शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

14 सितम्बर/हिंदी दिवस पर विशेष लेख

 


विश्व में तीसरे स्थान पर हिन्दी

क्यों नहीं बन पाई राष्ट्रभाषा?

भाषा किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर और पहचान होती है। इसके पीछे कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और तकनीकी कारण हैं। आज विश्व की भाषाओं की भीड़ में हिंदी का स्थान शीर्ष तीन में है। यह केवल बोलने वालों की संख्या से ही नहीं, बल्कि साहित्यिक वैभव, प्रवासी भारतीयों के योगदान, फ़िल्मों और तकनीक के विस्तार से भी वैश्विक मंच पर स्थापित है। आने वाले वर्षों में हिंदी न केवल एशिया बल्कि विश्व की प्रमुख सांस्कृतिक और डिजिटल भाषा के रूप में और भी मज़बूती से उभरेगी। हिंदी आज केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और डिजिटल क्रांति की भाषा बन चुकी है। बावजूद इसके ली हमारे भारत देश की राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पा रही। आइये इसकी पड़ताल करते हैं। सबसे पहले हमें औपनिवेशिक काल की ओर देखना होगा। अंग्रेज़ी ने भारत की शिक्षा, प्रशासन और न्याय प्रणाली पर गहरा असर डाला। स्वतंत्रता के बाद भी अंग्रेज़ी का वर्चस्व कायम रहा, जबकि हिंदी को अपेक्षित बढ़ावा नहीं मिल पाया। इसका परिणाम यह हुआ कि उच्च शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में अंग्रेज़ी की भूमिका बनी रही, और हिंदी पिछड़ती रही।

दूसरा कारण भारत की भाषायी विविधता है। भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है जहाँ तमिल, तेलुगु, बंगला, मराठी, पंजाबी जैसी अनेक भाषाएँ अपने-अपने क्षेत्रों में मज़बूत स्थिति रखती हैं। ऐसे परिदृश्य में हिंदी को एकमात्र राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करना आसान नहीं रहा। कई बार हिंदी को “थोपने” का आरोप भी लगा, जिससे दक्षिण और पूर्वी राज्यों में इसका विरोध हुआ। इस स्थिति में अंग्रेज़ी को समझौते के रूप में समानांतर स्थान मिल गया।

तीसरी बड़ी बाधा वैश्विक प्रसार की कमी है। स्पेनिश, चीनी और अंग्रेज़ी जैसी भाषाएँ अनेक देशों में बोली जाती हैं, जबकि हिंदी का प्रसार मुख्यतः भारत और प्रवासी भारतीयों तक सीमित है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के प्रति जिज्ञासा तो है, पर इसे आर्थिक और कूटनीतिक भाषा का दर्जा नहीं मिल पाया।

चौथा कारण तकनीकी और शैक्षणिक सामग्री का अभाव है। विज्ञान, प्रबंधन और शोध कार्यों में लंबे समय तक हिंदी में संसाधन उपलब्ध नहीं रहे। परिणामस्वरूप विद्यार्थियों और विद्वानों ने अंग्रेज़ी को ही प्राथमिकता दी।

फिर भी, हिंदी का साहित्य, सिनेमा और संगीत विश्व में लोकप्रिय हैं। बॉलीवुड फिल्मों ने हिंदी शब्दों और भावों को विदेशों तक पहुँचाया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने भी हिंदी को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी है।

1. बोलने वालों की संख्या-हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। लगभग 60 करोड़ लोग इसे मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। लगभग 120 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में हिंदी समझते और प्रयोग करते हैं। यदि “हिंदी-उर्दू” या “हिंदुस्तानी” को संयुक्त रूप से देखें, तो इसके बोलने वालों की संख्या 80 करोड़ से अधिक है। विश्व की प्रमुख भाषाओं की सूची में अंग्रेज़ी और चीनी (मंदारिन) के बाद हिंदी का स्थान आता है। हिंदी फ़िल्में और बॉलीवुड गीत भी हिंदी के वैश्विक प्रसार का बड़ा माध्यम हैं। भारत के अतिरिक्त नेपाल, मॉरीशस, फ़िजी, त्रिनिदाद, सूरीनाम, गुयाना, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन आदि देशों में बड़े हिंदी भाषी समुदाय हैं।

2. साहित्यिक समृद्धि-हिंदी का साहित्यिक भंडार अत्यंत व्यापक है। भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल से लेकर समकालीन रचनाओं तक हिंदी ने कविता, उपन्यास, नाटक, निबंध और पत्रकारिता में गहरी छाप छोड़ी है। तुलसीदास, सूरदास, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ से लेकर समकालीन कवियों और लेखकों ने इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई।

3. प्रवासी भारतीयों का योगदान-प्रवासी भारतीयों ने हिंदी को विदेशों में जीवित और प्रबल बनाए रखा है। मॉरीशस में हिंदी आधिकारिक भाषा है। फ़िजी में ‘फ़िजी हिंदी’ विकसित हुई है। अमेरिका और यूरोप में हिंदी साहित्य सम्मेलन, सांस्कृतिक आयोजन और विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग इसकी पहचान को और मजबूत करते हैं।

4. तकनीक और मीडिया-डिजिटल युग में हिंदी की पहुँच और अधिक बढ़ी है। सोशल मीडिया, यूट्यूब, ब्लॉगिंग और ऑनलाइन पत्रकारिता ने हिंदी को ग्लोबल डिजिटल भाषा का दर्जा दिया है। गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट और अन्य बड़ी कंपनियाँ अपने सॉफ़्टवेयर और सेवाओं में हिंदी को प्रमुखता दे रही हैं। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री का विस्तार तेजी से हुआ है। मेटा जैसी बड़ी टेक कंपनी ने हिंदी को अपनी सेवाओं में शामिल कर इसे डिजिटल वैश्विक भाषा बना दिया है। “भाषाई इंटरनेट रिपोर्ट (2023)” के अनुसार, भारत के 55 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता हिंदी में सामग्री पसंद करते हैं।

5. आधिकारिक मान्यता-संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के प्रयास निरंतर जारी हैं। कई देशों में हिंदी का अध्ययन विश्वविद्यालय स्तर पर कराया जा रहा है। 1975 से अब तक 12 विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं, जिनमें दुनिया भर के विद्वान सम्मिलित होते हैं। ब्रिटेन, रूस, जापान, जर्मनी और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन और शोध कार्य किए जा रहे हैं।

निष्कर्षतः, हिंदी में अपार संभावनाएँ हैं। यदि तकनीकी, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में हिंदी को अधिक प्रोत्साहन मिले और भारत के भीतर भाषायी सहमति का वातावरण बने, तो हिंदी निश्चित ही विश्व पटल पर राष्ट्रभाषा का स्वरूप ग्रहण कर सकती है। समाप्त

लेखक

डॉ. चेतन आनंद

(कवि एवं पत्रकार)

गुरुवार, 11 सितंबर 2025

महादेवी वर्मा और छायावाद की समकालीन कवयित्रियां

 12 सितम्बर महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि पर विशेष लेख-


-डॉ. चेतन आनंद

छायावाद हिंदी साहित्य का अत्यंत महत्त्वपूर्ण काव्य आंदोलन (1918-1936) माना जाता है। इसे “हिंदी काव्य का स्वर्णयुग“ भी कहा गया है। इस युग में कवियों ने भावुकता, रहस्यवाद, प्रकृति-सौंदर्य, प्रेम, करुणा और मानवीय संवेदनाओं को आत्मानुभूति के साथ प्रस्तुत किया। पुरुष कवियों में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ प्रमुख हैं, वहीं महिला कवयित्रियों में महादेवी वर्मा इस युग की सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि मानी जाती हैं। उन्होंने न केवल छायावाद को ऊँचाई दी, बल्कि आगे की प्रगतिवादी और नारीवादी काव्यधारा के लिए भी पथ प्रशस्त किया। उनके साथ सुभद्राकुमारी चौहान जैसी कवयित्रियाँ युग की राष्ट्रवादी चेतना की प्रतिनिधि बनकर सामने आईं।

महादेवी वर्मा (1907-1987)-इन्हें “आधुनिक मीरा” कहा जाता है। इनकी कविता में वेदना, करुणा और आत्मीय प्रेम की गहन अनुभूति है। नीरजा, सांध्यगीति, दीपशिखा, यामा इनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं। छायावादी भावुकता और रहस्यवाद के साथ-साथ इन्होंने सामाजिक सरोकार और नारी चेतना को भी स्वर दिया। इनकी रचनाओं में आत्मसंवाद, विरह और आध्यात्मिक प्रेम की अद्भुत अभिव्यक्ति मिलती है।

समकालीन कवयित्रियाँ-

महादेवी वर्मा की तरह छायावादी काल में और भी कई कवयित्रियाँ सक्रिय थीं, यद्यपि वे उतनी व्यापक ख्याति प्राप्त नहीं कर सकीं। प्रमुख नाम इस प्रकार हैं-

1.सुभद्राकुमारी चौहान (1904-1948)-राष्ट्रभक्ति और वीर रस की कवयित्री। “झाँसी की रानी“ कविता आज भी लोगों की जुबान पर है। इन्होंने छायावाद की कोमल भावुकता से अलग स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष और बलिदान का स्वर मुखरित किया।

2.विद्यावती कोकिल-इन्होंने भी छायावादी भावुकता के साथ सामाजिक सरोकारों और नारी-जीवन की पीड़ा को स्वर दिया।

3.शिवानी (गौरा पंत)-हालांकि ये बाद में कथाकार के रूप में प्रसिद्ध हुईं, किन्तु प्रारम्भिक काव्य-रचनाओं में छायावादी प्रवृत्ति देखी जा सकती है।

इनके अलावा इलाचंद्र जोशी, मन्नन द्विवेदी आदि कवियों की पत्नी-सहयोगिनी कवयित्रियाँ भी छायावादी भावभूमि पर लिख रही थीं, लेकिन वे हाशिए पर रहीं।

देखा जाये तो छायावाद में महादेवी वर्मा के बाद सुभद्रा कुमारी चौहान सबसे प्रसिद्ध कवयित्रियां मानी जाती हैं। दोनों ने ही अपना अलग मुकाम हासिल किया और हिन्दी साहित्य के आकाश की बुलंदियों को छुआ। छायावाद की महान कवयित्री महादेवी वर्मा और समकालीन सुभद्राकुमारी चौहान का तुलनात्मक अध्ययन करें तो काव्य की विषय-वस्तु की दृष्टि से

महादेवी वर्मा का काव्य मुख्यतः करुणा, विरह, प्रेम और आत्मानुभूति पर आधारित है। उनकी रचनाओं में नारी-हृदय की वेदना, जीवन की उदासी और आध्यात्मिक प्रेम का अद्भुत संगम मिलता है। नीरजा, सांध्यगीति, दीपशिखा और यामा जैसी कृतियाँ उनकी भावनात्मक गहराई और प्रतीकात्मक भाषा की साक्षी हैं। जबकि सुभद्राकुमारी चौहान की काव्य-दृष्टि पूरी तरह भिन्न है। वे राष्ट्रवादी चेतना और वीरता की कवयित्री हैं। उनकी कविताएँ स्वतंत्रता आंदोलन की पुकार बनकर जनमानस को उद्वेलित करती थीं। झाँसी की रानी कविता ने तो स्वतंत्रता-संग्राम के इतिहास में अमर स्थान प्राप्त कर लिया। उनकी रचनाएँ बलिदान, त्याग और देशप्रेम का संदेश देती हैं।

शैली और भाषा की दृष्टि से महादेवी वर्मा की शैली अत्यंत कोमल, संगीतमय और प्रतीकात्मक है। उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग अधिक है। उपमा, रूपक और बिंबों का जादुई संसार उनकी कविता को रहस्यात्मक सौंदर्य प्रदान करता है। वेदना की गहराई उनकी शैली को और प्रभावशाली बनाती है। इसके विपरीत, सुभद्राकुमारी चौहान की भाषा सरल, सहज और उद्बोधनात्मक है। उन्होंने साहित्यिक अलंकरणों से अधिक संदेश की स्पष्टता को महत्व दिया। उनकी कविताएँ पढ़ते ही उत्साह और जोश का संचार होता है। वे ओजस्वी स्वर की धनी थीं।

महादेवी वर्मा की भावभूमि मुख्यतः व्यक्तिगत है। वे आत्मा की पीड़ा और विरह की वेदना का चित्रण करती हैं। उनकी कविता में आत्मसंवाद और अंतर्मन की सूक्ष्मतम अनुभूतियाँ देखने को मिलती हैं। उन्हें आधुनिक मीरा भी कहा गया है, क्योंकि उनकी काव्य-दृष्टि में प्रेम का आध्यात्मिक रूप प्रकट होता है। सुभद्राकुमारी चौहान की भावभूमि सामूहिक है। वे राष्ट्र और समाज की पीड़ा, स्वतंत्रता की आकांक्षा और संघर्ष की ज्वाला को स्वर देती हैं। उनकी कविता में व्यक्तिगत वेदना की अपेक्षा सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति अधिक है।

योगदान और महत्व-महादेवी वर्मा ने हिंदी साहित्य को नारी-संवेदना का सशक्त आयाम दिया। छायावाद के चार स्तंभों में एकमात्र महिला होकर उन्होंने यह सिद्ध किया कि स्त्री भी साहित्य की दिशा तय कर सकती है। उनके काव्य ने आगे चलकर प्रगतिवाद और नारीवाद की पृष्ठभूमि तैयार की।

सुभद्राकुमारी चौहान ने साहित्य के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को स्वर दिया। उनकी कविताएँ उस समय के युवाओं को संघर्ष और बलिदान के लिए प्रेरित करती थीं। वे हिंदी साहित्य की पहली कवयित्रियों में से हैं, जिन्होंने राष्ट्रप्रेम और वीरता को केंद्र में रखकर स्त्री-कविता की पहचान गढ़ी।

तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य-

ऽ महादेवी वर्मा का काव्य आत्मा की करुण पुकार है, जबकि सुभद्राकुमारी चौहान का काव्य राष्ट्र की गरजती आवाज़ है।

ऽ महादेवी वर्मा की कविता व्यक्तिगत और आत्मनिष्ठ है, जबकि सुभद्राकुमारी चौहान की कविता सामूहिक और प्रेरणादायी है।

ऽ महादेवी की भाषा भावुक और प्रतीकात्मक है, जबकि सुभद्रा की भाषा सरल और ओजस्वी।

ऽ दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में हिंदी साहित्य को गौरव प्रदान कियाकृमहादेवी ने छायावाद को और सुभद्रा ने राष्ट्रवादी साहित्य को।

महादेवी वर्मा और सुभद्राकुमारी चौहान दोनों ही हिंदी साहित्य की गौरवशाली कवयित्रियाँ हैं। महादेवी ने जहाँ आत्मा की वेदना और नारी-हृदय की संवेदनाओं को स्वर दिया, वहीं सुभद्राकुमारी चौहान ने राष्ट्रप्रेम और वीरता की परंपरा को प्रतिष्ठित किया। एक ओर महादेवी वर्मा का काव्य हमें आंतरिक आत्मानुभूति की गहराइयों तक ले जाता है, तो दूसरी ओर सुभद्राकुमारी चौहान का काव्य हमें संघर्ष और बलिदान की राह पर प्रेरित करता है। इस प्रकार, दोनों कवयित्रियाँ अलग-अलग धरातलों पर खड़ी होकर भी हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा में अमिट स्थान रखती हैं। महादेवी आत्मा की आवाज़ हैं तो सुभद्रा राष्ट्र की आवाज़ हैं।

(लेखक सुप्रसिद्ध कवि एवं पत्रकार हैं)

बुधवार, 10 सितंबर 2025

NAZARIYA CHETAN ANAND KA


 समसामयिक लेख-

नेपाल का बवाल भारत के लिए खतरा?

नेपाल का बवाल भारत के लिए कई स्तरों पर खतरा साबित हो सकता है। यह खतरा केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि कूटनीतिक, आर्थिक, सामरिक और आंतरिक राजनीति पर भी असर डाल सकता है। भारत और नेपाल की खुली सीमा (लगभग 1,770 किमी) से आतंकवादी, माओवादी या अन्य असामाजिक तत्व आसानी से आवाजाही कर सकते हैं। चीन इस स्थिति का फायदा उठाकर नेपाल के माध्यम से भारत पर दबाव बना सकता है। नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता से चीन को अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर मिलता है। चीन की बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव और अन्य परियोजनाओं से नेपाल में उसकी रणनीतिक स्थिति भारत के लिए चुनौती बन सकती है। सीमा विवाद जैसे लिपुलेख, कालापानी, लिम्पियाधुरा को भड़काकर नेपाल की राजनीति भारत विरोधी हो सकती है। नेपाल में बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति भारत के खिलाफ माहौल बना सकती है, जिससे दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते प्रभावित होंगे। भारत-नेपाल के बीच व्यापार और ऊर्जा परियोजनाएँ बाधित हो सकती हैं। नेपाल में अस्थिरता का असर भारतीय निवेश और ट्रांजिट रूट पर भी पड़ेगा। नेपाल का बवाल भारत के सीमावर्ती राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, सिक्किम और पश्चिम बंगाल की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। माओवादी गतिविधियों को नई ऊर्जा मिल सकती है। कुल मिलाकर, नेपाल का बवाल भारत के लिए दोतरफा चुनौती है-बाहरी, चीन का प्रभाव, सीमा विवाद, सुरक्षा खतरे और आंतरिक, राजनीतिक दबाव, सीमावर्ती राज्यों की असुरक्षा, सामाजिक असर।

भारत को क्या करना चाहिए-

1-पहले 72 घंटों में नागरिक सुरक्षा और कंसुलर सहायता तेज करे। नेपाल में फँसे भारतीयों के लिए एमबेसी, कांसुलेट-हेल्पलाइन, अस्थायी आश्रय और निकासी-प्रबंध बढ़ाए। विदेश मंत्रालय ने इसी तरह की सलाह और हेल्पलाइन जारी की है।

2.सीमा पर निगरानी और बढ़ाई जाए। खुली सीमा पर पैट्रोलिंग बढ़ाए। स्थानीय पुलिस और बीएसएफ-कमान्डो के साथ तालमेल तय करे। ताकि गैरकानूनी आवाजाही और शरारती तत्वों की घुसपैठ रोकी जा सके। 

3-इंटेल और साइबर-मॉनिटरिंग स्केल-अप की जाए। सोशल मीडिया-डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलने वाले हिंसक उकसावे और गलत सूचनाओं की निगरानी करे और उनके स्रोतों पर कार्रवाई करे। आवश्यक कानूनी कदम उठाए।

4-वायु और वाहन मार्गों का बैक-अप तैयार रखे। हालिया उड़ान-डाइवर्जन और हवाई परिचालन व्यवधान ने दिखाया कि नागरिक आवागमन कठिन हो सकता है, ऐसे में  एयरलाइन या एयरपोर्ट समन्वय और प्रभावित राज्यों में स्वागत-सेन्टर तैयार रखे जाएं।

5-रणनीतिक-कूटनीतिक कदम उठाए जाएं। सीधा संवाद किया जाए। उच्च-स्तरीय राजनयिक पहल हो। नेपाल के साथ शांत और तथ्यों-आधारित वार्ता पर जोर दे। भारत ने भी खुलकर संवाद का रास्ता बताया है, यही रास्ता रखा जाए।

6-तीरंदाज़ी से बचे। बहुपक्षीय ढाँचा काम में ले। यदि एक-एक समझौते को भावनात्मक मुद्दा बना दिया गया है तो दोतरफ़ा स्तर पर भरोसा बहाल करने के उपाय चलाए जाएं।

7-चीन के साथ पारदर्शी समन्वय स्थापित किया जाए। नेपाल-चीन-भारत त्रिकोण में चीन की भागीदारी वास्तविक है, इसलिए न्यू-दिल्ली चीन को बताए कि कोई भी क्षेत्रीय समाधान तीनों पक्षों की सुरक्षा व शांति में योगदान दे और बीजिंग से क्षेत्रीय स्थिरता के लिये जिम्मेदारी की अपेक्षा रखे।

7-सीमावर्ती विकास-पैकेज। उत्तराखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम सीमा क्षेत्रों में विकास व निवेश तेज करे। ताकि स्थानीय आबादी में सुरक्षा-चिंताओं का असर कम हो।

8-नेपाल के साथ पारगमन-समझौतों को टिकाऊ बनाए। कस्टम-सहयोग और व्यापार-फेसिलिटेशन पर चर्चा तेज रखे। 

9-सॉफ्ट-पॉवर और लोगों तक पहुँच बनाई जाए। हिंदुस्तानी सांस्कृतिक, शैक्षिक पहल की जाए। छात्रवृत्तियाँ, हेल्थ-कैंप, सीमा-सहयोग परियोजनाएँ बढ़ाई जाएं। ताकि नेपाल में जन-समर्थन मजबूत रहे।

10-स्थानीय मीडिया सहयोग और तथ्यों का आदान-प्रदान हो। गलत धारणा, नफे-नुकसान के मिथक तोड़ने के लिए सहायक मीडिया-विज्ञान चलाया जाए। 

11-कानूनी-ऐतिहासिक ऑडिट की तैयारी की जाए। नक्शा, ऐतिहासिक दस्तावेजों का संकलन और सार्वजनिक हो। ऐतिहासिक दस्तावेज सार्वजनिक और कूटनीतिक चैनलों पर पेश किए जाए। इससे बहस तथ्य-आधारित बनेगी।

12-सीमा पर बड़े पैमाने पर आ रहे लोग या शरणार्थी संभालने के लिए अस्थायी केंद्र, स्वास्थ्य जाँच और पासपोर्ट-प्रक्रिया की व्यवस्था रखी जाए।

13-घुसपैठ या हिंसा की स्थिति में जवाब देने के बॉर्डर फोर्सेज़ को प्रशिक्षित और सुसज्जित रखे। साथ ही कूटनीतिक समाधान का द्वार खुला रखे। (समाप्त)

-डॉ. चेतन आनंद 

(वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि)





सोमवार, 21 अप्रैल 2014

ek hai shruti

 कहानी बिलकुल सच्ची है, हमारी बिटिया के साथ श्रुति नाम की एक नाबालिग बच्ची ट्यूशन  पढ़ा करती थी, उसने बताया था कि उसके पिता उन्हें छोड़कर कई साल पहले घर से कहीं चले गए, घर में अब वो है, उसकी मम्मी है और एक बड़ा भाई है, उनके घर का खर्च उसके नाना जी वहन करते हैं, घर से गरीब श्रुति के पास पढने के लिए भी पैसे नहीं होते थे, इसलिए ट्यूटर उससे पढ़ाने की फीस नहीं लेता था, हमारी बिटिया का ट्यूशन पूरा हुआ, उसने बोर्ड के पेपर भी दे दिए. श्रुति जहाँ पढ़ती थी वहां से उसने भी बोर्ड के एग्जाम दे दिए, अचानक अभी १५ दिन पहले श्रुति ने हमारी बिटिया से मोबाइल फ़ोन पर बात की, हमारी बिटिया उससे मिलने उसके घर गयी, घर के बाहर उसे श्रुति मिली, मगर उसने बताया कि अब वो लोग यहाँ नहीं रहते, दो किलोमीटर आगे रहते हैं, श्रुति उसे लेकर जहाँ गयी, वो एक स्लम बस्ती थी, रेलवे लाइन क्रॉस करके एक दो कमरों के टूटे-फूटे मकान में दाखिल होते हुए उसने बताया कि वो अब यहाँ रहते हैं, नाना जी की दो महीने पहले डेथ हो चुकी है, इस सदमे में मम्मी को हार्ट अटैक भी आ चुका  है, मम्मी अब घर का काम नहीं कर सकतीं, इसलिए यहीं थोड़ी दूरी पर एक छोटी सी दुकान में कुछ रेडीमेड गारमेंट्स बेचने का काम करती हैं, दूकान पर जाकर देखा तो उसमें कुछेक मैले-कुचैले कपड़े थे, जिनकी कीमत २० से लेकर ६० रूपए प्रति पीस तक थी, पता चला कि महीने में केवल ५-६ सौ रूपए ही कमाई हो पाती है, भाई आवारा हो गया है, वो घर पर ध्यान नहीं देता, उल्टा मम्मी से पैसे छीनकर ले जाता है, मैं आगे पढाई नहीं कर सकती, घर का काम कौन करेगा, पढ़ने के लिए पैसे भी तो नहीं हैं, श्रुति बोली, सोचती हूँ कि कंप्यूटर कोर्स कर लूँ, घर चलाने को पैसे मिल जायेंगे, उसने बताया कि कंप्यूटर कोर्स के लिए भी महीने की ९०० रूपए फीस देनी होगी, अब इतने पैसे भी नहीं होते, रोज़ रात को ऐसा होता है कि हमारे पास टमाटर खरीदने तक के लिए ४-५ रूपए भी नहीं होते, रोटी पानी से खानी पड़ती है, श्रुति क्या करे, काम नहीं, पढाई के लिए पैसे नहीं हैं,  अब मैं  सोचता हूँ कि श्रुति की कुछ मदद की जाये, कम से कम उसे आगे पढ़ने का मौका ज़रूर मिले, इसलिए मैं तो उसकी मदद करने चला, क्या आप भी इस नयी कवायद में शामिल होंगे, अगर हाँ तो मुझे इस ईमेल आईडी पर संपर्क कर सकते हैं- av.chetan@gmail .com



चेतन आनंद   

wo jo nahi hue apne

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाए, जोड़े  से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये, जीहां, ठीक ही कहा है रहीमदास जी ने. कभी हम भी सोचा करते थे कि प्रेम बाँटने से बढ़ता है, इसलिए अपनी परवाह किये  बगैर,अपनी पॉकेट लगातार हल्की करते रहे, अपनी उम्र के अधिकांश कीमती दिन, महीने, घंटे, मिनट्स, यहाँ तक कि अपने गुण , अपनी कला, अपनी सोच, अपनी कल्पना, अपना लेखन तक सब ताक पर रख दिया, ये सोचकर कि प्रेम बाँटने से बढ़ता है, लेकिन अब जाकर  पता चला कि प्यारे ये दुनिया  है, जैसे को तैसे की कहावत भी यहीं पर चलती है, समय को देखो, समय की धार को पहचानो, तब जाकर प्रेम या जैसे को तैसे वाला बर्ताव करो, मगर हम कभी न समझे, समझते भी कैसे, इतनी  समझ कभी आई नहीं कि क्या और कैसा बर्ताव किससे , कैसे और कब करना चाहिए, अपनी ज़िन्दगी की दुकान  में तो बस एक ही सौदा है-प्रेम........अब करें भी तो क्या। हमारे एक मित्र हैं, खूब कहते हैं, खूब घूमते हैं, खूब सोते हैं, खूब गुस्सा करते हैं और खूब झूठ बोलकर खूब सारी बातें छिपाने की महारत रखते हैं. एक दिन बोले यार अब से कोई बात नहीं छिपानी, ज़िन्दगी का हर पल शेयर करेंगे। हम भी बोल पड़े ओक्के। अब हुआ कुछ और--- हम तो हर बात को बताना सीख गए और वो---- अपनी बात को छिपाने के रस्ते पर चल पड़े, एक दिन ऐसा आया कि वो श्रीमान ५ दिन की यात्रा पर चुपके से निकल गए. जब पता चला तो हम भी गुस्से में दो दिन आउटिंग पर चले गए, अब हुआ क्या, दो दिन की आउटिंग की बात पता चलते ही उनका  पारा तो सातवें आसमान पर जा पहुंचा, लगे गालियां देने, तेवर दिखाने-----. जब हमने पूछा कि श्रीमान आप भी तो बिना बताये ५ दिन ग़ायब हो गए थे, तो बोले फिर क्या हुआ--- हमने आकर बता दिया न.... सुनकर हम तिलमिला उठे ---- बस साहब हमने सोच लिया कि अब ऐसे शख्स का साथ हम नहीं देंगे जो अपने लिए तो छूट लिए घूमता हो और दूसरों पर पाबंदियां लगता हो, ठीक ऐसा ही हाल हमारी राजनीति का भी हो चला है, नेता चाहे जहाँ घूमे, जितने झूठ बोले, जो चाहे वो करे, मगर आम जनता को अपने घर के खूँटें से बंधी निरीह बकरी ही समझता है. अब खूंटा तोड़ो तो मरे और न तोड़ो-- तो भी मरे. हम तो नेता जी से प्रेम का धागा जोड़े बैठे थे मगर वो तो धागा तोड़कर, हमारे गले और पैरों में ज़ंजीर डालने का काम करने में जुटे हैं, इसलिए मौका है कि जनता अपनी ताकत पहचाने और तय करे कि किससे प्रेम वाला बर्ताव करना है और किससे दो-दो हाथ करने हैं.



चेतन आनंद 

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

aao koshish karen

अभी हाल ही में देहरादून-मसूरी की यात्रा से लौटा हूँ. वहां देखकर सुकून हुआ कि डेल्ही-एनसीआर की तरह वहां लिकसभा चुनाव को लेकर कोई शोरगुल नहीं है. साथ ही ये भी देखा कि लोग भी अपने काम पर ज़्यादा लगे हुए हैं. देहरादून के गांव गुणियाल में एक दिन रहने का मौका भी मिला। क्या मौसम था. ठंडी ठंडी हवाएँ, चहचहाते पंछी, हवाओं में पेड़-पौधों की खुशबू। देर रात तक टहलते लोग-लुगाई, बच्चे। कारों के शीशे खुले, आराम से सामान कार में रखकर बहार बातचीत करते लीग. लगा ही नहीं कि किसी अनजान जगह पर हैं. बल्कि लगा कि जहाँ हम रहते हैं, वो जगह असुरक्षित है, मक्कारों, चोरों और लुटेरों से भरी पड़ी है, जहाँ न आप देर रात तक घूम सकते हैं, न कार को खुला छोड़ सकते हैं, न बच्चों को देर तक घर के भहर छोड़ सकते हैं, हर शख्स संदिग्ध नज़र आता है. हर पल लूट जाने का खतरा सताता है. जबकि ग़ज़िआबाद देश की राजधानी नई डेल्ही से २०-२५ किलोमीटर ही दूर है जबकि देहरादून २५० किलोमीटर। देखिये ज़रा से फैसले पर देश की दुनिआ ही अलग नज़र आती है. ठीक ही कहा है किसी विदेशी लेखक ने कि किसी भी देश की राजधानी के आसपास का ५० किलोमीटर का एरिया क्राइम और आर्थिक अपराध से भरा मिलता है. इससे दूर जाने लगो तो पाओगे के सबकछ, सुकून, लोगों में अपनापन, जीने का मिजाज़, खुशहाली, धरती के प्राणी सब अपने जैसे ही हैं. साफ़-सुथरे। काश डेल्ही के आस पास भी देहरादून जैसी बिना किसी प्रदुषण की दुनिआ होती. आइये कोई एक अच्छी कोशिश करके देखे--------




चेतन आनंद 

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

matdaan

लीजिये १० अप्रैल को मतदान है. एक पर्व नवरात्रे ख़त्म तो दूसरा पर्व मतदान आने में बस ३६ घंटे ही बचे हैं. लेकिन नवरात्रे जैसी तैयारी कहीं दिखाई नहीं दे रही. सब तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है. बस शोर है तो उम्मीदवारों में, घबराहट है तो उम्मीदवारों में, उन्हें मतदाता अब परीक्षक नज़र आ रहा है. जनता के दरबार में टेस्ट जो होना है. तरह तरह के  प्रलोभन,वादे, आश्वासन, मक्खन, मलाई, वोट मांगना, करबद्ध निवेदन, सब टोटके हो चुके। अबतो आज शाम ६ बजे वो भी काम नहीं आएंगे। बस हाथ जोड़कर घर-घर जाने का सिलसिला चल सकता है. ये ऐसी परीक्षा है जिसमे नक़ल परीक्षा के दौरान नहीं परीक्षा से पहले चलती है. कोई अटल बन मतदाताओं से आग्रह कर रहा है कि मैं आपका सेवक हूँ तो कोई अभिनेता बनकर जता रहा है कि भाई मैं ही हूँ जो आपका मनोरंजन भी कर सकता हूँ और आपके शहर की शान भी बन सकता हूँ. कोई आम आदमी बनकर अपने ४९ दिनों का बखान करने में जुटा हुआ है. शहर के एक कोने में दुबके बैठे  डबकू ने अपने दोस्त नन्नू से पूछा अरे अपना कौन है, किसकी सुनें, रिक्शा चलाकर पेट ही भरते रहेंगे या केजरीवाल बनने का नंबर अपना भी आ सकता है. डबकू बोला----केजरीवाल अरे नहीं केजरीवाल बनने से क्या होगा। जैसे झाड़ू ४० से ५० दिन तक चलती है वैसे ही केजरी मियां की सरकार चली, वादे इतने बड़े-बड़े कर लिए जनता से कि पूरा करने के टाइम पसीने छूट गए हुज़ूर के, भाग गए मैदान से. अब शास्त्री  जी का हवाला देकर अपनी करतूत छिपाने में लगे हुए हैं, नहीं भाई नहीं बनना केजरीवाल, नन्नू बोला अच्छा तो फिर राहुल गांधी बन लेते हैं, उसका तो जलवा है, अरे नहीं, डबकू बोला- राहुल तो बस रोबोट है, रिमोट तो उनकी माता जी के पास है, जैसे चाहतीहैं चला लेती हैं. अब तू बनेगा रोबोट? नन्नू ने मुंह में ऊँगली दबाते हुए कहा न---हीं.... औरमोदी, उसकी तो हवा है न, मोदी बनकर देश की सेवा करेंगे, मोदी------? मोदी खुद कुछ नहीं बन पा रहे, जनता पर दबाव बहुत है, सुबह से लेकर रात तक बस मोदी ही मोदी, टीवी के जिस चैनल को खोल लो वहाँ मोदी, सोशल साइट्स पर देख लो वहाँ मोदी, एफबी  पर मोदी, ट्विटर पर मोदी, गली में मोदी, चौराहों और राजमार्गो पर मोदी, चर्चा में कोई नहीं है, बस शोर ही शोर है. इसलिए मोदी बनने से पहले देख ले कि मोदी बनकर कितने लोग तुझे अपनाएंगे। वैसेएक बात कहूंगा नन्नू तू कुछ बने न बने मगर वोट ज़रूर करियो, देश के विकास में तेरी ही नहीं सबकी भागीदारी बहुत ज़रूरी है. चल रिक्शा पकड़ देख सवारी आ रही है.




चेतन आनंद