बुधवार, 28 जनवरी 2026

यूजीसी का नया नियम बना सत्ता के गले की फाँस

 विशेष लेख-

सियासत गर्म, सवर्णों में उबाल, क्या है निदान?
भारत में शिक्षा केवल ज्ञान का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, सत्ता-संतुलन और भविष्य-निर्माण का औज़ार भी रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में लागू अथवा प्रस्तावित नए नियमों ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि शिक्षा नीति का हर बदलाव केवल अकादमिक नहीं होता, वह गहरे सामाजिक और राजनीतिक परिणाम भी लेकर आता है। यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर में जिस तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं, उनसे स्पष्ट है कि यह विषय अब शैक्षिक परिसरों से निकलकर राजनीतिक गलियारों और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आ चुका है।
नया नियम : सुधार या असंतुलन?
यूजीसी द्वारा लाए गए नए प्रावधान, चाहे वे शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े हों, योग्यता मानकों में परिवर्तन हो या प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर, सरकार की मंशा के अनुसार “गुणवत्ता सुधार” के नाम पर प्रस्तुत किए गए हैं। किंतु आलोचकों का मानना है कि ये नियम समान अवसर की भावना को कमजोर करते हैं और पहले से मौजूद सामाजिक असंतुलन को और गहरा कर सकते हैं। एक वरिष्ठ शिक्षाविद् का कथन है “जब शिक्षा नीति समाज की वास्तविक विविधता को ध्यान में रखे बिना बनाई जाती है, तब वह सुधार नहीं, प्रतिरोध को जन्म देती है।”
सत्ता के गले की फाँस क्यों?
राजनीतिक दृष्टि से यह नया नियम सरकार के लिए दोधारी तलवार बन गया है। एक ओर सत्ता प्रतिष्ठान इसे ‘मेरिट’ और ‘गुणवत्ता’ का प्रश्न बताकर बचाव कर रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और शिक्षाविद्ों का एक बड़ा वर्ग इसे सामाजिक न्याय के विरुद्ध कदम मान रहा है। शिक्षा हमेशा से मतदाता चेतना को प्रभावित करने वाला विषय रही है। विश्वविद्यालयों में असंतोष, शिक्षकों का विरोध और छात्रों की लामबंदी किसी भी सरकार के लिए खतरे की घंटी होती है। यही कारण है कि यूजीसी का यह निर्णय सत्ता के लिए “गले की फाँस” बनता दिख रहा है। न तो इसे पूरी तरह वापस लिया जा सकता है और न ही बिना संवाद के आगे बढ़ाया जा सकता है।
सियासत क्यों हुई गर्म?
राजनीति वहाँ प्रवेश करती है जहाँ नीति जनभावनाओं को छूती है। यूजीसी के नए नियमों ने ठीक यही किया है। विपक्ष इसे “शिक्षा का केंद्रीकरण” और “संवैधानिक मूल्यों से विचलन” बता रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे “पुरानी व्यवस्था की जड़ता तोड़ने का साहसिक कदम” कह रहा है। एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार “जब शिक्षा नीति वोट बैंक से टकराती है, तब वह नीति नहीं रहती, वह सियासत बन जाती है।” यही कारण है कि संसद से लेकर सड़क तक और सोशल मीडिया से लेकर अकादमिक मंचों तक, यह मुद्दा तीखे बहस का विषय बन चुका है।
सवर्णों में उबाल : वास्तविकता या राजनीतिक आख्यान?
इस पूरे विवाद में एक प्रमुख कोण ‘सवर्ण असंतोष’ का है। एक वर्ग का मानना है कि नए नियमों से योग्यता आधारित अवसरों पर आघात हुआ है, जबकि दूसरा वर्ग इसे सदियों से चले आ रहे विशेषाधिकारों में आ रही दरार के रूप में देखता है। एक समाजशास्त्री का मत है-“सवर्ण असंतोष को केवल प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक संक्रमण की पीड़ा के रूप में देखना चाहिए।” यह उबाल केवल किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का भी है जो बदलते सामाजिक ढाँचे के साथ स्वयं को समायोजित करने में कठिनाई महसूस कर रही है।
शिक्षा बनाम सामाजिक न्याय : टकराव या संतुलन?
वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि यूजीसी का नया नियम सही है या गलत, बल्कि यह है कि क्या वह संतुलित है? क्या वह गुणवत्ता और सामाजिक न्याय दोनों को साथ लेकर चलता है? संविधान शिक्षा को केवल योग्यता का विषय नहीं, बल्कि समान अवसर का माध्यम भी मानता है। जब नीति इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बना पाती, तब असंतोष स्वाभाविक है। एक संवैधानिक विद्वान के शब्दों में “मेरिट और सामाजिक न्याय विरोधी नहीं हैं; समस्या तब होती है जब नीति उन्हें विरोधी बना देती है।”
निदान क्या है?
इस पूरे विवाद का समाधान न तो केवल विरोध में है, न ही केवल समर्थन में। निदान संवाद, पारदर्शिता और समावेशी पुनर्विचार में निहित है।
व्यापक संवाद-यूजीसी को शिक्षकों, छात्रों, सामाजिक समूहों और राज्यों के साथ खुला संवाद करना चाहिए।
चरणबद्ध लागूकरण-नियमों को एक साथ थोपने के बजाय चरणों में लागू किया जाए।
समीक्षा तंत्र-स्वतंत्र विद्वानों की समिति द्वारा नियमों की सामाजिक प्रभाव समीक्षा हो।
संवैधानिक संतुलन-गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ सामाजिक न्याय के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित हो। एक शिक्षा नीति विशेषज्ञ के अनुसार “नीति वही टिकाऊ होती है, जिसमें सुधार का साहस और सुधार की गुंजाइश दोनों मौजूद हों।”
यूजीसी का नया नियम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारत की शिक्षा, समाज और राजनीति के चौराहे पर खड़ा प्रश्न है। यदि इसे केवल सत्ता के अहं या विरोध की राजनीति से देखा गया, तो यह टकराव बढ़ाएगा। किंतु यदि इसे आत्ममंथन और सुधार के अवसर के रूप में लिया गया, तो यही विवाद भविष्य की अधिक न्यायपूर्ण और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था की नींव बन सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को युद्धभूमि नहीं, संवाद का मंच बनाया जाए। यही इस संकट का वास्तविक निदान है।

-डॉ. चेतन आनंद 
(लेखक वरिष्ठ कवि और पत्रकार है।)


मंगलवार, 6 जनवरी 2026

दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलनों और मुशायरों में गुटबाज़ी

 विशेष लेख-

दिल्ली-एनसीआर लंबे समय से हिंदी कवि सम्मेलनों और उर्दू मुशायरों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ की महफ़िलों ने देश को अनेक बड़े कवि, शायर और साहित्यिक आंदोलन दिए हैं। कभी ये मंच विचारों की उर्वर भूमि हुआ करते थे, जहाँ रचना की गुणवत्ता, संवेदना और वैचारिक गहराई ही कवि की पहचान होती थी। किंतु आज के संदर्भ में यदि ईमानदारी से देखा जाए, तो दिल्ली-एनसीआर के अधिकांश कवि सम्मेलनों और मुशायरों पर गुटबाज़ी की छाया गहराती जा रही है। यह गुटबाज़ी साहित्य से अधिक संबंधों, समीकरणों और स्वार्थों पर आधारित होती जा रही है।
गुटबाज़ी का बदलता स्वरूप
आज की गुटबाज़ी वैचारिक बहस या साहित्यिक मतभेद तक सीमित नहीं है। यह अब व्यक्तिगत निकटताओं, आयोजकों से रिश्तों, मंच संचालकों की पसंद-नापसंद और सोशल मीडिया नेटवर्किंग पर टिकी हुई है। किसी कवि या शायर का मंच पर आना कई बार उसकी रचना की ताकत से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता है कि वह किस गुट का हिस्सा है। “आप हमारे कार्यक्रम में आइए, हम आपको अपने कार्यक्रम में बुलाएँगे”, यह आपसी लेन-देन आज मंच चयन की सबसे प्रचलित कसौटी बन गई है।
वही चेहरे, वही आवाज़ें
दिल्ली, गाज़ियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद और गुरुग्राम, लगभग हर साहित्यिक आयोजन में बार-बार वही चेहरे दिखाई देते हैं। श्रोता कई बार यह महसूस करता है कि कार्यक्रम बदल गया है, पर कवि-सूची वही है। इससे न केवल मंच की विविधता समाप्त होती है, बल्कि नए और युवा रचनाकारों के लिए दरवाज़े भी बंद हो जाते हैं। अनेक प्रतिभाशाली कवि वर्षों तक मंच के बाहर खड़े रह जाते हैं, जबकि औसत रचनाएँ लिखने वाले लोग केवल गुटीय पहचान के कारण मंच पर बने रहते हैं।
युवा कवियों के लिए कठिन राह
गुटबाज़ी का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव युवा कवियों पर पड़ता है। कई आयोजनों में उनसे या तो अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा की जाती है, या फिर यह संकेत दिया जाता है कि पहले “हमारे लोगों” के कार्यक्रमों में नियमित उपस्थिति दर्ज कराइए। कई युवा कवि निराश होकर मंचीय कविता से दूरी बना लेते हैं और कुछ साहित्य से ही विमुख हो जाते हैं। यह स्थिति साहित्यिक भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।
विचारधारा की राजनीति
दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलनों में अब विचारधारात्मक गुट भी स्पष्ट दिखने लगे हैं। कुछ मंच केवल एक खास सोच या विचारधारा से जुड़े कवियों को ही आमंत्रित करते हैं। जो कवि उस वैचारिक खांचे में फिट नहीं बैठता, उसे भले ही उसकी रचना उत्कृष्ट क्यों न हो, मंच नहीं मिलता। साहित्य, जो प्रश्न पूछने और विविध दृष्टियों को स्वीकार करने की परंपरा रहा है, वह आज कई जगह संकीर्णता का शिकार होता दिख रहा है।
मंच संचालन भी गुटीय
मंच संचालन की भूमिका कभी कार्यक्रम की आत्मा हुआ करती थी। आज कई आयोजनों में मंच संचालक स्वयं किसी गुट विशेष का प्रतिनिधि बन जाता है। परिणामस्वरूप समय-वितरण असंतुलित हो जाता है। कुछ कवियों को आवश्यकता से अधिक समय, बार-बार वाहवाही और भूमिका मिलती है, जबकि कुछ को औपचारिक दो-तीन मिनट देकर निपटा दिया जाता है। श्रोता भले ही इसे सहज प्रवाह समझे, लेकिन मंच के भीतर की राजनीति साफ़ दिखाई देती है।
सम्मान और पुरस्कारों की सच्चाई
आज कवि सम्मेलनों में दिए जाने वाले अनेक सम्मान और स्मृति-चिह्न भी गुटबाज़ी की भेंट चढ़ चुके हैं। वही नाम बार-बार सम्मानित किए जाते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि सम्मान साहित्यिक योगदान का नहीं, बल्कि आयोजक से संबंधों का पुरस्कार बन गया है। इससे सम्मान की गरिमा कम होती है और वास्तविक साहित्यिक मूल्यांकन की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है।
सोशल मीडिया और गुटबाज़ी
सोशल मीडिया ने इस गुटीय संस्कृति को और मज़बूत किया है। अपने गुट के कवियों की प्रस्तुतियों को जमकर प्रचार मिलता है, जबकि दूसरे गुट की अच्छी प्रस्तुति भी अनदेखी रह जाती है। तारीफ़, साझा करना और समर्थन, सब कुछ आपसी दायरे में सिमट गया है। डिजिटल मंच, जो लोकतांत्रिक होना चाहिए था, वह भी कई बार गुटीय प्रचार का औज़ार बन गया है।
साहित्य का मंच या मनोरंजन का मेला?
गुटबाज़ी का सीधा असर कविता की प्रकृति पर भी पड़ा है। गंभीर, विचारोत्तेजक और संवेदनशील रचनाओं की जगह अब त्वरित तालियाँ बटोरने वाली रचनाएँ अधिक पसंद की जाने लगी हैं। कविता धीरे-धीरे साहित्य से खिसककर केवल मंचीय मनोरंजन बनती जा रही है। शोर, चुटकुले और सतही भावुकता कई जगह कविता पर हावी हो गए हैं।
क्या हर जगह स्थिति एक-सी है?
यह कहना भी अनुचित होगा कि हर कवि सम्मेलन या मुशायरा इसी बीमारी से ग्रस्त है। दिल्ली-एनसीआर में आज भी कुछ आयोजन ऐसे हैं जो बिना गुट, बिना शर्त और बिना पक्षपात के मंच प्रदान करते हैं। वहाँ रचना, प्रस्तुति और संवेदना को प्राथमिकता दी जाती है। किंतु ऐसे आयोजन अपवाद बनते जा रहे हैं, जबकि गुटबाज़ी धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार का रूप लेती जा रही है।
दिल्ली-एनसीआर के कवि सम्मेलन और मुशायरे आज भी जीवित हैं, सक्रिय हैं और श्रोताओं को आकर्षित करते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गुटबाज़ी ने इनके साहित्यिक चरित्र को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। जब तक आयोजक निष्पक्षता नहीं अपनाते, मंच संचालक ईमानदार नहीं होता और कवि स्वयं गुटों से ऊपर उठकर साहित्य को प्राथमिकता नहीं देते, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। साहित्य का मंच केवल तालियों और पहचान का साधन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और चेतना का वाहक होता है। यदि यह मंच संकीर्णताओं में कैद हो गया, तो नुकसान केवल कवियों का नहीं, बल्कि पूरी साहित्यिक परंपरा का होगा। आज ज़रूरत इस बात की है कि कवि सम्मेलन और मुशायरे फिर से रचना की गरिमा, विचार की स्वतंत्रता और साहित्यिक ईमानदारी की ओर लौटें।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


सोमवार, 5 जनवरी 2026

दिल्ली की कवि गोष्ठियों का सच

 विशेष लेख-

भारत की सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान में दिल्ली का विशेष स्थान रहा है। यहाँ की कवि गोष्ठियाँ कभी विचार, संवेदना और सामाजिक सरोकार की जीवंत प्रयोगशालाएँ मानी जाती थीं। हिंदी-उर्दू कविता की अनेक धाराएँ यहीं से आगे बढ़ीं। परंतु बीते एक दशक में दिल्ली की कवि गोष्ठियों का स्वरूप जिस तेजी से बदला है, उसने साहित्य प्रेमियों और गंभीर रचनाकारों को आत्ममंथन के लिए विवश कर दिया है।

आयोजन की भरमार, विचारों की कमी

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आज दिल्ली में लगभग हर सप्ताह सैकड़ों कवि गोष्ठियाँ होती हैं। सभागारों में, पार्कों में, सोसायटियों में और यहां तक कि रेस्तरां व कैफे में भी। संख्या के इस विस्फोट ने गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। कई आयोजनों में कविता का उद्देश्य आत्म-अभिव्यक्ति न होकर केवल मंच-प्रदर्शन बनकर रह गया है। कविता सुनी कम जाती है, दिखाई अधिक जाती है।

वही चेहरे, वही तालियाँ

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दिल्ली की अनेक कवि गोष्ठियों में वर्षों से घूमते वही परिचित चेहरे दिखाई देते हैं। वही रचनाएँ, वही लय, वही ठहरे हुए मुहावरे। नए और युवा कवियों के लिए मंच सीमित है। अक्सर उन्हें या तो अंतिम समय में बोलने का अवसर मिलता है या बिल्कुल नहीं। इससे साहित्य का स्वाभाविक विकास बाधित होता है और कविता एक बंद दायरे में घूमती रहती है।

श्रोता : रसिक से दर्शक तक

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पहले कवि गोष्ठी का श्रोता ‘रसिक’ होता था, जो कविता को सुनता, समझता और आत्मसात करता था। आज वह कई बार ‘दर्शक’ बन गया है, जो तालियाँ बजाता है, वीडियो बनाता है और सोशल मीडिया पर साझा करता है। गंभीर और विचारोत्तेजक कविताओं के समय बेचैनी दिखती है, जबकि तुकांत, तात्कालिक और चुटीली पंक्तियों पर तुरंत प्रतिक्रिया मिल जाती है।

साहित्य से व्यापार की ओर

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दिल्ली की कुछ कवि गोष्ठियाँ अब आस्था से अधिक आयोजन-व्यवसाय का रूप ले चुकी हैं। कहीं ‘सहयोग राशि’ के नाम पर मंच तक पहुँच सुनिश्चित की जाती है, तो कहीं प्रायोजकों के बैनर कविता से बड़े दिखाई देते हैं। यह स्थिति साहित्य की आत्मा के लिए चिंताजनक है, क्योंकि कविता का मूल्य उसकी संवेदना में होना चाहिए, न कि उसकी मार्केटिंग में।

सोशल मीडिया का दबाव

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रील और शॉर्ट वीडियो संस्कृति ने कविता की संरचना तक को प्रभावित किया है। अब कविताएँ इस सोच के साथ लिखी जा रही हैं कि कौन-सी पंक्ति वायरल होगी। गहराई, धैर्य और दीर्घ अनुभूति की जगह त्वरित प्रभाव ने ले ली है। कविता की यात्रा ‘पंक्ति’ तक सिमटती जा रही है।

दिल्ली-एनसीआर की स्थिति

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ग़ाज़ियाबाद, हापुड़ और दिल्ली-एनसीआर के अन्य क्षेत्रों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है। यहाँ मुहल्ला-स्तरीय कवि गोष्ठियाँ सामाजिक मेल-जोल का माध्यम तो बन रही हैं, पर साहित्यिक कसौटी पर सब खरा नहीं उतरता। प्रतिस्पर्धा अब रचना की नहीं, आयोजन की हो गई है।

आशा की किरण

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इस चित्र का दूसरा पहलू भी है। दिल्ली में कुछ संस्थाएँ, विश्वविद्यालयों के साहित्यिक मंच और स्वतंत्र समूह आज भी गंभीर कविताओं के लिए स्थान बना रहे हैं। यहाँ नए रचनाकारों को सुना जाता है, आलोचना होती है और संवाद जीवित रहता है। ये आयोजन कम प्रचारित होते हैं, पर साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान हैं।

क्या किया जाना चाहिए

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1.कवि गोष्ठियों में चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो

2.नवोदित कवियों के लिए निश्चित अवसर तय हों

3.श्रोताओं में कविता सुनने की संस्कृति विकसित की जाए

4.कविता को सोशल मीडिया कंटेंट से ऊपर रखा जाए

5.आयोजक साहित्य को उद्देश्य मानें, साधन नहीं

दिल्ली की कवि गोष्ठियाँ आज एक चौराहे पर खड़ी हैं। एक रास्ता बाजार, भीड़ और तात्कालिक लोकप्रियता की ओर जाता है, दूसरा साहित्यिक ईमानदारी, साधना और संवाद की ओर। यह तय करना कवियों, आयोजकों और श्रोताओं तीनों की साझा जिम्मेदारी है कि कविता मंच की शोभा भर न बने, बल्कि समाज की चेतना की आवाज़ बनी रहे।

लेखक

डॉ. चेतन आनंद

(कवि-पत्रकार)

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूल गए लोग?

 एक जनवरी बलिदान दिवस पर विशेष लेख-

भारतीय लोकतंत्र, कला और जनसंघर्ष के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ने चाहिएं, बल्कि और अधिक उज्ज्वल होने चाहिएं। सफ़दर हाशमी ऐसा ही एक नाम है। वे केवल एक रंगकर्मी या नाटककार नहीं थे, बल्कि जनता की आवाज़, शोषितों की पीड़ा और सत्ता से सवाल करने वाली चेतना थे। आज यह प्रश्न बार-बार उठता है, क्या हम सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूलते जा रहे हैं? क्या उनकी शहादत केवल स्मृति दिवसों और औपचारिक श्रद्धांजलियों तक सिमट कर रह गई है?
नुक्कड़ से उठी आवाज़
सफ़दर हाशमी ने रंगमंच को अभिजात्य सभागारों से निकालकर सड़कों और गलियों तक पहुँचाया। वे मानते थे कि असली दर्शक वही है, जो जीवन की सबसे कठोर परिस्थितियों से जूझ रहा है, मज़दूर, किसान, छात्र और आम नागरिक। नुक्कड़ नाटक उनके लिए कला का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का माध्यम था। उनके नाटक सत्ता के दंभ, पूँजी के शोषण और सामाजिक असमानता पर सीधा प्रहार करते थे। वे दर्शकों से संवाद करते थे, उपदेश नहीं देते थे।
जन नाट्य मंच और वैचारिक संघर्ष
सफ़दर हाशमी जन नाट्य मंच के प्रमुख स्तंभ थे। यह मंच केवल नाटक करने का संगठन नहीं था, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन था। ‘हल्ला बोल’, ‘मशीन’, ‘औरत’ जैसे नाटक आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे उन प्रश्नों को उठाते हैं, जिनसे समाज अक्सर मुँह मोड़ लेता है। हाशमी के लिए कला तटस्थ नहीं हो सकती थी; वह या तो शोषक के पक्ष में होती है या शोषित के।
1 जनवरी 1989ः अभिव्यक्ति पर हमला
1 जनवरी 1989 को ग़ाज़ियाबाद के साहिबाबाद क्षेत्र में जन नाट्य मंच द्वारा एक नुक्कड़ नाटक का मंचन किया जा रहा था। विषय था-मज़दूरों के अधिकार। तभी राजनीतिक हिंसा ने कला पर हमला कर दिया। सफ़दर हाशमी को बेरहमी से पीटा गया। अगले दिन 2 जनवरी को उन्होंने दम तोड़ दिया। यह केवल एक कलाकार की हत्या नहीं थी, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किया गया सुनियोजित प्रहार था।
क्या समाज सचमुच शोकाकुल हुआ?
उस समय देशभर में आक्रोश फैला। कलाकारों, बुद्धिजीवियों और आम लोगों ने इस हत्या की निंदा की। लेकिन समय के साथ सवाल उठता है-क्या यह आक्रोश टिकाऊ था? क्या हमने इस घटना से सबक लिया? या फिर हम भीड़ की तरह कुछ दिनों का शोर मचाकर चुप हो गए?
विस्मृति के कारण
आज सफ़दर हाशमी की चर्चा सीमित दायरे में सिमटती दिखती है। इसके कई कारण हैं। पहला, तेज़ी से बदलता समय, सोशल मीडिया और तात्कालिक सूचनाओं के युग में गहन वैचारिक विमर्श के लिए धैर्य कम होता जा रहा है। दूसरा, सुविधाजनक चुप्पी, सत्ता को सवाल पूछने वाले कलाकार असहज करते हैं, इसलिए उन्हें भुला देना आसान होता है। तीसरा, औपचारिक स्मरण, हमने स्मृति को रस्म बना दिया है। माल्यार्पण, गोष्ठी और दो भाषण, बस यहीं तक सीमित। चौथा, शिक्षा से दूरी, हमारे पाठ्यक्रमों में सफ़दर हाशमी जैसे जनपक्षधर कलाकारों को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे।
आज के दौर में सफ़दर हाशमी
आज जब असहमति को देशद्रोह समझ लिया जाता है, जब कलाकारों और लेखकों को डराया जाता है, तब सफ़दर हाशमी और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि सवाल पूछने की आज़ादी से जीवित रहता है। अगर कला सत्ता की प्रशंसा तक सीमित हो जाए, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है।
क्या नई पीढ़ी जानती है?
यह चिंता का विषय है कि नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा सफ़दर हाशमी के नाम और काम से अपरिचित है। वे चे ग्वेरा या वैश्विक प्रतीकों को तो जानते हैं, लेकिन अपने ही देश के उस कलाकार को नहीं, जिसने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए जान दे दी। यह केवल पीढ़ी की भूल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक विफलता है।
सक्रिय स्मरण की ज़रूरत
सफ़दर हाशमी को याद करने का अर्थ केवल उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना नहीं है। उनका असली स्मरण तब होगा, जब नुक्कड़ नाटक फिर से सड़कों पर लौटेंगे, कलाकार सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस करेंगे, शिक्षा में कला और विचार को साथ-साथ महत्व मिलेगा और समाज असहमति को दुश्मनी नहीं, लोकतंत्र की ताक़त मानेगा।
साहित्य और रंगमंच की जिम्मेदारी
आज के साहित्यकार और रंगकर्मी पर यह नैतिक दायित्व है कि वे हाशमी की परंपरा को आगे बढ़ाएँ। यह ज़रूरी नहीं कि हर कलाकार वही भाषा या शैली अपनाए, लेकिन जनपक्षधर दृष्टि बनाए रखना अनिवार्य है। अगर कला केवल पुरस्कार, मंच और तालियों की भूखी हो जाए, तो सफ़दर हाशमी की शहादत व्यर्थ लगने लगेगी। तो क्या लोग सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूल गए हैं? शायद पूरी तरह नहीं, लेकिन खतरा ज़रूर है। स्मृतियाँ तभी जीवित रहती हैं, जब उन्हें कर्म में बदला जाए। सफ़दर हाशमी का जीवन और मृत्यु हमें यह सिखाती है कि कला, विचार और साहस, तीनों एक साथ चलें, तभी लोकतंत्र मज़बूत होता है। यदि हम उनके सवालों को जीवित रखते हैं, तो वे हमारे बीच हैं। अगर नहीं तो इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

अटल बिहारी वाजपेयी का बहुमुखी व्यक्तित्व

 जन्म जयंती पर विशेष लेख-

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के ऐसे युगपुरुष थे, जिनका व्यक्तित्व अनेक आयामों से सुसज्जित था। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि कवि, विचारक, ओजस्वी वक्ता, कुशल प्रशासक और मानवीय मूल्यों के सजग प्रहरी थे। उनके जीवन और कृतित्व में राजनीति की कठोरता के साथ कविता की कोमलता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यही कारण है कि वे सत्ता में रहते हुए भी सर्वमान्य बने रहे और सत्ता से बाहर रहते हुए भी उतने ही सम्मानित रहे।
प्रारंभिक जीवन और वैचारिक निर्माण
अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन सादगी, संघर्ष और अनुशासन से निर्मित हुआ। छात्र जीवन से ही उनमें राष्ट्रसेवा की भावना प्रबल थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभक्ति के संस्कार पाए। यही संस्कार आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की रीढ़ बने। वे विचारों में दृढ़ थे, किंतु दृष्टि में उदार, और यही संतुलन उन्हें अन्य राजनेताओं से अलग करता है।
राजनीतिक जीवनः सिद्धांतों की राजनीति
अटल जी का राजनीतिक जीवन अवसरवाद नहीं, बल्कि सिद्धांतनिष्ठा का उदाहरण रहा। वे लंबे समय तक विपक्ष में रहे, किंतु कभी भी मर्यादा नहीं छोड़ी। संसद में उनकी भूमिका केवल विरोध करने की नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझाव देने की रही। वे मानते थे कि लोकतंत्र की मजबूती सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। तीन बार प्रधानमंत्री बनना उनके व्यक्तित्व पर जनता के अटूट विश्वास का प्रमाण है, विशेषकर गठबंधन राजनीति के कठिन दौर में।
प्रधानमंत्री के रूप में दूरदर्शी नेतृत्व
प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने साहसिक और ऐतिहासिक निर्णय लिए। पोखरण परमाणु परीक्षण ने भारत को सामरिक दृष्टि से आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। इसके साथ ही उन्होंने यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि भारत शांति का पक्षधर है, परंतु अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। उनके कार्यकाल में सड़क, संचार और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना ने देश के आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति दी। उनका शासन ‘कम बोलो, ज़्यादा काम करो’ की भावना से प्रेरित था।
विदेश नीतिः संवाद और संतुलन
अटल जी की विदेश नीति का मूल मंत्र था-संवाद, संतुलन और सम्मान। उन्होंने पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने की ईमानदार कोशिश की। बस कूटनीति के माध्यम से शांति का संदेश देना उनके दूरदर्शी नेतृत्व का प्रतीक था। वैश्विक मंचों पर भारत की स्वतंत्र और आत्मसम्मान से भरी आवाज़ उनके नेतृत्व में और अधिक सशक्त हुई। वे मानते थे कि राष्ट्रों के संबंध केवल कूटनीति से नहीं, बल्कि मानवीय संपर्क से भी मजबूत होते हैं।
ओजस्वी वक्ता और संसदीय गरिमा
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय संसद के सर्वश्रेष्ठ वक्ताओं में गिने जाते हैं। उनकी वाणी में ओज, तर्क और शालीनता का अनूठा संतुलन था। वे तीखे से तीखे विषय को भी सौम्यता और विनोद के साथ प्रस्तुत करते थे। उनके भाषणों में तथ्यात्मक मजबूती के साथ भावनात्मक अपील होती थी। यही कारण था कि उनके विरोधी भी उनके भाषण सुनने को उत्सुक रहते थे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि असहमति भी सम्मानजनक हो सकती है।
कवि-हृदय और साहित्यिक व्यक्तित्व
अटल जी का कवि-हृदय उनके व्यक्तित्व का सबसे संवेदनशील पक्ष था। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, जीवन-संघर्ष, मानवीय करुणा और आशा का स्वर मुखर है। “हार नहीं मानूँगा” जैसी पंक्तियाँ उनके जीवन-दर्शन का घोष बन गईं। राजनीति की कठोरता के बीच कविता उनके लिए आत्मसंवाद का माध्यम थी। उनकी कविताएँ बताती हैं कि सत्ता के शिखर पर बैठा व्यक्ति भी भीतर से कितना संवेदनशील हो सकता है।
मानवीय मूल्य और व्यक्तिगत सादगी
अटल बिहारी वाजपेयी का निजी जीवन सादगी, संयम और विनम्रता का उदाहरण था। सत्ता और वैभव के बीच रहते हुए भी उन्होंने कभी अहंकार को स्थान नहीं दिया। उनके व्यवहार में करुणा, सहिष्णुता और उदारता स्पष्ट दिखाई देती थी। वे मतभेदों के बीच भी मनभेद नहीं होने देते थे। यही गुण उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि सच्चा लोकनायक बनाता है।
लोकतंत्र के सजग प्रहरी
अटल जी लोकतंत्र को केवल शासन-प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य मानते थे। वे प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की गरिमा और संसदीय परंपराओं के संरक्षण के प्रति सदैव सचेत रहे। उनका विश्वास था कि मजबूत लोकतंत्र वही है जिसमें असहमति का सम्मान हो, संवाद की गुंजाइश बनी रहे और सत्ता जवाबदेह हो। उन्होंने अपने आचरण से लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त किया।
विरासत और प्रेरणा
अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत केवल नीतियों या योजनाओं तक सीमित नहीं है। उनकी सबसे बड़ी देन है-राजनीति में नैतिकता, संवाद में शालीनता और सत्ता में संवेदना। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश छोड़ गए कि राजनीति को भी मानवीय बनाया जा सकता है।
अटल बिहारी वाजपेयी का बहुमुखी व्यक्तित्व भारतीय लोकतंत्र की अमूल्य धरोहर है। वे राजनीति में कविता की कोमलता और कविता में राजनीति की जिम्मेदारी लेकर आए। उनका जीवन इस सत्य को प्रमाणित करता है कि दृढ़ सिद्धांतों के साथ उदार हृदय और मानवीय संवेदना संभव है। अटल जी न केवल अपने समय के महान नेता थे, बल्कि वे सदैव भारत की आत्मा में जीवित रहने वाली प्रेरणा हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


रविवार, 21 दिसंबर 2025

लोकतंत्र की पाठशाला थे अटल जी

 25 दिसम्बर अटल जी के जन्मदिन पर विशेष लेख-


अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम हैं, जिनके साथ ‘क़िस्से’ केवल रोचक घटनाएँ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कारों की सीख भी हैं। उनके जीवन से जुड़े प्रसंग बताते हैं कि सत्ता में रहते हुए भी विनम्रता, संवाद और मानवीयता कैसे बचाए रखी जा सकती है। अटल जी के क़िस्से आज के शोरगुल भरे राजनीतिक माहौल में शालीनता का पाठ पढ़ाते हैं।
विरोध का सम्मानः संसद से सड़क तक
संसद में तीखी बहस के दौरान जब शोर-शराबा बढ़ जाता, अटल जी मुस्कराकर माहौल हल्का कर देते। एक बार विपक्ष के तीखे प्रहार पर उन्होंने कहा “लोकतंत्र में विरोध सरकार की कमजोरी नहीं, ताक़त होता है।” यह वाक्य केवल एक तात्कालिक टिप्पणी नहीं था, बल्कि उनके राजनीतिक दर्शन का सार था। वे असहमति को भी संवाद में बदलने की कला जानते थे।
ऐतिहासिक भाषणः देश पहले
1996 में विश्वास मत हारने के बाद संसद में दिया गया उनका वक्तव्य आज भी उद्धृत किया जाता है, “सरकारें आती-जाती रहती हैं, पार्टियाँ बनती-बिगड़ती रहती हैं, लेकिन देश रहना चाहिए।” यह क़िस्सा बताता है कि सत्ता उनके लिए साध्य नहीं, साधन थी; राष्ट्र सर्वोपरि था।
लाहौर बस यात्राः साहस का संदेश
जब अटल जी लाहौर बस यात्रा पर निकले, तो आलोचनाएँ भी हुईं। लेकिन उनका उत्तर सरल और दूरदर्शी था, “मित्र बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं।” यह प्रसंग बताता है कि वे जोखिम उठाने से नहीं घबराते थे, यदि उद्देश्य शांति और संवाद हो। उनके लिए कूटनीति केवल समझौते नहीं, भरोसे की पहल थी।
कवि का मन, प्रधानमंत्री का दायित्व
एक कार्यक्रम में उनसे पूछा गया, आप पहले क्या हैं, कवि या प्रधानमंत्री? अटल जी का उत्तर था, “प्रधानमंत्री संयोग से हूँ, कवि स्वभाव से।” सत्ता के उच्च शिखर पर बैठा व्यक्ति भी भीतर से संवेदनशील रचनाकार हो सकता है, यह क़िस्सा इसी सच्चाई को रेखांकित करता है।
हार में भी गरिमा
चुनावी पराजय के बाद कार्यकर्ताओं में निराशा थी। अटल जी ने कहाकृ?, “हार हमें और बेहतर बनने का अवसर देती है।” राजनीति में हार को भी सीख मानने का यह दृष्टिकोण उन्हें विशिष्ट बनाता है। वे जीत में संयमी और हार में धैर्यवान थे।
सादगी का प्रसंग
प्रधानमंत्री रहते हुए भी उनका जीवन सादा रहा। बताया जाता है कि देर रात तक फाइलों पर काम के बाद वे कुछ पंक्तियाँ लिख लेते थे, कविता उनके लिए थकान की दवा थी। यह क़िस्सा बताता है कि सत्ता उनके स्वभाव को नहीं बदल सकी।
विरोधी भी प्रशंसक
एक वरिष्ठ विपक्षी नेता का कथन चर्चित है, “हम अटल जी से राजनीतिक असहमति रख सकते हैं, लेकिन उनका अपमान नहीं कर सकते।” यह प्रसंग दर्शाता है कि उनका व्यक्तित्व दलगत सीमाओं से ऊपर था।
युवाओं के नाम संदेश
एक छात्र ने राजनीति में सफलता का सूत्र पूछा। अटल जी बोले, “पहले अच्छा इंसान बनो, नेता अपने आप बन जाओगे।” यह छोटा-सा क़िस्सा उनके जीवन-दर्शन को संक्षेप में रख देता है।
अटल बिहारी वाजपेयी के क़िस्से केवल स्मृतियाँ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पाठशाला हैं। वे सिखाते हैं कि दृढ़ विचारों के साथ भी शालीनता संभव है, सत्ता के साथ भी संवेदना बची रह सकती है। आज जब राजनीति में कटुता बढ़ रही है, अटल जी के ये प्रसंग हमें याद दिलाते हैं कि संवाद, सम्मान और संयम ही लोकतंत्र की असली ताक़त हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


बुधवार, 17 दिसंबर 2025

जानलेवा कोहरा बना राष्ट्रीय चुनौती

 लेख-

भयावह आंकड़े, नुकसान और भविष्य की चेतावनी
भारत में सर्दी का मौसम आते ही एक अदृश्य लेकिन अत्यंत घातक संकट जन्म लेता है, घना कोहरा। यह केवल मौसम की सामान्य स्थिति नहीं रहा, बल्कि अब यह जान-माल के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। हर वर्ष दिसंबर से जनवरी के बीच देश के अनेक हिस्सों में कोहरा सड़क, रेल और हवाई यातायात को बुरी तरह प्रभावित करता है। इसके कारण सैकड़ों लोग अपनी जान गंवाते हैं और हजारों घायल होते हैं। हाल के वर्षों में कोहरे से जुड़ी दुर्घटनाओं के आंकड़े इस समस्या की भयावहता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
भारत में कोहरे से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र
उत्तर भारत सबसे अधिक प्रभावित-दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड के तराई क्षेत्र कोहरे से सबसे अधिक प्रभावित रहते हैं। दिल्ली, नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, गुरुग्राम और फ़रीदाबाद में कई बार दृश्यता 20 से 50 मीटर तक सिमट जाती है। उत्तर प्रदेश के आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे, मेरठ, मुरादाबाद, बरेली और कानपुर क्षेत्र में कोहरे के कारण बार-बार बड़े हादसे होते हैं। हरियाणा के करनाल, पानीपत, रोहतक, अंबाला और रेवाड़ी तथा पंजाब के लुधियाना और जालंधर में भी कोहरा जानलेवा साबित होता है।
अन्य क्षेत्र-उत्तराखंड के रुद्रपुर, काशीपुर, हरिद्वार जैसे तराई इलाकों में सुबह के समय घना कोहरा जनजीवन ठप कर देता है। हाल के वर्षों में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी कोहरे से दुर्घटनाएँ दर्ज की गई हैं।
कोहरे से होने वाली दुर्घटनाओं के भयावह आंकड़े
सरकारी और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कोहरा अब एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा संकट बन चुका है। भारत में हर साल 30,000 से अधिक सड़क दुर्घटनाएँ सीधे तौर पर कोहरे या अत्यधिक धुंध के कारण होती हैं। औसतन सर्दियों के मौसम में प्रतिदिन 14 लोगों की मौत कोहरे से जुड़ी दुर्घटनाओं में होती है। वर्ष 2019 में कोहरे के कारण लगभग 35,600 से अधिक सड़क हादसे दर्ज किए गए। वर्ष 2020 में यह संख्या घटकर 26,500 के आसपास रही, लेकिन इसके बाद फिर बढ़ने लगी। 2014 से 2021 के बीच कोहरे से जुड़ी दुर्घटनाओं में 5,700 से अधिक लोगों की मौत और 4,000 से अधिक लोग घायल हुए। अकेले 2021 में कोहरे से संबंधित सड़क हादसों में 13,000 से अधिक लोगों की जान गई।
हालिया घटनाएँ-यमुना एक्सप्रेसवे पर कोहरे के कारण हुई एक भीषण दुर्घटना में 13 लोगों की मौत और 100 से अधिक लोग घायल हुए। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर कोहरे से हुई चेन-कोलिजन में 4 लोगों की जान चली गई। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड में केवल कुछ ही दिनों में कोहरे से 20 से अधिक मौतें दर्ज की गईं। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि कोहरा केवल असुविधा नहीं, बल्कि घातक आपदा बन चुका है।
जान-माल और आर्थिक नुकसान
सड़क दुर्घटनाएँ-कोहरे में दृश्यता अचानक बहुत कम हो जाती है। चालक आगे चल रहे वाहन, मोड़ या अवरोध को समय पर नहीं देख पाते, जिससे मल्टी-व्हीकल टक्कर, बस और ट्रक पलटना, दोपहिया वाहन चालकों की मौत, पैदल यात्रियों का कुचला जाना
जैसी घटनाएँ होती हैं।
रेल और हवाई यातायात-कोहरे के कारण ट्रेनें कई-कई घंटे लेट होती हैं, सैकड़ों उड़ानें देरी से चलती हैं या रद्द हो जाती हैं, यात्रियों को भारी असुविधा और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।
आर्थिक प्रभाव माल ढुलाई प्रभावित होती है। उद्योगों और व्यापार की गति धीमी पड़ जाती है। स्कूल, कॉलेज और कार्यालय देर से खुलते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कोहरा हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का अप्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान करता है।
स्वास्थ्य पर असर-कोहरा जब प्रदूषण के साथ मिलकर स्मॉग बनता है, तब दमा और अस्थमा के मरीजों की हालत बिगड़ती है। आँखों में जलन, एलर्जी और साँस की तकलीफ़ बढ़ती है। बच्चों और बुज़ुर्गों को विशेष खतरा होता है।
कोहरे के प्रमुख कारण
1. तापमान में तेज़ गिरावट
2. हवा की गति का कम होना
3. वातावरण में अधिक नमी
4. प्रदूषण और धूल कण
5. बढ़ता शहरीकरण और वाहन उत्सर्जन
प्रदूषण कोहरे को अधिक घना और लंबे समय तक टिकाऊ बना देता है, जिससे खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
कोहरे में सुरक्षा के आवश्यक उपाय-सड़क पर वाहन धीमी गति से चलाएँ। फॉग लाइट और लो-बीम हेडलाइट का प्रयोग करें। हाई-बीम का उपयोग न करें। आगे चल रही गाड़ी से पर्याप्त दूरी रखें। अत्यधिक कोहरे में यात्रा टाल दें। यात्रा से पहले मौसम विभाग की चेतावनी देखें। रात और सुबह तड़के यात्रा से बचें। वैकल्पिक समय और मार्ग अपनाएँ।
स्वास्थ्य सुरक्षा
बुज़ुर्ग, बच्चे और श्वास रोगी सुबह बाहर न निकलें
मास्क और चश्मे का उपयोग करें
भविष्य में कोहरे की स्थिति-मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण के कारण आने वाले वर्षों में कोहरे की अवधि और तीव्रता बढ़ सकती है। उत्तर भारत में लंबे समय तक घना कोहरा छाया रह सकता है। दुर्घटनाओं का जोखिम और बढ़ेगा। यदि प्रदूषण नियंत्रण, सड़क सुरक्षा तकनीक और जन-जागरूकता पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कोहरा भविष्य में और अधिक जानलेवा बन सकता है। कोहरा अब मौसम की साधारण घटना नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती बन चुका है। हर साल हजारों दुर्घटनाएँ, सैकड़ों मौतें और भारी आर्थिक नुकसान इसकी भयावहता को दर्शाते हैं। सरकार, प्रशासन और नागरिक तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि सावधानी, तकनीक और जागरूकता के माध्यम से इस संकट से निपटा जाए। कोहरे में सावधानी ही जीवन की सुरक्षा है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)