शुक्रवार, 5 जून 2026

गाजियाबाद के भी होटल, स्कूल और कॉलेज सुरक्षित नहीं!

 विशेष लेख-

दस वर्षों के अग्निकांड, प्रशासनिक कार्रवाई 
और सुरक्षा व्यवस्था की पड़ताल
तेजी से विकसित होते शहरों में सुरक्षा व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का प्रमुख शहर गाजियाबाद भी इससे अछूता नहीं है। पिछले एक दशक में शहर में बहुमंजिला इमारतों, होटलों, मॉलों, स्कूलों और कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। विकास की इस रफ्तार ने जहां नई सुविधाएं प्रदान की हैं, वहीं अग्नि सुरक्षा और आपदा प्रबंधन से जुड़े अनेक सवाल भी खड़े किए हैं। हाल के वर्षों में गाजियाबाद में हुई आग की घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्या शहर के होटल, स्कूल और कॉलेज वास्तव में सुरक्षित हैं? क्या इन संस्थानों में सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है? और यदि कोई दुर्घटना हो जाए तो उससे निपटने की तैयारी कितनी है?
बढ़ती आग की घटनाएं बढ़ा रहीं चिंता
गाजियाबाद में आग लगने की घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। फायर विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 के शुरुआती चार महीनों में ही जिले में लगभग 580 अग्निकांड सामने आए। इनमें जनवरी में 79, फरवरी में 97, मार्च में 128 तथा अप्रैल में 286 घटनाएं दर्ज की गईं। विशेषज्ञों के अनुसार इनमें लगभग 90 प्रतिशत मामलों का कारण विद्युत शॉर्ट सर्किट रहा। बढ़ती गर्मी, ओवरलोड बिजली व्यवस्था, जर्जर वायरिंग और सुरक्षा मानकों की अनदेखी ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देती है। अग्निशमन विभाग का मानना है कि अधिकांश हादसे रोके जा सकते हैं, यदि भवन मालिक समय-समय पर विद्युत व्यवस्था और अग्निशमन उपकरणों की जांच कराएं।
होटलों की सुरक्षा पर सबसे अधिक सवाल
यदि सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो गाजियाबाद में होटल क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील माना जा रहा है। यहां छोटे-बड़े सैकड़ों होटल संचालित हैं, जिनमें प्रतिदिन हजारों लोग ठहरते हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्रशासनिक जांच के दौरान अनेक होटलों में फायर एनओसी, आपातकालीन निकास मार्ग और अग्निशमन उपकरणों से संबंधित कमियां सामने आईं। कुछ प्रतिष्ठानों के पास वैध फायर एनओसी तक नहीं थी, जबकि कई स्थानों पर फायर एग्जिट अवरुद्ध पाए गए। होटलों में खतरा इसलिए भी अधिक होता है क्योंकि यहां रसोईघर, गैस कनेक्शन, एयर कंडीशनिंग सिस्टम और बड़ी संख्या में विद्युत उपकरण लगातार संचालित होते हैं। यदि आग लग जाए तो मेहमान भवन की संरचना से अनजान होते हैं, जिससे निकासी और भी कठिन हो जाती है। दिल्ली-एनसीआर में हाल के वर्षों में हुए कई होटल अग्निकांड यह बता चुके हैं कि बंद खिड़कियां, संकरी सीढ़ियां और खराब अग्निशमन व्यवस्था किसी भी दुर्घटना को भयावह बना सकती हैं।
स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि
स्कूलों में प्रतिदिन हजारों बच्चे पढ़ने आते हैं। इसलिए यहां सुरक्षा के मानक अन्य संस्थानों की तुलना में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। देश में समय-समय पर हुए स्कूल अग्निकांडों और भवन दुर्घटनाओं के बाद गाजियाबाद प्रशासन ने भी विद्यालयों की सुरक्षा जांच पर विशेष ध्यान दिया है। हाल के वर्षों में सरकारी और निजी स्कूलों की इमारतों, विद्युत व्यवस्था, प्रयोगशालाओं, सीढ़ियों और अग्निशमन उपकरणों का निरीक्षण कराया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में केवल फायर एक्सटिंग्विशर लगा देना पर्याप्त नहीं है। छात्रों और शिक्षकों को यह भी पता होना चाहिए कि आग लगने की स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया करनी है। नियमित मॉक ड्रिल और आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण इसलिए अत्यंत आवश्यक हैं। कई विद्यालयों में ऐसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन अनेक पुराने संस्थानों में अब भी सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
कॉलेजों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर
गाजियाबाद में अनेक विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान संचालित हैं। इनमें इंजीनियरिंग, प्रबंधन, चिकित्सा और अन्य व्यावसायिक शिक्षा संस्थान शामिल हैं। कॉलेजों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर मानी जाती है क्योंकि उन्हें विभिन्न नियामक संस्थाओं के सुरक्षा मानकों का पालन करना पड़ता है। अधिकांश बड़े परिसरों में फायर अलार्म, आपातकालीन निकास, सुरक्षा कर्मी और अग्निशमन उपकरण उपलब्ध होते हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि केवल उपकरणों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। उनका नियमित रखरखाव और कर्मचारियों का प्रशिक्षण भी उतना ही आवश्यक है। कई संस्थानों में मॉक ड्रिल केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है, जो किसी बड़ी दुर्घटना की स्थिति में गंभीर समस्या पैदा कर सकती है।
पिछले दस वर्षों की प्रमुख घटनाएं
गाजियाबाद में पिछले दशक के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को सामने ला दिया। खोड़ा क्षेत्र की एक बहुमंजिला इमारत में लगी भीषण आग में कई लोगों की जान चली गई। आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला। इंदिरापुरम की एक हाईराइज सोसायटी में लगी आग ने ऊंची इमारतों में सुरक्षा प्रबंधन की चुनौतियों को उजागर किया। कई फ्लैट जल गए और दमकल कर्मियों को आग पर काबू पाने में लंबा समय लगा। वैशाली स्थित एक बड़े मॉल परिसर में लगी आग ने यह दिखाया कि आधुनिक और अत्याधुनिक भवन भी जोखिम से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। साहिबाबाद और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में समय-समय पर हुए बड़े फैक्ट्री अग्निकांडों ने भी जिले की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े किए।
क्या कहते हैं दमकल अधिकारी
गाजियाबाद के मुख्य अग्निशमन अधिकारी राहुल पाल का मानना है कि अधिकांश अग्निकांड मानवीय लापरवाही का परिणाम होते हैं। उनके अनुसार, “अधिकांश आग की घटनाओं के पीछे शॉर्ट सर्किट और सुरक्षा मानकों की अनदेखी प्रमुख कारण हैं। भवनों में अग्निशमन व्यवस्था का नियमित रखरखाव अत्यंत आवश्यक है।” राहुल पाल का कहना है कि कई संस्थानों में अग्निशमन उपकरण तो लगे होते हैं, लेकिन वर्षों तक उनकी जांच नहीं होती। आपात स्थिति आने पर वे उपकरण काम ही नहीं करते। वहीं गाजियाबाद के पूर्व मुख्य अग्निशमन अधिकारी सुनील कुमार सिंह ने भी कई बार कहा था कि अनेक भवनों में अग्निशमन प्रणालियों की गंभीर कमियां पाई गईं और कई संस्थानों ने अपने एनओसी का नवीनीकरण समय पर नहीं कराया। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षा केवल कागजी औपचारिकता नहीं बल्कि जीवन रक्षा का विषय है।
आग लगने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों और अग्निशमन अधिकारियों के अनुसार अधिकांश घटनाओं के पीछे कुछ सामान्य कारण जिम्मेदार होते हैं, जैसे-विद्युत शॉर्ट सर्किट, पुरानी और जर्जर वायरिंग, अग्निशमन उपकरणों का अनुपयोगी होना, आपातकालीन निकास मार्गों का अवरुद्ध होना, सुरक्षा नियमों की अनदेखी, भवनों का नियमित निरीक्षण न होना, मॉक ड्रिल और प्रशिक्षण का अभाव। इन कारणों से छोटी आग भी कुछ ही मिनटों में बड़ी दुर्घटना का रूप ले लेती है।
प्रशासन की कार्रवाई
सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए गाजियाबाद प्रशासन और अग्निशमन विभाग ने हाल के वर्षों में कई अभियान चलाए हैं। होटलों, मॉलों, अस्पतालों, स्कूलों और अन्य सार्वजनिक भवनों का फायर ऑडिट कराया गया। नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों को नोटिस जारी किए गए और कई मामलों में कार्रवाई भी की गई।
स्कूलों तथा कॉलेजों में आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल को बढ़ावा दिया गया। फायर विभाग लगातार जागरूकता कार्यक्रम भी चला रहा है ताकि लोग दुर्घटना से पहले ही सावधानी बरत सकें।
आगे क्या किया जाना चाहिए
विशेषज्ञों का मानना है कि गाजियाबाद जैसे तेजी से बढ़ते शहर में सुरक्षा को विकास का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। इसके लिए जरूरी है कि सभी होटलों का वार्षिक फायर ऑडिट अनिवार्य हो। स्कूलों और कॉलेजों में नियमित मॉक ड्रिल कराई जाए। पुरानी इमारतों की संरचनात्मक जांच हो। विद्युत वायरिंग का समय-समय पर परीक्षण कराया जाए। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो। नागरिकों को भी अग्नि सुरक्षा के प्रति जागरूक बनाया जाए।
पिछले दस वर्षों का अनुभव बताता है कि गाजियाबाद के होटल, स्कूल और कॉलेज पूरी तरह असुरक्षित नहीं हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं कहा जा सकता। होटलों में अग्नि सुरक्षा संबंधी कमियां सबसे अधिक चिंता का विषय हैं, जबकि स्कूलों और कॉलेजों में आपदा प्रबंधन और नियमित प्रशिक्षण को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। बढ़ती आग की घटनाएं यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि सुरक्षा को केवल सरकारी जिम्मेदारी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। संस्थानों, प्रशासन और नागरिकों तीनों को मिलकर सुरक्षा संस्कृति विकसित करनी होगी। क्योंकि किसी भी दुर्घटना के बाद होने वाली क्षति की भरपाई संभव नहीं होती, लेकिन समय रहते बरती गई सावधानी अनेक जिंदगियां बचा सकती है।
गाजियाबाद की सुरक्षा तस्वीर

अध्ययन अवधि- 2016-2026
2026 के पहले चार महीनों में आग की घटनाएं-लगभग 580
प्रमुख कारण-लगभग 90 प्रतिशत मामलों में शॉर्ट सर्किट
चिन्हित असुरक्षित भवन- 42
फायर ऑडिट के दायरे में आए स्कूल-लगभग 400
सबसे संवेदनशील क्षेत्र-होटल, हाईराइज भवन और भीड़भाड़ वाले व्यावसायिक परिसर
प्रमुख संदेश-“सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, आवश्यकता है।”

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


भारतीयों पर डबल डिजीज बर्डन

 लेख-

भारत आज स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ एक तरफ संक्रामक रोगों का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, वहीं दूसरी तरफ जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। देश के स्वास्थ्य परिदृश्य में पिछले दो दशकों में बड़ा बदलाव आया है। कभी तपेदिक, मलेरिया, डेंगू, हैजा और अन्य संक्रामक रोग सबसे बड़ी चुनौती माने जाते थे, लेकिन अब मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर और किडनी संबंधी बीमारियाँ भी उतनी ही गंभीर समस्या बन चुकी हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे ‘डबल डिजीज बर्डन’ अर्थात दोहरे रोग-भार की स्थिति बताते हैं।
बढ़ता गैर-संचारी रोगों का खतरा
भारत में आज गैर-संचारी रोग (नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज) सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरे हैं। मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, स्ट्रोक और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियाँ देश में होने वाली अधिकांश मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय स्वास्थ्य एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि देश में होने वाली लगभग दो-तिहाई मौतें अब इन्हीं बीमारियों के कारण होती हैं। मधुमेह के मामलों में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। बदलती जीवनशैली, फास्ट फूड का बढ़ता चलन, शारीरिक श्रम में कमी और तनाव इसके प्रमुख कारण हैं। पहले यह बीमारी अधिक आयु के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन अब 30 से 40 वर्ष की आयु के युवाओं में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उच्च रक्तचाप भी एक ‘साइलेंट किलर’ बन चुका है। लाखों लोगों को यह पता ही नहीं होता कि वे हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित हैं। यही स्थिति बाद में हृदयाघात और ब्रेन स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बनती है।
हृदय रोग और कैंसर की बढ़ती चुनौती
देश में हृदय रोग मृत्यु के सबसे बड़े कारणों में शामिल हो चुके हैं। चिंताजनक बात यह है कि पहले जहाँ हार्ट अटैक को वृद्धावस्था की समस्या माना जाता था, वहीं अब 35 से 50 वर्ष की आयु के लोगों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञ इसके लिए तनावपूर्ण जीवन, धूम्रपान, मोटापा, अनियमित खान-पान और व्यायाम की कमी को जिम्मेदार मानते हैं। कैंसर के मामलों में भी निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। महिलाओं में स्तन कैंसर और गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर प्रमुख हैं, जबकि पुरुषों में मुख कैंसर, फेफड़ों का कैंसर और तंबाकू से जुड़े अन्य कैंसर अधिक पाए जाते हैं। भारत में बड़ी संख्या में लोग तंबाकू और गुटखे का सेवन करते हैं, जिसके कारण मुख कैंसर के मामले दुनिया के कई देशों की तुलना में अधिक हैं।
संक्रामक रोग अभी भी चुनौती
हालाँकि गैर-संचारी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन भारत अभी भी संक्रामक रोगों से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। तपेदिक (टीबी) आज भी देश के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। भारत दुनिया में टीबी के सबसे अधिक रोगियों वाले देशों में शामिल है। गरीबी, कुपोषण, भीड़भाड़ और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच इसके प्रसार को बढ़ाती है। डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी मच्छरजनित बीमारियाँ हर वर्ष मानसून के दौरान और उसके बाद हजारों लोगों को प्रभावित करती हैं। जलभराव, स्वच्छता की कमी और बदलती जलवायु परिस्थितियाँ इन बीमारियों को बढ़ावा देती हैं। इसी प्रकार मौसमी फ्लू, वायरल बुखार और श्वसन संबंधी संक्रमण भी समय-समय पर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चुनौती बनते रहते हैं।
पिछले 10 वर्षों में भारत का स्वास्थ्य परिदृश्य
बीमारी       2015 के आसपास                2024-25 के आसपास       स्थिति
टीबी
(प्रति लाख आबादी)   237                         187    लगभग 21 प्रतिशत कमी
गैर-संचारी रोगों से मौतें लगभग 62 प्रतिशत  63-65 प्रतिशत        लगातार वृद्धि
मधुमेह   लगभग 6-7 करोड़ रोगी       10 करोड़ से अधिक               तीव्र वृद्धि
उच्च रक्तचाप लगभग 20-25 प्रतिशत वयस्क 30 प्रतिशत से अधिक वयस्क  तेज वृद्धि
डेंगू      छिटपुट प्रकोप  कई राज्यों में स्थायी चुनौती, मामलों में कई गुना वृद्धि
हृदय रोग प्रमुख कारणों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण लगातार वृद्धि
कैंसर  लगभग 10-11 लाख वार्षिक मामले
कौन हैं सबसे अधिक प्रभावित?
भारत में स्वास्थ्य समस्याओं का प्रभाव सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। 30 वर्ष से अधिक आयु के लोग गैर-संचारी रोगों की चपेट में सबसे अधिक आ रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों से अधिक प्रभावित हैं क्योंकि उनकी जीवनशैली अपेक्षाकृत कम सक्रिय होती है। महिलाओं में एनीमिया अभी भी एक बड़ी समस्या है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार देश की बड़ी संख्या में महिलाएँ और किशोरियाँ रक्ताल्पता से पीड़ित हैं। इसके अलावा स्तन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर भी महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में टीबी, कुपोषण और संक्रामक रोगों का खतरा अपेक्षाकृत अधिक है। स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच और जागरूकता की कमी भी इन समस्याओं को बढ़ाती है।
सरकार के प्रयास
स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कई स्तरों पर कार्य कर रही हैं। आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से करोड़ों गरीब परिवारों को स्वास्थ्य बीमा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। देशभर में स्थापित आयुष्मान आरोग्य मंदिर और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर और हृदय रोगों की स्क्रीनिंग की जा रही है। 30 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की नियमित स्वास्थ्य जांच पर विशेष बल दिया जा रहा है। टीबी उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। निक्षय पोषण योजना के माध्यम से रोगियों को पोषण सहायता भी प्रदान की जा रही है। डेंगू और मलेरिया नियंत्रण के लिए मच्छरनाशी दवाओं का छिड़काव, जागरूकता अभियान और निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है।
क्या हैं आगे की चुनौतियाँ?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पतालों और दवाओं के भरोसे स्वास्थ्य संकट का समाधान संभव नहीं है। बीमारी होने के बाद उपचार की तुलना में बीमारी को रोकना अधिक प्रभावी और कम खर्चीला उपाय है। भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण, प्रदूषण, तनाव, असंतुलित भोजन और शारीरिक निष्क्रियता आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को और बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी चिंता का विषय है। क्या हैं सुझाव?
विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को वर्ष में कम से कम एक बार स्वास्थ्य जांच अवश्य करानी चाहिए। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना आवश्यक है। तंबाकू और शराब से दूरी बनाकर अनेक गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है। मच्छरजनित रोगों से बचाव के लिए घर और आसपास स्वच्छता बनाए रखना जरूरी है। बच्चों और महिलाओं में पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाना भी अत्यंत आवश्यक है।
भारत का वर्तमान हेल्थ बुलेटिन स्पष्ट संकेत देता है कि देश एक नए स्वास्थ्य संक्रमण काल से गुजर रहा है। जहाँ संक्रामक रोग अब भी चुनौती बने हुए हैं, वहीं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ती जा रही हैं। सरकार की योजनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन स्वास्थ्य सुरक्षा केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए समाज, परिवार और प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि जागरूकता, नियमित जांच, संतुलित जीवनशैली और समय पर उपचार को प्राथमिकता दी जाए, तो भारत न केवल बीमारियों का बोझ कम कर सकता है बल्कि एक स्वस्थ और उत्पादक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ सकता है।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

बुधवार, 3 जून 2026

दिल्ली-एनसीआर में अग्निकांड-हादसे, हिदायतें और हकीकत

 विशेष लेख-

करोल बाग से मालवीय नगर तक,
हर त्रासदी ने उठाए एक जैसे सवाल

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उससे जुड़े नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम तथा फरीदाबाद जैसे शहर देश के सबसे तेजी से विकसित होते शहरी क्षेत्रों में शामिल हैं। ऊँची-ऊँची इमारतें, व्यावसायिक परिसर, औद्योगिक इकाइयाँ और विशाल बाजार विकास की नई तस्वीर पेश कर रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही अग्नि सुरक्षा की चुनौतियाँ भी तेजी से बढ़ी हैं। पिछले एक दशक में हुए अनेक बड़े अग्निकांडों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शहरी विस्तार की गति के मुकाबले सुरक्षा व्यवस्था अभी भी कमजोर कड़ी बनी हुई है। दिल्ली में वर्ष 2018 के बवाना पटाखा फैक्टरी अग्निकांड से लेकर 2019 के करोल बाग होटल अग्निकांड, अनाज मंडी फैक्टरी त्रासदी, 2022 के मुंडका अग्निकांड और हाल ही में 2026 के मालवीय नगर होटल-रेस्तरां अग्निकांड तक, लगभग हर बड़ी घटना ने एक ही कहानी दोहराई है, सुरक्षा मानकों की अनदेखी, अवैध निर्माण, विद्युत शॉर्ट-सर्किट और आपातकालीन निकास व्यवस्था का अभाव।
हादसों का सिलसिला
फरवरी 2019 में करोल बाग स्थित होटल अर्पित पैलेस में लगी आग में 17 लोगों की मौत हुई। जांच में सामने आया कि भवन में कई सुरक्षा खामियाँ थीं। आपातकालीन निकास व्यवस्था अपर्याप्त थी, ज्वलनशील सामग्री का उपयोग किया गया था और सुरक्षा मानकों का समुचित पालन नहीं किया गया था। इसी वर्ष दिसंबर में पुरानी दिल्ली के अनाज मंडी क्षेत्र में लगी आग ने पूरे देश को झकझोर दिया। एक अवैध फैक्टरी में सो रहे मजदूर धुएँ और आग के बीच फँस गए। 43 लोगों की मौत हुई। संकरी गलियाँ, बंद निकास मार्ग, लोहे की जालियाँ और सुरक्षा उपकरणों का अभाव इस त्रासदी को और घातक बना गया। प्रारम्भिक जांच में विद्युत शॉर्ट-सर्किट की आशंका जताई गई। मई 2022 में पश्चिमी दिल्ली के मुंडका स्थित एक व्यावसायिक भवन में आग लगने से 27 लोगों की जान चली गई। भवन के पास अग्निशमन विभाग की मंजूरी नहीं थी, पर्याप्त अग्नि सुरक्षा उपकरण नहीं थे और केवल एक सीढ़ी होने के कारण लोग सुरक्षित बाहर नहीं निकल सके। और अब जून 2026 में मालवीय नगर स्थित होटल-रेस्तरां परिसर में लगी भीषण आग ने एक बार फिर राजधानी को शोक में डुबो दिया। इस हादसे में 21 लोगों की मौत हुई, जिनमें विदेशी नागरिक भी शामिल थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कई लोगों को जान बचाने के लिए खिड़कियों से छलांग लगानी पड़ी। प्रारम्भिक जांच में आग के रेस्तरां क्षेत्र से शुरू होने की आशंका जताई गई है। घटना के बाद दिल्ली सरकार ने अग्नि सुरक्षा नियमों के उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों के खिलाफ विशेष अभियान की घोषणा की।
केवल दिल्ली नहीं, पूरा एनसीआर जोखिम में
आग की समस्या केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम की हाईराइज सोसायटियों में भी पिछले कुछ वर्षों में आग की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं। अधिकांश मामलों में जनहानि तो नहीं हुई, लेकिन इन घटनाओं ने यह संकेत दिया कि बहुमंजिला इमारतों में सुरक्षा व्यवस्था अभी भी पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि एनसीआर में तेजी से बढ़ती हाईराइज इमारतें नई चुनौती बन चुकी हैं। कई भवनों में स्प्रिंकलर सिस्टम, फायर अलार्म और हाइड्रेंट लगाए तो गए हैं, लेकिन उनके रखरखाव की स्थिति संतोषजनक नहीं है। कई बार आपातकालीन निकास मार्ग भी अवरुद्ध पाए जाते हैं।
आखिर क्यों लगती हैं इतनी आग?
दिल्ली अग्निशमन सेवा और विभिन्न जांच रिपोर्टों के अनुसार अधिकांश बड़ी आग की घटनाओं के पीछे विद्युत शॉर्ट-सर्किट प्रमुख कारण रहा है। पुराने तार, ओवरलोडिंग, अवैध बिजली कनेक्शन और बढ़ती बिजली खपत जोखिम को बढ़ाते हैं। इसके अलावा ज्वलनशील सामग्री का असुरक्षित भंडरण, अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी आग को विकराल रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञ आर.सी. शर्मा कहते हैं, “आग से होने वाली अधिकांश मौतें लपटों से नहीं, बल्कि धुएँ और दम घुटने से होती हैं। यदि भवनों में सुरक्षित निकास मार्ग और कार्यशील अलार्म सिस्टम हों तो बड़ी संख्या में जानें बचाई जा सकती हैं।” शहरी नियोजन विशेषज्ञ डॉ. संजय गुप्ता का मानना है कि फायर एनओसी प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार प्रत्येक व्यावसायिक और बहुमंजिला भवन का नियमित सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए।
सरकारी प्रयास
बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए दिल्ली सरकार और आसपास के राज्यों ने कई कदम उठाए हैं। अग्निशमन सेवाओं के आधुनिकीकरण, नए दमकल वाहनों की खरीद, हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म और विशेष बचाव उपकरणों की उपलब्धता पर जोर दिया गया है। बड़े हादसों के बाद विशेष निरीक्षण अभियान भी चलाए गए हैं। मुंडका हादसे के बाद व्यापक जांच और निरीक्षण अभियान शुरू किए गए थे, जबकि मालवीय नगर हादसे के बाद दिल्ली सरकार ने सुरक्षा नियमों के उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संकेत दिया है। हालाँकि विशेषज्ञ मानते हैं कि संसाधनों की उपलब्धता से अधिक महत्वपूर्ण उनका प्रभावी उपयोग है। यदि निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहेंगे और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर समय रहते कार्रवाई नहीं होगी तो दुर्घटनाएँ रुकना कठिन है।
कहाँ रह जाती हैं कमियाँ?
सबसे बड़ी समस्या अनुपालन की है। भवन निर्माण के समय नियमों का पालन कर लिया जाता है, लेकिन बाद में रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया जाता। कई इमारतों में अग्निशमन उपकरण वर्षों तक परीक्षण के बिना पड़े रहते हैं। पुरानी दिल्ली, सदर बाजार, गांधी नगर, खारी बावली और अनेक औद्योगिक क्षेत्रों की संकरी गलियाँ दमकल वाहनों की पहुँच को प्रभावित करती हैं। आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ प्रो. अजय मेहता कहते हैं, “भारत में अक्सर हादसे के बाद कार्रवाई होती है। जरूरत यह है कि जोखिमों की पहचान पहले की जाए और उन्हें कम करने के उपाय समय रहते लागू किए जाएँ।”
दिल्ली-एनसीआर के प्रमुख अग्निकांड
वर्ष                      स्थान                                 जनहानि
2019         करोल बाग होटल, दिल्ली                17 मृत
2019         अनाज मंडी फैक्टरी, दिल्ली             43 मृत
2022       मुंडका व्यावसायिक भवन, दिल्ली      27 मृत
2024    पूर्वी दिल्ली शिशु अस्पताल अग्निकांड    6 नवजातों की मृत्यु
2026    मालवीय नगर होटल-रेस्तरां अग्निकांड   21 मृत
2024-26 नोएडा-गाजियाबाद की हाईराइज सोसायटियों में कई बड़ी आग, भारी संपत्ति नुकसान।
आगे का रास्ता
विशेषज्ञों के अनुसार सभी व्यावसायिक और बहुमंजिला भवनों का वार्षिक फायर ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए। विद्युत प्रणाली की नियमित जाँच, मॉक ड्रिल, अग्नि सुरक्षा प्रशिक्षण और अवैध निर्माणों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई समय की आवश्यकता है। साथ ही नागरिकों को भी यह समझना होगा कि अग्नि सुरक्षा केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व है। दिल्ली-एनसीआर के अग्निकांड केवल दुर्घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि हमारी शहरी व्यवस्था की कमजोरियों का आईना हैं। करोल बाग, अनाज मंडी, मुंडका और मालवीय नगर जैसी त्रासदियाँ अलग-अलग घटनाएँ जरूर हैं, लेकिन इनके कारण लगभग समान हैं। यदि सुरक्षा मानकों का कठोरता से पालन नहीं किया गया और निगरानी व्यवस्था को मजबूत नहीं बनाया गया तो विकास की यह चमक भविष्य में और बड़े हादसों की कीमत पर हासिल होती दिखाई दे सकती है। आग लगने के बाद राहत पहुँचाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है आग लगने की नौबत ही न आने देना।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)




सोमवार, 1 जून 2026

सुमन कल्याणपुर : एक स्वर जो लता के साये में रहकर भी अमर हो गया

 

-डॉ. चेतन आनंद
भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी लोकप्रियता और योगदान निर्विवाद है, लेकिन जिनके हिस्से वह पहचान नहीं आ सकी जिसकी वे पूरी तरह अधिकारी थे। पार्श्वगायिका सुमन कल्याणपुर ऐसा ही एक नाम हैं। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग में जब लता मंगेशकर का स्वर लगभग हर नायिका की आवाज़ बन चुका था, तब सुमन कल्याणपुर ने अपनी असाधारण प्रतिभा, मधुरता और अनुशासित गायन के बल पर एक विशिष्ट स्थान बनाया। विडंबना यह रही कि उनकी आवाज़ की सबसे बड़ी विशेषता उसकी कोमलता और लता मंगेशकर से मिलती-जुलती गुणवत्ता ही उनकी पहचान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा भी बन गई।
28 जनवरी 1937 को जन्मी सुमन कल्याणपुर का मूल नाम सुमन हेमाडी था। उन्होंने बचपन से ही शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण प्राप्त किया और संगीत के प्रति उनकी रुचि ने शीघ्र ही उन्हें आकाशवाणी और फिर फिल्मी दुनिया तक पहुँचा दिया। 1950 के दशक में उन्होंने फिल्मों में गाना शुरू किया, लेकिन उस समय फिल्म संगीत के आकाश पर लता मंगेशकर का सूर्य पूरी चमक के साथ उपस्थित था। ऐसे दौर में किसी नई गायिका के लिए अपनी जगह बनाना अत्यंत कठिन था।
फिर भी सुमन कल्याणपुर ने हार नहीं मानी। उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास, शुद्धता और भावनात्मक गहराई थी कि बड़े-बड़े संगीतकार उनसे प्रभावित हुए। शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, रोशन, नौशाद, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और वसंत देसाई जैसे संगीतकारों ने उन्हें अवसर दिए। यह इस बात का प्रमाण था कि वे केवल किसी की प्रतिछाया नहीं, बल्कि स्वयं में एक समर्थ और पूर्ण कलाकार थीं।
सुमन कल्याणपुर के जीवन का सबसे चर्चित पहलू उनकी तुलना लता मंगेशकर से रहा। उनकी आवाज़ इतनी समान प्रतीत होती थी कि श्रोता ही नहीं, कभी-कभी संगीत के जानकार भी भ्रमित हो जाते थे। रेडियो पर बजने वाले अनेक गीतों को लोग वर्षों तक लता मंगेशकर का गीत समझते रहे। बाद में जब पता चला कि उन्हें सुमन कल्याणपुर ने गाया है तो लोग आश्चर्यचकित रह गए।
फिल्म ब्रह्मचारी का प्रसिद्ध गीत “आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे” इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मोहम्मद रफ़ी के साथ गाए इस गीत को आज भी अनेक लोग पहली बार सुनकर लता मंगेशकर का गीत समझ बैठते हैं। इसी प्रकार “तुमने पुकारा और हम चले आए”, “ना ना करते प्यार”, “परबतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है” और “दिल एक मंदिर है” जैसे गीतों ने उनकी लोकप्रियता को नई ऊँचाइयाँ दीं।
संगीत समीक्षकों का मानना है कि यदि सुमन कल्याणपुर किसी अन्य युग में होतीं, तो वे निस्संदेह शीर्ष गायिकाओं में गिनी जातीं। लेकिन उनका दुर्भाग्य यह था कि वे ऐसे समय में सक्रिय थीं जब लता मंगेशकर का प्रभुत्व लगभग अजेय था। तुलना का यह सिलसिला उनके पूरे करियर के साथ जुड़ा रहा। फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की और न ही किसी प्रकार की कटुता व्यक्त की।
सुमन कल्याणपुर की सफलता का एक महत्वपूर्ण अध्याय मोहम्मद रफ़ी के साथ उनकी जोड़ी है। 1960 के दशक में रॉयल्टी के मुद्दे पर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी के बीच मतभेद हो गए थे। कुछ वर्षों तक दोनों ने साथ में गीत नहीं गाए। इस दौरान कई संगीतकारों ने रफ़ी साहब के साथ सुमन कल्याणपुर को चुना। परिणामस्वरूप हिंदी फिल्म संगीत को अनेक यादगार युगल गीत मिले।
स्वयं सुमन कल्याणपुर ने एक साक्षात्कार में कहा था कि रफ़ी साहब के साथ गाना किसी विद्यालय में शिक्षा पाने जैसा था। वे रिकॉर्डिंग के दौरान अत्यंत विनम्र और सहयोगी रहते थे। रफ़ी साहब की यह विशेषता थी कि वे नए कलाकारों को सहज महसूस कराते थे। सुमन जी हमेशा उनके प्रति गहरा सम्मान व्यक्त करती रहीं।
प्रसिद्ध गीतकार और फिल्मकार गुलज़ार ने एक बार कहा था कि हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम संगीत केवल बड़े नामों का परिणाम नहीं था, बल्कि उन अनेक प्रतिभाओं का भी योगदान था जो अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहीं। यद्यपि यह टिप्पणी किसी एक कलाकार के लिए नहीं थी, लेकिन सुमन कल्याणपुर का नाम उन कलाकारों में अवश्य लिया जा सकता है जिनके बिना उस युग का संगीत अधूरा होता।
संगीत इतिहासकार राजू भारतन ने भी कई अवसरों पर लिखा कि सुमन कल्याणपुर को उनकी वास्तविक क्षमता के अनुरूप अवसर नहीं मिले। वे मानते थे कि उनकी आवाज़ की समानता ने संगीत कंपनियों और निर्माताओं को लाभ तो पहुँचाया, लेकिन कलाकार के रूप में सुमन जी की स्वतंत्र पहचान को सीमित भी किया।
इसके बावजूद सुमन कल्याणपुर का योगदान अत्यंत व्यापक है। उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी, भोजपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी गीत गाए। फिल्मी गीतों के साथ-साथ भजन, ग़ज़ल और गैर-फिल्मी संगीत में भी उनकी उपस्थिति उल्लेखनीय रही। अनुमानतः उन्होंने सात सौ से अधिक गीत रिकॉर्ड किए।
उनके व्यक्तित्व का एक और उल्लेखनीय पक्ष उनकी सादगी और विनम्रता थी। उन्होंने कभी प्रचार-प्रसार की दौड़ में स्वयं को शामिल नहीं किया। मीडिया में विवादों से दूर रहना और केवल अपने काम पर ध्यान देना उनकी आदत थी। शायद यही कारण है कि वे अपने समय की सबसे सम्मानित कलाकारों में गिनी जाती हैं।
जब उनसे बार-बार लता मंगेशकर से तुलना के बारे में पूछा जाता था, तो वे हमेशा आदरपूर्वक उत्तर देती थीं। उन्होंने अनेक अवसरों पर कहा कि युवावस्था में वे स्वयं लता जी के गीत गाकर अभ्यास करती थीं। उनके भीतर किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धात्मक कटुता नहीं थी। यह उनकी उदारता और संस्कारों का परिचायक है।
समय बीतता गया, संगीत की दुनिया बदलती गई, लेकिन सुमन कल्याणपुर के गीतों का आकर्षण कम नहीं हुआ। डिजिटल युग में जब पुराने गीतों को नई पीढ़ी ने फिर से सुनना शुरू किया, तब लोगों ने महसूस किया कि जिन गीतों को वे वर्षों से लता मंगेशकर का मानते आए थे, उनमें से कई वास्तव में सुमन कल्याणपुर के स्वर में थे। यह खोज अपने-आप में उनकी प्रतिभा की सबसे बड़ी स्वीकृति है।
भारत सरकार ने वर्ष 2023 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। संगीत जगत ने इसे एक ऐसे कलाकार को मिला सम्मान माना, जिसे बहुत पहले ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल जानी चाहिए थी। यह सम्मान केवल एक गायिका का नहीं, बल्कि उस पूरे वर्ग का सम्मान था जो उत्कृष्ट कार्य करने के बावजूद अपेक्षाकृत कम चर्चा में रहा।
आज जब हम हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग को याद करते हैं, तो यह आवश्यक है कि सुमन कल्याणपुर को केवल लता मंगेशकर की समकालीन गायिका के रूप में न देखें। उन्हें उनके अपने योगदान, उनकी अपनी शैली और उनकी अपनी उपलब्धियों के आधार पर याद किया जाना चाहिए। उन्होंने यह सिद्ध किया कि महानता केवल शीर्ष स्थान प्राप्त करने में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपनी गरिमा और गुणवत्ता बनाए रखने में निहित होती है।
सुमन कल्याणपुर का स्वर भारतीय संगीत की उस मधुर नदी की तरह है, जो बिना शोर किए निरंतर बहती रही। शायद इसी कारण वह आज भी संगीत प्रेमियों के हृदय में उतनी ही ताज़गी और आत्मीयता के साथ गूँजता है। इतिहास भले ही उन्हें वह स्थान देने में देर कर गया हो, लेकिन संगीत के सच्चे रसिकों ने उन्हें हमेशा सम्मान और प्रेम से याद रखा है। यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।
(समाप्त)

रविवार, 31 मई 2026

युवाओं में किताबें पढ़ने की संस्कृति कैसे बढ़े

 लेख-

तकनीक और इंटरनेट के इस युग में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या युवा पीढ़ी किताबों से दूर होती जा रही है? मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, वेब सीरीज और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के बढ़ते प्रभाव के बीच किताबों का स्थान क्या रह गया है? यह सच है कि युवाओं की पढ़ने की आदतों में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि किताबों का महत्व समाप्त हो रहा है। वास्तव में चुनौती किताबों के अस्तित्व की नहीं, बल्कि पढ़ने की संस्कृति को नए समय के अनुरूप ढालने की है।
युवाओं में बढ़ती अरुचि के कारण
आज का युवा सूचना के विस्फोट के दौर में जी रहा है। उसके हाथ में स्मार्टफोन है, जहां कुछ सेकंड में मनोरंजन, समाचार और ज्ञान उपलब्ध हो जाता है। इसके कारण लंबे समय तक बैठकर पुस्तक पढ़ने का धैर्य कम हुआ है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म त्वरित संतुष्टि प्रदान करते हैं। कुछ सेकंड की रील और छोटे वीडियो युवाओं का ध्यान आकर्षित करते हैं। इसके मुकाबले किताबें समय, एकाग्रता और कल्पनाशक्ति की मांग करती हैं। यही कारण है कि कई युवा पुस्तक पढ़ने को बोझिल मानने लगे हैं। इसके अतिरिक्त शिक्षा व्यवस्था भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। अधिकांश विद्यार्थियों के लिए किताबें परीक्षा पास करने का माध्यम बन गई हैं। पाठ्यक्रम से बाहर साहित्य, जीवनी, इतिहास या विज्ञान की पुस्तकें पढ़ने की प्रेरणा बहुत कम मिलती है।
फिर भी किताबों से पूरी तरह दूर नहीं हैं युवा
स्थिति का दूसरा पक्ष भी है। आज भी बड़ी संख्या में युवा उपन्यास, सेल्फ-हेल्प, करियर, उद्यमिता, मनोविज्ञान और समसामयिक विषयों की पुस्तकें पढ़ रहे हैं। ऑनलाइन पुस्तक बिक्री में लगातार वृद्धि इसका प्रमाण है। पिछले कुछ वर्षों में पुस्तक मेलों, साहित्य उत्सवों और लेखक संवाद कार्यक्रमों में युवाओं की उपस्थिति बढ़ी है। ऑडियो बुक और ई-बुक्स ने भी पढ़ने की संस्कृति को नया आयाम दिया है। अनेक युवा यात्रा के दौरान या व्यायाम करते समय ऑडियो बुक सुनते हैं। यानी समस्या किताबों के प्रति अरुचि की नहीं, बल्कि पढ़ने के स्वरूप में आए बदलाव की है।
किताबों का भविष्य क्या है?
इतिहास बताता है कि नई तकनीकों के आने से पुरानी विधाएं समाप्त नहीं होतीं, बल्कि उनका स्वरूप बदलता है। रेडियो के आने से अखबार खत्म नहीं हुए, टीवी के आने से रेडियो समाप्त नहीं हुआ और इंटरनेट के बावजूद पुस्तकें आज भी मौजूद हैं। किताबें केवल सूचना का स्रोत नहीं होतीं। वे चिंतन, कल्पना, संवेदना और व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम हैं। इंटरनेट त्वरित जानकारी दे सकता है, लेकिन गहन समझ और विचार की क्षमता अक्सर पुस्तकों से ही विकसित होती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में पुस्तकें मुद्रित और डिजिटल दोनों रूपों में मौजूद रहेंगी। ई-बुक्स और ऑडियो बुक्स का विस्तार होगा, लेकिन कागजी किताबों का आकर्षण भी बना रहेगा। पुस्तक हाथ में लेकर पढ़ने का अनुभव आज भी लाखों पाठकों को प्रिय है।
पढ़ने की आदत क्यों जरूरी है?
पुस्तकें केवल ज्ञान नहीं देतीं, बल्कि व्यक्ति का दृष्टिकोण भी विकसित करती हैं। नियमित पुस्तक-पठन से भाषा और अभिव्यक्ति में सुधार होता है। कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता बढ़ती है। एकाग्रता विकसित होती है। आलोचनात्मक सोच का विकास होता है। मानसिक तनाव कम होता है। समाज और जीवन को समझने की क्षमता बढ़ती है। यही कारण है कि दुनिया के अधिकांश सफल उद्यमी, वैज्ञानिक, लेखक और नेता नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ने की आदत रखते हैं।
युवाओं में पढ़ने की रुचि कैसे बढ़ाई जाए?
1. बचपन से पुस्तक संस्कृति विकसित की जाए-पढ़ने की आदत स्कूल या कॉलेज में अचानक नहीं बनती। परिवार में किताबों का वातावरण होना चाहिए। यदि माता-पिता स्वयं पढ़ते हैं तो बच्चे भी प्रेरित होते हैं।
2. पुस्तकालयों को आकर्षक बनाया जाए-देश के अधिकांश सार्वजनिक पुस्तकालय उपेक्षा का शिकार हैं। आधुनिक पुस्तकालयों में आरामदायक वातावरण, डिजिटल सुविधाएं और नई किताबें उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
3. पाठ्यक्रम से बाहर पढ़ने को प्रोत्साहन-विद्यालय और विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम के अतिरिक्त पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करें। पुस्तक समीक्षा, चर्चा और वाचन प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती हैं।
4. सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग-जहां युवा हैं, वहीं किताबों को पहुंचाना होगा। पुस्तक समीक्षा, लेखक परिचय और साहित्यिक सामग्री को सोशल मीडिया के माध्यम से लोकप्रिय बनाया जा सकता है।
5. स्थानीय भाषा के साहित्य को बढ़ावा-अनेक युवा अंग्रेजी पुस्तकों की ओर आकर्षित होते हैं, लेकिन अपनी मातृभाषा में उपलब्ध उत्कृष्ट साहित्य से परिचित नहीं हो पाते। हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की अच्छी पुस्तकों को युवाओं तक पहुंचाना जरूरी है।
6. साहित्यिक उत्सव और पुस्तक मेले-पुस्तक मेलों में लेखक और पाठकों का सीधा संवाद युवाओं को आकर्षित करता है। ऐसे आयोजनों को छोटे शहरों और कस्बों तक ले जाना चाहिए।
7. डिजिटल और प्रिंट का संतुलन-युवाओं को यह समझाने की आवश्यकता है कि तकनीक और पुस्तकें विरोधी नहीं हैं। ई-बुक, ऑडियो बुक और मुद्रित पुस्तकें मिलकर पढ़ने की संस्कृति को समृद्ध बना सकती हैं।
यह धारणा कि युवा पूरी तरह किताबों से दूर हो गए हैं, वास्तविकता का केवल एक हिस्सा है। सच यह है कि पढ़ने के तरीके बदल रहे हैं। चुनौती यह है कि हम पुस्तकों को युवाओं के जीवन से जोड़ने के नए रास्ते खोजें। किताबें केवल ज्ञान का भंडार नहीं, बल्कि सभ्यता की स्मृति और समाज की चेतना होती हैं। यदि हम चाहते हैं कि भविष्य की पीढ़ी विचारशील, संवेदनशील और रचनात्मक बने, तो उसे किताबों से जोड़ना ही होगा। तकनीक के युग में भी पुस्तकें अप्रासंगिक नहीं हुई हैं, बल्कि आज उनकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। क्योंकि सूचना के समुद्र में सही दिशा देने का काम अब भी किताबें ही सबसे बेहतर ढंग से कर सकती हैं।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)


शनिवार, 30 मई 2026

पहाड़ों के जंगलों में हर साल क्यों धधकती है आग?

 महत्वपूर्ण लेख-







कारण, नुकसान, सरकारी कार्रवाई और अनुत्तरित सवाल  मई और जून का महीना आते ही हिमालयी राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के जंगलों से धुएँ की खबरें आने लगती हैं। हर वर्ष हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ जाता है, वन्यजीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है, स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित होती है और करोड़ों रुपये की प्राकृतिक संपदा नष्ट हो जाती है। सवाल यह है कि आखिर पहाड़ों के जंगलों में आग की घटनाएँ सबसे अधिक मई-जून में ही क्यों होती हैं? क्या यह केवल प्राकृतिक कारणों का परिणाम है या इसके पीछे मानवीय हस्तक्षेप भी है? वन विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में आग लगने के पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं। मार्च से जून के बीच पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है। तापमान बढ़ जाता है और जंगलों में गिरी सूखी पत्तियाँ तथा घास अत्यधिक ज्वलनशील हो जाती हैं। उत्तराखंड के बड़े भूभाग में फैले चीड़ के जंगल इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं। चीड़ की सूखी सुइयाँ, जिन्हें स्थानीय भाषा में पिरूल कहा जाता है, आग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं। तेज हवाएँ इस आग को कुछ ही घंटों में कई किलोमीटर तक पहुँचा देती हैं।
हालाँकि विशेषज्ञ केवल चीड़ को दोषी नहीं मानते। उनका कहना है कि अधिकांश वनाग्नि घटनाओं के पीछे मानवजनित कारण अधिक महत्वपूर्ण हैं। वन विभाग की रिपोर्टों और विभिन्न न्यायिक मंचों पर प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार बड़ी संख्या में आग की घटनाएँ मानवीय लापरवाही अथवा जानबूझकर की गई हरकतों का परिणाम होती हैं। बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े फेंकना, सूखी घास जलाना, चरागाह तैयार करने के लिए आग लगाना, शहद या अन्य वन उपज एकत्र करने के दौरान आग का प्रयोग करना तथा कुछ मामलों में शरारतन आग लगाना भी इसके प्रमुख कारण बताए जाते हैं। एक याचिका में तो यह दावा किया गया था कि लगभग 90 प्रतिशत वनाग्नि घटनाएँ मानवजनित होती हैं।
पिछले कुछ वर्षों के आँकड़े इस समस्या की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2024 में उत्तराखंड सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया था कि राज्य में जंगलों में आग लगने की लगभग 398 घटनाएँ दर्ज की गईं। वहीं नवंबर 2023 से मई 2024 के बीच आग की 900 से अधिक घटनाओं का उल्लेख विभिन्न रिपोर्टों में किया गया। वर्ष 2026 में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। हालिया आँकड़ों के अनुसार राज्य में लगभग 400 वनाग्नि घटनाएँ दर्ज की जा चुकी हैं और सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। कई जिलों में लगातार आग लगने की घटनाओं ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
इन घटनाओं का प्रभाव केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता। वनाग्नि के कारण जैव विविधता को भारी नुकसान पहुँचता है। अनेक छोटे जीव-जंतु और पक्षी आग की चपेट में आकर मर जाते हैं। बड़े वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास छोड़ने को विवश हो जाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। आग मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को भी नष्ट कर देती है। इसके परिणामस्वरूप वर्षा होने पर मिट्टी का कटाव बढ़ जाता है और भूस्खलन की आशंका अधिक हो जाती है। पहाड़ों के जलस्रोतों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बार-बार लगने वाली आग जंगलों की जल धारण क्षमता को कम करती है, जिससे झरनों और प्राकृतिक स्रोतों का जलस्तर प्रभावित हो सकता है।
वनाग्नि का एक बड़ा प्रभाव जलवायु पर भी पड़ता है। जंगलों में लगी आग से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक गैसें वातावरण में पहुँचती हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है और वैश्विक तापवृद्धि की समस्या और गंभीर हो जाती है। विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी और सूखा वनाग्नि को बढ़ावा देते हैं, जबकि वनाग्नि स्वयं जलवायु परिवर्तन को और तीव्र बनाती है। इस प्रकार एक दुष्चक्र तैयार हो जाता है।
वन क्षेत्र को हुए नुकसान को लेकर भी विभिन्न आँकड़े सामने आए हैं। कुछ स्वतंत्र अध्ययनों और सैटेलाइट विश्लेषणों में यह संकेत मिला है कि वास्तविक रूप से प्रभावित क्षेत्र कई बार सरकारी आँकड़ों से कहीं अधिक होता है। सैटेलाइट चित्रों के आधार पर किए गए विश्लेषणों में लाखों हेक्टेयर क्षेत्र पर आग के प्रभाव के संकेत मिले हैं। इससे यह बहस भी तेज हुई है कि वनाग्नि की वास्तविक स्थिति का आकलन और अधिक पारदर्शी तथा वैज्ञानिक ढंग से किया जाना चाहिए।
इस गंभीर स्थिति पर न्यायपालिका ने भी चिंता व्यक्त की है। वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में जंगलों की आग को लेकर राज्य सरकार से कड़े सवाल पूछे थे। अदालत ने कहा कि मीडिया में भयावह तस्वीरें दिखाई दे रही हैं और यह जानना आवश्यक है कि सरकार आग रोकने के लिए क्या कदम उठा रही है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल बारिश या क्लाउड सीडिंग जैसे अस्थायी उपायों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। इसके लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक रणनीति विकसित करनी होगी।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी वनाग्नि के मामलों को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग से कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ माँगी हैं। इनमें वन कर्मियों की उपलब्धता, आपातकालीन प्रबंधन व्यवस्था, आग लगने की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली और संसाधनों की स्थिति जैसे विषय शामिल हैं। एनजीटी का मानना है कि प्रभावी प्रबंधन और जवाबदेही के बिना वनाग्नि की समस्या पर नियंत्रण संभव नहीं है। सरकारों ने भी समय-समय पर कई निर्देश जारी किए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने, फायर लाइन बनाने, ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक का उपयोग करने, स्थानीय समुदायों को जागरूक करने और वन कर्मियों की संख्या बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। कई स्थानों पर पिरूल संग्रहण को प्रोत्साहित किया गया है ताकि जंगलों में ज्वलनशील सामग्री की मात्रा कम हो सके। इसके अतिरिक्त आग लगाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं।
कार्रवाई के मोर्चे पर भी कुछ आँकड़े उल्लेखनीय हैं। राज्य सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को दी गई जानकारी के अनुसार वनाग्नि से जुड़े सैकड़ों आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं और अनेक व्यक्तियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की गई है। फिर भी यह प्रश्न बना हुआ है कि यदि हर वर्ष बड़ी संख्या में घटनाएँ मानवजनित हैं, तो दोषियों की पहचान और दंड की प्रक्रिया अभी भी अपेक्षित स्तर तक प्रभावी क्यों नहीं हो पाई है। वास्तव में वनाग्नि की समस्या केवल कानून-व्यवस्था या वन विभाग की चुनौती नहीं है। यह पर्यावरण, जल संरक्षण, जैव विविधता, पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और जनजीवन से जुड़ा हुआ विषय है। पहाड़ों के जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि वे नदियों, झरनों, वन्यजीवों और लाखों लोगों की जीवनरेखा हैं। यदि इन्हें बचाना है तो सरकार, प्रशासन, न्यायपालिका, वैज्ञानिक समुदाय और स्थानीय समाज सभी को मिलकर काम करना होगा।
हर वर्ष मई-जून में धधकते जंगल हमें यह याद दिलाते हैं कि प्रकृति के साथ लापरवाही का परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है। अब समय आ गया है कि वनाग्नि को मौसमी घटना मानकर नजरअंदाज करने के बजाय इसे राष्ट्रीय पर्यावरणीय चुनौती के रूप में देखा जाए। तभी हिमालय की हरियाली, जैव विविधता और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक धरोहर को बचाया जा सकेगा।
हाल के वर्षों में हुईं घटनाएं
2024 में उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि जंगलों में आग की 398 घटनाएं दर्ज हुईं।
2024-25 फायर सीजन रहा। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के अनुसार नवंबर 2023 से मई 2024 तक आग की 910 घटनाएं सामने आई थीं। 2026 में रिपोर्टों के अनुसार 394 से अधिक वनाग्नि घटनाएं दर्ज हुईं। 331 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जल गया। 2 से 3 लोगों की मृत्यु की सूचना सामने आई। चमोली सहित कई जिले गंभीर रूप से प्रभावित हुए।
कितना नुकसान हुआ?
2026 में ही सैकड़ों हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। वास्तविक नुकसान शायद कहीं अधिक, वन विभाग और सैटेलाइट आंकड़ों में बड़ा अंतर पाया गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2023 से जून 2024 के बीच सैटेलाइट विश्लेषण में लगभग 1.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र आग से प्रभावित दिखाई दिया, जबकि विभागीय आंकड़े इससे काफी कम थे।
कितने लोगों पर कार्रवाई हुई?
सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड सरकार ने बताया था कि जंगलों में आग से जुड़े 350 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। 62 लोगों के खिलाफ कार्रवाई, मुकदमे दर्ज किए गए। 2026 में भी राज्य सरकार ने आग लगाने वालों की गिरफ्तारी और कठोर दंड के निर्देश जारी किए हैं।

लेखक-डाॅ. चेतन आनंद (कवि एवं पत्रकार)

(लेखक ने यह लेख अल्मोड़ा यात्रा से लौटकर लिखा है। फोटो भी हाल के हैं।)  


शुक्रवार, 29 मई 2026

सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक स्थल

 लेख-

देशभर में चल रहा अभियान
बढ़ती कार्रवाई और संवेदनशील चुनौती

भारत में सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक स्थलों का मुद्दा लंबे समय से प्रशासन, राजनीति और समाज के बीच बहस का विषय रहा है। सड़कों, फुटपाथों, पार्कों, रेलवे भूमि, वनभूमि, तालाबों और ग्राम समाज की जमीनों पर मंदिर, मस्जिद, मजार, गुरुद्वारे और चर्च बनने के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कई बार छोटे पूजा स्थलों के रूप में शुरू हुए निर्माण धीरे-धीरे स्थायी धार्मिक ढाँचों में बदल जाते हैं और फिर सरकारी भूमि पर कब्जे का रूप ले लेते हैं। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने ऐसे अतिक्रमणों के खिलाफ अभियान तेज किए हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम, गुजरात, मध्य प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में प्रशासनिक कार्रवाई देखने को मिली है। सुप्रीम कोर्ट भी सार्वजनिक स्थलों पर अवैध धार्मिक निर्माणों को लेकर सख्त रुख अपना चुका है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
वर्ष 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि सार्वजनिक स्थानों पर नए धार्मिक ढाँचों के निर्माण की अनुमति न दी जाए। अदालत ने यह भी कहा था कि सड़कों, पार्कों और सरकारी भूमि पर बने अवैध धार्मिक स्थलों की पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। इसके बाद कई राज्यों ने जिला स्तरीय समितियाँ गठित कीं और सर्वेक्षण शुरू किए। हालाँकि, धार्मिक संवेदनशीलता के कारण अधिकांश राज्यों में कार्रवाई बेहद सावधानी के साथ की जाती रही है।
किन राज्यों में सबसे अधिक कार्रवाई हुई
उत्तर प्रदेश-देश में सरकारी भूमि से धार्मिक अतिक्रमण हटाने की सबसे व्यापक कार्रवाई उत्तर प्रदेश में देखने को मिली। सड़क, तालाब, ग्राम समाज और नगर निकाय की भूमि पर बने हजारों अवैध ढाँचों को चिन्हित किया गया। प्रशासन ने कई जिलों में नोटिस जारी किए और “स्वैच्छिक हटाओ” अभियान चलाया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई बार कहा कि सरकारी भूमि पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा स्वीकार नहीं किया जाएगा। हाल के अभियानों में नोएडा और ग्रेटर नोएडा में प्रशासन ने लगभग 5900 करोड़ रुपये मूल्य की सरकारी भूमि मुक्त कराने का दावा किया।
उत्तराखंड-उत्तराखंड में वनभूमि और सड़क किनारे बने अवैध धार्मिक ढाँचों पर विशेष अभियान चलाया गया। हरिद्वार, हल्द्वानी, नैनीताल और देहरादून में अवैध मजारों और मंदिरों को हटाने की कार्रवाई चर्चा में रही। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी और किसी को कानून से ऊपर नहीं माना जाएगा।
असम-असम में मुख्यमंत्री हिमन्त बिस्वा शर्मा के नेतृत्व में वनभूमि और सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने के अभियान तेज हुए। राज्य सरकार का कहना रहा कि विकास योजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकारी भूमि को मुक्त कराना आवश्यक है। कई जगह धार्मिक ढाँचों को लेकर विवाद भी सामने आए।
गुजरात और मध्य प्रदेश-गुजरात में सड़क चैड़ीकरण और नगर विकास परियोजनाओं के दौरान अनेक धार्मिक अतिक्रमण हटाए गए। अहमदाबाद और वडोदरा जैसे शहरों में प्रशासन ने सार्वजनिक भूमि खाली कराई। मध्य प्रदेश के भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में भी इसी प्रकार की कार्रवाई हुई। राज्य सरकार ने कहा कि धर्म के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
दिल्ली-दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद नगर निगमों ने सड़कों, फुटपाथों और पार्कों पर बने अवैध धार्मिक ढाँचों की पहचान शुरू की। राजधानी में कई छोटे मंदिर, मजार और अन्य ढाँचे सार्वजनिक मार्गों में बाधा के रूप में चिन्हित किए गए।
मुंबई के बांद्रा में रेलवे की बड़ी कार्रवाई-हाल के दिनों में मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित गरीब नगर क्षेत्र में पश्चिम रेलवे द्वारा चलाया गया अतिक्रमण हटाओ अभियान राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना। रेलवे प्रशासन ने दावा किया कि यह भूमि रेलवे विस्तार और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए आवश्यक है। रिपोर्टों के अनुसार, अभियान के दौरान लगभग 480 घरों और अन्य अवैध ढाँचों को हटाया गया तथा वर्षों पुराने अतिक्रमणों को तोड़ा गया। रेलवे अधिकारियों ने कहा कि कार्रवाई अदालत की अनुमति और पूर्व नोटिसों के बाद की गई। इस कार्रवाई के दौरान कुछ धार्मिक संरचनाओं को नुकसान पहुँचने की खबरों के बाद क्षेत्र में तनाव भी पैदा हुआ। विरोध प्रदर्शन और झड़पों की घटनाएँ सामने आईं, जिसके बाद भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने पुनर्वास की अपर्याप्त व्यवस्था का मुद्दा भी उठाया। यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया कि सरकारी भूमि खाली कराने की कार्रवाई केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक और धार्मिक संवेदनशीलता से भी जुड़ जाती है।
सबसे अधिक संख्या किस धार्मिक स्थल की

विभिन्न राज्यों की प्रशासनिक रिपोर्टों और मीडिया विश्लेषणों के अनुसार सरकारी भूमि पर बने अवैध धार्मिक स्थलों में सबसे अधिक संख्या मंदिरों की बताई जाती है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि भारत में मंदिरों की कुल संख्या अन्य धार्मिक स्थलों की तुलना में बहुत अधिक है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कई बार किसी पेड़, चबूतरे या छोटे पूजा स्थल से शुरुआत होती है और धीरे-धीरे वह स्थायी मंदिर का रूप ले लेता है। हालाँकि, कई राज्यों में मस्जिदों, मजारों, गुरुद्वारों और चर्चों से जुड़े भूमि विवाद भी सामने आए हैं। उत्तराखंड में अवैध मजारों को लेकर विशेष अभियान चर्चा में रहे, जबकि कुछ महानगरों में सड़क किनारे बने छोटे मंदिरों और मस्जिदों पर कार्रवाई हुई।
कितनी भूमि मुक्त कराई गई
देशभर में मुक्त कराई गई सरकारी भूमि का कोई एकीकृत राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी विभिन्न राज्यों ने हजारों हेक्टेयर भूमि से अतिक्रमण हटाने का दावा किया है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार देश के अनेक राज्यों में लाखों हेक्टेयर वनभूमि पर अतिक्रमण दर्ज है। इनमें आवासीय निर्माण, खेती, व्यावसायिक उपयोग और धार्मिक ढाँचे सभी शामिल हैं। राज्य सरकारों का कहना है कि अतिक्रमण हटाने से सड़क चैड़ीकरण, रेलवे विस्तार, जल निकासी, पार्क निर्माण और विकास योजनाओं को गति मिलती है।
राजनीतिक और सामाजिक चुनौती
धार्मिक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई प्रशासन के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहती है। किसी भी धार्मिक स्थल पर कार्रवाई से स्थानीय लोगों की भावनाएँ प्रभावित हो सकती हैं। इसी कारण कई बार प्रशासन पहले समझौते, स्थानांतरण या स्वैच्छिक हटाने का विकल्प देता है। विपक्षी दल अक्सर आरोप लगाते हैं कि कार्रवाई चयनात्मक होती है, जबकि सरकारें दावा करती हैं कि अभियान सभी धर्मों के अवैध निर्माणों के खिलाफ समान रूप से चलाए जा रहे हैं। अदालतें भी समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुकी हैं कि सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जे को केवल धार्मिक आधार पर वैध नहीं माना जा सकता। भारत में सरकारी जमीनों पर बने धार्मिक स्थलों का मुद्दा केवल अतिक्रमण का प्रश्न नहीं, बल्कि कानून, आस्था, राजनीति और प्रशासन के बीच संतुलन की बड़ी चुनौती बन चुका है। लगभग हर राज्य में ऐसे मामले मौजूद हैं और समय-समय पर अभियान चलाए जाते रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि अवैध धार्मिक ढाँचों में मंदिरों की संख्या सबसे अधिक है, लेकिन मस्जिद, मजार, गुरुद्वारे और चर्च भी विवादों में शामिल रहे हैं। मुंबई के बांद्रा में रेलवे की हालिया कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में सरकारी भूमि को मुक्त कराने की मुहिम और तेज हो सकती है। लेकिन सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रहेगी कि कानून का पालन भी हो और धार्मिक-सामाजिक संवेदनशीलता भी बनी रहे।

लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)