सोमवार, 8 जून 2026

हर साल बारिश में क्यों खुल जाती है सड़कों की पोल?

 लेख-

दिल्ली-एनसीआर देश का सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र है। यहां रोजाना करोड़ों लोग सड़कों पर सफर करते हैं। पिछले दस वर्षों में एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर और चैड़ी सड़कों का जाल बिछा है, लेकिन मानसून की पहली तेज बारिश के साथ ही विकास के दावों की परीक्षा शुरू हो जाती है। कहीं गड्ढे उभर आते हैं, कहीं सड़क धंस जाती है और कहीं जलभराव घंटों तक यातायात को जाम कर देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल सड़क निर्माण की नहीं, बल्कि ड्रेनेज सिस्टम, रखरखाव और एजेंसियों के बीच समन्वय की भी है।
दिल्ली की सबसे संवेदनशील सड़कें
पिछले कई वर्षों से कुछ सड़कें मानसून के दौरान विशेष रूप से परेशानी का कारण बनती रही हैं।
1. आउटर रिंग रोड-दिल्ली की सबसे व्यस्त सड़कों में शामिल आउटर रिंग रोड पर बारिश के दौरान गड्ढे, जलभराव और दुर्घटनाएं लगातार चिंता का विषय रहे हैं। 2025 में भी यह राजधानी की सबसे खतरनाक सड़कों में शामिल रही।
2. रिंग रोड (इनर रिंग रोड)-दिल्ली की जीवनरेखा कही जाने वाली इस सड़क पर 2025 में सर्वाधिक सड़क मौतें दर्ज की गईं। चैड़ी सड़क और तेज रफ्तार वाहनों के कारण दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
3. मथुरा रोड-बारिश के दौरान गड्ढों और जलभराव की शिकायतें लगातार आती रही हैं। सड़क की सतह कई बार टूटने के कारण यातायात प्रभावित हुआ है।
4. आईटीओ और मिंटो ब्रिज क्षेत्र-यह इलाका जलभराव के लिए वर्षों से बदनाम है। तेज बारिश के दौरान यहां वाहन फंसने और लंबा जाम लगने की घटनाएं आम रही हैं।
5. एनएच-48 (दिल्ली-गुरुग्राम मार्ग)-गुरुग्राम सीमा तक फैला यह कॉरिडोर हर मानसून में जलभराव और ट्रैफिक जाम का सामना करता है।
पिछले 10 वर्षों में सबसे खतरनाक बने सड़क क्षेत्र
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग की रिपोर्टों के अनुसार निम्न स्थान लगातार दुर्घटना-प्रवण रहे हैं-
आजादपुर मंडी जंक्शन
वजीराबाद क्षेत्र
कश्मीरी गेट-आईएसबीटी
भलस्वा चैक
मुकरबा चैक
लिबासपुर बस स्टैंड
राजोकरी फ्लाईओवर
अक्षरधाम एक्सप्रेसवे क्षेत्र
इन स्थानों पर सड़क की स्थिति, तेज रफ्तार, निर्माण कार्य और अव्यवस्थित यातायात दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण रहे हैं।
जान-माल का नुकसान
दिल्ली में सड़क दुर्घटनाएं लगातार बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।
2024
111 ब्लैक स्पॉट्स पर 1,132 दुर्घटनाएं
483 लोगों की मौत
649 लोग घायल
2025
25 नए ब्लैक स्पॉट चिन्हित
176 दुर्घटनाएं
88 मौतें केवल इन नए ब्लैक स्पॉट्स पर
कुल सड़क दुर्घटनाएं
2024 में 5,657 दुर्घटनाएं
1,504 घातक दुर्घटनाएं
2025 में सड़क दुर्घटना मौतें बढ़कर 1,617 तक पहुंच गईं।
हालांकि हर दुर्घटना सीधे गड्ढों से नहीं जुड़ी होती, लेकिन मानसून में खराब सड़कें, जलभराव और दृश्यता की कमी दुर्घटनाओं का जोखिम काफी बढ़ा देती हैं।
बारिश से पहले किन सड़कों को प्राथमिकता पर सुधारना चाहिए?
विशेषज्ञों के अनुसार निम्न सड़कों पर तत्काल ध्यान आवश्यक है-
प्रथम श्रेणी
आउटर रिंग रोड
मथुरा रोड
एनएच-48
आईटीओ कॉरिडोर
वजीराबाद रोड
द्वितीय श्रेणी
आजादपुर-मुकरबा चैक क्षेत्र
भलस्वा चैक
कश्मीरी गेट क्षेत्र
राजोकरी फ्लाईओवर
तृतीय श्रेणी
विभिन्न अंडरपास
कॉलोनी कनेक्टिंग रोड
औद्योगिक क्षेत्रों की सड़कें
सरकारी प्रयास कितना असर?
गड्ढा-मुक्त अभियान-दिल्ली सरकार ने 2025 में एक ही दिन में 3,433 गड्ढे भरने का दावा किया। लगभग 1,400 किलोमीटर सड़क नेटवर्क पर मरम्मत अभियान चलाया गया।
जियो-टैगिंग और ड्रोन सर्वे-गड्ढों और खराब सड़कों की पहचान के लिए ड्रोन सर्वे और जियो-टैगिंग का उपयोग शुरू किया गया।
डिजिटल रोड मॉनिटरिंग-पीडब्ल्यूडी ने सड़क, जलभराव, अंधेरे क्षेत्रों और दुर्घटना-प्रवण स्थलों की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड विकसित करने की पहल की है।
नई तकनीक-सीएसआईआर और सीआरआरआई द्वारा विकसित ईकोफिक्स तकनीक का परीक्षण किया गया, जिससे पानी भरे गड्ढों की भी त्वरित मरम्मत संभव है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की अधिकांश सड़कें निर्माण गुणवत्ता से अधिक खराब ड्रेनेज व्यवस्था की वजह से क्षतिग्रस्त होती हैं। पानी का लगातार जमाव सड़क की ऊपरी परत को कमजोर कर देता है, जिससे गड्ढे बनते हैं और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है। सड़कों के साथ-साथ नालों और वर्षा जल निकासी तंत्र के आधुनिकीकरण पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
फैक्ट बॉक्स
दिल्ली-एनसीआर सड़क सुरक्षा-एक नजर

2024 के ब्लैक स्पॉट
111 ब्लैक स्पॉट दुर्घटनाएं (2024) 1,132, मौतें (2024) 483
2025 में चिन्हित नए ब्लैक स्पॉट
25, 2025 सड़क दुर्घटना मौतें 1,617, 2025 में भरे गए गड्ढे 3,433
सबसे खतरनाक सड़कें
रिंग रोड, आउटर रिंग रोड, मथुरा रोड, एनएच-48
दिल्ली-एनसीआर की सड़कें देश की आर्थिक गतिविधियों की धुरी हैं, लेकिन मानसून हर वर्ष उनकी वास्तविक स्थिति उजागर कर देता है। यदि आउटर रिंग रोड, मथुरा रोड, आईटीओ, वजीराबाद और एनएच-48 जैसे संवेदनशील मार्गों पर समय रहते व्यापक मरम्मत, बेहतर ड्रेनेज और नियमित निगरानी सुनिश्चित नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में दुर्घटनाओं और आर्थिक नुकसान की कीमत और अधिक चुकानी पड़ सकती है। सड़क निर्माण के साथ-साथ सड़क रखरखाव को भी समान प्राथमिकता देना समय की मांग है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


रविवार, 7 जून 2026

छह साल में 114 काले हिरणों का शिकार

 लेख-

संरक्षण के बावजूद शिकार की चुनौती बरकरार
भारत की जैव विविधता में काला हिरण एक विशिष्ट स्थान रखता है। अपनी आकर्षक काया, घुमावदार सींगों और अद्भुत गति के कारण यह देश के सबसे सुंदर वन्यजीवों में गिना जाता है। कभी भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल घास के मैदानों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले काले हिरणों की आबादी बीसवीं शताब्दी के दौरान तेजी से घटने लगी थी। इसका प्रमुख कारण अंधाधुंध शिकार, कृषि विस्तार, घासभूमियों का विनाश और मानव गतिविधियों का बढ़ता दबाव था। हालांकि स्वतंत्र भारत में बनाए गए कठोर वन्यजीव कानूनों और समाज की बढ़ती जागरूकता ने इस प्रजाति को नया जीवन दिया है, लेकिन आज भी इसका अस्तित्व पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। हाल में सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. रंजन तोमर द्वारा प्राप्त सूचना ने एक बार फिर काले हिरणों की सुरक्षा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु अथवा शिकार से संबंधित 114 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा बताता है कि कानूनी संरक्षण के बावजूद वन्यजीव अपराधों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगाया जा सका है।
कहां-कहां पाए जाते हैं काले हिरण
काला हिरण मुख्य रूप से भारत के खुले घास के मैदानों और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। राजस्थान आज भी इसका सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है, जहां इनकी संख्या 25 हजार से अधिक आंकी गई है। इसके अतिरिक्त ओडिशा के गंजाम क्षेत्र में लगभग 9 हजार, पंजाब और हरियाणा में हजारों की संख्या में तथा गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी इनकी महत्वपूर्ण आबादी पाई जाती है। गुजरात का वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान और राजस्थान का ताल छापर अभयारण्य काले हिरणों के प्रमुख संरक्षण केंद्र हैं।
क्यों खास है यह वन्यजीव
काले हिरण का वैज्ञानिक नाम एंटीलोप सर्विकापर है। नर काले हिरण अपने काले-भूरे रंग और सर्पिलाकार सींगों के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि मादाएं हल्के भूरे रंग की होती हैं। यह दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले खुरदार जीवों में शामिल है और लगभग 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति तक पहुंच सकता है। यही कारण है कि इसे भारतीय घासभूमियों का धावक भी कहा जाता है।
कानून देता है सर्वोच्च सुरक्षा
भारत सरकार ने काले हिरण को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल किया है। यह श्रेणी देश के सबसे अधिक संरक्षित वन्यजीवों के लिए आरक्षित है। काले हिरण का शिकार, उसे घायल करना, पकड़ना या उसका अवैध व्यापार करना गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर तीन से सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।
शिकार की घटनाएं क्यों नहीं रुक रहीं
विशेषज्ञों के अनुसार अवैध शिकार के पीछे कई कारण हैं। कुछ क्षेत्रों में मांस के लिए, कुछ स्थानों पर मनोरंजन अथवा ट्रॉफी शिकार के लिए और कहीं-कहीं स्थानीय संघर्षों के कारण काले हिरणों को निशाना बनाया जाता है। इसके अलावा सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले, कृषि विस्तार और प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना भी इनके अस्तित्व के लिए खतरा बने हुए हैं।
देश का सबसे चर्चित शिकार मामला
काले हिरण शिकार की चर्चा जब भी होती है तो 1998 का जोधपुर प्रकरण सबसे पहले याद किया जाता है। फिल्म ‘हम साथ-साथ हैं’ की शूटिंग के दौरान दो काले हिरणों के शिकार के आरोप में अभिनेता सलमान खान और अन्य कलाकारों के विरुद्ध मामला दर्ज हुआ था। यह मुकदमा दो दशक से अधिक समय तक देश की सबसे चर्चित वन्यजीव कानूनी लड़ाइयों में शामिल रहा और इसने वन्यजीव संरक्षण कानूनों को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
वन्यजीव जीवविज्ञानी अमित गोस्वामी का मानना है कि काले हिरणों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों, विशेषकर बिश्नोई समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उनके अनुसार राजस्थान के अनेक क्षेत्रों में अभयारण्यों के बाहर भी काले हिरण सुरक्षित दिखाई देते हैं।
वन अधिकारी और शोधकर्ता गीतांजलि मेरियासेल्वम का कहना है कि संरक्षण को केवल सामाजिक आस्था पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए समुदाय आधारित संरक्षण योजनाओं और सरकारी सहयोग की आवश्यकता है। संरक्षण विशेषज्ञ टी. मुरुगावेल के अनुसार भारत में घासभूमियों के संरक्षण पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है। यदि घासभूमियां सिकुड़ती रहीं तो काले हिरणों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
संरक्षण की असली कुंजी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं। वन्यजीव अपराधों की निगरानी, त्वरित न्यायिक प्रक्रिया, आधुनिक तकनीक का उपयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही दीर्घकालिक समाधान प्रदान कर सकती है। साथ ही घासभूमियों को भी उतना ही महत्व देना होगा जितना जंगलों को दिया जाता है।
साझा जिम्मेदारी
काला हिरण केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। इसकी बढ़ती आबादी संरक्षण की सफलता का संकेत देती है, वहीं शिकार और आवास विनाश की घटनाएं हमें सावधान भी करती हैं। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, वन विभाग और समाज मिलकर प्रयास करें तो आने वाली पीढ़ियां भी भारतीय घासभूमियों में दौड़ते हुए इस सुंदर जीव को देख सकेंगी। प्रकृति की इस अनमोल धरोहर की रक्षा करना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

फैक्ट बॉक्स
    काला हिरण एक नजर में

► सामान्य नाम-काला हिरण
► वैज्ञानिक नाम-एंटीलोप सर्विकापर
► प्राकृतिक आवास-घासभूमियां, अर्द्ध-शुष्क मैदान, खुले वन क्षेत्र
► अधिकतम गति- 70-80 किलोमीटर प्रति घंटा
► विशेष पहचान-नर के लंबे सर्पिलाकार सींग और गहरा काला-भूरा रंग
► भारत में कहां पाये जाते हैं-राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश
► सबसे बड़ी आबादी-राजस्थान
► संरक्षण दर्जा-वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल
► शिकार पर सजा-3 से 7 वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना
► प्रमुख खतरे-अवैध शिकार, घासभूमियों का विनाश, सड़क दुर्घटनाएं, आवारा कुत्तों के हमले और मानव-वन्यजीव संघर्ष
► विशेष समुदाय-बिश्नोई समाज, जिसने सदियों से काले हिरणों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है
► प्रमुख संरक्षित क्षेत्र-ताल छापर अभयारण्य (राजस्थान), वेलावदर राष्ट्रीय उद्यान (गुजरात), अबोहर क्षेत्र (पंजाब), रानीबेन्नूर ब्लैकबक अभयारण्य (कर्नाटक)
► सबसे चर्चित मामला-1998 का जोधपुर काला हिरण शिकार प्रकरण
► हालिया चिंता-आरटीआई के अनुसार वर्ष 2020 से अप्रैल 2026 के बीच देश में काले हिरणों की मृत्यु-शिकार से जुड़ी 114 घटनाएं दर्ज होने का दावा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि और पत्रकार)


शनिवार, 6 जून 2026

युवा लिख रहे हैं भारत में नए परिवर्तन की पटकथा!

 समसामयिक लेख-

रोजगार, शिक्षा और व्यवस्था से जुड़े सवालों ने युवाओं को एक बार फिर सड़कों पर ला खड़ा किया है। जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़, सोशल मीडिया पर बढ़ती सक्रियता और पारंपरिक राजनीति से मोहभंग के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत किसी नए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा है? भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जेपी आंदोलन, मंडल-कमंडल की राजनीति, अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन और किसान आंदोलन तक, समय-समय पर जनभावनाओं ने सत्ता और व्यवस्था को नई दिशा दी है। इन आंदोलनों में एक बात समान रही है, जब युवाओं ने किसी मुद्दे को अपना मुद्दा बना लिया, तब परिवर्तन की संभावना भी बढ़ी। इन दिनों कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बैनर तले युवाओं का आंदोलन चर्चा में है। बेरोजगारी, परीक्षा-पत्र लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रही आवाजों ने एक बार फिर देश का ध्यान युवाओं की ओर खींचा है।

अन्ना आंदोलन जब भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ था देश
वर्ष 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली जनआंदोलनों में गिना जाता है। उस समय राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम विवाद और अन्य भ्रष्टाचार के मामलों ने जनता में गहरा असंतोष पैदा कर दिया था। अन्ना हजारे ने जनलोकपाल कानून की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। देखते ही देखते यह आंदोलन राष्ट्रीय जनभावना का प्रतीक बन गया। दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर देश के छोटे-बड़े शहरों तक लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि इस आंदोलन का चेहरा युवा वर्ग बन गया। सोशल मीडिया के माध्यम से पहली बार किसी आंदोलन ने इतनी व्यापक जनभागीदारी देखी। बाद में इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ।

नेपाल के युवाओं ने बदला राजनीतिक विमर्श
नेपाल का हालिया राजनीतिक इतिहास भी युवाओं की भूमिका का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक चुनौतियों, भ्रष्टाचार और बढ़ते पलायन ने वहाँ के युवाओं को निराश किया। युवाओं ने सोशल मीडिया और जनसभाओं के माध्यम से अपनी नाराजगी व्यक्त की। परिणामस्वरूप राजनीतिक दलों को युवाओं के मुद्दों पर खुलकर बात करनी पड़ी। नेपाल का अनुभव यह बताता है कि जब युवाओं का असंतोष संगठित रूप ले लेता है, तो वह केवल आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक एजेंडा तय करने की क्षमता भी प्राप्त कर लेता है।

कॉकरोच जनता पार्टी-सोशल मीडिया से सड़क तक
कॉकरोच जनता पार्टी का उदय परंपरागत राजनीतिक दलों की तरह नहीं हुआ। इसकी शुरुआत सोशल मीडिया के माध्यम से हुई और धीरे-धीरे यह युवाओं की आकांक्षाओं और असंतोष का मंच बनती दिखाई देने लगी। हाल में जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ ने यह संकेत दिया कि यह केवल ऑनलाइन चर्चा भर नहीं है। युवाओं का एक वर्ग अब अपनी समस्याओं को सीधे सार्वजनिक मंचों पर उठाना चाहता है। यह आंदोलन किसी विचारधारा की बजाय युवाओं के रोजमर्रा के संघर्षों पर केंद्रित दिखाई देता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता और ताकत मानी जा रही है।

क्या हैं युवाओं की प्रमुख मांगें?
1. रोजगार के अवसर बढ़ें-देश में लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। कई वर्षों तक तैयारी करने के बावजूद नौकरी न मिल पाने की समस्या लगातार चर्चा में रही है।
2. भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता-युवाओं की मांग है कि सरकारी भर्ती प्रक्रियाएँ समयबद्ध और निष्पक्ष हों तथा नियुक्तियों में अनावश्यक देरी न हो।
3. पेपर लीक पर सख्ती-विभिन्न राज्यों में समय-समय पर परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने अभ्यर्थियों का भरोसा कमजोर किया है। युवा कठोर कानून और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
4. शिक्षा और रोजगार में बेहतर समन्वय-युवाओं का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को बाजार और उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप बनाया जाए ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार के अवसर बढ़ सकें।

अन्ना आंदोलन और सीजेपी आंदोलन की समानताएँ
दोनों आंदोलनों के मुद्दे अलग हो सकते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति में कई समानताएँ दिखाई देती हैं। युवाओं की केंद्रीय भूमिका, दोनों आंदोलनों की असली ताकत युवा वर्ग रहा है। सोशल मीडिया का प्रभाव, अन्ना आंदोलन के दौर में फेसबुक और ट्विटर ने भूमिका निभाई थी। आज इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म आंदोलन को गति दे रहे हैं। व्यवस्था से असंतोष, दोनों आंदोलनों की जड़ में व्यवस्था के प्रति असंतोष और सुधार की मांग निहित है। राजनीतिक विमर्श पर असर, इन आंदोलनों ने उन मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया जिन पर पहले अपेक्षाकृत कम चर्चा होती थी।

फिर भी कई मायनों में अलग है यह आंदोलन
अन्ना आंदोलन का केंद्र बिंदु भ्रष्टाचार और जनलोकपाल था। उसके पास स्पष्ट नेतृत्व और एक ठोस विधायी मांग थी। इसके विपरीत सीजेपी आंदोलन रोजगार, शिक्षा और अवसरों से जुड़े अनेक प्रश्नों को एक साथ उठा रहा है। यह अभी संगठनात्मक रूप से विकसित हो रहा है और इसकी दिशा आने वाले समय में अधिक स्पष्ट होगी।

क्या यह नए राजनीतिक विकल्प का संकेत है?
भारतीय राजनीति में कई बार आंदोलनों ने नए राजनीतिक विकल्पों को जन्म दिया है। अन्ना आंदोलन से आम आदमी पार्टी निकली, जबकि जेपी आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक बदलाव का रास्ता बनाया। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या सीजेपी आंदोलन भी भविष्य में किसी राजनीतिक विकल्प का आधार बन सकता है? इस प्रश्न का उत्तर अभी समय के गर्भ में है। लेकिन इतना निश्चित है कि यदि यह आंदोलन व्यापक जनसमर्थन बनाए रखता है और मजबूत संगठन विकसित करता है, तो इसका राजनीतिक प्रभाव अवश्य दिखाई देगा।

भारत का भविष्य और युवा शक्ति
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। आने वाले दशकों में देश की आर्थिक और सामाजिक दिशा इसी युवा आबादी से तय होगी। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और अवसर मिलते हैं तो भारत विश्व मंच पर और अधिक मजबूत स्थिति में पहुँच सकता है। लेकिन यदि उनकी अपेक्षाएँ लगातार अधूरी रह जाती हैं, तो असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि युवाओं की आवाज को केवल आंदोलन या विरोध के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी और संभावना दोनों के रूप में देखा जाना चाहिए।

बदलाव की दस्तक या क्षणिक उभार
अन्ना आंदोलन, नेपाल के युवा आंदोलनों और कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले उभर रहे आंदोलन की परिस्थितियाँ अलग हैं, लेकिन इन सबका मूल संदेश एक ही है-युवा अपने भविष्य को लेकर गंभीर हैं और अब अपनी बात अधिक मुखरता से कहना चाहते हैं। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह आंदोलन भारत में कोई बड़ा राजनीतिक परिवर्तन ले आएगा। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि इसने रोजगार, शिक्षा, भर्ती व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। लोकतंत्र में परिवर्तन हमेशा सत्ता परिवर्तन से नहीं आते। कई बार परिवर्तन की शुरुआत उन सवालों से होती है जिन्हें अनदेखा करना अब संभव नहीं रह जाता। जंतर-मंतर से उठती युवाओं की आवाज शायद ऐसे ही किसी नए अध्याय की प्रस्तावना हो।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


शुक्रवार, 5 जून 2026

गाजियाबाद के भी होटल, स्कूल और कॉलेज सुरक्षित नहीं!

 विशेष लेख-

दस वर्षों के अग्निकांड, प्रशासनिक कार्रवाई 
और सुरक्षा व्यवस्था की पड़ताल
तेजी से विकसित होते शहरों में सुरक्षा व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का प्रमुख शहर गाजियाबाद भी इससे अछूता नहीं है। पिछले एक दशक में शहर में बहुमंजिला इमारतों, होटलों, मॉलों, स्कूलों और कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। विकास की इस रफ्तार ने जहां नई सुविधाएं प्रदान की हैं, वहीं अग्नि सुरक्षा और आपदा प्रबंधन से जुड़े अनेक सवाल भी खड़े किए हैं। हाल के वर्षों में गाजियाबाद में हुई आग की घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या शहर के होटल, स्कूल और कॉलेज वास्तव में सुरक्षित हैं? क्या इन संस्थानों में सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है? और यदि कोई दुर्घटना हो जाए तो उससे निपटने की तैयारी कितनी है?
बढ़ती आग की घटनाएं बढ़ा रहीं चिंता
गाजियाबाद में आग लगने की घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। फायर विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 के शुरुआती चार महीनों में ही जिले में लगभग 580 अग्निकांड सामने आए। इनमें जनवरी में 79, फरवरी में 97, मार्च में 128 तथा अप्रैल में 286 घटनाएं दर्ज की गईं। विशेषज्ञों के अनुसार इनमें लगभग 90 प्रतिशत मामलों का कारण विद्युत शॉर्ट सर्किट रहा। बढ़ती गर्मी, ओवरलोड बिजली व्यवस्था, जर्जर वायरिंग और सुरक्षा मानकों की अनदेखी ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देती है। अग्निशमन विभाग का मानना है कि अधिकांश हादसे रोके जा सकते हैं, यदि भवन मालिक समय-समय पर विद्युत व्यवस्था और अग्निशमन उपकरणों की जांच कराएं।
होटलों की सुरक्षा पर सबसे अधिक सवाल
यदि सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो गाजियाबाद में होटल क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील माना जा रहा है। यहां छोटे-बड़े सैकड़ों होटल संचालित हैं, जिनमें प्रतिदिन हजारों लोग ठहरते हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्रशासनिक जांच के दौरान अनेक होटलों में फायर एनओसी, आपातकालीन निकास मार्ग और अग्निशमन उपकरणों से संबंधित कमियां सामने आईं। कुछ प्रतिष्ठानों के पास वैध फायर एनओसी तक नहीं थी, जबकि कई स्थानों पर फायर एग्जिट अवरुद्ध पाए गए। होटलों में खतरा इसलिए भी अधिक होता है क्योंकि यहां रसोईघर, गैस कनेक्शन, एयर कंडीशनिंग सिस्टम और बड़ी संख्या में विद्युत उपकरण लगातार संचालित होते हैं। यदि आग लग जाए तो मेहमान भवन की संरचना से अनजान होते हैं, जिससे निकासी और भी कठिन हो जाती है। दिल्ली-एनसीआर में हाल के वर्षों में हुए कई होटल अग्निकांड यह बता चुके हैं कि बंद खिड़कियां, संकरी सीढ़ियां और खराब अग्निशमन व्यवस्था किसी भी दुर्घटना को भयावह बना सकती हैं।
स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि
स्कूलों में प्रतिदिन हजारों बच्चे पढ़ने आते हैं। इसलिए यहां सुरक्षा के मानक अन्य संस्थानों की तुलना में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। देश में समय-समय पर हुए स्कूल अग्निकांडों और भवन दुर्घटनाओं के बाद गाजियाबाद प्रशासन ने भी विद्यालयों की सुरक्षा जांच पर विशेष ध्यान दिया है। हाल के वर्षों में सरकारी और निजी स्कूलों की इमारतों, विद्युत व्यवस्था, प्रयोगशालाओं, सीढ़ियों और अग्निशमन उपकरणों का निरीक्षण कराया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में केवल फायर एक्सटिंग्विशर लगा देना पर्याप्त नहीं है। छात्रों और शिक्षकों को यह भी पता होना चाहिए कि आग लगने की स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया करनी है। नियमित मॉक ड्रिल और आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण इसलिए अत्यंत आवश्यक हैं। कई विद्यालयों में ऐसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन अनेक पुराने संस्थानों में अब भी सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
कॉलेजों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर
गाजियाबाद में अनेक विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान संचालित हैं। इनमें इंजीनियरिंग, प्रबंधन, चिकित्सा और अन्य व्यावसायिक शिक्षा संस्थान शामिल हैं। कॉलेजों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है क्योंकि उन्हें विभिन्न नियामक संस्थाओं के सुरक्षा मानकों का पालन करना पड़ता है। अधिकांश बड़े परिसरों में फायर अलार्म, आपातकालीन निकास, सुरक्षा कर्मी और अग्निशमन उपकरण उपलब्ध होते हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि केवल उपकरणों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। उनका नियमित रखरखाव और कर्मचारियों का प्रशिक्षण भी उतना ही आवश्यक है। कई संस्थानों में मॉक ड्रिल केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है, जो किसी बड़ी दुर्घटना की स्थिति में गंभीर समस्या पैदा कर सकती है।
पिछले दस वर्षों की प्रमुख घटनाएं
गाजियाबाद में पिछले दशक के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को सामने ला दिया। खोड़ा क्षेत्र की एक बहुमंजिला इमारत में लगी भीषण आग में कई लोगों की जान चली गई। आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला। इंदिरापुरम की एक हाईराइज सोसायटी में लगी आग ने ऊंची इमारतों में सुरक्षा प्रबंधन की चुनौतियों को उजागर किया। कई फ्लैट जल गए और दमकल कर्मियों को आग पर काबू पाने में लंबा समय लगा। वैशाली स्थित एक बड़े मॉल परिसर में लगी आग ने यह दिखाया कि आधुनिक और अत्याधुनिक भवन भी जोखिम से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। साहिबाबाद और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में समय-समय पर हुए बड़े फैक्ट्री अग्निकांडों ने भी जिले की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
क्या कहते हैं दमकल अधिकारी
गाजियाबाद के मुख्य अग्निशमन अधिकारी राहुल पाल का मानना है कि अधिकांश अग्निकांड मानवीय लापरवाही का परिणाम होते हैं। उनके अनुसार, “अधिकांश आग की घटनाओं के पीछे शॉर्ट सर्किट और सुरक्षा मानकों की अनदेखी प्रमुख कारण हैं। भवनों में अग्निशमन व्यवस्था का नियमित रखरखाव अत्यंत आवश्यक है।” राहुल पाल का कहना है कि कई संस्थानों में अग्निशमन उपकरण तो लगे होते हैं, लेकिन वर्षों तक उनकी जांच नहीं होती। आपात स्थिति आने पर वे उपकरण काम ही नहीं करते। वहीं गाजियाबाद के पूर्व मुख्य अग्निशमन अधिकारी सुनील कुमार सिंह ने भी कई बार कहा था कि अनेक भवनों में अग्निशमन प्रणालियों की गंभीर कमियां पाई गईं और कई संस्थानों ने अपने एनओसी का नवीनीकरण समय पर नहीं कराया। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा केवल कागजी औपचारिकता नहीं बल्कि जीवन रक्षा का विषय है।
आग लगने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों और अग्निशमन अधिकारियों के अनुसार अधिकांश घटनाओं के पीछे कुछ सामान्य कारण जिम्मेदार होते हैं, जैसे-विद्युत शॉर्ट सर्किट, पुरानी और जर्जर वायरिंग, अग्निशमन उपकरणों का अनुपयोगी होना, आपातकालीन निकास मार्गों का अवरुद्ध होना, सुरक्षा नियमों की अनदेखी, भवनों का नियमित निरीक्षण न होना, मॉक ड्रिल और प्रशिक्षण का अभाव। इन कारणों से छोटी आग भी कुछ ही मिनटों में बड़ी दुर्घटना का रूप ले लेती है।
प्रशासन की कार्रवाई
सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए गाजियाबाद प्रशासन और अग्निशमन विभाग ने हाल के वर्षों में कई अभियान चलाए हैं। होटलों, मॉलों, अस्पतालों, स्कूलों और अन्य सार्वजनिक भवनों का फायर ऑडिट कराया गया। नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों को नोटिस जारी किए गए और कई मामलों में कार्रवाई भी की गई।
स्कूलों तथा कॉलेजों में आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल को बढ़ावा दिया गया। फायर विभाग लगातार जागरूकता कार्यक्रम भी चला रहा है ताकि लोग दुर्घटना से पहले ही सावधानी बरत सकें।
आगे क्या किया जाना चाहिए
विशेषज्ञों का मानना है कि गाजियाबाद जैसे तेजी से बढ़ते शहर में सुरक्षा को विकास का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि सभी होटलों का वार्षिक फायर ऑडिट अनिवार्य हो। स्कूलों और कॉलेजों में नियमित मॉक ड्रिल कराई जाए। पुरानी इमारतों की संरचनात्मक जांच हो। विद्युत वायरिंग का समय-समय पर परीक्षण कराया जाए। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो। नागरिकों को भी अग्नि सुरक्षा के प्रति जागरूक बनाया जाए।
पिछले दस वर्षों का अनुभव बताता है कि गाजियाबाद के होटल, स्कूल और कॉलेज पूरी तरह असुरक्षित नहीं हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं कहा जा सकता। होटलों में अग्नि सुरक्षा संबंधी कमियां सबसे अधिक चिंता का विषय हैं, जबकि स्कूलों और कॉलेजों में आपदा प्रबंधन और नियमित प्रशिक्षण को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। बढ़ती आग की घटनाएं यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि सुरक्षा को केवल सरकारी जिम्मेदारी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। संस्थानों, प्रशासन और नागरिकों तीनों को मिलकर सुरक्षा संस्कृति विकसित करनी होगी। क्योंकि किसी भी दुर्घटना के बाद होने वाली क्षति की भरपाई संभव नहीं होती, लेकिन समय रहते बरती गई सावधानी अनेक जिंदगियां बचा सकती है।
गाजियाबाद की सुरक्षा तस्वीर

अध्ययन अवधि- 2016-2026
2026 के पहले चार महीनों में आग की घटनाएं-लगभग 580
प्रमुख कारण-लगभग 90 प्रतिशत मामलों में शॉर्ट सर्किट
चिन्हित असुरक्षित भवन- 42
फायर ऑडिट के दायरे में आए स्कूल-लगभग 400
सबसे संवेदनशील क्षेत्र-होटल, हाईराइज भवन और भीड़भाड़ वाले व्यावसायिक परिसर
प्रमुख संदेश-“सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, आवश्यकता है।”

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


भारतीयों पर डबल डिजीज बर्डन

 लेख-

भारत आज स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ एक तरफ संक्रामक रोगों का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, वहीं दूसरी तरफ जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। देश के स्वास्थ्य परिदृश्य में पिछले दो दशकों में बड़ा बदलाव आया है। कभी तपेदिक, मलेरिया, डेंगू, हैजा और अन्य संक्रामक रोग सबसे बड़ी चुनौती माने जाते थे, लेकिन अब मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर और किडनी संबंधी बीमारियाँ भी उतनी ही गंभीर समस्या बन चुकी हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे ‘डबल डिजीज बर्डन’ अर्थात दोहरे रोग-भार की स्थिति बताते हैं।
बढ़ता गैर-संचारी रोगों का खतरा
भारत में आज गैर-संचारी रोग (नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज) सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरे हैं। मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, स्ट्रोक और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियाँ देश में होने वाली अधिकांश मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय स्वास्थ्य एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि देश में होने वाली लगभग दो-तिहाई मौतें अब इन्हीं बीमारियों के कारण होती हैं। मधुमेह के मामलों में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। बदलती जीवनशैली, फास्ट फूड का बढ़ता चलन, शारीरिक श्रम में कमी और तनाव इसके प्रमुख कारण हैं। पहले यह बीमारी अधिक आयु के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन अब 30 से 40 वर्ष की आयु के युवाओं में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उच्च रक्तचाप भी एक ‘साइलेंट किलर’ बन चुका है। लाखों लोगों को यह पता ही नहीं होता कि वे हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित हैं। यही स्थिति बाद में हृदयाघात और ब्रेन स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बनती है।
हृदय रोग और कैंसर की बढ़ती चुनौती
देश में हृदय रोग मृत्यु के सबसे बड़े कारणों में शामिल हो चुके हैं। चिंताजनक बात यह है कि पहले जहाँ हार्ट अटैक को वृद्धावस्था की समस्या माना जाता था, वहीं अब 35 से 50 वर्ष की आयु के लोगों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञ इसके लिए तनावपूर्ण जीवन, धूम्रपान, मोटापा, अनियमित खान-पान और व्यायाम की कमी को जिम्मेदार मानते हैं। कैंसर के मामलों में भी निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। महिलाओं में स्तन कैंसर और गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर प्रमुख हैं, जबकि पुरुषों में मुख कैंसर, फेफड़ों का कैंसर और तंबाकू से जुड़े अन्य कैंसर अधिक पाए जाते हैं। भारत में बड़ी संख्या में लोग तंबाकू और गुटखे का सेवन करते हैं, जिसके कारण मुख कैंसर के मामले दुनिया के कई देशों की तुलना में अधिक हैं।
संक्रामक रोग अभी भी चुनौती
हालाँकि गैर-संचारी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन भारत अभी भी संक्रामक रोगों से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। तपेदिक (टीबी) आज भी देश के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। भारत दुनिया में टीबी के सबसे अधिक रोगियों वाले देशों में शामिल है। गरीबी, कुपोषण, भीड़भाड़ और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच इसके प्रसार को बढ़ाती है। डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी मच्छरजनित बीमारियाँ हर वर्ष मानसून के दौरान और उसके बाद हजारों लोगों को प्रभावित करती हैं। जलभराव, स्वच्छता की कमी और बदलती जलवायु परिस्थितियाँ इन बीमारियों को बढ़ावा देती हैं। इसी प्रकार मौसमी फ्लू, वायरल बुखार और श्वसन संबंधी संक्रमण भी समय-समय पर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चुनौती बनते रहते हैं।
पिछले 10 वर्षों में भारत का स्वास्थ्य परिदृश्य
बीमारी       2015 के आसपास                2024-25 के आसपास       स्थिति
टीबी
(प्रति लाख आबादी)   237                         187    लगभग 21 प्रतिशत कमी
गैर-संचारी रोगों से मौतें लगभग 62 प्रतिशत  63-65 प्रतिशत        लगातार वृद्धि
मधुमेह   लगभग 6-7 करोड़ रोगी       10 करोड़ से अधिक               तीव्र वृद्धि
उच्च रक्तचाप लगभग 20-25 प्रतिशत वयस्क 30 प्रतिशत से अधिक वयस्क  तेज वृद्धि
डेंगू      छिटपुट प्रकोप  कई राज्यों में स्थायी चुनौती, मामलों में कई गुना वृद्धि
हृदय रोग प्रमुख कारणों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण लगातार वृद्धि
कैंसर  लगभग 10-11 लाख वार्षिक मामले
कौन हैं सबसे अधिक प्रभावित?
भारत में स्वास्थ्य समस्याओं का प्रभाव सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। 30 वर्ष से अधिक आयु के लोग गैर-संचारी रोगों की चपेट में सबसे अधिक आ रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों से अधिक प्रभावित हैं क्योंकि उनकी जीवनशैली अपेक्षाकृत कम सक्रिय होती है। महिलाओं में एनीमिया अभी भी एक बड़ी समस्या है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार देश की बड़ी संख्या में महिलाएँ और किशोरियाँ रक्ताल्पता से पीड़ित हैं। इसके अलावा स्तन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर भी महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में टीबी, कुपोषण और संक्रामक रोगों का खतरा अपेक्षाकृत अधिक है। स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच और जागरूकता की कमी भी इन समस्याओं को बढ़ाती है।
सरकार के प्रयास
स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कई स्तरों पर कार्य कर रही हैं। आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से करोड़ों गरीब परिवारों को स्वास्थ्य बीमा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। देशभर में स्थापित आयुष्मान आरोग्य मंदिर और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर और हृदय रोगों की स्क्रीनिंग की जा रही है। 30 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की नियमित स्वास्थ्य जांच पर विशेष बल दिया जा रहा है। टीबी उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। निक्षय पोषण योजना के माध्यम से रोगियों को पोषण सहायता भी प्रदान की जा रही है। डेंगू और मलेरिया नियंत्रण के लिए मच्छरनाशी दवाओं का छिड़काव, जागरूकता अभियान और निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है।
क्या हैं आगे की चुनौतियाँ?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पतालों और दवाओं के भरोसे स्वास्थ्य संकट का समाधान संभव नहीं है। बीमारी होने के बाद उपचार की तुलना में बीमारी को रोकना अधिक प्रभावी और कम खर्चीला उपाय है। भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण, प्रदूषण, तनाव, असंतुलित भोजन और शारीरिक निष्क्रियता आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को और बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी चिंता का विषय है। क्या हैं सुझाव?
विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को वर्ष में कम से कम एक बार स्वास्थ्य जांच अवश्य करानी चाहिए। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना आवश्यक है। तंबाकू और शराब से दूरी बनाकर अनेक गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है। मच्छरजनित रोगों से बचाव के लिए घर और आसपास स्वच्छता बनाए रखना जरूरी है। बच्चों और महिलाओं में पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाना भी अत्यंत आवश्यक है।
भारत का वर्तमान हेल्थ बुलेटिन स्पष्ट संकेत देता है कि देश एक नए स्वास्थ्य संक्रमण काल से गुजर रहा है। जहाँ संक्रामक रोग अब भी चुनौती बने हुए हैं, वहीं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ती जा रही हैं। सरकार की योजनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन स्वास्थ्य सुरक्षा केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए समाज, परिवार और प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि जागरूकता, नियमित जांच, संतुलित जीवनशैली और समय पर उपचार को प्राथमिकता दी जाए, तो भारत न केवल बीमारियों का बोझ कम कर सकता है बल्कि एक स्वस्थ और उत्पादक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ सकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

बुधवार, 3 जून 2026

दिल्ली-एनसीआर में अग्निकांड-हादसे, हिदायतें और हकीकत

 विशेष लेख-

करोल बाग से मालवीय नगर तक,
हर त्रासदी ने उठाए एक जैसे सवाल

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उससे जुड़े नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम तथा फरीदाबाद जैसे शहर देश के सबसे तेजी से विकसित होते शहरी क्षेत्रों में शामिल हैं। ऊँची-ऊँची इमारतें, व्यावसायिक परिसर, औद्योगिक इकाइयाँ और विशाल बाजार विकास की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही अग्नि सुरक्षा की चुनौतियाँ भी तेजी से बढ़ी हैं। पिछले एक दशक में हुए अनेक बड़े अग्निकांडों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शहरी विस्तार की गति के मुकाबले सुरक्षा व्यवस्था अभी भी कमजोर कड़ी बनी हुई है। दिल्ली में वर्ष 2018 के बवाना पटाखा फैक्टरी अग्निकांड से लेकर 2019 के करोल बाग होटल अग्निकांड, अनाज मंडी फैक्टरी त्रासदी, 2022 के मुंडका अग्निकांड और हाल ही में 2026 के मालवीय नगर होटल-रेस्तरां अग्निकांड तक, लगभग हर बड़ी घटना ने एक ही कहानी दोहराई है, सुरक्षा मानकों की अनदेखी, अवैध निर्माण, विद्युत शॉर्ट-सर्किट और आपातकालीन निकास व्यवस्था का अभाव।
हादसों का सिलसिला
फरवरी 2019 में करोल बाग स्थित होटल अर्पित पैलेस में लगी आग में 17 लोगों की मौत हुई। जांच में सामने आया कि भवन में कई सुरक्षा खामियाँ थीं। आपातकालीन निकास व्यवस्था अपर्याप्त थी, ज्वलनशील सामग्री का उपयोग किया गया था और सुरक्षा मानकों का समुचित पालन नहीं किया गया था। इसी वर्ष दिसंबर में पुरानी दिल्ली के अनाज मंडी क्षेत्र में लगी आग ने पूरे देश को झकझोर दिया। एक अवैध फैक्टरी में सो रहे मजदूर धुएँ और आग के बीच फँस गए। 43 लोगों की मौत हुई। संकरी गलियाँ, बंद निकास मार्ग, लोहे की जालियाँ और सुरक्षा उपकरणों का अभाव इस त्रासदी को और घातक बना गया। प्रारम्भिक जांच में विद्युत शॉर्ट-सर्किट की आशंका जताई गई। मई 2022 में पश्चिमी दिल्ली के मुंडका स्थित एक व्यावसायिक भवन में आग लगने से 27 लोगों की जान चली गई। भवन के पास अग्निशमन विभाग की मंजूरी नहीं थी, पर्याप्त अग्नि सुरक्षा उपकरण नहीं थे और केवल एक सीढ़ी होने के कारण लोग सुरक्षित बाहर नहीं निकल सके। और अब जून 2026 में मालवीय नगर स्थित होटल-रेस्तरां परिसर में लगी भीषण आग ने एक बार फिर राजधानी को शोक में डुबो दिया। इस हादसे में 21 लोगों की मौत हुई, जिनमें विदेशी नागरिक भी शामिल थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कई लोगों को जान बचाने के लिए खिड़कियों से छलांग लगानी पड़ी। प्रारम्भिक जांच में आग के रेस्तरां क्षेत्र से शुरू होने की आशंका जताई गई है। घटना के बाद दिल्ली सरकार ने अग्नि सुरक्षा नियमों के उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों के खिलाफ विशेष अभियान की घोषणा की।
केवल दिल्ली नहीं, पूरा एनसीआर जोखिम में
आग की समस्या केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम की हाईराइज सोसायटियों में भी पिछले कुछ वर्षों में आग की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं। अधिकांश मामलों में जनहानि तो नहीं हुई, लेकिन इन घटनाओं ने यह संकेत दिया कि बहुमंजिला इमारतों में सुरक्षा व्यवस्था अभी भी पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि एनसीआर में तेजी से बढ़ती हाईराइज इमारतें नई चुनौती बन चुकी हैं। कई भवनों में स्प्रिंकलर सिस्टम, फायर अलार्म और हाइड्रेंट लगाए तो गए हैं, लेकिन उनके रखरखाव की स्थिति संतोषजनक नहीं है। कई बार आपातकालीन निकास मार्ग भी अवरुद्ध पाए जाते हैं।
आखिर क्यों लगती हैं इतनी आग?
दिल्ली अग्निशमन सेवा और विभिन्न जांच रिपोर्टों के अनुसार अधिकांश बड़ी आग की घटनाओं के पीछे विद्युत शॉर्ट-सर्किट प्रमुख कारण रहा है। पुराने तार, ओवरलोडिंग, अवैध बिजली कनेक्शन और बढ़ती बिजली खपत जोखिम को बढ़ाते हैं। इसके अलावा ज्वलनशील सामग्री का असुरक्षित भंडरण, अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी आग को विकराल रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञ आर.सी. शर्मा कहते हैं, “आग से होने वाली अधिकांश मौतें लपटों से नहीं, बल्कि धुएँ और दम घुटने से होती हैं। यदि भवनों में सुरक्षित निकास मार्ग और कार्यशील अलार्म सिस्टम हों तो बड़ी संख्या में जानें बचाई जा सकती हैं।” शहरी नियोजन विशेषज्ञ डॉ. संजय गुप्ता का मानना है कि फायर एनओसी प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार प्रत्येक व्यावसायिक और बहुमंजिला भवन का नियमित सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए।
सरकारी प्रयास
बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए दिल्ली सरकार और आसपास के राज्यों ने कई कदम उठाए हैं। अग्निशमन सेवाओं के आधुनिकीकरण, नए दमकल वाहनों की खरीद, हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म और विशेष बचाव उपकरणों की उपलब्धता पर जोर दिया गया है। बड़े हादसों के बाद विशेष निरीक्षण अभियान भी चलाए गए हैं। मुंडका हादसे के बाद व्यापक जांच और निरीक्षण अभियान शुरू किए गए थे, जबकि मालवीय नगर हादसे के बाद दिल्ली सरकार ने सुरक्षा नियमों के उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संकेत दिया है। हालाँकि विशेषज्ञ मानते हैं कि संसाधनों की उपलब्धता से अधिक महत्वपूर्ण उनका प्रभावी उपयोग है। यदि निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहेंगे और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर समय रहते कार्रवाई नहीं होगी तो दुर्घटनाएँ रुकना कठिन है।
कहाँ रह जाती हैं कमियाँ?
सबसे बड़ी समस्या अनुपालन की है। भवन निर्माण के समय नियमों का पालन कर लिया जाता है, लेकिन बाद में रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया जाता। कई इमारतों में अग्निशमन उपकरण वर्षों तक परीक्षण के बिना पड़े रहते हैं। पुरानी दिल्ली, सदर बाजार, गांधी नगर, खारी बावली और अनेक औद्योगिक क्षेत्रों की संकरी गलियाँ दमकल वाहनों की पहुँच को प्रभावित करती हैं। आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ प्रो. अजय मेहता कहते हैं, “भारत में अक्सर हादसे के बाद कार्रवाई होती है। जरूरत यह है कि जोखिमों की पहचान पहले की जाए और उन्हें कम करने के उपाय समय रहते लागू किए जाएँ।”
दिल्ली-एनसीआर के प्रमुख अग्निकांड
वर्ष                      स्थान                                 जनहानि
2019         करोल बाग होटल, दिल्ली                17 मृत
2019         अनाज मंडी फैक्टरी, दिल्ली             43 मृत
2022       मुंडका व्यावसायिक भवन, दिल्ली      27 मृत
2024    पूर्वी दिल्ली शिशु अस्पताल अग्निकांड    6 नवजातों की मृत्यु
2026    मालवीय नगर होटल-रेस्तरां अग्निकांड   21 मृत
2024-26 नोएडा-गाजियाबाद की हाईराइज सोसायटियों में कई बड़ी आग, भारी संपत्ति नुकसान।
आगे का रास्ता
विशेषज्ञों के अनुसार सभी व्यावसायिक और बहुमंजिला भवनों का वार्षिक फायर ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए। विद्युत प्रणाली की नियमित जाँच, मॉक ड्रिल, अग्नि सुरक्षा प्रशिक्षण और अवैध निर्माणों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई समय की आवश्यकता है। साथ ही नागरिकों को भी यह समझना होगा कि अग्नि सुरक्षा केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व है। दिल्ली-एनसीआर के अग्निकांड केवल दुर्घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि हमारी शहरी व्यवस्था की कमजोरियों का आईना हैं। करोल बाग, अनाज मंडी, मुंडका और मालवीय नगर जैसी त्रासदियाँ अलग-अलग घटनाएँ जरूर हैं, लेकिन इनके कारण लगभग समान हैं। यदि सुरक्षा मानकों का कठोरता से पालन नहीं किया गया और निगरानी व्यवस्था को मजबूत नहीं बनाया गया तो विकास की यह चमक भविष्य में और बड़े हादसों की कीमत पर हासिल होती दिखाई दे सकती है। आग लगने के बाद राहत पहुँचाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है आग लगने की नौबत ही न आने देना।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)




सोमवार, 1 जून 2026

सुमन कल्याणपुर : एक स्वर जो लता के साये में रहकर भी अमर हो गया

 

-डॉ. चेतन आनंद
भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी लोकप्रियता और योगदान निर्विवाद है, लेकिन जिनके हिस्से वह पहचान नहीं आ सकी जिसकी वे पूरी तरह अधिकारी थे। पार्श्वगायिका सुमन कल्याणपुर ऐसा ही एक नाम हैं। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग में जब लता मंगेशकर का स्वर लगभग हर नायिका की आवाज़ बन चुका था, तब सुमन कल्याणपुर ने अपनी असाधारण प्रतिभा, मधुरता और अनुशासित गायन के बल पर एक विशिष्ट स्थान बनाया। विडंबना यह रही कि उनकी आवाज़ की सबसे बड़ी विशेषता उसकी कोमलता और लता मंगेशकर से मिलती-जुलती गुणवत्ता ही उनकी पहचान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा भी बन गई।
28 जनवरी 1937 को जन्मी सुमन कल्याणपुर का मूल नाम सुमन हेमाडी था। उन्होंने बचपन से ही शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया और संगीत के प्रति उनकी रुचि ने शीघ्र ही उन्हें आकाशवाणी और फिर फिल्मी दुनिया तक पहुँचा दिया। 1950 के दशक में उन्होंने फिल्मों में गाना शुरू किया, लेकिन उस समय फिल्म संगीत के आकाश पर लता मंगेशकर का सूर्य पूरी चमक के साथ उपस्थित था। ऐसे दौर में किसी नई गायिका के लिए अपनी जगह बनाना अत्यंत कठिन था।
फिर भी सुमन कल्याणपुर ने हार नहीं मानी। उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास, शुद्धता और भावनात्मक गहराई थी कि बड़े-बड़े संगीतकार उनसे प्रभावित हुए। शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, रोशन, नौशाद, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और वसंत देसाई जैसे संगीतकारों ने उन्हें अवसर दिए। यह इस बात का प्रमाण था कि वे केवल किसी की प्रतिछाया नहीं, बल्कि स्वयं में एक समर्थ और पूर्ण कलाकार थीं।
सुमन कल्याणपुर के जीवन का सबसे चर्चित पहलू उनकी तुलना लता मंगेशकर से रहा। उनकी आवाज़ इतनी समान प्रतीत होती थी कि श्रोता ही नहीं, कभी-कभी संगीत के जानकार भी भ्रमित हो जाते थे। रेडियो पर बजने वाले अनेक गीतों को लोग वर्षों तक लता मंगेशकर का गीत समझते रहे। बाद में जब पता चला कि उन्हें सुमन कल्याणपुर ने गाया है तो लोग आश्चर्यचकित रह गए।
फिल्म ब्रह्मचारी का प्रसिद्ध गीत “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे” इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मोहम्मद रफ़ी के साथ गाए इस गीत को आज भी अनेक लोग पहली बार सुनकर लता मंगेशकर का गीत समझ बैठते हैं। इसी प्रकार “तुमने पुकारा और हम चले आए”, “ना ना करते प्यार”, “परबतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है” और “दिल एक मंदिर है” जैसे गीतों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊँचाइयाँ दीं।
संगीत समीक्षकों का मानना है कि यदि सुमन कल्याणपुर किसी अन्य युग में होतीं, तो वे निस्संदेह शीर्ष गायिकाओं में गिनी जातीं। लेकिन उनका दुर्भाग्य यह था कि वे ऐसे समय में सक्रिय थीं जब लता मंगेशकर का प्रभुत्व लगभग अजेय था। तुलना का यह सिलसिला उनके पूरे करियर के साथ जुड़ा रहा। फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की और न ही किसी प्रकार की कटुता व्यक्त की।
सुमन कल्याणपुर की सफलता का एक महत्वपूर्ण अध्याय मोहम्मद रफ़ी के साथ उनकी जोड़ी है। 1960 के दशक में रॉयल्टी के मुद्दे पर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के बीच मतभेद हो गए थे। कुछ वर्षों तक दोनों ने साथ में गीत नहीं गाए। इस दौरान कई संगीतकारों ने रफ़ी साहब के साथ सुमन कल्याणपुर को चुना। परिणामस्वरूप हिंदी फिल्म संगीत को अनेक यादगार युगल गीत मिले।
स्वयं सुमन कल्याणपुर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि रफ़ी साहब के साथ गाना किसी विद्यालय में शिक्षा पाने जैसा था। वे रिकॉर्डिंग के दौरान अत्यंत विनम्र और सहयोगी रहते थे। रफ़ी साहब की यह विशेषता थी कि वे नए कलाकारों को सहज महसूस कराते थे। सुमन जी हमेशा उनके प्रति गहरा सम्मान व्यक्त करती रहीं।
प्रसिद्ध गीतकार और फिल्मकार गुलज़ार ने एक बार कहा था कि हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम संगीत केवल बड़े नामों का परिणाम नहीं था, बल्कि उन अनेक प्रतिभाओं का भी योगदान था जो अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहीं। यद्यपि यह टिप्पणी किसी एक कलाकार के लिए नहीं थी, लेकिन सुमन कल्याणपुर का नाम उन कलाकारों में अवश्य लिया जा सकता है जिनके बिना उस युग का संगीत अधूरा होता।
संगीत इतिहासकार राजू भारतन ने भी कई अवसरों पर लिखा कि सुमन कल्याणपुर को उनकी वास्तविक क्षमता के अनुरूप अवसर नहीं मिले। वे मानते थे कि उनकी आवाज़ की समानता ने संगीत कंपनियों और निर्माताओं को लाभ तो पहुँचाया, लेकिन कलाकार के रूप में सुमन जी की स्वतंत्र पहचान को सीमित भी किया।
इसके बावजूद सुमन कल्याणपुर का योगदान अत्यंत व्यापक है। उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी, भोजपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी गीत गाए। फिल्मी गीतों के साथ-साथ भजन, ग़ज़ल और गैर-फिल्मी संगीत में भी उनकी उपस्थिति उल्लेखनीय रही। अनुमानतः उन्होंने सात सौ से अधिक गीत रिकॉर्ड किए।
उनके व्यक्तित्व का एक और उल्लेखनीय पक्ष उनकी सादगी और विनम्रता थी। उन्होंने कभी प्रचार-प्रसार की दौड़ में स्वयं को शामिल नहीं किया। मीडिया में विवादों से दूर रहना और केवल अपने काम पर ध्यान देना उनकी आदत थी। शायद यही कारण है कि वे अपने समय की सबसे सम्मानित कलाकारों में गिनी जाती हैं।
जब उनसे बार-बार लता मंगेशकर से तुलना के बारे में पूछा जाता था, तो वे हमेशा आदरपूर्वक उत्तर देती थीं। उन्होंने अनेक अवसरों पर कहा कि युवावस्था में वे स्वयं लता जी के गीत गाकर अभ्यास करती थीं। उनके भीतर किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धात्मक कटुता नहीं थी। यह उनकी उदारता और संस्कारों का परिचायक है।
समय बीतता गया, संगीत की दुनिया बदलती गई, लेकिन सुमन कल्याणपुर के गीतों का आकर्षण कम नहीं हुआ। डिजिटल युग में जब पुराने गीतों को नई पीढ़ी ने फिर से सुनना शुरू किया, तब लोगों ने महसूस किया कि जिन गीतों को वे वर्षों से लता मंगेशकर का मानते आए थे, उनमें से कई वास्तव में सुमन कल्याणपुर के स्वर में थे। यह खोज अपने-आप में उनकी प्रतिभा की सबसे बड़ी स्वीकृति है।
भारत सरकार ने वर्ष 2023 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। संगीत जगत ने इसे एक ऐसे कलाकार को मिला सम्मान माना, जिसे बहुत पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल जानी चाहिए थी। यह सम्मान केवल एक गायिका का नहीं, बल्कि उस पूरे वर्ग का सम्मान था जो उत्कृष्ट कार्य करने के बावजूद अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा।
आज जब हम हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग को याद करते हैं, तो यह आवश्यक है कि सुमन कल्याणपुर को केवल लता मंगेशकर की समकालीन गायिका के रूप में न देखें। उन्हें उनके अपने योगदान, उनकी अपनी शैली और उनकी अपनी उपलब्धियों के आधार पर याद किया जाना चाहिए। उन्होंने यह सिद्ध किया कि महानता केवल शीर्ष स्थान प्राप्त करने में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी गरिमा और गुणवत्ता बनाए रखने में निहित होती है।
सुमन कल्याणपुर का स्वर भारतीय संगीत की उस मधुर नदी की तरह है, जो बिना शोर किए निरंतर बहती रही। शायद इसी कारण वह आज भी संगीत प्रेमियों के हृदय में उतनी ही ताज़गी और आत्मीयता के साथ गूँजता है। इतिहास भले ही उन्हें वह स्थान देने में देर कर गया हो, लेकिन संगीत के सच्चे रसिकों ने उन्हें हमेशा सम्मान और प्रेम से याद रखा है। यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
(समाप्त)