे के प्रबंधन में तकनीकी नवाचार, औपचारिक संग्रह प्रणाली और प्रशिक्षण आधारित मॉडल लागू करे, तो वह ई-वेस्ट से आर्थिक लाभ भी कमा सकता है, क्योंकि इसमें सोना, चांदी, तांबा जैसी मूल्यवान धातुएँ होती हैं।
“सुविधा का मूल्य, जिम्मेदारी के साथ”
ई-वेस्ट संकट आधुनिक जीवन की कीमत है। हम डिजिटल दुनिया में जितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, उतनी ही तेजी से धरती का पर्यावरण जहरीला होता जा रहा है। यदि सरकारें, उद्योग और आम नागरिक मिलकर ठोस कदम उठाएँ, औपचारिक रीसायक्लिंग, जागरूकता और जिम्मेदार उपभोग, तो हम इस खतरे को अवसर में बदल सकते हैं। ई-वेस्ट केवल कचरा नहीं, बल्कि संसाधन है, बशर्ते हम उसे सही दिशा दें।
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

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