सोमवार, 22 जून 2026

संवेदना के स्वर महाकवि डॉ. कुंअर बेचैन

 एक जुलाई जन्मदिन पर विशेष लेख-

‘हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए,
ज़िंदगी भोर है, सूरज से निकलते रहिए।’

इन दो पंक्तियों में महाकवि डॉ. कुंअर बेचैन का समूचा जीवन-दर्शन समाया हुआ है। निराशा के अंधकार में आशा का दीप जलाना, टूटते हुए मनुष्य को जीने का साहस देना और संवेदनाओं को शब्दों की गरिमा प्रदान करना, यही उनकी रचनात्मक साधना का मूल स्वर था। 1 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जनपद के उमरी गाँव में जन्मे डॉ. कुंअर बेचैन (वास्तविक नाम डॉ. कुंअर बहादुर सक्सेना) ने हिंदी कविता, गीत और गजल को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। वे लंबे समय तक गाजियाबाद के एम.एम.एच. कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे और देश-विदेश के कवि सम्मेलनों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। डॉ. कुंअर बेचैन का साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा का संगीत है। उन्होंने प्रेम को केवल निजी अनुभूति नहीं माना, बल्कि उसे मनुष्य और समाज के बीच विश्वास का सेतु बनाया। उनकी कविता में गाँव की मिट्टी की सोंधी गंध भी है और महानगर की बेचैनी भी। उनके गीतों में प्रकृति की कोमलता है तो गजलों में समय की तल्ख सच्चाइयों का साहसिक बयान। वे मानते थे कि कविता का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना भी है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं, जितनी अपने समय में थीं।
‘उसने फेंके मुझपे पत्थर और मैं पानी की तरह,
और ऊँचा, और ऊँचा, और ऊँचा हो गया।’

यह शेर केवल प्रतिकूल परिस्थितियों का उत्तर नहीं, बल्कि उनके जीवन-दर्शन का परिचय भी है। संघर्ष उनके जीवन में भी कम नहीं थे, किंतु उन्होंने विषमताओं को अपनी रचनात्मक ऊर्जा में बदल दिया। शायद यही कारण है कि उनकी कविता शिकायत नहीं करती, बल्कि जीवन का हाथ थामकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
डॉ. कुंअर बेचैन ने हिंदी मंचीय कविता को अभूतपूर्व गरिमा प्रदान की। वे उन विरले कवियों में थे, जिनकी लोकप्रियता कभी उनकी साहित्यिक गुणवत्ता पर भारी नहीं पड़ी। वे जब मंच पर आते थे तो शब्द अभिनय नहीं करते थे, बल्कि हृदय बोलता था। उनकी वाणी में विनम्रता थी, प्रस्तुति में सहजता और भावों में ऐसी आत्मीयता कि श्रोता स्वयं को कविता का हिस्सा महसूस करने लगते थे।
उनकी गजलों का एक बड़ा गुण उनकी संप्रेषणीयता है। वे कठिन से कठिन भाव को भी अत्यंत सरल भाषा में व्यक्त कर देते थे। इसलिए उनका साहित्य विश्वविद्यालयों के शोध का विषय भी बना और सामान्य पाठकों की प्रिय धरोहर भी। डॉ. कुंअर बेचैन केवल बड़े कवि नहीं थे, वे बड़े मनुष्य भी थे। साहित्य-जगत में उनकी पहचान एक स्नेही मार्गदर्शक के रूप में थी। असंख्य युवा कवियों को उन्होंने प्रोत्साहन दिया। मंच साझा करते समय वे नए रचनाकारों को उतना ही सम्मान देते थे, जितना वरिष्ठों को। यही कारण है कि उनके शिष्यों और प्रशंसकों का विशाल परिवार आज भी उन्हें केवल कवि नहीं, बल्कि एक संस्कार के रूप में याद करता है। उनकी रचनाओं में रिश्तों की ऊष्मा बार-बार दिखाई देती है। वे जानते थे कि आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी संवेदनाओं का क्षरण है। इसलिए उनकी कविताएँ मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं।
‘उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे,
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे।’

इन पंक्तियों में केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक संबंधों की पूरी कहानी छिपी है। यही उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे व्यक्तिगत अनुभव को सामाजिक संवेदना में बदल देते थे। डॉ. कुंअर बेचैन ने गीत, नवगीत, गजल, दोहा, कविता, उपन्यास और आलोचना, लगभग सभी विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया। उनकी अनेक कृतियाँ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने साहित्य को किसी विचारधारा की सीमाओं में नहीं बाँधा। उनके लिए मनुष्य सबसे बड़ा सत्य था और संवेदना सबसे बड़ा धर्म। आज जब समाज संवाद से अधिक विवाद में उलझा दिखाई देता है, जब तकनीक ने निकटता तो बढ़ाई है पर आत्मीयता कम कर दी है, तब डॉ. कुंअर बेचैन की कविताएँ हमें फिर से मनुष्य बनने का पाठ पढ़ाती हैं। उनकी रचनाएँ बताती हैं कि प्रेम, विश्वास, करुणा और सह-अस्तित्व केवल साहित्यिक शब्द नहीं, बल्कि सभ्यता की आधारशिलाएँ हैं।
उनकी भाषा का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी सहजता है। वे अलंकारों के मोह में नहीं उलझते, बल्कि सीधे हृदय तक पहुँचते हैं। यही कारण है कि उनकी पंक्तियाँ वर्षों बाद भी स्मृति में जीवित रहती हैं। उनकी कविता पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई आत्मीय व्यक्ति जीवन का अनुभव साझा कर रहा हो। 29 अप्रैल 2021 को उनका शारीरिक अवसान हुआ, किंतु कवि कभी नहीं मरता। वह अपनी रचनाओं में जीवित रहता है। आज भी देशभर के कवि सम्मेलन, साहित्यिक गोष्ठियाँ और युवा रचनाकार उनकी पंक्तियों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। गाजियाबाद की साहित्यिक पहचान का उल्लेख उनके बिना अधूरा माना जाता है। उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस संवेदनशील भारतीय मन को प्रणाम करना है जिसने कविता को जीवन की धड़कनों से जोड़ा। उनकी रचनाएँ हमें सिखाती हैं कि शब्द तभी सार्थक हैं जब वे मनुष्य के आँसू पोंछ सकें, उसके चेहरे पर मुस्कान ला सकें और अँधेरे समय में आशा का दीप जला सकें। और शायद इसलिए उनकी ये पंक्तियाँ आज भी हर पीढ़ी के लिए एक संदेश बनकर गूँजती हैं-
‘यह दुनिया सूखी मिट्टी है
तू प्यार के छींटें देता चल।’

डॉ. कुंअर बेचैन का साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल काव्य-संपदा नहीं, बल्कि संवेदना, संस्कृति और मनुष्यता की अमूल्य विरासत है। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उन्हें हिंदी साहित्य के आकाश में सदैव प्रकाशित रखने वाली ज्योति।


लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


गुरुवार, 18 जून 2026

आस्था पर डाका

 लेख-

धार्मिक स्थलों में चढ़ावे की चोरी और गबन के बढ़ते मामले
भारत में धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालु केवल धन नहीं चढ़ाते, बल्कि अपनी आस्था, विश्वास और मनोकामनाएँ भी समर्पित करते हैं। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च और अन्य धार्मिक संस्थाओं में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है। लेकिन पिछले एक दशक में अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें इसी चढ़ावे की चोरी, गबन या वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। यह समस्या किसी एक धर्म या देश तक सीमित नहीं है, भारत से लेकर सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड और अमेरिका तक ऐसे मामलों ने लोगों का विश्वास झकझोरा है।
अयोध्या राम मंदिर-करोड़ों के चढ़ावे पर सवाल
जून 2026 में देश के सबसे चर्चित धार्मिक स्थल, राम मंदिर अयोध्या, में चढ़ावे के कथित गबन का मामला सामने आया। आरोपों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन सदस्यीय विशेष जांच दल लीनी एसआईटी गठित किया। जांच में ट्रस्ट सदस्यों, कर्मचारियों और नकदी गिनने की व्यवस्था से जुड़े लोगों से पूछताछ की गई। फिलहाल जांच जारी है और किसी अदालत ने अभी तक किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया है। इसलिए इसे अभी केवल आरोप और जांच का मामला माना जाएगा।
तिरुपति में कर्मचारी पर चोरी का आरोप
देश के सबसे समृद्ध मंदिरों में गिने जाने वाले तिरुमला तिरुपति देवस्थानम में भी दान गिनने वाले विभाग (पराकामनी) के एक कर्मचारी पर नकदी चोरी का आरोप लगा। सीसीटीवी और आंतरिक जांच के आधार पर कार्रवाई हुई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि अत्याधुनिक व्यवस्था वाले संस्थानों में भी निगरानी की निरंतर आवश्यकता है।
बेंगलुरु का गली आंजनेय स्वामी मंदिर
2025 में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में मंदिर कर्मचारियों पर दान राशि निकालने के आरोप लगे। जांच में वित्तीय अनियमितताएँ सामने आने के बाद कर्नाटक सरकार ने मंदिर का प्रशासन अपने नियंत्रण में ले लिया। जांच में वर्षों तक लेखा-जोखा ठीक से न रखने और दान राशि के प्रबंधन में गंभीर कमियाँ पाई गईं।
स्वरवेद महामंदिर का मामला
वाराणसी स्थित स्वरवेद महामंदिर में एक लेखाकार पर लगभग 60 लाख रुपये के गबन का आरोप लगा। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर आपराधिक विश्वासघात और जालसाजी जैसी धाराओं में मामला दर्ज किया। यह मामला बताता है कि धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय नियंत्रण और ऑडिट कितना आवश्यक है।
छोटे मंदिर भी सुरक्षित नहीं
मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और कर्नाटक सहित अनेक राज्यों में दानपात्र तोड़कर नकदी चोरी करने की घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। कई मामलों में सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, जबकि कुछ मामलों में चोरी की गई राशि भी बरामद हुई।
सबरीमला में सोने की अनियमितताओं की जांच
केरल के प्रसिद्ध सबरीमला मंदिर में स्वर्ण-मंडित संरचनाओं से जुड़े कथित सोना गबन और वित्तीय अनियमितताओं की जांच ने भी व्यापक ध्यान आकर्षित किया। अदालत की निगरानी में जांच एजेंसियों ने कई पहलुओं की पड़ताल की। मामला अभी विभिन्न जांचों और न्यायिक प्रक्रियाओं में है।
विदेशों के चर्चित मामले
सिंगापुर-
सिटी हार्वेस्ट चर्च-सिंगापुर के प्रसिद्ध सिटी हार्वेस्ट चर्च में चर्च निधि के दुरुपयोग का मामला विश्वभर में चर्चा का विषय बना। चर्च के संस्थापक और अन्य अधिकारियों को दोषी ठहराया गया तथा उन्हें कारावास की सजा सुनाई गई। यह धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय जवाबदेही का बड़ा उदाहरण माना जाता है।
दक्षिण कोरिया-दक्षिण कोरिया के योइदो फुल गॉस्पेल चर्च से जुड़े वित्तीय गबन के मामले में चर्च नेतृत्व के विरुद्ध कार्रवाई हुई। अदालत ने दोषसिद्धि के बाद कारावास (कुछ मामलों में निलंबित) और आर्थिक दंड भी लगाया।
थाईलैंड-2017 से शुरू हुई थाई टेंपल फ्रॉड जांच में सरकारी अनुदानों और मंदिरों के धन के दुरुपयोग के आरोपों में कई वरिष्ठ बौद्ध भिक्षुओं और अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई। जांच के बाद कानूनों में भी बदलाव किए गए ताकि वित्तीय निगरानी मजबूत हो सके।
अमेरिका-अमेरिका में भी पिछले दशक में अनेक चर्चों के पादरियों और वित्तीय अधिकारियों पर दान राशि के गबन के मामले दर्ज हुए। कई मामलों में अदालतों ने जेल, जुर्माना और धन की वसूली के आदेश दिए।
क्यों बढ़ रहे हैं ऐसे मामले
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं-
नकद चढ़ावे की बड़ी मात्रा।
नियमित स्वतंत्र ऑडिट का अभाव।
ट्रस्टों में पारदर्शिता की कमी।
सीमित तकनीकी निगरानी।
एक ही व्यक्ति या छोटे समूह के हाथों में वित्तीय नियंत्रण।
क्या कहता है कानून
भारत में यदि धार्मिक स्थल की दान राशि की चोरी या गबन सिद्ध होता है तो भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत चोरी, आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी और जालसाजी जैसी धाराओं में कार्रवाई की जा सकती है। अपराध की प्रकृति और राशि के अनुसार जुर्माना, संपत्ति की जब्ती और कई वर्षों के कारावास तक का प्रावधान है।
समाधान क्या है
विशेषज्ञ धार्मिक संस्थानों में निम्न सुधारों की सलाह देते हैं-
प्रत्येक दानपात्र पर 24×7 सीसीटीवी निगरानी।
नकद के स्थान पर डिजिटल दान को बढ़ावा।
वार्षिक स्वतंत्र ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करना।
ट्रस्टों की आय-व्यय वेबसाइट पर प्रकाशित करना।
नकदी गिनती में बहुस्तरीय निगरानी और बैंकिंग प्रणाली का उपयोग।
समय-समय पर सामाजिक और सरकारी लेखा परीक्षण।
धार्मिक संस्थाएँ केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं, बल्कि समाज के विश्वास की धुरी भी हैं। जब चढ़ावे की चोरी या गबन के मामले सामने आते हैं, तो आर्थिक नुकसान से अधिक आस्था को चोट पहुँचती है। इसलिए धार्मिक संस्थानों के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और आधुनिक वित्तीय प्रबंधन अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुके हैं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


न विजन, न मिशन, एजुकेशन बनी धंधा!

 लेख-

बीस वर्षों में बदलती शिक्षा व्यवस्था की पड़ताल
कभी शिक्षा को समाज निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता था। गुरु-शिष्य परंपरा से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान, संस्कार और राष्ट्र निर्माण था। लेकिन पिछले दो दशकों में शिक्षा के स्वरूप में ऐसा परिवर्तन आया है कि आज अक्सर यह सवाल पूछा जाने लगा है ‘क्या शिक्षा सेवा है या व्यवसाय?’, यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेश ने अभूतपूर्व विस्तार किया है, वहीं बढ़ती फीस, फर्जी संस्थानों, प्रवेश घोटालों और परीक्षा-पत्र लीक जैसी घटनाओं ने व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाए हैं।
साल 2005 के बाद भारत में निजी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी। उच्च शिक्षा में आज अधिकांश नामांकन निजी संस्थानों में होता है। इंजीनियरिंग, प्रबंधन, चिकित्सा, नर्सिंग, फार्मेसी और व्यावसायिक शिक्षा का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के हाथों में है। सरकार की सीमित क्षमता और बढ़ती मांग के बीच निजी निवेश ने लाखों विद्यार्थियों को अवसर उपलब्ध कराए। आधुनिक प्रयोगशालाएँ, डिजिटल कक्षाएँ, उद्योग आधारित पाठ्यक्रम और बेहतर आधारभूत सुविधाएँ निजी संस्थानों की बड़ी उपलब्धियाँ मानी जाती हैं। लेकिन इसी दौर में शिक्षा के बाजारीकरण की आलोचना भी तेज हुई। कई निजी संस्थानों पर मनमानी फीस वसूलने, शिक्षकों को कम वेतन देने, प्लेसमेंट के बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने और गुणवत्ता से समझौता करने के आरोप लगे। अनेक राज्यों में अभिभावकों ने फीस वृद्धि के विरुद्ध आंदोलन किए और सरकारों को फीस नियमन संबंधी कानून बनाने पड़े।
घटनाक्रम जिन्होंने व्यवस्था पर सवाल खड़े किए
पिछले बीस वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं जिन्होंने शिक्षा व्यवस्था की साख को प्रभावित किया-
वर्ष 2009 में लागू शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम ने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया। इससे शिक्षा का दायरा बढ़ा, लेकिन निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच गुणवत्ता की बहस भी तेज हुई।
वर्ष 2010-2015 के दौरान देश के अनेक राज्यों में फर्जी विश्वविद्यालयों और बिना मान्यता वाले संस्थानों के मामले सामने आए। समय-समय पर नियामक संस्थाओं ने ऐसे संस्थानों की सूची जारी कर विद्यार्थियों को सतर्क किया।
वर्ष 2016 में निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश और शुल्क व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हुई। इसके बाद चिकित्सा शिक्षा में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से नीट को एक समान प्रवेश परीक्षा के रूप में लागू किया गया। इससे कई अनियमितताओं पर अंकुश लगा, हालांकि नई चुनौतियाँ भी सामने आईं।
वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को बदल दिया। ऑनलाइन शिक्षा सामान्य हो गई। निजी संस्थानों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी ने डिजिटल असमानता को उजागर कर दिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 लागू हुई, जिसने बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और लचीले पाठ्यक्रम की नई दिशा दी।
वर्ष 2023 और 2024 में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक और विशेष रूप से नीट-यूजी 2024 और 2026 को लेकर उठे विवाद ने देशभर में परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। लाखों छात्र और अभिभावक सड़कों पर उतरे। अदालतों तक मामले पहुँचे और सरकार को परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़े। यह स्पष्ट हुआ कि केवल संस्थान ही नहीं, बल्कि परीक्षा संचालन और नियामक तंत्र की मजबूती भी उतनी ही आवश्यक है।
निजी क्षेत्र का योगदान भी कम नहीं
यदि केवल नकारात्मक पक्ष देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रहेगी। देश के अनेक निजी विश्वविद्यालय और संस्थान शोध, नवाचार, स्टार्टअप संस्कृति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और उद्योग आधारित शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। कई निजी संस्थानों ने विदेशी विश्वविद्यालयों से समझौते किए, अत्याधुनिक प्रयोगशालाएँ स्थापित कीं और विद्यार्थियों को वैश्विक अवसर उपलब्ध कराए। यही कारण है कि लाखों विद्यार्थी आज भी निजी संस्थानों को प्राथमिकता देते हैं।
फिर समस्या कहाँ है?
समस्या तब उत्पन्न होती है जब शिक्षा का उद्देश्य केवल लाभ कमाना रह जाता है। कई संस्थानों में शिक्षकों को अनुबंध पर कम वेतन पर रखा जाता है, जबकि विद्यार्थियों से लाखों रुपये फीस ली जाती है। कुछ संस्थानों में शोध केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। दूसरी ओर सरकारी संस्थानों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, रिक्त पद, धीमी नियुक्तियाँ और प्रशासनिक जटिलताएँ भी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। इसलिए दोष केवल किसी एक पक्ष का नहीं है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
प्रो. कृष्ण कुमार, पूर्व निदेशक, एनसीईआरटी, का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। उनके अनुसार यदि शिक्षा केवल बाजार की मांग के अनुसार ढल जाएगी तो उसका मानवीय पक्ष कमजोर पड़ जाएगा। शिक्षाविद् प्रो. अनिल सदगोपाल लंबे समय से शिक्षा के बढ़ते निजीकरण पर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा को सामाजिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि केवल आर्थिक गतिविधि के रूप में। उनके अनुसार गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् प्रो. वाई. एस. राजन का मत था कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो नवाचार, अनुसंधान और रोजगार तीनों के बीच संतुलन स्थापित करे। केवल डिग्री आधारित शिक्षा देश को आगे नहीं ले जा सकती।
जिम्मेदार कौन?
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक संस्था या वर्ग में नहीं मिलता। सरकारों ने पर्याप्त सार्वजनिक निवेश नहीं किया, नियामक संस्थाएँ कई बार समय पर कार्रवाई नहीं कर सकीं, कुछ निजी संस्थानों ने शिक्षा को लाभ का माध्यम बना दिया और समाज ने भी कई बार केवल चमकदार परिसर और ऊँची फीस को गुणवत्ता का पर्याय मान लिया। परिणामस्वरूप शिक्षा का मूल उद्देश्य धीरे-धीरे पीछे छूटता गया।
आगे का रास्ता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने सुधार की दिशा अवश्य दिखाई है, लेकिन केवल नीति पर्याप्त नहीं होगी। नियमन में पारदर्शिता, शिक्षकों का सम्मानजनक वेतन, शोध को प्रोत्साहन, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, फर्जी संस्थानों पर कठोर कार्रवाई और फीस में संतुलन जैसे कदम समान रूप से आवश्यक हैं। शिक्षा को सेवा और उत्तरदायित्व दोनों के रूप में देखने की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने की है कि यदि शिक्षा केवल बाजार की वस्तु बन गई तो सबसे बड़ा नुकसान राष्ट्र के भविष्य का होगा। निजी क्षेत्र की ऊर्जा, सरकारी उत्तरदायित्व और समाज की अपेक्षाओं, इन तीनों के संतुलन से ही ऐसी शिक्षा व्यवस्था बन सकती है जो डिग्री ही नहीं, चरित्र, कौशल और नागरिकता भी गढ़े। यही भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


मंगलवार, 16 जून 2026

विकास की दौड़ में ढांचों की दरारें

 लेख-

डेढ़ दशक में रिकॉर्ड निर्माण, फिर क्यों टूट रहे हैं पुल, सड़कें और बांध?
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। नई सड़कें, एक्सप्रेसवे, पुल, सुरंगें, मेट्रो रेल और बांध विकास के प्रतीक बन चुके हैं। पिछले डेढ़ दशक में देश ने बुनियादी ढांचे के निर्माण में जो छलांग लगाई है, वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभूतपूर्व मानी जा रही है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। पुलों के ढहने, सड़कों के धंसने और पुराने बांधों की सुरक्षा को लेकर उठते सवाल बता रहे हैं कि विकास की रफ्तार के साथ सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
रिकॉर्ड निर्माण का दशक
वर्ष 2014 में भारत का राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क लगभग 91 हजार किलोमीटर था, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 1.46 लाख किलोमीटर हो गया। यानी करीब 61 प्रतिशत की वृद्धि। इसी अवधि में एक्सप्रेसवे नेटवर्क 93 किलोमीटर से बढ़कर 3 हजार किलोमीटर से अधिक हो गया। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे, द्वारका एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और समृद्धि महामार्ग जैसी परियोजनाएं आधुनिक भारत की पहचान बन गई हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की गति 2013-14 में लगभग 12 किलोमीटर प्रतिदिन थी, जो बाद के वर्षों में बढ़कर 30 किलोमीटर प्रतिदिन से अधिक तक पहुंच गई। यह वृद्धि केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, व्यापार और रोजगार से भी सीधे जुड़ी हुई है।
पुलों का नया भारत
गंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा और अन्य बड़ी नदियों पर अनेक विशाल पुल बने। बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वाेत्तर राज्यों में पुल निर्माण ने दूरस्थ क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा। कई राज्यों में रेलवे ओवरब्रिज और फ्लाईओवरों के निर्माण ने यातायात दबाव कम किया। लेकिन जितनी तेजी से नए पुल बने, उतनी ही तेजी से पुराने पुलों की जर्जरता सामने आने लगी। पिछले कुछ वर्षों में पुलों के ढहने की घटनाओं ने विकास मॉडल पर सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2022 में गुजरात के मोरबी में मच्छु नदी पर बना झूला पुल टूट गया। इस हादसे में 141 लोगों की जान चली गई। मरम्मत के बाद कुछ ही दिनों में पुल का टूटना देश के लिए बड़ा झटका था।वर्ष 2018 में वाराणसी में निर्माणाधीन फ्लाईओवर गिरने से 18 लोगों की मौत हुई। उसी वर्ष कोलकाता का माजेरहाट पुल भी ढह गया। वर्ष 2025 में गुजरात के गम्भीरा पुल हादसे में 22 लोगों की मृत्यु हुई। इसके बाद राज्य सरकार ने 1,800 से अधिक पुलों का विशेष निरीक्षण कराया। विशेषज्ञों के अनुसार केवल दुर्घटनाएं ही समस्या नहीं हैं। असली समस्या यह है कि देश में हजारों पुल अपनी निर्धारित आयु के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं।
सड़कें बन रही हैं, टूट भी रही हैं
भारत में हर मानसून के दौरान सड़कों के धंसने और गड्ढों की खबरें सामान्य हो चुकी हैं। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, पटना, जयपुर और लखनऊ जैसे बड़े शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। भारतीय सड़क कांग्रेस से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क क्षति के प्रमुख कारण हैं-खराब ड्रेनेज व्यवस्था, निम्न गुणवत्ता की निर्माण सामग्री, भारी वाहनों का दबाव, रखरखाव में लापरवाही, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती अतिवृष्टि। सड़क बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उसे वर्षों तक सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखना कहीं अधिक कठिन कार्य है।
बांधों पर बढ़ती उम्र का दबाव
भारत में 5,700 से अधिक बड़े बांध हैं। इनमें से लगभग 250 बांध 100 वर्ष से अधिक पुराने हो चुके हैं। अगले दो दशकों में एक हजार से अधिक बांध ‘एजिंग इंफ्रास्ट्रक्चर’ की श्रेणी में पहुंच जाएंगे। बांध विशेषज्ञों का कहना है कि बांधों का टूटना दुर्लभ घटना है, लेकिन उनकी उम्र बढ़ने के साथ जोखिम भी बढ़ता है। इसलिए समय-समय पर संरचनात्मक जांच और सुरक्षा ऑडिट आवश्यक हैं। भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरु की प्रसिद्ध भू-तकनीकी विशेषज्ञ जी माधवी लता का मानना है कि भारत में नई परियोजनाओं के निर्माण पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि रखरखाव को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिलती। कई सिविल इंजीनियरों का मत है कि पुलों की नियमित हेल्थ मॉनिटरिंग अनिवार्य की जानी चाहिए। जिस प्रकार मनुष्य का स्वास्थ्य परीक्षण होता है, उसी प्रकार पुलों और बांधों का भी समय-समय पर तकनीकी परीक्षण होना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार पहले जहां 50 वर्षों में एक बार आने वाली बाढ़ अब 10-15 वर्षों में देखने को मिल रही है। इससे पुलों की नींव और सड़कों की स्थिरता पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
सरकार ने क्या कदम उठाए?
1.इंडियन ब्रिज मैनेजमेंट सिस्टम-देश के लाखों पुलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया गया है। इससे पुलों की आयु, स्थिति और जोखिम का आकलन किया जा सकता है।
2.ड्रोन निगरानी-राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अब ड्रोन आधारित निरीक्षण प्रणाली का उपयोग कर रहा है। इससे छोटी-छोटी दरारों और क्षतियों का भी समय रहते पता लगाया जा सकता है।
3.डैम सेफ्टी एक्ट 2021-इस कानून के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बांध सुरक्षा संस्थाओं का गठन किया गया है। नियमित निरीक्षण और आपदा प्रबंधन योजना को अनिवार्य बनाया गया है।
4.स्ट्रक्चरल ऑडिट-कई राज्यों में 15 से 20 वर्ष से अधिक पुराने पुलों का विशेष ऑडिट कराया जा रहा है। जोखिम वाले पुलों पर भार सीमा निर्धारित की जा रही है।
दुनिया से क्या सीखें?
जापान, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में बड़ी संरचनाओं की डिजिटल निगरानी की जाती है। पुलों में सेंसर लगाए जाते हैं जो कंपन, झुकाव और दरारों की जानकारी तुरंत नियंत्रण केंद्र तक पहुंचाते हैं। भारत में भी अब स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में कदम बढ़ रहे हैं, लेकिन इसे व्यापक स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है।
डेढ़ दशक की तस्वीर
✔ राष्ट्रीय राजमार्ग: 91,000 किमी से बढ़कर 1.46 लाख किमी
✔ एक्सप्रेसवे नेटवर्क: 93 किमी से बढ़कर 3,000 किमी से अधिक
✔ बड़े बांध: 5,700 से अधिक
✔ 100 वर्ष से अधिक पुराने बांध: लगभग 250
✔ 2021-25 के बीच पुल दुर्घटनाएं: लगभग 170
✔ मोरबी हादसे में मृतक: 141
✔ गम्भीरा पुल हादसे में मृतक: 22
भारत विकास के उस दौर से गुजर रहा है जहां सड़कें, पुल और बांध केवल निर्माण परियोजनाएं नहीं, बल्कि आर्थिक प्रगति की जीवनरेखा हैं। लेकिन यदि रखरखाव, निरीक्षण और जवाबदेही को समान महत्व नहीं दिया गया तो विकास की यही संरचनाएं भविष्य में बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। देश को अब केवल कितना बनाया? से आगे बढ़कर कितना सुरक्षित रखा? का जवाब भी तलाशना होगा। क्योंकि मजबूत राष्ट्र केवल ऊंचे पुलों से नहीं, बल्कि सुरक्षित पुलों से बनता है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

सोमवार, 15 जून 2026

आइसक्रीम दवा नहीं, दावत है!

 आवश्यक लेख-

गर्मी का मौसम आते ही आइसक्रीम की बिक्री बढ़ जाती है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर वर्ग के लोगों की यह प्रिय मिठाई है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण एक प्रश्न बार-बार पूछा जाने लगा है-क्या आइसक्रीम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है? क्या इसे नियमित रूप से खाना चाहिए? और बाजार में उपलब्ध विभिन्न ब्रांडों में से कौन-सी आइसक्रीम अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा सकती है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने से पहले एक बात स्पष्ट कर लेना आवश्यक है कि आइसक्रीम कोई स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन या दवा नहीं है। यह मुख्यतः स्वाद और आनंद के लिए खाई जाने वाली वस्तु है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि ‘आइसक्रीम दवा नहीं, दावत है।’
आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट का अंतर
भारत में बहुत से लोग यह मानते हैं कि बाजार में मिलने वाली हर आइसक्रीम वास्तव में आइसक्रीम ही होती है, जबकि ऐसा नहीं है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के अनुसार ‘आइसक्रीम’ और ‘फ्रोजन डेजर्ट’ दो अलग-अलग श्रेणियाँ हैं। वास्तविक आइसक्रीम में दूध की वसा का प्रयोग किया जाता है, जबकि फ्रोजन डेजर्ट में वनस्पति वसा या वनस्पति तेल का उपयोग किया जा सकता है। इसलिए पैकेट पर आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट लिखा होना उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संकेत है।
डॉक्टर क्या कहते हैं?
दिल्ली के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञों और पोषण विशेषज्ञों का सामान्य मत है कि आइसक्रीम का सबसे बड़ा स्वास्थ्य जोखिम उसमें मौजूद अतिरिक्त चीनी और संतृप्त वसा है। अत्यधिक चीनी का सेवन मोटापा, टाइप-2 मधुमेह, फैटी लीवर और दंत रोगों का जोखिम बढ़ा सकता है। वहीं संतृप्त वसा का अत्यधिक सेवन हृदय रोगों के जोखिम कारकों को प्रभावित कर सकता है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार समस्या आइसक्रीम के कभी-कभार सेवन से नहीं, बल्कि उसके नियमित और अधिक मात्रा में सेवन से उत्पन्न होती है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन मीठे पेय, मिठाइयाँ और आइसक्रीम का सेवन करता है, तो उसके शरीर में अतिरिक्त कैलोरी जमा होने लगती है, जिसका परिणाम मोटापे के रूप में सामने आता है।
आइसक्रीम में आखिर होता क्या है?
एक सामान्य आइसक्रीम में दूध, क्रीम, चीनी, दूध पाउडर, फ्लेवर, स्टेबलाइजर और इमल्सीफायर शामिल होते हैं। प्रीमियम श्रेणी की आइसक्रीम में दूध और क्रीम की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है, जबकि कम कीमत वाले उत्पादों में विभिन्न प्रकार के विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है। आइसक्रीम उद्योग में ‘ओवररन’ नामक एक तकनीक भी प्रयोग की जाती है, जिसमें आइसक्रीम में हवा मिलाई जाती है। यही कारण है कि एक लीटर आइसक्रीम का वास्तविक वजन कई बार अपेक्षा से कम होता है। अधिक हवा वाली आइसक्रीम हल्की और सस्ती पड़ती है, जबकि कम हवा वाली प्रीमियम आइसक्रीम अधिक गाढ़ी और समृद्ध स्वाद वाली होती है।
क्या आइसक्रीम के कोई लाभ भी हैं?
हाँ, सीमित मात्रा में खाई जाने वाली वास्तविक डेयरी आइसक्रीम कुछ पोषण भी प्रदान करती है। इसमें कैल्शियम, प्रोटीन और कुछ विटामिन होते हैं, जो दूध से प्राप्त होते हैं। लेकिन यह लाभ इतने अधिक नहीं हैं कि आइसक्रीम को स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन माना जाए। यदि कोई व्यक्ति केवल कैल्शियम प्राप्त करना चाहता है तो दूध, दही, छाछ और पनीर कहीं बेहतर विकल्प हैं।
बच्चों और युवाओं के लिए सावधानी
बाल रोग विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को पूरी तरह आइसक्रीम से वंचित करना भी उचित नहीं है, क्योंकि इससे उनके मन में इसके प्रति अनावश्यक आकर्षण पैदा हो सकता है। लेकिन नियमित रूप से बड़ी मात्रा में आइसक्रीम खिलाना भी सही नहीं है। सप्ताह में एक या दो बार सीमित मात्रा में आइसक्रीम पर्याप्त मानी जा सकती है। युवाओं में बढ़ती मोटापे की समस्या को देखते हुए डॉक्टर सलाह देते हैं कि आइसक्रीम को भोजन का विकल्प नहीं, बल्कि कभी-कभार मिलने वाले स्वादिष्ट व्यंजन के रूप में देखा जाना चाहिए।
कौन-सी आइसक्रीम चुनें?
यदि आप बाजार से आइसक्रीम खरीद रहे हैं तो कुछ बातों पर ध्यान दें-
1.पैकेट पर आइसक्रीम लिखा हो, केवल फ्रोजन डेजर्ट नहीं।
2.सामग्री सूची में दूध, क्रीम और मिल्क सॉलिड्स प्रमुख घटक हों।
3.चीनी की मात्रा कम हो तो बेहतर।
4.कृत्रिम रंग और फ्लेवर कम हों।
5.विश्वसनीय और गुणवत्ता नियंत्रण रखने वाले ब्रांड का चयन करें।
भारत में डेयरी आधारित आइसक्रीम उपलब्ध कराने वाले प्रमुख ब्रांडों में अमूल, मदर डेयरी, विरका, हेवमोर, वाडीलाल, क्वालिटी वाल्स  जैसे स्थापित नाम शामिल हैं। उपभोक्ताओं को किसी ब्रांड का चुनाव करने से पहले उसके लेबल और सामग्री सूची को अवश्य पढ़ना चाहिए। आइसक्रीम को लेकर सबसे बड़ी भूल यह है कि लोग इसे सामान्य खाद्य पदार्थ की तरह खाने लगते हैं। वास्तव में यह एक मिठाई है, जिसका उद्देश्य स्वाद और आनंद देना है, पोषण की पूर्ति करना नहीं। यदि आप स्वस्थ हैं, नियमित व्यायाम करते हैं और संतुलित भोजन लेते हैं, तो कभी-कभार एक स्कूप आइसक्रीम का आनंद लेने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन यदि आइसक्रीम आपकी दैनिक आदत बन जाए तो यही स्वाद धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकता है। इसलिए याद रखिए-आइसक्रीम दवा नहीं, दावत है। दावत का आनंद कभी-कभार लिया जाता है, रोज नहीं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


शनिवार, 13 जून 2026

ढाबे से फूड प्लाजा तक

 लेख-

हाईवे के ढाबे और रेस्टोरेंट स्वाद
का सफर या सुरक्षा की चुनौती?

भारत में सड़क यात्रा और ढाबों का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना राजमार्गों का इतिहास। कभी ट्रक चालकों और लंबी दूरी तय करने वाले यात्रियों की जरूरत के रूप में विकसित हुए ढाबे आज भारतीय खानपान संस्कृति की पहचान बन चुके हैं। मुरथल के परांठों से लेकर पंजाब की लस्सी, राजस्थान की दाल-बाटी और उत्तर प्रदेश के तंदूरी व्यंजनों तक, ढाबों ने न केवल यात्रियों की भूख मिटाई है बल्कि स्थानीय व्यंजनों को राष्ट्रीय पहचान भी दिलाई है। दूसरी ओर, शहरों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधुनिक रेस्टोरेंट, फूड कोर्ट और हाईवे प्लाजा तेजी से बढ़े हैं, जिन्होंने यात्रा के दौरान भोजन की परंपरा को नया रूप दिया है। लेकिन पिछले एक दशक की तस्वीर केवल स्वाद और सुविधा की कहानी नहीं है। यह स्वच्छता, सुरक्षा, आगजनी, खाद्य गुणवत्ता, ढांचागत मजबूती और बदलती उपभोक्ता अपेक्षाओं की भी कहानी है।
बदलता हुआ हाईवे भारत
पिछले दस वर्षों में भारत के सड़क नेटवर्क में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। नए एक्सप्रेस-वे और राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के साथ हाईवे पर भोजनालयों का स्वरूप भी बदला है। पहले जहाँ अधिकांश ढाबे साधारण खाटों और खुले चूल्हों पर आधारित होते थे, वहीं अब अनेक ढाबे वातानुकूलित हॉल, डिजिटल भुगतान, बच्चों के खेलने की जगह और आधुनिक शौचालय जैसी सुविधाएँ देने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आय, पारिवारिक पर्यटन और निजी वाहनों की संख्या में वृद्धि ने ढाबों और रेस्टोरेंटों को अपनी सेवाएँ बेहतर करने के लिए प्रेरित किया है। यही कारण है कि आज कई प्रसिद्ध ढाबे छोटे उद्योगों का रूप ले चुके हैं और उनका वार्षिक कारोबार करोड़ों रुपये तक पहुँच गया है।
आखिर ढाबे इतने लोकप्रिय क्यों हैं?
ढाबों की सबसे बड़ी ताकत उनका स्वाद और आत्मीयता है। यात्रियों को घर जैसा भोजन, ताजा रोटियाँ और स्थानीय व्यंजन अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध हो जाते हैं। ट्रक चालक समुदाय के लिए तो ढाबे वर्षों से दूसरे घर की तरह रहे हैं। इसके अतिरिक्त, लंबी यात्रा के दौरान ढाबे विश्राम का भी अवसर प्रदान करते हैं। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि हर दो से तीन घंटे की ड्राइविंग के बाद कुछ समय का विश्राम दुर्घटनाओं की संभावना कम करता है। इस दृष्टि से ढाबे केवल भोजनालय नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा के अप्रत्यक्ष सहयोगी भी हैं।
रेस्टोरेंट और फूड प्लाजा की बढ़ती लोकप्रियता
हाल के वर्षों में यात्रियों की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है। अब परिवार केवल स्वाद नहीं बल्कि स्वच्छता, सुरक्षित पार्किंग, साफ शौचालय और आरामदायक वातावरण को भी महत्व देते हैं। इसी कारण राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधुनिक रेस्टोरेंट और फूड प्लाजा तेजी से विकसित हुए हैं। इन स्थानों पर भोजन के साथ-साथ स्वच्छ शौचालय, प्राथमिक चिकित्सा, बच्चों के लिए स्थान, ईवी चार्जिंग और सुरक्षित पार्किंग जैसी सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं। यही वजह है कि परिवारों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच इनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
कोविड काल-सबसे बड़ा झटका
वर्ष 2020 और 2021 ढाबा और रेस्टोरेंट उद्योग के लिए बेहद कठिन साबित हुए। कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण यातायात लगभग ठप हो गया। हजारों ढाबों और छोटे भोजनालयों की आय अचानक समाप्त हो गई। कई स्थानों पर कर्मचारियों को हटाना पड़ा, जबकि अनेक छोटे ढाबे स्थायी रूप से बंद हो गए। उद्योग संगठनों के अनुसार महामारी के दौरान भोजन सेवा क्षेत्र को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हालांकि महामारी के बाद घरेलू पर्यटन और सड़क यात्राओं में तेजी आने से इस क्षेत्र में फिर से जान लौटी।
स्वाद के साथ बढ़ते खतरे
ढाबों और रेस्टोरेंटों की लोकप्रियता जितनी बढ़ी है, उतनी ही तेजी से उनसे जुड़े जोखिम भी सामने आए हैं। खाद्य सुरक्षा विभागों द्वारा समय-समय पर की गई जांचों में भोजन की गुणवत्ता, रसोई की सफाई और पेयजल की शुद्धता से जुड़े गंभीर सवाल उठे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भोजन में कीड़े, दूषित सामग्री और अस्वच्छ रसोई से जुड़ी शिकायतों में वृद्धि हुई है। कई मामलों में उपभोक्ता अदालतों ने ग्राहकों को मुआवजा देने के आदेश भी दिए। विशेषज्ञों का कहना है कि भोजन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नियमित निरीक्षण और कठोर निगरानी की आवश्यकता है।
आग और ढांचागत हादसे-सबसे बड़ी चिंता
पिछले दशक में ढाबों और रेस्टोरेंटों से जुड़ी सबसे चिंताजनक घटनाएँ आगजनी और ढांचागत दुर्घटनाएँ रही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में रेस्टोरेंटों में लगी आग ने कई लोगों की जान ली। जांचों में बार-बार सामने आया कि अग्निशमन उपकरणों का अभाव, अवैध निर्माण, गैस सिलेंडरों का असुरक्षित उपयोग और आपात निकास मार्गों की कमी ऐसी घटनाओं के प्रमुख कारण रहे। 2024 में पटना में गैस सिलेंडर विस्फोट से लगी आग ने कई लोगों की जान ले ली। वहीं 2025 में जयपुर के एक ढाबे की छत गिरने से एक व्यक्ति की मृत्यु हुई और कई घायल हुए। हाल के वर्षों में दिल्ली समेत कई शहरों में हुई आग की घटनाओं ने यह सवाल उठाया कि क्या भोजनालय सुरक्षा मानकों का वास्तव में पालन कर रहे हैं।
हाईवे पर सुरक्षा की अलग चुनौती
हाईवे ढाबों से जुड़ी समस्याएँ केवल भोजन तक सीमित नहीं हैं। कई स्थानों पर अव्यवस्थित पार्किंग, सड़क किनारे अतिक्रमण और अचानक वाहन रुकने की प्रवृत्ति दुर्घटनाओं का कारण बनती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ढाबों के सामने सुरक्षित प्रवेश और निकास मार्ग, पर्याप्त पार्किंग और स्पष्ट संकेतक होना जरूरी है। कई दुर्घटनाएँ केवल इसलिए हुईं क्योंकि तेज गति से चल रहे वाहन अचानक ढाबे की ओर मुड़ गए या सड़क किनारे खड़े वाहनों से टकरा गए।
सरकार के नए प्रयास
इन चुनौतियों को देखते हुए सरकार और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने आधुनिक ‘वे-साइड अमेनिटी’ केंद्र विकसित करने की योजना शुरू की है। इन केंद्रों का उद्देश्य केवल भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि यात्रियों को एक सुरक्षित और सुविधाजनक पड़ाव प्रदान करना है। इन सुविधाओं में स्वच्छ शौचालय, मेडिकल सहायता, ड्राइवर विश्राम कक्ष, सुरक्षित पार्किंग, फूड कोर्ट, ईवी चार्जिंग स्टेशन और डिजिटल सुविधाएँ शामिल हैं। आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्गों पर बड़ी संख्या में ऐसे केंद्र विकसित किए जाने की योजना है।
क्या ढाबे खत्म हो जाएंगे?
इस प्रश्न का उत्तर अधिकांश विशेषज्ञ ‘नहीं’ में देते हैं। उनका मानना है कि ढाबे भारतीय सड़क संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। आधुनिक फूड प्लाजा सुविधाएँ दे सकते हैं, लेकिन ढाबों का स्वाद, आत्मीयता और स्थानीय पहचान आसानी से प्रतिस्थापित नहीं की जा सकती। हाँ, यह अवश्य है कि भविष्य का सफल ढाबा वही होगा जो स्वाद के साथ स्वच्छता, सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं का संतुलन बना सके। जो ढाबे बदलती अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को ढाल लेंगे, वे आने वाले वर्षों में और अधिक लोकप्रिय होंगे।
पिछले दस वर्षों में भारतीय ढाबों और रेस्टोरेंटों ने लंबा सफर तय किया है। वे पारंपरिक भोजनालयों से विकसित होकर आधुनिक आतिथ्य उद्योग का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। एक ओर उन्होंने करोड़ों यात्रियों को स्वाद, आराम और स्थानीय संस्कृति का अनुभव कराया है, तो दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा, आग, स्वच्छता और ढांचागत सुरक्षा जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्वाद और परंपरा के साथ सुरक्षा और गुणवत्ता को भी समान महत्व दिया जाए। यदि ऐसा हुआ, तो भारतीय हाईवे के ढाबे और रेस्टोरेंट न केवल यात्रियों के पसंदीदा पड़ाव बने रहेंगे, बल्कि सुरक्षित और विश्वसनीय यात्रा संस्कृति के प्रतीक भी बन सकेंगे।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

गुरुवार, 11 जून 2026

जनसंख्या विस्फोट से जनसंख्या संकट तक

 लेख-

क्या दुनिया बच्चों के अभाव की ओर बढ़ रही है?
सन् 1968 में अमेरिकी जीवविज्ञानी पॉल  एहरलीच  ने अपनी चर्चित पुस्तक द पापुलेशन  बम  में चेतावनी दी थी कि बढ़ती जनसंख्या मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। उस समय दुनिया की आबादी लगभग 3.5 अरब थी और आशंका व्यक्त की जा रही थी कि पृथ्वी के संसाधन बढ़ती आबादी का बोझ नहीं उठा पाएंगे। आज, लगभग छह दशक बाद, दुनिया की आबादी 8 अरब को पार कर चुकी है, लेकिन चिंता का विषय बदल चुका है। अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि दुनिया में लोग बहुत अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया पर्याप्त बच्चे पैदा कर रही है? संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक जनसांख्यिकीय अध्ययनों के अनुसार 1950 के दशक में विश्व की कुल प्रजनन दर (टोटल  फर्टिलिटी  रेट ) लगभग 5 बच्चे प्रति महिला थी। 2023 तक यह घटकर लगभग 2.3 रह गई है और सदी के मध्य तक इसके प्रतिस्थापन स्तर 2.1 तक पहुँचने या उससे नीचे जाने का अनुमान है। मानव इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि जन्मदर इतनी तेजी से गिरी हो। वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि 1950 में औसत महिला लगभग 5 बच्चों को जन्म देती थी। आज दुनिया के अधिकांश देशों में यह संख्या आधी से भी कम रह गई है। 2026 के विश्लेषणों के अनुसार विश्व की लगभग 71 प्रतिशत आबादी ऐसे देशों में रहती है जहाँ जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है।  यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन भी है। जिन देशों को कभी जनसंख्या विस्फोट से डर था, वे आज बच्चों की कमी से चिंतित हैं।
जापान-भविष्य की एक झलक
यदि कोई देश दुनिया को भविष्य की चेतावनी देता है तो वह जापान है। जापान में लगातार घटती जन्मदर और बढ़ती आयु ने समाज की संरचना बदल दी है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल बंद हो रहे हैं क्योंकि वहाँ पर्याप्त बच्चे नहीं बचे। लाखों घर खाली पड़े हैं। बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जबकि कामकाजी युवाओं की संख्या घट रही है। जापानी सरकार विवाह प्रोत्साहन, बाल-पालन सहायता, कर छूट और नकद प्रोत्साहन जैसी योजनाएँ चला रही है, लेकिन जन्मदर में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
दक्षिण कोरिया का संकट
दक्षिण कोरिया आज दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर वाले देशों में शामिल है। वहाँ महंगे घर, अत्यधिक प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था, लंबी कार्य संस्कृति और बढ़ती जीवन-यापन लागत के कारण युवा विवाह और मातृत्व-पितृत्व से दूर होते जा रहे हैं। सरकार अरबों डॉलर खर्च कर चुकी है, लेकिन सामाजिक प्रवृत्तियों को बदलना आसान नहीं साबित हुआ।
चीन-नीति का ऐतिहासिक उलटफेर
1979 में चीन ने एक-बच्चा नीति लागू की थी। उस समय उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि को रोकना था। लेकिन चार दशक बाद स्थिति बदल गई। अब चीन लोगों को दो और तीन बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। लगातार घटती जन्मदर और सिकुड़ती कार्यशील आबादी ने चीन की आर्थिक योजनाओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। जिस देश ने कभी जन्म को नियंत्रित किया था, वही आज जन्म बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यह इतिहास का एक अनोखा मोड़ है।
भारत की बदलती कहानी
भारत आज दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है, लेकिन भारत की जन्मदर भी तेजी से गिर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफसी-5) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 तक पहुँच चुकी है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। 1992 में एनएचएफसी-1 के दौरान भारत की प्रजनन दर लगभग 3.4 थी। अर्थात् तीन दशकों में देश ने अपनी प्रजनन दर में लगभग 40 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की है। ताजा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार भारत की प्रजनन दर 1.9 तक पहुँच चुकी है। केवल कुछ राज्य ही अब प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर बचे हैं।
दिल्ली, पंजाब और दक्षिण भारत की तस्वीर
दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जन्मदर काफी नीचे जा चुकी है। दिल्ली की प्रजनन दर देश में सबसे कम स्तरों में गिनी जाती है। दूसरी ओर बिहार और उत्तर प्रदेश अभी भी राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं। यह अंतर बताता है कि शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की कार्य भागीदारी और जीवनशैली का जन्मदर पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
कामकाजी दम्पत्तियों की नई दुनिया
आज का युवा दम्पत्ति अपने माता-पिता की पीढ़ी से अलग सोचता है। पहले विवाह जल्दी होते थे, परिवार जल्दी बनता था और तीन-चार बच्चों का होना सामान्य माना जाता था। आज स्थिति बदल गई है। उच्च शिक्षा में अधिक समय लग रहा है। करियर प्राथमिकता बन चुका है। घर खरीदना कठिन हो गया है। बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ गया है। महिलाएँ आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र हैं। महानगरों में जीवन-यापन महंगा हो गया है। परिणामस्वरूप लाखों दम्पत्ति परिवार विस्तार का निर्णय टाल रहे हैं या केवल एक बच्चे तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं।
जनसंख्या घटेगी तो समस्या क्या होगी?
सामान्य धारणा यह है कि कम जनसंख्या हमेशा अच्छी होती है। लेकिन अर्थशास्त्री इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। जब जन्म कम होते हैं तो कुछ दशकों बाद कार्यशील आयु की आबादी घटती है, उद्योगों को श्रमिकों की कमी होती है, पेंशन व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है, आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। इसी कारण जापान, जर्मनी, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे देश कम जन्मदर को राष्ट्रीय चुनौती मानते हैं।
क्या भारत को डरना चाहिए?
फिलहाल भारत दुनिया का सबसे युवा बड़ा देश है। भारत की औसत आयु लगभग 29 वर्ष के आसपास है जबकि जापान और यूरोप के अनेक देशों में यह 45 से 50 वर्ष तक पहुँच चुकी है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। इसे ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ कहा जाता है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि जन्मदर लगातार नीचे जाती रही तो 2040-2050 के बाद भारत को भी वृद्ध होती आबादी और घटते कार्यबल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
20वीं और 21वीं सदी का अंतर
20वीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न था-‘जनसंख्या को कैसे नियंत्रित किया जाए?’, मगर 21वीं सदी का उभरता हुआ प्रश्न है-‘पर्याप्त जनसंख्या कैसे बनाए रखी जाए?’, यही वह परिवर्तन है जो दुनिया की जनसांख्यिकीय बहस को नई दिशा दे रहा है।
दुनिया एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। कभी जनसंख्या विस्फोट मानवता का सबसे बड़ा डर था। आज अनेक देशों के सामने जनसंख्या संकट खड़ा है। घटती जन्मदर, बढ़ती बुजुर्ग आबादी और सिकुड़ता कार्यबल नई चुनौतियाँ बनकर उभर रहे हैं। भारत अभी युवा शक्ति के स्वर्णकाल में है, लेकिन बदलती जीवनशैली, छोटे परिवारों की प्रवृत्ति और गिरती प्रजनन दर संकेत दे रही है कि आने वाले दशकों में हमें भी जनसंख्या संतुलन पर गंभीरता से विचार करना होगा। कल तक दुनिया बच्चों की बढ़ती संख्या से डरती थी, आज कई देश बच्चों की घटती संख्या से चिंतित हैं। इतिहास का यह शायद सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय उलटफेर है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)