शनिवार, 13 सितंबर 2025

समसामयिक लेख/सुशीला कार्की के लिए आसान नहीं होगी नेपाल की सत्ता


 

-डॉ. चेतन आनंद 
नेपाल का इतिहास संघर्ष, साम्राज्य निर्माण और राजनीतिक अस्थिरता से भरा रहा है। वहाँ कई बार तख्तापलट यानी राजनीतिक विद्रोह हुए हैं। प्राचीन काल में नेपाल छोटे-छोटे रजवाड़ों में बँटा था। मध्यकाल में काठमांडू घाटी में लिच्छवि और मल्ल वंश का शासन आया। आधुनिक नेपाल (1768) में गोरखा नरेश पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल को एकीकृत कर गोरखा साम्राज्य की नींव रखी तो ब्रिटिश काल में नेपाल कभी उपनिवेश नहीं बना, परंतु 1814-16 का एंग्लो-नेपाल युद्ध और सुगौली संधि से उसका बड़ा भूभाग ब्रिटिश भारत को देना पड़ा। राणा शासन (1846-1951) में कोट हत्याकांड के बाद जंग बहादुर राणा ने सत्ता हथिया ली और करीब 104 साल तक राणा प्रधानमंत्री वंश ने देश को राजाओं के नाम पर चलाया। वर्ष 1951 में लोकतांत्रिक आंदोलन के दौरान राणा शासन का अंत और संवैधानिक राजतंत्र की शुरुआत हुई। बड़े संघर्ष और हिंसा के बीच अब नेपाल की अंतरिम सरकार की नयी प्रधानमंत्री सुशीला कार्की बनी हैं। नेपाल के राजनीतिक इतिहास के मद्देनजर के सामने सुशीला कार्की के सामने कई प्रकार की चुनौतियाँ होंगी, जो राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से प्रभाव डालेंगी।
नेपाल की राजनीति लंबे समय से अस्थिर गठबंधनों और बार-बार बदलती सरकारों से जूझ रही है। सुशीला कार्की को विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सामंजस्य बनाना होगा। संसद में बहुमत बनाए रखना और सहयोगी दलों की अपेक्षाओं को संतुलित करना बड़ी चुनौती होगी। 2015 में लागू हुए संविधान को लेकर मधेशी, जनजातीय और अन्य समुदायों की असंतुष्टियाँ अब भी बनी हुई हैं। सुशीला कार्की को सभी पक्षों के बीच संवाद और संवैधानिक संशोधनों पर विचार करना पड़ सकता है। आधारभूत ढांचे की कमी से जूझ रहा है।
पर्यटन, जलविद्युत और कृषि क्षेत्र को गति देना उनकी प्राथमिकता होगी। विदेशी निवेश आकर्षित करना और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना जरूरी होगा। नेपाल में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है। सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकीं कार्की की पहचान सख्त और ईमानदार नेतृत्व के रूप में रही है, इसलिए जनता उनसे सुशासन की उम्मीद रखेगी। नेपाल में जातीय, क्षेत्रीय और लैंगिक असमानताएँ गहरी हैं। महिला प्रधानमंत्री होने के नाते उनसे उम्मीद की जाएगी कि वे महिलाओं और वंचित वर्गों की आवाज को मजबूत करें। नेपाल की विदेश नीति में भारत और चीन दोनों के साथ संतुलन बनाना सबसे अहम चुनौती होगी। हाल के वर्षों में नेपाल पर चीन का प्रभाव बढ़ा है, जबकि भारत के साथ संबंधों में कई बार तनाव देखने को मिला। सुशीला कार्की को कूटनीतिक संतुलन साधते हुए नेपाल की स्वतंत्र छवि बनाए रखनी होगी। बड़ी संख्या में नेपाली युवा विदेश में रोजगार की तलाश में हैं। विदेश में काम करने वाले नेपाली नागरिकों की सुरक्षा और उनकी आर्थिक भूमिका को मजबूत करना भी उनके एजेंडे में शामिल होना चाहिए।
नेपाल में प्रमुख तख्तापलट और सत्ता परिवर्तन
1. 1846-कोट हत्याकांड। दरबार में षड्यंत्र कर जंग बहादुर राणा ने 40 से अधिक सरदारों को मरवाया। इसके बाद राणा वंश ने सत्ता अपने हाथ में ले ली।
2. 1950-51-राणा शासन का अंत हुआ। राजा त्रिभुवन ने भारत जाकर लोकतांत्रिक दलों के साथ समझौता किया। 1951 में राणा शासन खत्म और बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली।
3. 1960-महेंद्र का तख्तापलट हुआ। लोकतांत्रिक सरकार (बी.पी. कोईराला की कांग्रेस सरकार) को राजा महेंद्र ने भंग किया। 1961 में पंचायती व्यवस्था लागू की, जिसमें राजा सर्वोच्च शासक बने।
4. 1990- जनआंदोलन और बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली
जनता और दलों के दबाव से राजा बीरेन्द्र ने पंचायती व्यवस्था खत्म की। संसदीय लोकतंत्र बहाल हुआ।
5. 2001- राजदरबार हत्याकांड हुआ। क्राउन प्रिंस दीपेन्द्र ने गोलीबारी में राजा बीरेन्द्र, रानी ऐश्वर्या सहित राजपरिवार की हत्या कर दी। इसके बाद राजा ज्ञानेन्द्र सत्ता में आए।
6. 2005-राजा ज्ञानेन्द्र का सीधा शासन चला। विद्रोही माओवादी संघर्ष और अस्थिरता के बीच राजा ज्ञानेन्द्र ने लोकतांत्रिक सरकार को भंग कर सीधा शासन अपने हाथ में ले लिया।
7. 2006-जन आंदोलन के जरिये लोकतंत्र पुनः स्थापित हुआ।
व्यापक जन आंदोलन (लोक आंदोलन 2) के दबाव में राजा ज्ञानेन्द्र को झुकना पड़ा। संसद पुनः बहाल हुई और माओवादियों को भी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल किया गया।
8. 2008-राजतंत्र का अंत हुआ। संविधान सभा ने राजशाही समाप्त कर नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। शाही सत्ता का तख्तापलट हुआ और नेपाल में गणतंत्र की शुरुआत हुई।

नेपाल में बड़े तख्तापलट
1846 (राणा सत्ता)
1951 (राणा शासन का अंत)
1960 (राजा महेंद्र)
1990 (लोकतंत्र बहाली)
2001 (राजदरबार हत्याकांड)
2005-06 (राजा ज्ञानेन्द्र का तख्तापलट और जनता का विद्रोह)
2008 (गणतंत्र की स्थापना)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं।)


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