अभी हाल ही में देहरादून-मसूरी की यात्रा से लौटा हूँ. वहां देखकर सुकून हुआ कि डेल्ही-एनसीआर की तरह वहां लिकसभा चुनाव को लेकर कोई शोरगुल नहीं है. साथ ही ये भी देखा कि लोग भी अपने काम पर ज़्यादा लगे हुए हैं. देहरादून के गांव गुणियाल में एक दिन रहने का मौका भी मिला। क्या मौसम था. ठंडी ठंडी हवाएँ, चहचहाते पंछी, हवाओं में पेड़-पौधों की खुशबू। देर रात तक टहलते लोग-लुगाई, बच्चे। कारों के शीशे खुले, आराम से सामान कार में रखकर बहार बातचीत करते लीग. लगा ही नहीं कि किसी अनजान जगह पर हैं. बल्कि लगा कि जहाँ हम रहते हैं, वो जगह असुरक्षित है, मक्कारों, चोरों और लुटेरों से भरी पड़ी है, जहाँ न आप देर रात तक घूम सकते हैं, न कार को खुला छोड़ सकते हैं, न बच्चों को देर तक घर के भहर छोड़ सकते हैं, हर शख्स संदिग्ध नज़र आता है. हर पल लूट जाने का खतरा सताता है. जबकि ग़ज़िआबाद देश की राजधानी नई डेल्ही से २०-२५ किलोमीटर ही दूर है जबकि देहरादून २५० किलोमीटर। देखिये ज़रा से फैसले पर देश की दुनिआ ही अलग नज़र आती है. ठीक ही कहा है किसी विदेशी लेखक ने कि किसी भी देश की राजधानी के आसपास का ५० किलोमीटर का एरिया क्राइम और आर्थिक अपराध से भरा मिलता है. इससे दूर जाने लगो तो पाओगे के सबकछ, सुकून, लोगों में अपनापन, जीने का मिजाज़, खुशहाली, धरती के प्राणी सब अपने जैसे ही हैं. साफ़-सुथरे। काश डेल्ही के आस पास भी देहरादून जैसी बिना किसी प्रदुषण की दुनिआ होती. आइये कोई एक अच्छी कोशिश करके देखे--------
चेतन आनंद

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