नियम-
वार्णिक छंद, कुल चार पद यानि चार पंक्तियाँ
प्रत्येक पद में 8 सगण-
यानि
सलगा, सलगा, सलगा, सलगा,
सलगा, सलगा, सलगा, सलगा
यानि
112 112 112 112
112 112 112 112
(विशेष-मात्रा पतन कर सकते हैं।)
1- ग़म के, तम के, भ्रम के मसले, हल हो ही गये, हल हो ही गये।
दिन क्लेश भरे अगले-पिछले हल हो ही गये, हल हो ही गये।
कल के, छल के, बल के बदले, हल हो ही गये, हल हो ही गये।
तुमसे मिलके उलझे *मतले हल हो ही गये, हल हो ही गये।
2- तन से, मन से, थक-हार गये, सहते-सहते इस जीवन में।
कुछ साँस मिली, कुछ साँस गयी, कहते-कहते इस जीवन में।
उड़ पाय नहीं, जुड़ पाय नहीं, बहते-बहते इस जीवन में।
कुछ काम करें, बस नाम रहे, रहते-रहते इस जीवन में।
3- हर बार नया दुख हो फिर भी, अधरों पे नई मुसकान रहे।
अभिशाप अपार मिलें हमको, हर साँस नया वरदान रहे।
अपमान निरंतर दो प्रभु जी, कुछ तो फिर भी सममान रहे।
इतनी तो दया करना जग में, मिट के अपनी पहचान रहे।
4- जिसने अपमान सहा उसका, जग में जग ने सममान किया।
जिसने नयनों का नीर पिया, सबके दुख का विषपान किया।
जिसने तन का कतरा कतरा, जग के हित में अनुदान किया।
उस मानव ने निज जीवन को, विष पीकर भी वरदान किया।
-चेतन आनंद, ग़ाज़ियाबाद
(*मतले-ग़ज़ल के मुखड़े को मतला कहते हैं। गज़लों के मुखड़ों को मतले कहा जाता है।)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें