गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

हमारी देवगढ़ यात्रा

 

आत्मीयता, साहित्य और पारिवारिक संस्कृति का संस्मरण


जीवन में कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं, जो केवल दूरी तय करने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे मन, विचार और आत्मा को समृद्ध कर जाती हैं। सोनभद्र ज़िले के देवगढ़ की मेरी दो दिवसीय यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही। यह यात्रा पर्यटन, भ्रमण या दर्शनीय स्थलों की नहीं थी, बल्कि आत्मीयता, साहित्यिक संवाद, ज्ञान और भारतीय पारिवारिक संस्कृति के जीवंत अनुभव की यात्रा थी। इस पूरे प्रवास के केंद्र में रहे देवगढ़ निवासी परम ज्ञानी, विद्वान और कवि श्री जितेंद्र कुमार सिंह ‘संजय’।

मिर्जापुर से देवगढ़ : आत्मीय साथ की शुरुआत
इस यात्रा की सबसे सुंदर शुरुआत तब हुई, जब संजय जी स्वयं हमें मिर्जापुर से अपने साथ देवगढ़ लेकर गए। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की यात्रा नहीं थी, बल्कि आत्मीयता से भरा एक आमंत्रण था-अपने घर, अपने संसार और अपने परिवार में शामिल करने का। मिर्जापुर से देवगढ़ की यात्रा के दौरान रास्ते भर बातचीत चलती रही। साहित्य, समाज, संस्कृति, शिक्षा और वर्तमान समय की चुनौतियों पर उनके विचार सुनना अत्यंत प्रेरणादायक था। उनकी बातों में गहराई, संतुलन और अनुभव की परिपक्वता स्पष्ट दिखाई देती थी। यात्रा के दौरान यह महसूस ही नहीं हुआ कि हम पहली बार उनके साथ जा रहे हैं, ऐसा लग रहा था जैसे वर्षों पुराना परिचय हो।
देवगढ़ आगमन : घर जैसा स्वागत
देवगढ़ पहुँचते ही जिस आत्मीयता के साथ स्वागत हुआ, वह अविस्मरणीय है। संजय जी के घर का वातावरण गरिमामय होने के साथ-साथ अत्यंत स्नेहपूर्ण था। वहाँ औपचारिकता नहीं, बल्कि अपनापन था। उनके परिवार का व्यवहार भी अत्यंत विनम्र और सौम्य था।
भव्य अतिथि गृह में हमारा ठहराव
रात में हम सभी, कुल नौ लोग, संजय जी के भव्य अतिथि गृह में ठहरे। अतिथि गृह अत्यंत सुंदर, स्वच्छ और सुव्यवस्थित था। वहाँ हर सुविधा उपलब्ध थी, परंतु सबसे विशेष बात यह थी कि उसमें घर जैसी आत्मीयता थी। कमरों की व्यवस्था, स्वच्छता और सुविधा देखकर स्पष्ट था कि अतिथि उनके लिए अत्यंत सम्मानित स्थान रखते हैं। यह अनुभव किसी होटल जैसा नहीं, बल्कि परिवार के घर में ठहरने जैसा था।
घर का भोजन : स्वाद और स्नेह का अद्भुत संगम
रात्रि भोजन हमने उनके घर पर ही किया। घर का बना पारंपरिक भोजन अत्यंत स्वादिष्ट था। दाल, ताज़ी सब्जियाँ, कचौड़ियां, चावल, अचार और पारंपरिक व्यंजन, सब कुछ प्रेम से परोसा गया। भोजन के दौरान जो पारिवारिक माहौल था, वह अत्यंत सुखद था। बातचीत में औपचारिकता नहीं, बल्कि अपनापन था। भोजन में केवल स्वाद नहीं था, बल्कि उसमें भावनाएँ और संस्कार भी थे।
समृद्ध निजी पुस्तकालय : ज्ञान का खजाना

भोजन के बाद संजय जी हमें अपने निजी पुस्तकालय में ले गए। यह पुस्तकालय वास्तव में ज्ञान का खजाना था। साहित्य, इतिहास, दर्शन, धर्म, संस्कृति, समाजशास्त्र, राजनीति और कविता, लगभग हर विषय की पुस्तकें वहाँ व्यवस्थित रूप से सजी हुई थीं। कई दुर्लभ और महत्वपूर्ण पुस्तकें भी देखने को मिलीं। यह स्पष्ट था कि संजय जी केवल कवि ही नहीं, बल्कि गंभीर अध्ययनशील व्यक्तित्व के धनी हैं। पुस्तकालय में बिताया गया समय अत्यंत प्रेरणादायक था।
अतिथि गृह के पोर्च में पारिवारिक काव्य गोष्ठी

अगले दिन का सबसे यादगार और भावनात्मक क्षण था-अतिथि गृह के पोर्च में आयोजित पारिवारिक काव्य गोष्ठी। खुले वातावरण में, शांत और हल्की ठंडी हवा के बीच, हम सभी और उनका परिवार एक साथ बैठे। यह कोई औपचारिक मंचीय कार्यक्रम नहीं था, बल्कि परिवार और मित्रों के बीच साहित्य का आत्मीय उत्सव था। संजय जी ने अपनी कविताएँ सुनाईं। उनकी कविताओं में जीवन दर्शन, भारतीय संस्कृति, ग्रामीण जीवन और मानवीय संवेदनाओं की गहराई स्पष्ट झलकती है। हम सभी ने भी अपनी-अपनी रचनाएँ और विचार साझा किए। यह गोष्ठी केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि भावनात्मक संवाद का सुंदर माध्यम बन गई। काफी देर तक यह क्रम चलता रहा और वह वातावरण आज भी स्मृतियों में जीवंत है।
दूसरा दिन : संवाद और आत्मीय समय
दूसरे दिन सुबह अत्यंत शांत और सकारात्मक वातावरण में शुरुआत हुई। चाय के साथ साहित्य, समाज और समसामयिक विषयों पर चर्चा हुई। यह उल्लेखनीय रहा कि इस पूरे प्रवास के दौरान हम कहीं घूमने नहीं गए। परंतु इसका कोई अभाव महसूस नहीं हुआ, क्योंकि जो अनुभव हमें घर और परिवार के बीच मिला, वह किसी पर्यटन से कम नहीं था।
विचारों का गहन आदान-प्रदान
दिन का अधिकांश समय चर्चा और संवाद में बीता। हमने साहित्य की वर्तमान स्थिति, समाज की दिशा, भारतीय संस्कृति और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से विचार किया। संजय जी के विचारों में संतुलन और गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
पारिवारिक संस्कृति का जीवंत अनुभव
उनके परिवार का व्यवहार अत्यंत स्नेहपूर्ण और सहज था। ऐसा लग रहा था कि हम अतिथि नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा हैं। यह अनुभव भारतीय पारिवारिक संस्कृति की सुंदरता को दर्शाता है-जहाँ सम्मान, स्नेह और अपनापन स्वाभाविक रूप से मौजूद होता है।
दोपहर का भोजन और भावनात्मक विदाई
दोपहर का भोजन भी घर पर ही हुआ। भोजन के साथ बातचीत और हँसी-मज़ाक चलता रहा। शाम को जब विदाई का समय आया, तो मन भावुक हो गया। यह केवल यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक आत्मीय संबंध की शुरुआत जैसा लगा। यह दो दिन का प्रवास कई मायनों में विशेष और यादगार रहा। मिर्जापुर से देवगढ़ तक आत्मीय साथ की यात्रा, भव्य अतिथि गृह में सम्मानपूर्वक ठहराव, घर का स्वादिष्ट और स्नेहपूर्ण भोजन, समृद्ध निजी पुस्तकालय का अवलोकन, पारिवारिक काव्य गोष्ठी में सहभागिता, बिना कहीं घूमे भी गहरा सांस्कृतिक अनुभव। वापसी में शिवद्वार मंदिर में रखी ग्यारहवीं शताब्दी की खुदाई के दौरान नहीं निकली ऐतिहासिक और दुर्लभ भगवान शिव-पार्वती की मूर्ति के दर्शन। मन प्रसन्न हो गया। जितेन्द्र जी ने बताया कि शिव-पार्वती की मूर्ति की ऐसी मुस्कान कहीं नहीं मिलती। हालांकि तीन दर्जन से अधिक मंदिरों में इस प्रकार की मूर्ति बनाकर प्रतिष्ठापित की गई है, लेकिन ऐसी मोहक मुस्कान नहीं है उन मूर्तियों में। गजब होगा वह मुर्तिकार जिसने 11वीं शदी में ऐसी दुर्लभ मूर्ति बनाकर इसमें प्राण फूंक दिये। वापसी में जितेन्द्र जी ने हमारी गाड़ियों को मिर्जापुर के बरकछा इलाके में रुकवा लिया। वहां के जग प्रसिद्ध गुलाब जामुन खिलाये। अद्भुत। ऐसे गुलाब जामुन मैने दुनिया में कहीं नहीं खाये थे। मलाई जैसे मुलायम, चाशनी एकदम पतली मगर मीठी। आज भी यह लेख लिखते हुए मुंह में पानी आ रहा है। मेरे लिए यह यात्रा आत्मिक रूप से अत्यंत समृद्ध करने वाली रही। संजय जी का ज्ञान, उनकी सादगी, उनका साहित्यिक दृष्टिकोण और उनका पारिवारिक संस्कार अत्यंत प्रेरणादायक रहा। इदेवगढ़ का यह प्रवास यह सिखाता है कि सबसे सुंदर यात्राएँ वे होती हैं, जो दिलों के बीच होती हैं, जहाँ संबंध बनते हैं, विचार विकसित होते हैं और स्मृतियाँ जीवन भर साथ रहती हैं। यह यात्रा मेरे लिए केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत बन गई है, जो मेरी लेखनी और विचारों में लंबे समय तक जीवित रहेगी। इसके लिए मैं विशेष रूप मशहूर गजलकार श्रभ् अनिल मीत जी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं। हालांकि उनके लिए आभार शब्द बहुत छोटा पड़ रहा है। मगर देवगढ़ यात्रा मेरे लिए किसी तीर्थ से कम नहीं रही।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार 


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