मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

रहिमन धागा प्रेम का?

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाए, जोड़े  से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये, जीहां, ठीक ही कहा है रहीमदास जी ने. कभी हम भी सोचा करते थे कि प्रेम बाँटने से बढ़ता है, इसलिए अपनी परवाह किये  बगैर,अपनी पॉकेट लगातार हल्की करते रहे, अपनी उम्र के अधिकांश कीमती दिन, महीने, घंटे, मिनट्स, यहाँ तक कि अपने गुण , अपनी कला, अपनी सोच, अपनी कल्पना, अपना लेखन तक सब ताक पर रख दिया, ये सोचकर कि प्रेम बाँटने से बढ़ता है, लेकिन अब जाकर  पता चला कि प्यारे ये दुनिया  है, जैसे को तैसे की कहावत भी यहीं पर चलती है, समय को देखो, समय की धार को पहचानो, तब जाकर प्रेम या जैसे को तैसे वाला बर्ताव करो, मगर हम कभी न समझे, समझते भी कैसे, इतनी  समझ कभी आई नहीं कि क्या और कैसा बर्ताव किससे , कैसे और कब करना चाहिए, अपनी ज़िन्दगी की दुकान  में तो बस एक ही सौदा है-प्रेम........अब करें भी तो क्या। हमारे एक मित्र हैं, खूब कहते हैं, खूब घूमते हैं, खूब सोते हैं, खूब गुस्सा करते हैं और खूब झूठ बोलकर खूब सारी बातें छिपाने की महारत रखते हैं. एक दिन बोले यार अब से कोई बात नहीं छिपानी, ज़िन्दगी का हर पल शेयर करेंगे। हम भी बोल पड़े ओक्के। अब हुआ कुछ और--- हम तो हर बात को बताना सीख गए और वो---- अपनी बात को छिपाने के रस्ते पर चल पड़े, एक दिन ऐसा आया कि वो श्रीमान ५ दिन की यात्रा पर चुपके से निकल गए. जब पता चला तो हम भी गुस्से में दो दिन आउटिंग पर चले गए, अब हुआ क्या, दो दिन की आउटिंग की बात पता चलते ही उनका  पारा तो सातवें आसमान पर जा पहुंचा, लगे गालियां देने, तेवर दिखाने-----. जब हमने पूछा कि श्रीमान आप भी तो बिना बताये ५ दिन ग़ायब हो गए थे, तो बोले फिर क्या हुआ--- हमने आकर बता दिया न.... सुनकर हम तिलमिला उठे ---- बस साहब हमने सोच लिया कि अब ऐसे शख्स का साथ हम नहीं देंगे जो अपने लिए तो छूट लिए घूमता हो और दूसरों पर पाबंदियां लगता हो, ठीक ऐसा ही हाल हमारी राजनीति का भी हो चला है, नेता चाहे जहाँ घूमे, जितने झूठ बोले, जो चाहे वो करे, मगर आम जनता को अपने घर के खूँटें से बंधी निरीह बकरी ही समझता है. अब खूंटा तोड़ो तो मरे और न तोड़ो-- तो भी मरे. हम तो नेता जी से प्रेम का धागा जोड़े बैठे थे मगर वो तो धागा तोड़कर, हमारे गले और पैरों में ज़ंजीर डालने का काम करने में जुटे हैं, इसलिए मौका है कि जनता अपनी ताकत पहचाने और तय करे कि किससे प्रेम वाला बर्ताव करना है और किससे दो-दो हाथ करने हैं.

चेतन आनंद

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

नोएडा हिंसा के आईने में भारत की चुनौती

 लेख-

भारत की आर्थिक राजधानी की दौड़ में शामिल नोएडा और ग्रेटर नोएडा पिछले कुछ दशकों में ’विकास के इंजन’ बनकर उभरे हैं। लेकिन, अप्रैल 2026 में हुई हालिया मजदूर हिंसा ने इस चमक-धमक के पीछे छिपी एक कड़वी सच्चाई को उजागर कर दिया है। जब मजदूरों का असंतोष सड़कों पर आगजनी और पथराव के रूप में उतरता है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह हमारे औद्योगिक ढांचे, प्रशासन की सतर्कता और विदेशी हस्तक्षेप की संभावनाओं की गहरी पड़ताल की मांग करता है।
पिछले दो दशकों के प्रमुख औद्योगिक हादसे और संघर्ष
भारत में औद्योगिक संघर्षों का इतिहास लंबा रहा है। पिछले 20 वर्षों में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिन्होंने पूरे देश को हिलाकर रख दिया-
ग्रैजियानो ट्रांसमिशनी, नोएडा (2008)-नोएडा के औद्योगिक इतिहास में यह एक काला दिन था जब प्रबंधन और श्रमिकों के बीच विवाद इतना बढ़ा कि उग्र भीड़ ने कंपनी के सीईओ की पीट-पीटकर हत्या कर दी।
प्राइसकोल, कोयंबटूर (2009)-यहाँ भी यूनियन विवाद के कारण हिंसा हुई और एक वरिष्ठ अधिकारी को अपनी जान गंवानी पड़ी।
मारुति सुजुकी, मानेसर (2012)-यह भारतीय उद्योग जगत के लिए एक ’वेक-अप कॉल’ था। यहाँ हुई हिंसा में एक मानव संसाधन प्रबंधक की मौत हुई और संयंत्र को हफ़्तों बंद रखना पड़ा। इसके बाद श्रम कानूनों में सख्ती और मजदूरों के प्रति प्रबंधन के व्यवहार पर वैश्विक चर्चा हुई।
नोएडा हिंसा (2026)-वर्तमान संघर्ष का मुख्य कारण 12 घंटे की शिफ्ट और वेतन में विसंगतियां बताई जा रही हैं। सेक्टर 60 और 84 जैसे क्षेत्रों में हुई आगजनी ने साबित किया कि धरातल पर संवादहीनता की स्थिति आज भी कायम है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
विभिन्न औद्योगिक रिपोर्टों के अनुसार, भारत में हर साल औद्योगिक दुर्घटनाओं और संघर्षों में औसतन 400 से अधिक श्रमिकों की जान जाती है। श्रम मंत्रालय के पुराने आंकड़ों और हालिया रुझानों को देखें, तो औद्योगिक विवादों की संख्या में कमी तो आई है, लेकिन उनकी ’तीव्रता’ और ’हिंसा’ का स्तर बढ़ा है।
नोएडा हिंसा-’विदेशी हाथ’ और आंतरिक सुरक्षा का संकट
नोएडा की हालिया हिंसा में एक चौंकाने वाला पहलू सामने आया है, विदेशी शक्तियों की कथित संलिप्तता। उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्री और सुरक्षा एजेंसियों ने संकेत दिए हैं कि इस अशांति के पीछे सीमा पार (विशेषकर पाकिस्तान) के हैंडलर्स का हाथ हो सकता है।
साजिश का पैटर्न-सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, जब देश आर्थिक रूप से मजबूती से बढ़ रहा होता है, तो विदेशी ताकतें अक्सर आंतरिक अशांति फैलाने के लिए समाज के संवेदनशील वर्गों (जैसे मजदूर या किसान) का इस्तेमाल करती हैं।
सोशल मीडिया का दुरुपयोग-जांच में यह बात सामने आई है कि हिंसा भड़काने के लिए कई ’टेलीग्राम’ और ’व्हाट्सएप’ ग्रुप्स का इस्तेमाल किया गया, जिनके सर्वर और ऑपरेटर्स का लिंक संदिग्ध पाया गया है।
लक्ष्य-नोएडा जैसे क्षेत्रों को निशाना बनाने का उद्देश्य सीधा है विदेशी निवेश को डराना और भारत की ’इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की छवि को वैश्विक पटल पर खराब करना।
सरकार और प्रशासन की भूमिकाः कहाँ चूक हुई और क्या कदम उठाए गए?
ऐसी घटनाओं में सरकार और प्रशासन की भूमिका दोहरी होती हैः निवारक और सुधारात्मक।
चूक के बिंदु-
इंटेलिजेंस फेलियर-हजारों मजदूरों का एक जगह इकट्ठा होना और पेट्रोल बम जैसे हथियारों का इस्तेमाल होना यह दर्शाता है कि स्थानीय खुफिया इकाई भांपने में नाकाम रही।
संवाद की कमी-श्रम विभाग और फैक्ट्रियों के बीच नियमित ऑडिट और संवाद की कमी के कारण छोटे मुद्दे बड़ी हिंसा में तब्दील हो गए।
प्रशासनिक कदम
उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बार ’जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई है। मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा एक ’हाई-पावर्ड कमेटी’ का गठन किया गया है। साथ ही, उपद्रवियों की पहचान के लिए फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है और नुकसान की भरपाई दोषियों की संपत्ति से करने के निर्देश दिए गए हैं।
समाधान और भविष्य की राहः संघर्ष से शांति की ओर
औद्योगिक शांति केवल लाठी या कानून के दम पर नहीं आ सकती। इसके लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है-
1. डिजिटल पारदर्शी वेतन प्रणाली-मजदूरों की सबसे बड़ी शिकायत ’कागजी वेतन’ और ’वास्तविक वेतन’ के बीच का अंतर है। सरकार को हर कंपनी के लिए ’आधार-लिंक्ड’ डिजिटल पेरोल अनिवार्य करना चाहिए ताकि ठेकेदारों द्वारा किया जाने वाला शोषण बंद हो सके।
2. आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र-हर बड़ी फैक्ट्री में एक ऐसा मंच होना चाहिए जहाँ मजदूर बिना किसी डर के अपनी बात रख सकें। यदि प्रबंधन उनकी बात नहीं सुनता, तो सीधे ’ऑनलाइन पोर्टल’ के जरिए श्रम विभाग तक शिकायत पहुँचने की व्यवस्था होनी चाहिए।

3. खुफिया तंत्र का सुदृढ़ीकरण-औद्योगिक क्षेत्रों के लिए एक विशेष ’इंडस्ट्रियल इंटेलिजेंस यूनिट’ की आवश्यकता है जो सोशल मीडिया और जमीनी गतिविधियों पर नजर रख सके, ताकि किसी भी बाहरी साजिश को समय रहते कुचला जा सके।

4. काम के घंटों का मानवीयकरण-उत्पादकता बढ़ाने के चक्कर में मजदूरों को मशीनों की तरह इस्तेमाल करना दीर्घकालिक रूप से घातक है। 12 घंटे की शिफ्ट के बजाय 8 घंटे की तीन शिफ्टों का मॉडल न केवल रोजगार बढ़ाएगा बल्कि तनाव और आक्रोश को भी कम करेगा।
5. राष्ट्रविरोधी तत्वों पर कड़ी कार्रवाई-यदि जांच में पाकिस्तान या किसी भी बाहरी शक्ति का हाथ साबित होता है, तो इसे केवल श्रम विवाद न मानकर ’राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मुद्दा माना जाना चाहिए और संबंधित धाराओं में कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। नोएडा की हिंसा एक चेतावनी है कि हम विकास की दौड़ में अपने ’श्रम बल’ को पीछे नहीं छोड़ सकते। मजदूर किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि यह रीढ़ कमजोर होगी या इसमें असंतोष की दरार पड़ेगी, तो भव्य औद्योगिक ढांचा ढह सकता है। सरकार, प्रशासन और उद्योगपतियों को मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ मजदूर खुद को ’शोषित’ नहीं बल्कि ’साझेदार’ महसूस करे। तभी भारत एक सुरक्षित और समृद्ध औद्योगिक महाशक्ति बन पाएगा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

युद्धविराम के बाद क्या हो भारत की रणनीति

 लेख-

अमेरिका-ईरान तनाव-

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में  अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता या घटता तनाव केवल दो देशों तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ता है। विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील और ऊर्जा-निर्भर देश के लिए यह स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हालिया युद्ध विराम ने भले ही तत्काल राहत दी हो, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से भारत को अपनी रणनीति स्पष्ट और मजबूत रखनी होगी।

सबसे पहले, भारत की विदेश नीति का मूल आधार “संतुलन” होना चाहिए। भारत के अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, वहीं ईरान के साथ ऊर्जा और क्षेत्रीय सहयोग जुड़ा हुआ है। ऐसे में किसी एक पक्ष का खुला समर्थन भारत के हितों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए भारत को “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलते हुए दोनों देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए। यह नीति भारत को वैश्विक मंच पर एक स्वतंत्र और विश्वसनीय शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है ऊर्जा सुरक्षा। भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 80 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तनाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए भारत को दीर्घकाल में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जैव ईंधन की ओर तेजी से बढ़ना होगा। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना भी आवश्यक है, ताकि तेल पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सके।

तीसरा, समुद्री सुरक्षा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरने वाले व्यापारिक और ऊर्जा मार्ग भारत की जीवनरेखा हैं। भारतीय नौसेना की सक्रियता, अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग और तेल टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना समय की मांग है। यह न केवल भारत की ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करेगा, बल्कि उसे एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति के रूप में भी स्थापित करेगा।

चौथा, आर्थिक स्थिरता बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है। जैसे ही मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतों में उछाल आता है, जिसका सीधा असर महंगाई, मुद्रा विनिमय दर और शेयर बाजार पर पड़ता है। भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखना होगा और ऐसी नीतियां अपनानी होंगी जो बाहरी झटकों से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रख सकें। इसके अलावा, वैकल्पिक व्यापार मार्गों और आपूर्ति स्रोतों की खोज भी आवश्यक है।

पाँचवां और अंतिम पहलू है भारत की वैश्विक भूमिका। आज भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति है। जी 20 और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत शांति, संवाद और सहयोग की वकालत कर सकता है। यदि परिस्थितियां अनुकूल हों, तो भारत मध्यस्थ की भूमिका भी निभा सकता है, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव भारत के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। यदि भारत संतुलित कूटनीति, ऊर्जा आत्मनिर्भरता, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और सक्रिय वैश्विक भूमिका को अपनाता है, तो वह न केवल इस संकट से सुरक्षित निकल सकता है, बल्कि अपने लिए नए अवसर भी पैदा कर सकता है। आज की दुनिया में वही देश सफल है, जो संघर्षों से दूर रहते हुए भी परिस्थितियों का लाभ उठाना जानता है और भारत के पास यह क्षमता स्पष्ट रूप से मौजूद है।


लेखक

डॉ. चेतन आनंद

(कवि-पत्रकार)

गुरुवार, 26 मार्च 2026

क्या विश्व युद्ध वास्तव में संभव है!

 लेख-

बदलते वैश्विक परिदृश्य में चुनौतियाँ, संतुलन और रणनीतिक महत्व
आज की दुनिया तेजी से बदल रही है। महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष, तकनीकी हथियारों का विस्तार और आर्थिक अस्थिरता जैसे कारकों के कारण समय-समय पर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि कहीं दुनिया किसी बड़े युद्ध की ओर तो नहीं बढ़ रही। “विश्व युद्ध-3” की चर्चा भले ही अभी संभावनाओं और विश्लेषण तक सीमित हो, लेकिन यह विषय अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बना हुआ है। इतिहास हमें बताता है कि जब वैश्विक शक्ति संतुलन बिगड़ता है, सैन्य गठबंधन मजबूत होते हैं और आर्थिक संकट गहराता है, तब बड़े संघर्षों की जमीन तैयार होती है। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध इसी तरह की परिस्थितियों में हुए थे। आज की परिस्थितियाँ भले ही अलग हों, लेकिन कुछ समान संकेत विशेषज्ञों को चिंतित करते हैं।
क्या वास्तव में विश्व युद्ध संभव है
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों का मानना है कि वर्तमान समय में वैश्विक तनाव जरूर बढ़ा है, लेकिन सीधा विश्व युद्ध होना अभी निश्चित नहीं कहा जा सकता। इसके कई कारण हैं-
1. परमाणु हथियारों का भय-आज कई देशों के पास परमाणु शक्ति है। यदि बड़े युद्ध में इनका प्रयोग हुआ तो उसका विनाशकारी प्रभाव पूरी मानवता को झेलना पड़ेगा। यही कारण है कि महाशक्तियाँ सीधे टकराव से बचने की कोशिश करती हैं।
2. आर्थिक परस्पर निर्भरता-वैश्वीकरण के कारण देशों की अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। व्यापार और निवेश के माध्यम से सहयोग की आवश्यकता बढ़ी है। किसी भी बड़े युद्ध से वैश्विक मंदी आ सकती है, जिससे सभी देशों को नुकसान होगा।
3. कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ-संवाद और समझौते के माध्यम से संघर्षों को रोकने की कोशिश लगातार चलती रहती है। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालाँकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि यदि क्षेत्रीय युद्ध फैलते हैं या महाशक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने आती हैं, तो स्थिति गंभीर हो सकती है।
आधुनिक युद्ध का बदलता स्वरूप
भविष्य का युद्ध केवल सैनिकों की भिड़ंत नहीं होगा।
साइबर हमले
ड्रोन और रोबोटिक हथियार
अंतरिक्ष तकनीक
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य प्रणाली
ये सभी युद्ध को अधिक जटिल और तेज बना सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा अब पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है।
भारत की सैन्य शक्ति : वैश्विक संतुलन में भूमिका
ऐसे बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की सैन्य क्षमता और रणनीतिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियों में गिना जाता है और उसकी भौगोलिक स्थिति भी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
1. विशाल और प्रशिक्षित सेना-भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है। थल सेना, वायु सेना और नौसेना तीनों ही आधुनिक तकनीक से लैस होने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही हैं।
2. परमाणु शक्ति और प्रतिरोध क्षमता-भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है, जो “विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध” की नीति पर काम करता है। इसका उद्देश्य युद्ध को रोकना और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
3. स्वदेशी रक्षा उत्पादन-पिछले वर्षों में भारत ने आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण पर जोर दिया है। मिसाइल प्रणाली, लड़ाकू विमान, युद्धपोत और ड्रोन तकनीक जैसे क्षेत्रों में प्रगति ने देश की सामरिक क्षमता को मजबूत किया है।
4. सामरिक साझेदारी और संतुलित कूटनीति-भारत विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति अपनाता है। इससे वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक जिम्मेदार और स्थिर शक्ति के रूप में उभर रहा है।
यदि विश्व युद्ध जैसी स्थिति बनी तो भारत पर प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार, संभावित वैश्विक संघर्ष का असर भारत पर भी पड़ेगा-ऊर्जा और व्यापार आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, रक्षा व्यय बढ़ सकता है, आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। लेकिन इसके साथ भारत के लिए अवसर भी हो सकते हैं, जैसे वैश्विक उत्पादन केंद्र के रूप में उभरना या कूटनीतिक नेतृत्व की भूमिका निभाना।
आम नागरिक और राष्ट्रीय तैयारी
किसी भी वैश्विक संकट से निपटने के लिए केवल सैन्य शक्ति ही पर्याप्त नहीं होती। मजबूत अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता और सामाजिक एकजुटता भी आवश्यक है। साइबर सुरक्षा और डिजिटल जागरूकता, आपदा प्रबंधन और स्वास्थ्य व्यवस्था, ऊर्जा और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता, ये सभी कारक राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत बनाते हैं।
विश्व युद्ध की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन यह भी सच है कि आधुनिक दुनिया में बड़े युद्ध के परिणाम इतने भयावह हो सकते हैं कि देश उससे बचने की हर संभव कोशिश करते हैं। भारत के लिए यह समय सतर्कता और रणनीतिक तैयारी का है। मजबूत सैन्य शक्ति, संतुलित विदेश नीति और आर्थिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से वह न केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। अंततः यह पूरी मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी है कि इतिहास की त्रासदियों से सीख लेकर सहयोग और संवाद का मार्ग चुना जाए। यही भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बना सकता है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

मंगलवार, 17 मार्च 2026

फिल्मों के अश्लील गानों पर विवाद

 समसामयिक लेख-

फिल्मों के अश्लील गानों पर विवाद
बदलती संस्कृति, बाज़ार और अभिव्यक्ति की बहस

भारतीय फिल्म उद्योग लंबे समय से समाज के बदलते स्वरूप और नैतिक मान्यताओं का आईना रहा है। फिल्मों के गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे समाज की सोच, संवेदनाओं और सांस्कृतिक दिशा को भी प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर कुछ गीतों और फिल्मों को लेकर “अश्लीलता”, “अति बोल्ड प्रस्तुति” या “द्विअर्थी अभिव्यक्ति” के आरोप लगते रहे हैं। इन विवादों ने सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन की बहस को लगातार जीवित रखा है। अगर हम 1990 के दशक की ओर देखें तो यह विवाद मुख्यधारा में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। वर्ष 1993 में आई फिल्म खलनायक का गीत “चोली के पीछे क्या है” पूरे देश में चर्चा और विरोध का कारण बना। कई महिला संगठनों ने इसे स्त्री की गरिमा के विरुद्ध बताते हुए प्रदर्शन किए। अदालत तक मामला पहुँचा, लेकिन गीत पर प्रतिबंध नहीं लगा। इसके बावजूद यह गीत उस समय का सुपरहिट बन गया। इससे यह संकेत मिला कि दर्शकों की पसंद और सामाजिक नैतिकता के बीच एक दिलचस्प द्वंद्व मौजूद है।
इसके बाद के वर्षों में फिल्मों की विषय-वस्तु और प्रस्तुति अधिक ग्लैमरस और खुली होती चली गई। वर्ष 2011 में रिलीज़ हुई फिल्म द डर्टी पिक्चर और उसका चर्चित गीत “ऊ ला ला” इसी प्रवृत्ति का उदाहरण बने। फिल्म को सेंसर बोर्ड ने “ए” सर्टिफिकेट दिया, जबकि कुछ सामाजिक समूहों ने इसे युवाओं पर गलत प्रभाव डालने वाला बताया। इसके बावजूद फिल्म और गीत दोनों ने अपार लोकप्रियता हासिल की। इसी दौर में मनोरंजन उद्योग ने यह महसूस किया कि बोल्ड कंटेंट दर्शकों के एक बड़े वर्ग को आकर्षित कर रहा है।
युवा-केन्द्रित और कॉमेडी फिल्मों में भी इस प्रवृत्ति का असर दिखा। वर्ष 2013 में आई फिल्म ग्रैंड मस्ती पर अत्यधिक द्विअर्थी संवाद और अश्लीलता के आरोप लगे। मीडिया और फिल्म समीक्षकों ने सवाल उठाया कि क्या कॉमेडी के नाम पर मनोरंजन की सीमाएँ पार की जा रही हैं। इसके बाद 2014 में रिलीज़ हुई फिल्म रागिनी एमएमएस 2 का गीत “बेबी डॉल” भी अपनी बोल्ड प्रस्तुति के कारण विवादों में रहा। आलोचकों ने इसे महिलाओं के वस्तुकरण से जोड़कर देखा, जबकि समर्थकों का कहना था कि यह आधुनिक मनोरंजन की मांग है।
इसी क्रम में 2015 में आई फिल्म हंटर के कंटेंट और गीतों को लेकर भी बहस हुई। फिल्म के विषय और प्रस्तुति को लेकर कई लोगों ने कहा कि शहरी युवा संस्कृति के नाम पर यौन संकेतों को सामान्य बनाया जा रहा है। बाद में 2018 में रिलीज़ हुई फिल्म वीरे दी वेडिंग के कुछ गीतों और संवादों पर भी भाषा और अभिव्यक्ति की मर्यादा को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। इससे स्पष्ट हुआ कि डिजिटल युग में किसी भी फिल्म या गीत का विवाद कुछ ही समय में राष्ट्रीय चर्चा बन सकता है।
हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति और अधिक स्पष्ट हुई। वर्ष 2022 में रिलीज़ हुई फिल्म पठान के गीत “बेशरम रंग” को लेकर व्यापक विरोध देखने को मिला। गाने के कॉस्ट्यूम, डांस स्टेप्स और फिल्मांकन को लेकर कई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने आपत्ति जताई। कुछ राज्यों में फिल्म के बहिष्कार की मांग तक उठी। सेंसर बोर्ड द्वारा सुझाए गए बदलावों के बाद फिल्म रिलीज़ हुई और बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता भी हासिल की। इससे यह साबित हुआ कि विवाद कभी-कभी फिल्म की लोकप्रियता को और बढ़ा देते हैं।
इसके बाद 2023 में आई फिल्म डंकी के एक गीत की प्रस्तुति को लेकर भी सोशल मीडिया पर सीमित स्तर पर आलोचना हुई। हालांकि यह विवाद पहले की तुलना में कम तीव्र था, लेकिन इससे यह संकेत मिला कि दर्शकों की संवेदनशीलता और प्रतिक्रियाएँ अब पहले से अधिक त्वरित और मुखर हो गई हैं।
फिल्मों के अलावा पॉप संगीत और म्यूज़िक वीडियो में भी बोल्डनेस को लेकर बहस जारी रही है। वर्ष 2020 में रिलीज़ हुई फिल्म स्ट्रीट डांसर 3डी के गीत “गर्मी” ने युवाओं के बीच डांस ट्रेंड बना दिया, लेकिन इसके डांस मूव्स और कैमरा एंगल को लेकर आलोचना भी हुई। इसके बाद 2021 में आए स्वतंत्र म्यूज़िक वीडियो “पानी पानी” तथा उसी वर्ष फिल्म सत्यमेव जयते 2 के गीत “कुसु कुसु” ने भी ग्लैमरस प्रस्तुति के कारण चर्चा और विवाद दोनों अर्जित किए। इन गीतों ने यह दिखाया कि आज के मनोरंजन उद्योग में क्लब-संस्कृति, तेज़ बीट्स और आकर्षक विजुअल्स का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।  इधर नोरा फतेही के डांस नंबर जैसे चुनरी चुनरी (सरके चुनर मेरी सरके) पर ग्लैमरस फिल्मांकन, गाने के आपत्तिजनक बोल और उत्तेजक डांस स्टेप्स को लेकर सोशल मीडिया पर आलोचना हो रही है। वहीं रैपर बादशाह के पार्टी-स्टाइल गीत टटीरी के कुछ बोलों और विजुअल प्रस्तुति को भी द्विअर्थी और क्लब-संस्कृति को बढ़ावा देने वाला बताया गया। इन सभी घटनाओं को समग्र रूप से देखें तो स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में मनोरंजन को लेकर दृष्टिकोण लगातार बदल रहा है। एक ओर युवा पीढ़ी वैश्विक ट्रेंड और आधुनिक अभिव्यक्ति को सहजता से स्वीकार कर रही है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक सोच रखने वाले वर्ग सांस्कृतिक मर्यादाओं की रक्षा की बात करते हैं। सेंसर बोर्ड और न्यायपालिका भी इस संतुलन को बनाए रखने के लिए समय-समय पर हस्तक्षेप करते रहे हैं, चाहे वह आयु-आधारित प्रमाणपत्र देना हो या कुछ दृश्यों में बदलाव सुझाना।
वास्तव में “अश्लीलता” की परिभाषा स्थिर नहीं है; यह समय, समाज और संदर्भ के साथ बदलती रहती है। जो प्रस्तुति एक पीढ़ी को अस्वीकार्य लगती है, वही दूसरी पीढ़ी के लिए सामान्य मनोरंजन हो सकती है। डिजिटल मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म ने इस बहस को और व्यापक बना दिया है, क्योंकि अब दर्शक अपनी प्रतिक्रिया तुरंत व्यक्त कर सकते हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भारतीय फिल्मों और गीतों में बोल्डनेस को लेकर होने वाले विवाद केवल मनोरंजन की सीमा का प्रश्न नहीं हैं, बल्कि वे समाज में चल रहे सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत भी हैं। भविष्य में भी यह बहस जारी रहने की संभावना है, क्योंकि मनोरंजन उद्योग निरंतर नए प्रयोग करेगा और समाज अपनी संवेदनशीलताओं के अनुसार प्रतिक्रिया देता रहेगा। इसलिए आवश्यक है कि रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाकर ही स्वस्थ और समृद्ध सांस्कृतिक वातावरण तैयार किया जा सके।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार

नाराजगी के बीच डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति

 समसामयिक लेख-

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का कार्यकाल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसे दौर के रूप में देखा जाता है जिसने पारंपरिक वैश्विक संबंधों को नई दिशा दी। उनकी नीतियाँ, निर्णय लेने की शैली और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण ने दुनिया के कई देशों को प्रभावित किया। कुछ देशों ने उनके कदमों का समर्थन किया, तो अनेक देशों में असंतोष और चिंता भी दिखाई दी। इस कारण वैश्विक स्तर पर यह चर्चा तेज हुई कि ट्रम्प के दौर में अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा और टकराव की राजनीति को बढ़ावा मिला।
“अमेरिका फर्स्ट” की नीति और उसका प्रभाव
ट्रम्प प्रशासन की सबसे प्रमुख नीति अमेरिका फर्स्ट वाली रही, जिसका उद्देश्य अमेरिकी उद्योग, रोजगार और सुरक्षा को प्राथमिकता देना था। यह नीति घरेलू स्तर पर लोकप्रिय रही, लेकिन कई देशों को लगा कि इससे वैश्विक सहयोग की भावना कमजोर होगी। यूरोप और एशिया के कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और बहुपक्षीय समझौतों से दूरी बनाने की दिशा में कदम माना। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अमेरिका की पारंपरिक वैश्विक नेतृत्व भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा।
चीन के साथ व्यापार युद्ध
ट्रम्प के कार्यकाल में सबसे बड़ा आर्थिक विवाद चीन के साथ व्यापार युद्ध को लेकर हुआ। अमेरिका ने चीन से आयातित वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाए और तकनीकी कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाए। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क बढ़ा दिए। इस टकराव का असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्ख्विक आपूर्ति श्रृंखला और बाजारों में अस्थिरता फैल गई। कई विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर भी इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संघर्ष ने वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस को जन्म दिया।
यूरोप के साथ मतभेद
यूरोप के प्रमुख देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ भी ट्रम्प प्रशासन के संबंधों में तनाव देखा गया। विशेष रूप से रक्षा खर्च और सैन्य सहयोग को लेकर दिए गए बयानों ने असहजता पैदा की। ट्रम्प ने कई बार कहा कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा पर अधिक खर्च करना चाहिए और अमेरिका पर निर्भरता कम करनी चाहिए। इससे पारंपरिक सैन्य गठबंधन नाटो के भविष्य को लेकर भी चर्चा तेज हुई। इसके अलावा पर्यावरण नीति और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भी मतभेद सामने आए। यूरोपीय देशों ने वैश्विक पर्यावरणीय प्रयासों में अमेरिका की भूमिका को कमजोर पड़ता हुआ महसूस किया।
कनाडा और मैक्सिको के साथ आर्थिक विवाद
उत्तर अमेरिका के पड़ोसी देशों कनाडा और मैक्सिको के साथ भी ट्रम्प प्रशासन के संबंध पूरी तरह सहज नहीं रहे। स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए शुल्क से कनाडा में नाराज़गी देखी गई। मैक्सिको के साथ सीमा दीवार और प्रवासन नीति को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। हालाँकि बाद में नए व्यापार समझौतों के जरिए संबंधों को संतुलित करने की कोशिश की गई।
ईरान और मध्य-पूर्व की राजनीति
ट्रम्प प्रशासन का एक महत्वपूर्ण निर्णय ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका का बाहर निकलना था। इसके बाद आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य तनाव बढ़ने से दोनों देशों के संबंध बेहद खराब हो गए। मध्य-पूर्व की राजनीति में लिए गए कुछ फैसलों ने फ़िलिस्तीन सहित कई देशों में असंतोष पैदा किया। हालांकि दूसरी ओर, कुछ अरब देशों के साथ नए कूटनीतिक समझौते भी हुए, जिन्हें क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में सकारात्मक कदम माना गया।
एशियाई सहयोगियों के साथ संतुलन
जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की जैसे सहयोगी देशों के साथ भी समय-समय पर व्यापार और रक्षा खर्च के मुद्दों पर मतभेद सामने आए। ट्रम्प का मानना था कि अमेरिका लंबे समय से अपने सहयोगियों की सुरक्षा पर अत्यधिक खर्च कर रहा है। रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस  दृष्टिकोण ने सहयोगी देशों को अपनी रक्षा नीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया, लेकिन साथ ही असुरक्षा की भावना भी पैदा की।
कूटनीतिक शैली और वैश्विक प्रतिक्रिया
ट्रम्प की व्यक्तिगत राजनीतिक शैली भी वैश्विक चर्चा का विषय रही। वे अक्सर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर सीधे और तीखे बयान देते थे। इससे पारंपरिक कूटनीतिक प्रक्रियाओं की जगह सार्वजनिक संवाद और विवाद बढ़ते दिखाई दिए। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अनिश्चितता का माहौल बना, क्योंकि कई बार अचानक दिए गए बयानों से नीतिगत दिशा स्पष्ट नहीं रहती थी।
समर्थन और सकारात्मक पहलू
हालाँकि यह भी सच है कि ट्रम्प की नीतियों का पूरी दुनिया ने विरोध नहीं किया। कुछ देशों ने आतंकवाद के खिलाफ कठोर रुख और चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देने की रणनीति का समर्थन किया। अमेरिका के भीतर भी उद्योगों को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन के प्रयासों को सराहा गया। कई लोगों ने इसे वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभावों के खिलाफ एक आवश्यक कदम माना।
भारत के दृष्टिकोण से प्रभाव
भारत के लिए ट्रम्प का दौर मिश्रित अनुभव वाला रहा। रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई, लेकिन व्यापार और वीज़ा नीति को लेकर चुनौतियाँ भी सामने आईं। विदेश नीति के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने संतुलित कूटनीति अपनाकर अमेरिका के साथ सहयोग बनाए रखने के साथ-साथ अपने राष्ट्रीय हितों को भी प्राथमिकता दी।
डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति ने वैश्विक राजनीति में एक नए युग की शुरुआत की, जिसमें राष्ट्रवाद, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक पुनर्संतुलन प्रमुख विषय बन गए। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि पूरी दुनिया उनसे नाराज़ थी, लेकिन यह निश्चित है कि उनकी नीतियों ने पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों को चुनौती दी और नए समीकरणों को जन्म दिया। आज भी जब अमेरिकी राजनीति में उनकी संभावित वापसी की चर्चा होती है, तब दुनिया के कई देश उनके रुख और नीतिगत प्राथमिकताओं पर ध्यानपूर्वक नजर रखते हैं। आने वाले समय में यह तय करेगा कि वैश्विक व्यवस्था सहयोग और संवाद की दिशा में आगे बढ़ेगी या प्रतिस्पर्धा और शक्ति संतुलन की राजनीति और गहराएगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार


रविवार, 15 मार्च 2026

मृत्यु के पार की कथा : अनुभव, विज्ञान और साहित्य की साझा पड़ताल

 विशेष लेख-

मृत्यु मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है। जन्म से लेकर अंतिम सांस तक मनुष्य जीवन को समझने का प्रयास करता है, पर मृत्यु के बाद क्या होता है, यह प्रश्न सदियों से अनुत्तरित ही बना हुआ है। कभी-कभी ऐसे अद्भुत अनुभव सामने आते हैं जब कोई व्यक्ति मृत्यु-समान अवस्था में पहुँचकर फिर जीवन में लौट आता है। आधुनिक विज्ञान इन्हें निकट-मृत्यु अनुभव कहता है, जबकि आध्यात्मिक परंपराएँ इन्हें आत्मा की यात्रा का संकेत मानती हैं। यही कारण है कि यह विषय केवल चिकित्सा विज्ञान तक सीमित नहीं, बल्कि दर्शन, मनोविज्ञान और साहित्य सभी में गहरी रुचि का केंद्र रहा है।
अनुभवों की दुनिया : भय से शांति तक
निकट-मृत्यु अनुभवों का वर्णन करने वाले लोग प्रायः कुछ समान बातें बताते हैं। उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे अपने शरीर से अलग हो गए हों और अपने ही जीवन को बाहर से देख रहे हों। कई लोग एक उज्ज्वल प्रकाश, सुरंग या अद्भुत शांति का अनुभव करते हैं। कुछ के अनुसार उस क्षण उन्हें अपने जीवन की घटनाएँ चलचित्र की तरह दिखाई देती हैं, मानो जीवन स्वयं उनका मूल्यांकन कर रहा हो। भारत और विदेशों में अनेक ऐसे उदाहरण दर्ज हैं, जहाँ गंभीर दुर्घटना, हृदयाघात या ऑपरेशन के दौरान कुछ समय के लिए जीवन-चिह्न समाप्त होने के बाद व्यक्ति पुनः जीवित हो गया। कई लोगों ने लौटकर कहा कि उस अनुभव ने उनका जीवन बदल दिया। वे अधिक संवेदनशील, अधिक आध्यात्मिक और जीवन के प्रति अधिक कृतज्ञ हो गए।
विज्ञान की दृष्टि : मस्तिष्क और चेतना का रहस्य
चिकित्सा विशेषज्ञ इन अनुभवों को जैविक और न्यूरोलॉजिकल प्रक्रियाओं से जोड़कर देखते हैं। उनके अनुसार जब मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती या अत्यधिक तनाव की स्थिति होती है, तब चेतना की अवस्था में असामान्य परिवर्तन हो सकते हैं। मस्तिष्क कुछ ऐसे रसायन छोड़ता है जो दर्द को कम कर देते हैं और व्यक्ति को शांति या आनंद का अनुभव होता है। कुछ मनोवैज्ञानिक इसे मन की रक्षात्मक प्रक्रिया मानते हैं। संकट की चरम अवस्था में मन स्वयं को भय से बचाने के लिए सांत्वनादायक अनुभूति पैदा करता है। हालांकि कई शोधकर्ता यह भी स्वीकार करते हैं कि चेतना का रहस्य अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। इसलिए निकट-मृत्यु अनुभव विज्ञान के लिए भी एक खुली चुनौती बने हुए हैं।
साहित्य में मृत्यु-चेतना का चित्रण
रूसी लेखक लियो टॉल्स्टॉय के प्रसिद्ध लघु-उपन्यास “द डेथ ऑफ इवान इलिच” में मृत्यु के निकट खड़े व्यक्ति की मानसिक पीड़ा और आत्मबोध का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। यह कृति बताती है कि मृत्यु का सामना करते समय मनुष्य अपने जीवन के अर्थ को किस तरह नए दृष्टिकोण से देखता है। अमेरिकी लेखिका एलिस सीबोल्ड के उपन्यास “द लवली बोन्स” में एक मृत लड़की की आत्मा के दृष्टिकोण से कहानी कही गई है। यह उपन्यास मृत्यु के बाद भी भावनात्मक संबंधों के बने रहने की कल्पना को साहित्यिक रूप देता है। समकालीन लेखक जॉर्ज सॉन्डर्स की कृति “लिंकन इन द बार्डो” जीवन और मृत्यु के बीच की एक प्रतीकात्मक चेतन अवस्था का प्रयोगधर्मी चित्रण करती है। वहीं केट एटकिंसन के उपन्यास “लाइफ आफ्टर लाइफ” में नायिका बार-बार मृत्यु का अनुभव कर जीवन में लौटती है, जिससे नियति और संभावना के प्रश्न उठते हैं। अंग्रेज़ी साहित्य की महत्वपूर्ण लेखिका वर्जीनिया वुल्फ ने अपने उपन्यास “मिसेज़ डैलोवे” में जीवन-मृत्यु के मनोवैज्ञानिक तनाव और अस्तित्वगत संकट को सूक्ष्म संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है।
भारतीय दृष्टि : आत्मा और अनश्वरता
भारतीय दर्शन में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि परिवर्तन माना गया है। प्राचीन ग्रंथ कठोपनिषद में नचिकेता और यमराज का संवाद जीवन-मृत्यु के रहस्य को समझने का गहन प्रयास है। हिंदी साहित्य में भगवती चरण वर्मा का उपन्यास “चित्रलेखा” भी जीवन, पाप-पुण्य और अस्तित्व के प्रश्नों को दार्शनिक दृष्टि से उठाता है। निकट-मृत्यु अनुभव से लौटे लोगों के जीवन में अक्सर गहरा परिवर्तन देखा जाता है। वे भौतिक उपलब्धियों की अपेक्षा रिश्तों, सेवा और आत्मिक शांति को अधिक महत्व देने लगते हैं। यह अनुभव उन्हें जीवन की क्षणभंगुरता और उसके मूल्य का गहरा बोध कराता है। विज्ञान, साहित्य और आध्यात्मिक चिंतन, तीनों मिलकर हमें यह संकेत देते हैं कि मृत्यु का रहस्य चाहे जितना गहरा हो, जीवन का अर्थ उससे कहीं अधिक व्यापक है। शायद मरकर लौट आने वालों की कहानियाँ हमें यही संदेश देती हैं-जीवन को जागरूकता, प्रेम और कृतज्ञता के साथ जीना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार