सोमवार, 29 सितंबर 2025

विदेशों में रामलीला मंचनः संस्कृति, इतिहास और हमारी वैश्विक पहचान

 लेख-



भारतीय संस्कृति की सबसे जीवंत और लोकप्रिय परंपराओं में से एक है रामलीला। यह केवल एक धार्मिक नाट्य रूपक नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला, मूल्य सिखाने वाला और संस्कृति को जीवित रखने वाला एक उत्सव है। भारत में इसकी जड़ें गहरी हैं, परंतु इसकी शाखाएँ आज पूरी दुनिया में फैल चुकी हैं। विदेशों में रामलीला का मंचन प्रवासी भारतीयों की आस्था, संस्कार और सांस्कृतिक चेतना का परिचायक है।
रामलीला की उत्पत्ति और भारत में स्वरूप
रामलीला का अर्थ है राम की लीला, अर्थात श्रीराम के जीवन की कथा का मंचन। इसकी उत्पत्ति तुलसीदास कृत रामचरितमानस से मानी जाती है। 16वीं शताब्दी में यह परंपरा संगठित रूप से शुरू हुई और 17वीं सदी तक पूरे उत्तर भारत में लोकप्रिय हो गई। भारत के कई शहरों में आज भी भव्य रामलीलाएँ होती हैं। वाराणसी के रामनगर की रामलीला तो 31 दिनों तक चलती है, जिसमें पूरा शहर थियेटर का रूप ले लेता है। इसी तरह दिल्ली, अयोध्या, वृंदावन और मथुरा की रामलीलाएँ भी प्रसिद्ध हैं। वर्ष 2008 में यूनेस्को ने रामलीला को “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर” की सूची में शामिल कर इसकी वैश्विक महत्ता को मान्यता दी।
प्रवासी भारतीय और विदेशों में रामलीला का आरंभ
19वीं शताब्दी में जब भारतीय मजदूर फ़िजी, मॉरीशस, त्रिनिदाद, सूरीनाम, गुयाना और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में गए, तो वे अपनी धार्मिक परंपराएँ साथ लेकर गए। मंदिर, हवन, भजन, कीर्तन और रामायण पाठ के साथ उन्होंने रामलीला का मंचन भी प्रारंभ किया। यह उनके लिए केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि अपनी पहचान और संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम था।
देशवार रामलीला का स्वरूप
1. त्रिनिदाद और टोबैगो-यहाँ रामलीला की परंपरा 19वीं शताब्दी से है। पूरे गाँव के लोग इसमें शामिल होते हैं, और कभी-कभी राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों को भी इसमें प्रतीकात्मक ढंग से पिरोया जाता है। आज भी यह प्रवासी भारतीयों की आस्था और पहचान का अभिन्न हिस्सा है।
2. सूरीनाम और गुयाना-लगभग 150 साल पहले भारतीय प्रवासियों ने यहाँ रामलीला का मंचन शुरू किया। यह उत्सव वहाँ धार्मिक होने के साथ-साथ सांस्कृतिक मेल-मिलाप का प्रतीक बन गया है।
3. मॉरीशस और फ़िजी-इन द्वीपीय देशों में भी भारतीय प्रवासियों ने रामलीला परंपरा को स्थापित किया। फ़िजी की रामलीलाओं में भोजपुरी और अवधी भाषा का प्रभाव स्पष्ट दिखता है।
4. दक्षिण अफ्रीका-यहाँ भारतीय मूल के लोगों ने रामायण और रामलीला दोनों को लोकप्रिय बनाया। आज भी बड़े मंदिरों और सांस्कृतिक सभाओं में रामलीला का मंचन होता है।
5. अमेरिका, कनाडा और यूरोप-न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफ़ोर्निया, लंदन और पेरिस जैसे शहरों में भारतीय संगठन हर साल भव्य रामलीला आयोजित करते हैं। यहाँ केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोग भी रुचि लेकर अभिनय और दर्शक के रूप में हिस्सा लेते हैं।
6. थाईलैंड, कंबोडिया और इंडोनेशिया-इन देशों में रामायण पहले से ही संस्कृति का हिस्सा रही है। थाईलैंड में इसे रामाकियन के रूप में जाना जाता है और राजकीय स्तर पर मंचन किया जाता है। इंडोनेशिया के बाली द्वीप में रामायण कथा नृत्य-नाट्य के रूप में प्रस्तुत होती है।
विदेशों में रामलीला के स्वरूप और चुनौतियाँ
विदेशों में मंचन करते समय कई चुनौतियाँ आती हैंः
1.भाषा की समस्या-हिंदी या अवधी का ज्ञान हर प्रवासी पीढ़ी को नहीं होता, इसलिए कई जगह अंग्रेज़ी या स्थानीय भाषाओं में भी संवाद बोले जाते हैं।
2.संसाधन और मंचन शैली-छोटे समुदायों में मंच और तकनीकी साधन सीमित होते हैं।
3.सांस्कृतिक अनुकूलन-कुछ जगह प्रस्तुति में स्थानीय कला शैलियों का भी समावेश हो जाता है। फिर भी प्रवासी भारतीयों ने इन कठिनाइयों को अवसर में बदला और रामलीला को एक वैश्विक रंगमंचीय उत्सव बना दिया।
रामलीलाः वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर
रामलीला अब केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही। यह प्रवासियों के लिए सांस्कृतिक पहचान का आधार है। पीढ़ियों को जोड़ने का माध्यम है। भारत और विश्व समुदाय के बीच सांस्कृतिक सेतु का कार्य करती है। इसकी लोकप्रियता ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय संस्कृति का दायरा सीमाओं से परे है और इसका आकर्षण सार्वभौमिक है।
विश्व में सनातनियों की संख्या
रामलीला केवल हिंदू समाज की परंपरा है, इसलिए इसका संबंध सनातनियों की वैश्विक उपस्थिति से भी है। वर्तमान में विश्व में लगभग 1.2 अरब (120 करोड़) हिंदू हैं। यह कुल विश्व जनसंख्या का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा है। भारत में लगभग 94 प्रतिशत हिंदू रहते हैं। नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया (बाली), मॉरीशस, फ़िजी, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका में भी बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय मौजूद है। यह आंकड़े बताते हैं कि विश्व स्तर पर हिंदू समाज की मजबूत उपस्थिति है, और यही कारण है कि रामलीला जैसी परंपराएँ विदेशों में जीवित रहकर और भी समृद्ध हो रही हैं।
विदेशों में रामलीला का मंचन प्रवासी भारतीयों की सांस्कृतिक जीवटता और धार्मिक आस्था का अद्भुत उदाहरण है। चाहे वह कैरेबियाई देशों का गाँव हो, अमेरिका का कोई महानगर या थाईलैंड का राजदरबार, राम की कथा और उनकी लीला हर जगह लोगों को आकर्षित करती है। यह परंपरा केवल भारतीयों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक समाज के लिए भी सत्य, धर्म और आदर्श जीवन मूल्यों का संदेश देती है। रामलीला ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय संस्कृति केवल भारत की धरोहर नहीं, बल्कि पूरे विश्व की साझा धरोहर है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

गीता-जीवन प्रबंधन की शाश्वत गाइडबुक

 लेख-

श्री

मद्भगवद्गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और प्रबंधन का शाश्वत मार्गदर्शक है। महाभारत युद्ध के मैदान में जब अर्जुन मोह और द्वंद्व में उलझ गए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिए, वही उपदेश आज भी प्रत्येक व्यक्ति के जीवन, कार्यक्षेत्र, संगठन और समाज के लिए प्रासंगिक हैं। गीता हमें सिखाती है कि सफलता केवल परिणाम पाने का नाम नहीं, बल्कि संतुलित, मूल्य-आधारित और कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीने की प्रक्रिया का नाम है। यही कारण है कि आधुनिक प्रबंधन विज्ञान की अनेक अवधारणाएँ गीता से मेल खाती हैं।

कर्म का महत्व और फल से विरक्ति
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है-
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥” (2/47)

इस श्लोक का अर्थ है कि मनुष्य को केवल अपने कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। जीवन प्रबंधन के संदर्भ में यह सूत्र सिखाता है कि हमें कर्म को पूरी निष्ठा और दक्षता से करना चाहिए। परिणाम की चिंता हमें तनावग्रस्त बनाती है और हमारी क्षमता को बाधित करती है। प्रो. एस. राधाकृष्णन लिखते हैं-“गीता का यह उपदेश व्यक्ति को निष्काम कर्म की ओर ले जाता है, जहाँ कार्य कर्तव्य भावना से होता है, न कि स्वार्थ से।”

समत्व और मानसिक संतुलन
गीता का दूसरा महान संदेश है-
“समत्वं योग उच्यते।” (2/48)
अर्थात सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय, इन सब स्थितियों में संतुलित रहना ही योग है। यह शिक्षा आधुनिक जीवन के स्ट्रेस मैनेजमेंट और इमोशनल इंटेलीजेंस से गहरे रूप से जुड़ी हुई है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-“भगवद्गीता हमें यही सिखाती है कि मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मानसिक संतुलन को बनाए रखना चाहिए।” आज के कॉर्पोरेट जगत में जहाँ प्रतियोगिता और दबाव बहुत अधिक है, वहाँ यह सूत्र हर व्यक्ति को मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करता है।

निर्णय क्षमता और नेतृत्व
महाभारत युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन अपने ही सगे-सम्बंधियों को देखकर द्वंद्व और मोह में पड़ गए थे। उन्हें लगा कि युद्ध करना अधर्म होगा। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्तव्य और धर्म का बोध कराया और उनका मोह भंग किया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन और कार्यक्षेत्र में आने वाले कठिन निर्णय विवेक और साहस से लेने चाहिए। एक सच्चा नेता केवल आदेश देने वाला नहीं होता, बल्कि मार्गदर्शन और प्रेरणा देने वाला होता है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने गीता की व्याख्या करते हुए कहा था-“गीता एक ऐसी गाइडबुक है, जो हमें कठिन परिस्थितियों में भी स्पष्ट निर्णय लेने की शक्ति देती है।”

आत्मनियंत्रण और अनुशासन
गीता का एक महत्त्वपूर्ण श्लोक है-
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।” (6/5)
अर्थात मनुष्य को अपने आत्मबल से स्वयं को ऊपर उठाना चाहिए। आत्मनियंत्रण और आत्म-प्रेरणा के बिना जीवन में सफलता संभव नहीं। महात्मा गांधी गीता को अपनी “आध्यात्मिक डिक्शनरी” कहते थे। उनका मानना था-“गीता का संदेश आत्मनियंत्रण और आत्मबल पर आधारित है, जिसने मुझे हर संकट में मार्ग दिखाया।” आज जब युवा नशे, आलस्य और नकारात्मकता से घिर जाते हैं, तब यह श्लोक उन्हें आत्मविश्वास और अनुशासन का मार्ग दिखाता है।

कार्य और धर्म का संतुलन
गीता कहती है-
“श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।” (3/35)
अर्थात अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन करना, चाहे वह अपूर्ण ही क्यों न हो, दूसरों के धर्म का पालन करने से श्रेष्ठ है। जीवन प्रबंधन की दृष्टि से यह सूत्र हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सजग और निष्ठावान बनाता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था-“गीता का यह सूत्र हमें अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बनाता है। समाज और राष्ट्र का विकास तभी संभव है जब हर व्यक्ति अपने धर्म का पालन करे।”

भक्ति और समर्पण का भाव
गीता कहती है-
“यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥” (9/27)

अर्थात जो भी तुम करते हो, खाते हो, दान देते हो या तप करते हो, सब मुझे अर्पित करो। यह श्लोक हमें वर्क एज की प्रेरणा देता है। जब हम अपने कार्य को ईश्वर-समर्पण की भावना से करते हैं, तो उसमें उत्कृष्टता और पवित्रता आ जाती है।

टीमवर्क और मार्गदर्शन
महाभारत युद्ध केवल अर्जुन की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं थी, बल्कि पूरी पांडव टीम की लड़ाई थी। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मार्गदर्शन देकर पूरी टीम को विजय दिलाई। यह सूत्र बताता है कि इफैक्टिव टीमवर्क के लिए इफैक्टिव मेंटर आवश्यक है। आधुनिक प्रबंधन गुरु पीटर ड्रकर भी कहते हैं-“भारतीय गीता जैसी शिक्षाएँ हमें दिखाती हैं कि प्रबंधन केवल लक्ष्य प्राप्ति नहीं, बल्कि मूल्य-आधारित निर्णय लेने की कला है।”

आधुनिक जीवन में गीता की प्रासंगिकता
आज के समय में कार्यस्थल पर प्रतिस्पर्धा और दबाव बढ़ रहा है, पारिवारिक जीवन असंतुलित हो रहा है, युवा तनाव और असंतोष से जूझ रहे हैं, नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है, ऐसी परिस्थितियों में गीता जीवन प्रबंधन की हॉल्स्टिक एप्रोच प्रदान करती है। यह केवल सफलता की नहीं, बल्कि संतुलित और मूल्य-आधारित जीवन जीने की शिक्षा देती है।
श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश शाश्वत है। यह हमें निष्काम कर्म, समत्व, आत्मनियंत्रण, धर्म और समर्पण जैसे मूल्यों का पाठ पढ़ाती है। यह केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन की परिपूर्ण गाइडबुक है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, “गीता एक ऐसा ग्रंथ है, जिसे यदि आत्मसात कर लिया जाए तो जीवन की कोई भी समस्या हमें विचलित नहीं कर सकती।” आज जब विश्वभर के मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट्स नई-नई थ्योरी और मॉडल प्रस्तुत कर रहे हैं, तब भी गीता का संदेश समय की कसौटी पर खरा उतरता है। वास्तव में, यदि हम गीता के इन सूत्रों को व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में आत्मसात कर लें, तो सफलता, संतुलन और संतोष तीनों सहज रूप से प्राप्त हो सकते हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


शनिवार, 27 सितंबर 2025

जेन ज़ी में बढ़ती नफ़रत और आक्रोशः कारण और निवारण

 लेख-

आज का युवा समाज में सबसे सक्रिय, जागरूक और तकनीकी रूप से सक्षम वर्ग माना जाता है। वर्ष 1995 से 2010 के बीच जन्मी जेनरेशन ज़ी (जेन ज़ी) न केवल डिजिटल दुनिया में माहिर है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति भी संवेदनशील है। हालांकि, इसके साथ ही इस पीढ़ी में बढ़ती नफ़रत, असंतोष और आक्रोश भी एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। यदि इसे अनदेखा किया गया तो भविष्य में इसके दुष्परिणाम समाज, परिवार और देश दोनों पर पड़ सकते हैं।
बढ़ते आक्रोश और नफ़रत के कारण
1-डिजिटल युग और सोशल मीडिया दबाव-जेन जी ने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर बिताया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और ट्विटर जैसी प्लेटफ़ॉर्म पर लगातार तुलना, ट्रोलिंग और फेक न्यूज़ उन्हें मानसिक तनाव और आक्रोश की स्थिति में ले जाती है। वर्चुअल दुनिया में अपनी पहचान बनाने की कोशिश और रियल दुनिया में असफलता का अनुभव नकारात्मक भावनाओं को बढ़ावा देता है। टिम एल्मोर के शब्दों में-“हमारे समाज में बुरे बच्चे नहीं हैं; हम ऐसे बच्चों का सामना कर रहे हैं जो बहुत जल्दी बहुत कुछ जान गए हैं।“ यह उद्धरण दर्शाता है कि जेन ज़ी की जानकारी की अधिकता और डिजिटल युग में बढ़ती जानकारी के कारण वे मानसिक दबाव और असंतोष का सामना कर रहे हैं।
2-रोज़गार और भविष्य की अनिश्चितता-उच्च शिक्षा और कौशल के बावजूद रोज़गार की असुरक्षा जेन ज़ी के लिए चिंता का प्रमुख कारण है। युवाओं को नौकरी में प्रतिस्पर्धा, वेतन असमानता और स्टार्टअप या फ्रीलांसिंग में असफलता जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह निराशा और असंतोष धीरे-धीरे आक्रोश में बदल जाता है।
3-सामाजिक असमानता और राजनीतिक अविश्वास-अमीरी-गरीबी का अंतर, भ्रष्टाचार और राजनीतिक व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी जेन ज़ी को समाज से दूर करती है। यह असंतोष आक्रोश में बदलकर न केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि सार्वजनिक रूप से भी व्यक्त होता है। पंकज मिश्रा लिखते हैं-“वह समय आ गया है जब असंतोष और आक्रोश ने वैश्विक राजनीति और समाज को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।“ यह उद्धरण वैश्विक स्तर पर बढ़ते असंतोष और आक्रोश की गंभीरता को उजागर करता है।
4-परिवार और सामाजिक संरचना में बदलाव-संयुक्त परिवार की टूटती संरचना, बढ़ता अकेलापन और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ युवाओं के आक्रोश में योगदान देती हैं। परिवारिक और सामाजिक समर्थन की कमी उन्हें असंतोषपूर्ण और उग्र बनाती है।
5-सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय मुद्दे-लैंगिक असमानता, जातीय भेदभाव, पर्यावरणीय संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ जेन ज़ी के मन में संवेदनशीलता तो बढ़ाती हैं, लेकिन साथ ही असहायता और आक्रोश की भावना भी उत्पन्न करती हैं।

जेन ज़ी ने कहां-कहां किया हिंसक प्रदर्शन
1-लद्दाख (भारत)-लद्दाख में राज्य-स्तर की मांग को लेकर युवा प्रदर्शन हुए, जिनमें कुछ अराजकता व हिंसा भी हुई। विरोध प्रदर्शन में युवाओं ने भाजपा कार्यालय और अन्य सरकारी इमारतों को आग लगाई। परिणामस्वरूप कम से कम 4 लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए। सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष भी हुआ, पुलिस को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। प्रदर्शनकारियों ने सरकारी वाहनों, स्थानीय कार्यालयों को आग लगाई और तोड़फोड़ की। इस घटना के बाद लद्दाख के प्रमुख कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को गिरफ्तार किया गया।
2-नेपाल में विरोध प्रदर्शन-नेपाल में हाल ही में सोशल मीडिया प्रतिबंध, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को लेकर युवा आंदोलन हुए। इन प्रदर्शनों में सरकारी इमारतों पर हमला, संसद भवन में घुसपैठ, तोड़फोड़, आग लगाने की घटनाएं हुईं। मृतकों की संख्या 70 से ज़्यादा बताई जा रही है और घायल लोगों की संख्या 2,000$ के आसपास। इस हिंसा के कारण निजी और सरकारी संपत्ति को व्यापक क्षति हुई। आर्थिक नुकसान का अनुमान लगभग $22.5 बिलियन तक लगाया गया है, जो नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा असर है।
3-मुर्शिदाबाद (पश्चिम बंगाल, भारत)-वक्फ (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन मुर्शिदाबाद में हिंसक हुए। वहाँ प्रदर्शनकारियों ने घरों पर हमला किया, पुलिस वाहनों को आग लगाई और ट्रेन सेवाओं में रुकावट डाली। इस हिंसा में कम से कम 3 लोग मारे गए, 10 लोग घायल हुए और कई लोगों को स्थानांतरित होना पड़ा। 300 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया।
4-मैडागास्कर-वहां “जेन ज़ी मैडागास्कर” नामक समूह ने बिजली कटौती, भ्रष्टाचार व अन्य समस्याओं के खिलाफ विरोध किया। प्रदर्शन शांतिपूर्ण शुरू हुआ लेकिन बाद में हिंसा और आगजनी में बदल गया। कम से कम 5 लोगों की जान गई। सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा, हवाई यात्राएं प्रभावित हुईं।
आक्रोश और नफ़रत का निवारण
1-मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान-जेन ज़ी के मानसिक स्वास्थ्य को कलंकित न मानते हुए स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों में काउंसलिंग और माइंडफुलनेस कार्यक्रमों को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। यह युवा अपनी भावनाओं को समझने और नियंत्रित करने में सक्षम होंगे।
2-शिक्षा और कौशल विकास-शिक्षा केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और रोजगारोन्मुख होनी चाहिए। स्किल-बेस्ड ट्रेनिंग, इंटर्नशिप और उद्यमिता के अवसर युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेंगे।
3-सकारात्मक सोशल मीडिया उपयोग-डिजिटल साक्षरता और मीडिया लिटरेसी बढ़ाने से जेन ज़ी ऑनलाइन ट्रोलिंग, हेट स्पीच और फेक न्यूज़ से बच सकता है। इसके साथ ही सोशल मीडिया का उपयोग सकारात्मक बदलाव के लिए किया जा सकता है।
4-सांस्कृतिक और सामाजिक जुड़ाव-खेल, कला, साहित्य और सामुदायिक गतिविधियों में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने से उनकी ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगाई जा सकती है। परिवार और समाज में उनकी सहभागिता उन्हें भावनात्मक स्थिरता और संतोष प्रदान करती है।
5-नीतिगत सहयोग और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी-युवाओं को नीति निर्माण और निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना ज़रूरी है। रोज़गार, स्टार्टअप, उद्यमिता और सामाजिक न्याय के लिए सरकारी और निजी स्तर पर सहयोग उन्हें समाज और देश की सकारात्मक दिशा में जोड़ता है।
भविष्य की दिशा
जेन ज़ी का आक्रोश यदि सही दिशा में मोड़ा जाए तो यह सकारात्मक क्रांति का आधार बन सकता है। तकनीकी नवाचार, सामाजिक सुधार और पर्यावरण संरक्षण में यह पीढ़ी अग्रदूत बन सकती है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर कहते हैं-“हिंसा के माध्यम से आप नफ़रत करने वाले को मार सकते हैं, लेकिन नफ़रत को नहीं। वास्तव में, हिंसा केवल नफ़रत को बढ़ाती है।“ यह स्पष्ट करता है कि आक्रोश और हिंसा से न केवल व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक स्तर पर भी समस्याएँ बढ़ती हैं, और समाधान के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। यदि इसे अनदेखा किया गया, तो बढ़ती नफ़रत और असंतोष हिंसा, नकारात्मक आंदोलनों और सामाजिक विखंडन का कारण बन सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि परिवार, समाज, शिक्षा व्यवस्था और सरकार मिलकर जेन ज़ी के आक्रोश को सकारात्मक दिशा में मोड़ें। जेन ज़ी में बढ़ती नफ़रत और आक्रोश समय और परिस्थितियों का परिणाम हैं। इसे नियंत्रित और सकारात्मक बनाने के लिए मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, सामाजिक सहभागिता और नीति निर्माण में युवाओं को शामिल करना अनिवार्य है। यदि यह किया गया, तो जेन ज़ी न केवल समाज की समस्याओं का सामना कर सकेगी, बल्कि नवाचार, सुधार और सकारात्मक बदलाव की दिशा में एक सृजनशील और परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में उभर सकती है।



लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

काव्य मंचों पर कविता का भविष्य-सुरक्षित या चुनौतीपूर्ण?

 लेख-

कविता भारतीय संस्कृति और साहित्य की आत्मा रही है। वैदिक ऋचाओं से लेकर संत कवियों, रीतिकालीन रचनाकारों और आधुनिक प्रगतिशील लेखकों तक कविता ने हमेशा समाज की नब्ज़ को पकड़ा है। बदलते दौर में भी कविता का अस्तित्व जीवित है, परंतु प्रश्न यह है कि काव्य मंचों पर कविता का भविष्य कितना सुरक्षित है?
वर्तमान परिदृश्य
आज भी भारत के अनेक हिस्सों में कवि सम्मेलन, मुशायरे और साहित्यिक गोष्ठियाँ आयोजित होती हैं। इन मंचों पर कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि समाज को आईना भी दिखाते हैं। टीवी और रेडियो के दौर में कवि सम्मेलन बेहद लोकप्रिय थे, वहीं अब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने कविता को वैश्विक पहुँच दी है। यूट्यूब चैनलों और इंस्टाग्राम रील्स ने युवा कवियों को नए दर्शक दिए हैं।
कविता की संभावनाएँ
1. कविता हमारी परंपरा से गहरे जुड़ी है। जब तक संस्कृति जीवित है, कविता भी जीवित रहेगी।
2. डिजिटल माध्यमों ने कविता को सीमाओं से परे पहुँचा दिया है। अब एक कवि गाँव से लिखकर भी पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है।
3. नए कवि मंच पर आकर प्रयोगधर्मी और समसामयिक कविताएँ लिख रहे हैं। यह कविता के भविष्य को ऊर्जा प्रदान करता है।
4. कविता केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का माध्यम भी है। पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण, भ्रष्टाचार, राजनीति आदि विषय कविता के केंद्र में आ रहे हैं।
कविता का स्तर और काव्य मंचों की गरिमा को लेकर साहित्यिक जगत में लगातार चर्चा होती रहती है। इसे संतुलित रूप से समझना ज़रूरी है।
पहले और अब का अंतर
1. पुराने समय के काव्य मंच मंच-काव्य मंचों पर महाकाव्यीय परंपरा, गंभीर चिंतन, दार्शनिक गहराई और शिल्प की कसौटी पर रचनाएँ पढ़ी जाती थीं। कवि सम्मेलन साहित्यिक पर्व की तरह होते थे, जहाँ नीरज, गोपालदास ‘नीरज’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, बालकवि बैरागी, सोम ठाकुर, डॉ. कुंअर बेचैन, भारत भूषण, किशन सरोज आदि की रचनाएँ गंभीर अध्ययन और चिंतन को बढ़ावा देती थीं।
2. आज के काव्य मंच-मंचों पर मनोरंजन और तात्कालिक प्रभाव को ज़्यादा महत्व मिलने लगा है। हास्य-व्यंग्य और हल्की-फुल्की प्रस्तुतियों की माँग बढ़ी है, क्योंकि श्रोता जल्दी जुड़ना चाहते हैं। गहराई और साहित्यिक प्रयोग अक्सर मंच से कम होते दिखाई देते हैं।
क्या वास्तव में स्तर गिरा है?
गिरावट के कारण-बाज़ारवाद और आयोजनों की “लोकप्रियता” की होड़, दर्शकों की बदलती रुचियाँ, सोशल मीडिया के छोटे-छोटे क्लिप्स की संस्कृति।
सकारात्मक पक्ष-कविता अब पहले से ज़्यादा लोगों तक पहुँच रही है। नए युवा कवि अपनी आवाज़ लेकर आ रहे हैं। जनसरोकार, समकालीन मुद्दे (रोज़गार, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार, देशभक्ति) अब मंच का हिस्सा बनते हैं।
यह कहना उचित होगा कि काव्य मंखें का स्तर गिरा भी है और बदला भी है। साहित्यिक गहराई और शिल्प में जो अनुशासन पहले था, वह कम हुआ है। लेकिन लोकप्रियता, व्यापक पहुँच और नए प्रयोग की दृष्टि से मंचों ने अपने प्रभाव का विस्तार किया है। मतलब आज के मंच पर कविता अधिक “जनप्रिय” हो गई है, लेकिन कई बार “साहित्यिक कसौटी” से थोड़ी दूर भी हो जाती है।
चुनौतियाँ
1.व्यावसायिकता की कमी-कविता से जीविका चलाना कठिन है। मंचीय कविता सम्मान तो देती है, पर स्थायी आर्थिक आधार नहीं।
2.लोकप्रियता बनाम गहराई-आज श्रोता तुरंत हँसी या ताली बजाने वाली रचनाओं को प्राथमिकता देते हैं। गंभीर और चिंतनशील कविताएँ कम सुनी जाती हैं।
3.साहित्यिक संस्थाओं की उदासीनता-कई बार सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएँ कविता को प्रोत्साहन देने में सक्रिय नहीं रहतीं।
4.डिजिटल विचलन-सोशल मीडिया पर सतही कविता को त्वरित लोकप्रियता मिल जाती है, जिससे गहन रचनाएँ पीछे छूटने का खतरा है।
5.श्रोताओं का बदलता स्वाद-युवा वर्ग का ध्यान अधिकतर फ़िल्मी गीतों या शॉर्ट-फ़ॉर्म कंटेंट पर रहता है। ऐसे में कविता के लिए श्रोताओं का स्थायी आधार बनाना चुनौतीपूर्ण है।
समाधान और भविष्य की दिशा
ऽ शिक्षा में कविता का स्थान मज़बूत करना-विद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर कविता को रचनात्मक अभ्यास की तरह पढ़ाया जाए।
ऽ साहित्यिक मंचों का डिजिटलीकरण-कवि सम्मेलनों की लाइव स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग से कविता व्यापक श्रोताओं तक पहुँचेगी।
ऽ नए कवियों का प्रोत्साहन-पुरस्कार, फ़ेलोशिप और मंच उपलब्ध कराकर नई प्रतिभाओं को आगे लाना होगा।
ऽ कविता और समाज का सेतु-कवि यदि सामाजिक मुद्दों पर रचनाएँ करेंगे, तो कविता प्रासंगिक बनी रहेगी।
ऽ सहयोग और संरक्षण-सरकार, निजी संस्थाएँ और समाज मिलकर कवियों को संरक्षण दें।
कविता का भविष्य काव्य मंचों पर न केवल सुरक्षित है, बल्कि संभावनाओं से भरा हुआ है। हालाँकि इसे जीवित रखने के लिए चुनौतियों का सामना करना होगा। कविता को समय और तकनीक के साथ चलना होगा, ताकि वह केवल मंचों तक सीमित न रहकर समाज की चेतना का हिस्सा बने।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)



मंगलवार, 23 सितंबर 2025

दिल्ली-एनसीआर की रामलीला समितियाँः परंपरा, विवाद और बदलता स्वरूप

 लेख-

रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, लोक आस्था और सामाजिक समरसता का प्रतीक भी है। दिल्ली-एनसीआर में हर साल दशहरे के अवसर पर भव्य रामलीलाएँ आयोजित होती हैं। इन आयोजनों में लाखों लोग शामिल होते हैं। मंचन से लेकर झाँकियों तक सब कुछ महीनों पहले से तैयार होता है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह परंपरा कई तरह के विवादों और खींचतान का शिकार भी रही है। कहीं कलाकारों की चयन प्रक्रिया सवालों के घेरे में आई, तो कहीं परंपरागत भाषा और शैली संकट में पड़ी। कुछ जगह सुरक्षा और व्यवस्थागत लापरवाही ने विवादों को जन्म दिया तो कहीं रामलीला समिति पदाधिकरियों में आपसी खींचतान देखी गई।

दिल्लीः पूनम पांडे और लवकुश समिति विवाद
दिल्ली की सबसे चर्चित घटना इस वर्ष (2025) की रही, जब चांदनी चौक की लवकुश रामलीला समिति ने अभिनेत्री पूनम पांडे को मंदोदरी की भूमिका के लिए चुना। जैसे ही यह खबर फैली, बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद सहित अनेक धार्मिक संगठनों ने इसका विरोध किया। उनका तर्क था कि रामलीला एक पवित्र सांस्कृतिक मंच है, और इसमें ऐसे कलाकारों को शामिल करना ठीक नहीं, जिनकी सार्वजनिक छवि विवादास्पद रही हो।
समिति के अध्यक्ष अर्जुन कुमार और महासचिव सुभाष गोयल ने पहले निर्णय का बचाव किया, लेकिन जब दबाव बढ़ा और जनता में असंतोष सामने आया तो उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर घोषणा की कि पूनम पांडे इस वर्ष मंचन का हिस्सा नहीं होंगी। दिल्ली बीजेपी मीडिया सेल प्रमुख प्रवीण शंकर कपूर ने भी खुलकर विरोध किया। अंततः समिति ने पूनम पांडे को पत्र लिखकर इस भूमिका से हटाने का निर्णय सुनाया।
ग़ाज़ियाबादः ऊँट की मौत और कलाकार चयन
ग़ाज़ियाबाद में हाल ही में रामलीला आयोजन विवादों में तब आया जब राजनगर की रामलीला समिति में झाँकियों और मनोरंजन के लिए रखे गए ऊँट की मृत्यु हो गई। पशु अधिकार संगठनों ने इसे लापरवाही बताया और पुलिस पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाया। समिति अध्यक्ष जयकुमार गुप्ता ने कहा कि उन्हें ऊँट की खराब हालत की जानकारी नहीं थी, जबकि एनजीओ एफआईएपीओ की अनामिका राणा ने समिति और देखरेख करने वालों पर गंभीर आरोप लगाए।
इसके अलावा, ग़ाज़ियाबाद की कविनगर रामलीला में कलाकार चयन को लेकर चर्चा रही। यहां मिस सहारनपुर अनुष्का यादव को सीता और इंजीनियर अंशुल सिंह को रावण की भूमिका दी गई। यह विवाद नहीं बना, लेकिन चयन प्रक्रिया को लेकर स्थानीय स्तर पर बहस जरूर हुई। इससे पता चलता है कि कलाकारों की पृष्ठभूमि और पहचान भी अब जनता के बीच चर्चा का विषय बनती है। कवि नगर स्थित श्री धार्मिक रामलीला समिति में अध्यक्ष और महामंत्री पर गंभीर आरोप लगे हैं। समिति के आजीवन सदस्य और पूर्व सांसद डॉ. रमेश चंद्र तोमर ने आरोप लगाया है कि नियम विरुद्ध तरीके से उन्हें समिति से बाहर करने का प्रयास किया जा रहा है। डॉ. तोमर का कहना है कि वे समिति के आजीवन सदस्य हैं, फिर भी अध्यक्ष और महामंत्री ने उन्हें हटाने का नोटिस जारी कर दिया। उनका आरोप है कि समिति के भीतर कुछ लोग व्यक्तिगत लाभ और राजनीतिक दबाव में निर्णय ले रहे हैं। संजय नगर सेक्टर-23 में आयोजित होने वाली रामलीला भी राजनीतिक महाभारत का मैदान बनी हुई है। यहां भाजपा नेता प्रदीप चौधरी और पार्षद पप्पू नागर के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। बताया जा रहा है कि रोजाना नए-नए आदेश पत्र जारी किए जा रहे हैं, जिससे मंचन की तैयारी पर भी असर पड़ रहा
नोएडाः आधुनिक मंच और पुलिस की सख्ती
नोएडा में रामलीला समितियों का स्वरूप धीरे-धीरे बदल रहा है। श्री सनातन धर्म रामलीला, श्री राम मित्र मंडल जैसी समितियाँ भव्य मंच, स्क्रीन और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं। इस परंपरा और आधुनिकता का मेल दर्शकों को आकर्षित तो कर रहा है, लेकिन परंपरावादियों के बीच यह बहस छेड़ रहा है कि क्या रामलीला को इतने आधुनिक रूप में प्रस्तुत करना उचित है। इसके साथ ही, पुलिस और प्रशासन भी हर साल अधिक सतर्क हो रहा है। 2024 में नोएडा पुलिस ने भीड़ नियंत्रण के लिए धारा 144 लागू की और समितियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि सुरक्षा में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।
फरीदाबादः भाषा और परंपरा का संकट
फरीदाबाद की जागृति रामलीला समिति ने इस साल घोषणा की कि वे परंपरागत “बन्नुवाली रामलीला” का मंचन अब नहीं कर पाएंगे। यह रामलीला पंजाबी की एक विशेष बोली ‘बन्नुवाली’ में होती थी और लंबे समय से स्थानीय पहचान का हिस्सा रही है। समिति से जुड़े गुरचरण सिंह भाटिया ने कहा कि अब उस भाषा को जानने वाले लोग लगभग खत्म हो चुके हैं, इसलिए मंचन संभव नहीं है।
गुरुग्रामः विवाद कम, चुनौतियाँ वही
गुरुग्राम की रामलीलाओं से जुड़ी बड़े विवाद की खबरें कम मिली हैं। यहाँ आयोजन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहते हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर समितियों को भूमि, बिजली, अनुमति और फंड जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह बताता है कि भले ही गुरुग्राम मीडिया की सुर्खियों में न आए, पर समिति स्तर पर संघर्ष वही हैं जो दिल्ली या ग़ाज़ियाबाद में देखने को मिलते हैं।
रामलीलाओं में विवाद-एक नजर में
दिल्ली-एनसीआर की रामलीला समितियों के विवादों को अगर एक नज़र से देखें तो चार मुख्य प्रकार उभरते हैं-
1.कलाकार चयन और छवि विवाद-जैसे दिल्ली में पूनम पांडे का मामला।
2.सुरक्षा और लापरवाही-ग़ाज़ियाबाद में ऊँट की मौत, दिल्ली में मंच पर कलाकार का गिरना।
3.परंपरा बनाम आधुनिकता-नोएडा में एलईडी और तकनीक का इस्तेमाल, फरीदाबाद में भाषा का संकट।
4.संसाधन और प्रशासनिक दबाव-गुरुग्राम और अन्य जिलों में भूमि, बिजली, अनुमति जैसी समस्याएँ।
दिल्ली-एनसीआर की रामलीला समितियों में विवाद और आपसी खींचतान इस बात का संकेत है कि सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर समाज में संवेदनशीलता कितनी गहरी है। चाहे वह पूनम पांडे को लेकर हुआ विरोध हो, ग़ाज़ियाबाद में ऊँट की मौत हो, नोएडा की आधुनिकता हो या फरीदाबाद की भाषा का संकट, हर घटना हमें यह याद दिलाती है कि परंपरा को निभाने के लिए केवल उत्साह काफी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और दूरदृष्टि भी आवश्यक है। रामलीला की शक्ति इसी में है कि वह समय के साथ बदल भी सकती है और परंपरा को संभाल भी सकती है। जरूरत है कि समितियाँ और समाज दोनों मिलकर ऐसा संतुलन साधें, जिससे मर्यादा भी बनी रहे और आधुनिक दर्शकों को भी आकर्षित किया जा सके।


लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)







दिल्ली-एनसीआर महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं

 लेख-


बढ़ते महिला अपराध बने पुलिस के लिए चुनौती
दिल्ली-एनसीआर देश की राजधानी क्षेत्र होने के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र है। यहाँ की जनसंख्या विविध है, प्रवासी आबादी बड़ी संख्या में रहती है और शहरी जीवन की जटिलताएँ हर क्षेत्र में दिखाई देती हैं। इसी जटिलता का असर महिला सुरक्षा और अपराध की स्थिति पर भी देखा जाता है। पिछले पाँच वर्षों (2020-2024) के आँकड़े, रिपोर्ट्स और घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि महिला अपराध अब भी एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं। दिल्ली-एनसीआर में महिला अपराध एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती बने हुए हैं। एनसीआरबी और दिल्ली पुलिस के आँकड़े बताते हैं कि हालाँकि 2024 में अपराधों में कुछ कमी आई है, फिर भी दिल्ली महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित महानगरों में गिनी जाती है। अपराधों की विविधता, घरेलू हिंसा, दहेज, अपहरण, छेड़छाड़, बलात्कार, यह दर्शाती है कि समस्या केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक भी है। पुलिस की त्वरित कार्रवाई, अदालतों की तेज़ सुनवाई और समाज में मानसिकता परिवर्तन, तीनों स्तरों पर एक साथ काम करने की आवश्यकता है। तभी आने वाले वर्षों में दिल्ली-एनसीआर को वास्तव में महिलाओं के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक क्षेत्र बनाया जा सकेगा।

महिला अपराधों के आँकड़े
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और दिल्ली पुलिस द्वारा जारी आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में महिला अपराधों की संख्या पिछले पाँच वर्षों में ऊँची रही है। एनसीआरबी के अनुसार 2021 में दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लगभग 13,982 मामले दर्ज हुए, जो 2022 में बढ़कर 14,158 तक पहुँच गए। यानी महामारी के बाद के वर्षों में मामूली बढ़ोतरी देखी गई। दिल्ली पुलिस के अनुसार 2023 की तुलना में 2024 में महिला अपराधों में लगभग 11 प्रतिशत की कमी आई है। हालाँकि, यह कमी सांत्वना देने वाली है, फिर भी दिल्ली अब भी 19 महानगरों में महिला अपराध के मामले दर्ज कराने में सबसे ऊपर बनी हुई है।

महिला अपराधों की प्रमुख श्रेणियाँ
महिला अपराध अलग-अलग रूपों में सामने आते हैं। एनसीआरबी के आँकड़े इस विविधता को स्पष्ट करते हैं।
1-पति या ससुराल वालों द्वारा क्रूरता (आईपीसी 498)-यह श्रेणी सबसे अधिक मामलों की है, कुल अपराधों का लगभग 31 प्रतिशत। घरेलू हिंसा, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना इस श्रेणी में आती है।
2-महिलाओं का अपहरण और किडनैपिंग-लगभग 19 प्रतिशत मामले इसी श्रेणी में दर्ज होते हैं। इसमें विवाह हेतु अपहरण, यौन शोषण के उद्देश्य से अपहरण जैसे अपराध शामिल हैं।
3-महिलाओं पर हमला, छेड़छाड़ और अश्लील हरकतें-लगभग 18-19 प्रतिशत मामले। सार्वजनिक स्थलों पर छेड़छाड़, कार्यस्थल पर उत्पीड़न आदि इसमें आते हैं।
4-बलात्कार-यह श्रेणी कुल मामलों का लगभग 7 प्रतिशत हिस्सा रखती है। आँकड़ों के अनुसार दिल्ली में हर दिन कई रेप केस दर्ज होते हैं, जिससे यह अपराध विशेष रूप से संवेदनशील श्रेणी मानी जाती है।
5-इनके अलावा दहेज हत्या, पीछा करना, साइबर अपराध, मानव तस्करी और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न जैसी घटनाएँ भी सामने आती रहती हैं।

जिलेवार आंकड़े

1-दिल्ली (एनसीटी)
2020-लगभग 9,782 मामले दर्ज हुए (एनसीआरबी)।
2021-लगभग 13,982 मामले।
2022-कुल 14,158 मामले (एनसीआरबी रिपोर्ट)।
2023-एनसीआरबी की रिपोर्ट अभी प्रकाशित नहीं, पर दिल्ली पुलिस व मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 2023 में भी महिला अपराधों में वृद्धि देखी गई।
2024-दिल्ली पुलिस की आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में रेप के लगभग 2,076 मामले दर्ज हुए, अन्य श्रेणियों में भी सैकड़ों मामले आए।

2-गाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश)
2020-341 मामले दर्ज हुए।
2021-591 मामले।
2022-1,063 मामले (एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार)।
2023-स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार 2022 की तुलना में और वृद्धि दर्ज हुई, पर समेकित संख्या उपलब्ध नहीं।
2024-अभी तक आधिकारिक वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है।

3-गौतम बुद्ध नगर (नोएडा, यूपी)
2020-कुल अपराध लगभग 9,130
2021-रेप के लगभग 242 मामले, अन्य महिला अपराध भी जोड़े जाने पर संख्या अधिक रही।
2022-रेप के लगभग 226 मामले, घरेलू हिंसा व छेड़छाड़ जैसे अपराध भी काफी दर्ज हुए।
2023-रेप मामलों की संख्या घटकर लगभग 140 रही।
2024-पूर्ण आंकड़ा अभी सार्वजनिक नहीं, केवल आंशिक श्रेणियों के रिपोर्टेड केस उपलब्ध हैं।

4-फरीदाबाद (हरियाणा)
2020 से 2022-एनसीआरबी के अनुसार महिला अपराधों की संख्या लगातार बढ़ती रही, पर जिला स्तर पर हर साल का आंकड़ा सीमित रूप से उपलब्ध है।
2023-दर्ज मामलों में वृद्धि दिखी।
2024-जनवरी से जून तक के छह महीनों में ही 437 मामले दर्ज किए गए (जिसमें दुष्कर्म, छेड़छाड़, दहेज उत्पीड़न शामिल हैं)।

5-गुरुग्राम (हरियाणा)
2020 से 2021-एनसीआरबी के अनुसार महिला अपराधों के मामले हर साल बढ़ रहे थे।
2022-जनवरी से अगस्त तक महिला अपराधों में लगभग 57 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी (पिछले साल की तुलना में)।
2023-महिला अपराधों के मामलों में वृद्धि की पुष्टि स्थानीय रिपोर्टों में हुई।
2024-पूरे वर्ष में कुल 1,727 मामले दर्ज हुए (हरियाणा पुलिस डेटा के अनुसार)।

गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया
दिल्ली पुलिस हर दर्ज मामले पर कार्रवाई करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार करती है, लेकिन समस्या गिरफ्तारी तक ही सीमित नहीं है। असली चुनौती चार्जशीट दाखिल करने और अदालत में सजा दिलाने की प्रक्रिया में आती है।
कई मीडिया रिपोर्टों और एनसीआरबी के विश्लेषणों के अनुसार दिल्ली में चार्जशीट दाखिल करने की दर अपेक्षाकृत कम है। कुछ मामलों में यह दर 30 प्रतिशत के आसपास बताई गई है, जबकि देश के अन्य राज्यों में यह आँकड़ा इससे कहीं बेहतर है। इसी प्रकार सजा दिलाने की दर (कनविक्शन रेट) भी कम है। इसका सीधा असर यह होता है कि पीड़िता को न्याय पाने में लंबा समय लगता है और अपराधी अक्सर छूट जाते हैं।

पुलिस और न्यायिक व्यवस्था के सामने चुनौतियाँ
महिला अपराधों को रोकने और दोषियों को सजा दिलाने में पुलिस और न्यायिक तंत्र कई बड़ी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
1-अत्यधिक केस-लोड-दिल्ली जैसे महानगर में महिला अपराधों की संख्या बहुत अधिक है। प्रत्येक थाने पर सैकड़ों मामले लंबित रहते हैं।
2-साक्ष्य संग्रह में कमी-मेडिकल परीक्षण, फॉरेंसिक जांच और डिजिटल सबूत जुटाने में अक्सर देरी होती है। इससे चार्जशीट कमजोर हो जाती है।
3-अदालतों में लंबित मुकदमे-महिला अपराधों के हजारों मामले वर्षों तक अदालतों में लंबित रहते हैं। इससे पीड़िताओं का विश्वास कमजोर होता है।
4-सामाजिक दबाव-घरेलू हिंसा या दहेज जैसे मामलों में परिवार का दबाव, समझौते की कोशिशें और बयान बदलना आम है। इससे जांच प्रभावित होती है।
5-माइग्रेशन और जनसंख्या का दबाव-दिल्ली-एनसीआर की बदलती जनसंख्या, अस्थायी बस्तियाँ और अपराधी नेटवर्क की मौजूदगी पुलिस के लिए चुनौती है।
6-कानूनी बदलाव और प्रशिक्षण-हाल के वर्षों में दंड संहिता और आपराधिक कानूनों में बदलाव हुए हैं। पुलिस को इनके अनुरूप प्रशिक्षण और संसाधन नहीं मिल पाते।
7-डेटा पारदर्शिता की कमी-एनसीआरबी और दिल्ली पुलिस के आँकड़े कई बार अलग-अलग तस्वीर दिखाते हैं। इससे नीति-निर्माण में कठिनाई होती है।
सुधार के सुझाव
महिला अपराधों को कम करने और पीड़िताओं को न्याय दिलाने के लिए कई उपाय सुझाए जा सकते हैं।
1-फॉरेंसिक और मेडिकल प्रतिक्रिया को तेज़ करना ताकि हर जिले में त्वरित फॉरेंसिक यूनिट हो, जिससे सबूत तुरंत इकट्ठा किए जा सकें।
2-महिला हेल्प डेस्क और वन स्टॉप सेंटर, थानों में महिला हेल्प डेस्क सक्रिय हों और पीड़िताओं को परामर्श, कानूनी मदद और सुरक्षित स्थान तुरंत उपलब्ध कराया जाए।
3-विशेष प्रशिक्षण, पुलिसकर्मियों को जेंडर संवेदनशील जांच और पीड़िताओं से संवाद की ट्रेनिंग दी जाए।
4-तेजी से न्यायिक प्रक्रिया, महिला अपराधों के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बढ़ाए जाएँ।
5-समुदाय और एनजीओ सहयोग, समाज में जागरूकता अभियान चलाकर महिला अपराधों की रिपोर्टिंग को बढ़ावा देना।
6-शहरी ढाँचे में सुधार, अँधेरी सड़कों पर रोशनी, सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा व्यवस्था, सीसीटीवी कैमरों का विस्तार और महिला सुरक्षा ऐप्स का प्रचार।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


सोमवार, 22 सितंबर 2025

दिल्ली-एनसीआर में उच्च शिक्षा का हाल-खूबियां, कमियां और चुनौतियां

 लेख-

 
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में दिल्ली, उत्तर प्रदेश के जिले जैसे गौतमबुद्ध नगर (नोएडा, ग्रेटर नोएडा), गाजियाबाद, हरियाणा के जिले जैसे फरीदाबाद, गुरुग्राम, सोनीपत आदि शामिल हैं। ये क्षेत्र शिक्षा की दृष्टि से देश में अग्रणी हैं, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं। दिल्ली-एनसीआर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश के अग्रिम क्षेत्रों में है, लेकिन “गुणवत्ता के साथ समावेशन” और “सटीक डेटा पारदर्शिता” की कमी अभी भी बड़ी चुनौतियाँ हैं। ज़िलेवार संख्या, विषयवार छात्रों की उपस्थिति और संसाधन-विभाजन के डेटा का अभाव नीति निर्माताओं व शोधकर्ताओं दोनों के लिए समस्या है। यदि ये आंकड़े ठीक से एकत्रित हों और सार्वजनिक हों तो शिक्षा नीतियों को बेहतर तरीके से तैयार किया जा सकता है। संसाधन प्रभावी तरीके से आवंटित किए जा सकते हैं। छात्रों को बेहतर अवसर मिल सकते हैं।
राष्ट्रीय स्तर का डेटा (एआईएसएचई रिपोर्ट के अनुसार)
भारत में 45,473 कॉलेज एआईएसएचई से पंजीकृत हैं। जिनमें से लगभग 42,825 ने 2021-22 सर्वे में प्रतिक्रिया दी। इनमें उद्योग, तकनीकी, इंजीनियरिंग कॉलेजों की हिस्सेदारी लगभग 6.1 प्रतिशत है। शिक्षक-शिक्षण, शिक्षा-विषयक कॉलेज (टीचर एजुकेशन) लगभग 8.7 प्रतिशत हैं। अधिकांश कॉलेजों की छात्र संख्या छोटी-मोटी है। करीब 65.1 प्रतिशत कॉलेजों में नामांकन 500 से कम छात्रों का है। विषयवार नामांकन के लिए, उदाहरण के लिए आर्ट सामान्य एजुकेशन, कॉमर्स आदि तंत्रों में बड़े अनुपात में छात्र हैं। इंजीनियरिंग, तकनीकी और मेडिसिन और नर्सिंग जैसे विषयों में कम, पर लगातार वृद्धि हो रही है।
ज़िलेवार हाल एवं प्रमुख चुनौतियाँ
दिल्ली (एनसीआर) 
200-350 कॉलेज, उच्च-शिक्षण संस्थाएँ (सामान्य, प्राइवेट, प्रोफेशनल) आर्ट, कॉमर्स एवं साइंस कॉलेज बड़ी संख्या में हैं। कुछ विशेष तकनीकी, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट एवं बीएड कॉलेज। कुछ कॉलेजों का बुनियादी संसाधन कम, अत्यधिक छात्र-संख्या के कारण क्षेत्रों में दबाव।
गौतमबुद्ध नगर (नोएडा-ग्रेटर नोएडा, यूपी)
अनुमानतः 100-150 कॉलेज। प्रोफेशनल पाठ्यक्रम (इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट), कंप्यूटर, क्षेत्रीय कला-विज्ञान कॉलेज, बीएड आदि। यातायात और रहन-सहन खर्च, निजी कॉलेजों में फीस अधिक, कॉलेजों की गुणवत्ता में भिन्नता।
गाजियाबाद (यूपी)
लगभग 250-300 कॉलेजों की सूची-लिस्टिंग मिलती है। सामान्य शिक्षा, प्रोफेशनल पाठ्यक्रम; कॉमर्स, साइंस, कम्प्यूटर, शिक्षण प्रशिक्षण (टीचर एजुकेशन) अधोसंरचना और प्रयोगशालाओं की कमी, अध्यापक-छात्र अनुपात में असंतुलन, छात्रावास आदि सुविधाएँ कम।
फरीदाबाद (हरियाणा)
अनुमान 120-150 कॉलेज। इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी कॉलेज, सामान्य कॉलेज, बीएड आदि। औद्योगिक-प्रदूषण, आवास की समस्या; सार्वजनिक कॉलेजों में दाखिला प्रक्रिया या छात्र-सराहना में पारदर्शिता की आवश्यकता।
गुरुग्राम एवं नज़दीकी क्षेत्र
80-130 कॉलेज, विशेष टेक्नोलॉजी, मैनेजमेंट संस्थाएँ अधिक, निजी कॉलेजों की संख्या ज्यादा बहुत, अधिक फीस, ट्रैफ़िक एवं पब्लिक ट्रांसपोर्ट की समस्या, कुछ कॉलेजों की मान्यता और प्रतिष्ठा का प्रश्न।
सोनीपत अन्य हरियाणा जिले
 एनसीआर में कम से कम 50-80 कॉलेज, सामान्य, कॉमर्स, आर्ट्स कुछ प्रोफेशनल। क्षेत्रीय पहुंच और पारिवारिक खर्च, लैब व किताबालय की कमी, छात्र-परिवहन की समस्या।

उपलब्धियाँ, कमियाँ और सुधार के सुझाव 

1-उपलब्धियाँ
विविधता में वृद्धि-एनसीआर क्षेत्र में कला-विज्ञान, कॉमर्स, तकनीकी व प्रबंधन पाठ्यक्रमों की विविधता है। छात्रों को विकल्प मिलते हैं और निजी संस्थान भी बड़े पैमाने पर पेशेवर शिक्षा मुहैया करा रहे हैं।
विश्वविद्यालय और शोध संस्थानों की उपस्थिति-आईआईटी दिल्ल्ी, जेएनयू और डीयू जैसे उच्च स्तरीय संस्थाएँ हैं जो राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित हैं। इनमें शोध, ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों का अच्छा अवसर मिलता है।
पहुंच और सुलभता-एनसीआर की स्थिति की वजह से अधिकांश जिलों व कस्बों से परिवहन व लॉजिस्टिक दृष्टि से पहुंच बेहतर है। निजी कॉलेजों ने छात्रावास, ऑनलाइन शिक्षा आदि विकल्प दिए हैं जिससे दूर-दराज से आने वाले छात्रों को लाभ हुआ है।

2-प्रमुख कमियाँ
जिलेवार सटीक डेटा की कमी-जैसा कि आपने बताया, सूची-लिस्टिंग वेबसाइट अक्सर अपडेटेड नहीं होतीं, एआईएसएचई में सार्वजनिक रूप से ज़िलेवार स्तर पर पूरी तरह प्रकाशित डेटा नहीं मिलता।
गुणवत्ता में भिन्नता-कुछ कॉलेज उन्नत सुविधाएँ, शिक्षण व प्रयोगशालाएँ प्रदान करते हैं, जबकि कई छोटे या प्राइवेट कॉलेजों में संसाधन, अधोसंरचना व अनुभवी शिक्षक की कमी है।
उच्च शुल्क एवं आर्थिक बोझ-विशेषकर निजी एवं प्रोफेशनल कॉलेजों में फीस बहुत अधिक हो जाती है, छात्रवृत्ति या आर्थिक सहायता सीमित है।
स्ट्रीमवार असंतुलन-आर्ट, कॉमर्स, सामान्य स्ट्रीम आदि में सीटों की कमी या प्रवेश प्रक्रिया कठिनाई है।
छात्र-संख्या बोझ और संसाधन प्रबंधन-बड़े कॉलेजों में विशेष रूप से क्लास-रूम, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ व अध्ययन क्षेत्रों पर दबाव है, सुविधाएँ पुरानी या अपर्याप्त होती हैं।

3-सुधार के सुझाव
आधिकारिक ज़िला-वार सर्वे एवं डेटा सार्वजनिक करना-एआईएसएचई, राज्य शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन मिलकर ज़िलेवार, स्ट्रीमवार, छात्र-संख्यावार डेटा समय-समय पर अपडेट करें और सार्वजनिक पोर्टलों पर रखें।
गुणवत्ता मानदंडों को सुदृढ़ करें-कॉलेजों को नाक और एनबीए जैसे मान्यता-संस्थानों की ज़रूरत अनुसार समय-समय पर रेटिंग और सुधार की प्रक्रिया से गुजरना चाहिए। प्रयोगशालाओं, लाइब्रेरी, शिक्षक-प्रशिक्षण व पाठ्यचर्या में नियमित अपडेट ज़रूरी है।
वित्तीय सहायता व छात्रवृत्तियों का विस्तार-गरीब और मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए सरकारी छात्रवृत्तियाँ, विशेष योजना, फीस में रियायत आदि बढ़ानी चाहिए ताकि आर्थिक कारणों से शिक्षा न रुके।
प्रौद्योगिकी और ऑनलाइन संसाधनों का उपयोग-हाइब्रिड शिक्षा मॉडल, डिजिटल लाइब्रेरीज़, ऑनलाइन पाठ आदि को अपनाना, विशेष रूप से उन कॉलेजों के लिए जहाँ इन्फ्रास्ट्रक्चर कम है।
प्रोफेशनल और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा-उद्योग-संघों के साथ साझेदारी, इंटर्नशिप, कौशल-केंद्र, आधुनिक प्रयोगशालाएँ स्थापित करना चाहिए। छात्रों को रोजगार-उन्मुख शिक्षा मिले।
भौगोलिक एवं परिवहन दृष्टि से बेहतर पहुंच-अधिक कॉलेज दूरदराज क्षेत्रों में खोलने चाहिएं या आवास और परिवहन सुविधाएँ अच्छी करनी चाहिएं ताकि विद्यार्थियों का समय व धन बच सके।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

बुधवार, 17 सितंबर 2025

चार दुर्मिल सवैया छंद


नियम-

वार्णिक छंद, कुल चार पद यानि चार पंक्तियाँ

प्रत्येक पद में 8 सगण-

यानि 

सलगा, सलगा, सलगा, सलगा, 

सलगा, सलगा, सलगा, सलगा 

यानि 

112 112 112 112 

112 112 112 112 


(विशेष-मात्रा पतन कर सकते हैं।)


1- ग़म के, तम के, भ्रम के मसले, हल हो ही गये, हल हो ही गये।

दिन क्लेश भरे अगले-पिछले हल हो ही गये, हल हो ही गये।

कल के, छल के, बल के बदले, हल हो ही गये, हल हो ही गये।

तुमसे मिलके उलझे *मतले हल हो ही गये, हल हो ही गये।


2- तन से, मन से, थक-हार गये, सहते-सहते इस जीवन में।

कुछ साँस मिली, कुछ साँस गयी, कहते-कहते इस जीवन में।

उड़ पाय नहीं, जुड़ पाय नहीं, बहते-बहते इस जीवन में।

कुछ काम करें, बस नाम रहे, रहते-रहते इस जीवन में।


3- हर बार नया दुख हो फिर भी, अधरों पे नई मुसकान रहे।

अभिशाप अपार मिलें हमको, हर साँस नया वरदान रहे।

अपमान निरंतर दो प्रभु जी, कुछ तो फिर भी सममान रहे।

इतनी तो दया करना जग में, मिट के अपनी पहचान रहे।


4- जिसने अपमान सहा उसका, जग में जग ने सममान किया।

जिसने नयनों का नीर पिया, सबके दुख का विषपान किया।

जिसने तन का कतरा कतरा, जग के हित में अनुदान किया।

उस मानव ने निज जीवन को, विष पीकर भी वरदान किया।




-चेतन आनंद, ग़ाज़ियाबाद


(*मतले-ग़ज़ल के मुखड़े को मतला कहते हैं। गज़लों के मुखड़ों को मतले कहा जाता है।)

दिल्ली-एनसीआर में पार्किंगः समस्या, समाधान और सरकारी प्रयास



दिल्ली-एनसीआर के हर बड़े शहर में पार्किंग समस्या अलग-अलग रूप में है। कहीं यह व्यावसायिक इलाकों में गंभीर है तो कहीं रिहायशी कॉलोनियों में। सरकारें और विकास प्राधिकरण लगातार मल्टी-लेवल पार्किंग, स्मार्ट पार्किंग ऐप्स और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देकर समाधान खोजने में लगे हैं। परंतु सफलता तभी मिलेगी जब नागरिक भी नियमों का पालन करेंगे, अवैध पार्किंग से बचेंगे और निजी वाहनों की बजाय सार्वजनिक परिवहन को अपनाएँगे। आइये देखते हैं दिल्ली-एनसीआर में पार्किंग की तिनी समस्या है। इसका क्या समाधान है और इसके लिए सरकारों ने क्या-क्या प्रयास किये हैं-

1. दिल्ली (एनसीआर)
समस्या

दिल्ली में पंजीकृत वाहन लगभग 1.4 करोड़ से अधिक हैं।
अधिकांश कॉलोनियों और बाजारों में पार्किंग स्थल नहीं हैं।
अवैध ऑन-स्ट्रीट पार्किंग से ट्रैफिक जाम और प्रदूषण बढ़ता है।
समाधान
स्मार्ट पार्किंग प्रबंधन प्रणाली (एप के ज़रिए स्लॉट बुकिंग)। मल्टी-लेवल पार्किंग (कनॉट प्लेस, करोल बाग, सरोजिनी नगर आदि)। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का विस्तार (मेट्रो, इलेक्ट्रिक बसें)।
सरकारी प्रयास
1-दिल्ली सरकार ने पार्किंग पॉलिसी 2019 लागू की, जिसमें कॉलोनियों और व्यावसायिक क्षेत्रों के लिए पार्किंग शुल्क और प्रबंधन के प्रावधान हैं।
2-कई मल्टी-लेवल पार्किंग पहले से बन चुकी हैं और नई योजनाएँ जारी हैं।
3-ई-चालान और कैमरा आधारित निगरानी से अवैध पार्किंग पर कार्रवाई।

2. नोएडा (गौतमबुद्ध नगर)
समस्या

तेजी से बढ़ती आबादी और कॉर्पोरेट सेक्टर के कारण गाड़ियों की संख्या बहुत अधिक। सेक्टर-18, सेक्टर-62, फिल्म सिटी जैसे क्षेत्रों में पार्किंग भारी समस्या।
समाधान
ऑटोमैटिक मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण (सेक्टर-18 में तैयार, अन्य सेक्टरों में योजना)। मार्केट एरिया में पार्किंग स्लॉट को डिजिटली बुक करने की सुविधा।
सरकारी प्रयास
1-नोएडा अथॉरिटी ने कई मल्टी-लेवल पार्किंग प्रोजेक्ट शुरू किए हैं।
2-पब्लिक ट्रांसपोर्ट (मेट्रो, बसें) को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि निजी वाहनों का दबाव घटे।

3. ग़ाज़ियाबाद
समस्या

पुराने बाजार (तुराबनगर, नंदग्राम, घंटाघर आदि) में अवैध पार्किंग। रिहायशी कॉलोनियों में पार्किंग स्थल नहीं, लोग सड़क पर गाड़ियाँ खड़ी करते हैं।
समाधान
मेट्रो स्टेशनों और रेलवे स्टेशन के पास पार्क-एंड-राइड की सुविधा। मार्केट में मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण।
सरकारी प्रयास
ग़ाज़ियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) ने कई नई पार्किंग योजनाएँ स्वीकृत की हैं। पुलिस नियमित रूप से टोइंग और चालान कर रही है।

4. गुरुग्राम (हरियाणा)
समस्या

आईटी हब और कॉर्पोरेट ऑफिसों में लाखों कर्मचारी आते-जाते हैं। साइबर सिटी, एमजी रोड, सोहना रोड और पुराने गुरुग्राम में पार्किंग संकट गंभीर। अवैध पार्किंग से रोज़ ट्रैफिक जाम।
समाधान
स्मार्ट पार्किंग प्रबंधन (एप आधारित स्लॉट बुकिंग)। कॉर्पोरेट भवनों को पर्याप्त पार्किंग स्थान उपलब्ध कराना अनिवार्य।
सरकारी प्रयास
1-गुरुग्राम मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी ने अवैध पार्किंग “हॉटस्पॉट्स” चिन्हित किए हैं।
2-कई जगह पब्लिक पार्किंग स्थल विकसित किए जा रहे हैं।
3-स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत आधुनिक पार्किंग समाधान।

5. फरीदाबाद
समस्या

औद्योगिक क्षेत्रों और बाजारों में पार्किंग स्थान की भारी कमी। कॉलोनियों में वाहन सड़क किनारे खड़े रहते हैं।
समाधान
औद्योगिक इलाकों में डेडिकेटेड पार्किंग कॉम्प्लेक्स। कॉलोनियों में नियोजित पार्किंग स्थल।
सरकारी प्रयास
1-नगर निगम ने स्मार्ट पार्किंग सिस्टम की योजना बनाई है।
2-पुराने वाहनों को हटाने की दिशा में अभियान चल रहा है, जिससे पार्किंग और प्रदूषण दोनों की समस्या कम हो।

6. मेरठ
समस्या

संकरी गलियों वाले बाजारों (बेगमपुल, सदर बाजार) में पार्किंग संकट। अवैध पार्किंग से जाम आम समस्या है।
समाधान
शहर में कई मल्टी-लेवल पार्किंग की योजना। बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन के पास पार्क-एंड-राइड सुविधा।
सरकारी प्रयास
1-मेरठ स्मार्ट सिटी मिशन के अंतर्गत पार्किंग समाधान पर काम।
2-नगर निगम द्वारा अवैध पार्किंग पर नियमित अभियान।

7. सोनीपत और अन्य एनसीआर शहर
समस्या

तेजी से शहरीकरण, नई कॉलोनियों और औद्योगिक क्षेत्रों में पार्किंग की व्यवस्था नहीं। बाजार और हाइवे किनारे गाड़ियों की अव्यवस्थित खड़ी।
समाधान
नगर निगम स्तर पर मल्टी-लेवल पार्किंग का विकास। इंडस्ट्रियल क्षेत्रों में ट्रक और वाणिज्यिक वाहनों के लिए विशेष पार्किंग।
सरकारी प्रयास
1-सोनीपत स्मार्ट सिटी परियोजना में पार्किंग सुविधाओं पर बल।
2-नगर परिषद द्वारा पार्किंग शुल्क लागू करने के प्रयास।





लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

सोमवार, 15 सितंबर 2025

अगले 10 सालों में बदलेगी फ्लैटों की दुनिया

 लेख-


हर दो में से एक परिवार के पास होगा अपना फ्लैट

अगले दस वर्षों में भारत में घर और फ्लैट स्वामित्व का परिदृश्य तेजी से बदलेगा। दिल्ली-एनसीआर में 2035 तक हर दो में से एक परिवार फ्लैट में रह रहा होगा। पूरे भारत में लगभग 37 करोड़ परिवारों के पास अपने घर होंगे, जिनमें से 6-7 करोड़ परिवार अपार्टमेंट्स में बसेंगे। यह बदलाव न केवल आवासीय संरचना को बदलेगा, बल्कि भारतीय समाज की जीवनशैली, संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डालेगा। अपने घर का सपना आने वाले दशक में और अधिक भारतीयों के लिए हकीकत बनेगा। बशर्ते सरकार, निजी क्षेत्र और वित्तीय संस्थान मिलकर अफोर्डेबिलिटी और सस्टेनबिलिटी पर बराबर ध्यान दें।

वर्तमान परिदृश्यः भारत और दिल्ली-एनसीआर
2025 में भारत में कुल परिवारों की संख्या लगभग 36 करोड़ है। घर के स्वामित्व की दर लगभग 85 प्रतिशत (ग्रामीण$शहरी मिलाकर) है। शहरी क्षेत्रों में स्वामित्व लगभग 70 प्रतिशत है। जबकि फ्लैट में रहने वाले परिवार लगभग 3 करोड़ (ज्यादातर महानगरों में) हैं।

दिल्ली-एनसीआर
परिवारों की संख्या (2025) में लगभग 90 लाख है। अपने घर का मालिकाना हक केवल 55-60 प्रतिशत के पास है। फ्लैट या अपार्टमेंट में रहने वाले लगभग 30-35 लाख परिवार ही हैं। कीमतों की बात करें तो एनारॉक की रिपोर्ट (क्यू1 2025) के अनुसार एनसीआर में औसत दर 8,300 रुपए प्रति वर्ग फुट है। यानी 1,000 वर्ग फुट का फ्लैट औसतन 83 लाख रुपये का है। खाली फ्लैट्स (अनसोल्ड स्टॉक) लगभग 85-86 हज़ार यूनिट्स हैं। (एनारॉक 2024 के आँकड़े)। 10 साल की मूल्य वृद्धि 2015 से 2025 तक एनसीआर में प्रॉपर्टी की कीमतें 60 प्रतिशत से 136 प्रतिशत तक बढ़ीं।

आने वाले दस साल (2025-2035)ः अनुमान और संभावनाएँ
राष्ट्रीय स्तर पर 2035 तक भारत की आबादी 1.52 अरब होगी। कुल परिवार 42 करोड़ तक पहुँचेंगे। 2025 में 36 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है। 2035 तक यह बढ़कर 43-45 प्रतिशत हो जाएगी। इसका अर्थ है कि लगभग 6-7 करोड़ नए शहरी परिवार जुड़ेंगे।
स्वामित्व दर-ग्रामीण भारत में पहले से ही 95 प्रतिशत से अधिक परिवारों के पास अपने घर हैं। शहरी भारत में स्वामित्व 70 प्रतिशत से बढ़कर 78-80 प्रतिशत हो सकता है। यानी 2035 तक भारत में कुल 37 करोड़ परिवारों के पास अपना घर होगा।
फ्लैट्स- वर्तमान में 3 करोड़ परिवारों के पास हैं। 2035 तक अनुमानित 6-7 करोड़ परिवार फ्लैट्स में रहेंगे। दिल्ली-एनसीआर स्तर पर परिवार (2035) लगभग 1.05 करोड़ होंगे। स्वामित्व दर 70 प्रतिशत यानी लगभग 73 लाख परिवार होगी। फ्लैट्स में रहने वाले परिवार 50-55 लाख।

वृद्धि के प्रमुख क्षेत्र
गुरुग्रामः लग्जरी और मिड-सेगमेंट दोनों तरह के अपार्टमेंट्स।
नोएडा-ग्रेटर नोएडाः अफोर्डेबल सहित मिड सेगमेंट फ्लैट्स।
गाज़ियाबाद, फरीदाबादः अफोर्डेबल हाउसिंग बेल्ट।
दिल्ली के द्वारका, नरेला, रोहिणी में मास हाउसिंग प्रोजेक्ट्स।
प्रमुख महानगरों का तुलनात्मक परिदृश्य (2035 तक)
मुंबई में 85 लाख परिवार; 65 प्रतिशत स्वामित्व; 70$ लाख फ्लैट्स।
बेंगलुरु में 45 लाख परिवार; 70 प्रतिशत स्वामित्व; 28-30 लाख फ्लैट्स।
चेन्नई में 30 लाख परिवार; 72 प्रतिशत स्वामित्व; 20 लाख फ्लैट्स।
हैदराबाद में 28 लाख परिवार; 74 प्रतिशत स्वामित्व; 18-19 लाख फ्लैट्स।
कोलकाता में 32 लाख परिवार; 75 प्रतिशत स्वामित्व; 20-22 लाख फ्लैट्स।
स्पष्ट है कि दिल्ली-एनसीआर और मुंबई सबसे बड़े फ्लैट-बाज़ार बने रहेंगे।

उपलब्धियाँ
सरकारी योजनाएँ-प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत 1.18 करोड़ घर स्वीकृत हुए।
रेरा लागू होने के बाद-परियोजनाओं की पारदर्शिता और समय पर डिलीवरी में सुधार आया।
ईएमआई और होम लोन-आरबीआई के आँकड़ों के अनुसार 2015 से 2025 तक हाउसिंग लोन का दायरा तीन गुना बढ़ा।
इंफ्रास्ट्रक्चर विकास-मेट्रो, एक्सप्रेसवे और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स ने नए आवासीय क्षेत्रों को बढ़ावा दिया।

कमियाँ
अनअफोर्डेबिलिटी-एनसीआर और मुंबई जैसे क्षेत्रों में मध्यम वर्ग के लिए घर अभी भी महँगे हैं।
स्टॉल्ड प्रोजेक्ट्स-हज़ारों खरीदार आज भी अधूरे फ्लैटों का इंतजार कर रहे हैं।
जमीन अधिग्रहण में कठिनाई-नई परियोजनाओं में देरी का बड़ा कारण।
किराये का ढाँचा कमजोर-रेंटल हाउसिंग को लेकर अभी भी स्पष्ट नीति का अभाव है।

सुधार के सुझाव
अफोर्डेबल हाउसिंग पर फोकस-सरकार और निजी बिल्डर मिलकर कम लागत वाले फ्लैट विकसित करें।
स्टाल्ड प्रोजेक्ट्स का समाधान-फास्ट-ट्रैक कोर्ट और विशेष फंड से इन प्रोजेक्ट्स को पूरा कराया जाए।
रेंटल हाउसिंग पॉलिसी-शहरी गरीब और प्रवासी श्रमिकों के लिए सस्ती किराये की व्यवस्था विकसित करनी होगी।
ग्रीन और स्मार्ट हाउसिंग-नई कॉलोनियों में ऊर्जा बचत, सोलर पैनल, जल प्रबंधन को अनिवार्य करना चाहिए।
मध्यम वर्ग के लिए सब्सिडी-ब्याज दर पर छूट और टैक्स लाभ को और व्यापक बनाया जाए।

समाप्त



लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

रविवार, 14 सितंबर 2025

दिल्ली-एनसीआर का ट्रैफिकः संकट और समाधान


दिल्ली-एनसीआर भारत का सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र है, जहाँ लगभग 4.6 करोड़ लोग रहते हैं। यह क्षेत्र न केवल राजनीतिक राजधानी है, बल्कि आर्थिक, शैक्षिक और औद्योगिक गतिविधियों का भी मुख्य केंद्र है। ऐसे में यहाँ की सड़कों पर ट्रैफिक का बोझ लगातार बढ़ना स्वाभाविक है। पिछले पाँच वर्षों में दिल्ली-एनसीआर में वाहनों की संख्या में लगभग 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अकेले दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की संख्या 1.3 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जबकि रोज़ाना करीब 80-90 लाख वाहन सड़कों पर उतरते हैं। इसके साथ ही गाज़ियाबाद, नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद से लाखों यात्री रोज़ दिल्ली आते हैं, जिससे ट्रैफिक जाम और प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो गई है।


ट्रैफिक लोड का बढ़ता दबाव
2018 से 2023 तक के आँकड़ों के अनुसार दिल्ली में निजी कारों की संख्या 25 प्रतिशत बढ़ी। दोपहिया वाहनों की संख्या में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। एनसीआर से दिल्ली आने वाले बाहरी वाहनों की संख्या रोज़ाना 12-15 प्रतिशत तक बढ़ी। ट्रैफिक जाम में औसतन यात्रा समय 35 प्रतिशत तक बढ़ गया। टॉम टॉम ट्रैफिक इंडेक्स की 2023 रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली दुनिया का चौथा सबसे भीड़भाड़ वाला शहर है, जहाँ लोगों को पीक-ऑवर में 10 किलोमीटर की दूरी तय करने में 30-40 मिनट तक लग जाते हैं। यह केवल समय की बर्बादी नहीं, बल्कि ईंधन की खपत और पर्यावरणीय प्रदूषण को भी बढ़ाता है।

सरकारी प्रयास
समस्या की गंभीरता को देखते हुए सरकार और प्रशासन ने कई कदम उठाए हैं।
1-मेट्रो विस्तार, दिल्ली मेट्रो की लंबाई 390 किमी से अधिक हो चुकी है और इसे एनसीआर तक फैलाया गया है। रैपिड रेल ट्रांजिट सिस्टम का निर्माण भी तेज़ी से चल रहा है।
2-ईस्टर्न और वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे, दिल्ली से गैर-जरूरी ट्रक ट्रैफिक को बाहर निकालने के लिए ये प्रोजेक्ट पूरे किए गए।
3-इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम और सेंसर आधारित सिग्नल सिस्टम लागू किए जा रहे हैं।
4-ऑड-ईवन नीति, प्रदूषण और भीड़ दोनों घटाने के लिए प्रयोग किए गए।
5-इलेक्ट्रिक बसें और सीएनजी नीति, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को साफ-सुथरा और बेहतर बनाने की दिशा में प्रयास हुए।
हालाँकि, इन प्रयासों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर राहत सीमित ही दिखी है। कारण यह है कि वाहन वृद्धि की गति और शहरीकरण की रफ़्तार, योजनाओं की क्षमता से कहीं अधिक तेज़ है।

सुधार के आवश्यक सुझाव
1. ट्रैफिक प्रबंधन और नीतिगत सुधार
ए-इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंटः दिल्ली की सभी प्रमुख सड़कों पर स्मार्ट सिग्नल और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जरूरी है।
बी-पुरानी गाड़ियों पर सख्तीः 10 साल पुरानी डीज़ल और 15 साल पुरानी पेट्रोल गाड़ियों को दिल्ली-एनसीआर से बाहर खदेड़ने का प्रस्ताव प्रभावी रूप से लागू हो।
सी-पीक-ऑवर ट्रैफिक पॉलिसीः ऑड-ईवन को केवल आपातकालीन प्रयोग न मानकर, नियमित ट्रैफिक प्रबंधन नीति का हिस्सा बनाया जाए।

2. सार्वजनिक परिवहन सुधार
ए-मेट्रो और आरआरटीएस का विस्तारः मेरठ, पानीपत और अलवर कॉरिडोर को समय पर पूरा किया जाए और उन्हें दिल्ली मेट्रो से जोड़ा जाए।
बी-बस प्रणालीः डीटीसी और क्लस्टर बसों की संख्या दोगुनी हो, और डेडिकेडेट बस लेन लागू की जाए।
सी-लास्ट-माइल कनेक्टिविटीः मेट्रो और बस स्टेशनों पर ई-रिक्शा, साइकिल-शेयरिंग और पार्किंग सुविधाएँ व्यवस्थित हों।

3. सड़क और शहरी डिज़ाइन सुधार
ए-बॉटल-नेक्स हटानाः एम्स, धौला कुंआ, आईटीओ, आश्रम चौक और गाजीपुर जैसे स्थायी जाम बिंदुओं पर फ्लाईओवर और अंडरपास बनाए जाएँ।
बी-पेरिफेरल रोड्स का उपयोगः एक्सप्रेसवे पर ट्रैफिक डायवर्जन कड़ाई से लागू हो।
सी-स्मार्ट पार्किंग पॉलिसीः अवैध पार्किंग पर रोक और मल्टी-लेवल पार्किंग की सुविधा।

4. टिकाऊ और दीर्घकालिक समाधान
ए-ट्रांजिट एंड ऑरिएंटेड डवलपमेंट, मेट्रो स्टेशनों के आसपास ऑफिस और हाउसिंग विकसित हों ताकि लोग लंबी दूरी तय न करें।
बी-साइकिल और पैदल संस्कृतिः सुरक्षित लेन और पैदल-पथ से छोटी दूरी के लिए कार पर निर्भरता कम की जा सकती है।
सी-जन-जागरूकता और प्रवर्तनः यातायात नियम उल्लंघन पर कड़ी सज़ा और कार एंड फ्री डे जैसी पहल।

संभावित रोडमैप
1-तुरंत (1-2 वर्ष)ः आईटीएमएस लागू करना, पुरानी गाड़ियों पर सख्ती, स्मार्ट पार्किंग, बसों की संख्या बढ़ाना।
2-मध्यम अवधि (3-5 वर्ष)ः आरआरटीएस का पहला चरण पूरा करना, डेडिकेडेट बस लेन्स और मेट्रो के नए कॉरिडोर खोलना।
3-दीर्घकालिक (5-10 वर्ष)ः टीओडी मॉडल अपनाना, साइकिल और पैदल-मार्ग संस्कृति विकसित करना, ट्रैफिक न्यूट्रल शहरी डिज़ाइन।

दिल्ली-एनसीआर का ट्रैफिक संकट केवल सड़क की समस्या नहीं है, यह सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौती भी है। रोज़ाना लाखों घंटे और करोड़ों लीटर ईंधन बर्बाद होते हैं। प्रदूषण स्तर खतरनाक सीमा तक पहुँच चुका है। अगर अभी ठोस और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में हालात और बिगड़ सकते हैं। सही दिशा में उठाए गए कदम जैसे मजबूत सार्वजनिक परिवहन, स्मार्ट ट्रैफिक प्रबंधन और नागरिकों की भागीदारी दिल्ली-एनसीआर को इस संकट से बाहर निकाल सकते हैं। यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक की साझी जिम्मेदारी है कि वह नियमों का पालन करे और पर्यावरण के अनुकूल यातायात विकल्प अपनाए।




लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

शनिवार, 13 सितंबर 2025

समसामयिक लेख/सुशीला कार्की के लिए आसान नहीं होगी नेपाल की सत्ता


 

-डॉ. चेतन आनंद 
नेपाल का इतिहास संघर्ष, साम्राज्य निर्माण और राजनीतिक अस्थिरता से भरा रहा है। वहाँ कई बार तख्तापलट यानी राजनीतिक विद्रोह हुए हैं। प्राचीन काल में नेपाल छोटे-छोटे रजवाड़ों में बँटा था। मध्यकाल में काठमांडू घाटी में लिच्छवि और मल्ल वंश का शासन आया। आधुनिक नेपाल (1768) में गोरखा नरेश पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल को एकीकृत कर गोरखा साम्राज्य की नींव रखी तो ब्रिटिश काल में नेपाल कभी उपनिवेश नहीं बना, परंतु 1814-16 का एंग्लो-नेपाल युद्ध और सुगौली संधि से उसका बड़ा भूभाग ब्रिटिश भारत को देना पड़ा। राणा शासन (1846-1951) में कोट हत्याकांड के बाद जंग बहादुर राणा ने सत्ता हथिया ली और करीब 104 साल तक राणा प्रधानमंत्री वंश ने देश को राजाओं के नाम पर चलाया। वर्ष 1951 में लोकतांत्रिक आंदोलन के दौरान राणा शासन का अंत और संवैधानिक राजतंत्र की शुरुआत हुई। बड़े संघर्ष और हिंसा के बीच अब नेपाल की अंतरिम सरकार की नयी प्रधानमंत्री सुशीला कार्की बनी हैं। नेपाल के राजनीतिक इतिहास के मद्देनजर के सामने सुशीला कार्की के सामने कई प्रकार की चुनौतियाँ होंगी, जो राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से प्रभाव डालेंगी।
नेपाल की राजनीति लंबे समय से अस्थिर गठबंधनों और बार-बार बदलती सरकारों से जूझ रही है। सुशीला कार्की को विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच सामंजस्य बनाना होगा। संसद में बहुमत बनाए रखना और सहयोगी दलों की अपेक्षाओं को संतुलित करना बड़ी चुनौती होगी। 2015 में लागू हुए संविधान को लेकर मधेशी, जनजातीय और अन्य समुदायों की असंतुष्टियाँ अब भी बनी हुई हैं। सुशीला कार्की को सभी पक्षों के बीच संवाद और संवैधानिक संशोधनों पर विचार करना पड़ सकता है। आधारभूत ढांचे की कमी से जूझ रहा है।
पर्यटन, जलविद्युत और कृषि क्षेत्र को गति देना उनकी प्राथमिकता होगी। विदेशी निवेश आकर्षित करना और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना जरूरी होगा। नेपाल में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है। सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकीं कार्की की पहचान सख्त और ईमानदार नेतृत्व के रूप में रही है, इसलिए जनता उनसे सुशासन की उम्मीद रखेगी। नेपाल में जातीय, क्षेत्रीय और लैंगिक असमानताएँ गहरी हैं। महिला प्रधानमंत्री होने के नाते उनसे उम्मीद की जाएगी कि वे महिलाओं और वंचित वर्गों की आवाज को मजबूत करें। नेपाल की विदेश नीति में भारत और चीन दोनों के साथ संतुलन बनाना सबसे अहम चुनौती होगी। हाल के वर्षों में नेपाल पर चीन का प्रभाव बढ़ा है, जबकि भारत के साथ संबंधों में कई बार तनाव देखने को मिला। सुशीला कार्की को कूटनीतिक संतुलन साधते हुए नेपाल की स्वतंत्र छवि बनाए रखनी होगी। बड़ी संख्या में नेपाली युवा विदेश में रोजगार की तलाश में हैं। विदेश में काम करने वाले नेपाली नागरिकों की सुरक्षा और उनकी आर्थिक भूमिका को मजबूत करना भी उनके एजेंडे में शामिल होना चाहिए।
नेपाल में प्रमुख तख्तापलट और सत्ता परिवर्तन
1. 1846-कोट हत्याकांड। दरबार में षड्यंत्र कर जंग बहादुर राणा ने 40 से अधिक सरदारों को मरवाया। इसके बाद राणा वंश ने सत्ता अपने हाथ में ले ली।
2. 1950-51-राणा शासन का अंत हुआ। राजा त्रिभुवन ने भारत जाकर लोकतांत्रिक दलों के साथ समझौता किया। 1951 में राणा शासन खत्म और बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली।
3. 1960-महेंद्र का तख्तापलट हुआ। लोकतांत्रिक सरकार (बी.पी. कोईराला की कांग्रेस सरकार) को राजा महेंद्र ने भंग किया। 1961 में पंचायती व्यवस्था लागू की, जिसमें राजा सर्वोच्च शासक बने।
4. 1990- जनआंदोलन और बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली
जनता और दलों के दबाव से राजा बीरेन्द्र ने पंचायती व्यवस्था खत्म की। संसदीय लोकतंत्र बहाल हुआ।
5. 2001- राजदरबार हत्याकांड हुआ। क्राउन प्रिंस दीपेन्द्र ने गोलीबारी में राजा बीरेन्द्र, रानी ऐश्वर्या सहित राजपरिवार की हत्या कर दी। इसके बाद राजा ज्ञानेन्द्र सत्ता में आए।
6. 2005-राजा ज्ञानेन्द्र का सीधा शासन चला। विद्रोही माओवादी संघर्ष और अस्थिरता के बीच राजा ज्ञानेन्द्र ने लोकतांत्रिक सरकार को भंग कर सीधा शासन अपने हाथ में ले लिया।
7. 2006-जन आंदोलन के जरिये लोकतंत्र पुनः स्थापित हुआ।
व्यापक जन आंदोलन (लोक आंदोलन 2) के दबाव में राजा ज्ञानेन्द्र को झुकना पड़ा। संसद पुनः बहाल हुई और माओवादियों को भी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल किया गया।
8. 2008-राजतंत्र का अंत हुआ। संविधान सभा ने राजशाही समाप्त कर नेपाल को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया। शाही सत्ता का तख्तापलट हुआ और नेपाल में गणतंत्र की शुरुआत हुई।

नेपाल में बड़े तख्तापलट
1846 (राणा सत्ता)
1951 (राणा शासन का अंत)
1960 (राजा महेंद्र)
1990 (लोकतंत्र बहाली)
2001 (राजदरबार हत्याकांड)
2005-06 (राजा ज्ञानेन्द्र का तख्तापलट और जनता का विद्रोह)
2008 (गणतंत्र की स्थापना)

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं।)


अमेरिका में भारतीय समुदाय निशाने पर

 लेख 


वाशिंग मशीन के मामूली विवाद पर योरडानिस कोबोस मार्टिनेज नाम के व्यक्ति ने भारतीय मूल के पचास वर्षीय चंद्रमौली की कुल्हाड़ी से गरदन काट दी। इसके बाद से अमेरिका में एक बार फिर भारतीय समुदाय की सुरक्षा का मुद्दा गरमा गया है। हालांकि अमेरिका इसे मात्र कैपिटल मर्डर का  मामूली अपराध मान रहा है और इसे पूर्व नियोजित हत्या की श्रेणी में लाकर इसकी जांच में जुटा है। लेकिन अमेरिका की इस प्रकार की बचकाना हरकत से भारत में काफी उबाल है। अमेरिका को दुनिया का सबसे विकसित लोकतंत्र और बहुलतावादी समाज माना जाता है। यहाँ विभिन्न देशों से आए प्रवासी न केवल रहते हैं, बल्कि राजनीति, शिक्षा, विज्ञान और व्यवसाय में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। भारतीय मूल के लोग भी अमेरिका के सबसे सफल समुदायों में गिने जाते हैं। फिर भी पिछले कुछ वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। भारतीयों और व्यापक दक्षिण एशियाई समुदाय के खिलाफ बढ़ते भेदभाव, नफ़रत अपराध और हिंसा। आइये, इसे आँकड़ों, घटनाओं और सामाजिक परिप्रेक्ष्य के साथ समझने का प्रयास करें।
भारतीय समुदाय की स्थिति
2020 की अमेरिकी जनगणना के अनुसार, अमेरिका में लगभग 48 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जो एशियाई अमेरिकियों का एक बड़ा हिस्सा हैं। भारतीय अमेरिकी उच्च शिक्षा, आईटी और स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे आगे माने जाते हैं। परन्तु सफलता के बावजूद यह समुदाय भी नस्लीय और धार्मिक पूर्वाग्रह का शिकार होता रहा है।
पिउ रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट (2024) बताती है कि 50 प्रतिशत भारतीय अमेरिकी वयस्कों ने कभी न कभी नस्ल या राष्ट्रीयता आधारित भेदभाव का अनुभव किया। यह आंकड़ा इस धारणा को तोड़ता है कि “सफल” प्रवासी समुदाय अपने आप सुरक्षित है। लगभग 43 प्रतिशत दक्षिण एशियाई वयस्कों ने भेदभाव या नफ़रत आधारित घटनाओं का अनुभव किया। रिपोर्ट में मंदिरों और गुरुद्वारों पर वैंडलिज़्म, सार्वजनिक स्थानों पर अपमानजनक टिप्पणियाँ और सोशल मीडिया पर नफ़रत भरे संदेश प्रमुख रूप से दर्ज किए गए। यहूदी और मुस्लिमों के बाद सिख समुदाय धार्मिक आधार पर तीसरे सबसे अधिक निशाने पर रहा। हिंदुओं के खिलाफ लगभग 25 घटनाएँ रिपोर्ट की गईं। एंटी एंड एशियन घटनाओं की कुल संख्या 2021-23 के बीच लगातार ऊँची बनी रही।
राज्यवार तस्वीर
1-कैलिफ़ोर्निया-स्टॉप एप्पी हेट की 2024 रिपोर्ट के अनुसार, कैलिफ़ोर्निया में लगभग आधे एप्पी वयस्कों ने किसी न किसी रूप में नफ़रत का सामना किया। वहां की हेल्पलाइन को 2023-24 में लगभग 2000 से अधिक कॉल्स प्राप्त हुए, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा हिंदू और सिख समुदाय से संबंधित था। फ्रीमोंट, सैन जोस और लॉस एंजेलिस जैसे शहरों में मंदिर तोड़फोड़ और ग्रैफिटी की घटनाएँ सामने आईं।
2. न्यूयॉर्क-न्यूयॉर्क सिटी में 2023 नफरती अपराध में ऊपर की ओर रुझान दिखा। यहूदी और मुस्लिम समुदायों के बाद एशियाई मूल के लोग भी कई बार निशाने पर आए। कई मामलों में भारतीय रेस्त्रां मालिकों और दुकानदारों के साथ भेदभावपूर्ण दुर्व्यवहार दर्ज किया गया।
3. न्यू जर्सी-न्यू जर्सी अटॉर्नी जनरल की 2023 की रिपोर्ट में बाइस एंड इंसीडेंट्स में तेज़ वृद्धि दर्ज की गई। भारतीय और दक्षिण एशियाई समुदाय से जुड़े दर्जनों मामले रिपोर्ट हुए, जिनमें जातीय टिप्पणी और कार्यस्थल पर भेदभाव शामिल था।
4. टेक्सास-टेक्सास डिपार्टमेंट ऑफ़ पब्लिक सेफ़्टी की रिपोर्ट (2023) में कई घटनाएँ दर्ज हुईं, हालांकि कुल संख्या कैलिफ़ोर्निया और न्यूयॉर्क से कम थीं। यहाँ मुख्यतः डलास और ह्यूस्टन क्षेत्रों में भारतीयों के खिलाफ घटनाएँ सामने आईं।
5. वॉशिंगटन-सिएटल और उसके आसपास किए गए सर्वे में बड़ी संख्या में एशियाई अमेरिकियों ने असुरक्षा की भावना व्यक्त की। वॉशिंगटन राज्य सरकार ने 2024 में विशेष हेट क्राइम हेल्पलाइन शुरू की, ताकि पीड़ित सीधे रिपोर्ट कर सकें।
प्रमुख घटनाएँ
1-ओलाथे, कंसास शुटिंग (2017)ः भारतीय अभियंता श्रीनिवास कुचिभोटला की हत्या, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा।
2-कैलिफ़ोर्निया मंदिर वैंडलिज़्म (2023-24), कई हिंदू मंदिरों पर तोड़फोड़ और अपमानजनक नारे लिखे गए।
3-मैकडॉनल्ड्स हमला (कैलिफ़ोर्निया, 2024), एक दक्षिण एशियाई माँ और बेटी पर नस्लीय टिप्पणी के बाद शारीरिक हमला हुआ। आरोपी पर हेट क्राइम का मुकदमा चला।
कारण और पृष्ठभूमि-विशेषज्ञों के अनुसार इन घटनाओं के पीछे कई कारण काम कर रहे हैं। पहली, आर्थिक प्रतिस्पर्धा। भारतीयों की सफलता से यह धारणा बनती है कि वे “अमेरिकी नागरिकों की नौकरियाँ छीन रहे हैं।” दूसरी, राजनीतिक बयानबाज़ी। कुछ राजनीतिक समूह प्रवासियों के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करते हैं। तीसरी, धार्मिक व सांस्कृतिक पहचान। सिखों की पगड़ी या हिंदुओं के धार्मिक प्रतीक उन्हें तुरंत “अलग” बना देते हैं, जिससे वे निशाना बनते हैं। चौथी, सोशल मीडिया। ऑनलाइन नफ़रत और ट्रोलिंग ने वास्तविक जीवन में हिंसा को बढ़ावा दिया है।
समुदाय की प्रतिक्रिया-भारतीय और दक्षिण एशियाई संगठन लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। सिख कॉयलीशन और हिन्दू-अमेरिकन फाउंडेशन ने सरकार से अधिक सख़्त क़ानूनी कार्रवाई की माँग की है। सामुदायिक स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम और सुरक्षा उपाय अपनाए जा रहे हैं। कई भारतीय मूल के सांसद और स्थानीय नेता सार्वजनिक मंचों पर इन घटनाओं की निंदा कर चुके हैं।
समाधान की दिशा-सख्त कानून और रिपोर्टिंग हो। राज्य सरकारों को हेट क्राइम रिपोर्टिंग सिस्टम और अधिक पारदर्शी बनाना होगा। शिक्षा और जागरूकता पर ध्यान दिया जाए। स्कूल और कॉलेज स्तर पर बहुलतावाद और विविधता की शिक्षा को बढ़ावा देना ज़रूरी है। समुदाय की भागीदारी तय हो। भारतीय समुदाय को स्थानीय राजनीति और प्रशासन में और सक्रिय होना होगा। मीडिया की भूमिका अहम है। मीडिया को भी इन घटनाओं की लगातार रिपोर्टिंग करनी चाहिए, ताकि समस्या दब न जाए।
भारतीय मूल के लोग अमेरिका के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा हैं। लेकिन उनके खिलाफ बढ़ते हमले और भेदभाव लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़ा करते हैं। आँकड़े और घटनाएँ बताती हैं कि समस्या वास्तविक और गहरी है। समाधान केवल क़ानून से नहीं, बल्कि समाज में स्वीकृति और सहिष्णुता की संस्कृति विकसित करने से ही संभव होगा। भारतीय समुदाय की सफलता को नकारात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि अमेरिका की प्रगति में योगदान के रूप में देखना चाहिए। तभी यह देश वास्तव में “विविधता में एकता” का उदाहरण बन सकेगा।

                        समाप्त

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

14 सितम्बर/हिंदी दिवस पर विशेष लेख

 


विश्व में तीसरे स्थान पर हिन्दी

क्यों नहीं बन पाई राष्ट्रभाषा?

भाषा किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर और पहचान होती है। इसके पीछे कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और तकनीकी कारण हैं। आज विश्व की भाषाओं की भीड़ में हिंदी का स्थान शीर्ष तीन में है। यह केवल बोलने वालों की संख्या से ही नहीं, बल्कि साहित्यिक वैभव, प्रवासी भारतीयों के योगदान, फ़िल्मों और तकनीक के विस्तार से भी वैश्विक मंच पर स्थापित है। आने वाले वर्षों में हिंदी न केवल एशिया बल्कि विश्व की प्रमुख सांस्कृतिक और डिजिटल भाषा के रूप में और भी मज़बूती से उभरेगी। हिंदी आज केवल भारतीय उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और डिजिटल क्रांति की भाषा बन चुकी है। बावजूद इसके ली हमारे भारत देश की राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बन पा रही। आइये इसकी पड़ताल करते हैं। सबसे पहले हमें औपनिवेशिक काल की ओर देखना होगा। अंग्रेज़ी ने भारत की शिक्षा, प्रशासन और न्याय प्रणाली पर गहरा असर डाला। स्वतंत्रता के बाद भी अंग्रेज़ी का वर्चस्व कायम रहा, जबकि हिंदी को अपेक्षित बढ़ावा नहीं मिल पाया। इसका परिणाम यह हुआ कि उच्च शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में अंग्रेज़ी की भूमिका बनी रही, और हिंदी पिछड़ती रही।

दूसरा कारण भारत की भाषायी विविधता है। भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है जहाँ तमिल, तेलुगु, बंगला, मराठी, पंजाबी जैसी अनेक भाषाएँ अपने-अपने क्षेत्रों में मज़बूत स्थिति रखती हैं। ऐसे परिदृश्य में हिंदी को एकमात्र राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करना आसान नहीं रहा। कई बार हिंदी को “थोपने” का आरोप भी लगा, जिससे दक्षिण और पूर्वी राज्यों में इसका विरोध हुआ। इस स्थिति में अंग्रेज़ी को समझौते के रूप में समानांतर स्थान मिल गया।

तीसरी बड़ी बाधा वैश्विक प्रसार की कमी है। स्पेनिश, चीनी और अंग्रेज़ी जैसी भाषाएँ अनेक देशों में बोली जाती हैं, जबकि हिंदी का प्रसार मुख्यतः भारत और प्रवासी भारतीयों तक सीमित है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के प्रति जिज्ञासा तो है, पर इसे आर्थिक और कूटनीतिक भाषा का दर्जा नहीं मिल पाया।

चौथा कारण तकनीकी और शैक्षणिक सामग्री का अभाव है। विज्ञान, प्रबंधन और शोध कार्यों में लंबे समय तक हिंदी में संसाधन उपलब्ध नहीं रहे। परिणामस्वरूप विद्यार्थियों और विद्वानों ने अंग्रेज़ी को ही प्राथमिकता दी।

फिर भी, हिंदी का साहित्य, सिनेमा और संगीत विश्व में लोकप्रिय हैं। बॉलीवुड फिल्मों ने हिंदी शब्दों और भावों को विदेशों तक पहुँचाया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने भी हिंदी को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी है।

1. बोलने वालों की संख्या-हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। लगभग 60 करोड़ लोग इसे मातृभाषा के रूप में बोलते हैं। लगभग 120 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में हिंदी समझते और प्रयोग करते हैं। यदि “हिंदी-उर्दू” या “हिंदुस्तानी” को संयुक्त रूप से देखें, तो इसके बोलने वालों की संख्या 80 करोड़ से अधिक है। विश्व की प्रमुख भाषाओं की सूची में अंग्रेज़ी और चीनी (मंदारिन) के बाद हिंदी का स्थान आता है। हिंदी फ़िल्में और बॉलीवुड गीत भी हिंदी के वैश्विक प्रसार का बड़ा माध्यम हैं। भारत के अतिरिक्त नेपाल, मॉरीशस, फ़िजी, त्रिनिदाद, सूरीनाम, गुयाना, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन आदि देशों में बड़े हिंदी भाषी समुदाय हैं।

2. साहित्यिक समृद्धि-हिंदी का साहित्यिक भंडार अत्यंत व्यापक है। भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल से लेकर समकालीन रचनाओं तक हिंदी ने कविता, उपन्यास, नाटक, निबंध और पत्रकारिता में गहरी छाप छोड़ी है। तुलसीदास, सूरदास, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ से लेकर समकालीन कवियों और लेखकों ने इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई।

3. प्रवासी भारतीयों का योगदान-प्रवासी भारतीयों ने हिंदी को विदेशों में जीवित और प्रबल बनाए रखा है। मॉरीशस में हिंदी आधिकारिक भाषा है। फ़िजी में ‘फ़िजी हिंदी’ विकसित हुई है। अमेरिका और यूरोप में हिंदी साहित्य सम्मेलन, सांस्कृतिक आयोजन और विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग इसकी पहचान को और मजबूत करते हैं।

4. तकनीक और मीडिया-डिजिटल युग में हिंदी की पहुँच और अधिक बढ़ी है। सोशल मीडिया, यूट्यूब, ब्लॉगिंग और ऑनलाइन पत्रकारिता ने हिंदी को ग्लोबल डिजिटल भाषा का दर्जा दिया है। गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट और अन्य बड़ी कंपनियाँ अपने सॉफ़्टवेयर और सेवाओं में हिंदी को प्रमुखता दे रही हैं। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री का विस्तार तेजी से हुआ है। मेटा जैसी बड़ी टेक कंपनी ने हिंदी को अपनी सेवाओं में शामिल कर इसे डिजिटल वैश्विक भाषा बना दिया है। “भाषाई इंटरनेट रिपोर्ट (2023)” के अनुसार, भारत के 55 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता हिंदी में सामग्री पसंद करते हैं।

5. आधिकारिक मान्यता-संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के प्रयास निरंतर जारी हैं। कई देशों में हिंदी का अध्ययन विश्वविद्यालय स्तर पर कराया जा रहा है। 1975 से अब तक 12 विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं, जिनमें दुनिया भर के विद्वान सम्मिलित होते हैं। ब्रिटेन, रूस, जापान, जर्मनी और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन और शोध कार्य किए जा रहे हैं।

निष्कर्षतः, हिंदी में अपार संभावनाएँ हैं। यदि तकनीकी, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में हिंदी को अधिक प्रोत्साहन मिले और भारत के भीतर भाषायी सहमति का वातावरण बने, तो हिंदी निश्चित ही विश्व पटल पर राष्ट्रभाषा का स्वरूप ग्रहण कर सकती है। समाप्त

लेखक

डॉ. चेतन आनंद

(कवि एवं पत्रकार)