शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

काव्य मंचों पर कविता का भविष्य-सुरक्षित या चुनौतीपूर्ण?

 लेख-

कविता भारतीय संस्कृति और साहित्य की आत्मा रही है। वैदिक ऋचाओं से लेकर संत कवियों, रीतिकालीन रचनाकारों और आधुनिक प्रगतिशील लेखकों तक कविता ने हमेशा समाज की नब्ज़ को पकड़ा है। बदलते दौर में भी कविता का अस्तित्व जीवित है, परंतु प्रश्न यह है कि काव्य मंचों पर कविता का भविष्य कितना सुरक्षित है?
वर्तमान परिदृश्य
आज भी भारत के अनेक हिस्सों में कवि सम्मेलन, मुशायरे और साहित्यिक गोष्ठियाँ आयोजित होती हैं। इन मंचों पर कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि समाज को आईना भी दिखाते हैं। टीवी और रेडियो के दौर में कवि सम्मेलन बेहद लोकप्रिय थे, वहीं अब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने कविता को वैश्विक पहुँच दी है। यूट्यूब चैनलों और इंस्टाग्राम रील्स ने युवा कवियों को नए दर्शक दिए हैं।
कविता की संभावनाएँ
1. कविता हमारी परंपरा से गहरे जुड़ी है। जब तक संस्कृति जीवित है, कविता भी जीवित रहेगी।
2. डिजिटल माध्यमों ने कविता को सीमाओं से परे पहुँचा दिया है। अब एक कवि गाँव से लिखकर भी पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है।
3. नए कवि मंच पर आकर प्रयोगधर्मी और समसामयिक कविताएँ लिख रहे हैं। यह कविता के भविष्य को ऊर्जा प्रदान करता है।
4. कविता केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का माध्यम भी है। पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण, भ्रष्टाचार, राजनीति आदि विषय कविता के केंद्र में आ रहे हैं।
कविता का स्तर और काव्य मंचों की गरिमा को लेकर साहित्यिक जगत में लगातार चर्चा होती रहती है। इसे संतुलित रूप से समझना ज़रूरी है।
पहले और अब का अंतर
1. पुराने समय के काव्य मंच मंच-काव्य मंचों पर महाकाव्यीय परंपरा, गंभीर चिंतन, दार्शनिक गहराई और शिल्प की कसौटी पर रचनाएँ पढ़ी जाती थीं। कवि सम्मेलन साहित्यिक पर्व की तरह होते थे, जहाँ नीरज, गोपालदास ‘नीरज’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, बालकवि बैरागी, सोम ठाकुर, डॉ. कुंअर बेचैन, भारत भूषण, किशन सरोज आदि की रचनाएँ गंभीर अध्ययन और चिंतन को बढ़ावा देती थीं।
2. आज के काव्य मंच-मंचों पर मनोरंजन और तात्कालिक प्रभाव को ज़्यादा महत्व मिलने लगा है। हास्य-व्यंग्य और हल्की-फुल्की प्रस्तुतियों की माँग बढ़ी है, क्योंकि श्रोता जल्दी जुड़ना चाहते हैं। गहराई और साहित्यिक प्रयोग अक्सर मंच से कम होते दिखाई देते हैं।
क्या वास्तव में स्तर गिरा है?
गिरावट के कारण-बाज़ारवाद और आयोजनों की “लोकप्रियता” की होड़, दर्शकों की बदलती रुचियाँ, सोशल मीडिया के छोटे-छोटे क्लिप्स की संस्कृति।
सकारात्मक पक्ष-कविता अब पहले से ज़्यादा लोगों तक पहुँच रही है। नए युवा कवि अपनी आवाज़ लेकर आ रहे हैं। जनसरोकार, समकालीन मुद्दे (रोज़गार, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार, देशभक्ति) अब मंच का हिस्सा बनते हैं।
यह कहना उचित होगा कि काव्य मंखें का स्तर गिरा भी है और बदला भी है। साहित्यिक गहराई और शिल्प में जो अनुशासन पहले था, वह कम हुआ है। लेकिन लोकप्रियता, व्यापक पहुँच और नए प्रयोग की दृष्टि से मंचों ने अपने प्रभाव का विस्तार किया है। मतलब आज के मंच पर कविता अधिक “जनप्रिय” हो गई है, लेकिन कई बार “साहित्यिक कसौटी” से थोड़ी दूर भी हो जाती है।
चुनौतियाँ
1.व्यावसायिकता की कमी-कविता से जीविका चलाना कठिन है। मंचीय कविता सम्मान तो देती है, पर स्थायी आर्थिक आधार नहीं।
2.लोकप्रियता बनाम गहराई-आज श्रोता तुरंत हँसी या ताली बजाने वाली रचनाओं को प्राथमिकता देते हैं। गंभीर और चिंतनशील कविताएँ कम सुनी जाती हैं।
3.साहित्यिक संस्थाओं की उदासीनता-कई बार सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएँ कविता को प्रोत्साहन देने में सक्रिय नहीं रहतीं।
4.डिजिटल विचलन-सोशल मीडिया पर सतही कविता को त्वरित लोकप्रियता मिल जाती है, जिससे गहन रचनाएँ पीछे छूटने का खतरा है।
5.श्रोताओं का बदलता स्वाद-युवा वर्ग का ध्यान अधिकतर फ़िल्मी गीतों या शॉर्ट-फ़ॉर्म कंटेंट पर रहता है। ऐसे में कविता के लिए श्रोताओं का स्थायी आधार बनाना चुनौतीपूर्ण है।
समाधान और भविष्य की दिशा
ऽ शिक्षा में कविता का स्थान मज़बूत करना-विद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर कविता को रचनात्मक अभ्यास की तरह पढ़ाया जाए।
ऽ साहित्यिक मंचों का डिजिटलीकरण-कवि सम्मेलनों की लाइव स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग से कविता व्यापक श्रोताओं तक पहुँचेगी।
ऽ नए कवियों का प्रोत्साहन-पुरस्कार, फ़ेलोशिप और मंच उपलब्ध कराकर नई प्रतिभाओं को आगे लाना होगा।
ऽ कविता और समाज का सेतु-कवि यदि सामाजिक मुद्दों पर रचनाएँ करेंगे, तो कविता प्रासंगिक बनी रहेगी।
ऽ सहयोग और संरक्षण-सरकार, निजी संस्थाएँ और समाज मिलकर कवियों को संरक्षण दें।
कविता का भविष्य काव्य मंचों पर न केवल सुरक्षित है, बल्कि संभावनाओं से भरा हुआ है। हालाँकि इसे जीवित रखने के लिए चुनौतियों का सामना करना होगा। कविता को समय और तकनीक के साथ चलना होगा, ताकि वह केवल मंचों तक सीमित न रहकर समाज की चेतना का हिस्सा बने।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)



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