मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूल गए लोग?

 एक जनवरी बलिदान दिवस पर विशेष लेख-

भारतीय लोकतंत्र, कला और जनसंघर्ष के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ने चाहिएं, बल्कि और अधिक उज्ज्वल होने चाहिएं। सफ़दर हाशमी ऐसा ही एक नाम है। वे केवल एक रंगकर्मी या नाटककार नहीं थे, बल्कि जनता की आवाज़, शोषितों की पीड़ा और सत्ता से सवाल करने वाली चेतना थे। आज यह प्रश्न बार-बार उठता है, क्या हम सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूलते जा रहे हैं? क्या उनकी शहादत केवल स्मृति दिवसों और औपचारिक श्रद्धांजलियों तक सिमट कर रह गई है?
नुक्कड़ से उठी आवाज़
सफ़दर हाशमी ने रंगमंच को अभिजात्य सभागारों से निकालकर सड़कों और गलियों तक पहुँचाया। वे मानते थे कि असली दर्शक वही है, जो जीवन की सबसे कठोर परिस्थितियों से जूझ रहा है, मज़दूर, किसान, छात्र और आम नागरिक। नुक्कड़ नाटक उनके लिए कला का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का माध्यम था। उनके नाटक सत्ता के दंभ, पूँजी के शोषण और सामाजिक असमानता पर सीधा प्रहार करते थे। वे दर्शकों से संवाद करते थे, उपदेश नहीं देते थे।
जन नाट्य मंच और वैचारिक संघर्ष
सफ़दर हाशमी जन नाट्य मंच के प्रमुख स्तंभ थे। यह मंच केवल नाटक करने का संगठन नहीं था, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन था। ‘हल्ला बोल’, ‘मशीन’, ‘औरत’ जैसे नाटक आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे उन प्रश्नों को उठाते हैं, जिनसे समाज अक्सर मुँह मोड़ लेता है। हाशमी के लिए कला तटस्थ नहीं हो सकती थी; वह या तो शोषक के पक्ष में होती है या शोषित के।
1 जनवरी 1989ः अभिव्यक्ति पर हमला
1 जनवरी 1989 को ग़ाज़ियाबाद के साहिबाबाद क्षेत्र में जन नाट्य मंच द्वारा एक नुक्कड़ नाटक का मंचन किया जा रहा था। विषय था-मज़दूरों के अधिकार। तभी राजनीतिक हिंसा ने कला पर हमला कर दिया। सफ़दर हाशमी को बेरहमी से पीटा गया। अगले दिन 2 जनवरी को उन्होंने दम तोड़ दिया। यह केवल एक कलाकार की हत्या नहीं थी, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किया गया सुनियोजित प्रहार था।
क्या समाज सचमुच शोकाकुल हुआ?
उस समय देशभर में आक्रोश फैला। कलाकारों, बुद्धिजीवियों और आम लोगों ने इस हत्या की निंदा की। लेकिन समय के साथ सवाल उठता है-क्या यह आक्रोश टिकाऊ था? क्या हमने इस घटना से सबक लिया? या फिर हम भीड़ की तरह कुछ दिनों का शोर मचाकर चुप हो गए?
विस्मृति के कारण
आज सफ़दर हाशमी की चर्चा सीमित दायरे में सिमटती दिखती है। इसके कई कारण हैं। पहला, तेज़ी से बदलता समय, सोशल मीडिया और तात्कालिक सूचनाओं के युग में गहन वैचारिक विमर्श के लिए धैर्य कम होता जा रहा है। दूसरा, सुविधाजनक चुप्पी, सत्ता को सवाल पूछने वाले कलाकार असहज करते हैं, इसलिए उन्हें भुला देना आसान होता है। तीसरा, औपचारिक स्मरण, हमने स्मृति को रस्म बना दिया है। माल्यार्पण, गोष्ठी और दो भाषण, बस यहीं तक सीमित। चौथा, शिक्षा से दूरी, हमारे पाठ्यक्रमों में सफ़दर हाशमी जैसे जनपक्षधर कलाकारों को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे।
आज के दौर में सफ़दर हाशमी
आज जब असहमति को देशद्रोह समझ लिया जाता है, जब कलाकारों और लेखकों को डराया जाता है, तब सफ़दर हाशमी और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि सवाल पूछने की आज़ादी से जीवित रहता है। अगर कला सत्ता की प्रशंसा तक सीमित हो जाए, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है।
क्या नई पीढ़ी जानती है?
यह चिंता का विषय है कि नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा सफ़दर हाशमी के नाम और काम से अपरिचित है। वे चे ग्वेरा या वैश्विक प्रतीकों को तो जानते हैं, लेकिन अपने ही देश के उस कलाकार को नहीं, जिसने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए जान दे दी। यह केवल पीढ़ी की भूल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक विफलता है।
सक्रिय स्मरण की ज़रूरत
सफ़दर हाशमी को याद करने का अर्थ केवल उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना नहीं है। उनका असली स्मरण तब होगा, जब नुक्कड़ नाटक फिर से सड़कों पर लौटेंगे, कलाकार सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस करेंगे, शिक्षा में कला और विचार को साथ-साथ महत्व मिलेगा और समाज असहमति को दुश्मनी नहीं, लोकतंत्र की ताक़त मानेगा।
साहित्य और रंगमंच की जिम्मेदारी
आज के साहित्यकार और रंगकर्मी पर यह नैतिक दायित्व है कि वे हाशमी की परंपरा को आगे बढ़ाएँ। यह ज़रूरी नहीं कि हर कलाकार वही भाषा या शैली अपनाए, लेकिन जनपक्षधर दृष्टि बनाए रखना अनिवार्य है। अगर कला केवल पुरस्कार, मंच और तालियों की भूखी हो जाए, तो सफ़दर हाशमी की शहादत व्यर्थ लगने लगेगी। तो क्या लोग सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूल गए हैं? शायद पूरी तरह नहीं, लेकिन खतरा ज़रूर है। स्मृतियाँ तभी जीवित रहती हैं, जब उन्हें कर्म में बदला जाए। सफ़दर हाशमी का जीवन और मृत्यु हमें यह सिखाती है कि कला, विचार और साहस, तीनों एक साथ चलें, तभी लोकतंत्र मज़बूत होता है। यदि हम उनके सवालों को जीवित रखते हैं, तो वे हमारे बीच हैं। अगर नहीं तो इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

अटल बिहारी वाजपेयी का बहुमुखी व्यक्तित्व

 जन्म जयंती पर विशेष लेख-

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के ऐसे युगपुरुष थे, जिनका व्यक्तित्व अनेक आयामों से सुसज्जित था। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि कवि, विचारक, ओजस्वी वक्ता, कुशल प्रशासक और मानवीय मूल्यों के सजग प्रहरी थे। उनके जीवन और कृतित्व में राजनीति की कठोरता के साथ कविता की कोमलता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यही कारण है कि वे सत्ता में रहते हुए भी सर्वमान्य बने रहे और सत्ता से बाहर रहते हुए भी उतने ही सम्मानित रहे।
प्रारंभिक जीवन और वैचारिक निर्माण
अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन सादगी, संघर्ष और अनुशासन से निर्मित हुआ। छात्र जीवन से ही उनमें राष्ट्रसेवा की भावना प्रबल थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभक्ति के संस्कार पाए। यही संस्कार आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की रीढ़ बने। वे विचारों में दृढ़ थे, किंतु दृष्टि में उदार, और यही संतुलन उन्हें अन्य राजनेताओं से अलग करता है।
राजनीतिक जीवनः सिद्धांतों की राजनीति
अटल जी का राजनीतिक जीवन अवसरवाद नहीं, बल्कि सिद्धांतनिष्ठा का उदाहरण रहा। वे लंबे समय तक विपक्ष में रहे, किंतु कभी भी मर्यादा नहीं छोड़ी। संसद में उनकी भूमिका केवल विरोध करने की नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझाव देने की रही। वे मानते थे कि लोकतंत्र की मजबूती सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। तीन बार प्रधानमंत्री बनना उनके व्यक्तित्व पर जनता के अटूट विश्वास का प्रमाण है, विशेषकर गठबंधन राजनीति के कठिन दौर में।
प्रधानमंत्री के रूप में दूरदर्शी नेतृत्व
प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने साहसिक और ऐतिहासिक निर्णय लिए। पोखरण परमाणु परीक्षण ने भारत को सामरिक दृष्टि से आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। इसके साथ ही उन्होंने यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि भारत शांति का पक्षधर है, परंतु अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। उनके कार्यकाल में सड़क, संचार और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना ने देश के आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति दी। उनका शासन ‘कम बोलो, ज़्यादा काम करो’ की भावना से प्रेरित था।
विदेश नीतिः संवाद और संतुलन
अटल जी की विदेश नीति का मूल मंत्र था-संवाद, संतुलन और सम्मान। उन्होंने पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने की ईमानदार कोशिश की। बस कूटनीति के माध्यम से शांति का संदेश देना उनके दूरदर्शी नेतृत्व का प्रतीक था। वैश्विक मंचों पर भारत की स्वतंत्र और आत्मसम्मान से भरी आवाज़ उनके नेतृत्व में और अधिक सशक्त हुई। वे मानते थे कि राष्ट्रों के संबंध केवल कूटनीति से नहीं, बल्कि मानवीय संपर्क से भी मजबूत होते हैं।
ओजस्वी वक्ता और संसदीय गरिमा
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय संसद के सर्वश्रेष्ठ वक्ताओं में गिने जाते हैं। उनकी वाणी में ओज, तर्क और शालीनता का अनूठा संतुलन था। वे तीखे से तीखे विषय को भी सौम्यता और विनोद के साथ प्रस्तुत करते थे। उनके भाषणों में तथ्यात्मक मजबूती के साथ भावनात्मक अपील होती थी। यही कारण था कि उनके विरोधी भी उनके भाषण सुनने को उत्सुक रहते थे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि असहमति भी सम्मानजनक हो सकती है।
कवि-हृदय और साहित्यिक व्यक्तित्व
अटल जी का कवि-हृदय उनके व्यक्तित्व का सबसे संवेदनशील पक्ष था। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, जीवन-संघर्ष, मानवीय करुणा और आशा का स्वर मुखर है। “हार नहीं मानूँगा” जैसी पंक्तियाँ उनके जीवन-दर्शन का घोष बन गईं। राजनीति की कठोरता के बीच कविता उनके लिए आत्मसंवाद का माध्यम थी। उनकी कविताएँ बताती हैं कि सत्ता के शिखर पर बैठा व्यक्ति भी भीतर से कितना संवेदनशील हो सकता है।
मानवीय मूल्य और व्यक्तिगत सादगी
अटल बिहारी वाजपेयी का निजी जीवन सादगी, संयम और विनम्रता का उदाहरण था। सत्ता और वैभव के बीच रहते हुए भी उन्होंने कभी अहंकार को स्थान नहीं दिया। उनके व्यवहार में करुणा, सहिष्णुता और उदारता स्पष्ट दिखाई देती थी। वे मतभेदों के बीच भी मनभेद नहीं होने देते थे। यही गुण उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि सच्चा लोकनायक बनाता है।
लोकतंत्र के सजग प्रहरी
अटल जी लोकतंत्र को केवल शासन-प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य मानते थे। वे प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की गरिमा और संसदीय परंपराओं के संरक्षण के प्रति सदैव सचेत रहे। उनका विश्वास था कि मजबूत लोकतंत्र वही है जिसमें असहमति का सम्मान हो, संवाद की गुंजाइश बनी रहे और सत्ता जवाबदेह हो। उन्होंने अपने आचरण से लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त किया।
विरासत और प्रेरणा
अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत केवल नीतियों या योजनाओं तक सीमित नहीं है। उनकी सबसे बड़ी देन है-राजनीति में नैतिकता, संवाद में शालीनता और सत्ता में संवेदना। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश छोड़ गए कि राजनीति को भी मानवीय बनाया जा सकता है।
अटल बिहारी वाजपेयी का बहुमुखी व्यक्तित्व भारतीय लोकतंत्र की अमूल्य धरोहर है। वे राजनीति में कविता की कोमलता और कविता में राजनीति की जिम्मेदारी लेकर आए। उनका जीवन इस सत्य को प्रमाणित करता है कि दृढ़ सिद्धांतों के साथ उदार हृदय और मानवीय संवेदना संभव है। अटल जी न केवल अपने समय के महान नेता थे, बल्कि वे सदैव भारत की आत्मा में जीवित रहने वाली प्रेरणा हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


रविवार, 21 दिसंबर 2025

लोकतंत्र की पाठशाला थे अटल जी

 25 दिसम्बर अटल जी के जन्मदिन पर विशेष लेख-


अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम हैं, जिनके साथ ‘क़िस्से’ केवल रोचक घटनाएँ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कारों की सीख भी हैं। उनके जीवन से जुड़े प्रसंग बताते हैं कि सत्ता में रहते हुए भी विनम्रता, संवाद और मानवीयता कैसे बचाए रखी जा सकती है। अटल जी के क़िस्से आज के शोरगुल भरे राजनीतिक माहौल में शालीनता का पाठ पढ़ाते हैं।
विरोध का सम्मानः संसद से सड़क तक
संसद में तीखी बहस के दौरान जब शोर-शराबा बढ़ जाता, अटल जी मुस्कराकर माहौल हल्का कर देते। एक बार विपक्ष के तीखे प्रहार पर उन्होंने कहा “लोकतंत्र में विरोध सरकार की कमजोरी नहीं, ताक़त होता है।” यह वाक्य केवल एक तात्कालिक टिप्पणी नहीं था, बल्कि उनके राजनीतिक दर्शन का सार था। वे असहमति को भी संवाद में बदलने की कला जानते थे।
ऐतिहासिक भाषणः देश पहले
1996 में विश्वास मत हारने के बाद संसद में दिया गया उनका वक्तव्य आज भी उद्धृत किया जाता है, “सरकारें आती-जाती रहती हैं, पार्टियाँ बनती-बिगड़ती रहती हैं, लेकिन देश रहना चाहिए।” यह क़िस्सा बताता है कि सत्ता उनके लिए साध्य नहीं, साधन थी; राष्ट्र सर्वोपरि था।
लाहौर बस यात्राः साहस का संदेश
जब अटल जी लाहौर बस यात्रा पर निकले, तो आलोचनाएँ भी हुईं। लेकिन उनका उत्तर सरल और दूरदर्शी था, “मित्र बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं।” यह प्रसंग बताता है कि वे जोखिम उठाने से नहीं घबराते थे, यदि उद्देश्य शांति और संवाद हो। उनके लिए कूटनीति केवल समझौते नहीं, भरोसे की पहल थी।
कवि का मन, प्रधानमंत्री का दायित्व
एक कार्यक्रम में उनसे पूछा गया, आप पहले क्या हैं, कवि या प्रधानमंत्री? अटल जी का उत्तर था, “प्रधानमंत्री संयोग से हूँ, कवि स्वभाव से।” सत्ता के उच्च शिखर पर बैठा व्यक्ति भी भीतर से संवेदनशील रचनाकार हो सकता है, यह क़िस्सा इसी सच्चाई को रेखांकित करता है।
हार में भी गरिमा
चुनावी पराजय के बाद कार्यकर्ताओं में निराशा थी। अटल जी ने कहाकृ?, “हार हमें और बेहतर बनने का अवसर देती है।” राजनीति में हार को भी सीख मानने का यह दृष्टिकोण उन्हें विशिष्ट बनाता है। वे जीत में संयमी और हार में धैर्यवान थे।
सादगी का प्रसंग
प्रधानमंत्री रहते हुए भी उनका जीवन सादा रहा। बताया जाता है कि देर रात तक फाइलों पर काम के बाद वे कुछ पंक्तियाँ लिख लेते थे, कविता उनके लिए थकान की दवा थी। यह क़िस्सा बताता है कि सत्ता उनके स्वभाव को नहीं बदल सकी।
विरोधी भी प्रशंसक
एक वरिष्ठ विपक्षी नेता का कथन चर्चित है, “हम अटल जी से राजनीतिक असहमति रख सकते हैं, लेकिन उनका अपमान नहीं कर सकते।” यह प्रसंग दर्शाता है कि उनका व्यक्तित्व दलगत सीमाओं से ऊपर था।
युवाओं के नाम संदेश
एक छात्र ने राजनीति में सफलता का सूत्र पूछा। अटल जी बोले, “पहले अच्छा इंसान बनो, नेता अपने आप बन जाओगे।” यह छोटा-सा क़िस्सा उनके जीवन-दर्शन को संक्षेप में रख देता है।
अटल बिहारी वाजपेयी के क़िस्से केवल स्मृतियाँ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पाठशाला हैं। वे सिखाते हैं कि दृढ़ विचारों के साथ भी शालीनता संभव है, सत्ता के साथ भी संवेदना बची रह सकती है। आज जब राजनीति में कटुता बढ़ रही है, अटल जी के ये प्रसंग हमें याद दिलाते हैं कि संवाद, सम्मान और संयम ही लोकतंत्र की असली ताक़त हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


बुधवार, 17 दिसंबर 2025

जानलेवा कोहरा बना राष्ट्रीय चुनौती

 लेख-

भयावह आंकड़े, नुकसान और भविष्य की चेतावनी
भारत में सर्दी का मौसम आते ही एक अदृश्य लेकिन अत्यंत घातक संकट जन्म लेता है, घना कोहरा। यह केवल मौसम की सामान्य स्थिति नहीं रहा, बल्कि अब यह जान-माल के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। हर वर्ष दिसंबर से जनवरी के बीच देश के अनेक हिस्सों में कोहरा सड़क, रेल और हवाई यातायात को बुरी तरह प्रभावित करता है। इसके कारण सैकड़ों लोग अपनी जान गंवाते हैं और हजारों घायल होते हैं। हाल के वर्षों में कोहरे से जुड़ी दुर्घटनाओं के आंकड़े इस समस्या की भयावहता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
भारत में कोहरे से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र
उत्तर भारत सबसे अधिक प्रभावित-दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड के तराई क्षेत्र कोहरे से सबसे अधिक प्रभावित रहते हैं। दिल्ली, नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, गुरुग्राम और फ़रीदाबाद में कई बार दृश्यता 20 से 50 मीटर तक सिमट जाती है। उत्तर प्रदेश के आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे, मेरठ, मुरादाबाद, बरेली और कानपुर क्षेत्र में कोहरे के कारण बार-बार बड़े हादसे होते हैं। हरियाणा के करनाल, पानीपत, रोहतक, अंबाला और रेवाड़ी तथा पंजाब के लुधियाना और जालंधर में भी कोहरा जानलेवा साबित होता है।
अन्य क्षेत्र-उत्तराखंड के रुद्रपुर, काशीपुर, हरिद्वार जैसे तराई इलाकों में सुबह के समय घना कोहरा जनजीवन ठप कर देता है। हाल के वर्षों में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी कोहरे से दुर्घटनाएँ दर्ज की गई हैं।
कोहरे से होने वाली दुर्घटनाओं के भयावह आंकड़े
सरकारी और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कोहरा अब एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा संकट बन चुका है। भारत में हर साल 30,000 से अधिक सड़क दुर्घटनाएँ सीधे तौर पर कोहरे या अत्यधिक धुंध के कारण होती हैं। औसतन सर्दियों के मौसम में प्रतिदिन 14 लोगों की मौत कोहरे से जुड़ी दुर्घटनाओं में होती है। वर्ष 2019 में कोहरे के कारण लगभग 35,600 से अधिक सड़क हादसे दर्ज किए गए। वर्ष 2020 में यह संख्या घटकर 26,500 के आसपास रही, लेकिन इसके बाद फिर बढ़ने लगी। 2014 से 2021 के बीच कोहरे से जुड़ी दुर्घटनाओं में 5,700 से अधिक लोगों की मौत और 4,000 से अधिक लोग घायल हुए। अकेले 2021 में कोहरे से संबंधित सड़क हादसों में 13,000 से अधिक लोगों की जान गई।
हालिया घटनाएँ-यमुना एक्सप्रेसवे पर कोहरे के कारण हुई एक भीषण दुर्घटना में 13 लोगों की मौत और 100 से अधिक लोग घायल हुए। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर कोहरे से हुई चेन-कोलिजन में 4 लोगों की जान चली गई। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड में केवल कुछ ही दिनों में कोहरे से 20 से अधिक मौतें दर्ज की गईं। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि कोहरा केवल असुविधा नहीं, बल्कि घातक आपदा बन चुका है।
जान-माल और आर्थिक नुकसान
सड़क दुर्घटनाएँ-कोहरे में दृश्यता अचानक बहुत कम हो जाती है। चालक आगे चल रहे वाहन, मोड़ या अवरोध को समय पर नहीं देख पाते, जिससे मल्टी-व्हीकल टक्कर, बस और ट्रक पलटना, दोपहिया वाहन चालकों की मौत, पैदल यात्रियों का कुचला जाना
जैसी घटनाएँ होती हैं।
रेल और हवाई यातायात-कोहरे के कारण ट्रेनें कई-कई घंटे लेट होती हैं, सैकड़ों उड़ानें देरी से चलती हैं या रद्द हो जाती हैं, यात्रियों को भारी असुविधा और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।
आर्थिक प्रभाव माल ढुलाई प्रभावित होती है। उद्योगों और व्यापार की गति धीमी पड़ जाती है। स्कूल, कॉलेज और कार्यालय देर से खुलते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कोहरा हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का अप्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान करता है।
स्वास्थ्य पर असर-कोहरा जब प्रदूषण के साथ मिलकर स्मॉग बनता है, तब दमा और अस्थमा के मरीजों की हालत बिगड़ती है। आँखों में जलन, एलर्जी और साँस की तकलीफ़ बढ़ती है। बच्चों और बुज़ुर्गों को विशेष खतरा होता है।
कोहरे के प्रमुख कारण
1. तापमान में तेज़ गिरावट
2. हवा की गति का कम होना
3. वातावरण में अधिक नमी
4. प्रदूषण और धूल कण
5. बढ़ता शहरीकरण और वाहन उत्सर्जन
प्रदूषण कोहरे को अधिक घना और लंबे समय तक टिकाऊ बना देता है, जिससे खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
कोहरे में सुरक्षा के आवश्यक उपाय-सड़क पर वाहन धीमी गति से चलाएँ। फॉग लाइट और लो-बीम हेडलाइट का प्रयोग करें। हाई-बीम का उपयोग न करें। आगे चल रही गाड़ी से पर्याप्त दूरी रखें। अत्यधिक कोहरे में यात्रा टाल दें। यात्रा से पहले मौसम विभाग की चेतावनी देखें। रात और सुबह तड़के यात्रा से बचें। वैकल्पिक समय और मार्ग अपनाएँ।
स्वास्थ्य सुरक्षा
बुज़ुर्ग, बच्चे और श्वास रोगी सुबह बाहर न निकलें
मास्क और चश्मे का उपयोग करें
भविष्य में कोहरे की स्थिति-मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण के कारण आने वाले वर्षों में कोहरे की अवधि और तीव्रता बढ़ सकती है। उत्तर भारत में लंबे समय तक घना कोहरा छाया रह सकता है। दुर्घटनाओं का जोखिम और बढ़ेगा। यदि प्रदूषण नियंत्रण, सड़क सुरक्षा तकनीक और जन-जागरूकता पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कोहरा भविष्य में और अधिक जानलेवा बन सकता है। कोहरा अब मौसम की साधारण घटना नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती बन चुका है। हर साल हजारों दुर्घटनाएँ, सैकड़ों मौतें और भारी आर्थिक नुकसान इसकी भयावहता को दर्शाते हैं। सरकार, प्रशासन और नागरिक तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि सावधानी, तकनीक और जागरूकता के माध्यम से इस संकट से निपटा जाए। कोहरे में सावधानी ही जीवन की सुरक्षा है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

कथावाचन : धर्म या धंधा

 विशेष लेख-

भारत के कथावाचकों की बढ़ती दुनिया
भारत में कथावाचन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा है, जो सदियों से समाज को जोड़ने, अध्यात्म को सरल बनाने और जीवन मूल्यों को स्थापित करने का माध्यम रही है। वेदों-पुराणों में वर्णित कथाएँ, लोक परंपराएँ और भक्ति आंदोलन ने इस कला को समय के साथ और भी समृद्ध किया। किंतु 21वीं सदी में, विशेषकर पिछले दो दशकों में, कथावाचन एक नए स्वरूप में दिखाई देने लगा है, जहाँ यह सिर्फ “धर्मकार्य” नहीं रहा, बल्कि कई स्थानों पर “व्यवसाय” का रूप भी ले चुका है। फीस, लोकप्रियता, सोशल मीडिया का प्रभाव और हजारों-लाखों की भीड़ ने कथावाचन को एक बड़े उद्योग में बदल दिया है। इस बदलाव ने अनेक प्रश्न भी खड़े किए हैं। क्या कथावाचन अब भी शुद्ध आध्यात्मिक साधना है? या यह एक पेशा, मंच-कला और आर्थिक गतिविधि बन गया है?
कथावाचन का मूल स्वरूप : धर्म, भक्ति और जन-जागरण
प्राचीन भारत में कथा-वाचन सामाजिक ज्ञान-वितरण का प्रमुख साधन था। कथा-व्यास गाँवों-नगरों में जाकर रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, शिवपुराण जैसी कथाएँ सुनाते थे। यह सेवा-भावनाओं पर आधारित कार्य था, जहाँ कथावाचक को यथासंभव ‘दक्षिणा’ दी जाती थी, जो उनका जीवन-यापन सुनिश्चित करती थी। कथा का उद्देश्य था, धर्म का प्रचार, समाज में नैतिकता का संरक्षण और सामान्य लोगों को जीवन-दर्शन समझाना।
आज भी अनेक कथावाचक इसे सेवा ही मानते हैं और कोई निश्चित फीस नहीं लेते। कई संगठन और आश्रम कथाओं को मुफ्त आयोजित करते हैं। समाज में ऐसे व्यासों की संख्या कम नहीं है जो भक्ति को ही सर्वोपरि मानते हैं। परंतु समय के साथ-साथ, कथावाचन की प्रस्तुति शैली, मंच, आयोजन और लोकप्रियता ने इसे नया आर्थिक आयाम भी प्रदान किया है।
आधुनिक कथावाचन : मंच, मीडिया और बढ़ता व्यावसायीकरण
आधुनिक दौर में कथा अब केवल मंदिर या धर्मशाला तक सीमित नहीं रह गई। बड़े पंडाल, भव्य साउंड सिस्टम, एलईडी स्क्रीन, सोशल मीडिया लाइव स्ट्रीम और प्रचार-प्रसार के साथ यह बड़े आयोजनों में बदल चुकी है। लोकप्रिय कथावाचकों के कार्यक्रमों में लाखों की भीड़ उमड़ती है। आयोजक इसके लिए भारी खर्च करते हैं। आवास, यात्रा, मंच, पंडाल, भंडारा, सुरक्षा और मीडिया कवरेज। ऐसे में कथा-व्यास की फीस भी स्वाभाविक रूप से बढ़ी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज कथावाचन स्प्रिच्युअल एन्टरटेनमेंट और फेथ इवेंट इंडस्ट्री का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यहाँ यह समझना जरूरी है कि व्यावसायीकरण का अर्थ अनिवार्य रूप से नकारात्मक नहीं होता। यदि कथा के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन, अध्यात्मिक प्रेरणा और सांस्कृतिक एकता फैल रही है, तो यह उपयोगी भी है। परंतु फीस और संपत्ति को लेकर उठने वाले प्रश्नों ने बहस को गहरा किया है।
भारत के प्रसिद्ध कथावाचक और उनकी फीस
मीडिया रिपोर्टों के आधार पर आज भारत में कई कथावाचक अत्यधिक लोकप्रिय हैं और उनकी कथाओं के लिए बड़ी राशि खर्च की जाती है।
1. देवकीनंदन ठाकुर सबसे लोकप्रिय कथा-व्यासों में से एक, जिनकी फीस लगभग 10-12 लाख रुपए बताई जाती है। उनकी भक्ति व रसपूर्ण भाषा-शैली और बड़ी भीड़ उनकी विशेष पहचान है।
2. पं. प्रदीप मिश्रा (सीहोर) शिवपुराण कथा के लिए जाने जाते हैं। विभिन्न रिपोर्टों में उनकी फीस 10 लाख से 50 लाख तक बताई जाती है। शिवभक्ति की शैली ने उन्हें देशव्यापी पहचान दी है।
3. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर धाम) दिव्य दरबार शैली के कारण प्रख्यात। मीडिया के अनुसार एक कार्यक्रम की फीस 3 से 4 लाख के आसपास है।
4. अनिरुद्धाचार्य जी भागवत और रामकथा के लोकप्रिय व्यास, जिनकी अनुमानित फीस 12 से 15 लाख मानी जाती है।
5. जया किशोरी जी युवा कथावाचक, जिनकी कथा व भजन दोनों अत्यंत लोकप्रिय हैं। फीस 8 से 12 लाख बताई जाती है।
6. मोरारी बापू विश्वप्रसिद्ध रामकथाकार, जो किसी प्रकार की फीस नहीं लेते। वे कथा को साधना मानते हैं।
इन कथावाचकों के मंच इतने बड़े हो गए हैं कि कई बार पूरा आयोजन करोड़ों तक पहुँच जाता है। इसमें कथा-व्यास की फीस के अलावा पंडाल, ध्वनि, मंच, भोजन और भी बहुत कुछ शामिल होता है।
कथावाचकों की अनुमानित संपत्ति : मीडिया-आधारित आँकड़े
कथावाचकों की वास्तविक संपत्ति आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं होती, इसलिए उपलब्ध सभी आंकड़े “अनुमानित” ही कहे जाते हैं। कई कथावाचकों की नेटवर्थ 10 करोड़ से 30 करोड़ के बीच बताई जाती है। कुछ लोग आश्रम, ट्रस्ट या चैरिटी के माध्यम से कार्य करते हैं, इसलिए उनकी व्यक्तिगत संपत्ति अलग नहीं आँकी जा सकती। कुछ कथावाचक कोई फीस नहीं लेते, पर कार्यक्रमों से जुड़े दान/दक्षिणा, संस्थागत सहयोग आदि से उनका आर्थिक ढांचा चलता है।
धर्म बनाम धंधा : मूल प्रश्न
अब बड़ा सवाल यह है कि कथावाचन धर्म है या धंधा? सच्चाई यह है कि धर्म उन कथावाचकों के लिए है जो कथा को सेवा मानकर करते हैं, समाज में आध्यात्मिक चेतना फैलाते हैं और वैदिक संस्कृति का प्रसार करते हैं। धंधा तब प्रतीत होता है जब फीस, शो-ऑफ, भीड़, चकाचौंध और प्रचार-मार्केटिंग कथा की मूल भावना पर हावी हो जाते हैं। ये दोनों स्थितियाँ आज एक साथ मौजूद हैं। कई बड़े कथावाचक अपार लोकप्रियता और भारी भीड़ के कारण अपने कार्यक्रमों को व्यवस्थित करने के लिए शुल्क लेते हैं, जो व्यावहारिक भी है। वहीं कुछ लोग इसे भक्ति के कारोबार में बदलने का आरोप भी लगाते हैं। इसलिए कहना उचित है कि आज का कथावाचन “धर्म $ प्रबंधन $ व्यवसाय” तीनों का मिश्रित रूप है।
कुमार विश्वास कथावाचक नहीं, बल्कि वक्ता और कवि
कई लोग मंचीय प्रस्तुति देखकर कुमार विश्वास का नाम कथावाचकों के साथ जोड़ देते हैं, पर यह गलत है। वे धार्मिक कथावाचक नहीं, बल्कि शायर, कवि और प्रेरक वक्ता हैं। उनकी मंच-शैली साहित्य, देशभक्ति और प्रेम-कविता पर आधारित है। फीस 5 से 10 लाख तक बताई जाती है, पर यह “कथा“ नहीं बल्कि “कवि सम्मेलन” और “स्पीच इवेंट” की श्रेणी में आता है। इसलिए उन्हें कथावाचकों की सूची में रखना उचित नहीं होगा।
समाज पर कथावाचन का प्रभाव
कथावाचन चाहे धर्म हो या व्यवसाय, यह आज भी करोड़ों लोगों के जीवन में भावनात्मक ऊर्जा भरता है। भक्ति रस और अध्यात्मिक विचार लोगों को शांति प्रदान करते हैं। सामाजिक सद्भाव, दान, सेवा और आध्यात्मिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है। कई कथावाचक समाज सेवा, गौसेवा, शिक्षा और चैरिटी कार्यों में भी सक्रिय हैं।
कथावाचन भारत की सांस्कृतिक धरोहर है। बदलते समय में इसका स्वरूप बदला है। एक ओर आध्यात्मिक परंपरा, दूसरी ओर आधुनिक आयोजन-व्यवस्था और आर्थिक ढांचा। यह कहना सही होगा कि आज कथावाचन न तो केवल धर्म है, न केवल धंधा, बल्कि “धार्मिक-सांस्कृतिक उद्योग” का एक नया रूप है, जहाँ भक्ति भी है और प्रबंधन भी। भारत के कथावाचकों की लोकप्रियता ने यह सिद्ध कर दिया है कि कथाएँ आज भी भारतीय समाज की आत्मा हैं, बस उनकी प्रस्तुति और मंच बदल गए हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

बुधवार, 10 दिसंबर 2025

दुनिया में बढ़ता डेटा-लीक संकट

 लेख-

भारत टॉप-3 देशों में शामिल
डिजिटल युग ने जहाँ मानव जीवन को आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधों के नए खतरे भी उतनी ही तेजी से सामने आए हैं। आज दुनिया का हर देश हजारों-लाखों टेराबाइट डेटा संग्रह कर रहा है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं बन पाई है। परिणामस्वरूप, डेटा-चोरी, डेटा-लीक और अनधिकृत डेटा-शेयरिंग विश्वभर में गंभीर संकट के रूप में उभर रहे हैं। 2024-25 की अंतरराष्ट्रीय साइबर रिपोर्टों से पता चलता है कि कुछ देशों में इन घटनाओं की मात्रा अन्य देशों की तुलना में कई गुना अधिक है। इसका मुख्य कारण इन देशों में डिजिटल अवसंरचना का विशाल विस्तार, बड़ी कंपनियों द्वारा डेटा-संग्रह का पैमाना, और साइबर सुरक्षा की चुनौतियाँ हैं। अमेरिका, चीन, रूस, भारत और ब्राज़ील देशों में डेटा-लीक की मात्रा केवल संख्या में ही नहीं, बल्कि उसके प्रभाव, वित्तीय लागत, पारदर्शिता और साइबर-हमलों की तीव्रता में भी अलग-अलग है।
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा डेटा-ब्रीच हॉटस्पॉट
अमेरिका लंबे समय से डेटा-लीक की घटनाओं में शीर्ष पर रहा है। 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में 489 बड़े सार्वजनिक डेटा-ब्रीच दर्ज किए गए, जबकि कुल वार्षिक घटनाओं की संख्या 4,600 से भी अधिक मानी जाती है। आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में ही अमेरिका से 5 अरब से अधिक डेटा-रिकॉर्ड्स लीक हुए। अमेरिका की यह स्थिति कई कारणों से बनती है। पहला, वहाँ डिजिटल अर्थव्यवस्था और ऑनलाइन सेवाओं का प्रसार सबसे अधिक है। दूसरा, हेल्थकेयर, फाइनेंस, ई-कॉमर्स और क्लाउड कंपनियों के पास अत्यंत संवेदनशील उपभोक्ता डेटा मौजूद रहता है, जिसे साइबर अपराधी बड़े मूल्य पर बेचते हैं। तीसरा, अमेरिका में घटनाओं का खुलासा अनिवार्य है, इसलिए अधिक मामले सार्वजनिक हो जाते हैं। इसके साथ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अमेरिका में किसी डेटा-ब्रीच की औसत लागत 10.22 मिलियन डॉलर से अधिक है, जो दुनिया में सबसे ऊँची है। यह लागत संस्थाओं के लिए भारी बोझ बन जाती है, परंतु उपभोक्ता सुरक्षा के प्रति मजबूत कानूनी ढाँचा होने के कारण पारदर्शिता भी उच्च रहती है।
चीन सबसे अधिक अकाउंट-लीक वाला देश
यदि घटनाओं की संख्या नहीं, बल्कि ब्रीच्ड अकाउंट्स की बात करें, तो 2024 की वैश्विक रिपोर्ट में चीन दुनिया में पहले स्थान पर पाया गया। देश के कई बड़े सरकारी व निजी डेटाबेस, स्वास्थ्य, नागरिक पहचान, मोबाइल सेवाएं, ई-कॉमर्स, साइबर अपराधियों का प्रमुख निशाना रहते हैं। चीन में कई बार गलत कॉन्फ़िगरेशन, अपर्याप्त एन्क्रिप्शन और विशाल सामाजिक डेटा-प्लेटफॉर्म के कारण बड़े पैमाने पर अकाउंट-लीक होते हैं। अनुमान के अनुसार पिछले वर्षों में चीन से 2 अरब से अधिक रिकॉर्ड्स डार्कवेब पर उपलब्ध हुए। यहाँ डेटा-लीक का एक कारण यह भी है कि कई ब्रिचेज़ सरकारी संस्थानों पर होते हैं, और कुछ मामलों का सार्वजनिक खुलासा सीमित रूप में ही किया जाता है। इससे वास्तविक आँकड़े अनुमान से भी कहीं अधिक हो सकते हैं।
रूस डार्कवेब में सबसे अधिक उपलब्ध डेटा
रूस साइबर युद्ध, डिजिटल जासूसी और ऑनलाइन वित्तीय अपराधों के केंद्रों में से एक माना जाता है। कई अंतरराष्ट्रीय साइबर सुरक्षा कंपनियों की रिपोर्ट बताती हैं कि रूस से 4.5 अरब से अधिक डेटा-प्वाइंट्स लीक हुए, जो दुनिया में सबसे ज्यादा उपलब्ध “चोरी के डेटा“ की श्रेणी में आता है। रूस में डेटा-लीक के दो प्रमुख कारण हैं। पहला, देश के सरकारी, सैन्य और बैंकिंग ढाँचे को लेकर लगातार साइबर हमले किए जाते हैं। दूसरा, रूस के भीतर भी कई साइबर अपराधी समूह सक्रिय हैं जो डेटा चोरी कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेचते हैं। रूस की स्थिति यह दर्शाती है कि डेटा-सुरक्षा केवल तकनीक से नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक परिस्थितियों से भी प्रभावित होती है।
भारत तेजी से उभरता हुआ टॉप 3 डेटा-लीक देश
भारत में डिजिटल क्रांति ने सामाजिक व आर्थिक बदलाव को नई दिशा दी है। लेकिन इसी के साथ डेटा-ब्रीच की घटनाएँ भी बड़ी गति से बढ़ी हैं। 2024 की रिपोर्ट में भारत को तीसरा सबसे अधिक डेटा-ब्रीच वाला देश बताया गया, जहाँ 114 बड़े साइबर घटनाएँ दर्ज की गईं। भारत में लीक हुए रिकॉर्ड्स की संख्या कई रिपोर्टों में 30-50 करोड़ के बीच बताई जाती है। ज्यादातर हमले स्वास्थ्य, शिक्षा, टेलीकॉम, सरकारी पोर्टल्स और ऑनलाइन सेवाओं पर होते हैं। भारत में सबसे बड़ी समस्या थर्ड-पार्टी वेंडर सिक्योरिटी, कमजोर पासवर्ड नीति और असुरक्षित क्लाउड कॉन्फ़िगरेशन है। भारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश बन रहा है। आधार, यूपीआई, डिजिटल हेल्थ मिशन आदि। लेकिन जैसे-जैसे डेटा संग्रह बढ़ता जा रहा है, सुरक्षा चुनौती भी उसी गति से जटिल होती जा रही है। विश्व स्तर पर भारत की यह बढ़ती संवेदनशीलता चिंता का विषय तो है, लेकिन इसे सुधारने की संभावनाएँ भी उतनी ही अधिक हैं, क्योंकि देश साइबर कानूनों को तेज़ी से मजबूत कर रहा है।
ब्राज़ील लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा डेटा-लीक क्षेत्र
ब्राज़ील डिजिटल भुगतान और इंटरनेट उपयोग के मामले में लैटिन अमेरिका का अग्रणी देश है। हालाँकि, देश अभी भी डेटा सुरक्षा कानूनों को पूरी तरह लागू करने की प्रक्रिया में है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में ब्राज़ील से 20-40 करोड़ रिकॉर्ड्स लीक होने की घटनाएँ दर्ज की गईं और इसे वैश्विक स्तर पर टॉप-5 में स्थान मिला। ब्राज़ील की चुनौतियों में सबसे बड़ा तत्व है, मोबाइल बैंकिंग और ई-कॉमर्स का तेजी से विस्तार, लेकिन समान गति से साइबर सुरक्षा अवसंरचना का विकास न हो पाना। इसके कारण क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी, पहचान-चोरी और सोशल मीडिया डेटा एक्सपोज़र जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं।
सभी देशों के आँकड़ों की तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि डेटा-लीक की समस्या किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं है। लेकिन कुछ देशों में इसके कारण अलग-अलग हैं। कहीं पारदर्शिता अधिक है, तो कहीं डिजिटल रिकॉर्ड्स का आकार बड़ा, कहीं साइबर अपराधियों की गतिविधियाँ व्यापक हैं, और कहीं डेटा-सुरक्षा ढाँचा अभी निर्माण के चरण में है। संक्षेप में कहें तो अमेरिका घटनाओं की संख्या और वित्तीय नुकसान में सबसे आगे है। चीन ब्रीच्ड अकाउंट्स की श्रेणी में शीर्ष पर है। रूस डार्कवेब पर उपलब्ध चोरी के डेटा की मात्रा में अग्रणी है। भारत तीव्र गति से बढ़ती डेटा-लीक घटनाओं के कारण अब वैश्विक टॉप-3 में शामिल है। ब्राज़ील लैटिन अमेरिकी क्षेत्र में सबसे अधिक प्रभावित देश है।
इन आँकड़ों से यह निष्कर्ष निकलता है कि डिजिटल सुरक्षा अब वैश्विक चुनौती बन चुकी है। देशों को केवल तकनीकी सुरक्षा पर नहीं, बल्कि कानून, जागरूकता, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। डेटा-लीक की हर घटना सिर्फ एक संस्था का नुकसान नहीं होती, यह करोड़ों लोगों के निजी जीवन, आर्थिक सुरक्षा और डिजिटल विश्वास पर सीधा प्रहार करती है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)



सोमवार, 8 दिसंबर 2025

फिर कैसे हो वायु प्रदूषण पर नियंत्रण

 विशेष लेख-

अन्य देशों की तुलना में भारत का बजट सबसे कम
वायु प्रदूषण आज दुनिया के सामने खड़ी सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। दक्षिण एशिया, खासकर भारत, इस संकट का केंद्र बन गया है। दुनिया के कई देश प्रदूषण से लड़ने के लिए बड़े आर्थिक संसाधन, आधुनिक तकनीक और दीर्घकालिक योजनाएँ लागू कर रहे हैं। लेकिन जब भारत की स्थिति की तुलना इन देशों से की जाती है, तो यह स्पष्ट होता है कि हमारा बजट, संसाधन और क्रियान्वयन दुनिया के कई विकसित देशों की तुलना में काफ़ी कम है। यह अंतर न सिर्फ संख्या में दिखता है, बल्कि योजनाओं के प्रभाव और जमीन पर बदलाव में भी साफ़ झलकता है।
भारत का प्रदूषण-नियंत्रण बजटः कितना और कैसे
भारत में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बजट मुख्य रूप से पर्यावरण मंत्रालय और नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के माध्यम से जारी होता है। नवीनतम उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार-वर्ष 2025-26 के लिए पर्यावरण मंत्रालय का कुल बजट 3,413 करोड़ रुपए है। इसमें प्रदूषण नियंत्रण योजना के लिए 854 करोड़ है। 2019 से 2025 तक राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के लिए कुल आवंटन 19,711 करोड़ रुपए है। अगर इसे भारत की विशाल आबादी 142 करोड़ 132 से अधिक प्रदूषण-प्रभावित शहरों और देश की औद्योगिक-कृषि गतिविधियों के पैमाने से तुलना करें, तो यह खर्च अपर्याप्त माना जाता है। कई संसदीय रिपोर्टें बताती हैं कि आवंटित धन का भी पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता, कुछ वर्ष तो ऐसे रहे जब गतिविधियों, योजनाओं या प्रशासनिक प्रक्रियाओं की धीमी गति के कारण एक प्रतिशत से भी कम धन उपयोग हुआ। भारत का बजट यह संकेत देता है कि देश ने प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत तो कर दी है, लेकिन आवश्यक आर्थिक शक्ति और निरंतरता की दृष्टि से यह अभी भी काफी कम है।
दुनिया के प्रमुख देशों का बजटः भारत से कितनी दूरी
अब देखते हैं कि दुनिया के वे देश, जो प्रदूषण से जूझ चुके हैं और अब सफलतापूर्वक निपट रहे हैं, वे इस पर कितना खर्च कर रहे हैं।
1. चीन-सबसे बड़ा मजबूत उदाहरण-चीन एक समय दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में शामिल था, लेकिन 2013 के बाद उसने अभूतपूर्व बजट जारी किया। चीन ने वायु प्रदूषण एक्शन प्लान (2013-2017) के लिए लगभग $270 बिलियन यानी 22 लाख करोड़ खर्च किए। सिर्फ बीजिंग शहर ने ही प्रदूषण नियंत्रण, स्वच्छ ईंधन, उद्योग परिवर्तन और मॉनिटरिंग के लिए $120 बिलियन से अधिक निवेश किया। यह भारत के मुकाबले कई गुना अधिक है, न सिर्फ संख्या में बल्कि कार्यान्वयन की गति में भी। चीन की सफलता का बड़ा कारण यही भारी आर्थिक निवेश माना जाता है।
2. संयुक्त राज्य अमेरिका-अमेरिका में प्रदूषण नियंत्रण र्प्यावरण संरक्षण एजेंसी के माध्यम से होता है। इसका वार्षिक बजटः $9-10 बिलियन  यानी 75,000-80,000 करोड़ रुपए रहा। क्लीन एयर एक्ट कार्यक्रमों पर हर साल अरबों डॉलर खर्च किए जाते हैं। बड़े शहरों की वायु गुणवत्ता सुधार के लिए स्थानीय फ़ंडिंग भी समानांतर चलती है। यूएसए की तुलना में भारत का बजट बेहद कम नजर आता है।
3. यूरोपीय संघ-प्रदूषण नियंत्रण के लिए ग्रीन डील और जीरो पॉल्यूशन एक्शन प्लान पर विशाल निवेश किया जा रहा है। यूरोपीय ग्रीन डील के तहत कई वर्षों में कुल निवेश एक ट्रिलियन यानी 90 लाख करोड़ रुपए, वायु-गुणवत्ता सुधार के लिए केवल एक वर्ष में ही भारत के पूरे पर्यावरण बजट से कई गुना अधिक धन यूरोपीय संघ जारी करता है। स्थानीय निकाय, नगर निगम और सिविल समाज भी बड़े स्तर पर निवेश करते हैं।
4. दक्षिण कोरिया-सियोल दुनिया के प्रदूषित शहरों में शामिल था, लेकिन देश ने बड़े पैमाने पर निवेश बढ़ाया। पीएम 2.5 से निपटने के लिए वार्षिक खर्चः $2-3 बिलियन यानी 17,000-25,000 करोड़ रुपए, वायु शोधन, मॉनिटरिंग, इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन और सरकारी हस्तक्षेप में भारी खर्च। इन देशों की तुलना दर्शाती है कि भारत प्रदूषण-नियंत्रण पर बहुत कम निवेश कर रहा है, जबकि समस्या का पैमाना कहीं अधिक बड़ा है।
भारत की कम फ़ंडिंग चिंता का विषय
1. भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में शामिल है, इसलिए बजट “समस्या के अनुपात” में होना चाहिए।
2. भारत में 40 से अधिक शहर अक्सर दुनिया की प्रदूषण सूची में आते हैं, इसलिए बड़े क्षेत्र के लिए बड़े बजट की ज़रूरत है।
3. विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रदूषण से भारत में हर साल 10-12 लाख मौतें जुड़ी मानी जाती हैं, लेकिन स्वास्थ्य-जोखिम के अनुपात में खर्च बेहद कम है।
4. बड़े देशों की तुलना में भारत में आबादी बहुत अधिक है; प्रति व्यक्ति खर्च भी काफी कम है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना
देश प्रदूषण नियंत्रण वार्षिक/प्रधान खर्च भारत की तुलना
चीन $270 बिलियन$ (4-5 वर्षों में) भारत से दर्जनों गुना अधिक
यूएसए $10 बिलियन प्रति वर्ष भारत से 10 गुना अधिक
यूएई 1 ट्रिलियन मल्टी-ईयर भारत से बहुत विशाल अंतर
दक्षिण कोरिया $2-3 बिलियन प्रति वर्ष भारत से 20-30 गुना अधिक
भारत 854 करोड़ रुपए पदूषण नियंत्रण आवश्यकता की तुलना में अत्यल्प
भारत के पास योजनाएँ हैं, कार्यक्रम हैं और नीतियाँ भी हैं, लेकिन समस्या इतनी बड़ी है कि वर्तमान बजट उसके सामने बहुत छोटा पड़ता है। अन्य विकसित देशों ने प्रदूषण से लड़ने के लिए न सिर्फ भारी धन खर्च किया बल्कि मजबूत संस्थागत व्यवस्था, वैज्ञानिक मॉनिटरिंग और निवेश की निरंतरता बनाए रखी। भारत का बजट, आबादी के अनुपात, भूगोल और प्रदूषण स्तर की तुलना में अभी भी बहुत कम है। इसलिए जब भारत की तुलना चीन, यूरोप या अमेरिका जैसे देशों से की जाती है, तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि हमारा निवेश “समस्या के आकार” के अनुरूप नहीं है। यह स्थिति बताती है कि यदि भारत को वायु प्रदूषण जैसी बड़ी चुनौती से वास्तव में निपटना है तो आर्थिक निवेश को भी उसी स्तर पर बढ़ाना होगा जैसा दुनिया के प्रमुख देशों ने किया, तभी भारत अपने नागरिकों को स्वच्छ हवा और स्वस्थ जीवन का भरोसा दे सकेगा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)