लेख-
श्रीमद्भगवद्गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और प्रबंधन का शाश्वत मार्गदर्शक है। महाभारत युद्ध के मैदान में जब अर्जुन मोह और द्वंद्व में उलझ गए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिए, वही उपदेश आज भी प्रत्येक व्यक्ति के जीवन, कार्यक्षेत्र, संगठन और समाज के लिए प्रासंगिक हैं। गीता हमें सिखाती है कि सफलता केवल परिणाम पाने का नाम नहीं, बल्कि संतुलित, मूल्य-आधारित और कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीने की प्रक्रिया का नाम है। यही कारण है कि आधुनिक प्रबंधन विज्ञान की अनेक अवधारणाएँ गीता से मेल खाती हैं।
कर्म का महत्व और फल से विरक्ति
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है-
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥” (2/47)
इस श्लोक का अर्थ है कि मनुष्य को केवल अपने कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। जीवन प्रबंधन के संदर्भ में यह सूत्र सिखाता है कि हमें कर्म को पूरी निष्ठा और दक्षता से करना चाहिए। परिणाम की चिंता हमें तनावग्रस्त बनाती है और हमारी क्षमता को बाधित करती है। प्रो. एस. राधाकृष्णन लिखते हैं-“गीता का यह उपदेश व्यक्ति को निष्काम कर्म की ओर ले जाता है, जहाँ कार्य कर्तव्य भावना से होता है, न कि स्वार्थ से।”
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है-
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥” (2/47)
इस श्लोक का अर्थ है कि मनुष्य को केवल अपने कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। जीवन प्रबंधन के संदर्भ में यह सूत्र सिखाता है कि हमें कर्म को पूरी निष्ठा और दक्षता से करना चाहिए। परिणाम की चिंता हमें तनावग्रस्त बनाती है और हमारी क्षमता को बाधित करती है। प्रो. एस. राधाकृष्णन लिखते हैं-“गीता का यह उपदेश व्यक्ति को निष्काम कर्म की ओर ले जाता है, जहाँ कार्य कर्तव्य भावना से होता है, न कि स्वार्थ से।”
समत्व और मानसिक संतुलन
गीता का दूसरा महान संदेश है-
“समत्वं योग उच्यते।” (2/48)
अर्थात सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, इन सब स्थितियों में संतुलित रहना ही योग है। यह शिक्षा आधुनिक जीवन के स्ट्रेस मैनेजमेंट और इमोशनल इंटेलीजेंस से गहरे रूप से जुड़ी हुई है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-“भगवद्गीता हमें यही सिखाती है कि मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मानसिक संतुलन को बनाए रखना चाहिए।” आज के कॉर्पोरेट जगत में जहाँ प्रतियोगिता और दबाव बहुत अधिक है, वहाँ यह सूत्र हर व्यक्ति को मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
निर्णय क्षमता और नेतृत्व
महाभारत युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन अपने ही सगे-सम्बंधियों को देखकर द्वंद्व और मोह में पड़ गए थे। उन्हें लगा कि युद्ध करना अधर्म होगा। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्तव्य और धर्म का बोध कराया और उनका मोह भंग किया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन और कार्यक्षेत्र में आने वाले कठिन निर्णय विवेक और साहस से लेने चाहिए। एक सच्चा नेता केवल आदेश देने वाला नहीं होता, बल्कि मार्गदर्शन और प्रेरणा देने वाला होता है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने गीता की व्याख्या करते हुए कहा था-“गीता एक ऐसी गाइडबुक है, जो हमें कठिन परिस्थितियों में भी स्पष्ट निर्णय लेने की शक्ति देती है।”
आत्मनियंत्रण और अनुशासन
गीता का एक महत्त्वपूर्ण श्लोक है-
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।” (6/5)
अर्थात मनुष्य को अपने आत्मबल से स्वयं को ऊपर उठाना चाहिए। आत्मनियंत्रण और आत्म-प्रेरणा के बिना जीवन में सफलता संभव नहीं। महात्मा गांधी गीता को अपनी “आध्यात्मिक डिक्शनरी” कहते थे। उनका मानना था-“गीता का संदेश आत्मनियंत्रण और आत्मबल पर आधारित है, जिसने मुझे हर संकट में मार्ग दिखाया।” आज जब युवा नशे, आलस्य और नकारात्मकता से घिर जाते हैं, तब यह श्लोक उन्हें आत्मविश्वास और अनुशासन का मार्ग दिखाता है।
कार्य और धर्म का संतुलन
गीता कहती है-
“श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।” (3/35)
अर्थात अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन करना, चाहे वह अपूर्ण ही क्यों न हो, दूसरों के धर्म का पालन करने से श्रेष्ठ है। जीवन प्रबंधन की दृष्टि से यह सूत्र हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सजग और निष्ठावान बनाता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था-“गीता का यह सूत्र हमें अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बनाता है। समाज और राष्ट्र का विकास तभी संभव है जब हर व्यक्ति अपने धर्म का पालन करे।”
भक्ति और समर्पण का भाव
गीता कहती है-
“यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥” (9/27)
अर्थात जो भी तुम करते हो, खाते हो, दान देते हो या तप करते हो, सब मुझे अर्पित करो। यह श्लोक हमें वर्क एज की प्रेरणा देता है। जब हम अपने कार्य को ईश्वर-समर्पण की भावना से करते हैं, तो उसमें उत्कृष्टता और पवित्रता आ जाती है।
टीमवर्क और मार्गदर्शन
महाभारत युद्ध केवल अर्जुन की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं थी, बल्कि पूरी पांडव टीम की लड़ाई थी। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मार्गदर्शन देकर पूरी टीम को विजय दिलाई। यह सूत्र बताता है कि इफैक्टिव टीमवर्क के लिए इफैक्टिव मेंटर आवश्यक है। आधुनिक प्रबंधन गुरु पीटर ड्रकर भी कहते हैं-“भारतीय गीता जैसी शिक्षाएँ हमें दिखाती हैं कि प्रबंधन केवल लक्ष्य प्राप्ति नहीं, बल्कि मूल्य-आधारित निर्णय लेने की कला है।”
आधुनिक जीवन में गीता की प्रासंगिकता
आज के समय में कार्यस्थल पर प्रतिस्पर्धा और दबाव बढ़ रहा है, पारिवारिक जीवन असंतुलित हो रहा है, युवा तनाव और असंतोष से जूझ रहे हैं, नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है, ऐसी परिस्थितियों में गीता जीवन प्रबंधन की हॉल्स्टिक एप्रोच प्रदान करती है। यह केवल सफलता की नहीं, बल्कि संतुलित और मूल्य-आधारित जीवन जीने की शिक्षा देती है।
श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश शाश्वत है। यह हमें निष्काम कर्म, समत्व, आत्मनियंत्रण, धर्म और समर्पण जैसे मूल्यों का पाठ पढ़ाती है। यह केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन की परिपूर्ण गाइडबुक है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, “गीता एक ऐसा ग्रंथ है, जिसे यदि आत्मसात कर लिया जाए तो जीवन की कोई भी समस्या हमें विचलित नहीं कर सकती।” आज जब विश्वभर के मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट्स नई-नई थ्योरी और मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं, तब भी गीता का संदेश समय की कसौटी पर खरा उतरता है। वास्तव में, यदि हम गीता के इन सूत्रों को व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में आत्मसात कर लें, तो सफलता, संतुलन और संतोष तीनों सहज रूप से प्राप्त हो सकते हैं।
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


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