मंगलवार, 11 नवंबर 2025

पानी का विज्ञान, नैतिकता और आवश्यकता

 विशेष लेख-

पानी का सम्मान ही भविष्य की सुरक्षा है। विज्ञान हमें बताता है कि जल के बिना जीवन असंभव है, नैतिकता सिखाती है कि यह सबका अधिकार है और आवश्यकता याद दिलाती है कि इसका सीमित उपयोग ही स्थायित्व की गारंटी है। आज का समय हमसे यह संकल्प मांगता है-हम पानी को केवल प्रयोग नहीं, सम्मान देंगे। “यदि हम जल बचाएँगे, तो भविष्य हमें बचाएगा।” इसलिए, अब आवश्यकता है कि विज्ञान की समझ और नैतिकता की संवेदना से हम जल को नयी दृष्टि से देखें। क्योंकि जब आखि़री बूंद बचेगी, तब ही मानवता बचेगी। “जल ही जीवन है” यह नारा केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की आधारशिला है। आज जब पृथ्वी पर हर तीसरा व्यक्ति पानी के संकट से जूझ रहा है, तब यह प्रश्न पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या हमने पानी के विज्ञान को समझा, उसकी नैतिकता को निभाया और उसकी वास्तविक आवश्यकता को जाना?
पानी का विज्ञान, धरती का जीवन-सूत्र-विज्ञान की दृष्टि से पानी दो हाइड्रोजन और एक ऑक्सीजन परमाणु से मिलकर बना रासायनिक यौगिक है। परंतु इसकी उपयोगिता रासायनिक नहीं, जीव वैज्ञानिक है, क्योंकि यही जीवन की धड़कन है।
कुछ वैज्ञानिक तथ्य-पृथ्वी की सतह का लगभग 71 प्रतिशत भाग जल से ढका है, परन्तु मात्र 2.5 प्रतिशत ही मीठा पानी है। मानव शरीर का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा जल से बना है। यह सबसे बड़ा विलायक है, जो जीवों के भीतर रासायनिक प्रक्रियाओं को संभव बनाता है। इसका तापीय गुण पृथ्वी को अत्यधिक गर्म या ठंडा होने से बचाता है। वर्षा, नदियाँ, झीलें, समुद्र और भूजल सभी मिलकर जलचक्र बनाते हैं। यही चक्र जीवन की निरंतरता का वैज्ञानिक आधार है।
पानी की नैतिकता, मानव का नैतिक दायित्व-पानी केवल उपयोग की वस्तु नहीं, साझी विरासत है। प्राचीन भारतीय परंपरा में इसे “पवित्र तत्व” माना गया। गंगा, यमुना, सरस्वती, सिंधु केवल नदियाँ नहीं, माँ कहलाईं। इसका अर्थ था “जिससे जीवन मिले, उसका संरक्षण भी हमारा कर्तव्य है।”
नैतिक दृष्टि से कुछ मूल सिद्धांत
1.जल सबका है, कोई भी व्यक्ति, संस्था या राष्ट्र जल पर पूर्ण अधिकार नहीं रख सकता।
2.समान वितरण का अधिकार, जब शहरों के क्लबों में स्विमिंग पूल भरते हैं और गाँवों में लोग एक बाल्टी पानी को तरसते हैं, तब यह असमानता नैतिक पतन है।
3.प्रदूषण अपराध है, रासायनिक कचरे, नालों और प्लास्टिक से नदियों को दूषित करना न केवल पर्यावरणीय अपराध है, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अधर्म है।
4.संरक्षण जिम्मेदारी है, भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल बचाना मानव धर्म है। महात्मा गांधी ने कहा था “प्रकृति सभी की आवश्यकता पूरी कर सकती है, पर किसी एक के लालच को नहीं।” यह वाक्य आज जल संकट की सबसे बड़ी चेतावनी बन गया है।

पानी की आवश्यकता, विकास और अस्तित्व की धुरी
पानी की आवश्यकता को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है- जैविक, सामाजिक और आर्थिक।
जैविक आवश्यकता-हर व्यक्ति को प्रतिदिन 3-5 लीटर पीने योग्य पानी चाहिए। इसके बिना शरीर में डिहाइड्रेशन, गुर्दे की समस्याएँ, और अंततः मृत्यु तक की संभावना होती है।
सामाजिक आवश्यकता-भारत जैसे देश में जल केवल जीवन नहीं, संस्कार है। छठ पूजा, स्नान पर्व, कुंभ और गणेश विसर्जन सबमें जल की पवित्र भूमिका है। गाँवों में तालाब, कुएँ और नदियाँ केवल जल स्रोत नहीं, सामाजिक एकता के केंद्र रहे हैं। लेकिन यही जल विवाद का कारण भी बना। जैसे कावेरी जल विवाद या रावी-ब्यास नदी विवाद।
आर्थिक आवश्यकता-कृषि, उद्योग, बिजली, निर्माण, और पर्यटन  सभी जल पर निर्भर हैं। भारत में कुल मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत भाग कृषि में खर्च होता है। एक लीटर दूध उत्पादन में औसतन 1000 लीटर पानी और एक किलो चावल में 3000 लीटर पानी लगता है। बिना पानी के न उद्योग चल सकता है, न खेत, न शहर।
जल संकट, विज्ञान और नैतिकता की हार
संयुक्त राष्ट्र की वॉटर डेवलपमेंट रिपोर्ट (2024) बताती है कि विश्व की 25 प्रतिशत आबादी जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में रहती है। भारत का हाल भी चिंताजनक है। दिल्ली, चेन्नई, जयपुर, लखनऊ, और बेंगलुरु अगले दशक में “डे-ज़ीरो सिटी” बन सकते हैं। भूजल स्तर हर वर्ष 0.3 मीटर की दर से घट रहा है। नदियाँ रासायनिक कचरे और सीवेज से भरी हैं। गंगा और यमुना में 70 प्रतिशत तक प्रदूषण स्तर मानक से ऊपर है।
मुख्य कारण
भूजल का अत्यधिक दोहन
वर्षा जल संचयन की उपेक्षा
औद्योगिक प्रदूषण
शहरीकरण और कंक्रीटीकरण
जल नीति की अनदेखी
यह केवल वैज्ञानिक विफलता नहीं, नैतिक पतन भी है। क्योंकि हमने धरती को उपभोग की वस्तु मान लिया, संरक्षण की नहीं।
समाधान, विज्ञान और संवेदना का संगम
जल संकट का समाधान तभी संभव है जब तकनीकी उपायों के साथ नैतिक दृष्टिकोण भी जोड़ा जाए।
वैज्ञानिक उपाय, वर्षा जल संचयनः हर भवन में अनिवार्य व्यवस्था। सूक्ष्म सिंचाई, जल उपयोग में 40 प्रतिशत तक बचत।
रीसाइक्लिंग और पुनः उपयोग, शहरी क्षेत्रों में गंदे पानी का शोधन।
भूजल पुनर्भरण तकनीक, बोरवेल और रिचार्ज वेल का उपयोग।
तालाब और झील पुनर्जीवन, पुराने जल स्रोतों का पुनर्निर्माण।
नैतिक उपाय
दैनिक जीवन में जल बचत, दाँत ब्रश करते समय या कपड़े धोते समय नल खुला न छोड़ना।
बच्चों को “जल संस्कृति” सिखाना, शिक्षा में जल अध्याय को व्यवहारिक बनाना।
धार्मिक आयोजनों में नदियों की रक्षा का संकल्प।
समाज में जल-समानता की भावना विकसित करना, गाँवों को प्राथमिकता देना।
भारत सरकार की ‘जल जीवन मिशन’, ‘नमामि गंगे’ और ‘अटल भूजल योजना’ जैसी परियोजनाएँ तभी सफल होंगी जब प्रत्येक नागरिक “पानी का प्रहरी” बने।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

150 साल बाद भी ‘वन्दे मातरम’ गीत पर विवाद

 विशेष लेख-

भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम’ को लिखे आज लगभग 150 वर्ष पूरे हो चुके हैं, परंतु विडम्बना यह है कि यह गीत आज भी विवादों के घेरे में है। जो गीत कभी स्वतंत्रता संग्राम के समय भारतीय जनमानस में जोश, बलिदान और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना का प्रतीक बना था, वही आज धार्मिक, राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों का केंद्र बन गया है। सवाल उठता है आखि़र 150 साल बाद भी यह गीत विवादों से मुक्त क्यों नहीं हो सका?
इतिहास और उत्पत्ति
वन्दे मातरम् गीत बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में रचा था, जो बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनन्दमठ (1882) में सम्मिलित हुआ। यह गीत मूलतः बंगाल की मातृभूमि की महिमा का वर्णन करता है, लेकिन धीरे-धीरे यह समूचे भारत की मातृभूमि का प्रतीक बन गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत ‘स्वराज्य’ और ‘स्वाभिमान’ का नारा बन गया था। लाला लाजपत राय, अरविंद घोष, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत का “राष्ट्रीय गीत” घोषित किया, जबकि “जन गण मन” को “राष्ट्रीय गान” का दर्जा मिला। लेकिन तभी से इसके कुछ धार्मिक और वैचारिक पक्षों को लेकर मतभेद प्रारंभ हुए।
विवाद के प्रमुख कारण
1. धार्मिक प्रतीकवाद और संवेदनशीलता-गीत के कुछ छंदों में माँ दुर्गा और देवी स्वरूपा मातृभूमि का चित्रण मिलता है। जैसे पंक्ति, “त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी”। हिन्दू दृष्टि से यह प्रतीकात्मक है, परंतु मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग का मत है कि मातृभूमि को देवी मानकर पूजना उनके एकेश्वरवादी सिद्धांत के विपरीत है। इसलिए, उनके लिए यह धार्मिक रूप से अस्वीकार्य बन जाता है। यही कारण है कि स्वतंत्रता संग्राम के समय भी कई मुस्लिम नेताओं ने इसके पूर्ण पाठ का विरोध किया था। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर की मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा संस्था ने सरकार के उस आदेश का विरोध किया, जिसमें स्कूलों में वन्दे मातरम् को अनिवार्य रूप से गाने की बात कही गई थी। उनका कहना है कि यह आदेश “धार्मिक स्वतंत्रता” के अधिकार का उल्लंघन करता है।
2. अनिवार्यता बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता-वन्दे मातरम् गाना या न गाना, यह देशभक्ति का पैमाना नहीं हो सकता, यह बात कई विपक्षी नेताओं और शिक्षाविदों ने दोहराई है। महाराष्ट्र में हाल ही में जारी आदेश में सभी विद्यालयों को प्रतिदिन यह गीत गाने का निर्देश दिया गया, जिससे बहस तेज हो गई। समाजवादी पार्टी के नेता अबू आसिम आज़मी ने कहा-“जैसे मैं किसी को नमाज़ पढ़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, वैसे ही कोई मुझे वन्दे मातरम् गाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।” विपक्षी नेताओं का कहना है कि देशभक्ति का प्रदर्शन वैकल्पिक होना चाहिए, अनिवार्य नहीं। जबकि सत्ताधारी पक्ष का तर्क है कि यह गीत राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है और इसे गाना हर नागरिक का सम्मान है।
3. राजनीति और प्रतीकवाद-150वीं वर्षगाँठ के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी ने इसे राष्ट्रीय गौरव का उत्सव बनाते हुए देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए। महाराष्ट्र में उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि “वन्दे मातरम् भारत की आत्मा का स्वर है।” दूसरी ओर कांग्रेस पर आरोप लगाया गया कि उसने 1937 में इस गीत के केवल पहले दो छंदों को स्वीकार किया और देवी-दुर्गा वाले छंदों को हटा दिया था, ताकि मुस्लिम समुदाय की भावना को आहत न किया जाए। बीजेपी के नेता सी.आर. केशवन ने कहा कि “नेहरू और कांग्रेस ने जानबूझकर माँ दुर्गा वाले हिस्से को हटाया ताकि तुष्टिकरण की राजनीति की जा सके।” कांग्रेस का जवाब था कि गीत के पहले दो छंद राष्ट्रवादी भावना के प्रतीक हैं, जबकि बाद के छंद धार्मिक प्रकृति के हैं, इसलिए संविधान-निरपेक्ष भारत के लिए दो छंद पर्याप्त माने गए।
4. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक व्याख्या का अंतर-विद्वान जे. जे. लिप्नर अपने शोध लेख ‘आइकॉन एंड मदर्स’ में लिखते हैं कि वन्दे मातरम् का मातृस्वरूप भारतीय सभ्यता में देवी-माँ की सांस्कृतिक छवि से जुड़ा है। यह किसी धर्म की आराधना नहीं बल्कि मातृभूमि के प्रति प्रेम का प्रतीक है। किन्तु समाज की विविध धार्मिक परंपराओं में इस प्रतीक की व्याख्या अलग-अलग हुई है। कुछ समुदायों ने इसे “राष्ट्र की माता” के रूप में स्वीकार किया, तो कुछ ने इसे “देवी की उपासना” के रूप में देखा। यह बहुआयामी अर्थ ही आज विवाद का कारण बन गया है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विवाद
नवम्बर 2025 में, गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर देशभर में समारोहों का आयोजन हुआ। परंतु कई राज्यों में इसे लेकर राजनीति भी गरमाई। राजस्थान, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर में विपक्षी दलों ने कहा कि सरकार इसे एक “धार्मिक राष्ट्रवाद” के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रही है। दूसरी ओर बीजेपी और उससे जुड़े संगठन इसे “भारत माता की आराधना” बताते हुए राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक मान रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ी। एक वर्ग ने कहा कि “जो वन्दे मातरम् नहीं कह सकता, वह देशभक्त नहीं।” वहीं दूसरा वर्ग कहता है कि “देशभक्ति का अर्थ जबरन थोपना नहीं है, बल्कि विविधता में एकता को स्वीकार करना है।”
विद्वानों की दृष्टि
राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों ही भारत की पहचान के अंग हैं, परंतु दोनों का स्वर अलग है। राष्ट्रगान (जन गण मन) “राज्य की व्यवस्था और एकता” का प्रतीक है, जबकि वन्दे मातरम् “भावनात्मक और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” का। इतिहासकार रामचन्द्र गुहा के अनुसार, “वन्दे मातरम् का असली अर्थ भारत की भूमि और संस्कृति के प्रति प्रेम है, न कि किसी देवी की आराधना।” कई समाजशास्त्रियों का मत है कि यह विवाद भारत की धार्मिक बहुलता और राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रतीक बन गया है। गीत पर प्रतिबंध या अनिवार्यता, दोनों ही चरम स्थितियाँ हैं; समाधान संतुलन में है।
वन्दे मातरम् का सांस्कृतिक अर्थ
वन्दे मातरम का अर्थ है-“माँ, मैं तुम्हें नमन करता हूँ।” यह मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक है। स्वतंत्रता संग्राम के समय यह नारा जब गूँजता था, तो अंग्रेज शासन काँप उठता था। “वन्दे मातरम” के स्वर में वह शक्ति थी जिसने भगत सिंह, खुदीराम बोस, बिपिनचन्द्र पाल, सुभाषचन्द्र बोस जैसे युवाओं को प्रेरित किया। आज जब यह गीत विवादों में घिरा है, तो शायद हमें उसके मूल अर्थ और भावना को पुनः समझने की आवश्यकता है, यह किसी धर्म की नहीं, बल्कि भारत की मिट्टी की वंदना है। 150 वर्षों बाद भी वन्दे मातरम् का विवाद यह दिखाता है कि भारत की राष्ट्रीय प्रतीकात्मक एकता अभी भी संवेदनशील मुद्दा है। यह गीत भारत की आत्मा, संस्कृति और संघर्ष का प्रतीक है। लेकिन जब इसे राजनीतिक या धार्मिक दृष्टि से देखा जाता है तो इसकी पवित्रता कमजोर पड़ जाती है। गीत के रचनाकार बंकिमचन्द्र का उद्देश्य देश की धरती, नदियों, वनों और जनजीवन को “माँ” के रूप में पूजना था, न कि किसी संप्रदाय विशेष की देवी के रूप में। यदि हम इस मूल भावना को समझ सकें, तो वन्दे मातरम् पुनः वही प्रेरणा बन सकता है जो 1905 में स्वदेशी आंदोलन का नारा बना था। वन्दे मातरम् को लेकर मतभेद हो सकते हैं, परंतु यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि इस गीत ने भारतीय स्वतंत्रता और राष्ट्रभावना को एकजुट किया। इसलिए आज भी इसका संदेश स्पष्ट है-“भारत माता की सेवा ही सर्वोच्च धर्म है, और उसकी वंदना ही सच्ची देशभक्ति।”

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


दिल्ली-एनसीआर के फ्लैटोंधारकों पर 34 लाख करोड़ रुपये का बोझ

 लेख-

दिल्ली-एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) देश के सबसे बड़े आवासीय बाजारों में से एक है। गुरुग्राम, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, फरीदाबाद और गाजियाबाद जैसे शहर पिछले दो दशकों में गगनचुंबी इमारतों से भर गए हैं। हर साल लाखों लोग यहाँ अपने “सपनों का घर” खरीदने की कोशिश करते हैं। पर इन ऊँची इमारतों की चमक के पीछे एक बड़ा आर्थिक और सामाजिक सवाल छिपा है, कितने फ्लैटों पर बैंक लोन चल रहा है, कितने लोग किस्तें चुका रहे हैं और कितनों की किस्तें डूब चुकी हैं?
बैंक लोन का बढ़ता ग्राफ
राष्ट्रीय आवास बैंक (एनएचबी) के अनुसार, वर्ष 2024 के अंत तक भारत में कुल 33.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का आवासीय ऋण बकाया था। इसमें दिल्ली-एनसीआर की हिस्सेदारी लगभग 22-25 प्रतिशत के बीच मानी जाती है, क्योंकि यहाँ सबसे अधिक शहरीकरण और मध्यमवर्गीय आवासीय निवेश हुआ है। सिर्फ नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम मिलाकर लगभग 10 लाख से अधिक सक्रिय फ्लैट लोन खाते चल रहे हैं। इनमें से बड़ी संख्या 40 लाख से 1 करोड़ रुपये तक के कर्ज़ की है। इन फ्लैटों में से लगभग 65-70 प्रतिशत खरीदारों ने बैंक या हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों से ऋण लिया है। बैंकों के लिए यह सेक्टर बेहद आकर्षक रहा, क्योंकि नियमित ईएमआई भुगतान से उन्हें स्थिर ब्याज आय मिलती है। परंतु इस सुनहरी तस्वीर में एक छिपी दरार भी है।
डूबते सपनों की हकीकत
आरबीआई की रिपोर्टों और उद्योग सर्वेक्षणों के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में आवासीय ऋणों का औसत एनपीए अनुपात लगभग 2-3 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। हालांकि यह प्रतिशत कम दिखता है, पर क्षेत्र की विशालता को देखते हुए इसका अर्थ है कि लगभग 15,000- 20,000 करोड़ रुपये तक के ऋण जोखिम में हैं। सबसे बड़ी दिक्कत “अफोर्डेबल हाउसिंग” यानी किफ़ायती आवास क्षेत्र में है। यहाँ नौकरी की अस्थिरता और आय की अनिश्चितता के कारण ईएमआई भुगतान में रुकावटें आई हैं। गुरुग्राम और नोएडा के कई प्रोजेक्टों में अधूरे निर्माण, कानूनी विवाद और बिल्डर की दिवालियापन प्रक्रिया ने भी हजारों खरीदारों को लोन भुगतान में फँसा दिया। नोएडा एक्सटेंशन, बिसरख और सेक्टर-150 जैसे इलाकों में कई परियोजनाएँ वर्षों से रुकी हुई हैं। खरीदार ईएमआई तो दे रहे हैं, पर कब्जा नहीं मिला। परिणामस्वरूप कई लोगों ने भुगतान रोक दिया, जिससे ये लोन एनपीए श्रेणी में आने लगे।
लोन डूबने के मुख्य कारण
दिल्ली-एनसीआर के फ्लैट लोन संकट को समझने के लिए इसके सामाजिक और आर्थिक कारणों को देखना आवश्यक है-
निर्माण में विलंब और बिल्डर की दिवालियापन स्थिति-2010 के बाद से कई बड़े बिल्डर,जैसे आम्रपाली, यूनिटेक, सुपरटेक आदि पर कानूनी कार्यवाही हुई। फ्लैट खरीदारों ने लोन लिया, ईएमआई दी, पर मकान अधूरा रह गया।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी-2022-24 के बीच रेपो रेट में 2.5 प्रतिशत तक वृद्धि हुई, जिससे ईएमआई औसतन 4,000 से 6,000 रुपये बढ़ गई। इससे मध्यमवर्गीय आय पर सीधा असर पड़ा।
रोजगार अस्थिरता-कोविड के बाद आईटी, रिटेल और रियल एस्टेट क्षेत्रों में छँटनी हुई, जिससे ईएमआई भुगतान रुक गए।
कानूनी और स्वामित्व विवाद-जमीन के स्वामित्व, रेरा पंजीकरण और अधिग्रहण में खामियों ने कई प्रोजेक्टों को रोक दिया।
अतिरिक्त लोन बोझ-कई परिवारों ने एक से अधिक फ्लैट खरीद लिए, निवेश की नीयत से। बाजार मंदा पड़ा तो उन्हें नुकसान हुआ और भुगतान असंभव हो गया।
सरकार और न्यायालय की भूमिका
इन संकटों के बीच सरकार और न्यायालय ने खरीदारों के हित में कई कदम उठाए-
रेरा (रियल एस्टेट रेगुलेशन एक्ट, 2016)-अब हर प्रोजेक्ट को रजिस्ट्रेशन आवश्यक है। बिल्डर को खरीदार के पैसे का 70 प्रतिशत निर्माण पर ही खर्च करना होगा। देरी होने पर बिल्डर को ब्याज देना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप (आम्रपाली केस)-कोर्ट ने एनबीसीसी को अधूरे प्रोजेक्ट पूरे करने का आदेश दिया। इस कदम से लगभग 40,000 खरीदारों को राहत मिली।
प्रधानमंत्री आवास योजना-निम्न और मध्यम आय वर्ग को 6.5 प्रतिशत तक ब्याज सब्सिडी दी जा रही है।
नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों द्वारा नई नीतियाँ-बिल्डरों के डिफॉल्ट प्रोजेक्टों को नए निवेशकों को सौंपकर पूरा करने की दिशा में प्रयास।
बैंकिंग सेक्टर की स्थिति
सार्वजनिक और निजी बैंकों ने भी अपने जोखिम को सीमित करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे आरबीआई और एनएचबी के दिशा-निर्देशों के तहत बैंक अब लोन टू वैल्यू रेशियो को 80 प्रतिशत तक सीमित रखते हैं। क्रेडिट स्कोर आधारित स्क्रीनिंग कड़ी कर दी गई है। हाउसिंग फाइनेंस कंपनीज को अब छोटे लोन पर ब्याज दरें बढ़ानी पड़ी हैं ताकि संभावित नुकसान की भरपाई हो सके। बड़े प्रोजेक्टों में बैंकों ने “सिंडिकेटेड लोन” मॉडल अपनाया है ताकि जोखिम साझा किया जा सके।
संभावनाएँ और सुधार की दिशा
दिल्ली-एनसीआर का रियल एस्टेट बाजार 2025-26 में फिर से तेज़ी दिखा रहा है। नाइट फें्रक और एनारॉक की रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 में इस क्षेत्र में लगभग 60,000 नए फ्लैटों की बुकिंग की उम्मीद है। आय में वृद्धि, बुनियादी ढाँचे (जैसे मेट्रो विस्तार, यमुना एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मुंबई कॉरिडोर) और रोजगार के अवसरों के कारण यह क्षेत्र निवेशकों के लिए अब भी आकर्षक है। सरकार के अनुसार, रेरा और डिजिटल रजिस्ट्री के बाद खरीदारों का भरोसा लौटा है। बैंकों ने भी अब सुरक्षित ऋण नीति अपनाई है, अर्थात् पहले से अधिक सटीक मूल्यांकन और भुगतान ट्रैकिंग।
समाधानः खरीदार, बैंक और नीति-निर्माताओं की साझा जिम्मेदारी
खरीदारों को सावधानी बरतनी होगी केवल रेरा मान्य प्रोजेक्ट में निवेश करें। ईएमआई क्षमता का आकलन वास्तविक आय के अनुरूप करें। “इन्वेस्टमेंट फ्लैट” की बजाय “रहने योग्य फ्लैट” प्राथमिकता बनाएं।
बैंकों को पारदर्शिता बढ़ानी होगी
ग्राहक को ब्याज दर, फ्लोटिंग रेट बदलाव और छिपे शुल्क स्पष्ट बताएं। डिजिटल ट्रैकिंग और चेतावनी प्रणाली मजबूत करें। सरकार को नियमन सख्त और सरल दोनों बनाना होगा। रेरा में अपील प्रक्रियाएँ तेज़ हों। अधूरे प्रोजेक्टों की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग हो। बिल्डरों की वित्तीय गारंटी प्रणाली लागू की जाए।
दिल्ली-एनसीआर का रियल एस्टेट देश की आर्थिक नब्ज़ है। यहाँ के फ्लैट केवल ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के जीवन सपनों का प्रतीक हैं। बैंकों के लिए यह लाभकारी क्षेत्र है, लेकिन लापरवाही, कानूनी गड़बड़ियाँ और आर्थिक अस्थिरता इसे बार-बार संकट में डाल देती हैं। यदि नीति-निर्माता, बैंक और खरीदार, तीनों ही मिलकर पारदर्शिता, जिम्मेदारी और नियमन के साथ आगे बढ़ें, तो दिल्ली-एनसीआर एक बार फिर भारत के “सपनों के घर” का सच्चा केंद्र बन सकता है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

किसी से कम नहीं हैं भारत की छोरियाँ

 लेख-


भा
रत की बेटियाँ आज किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। विज्ञान की प्रयोगशालाओं से लेकर खेल के मैदानों तक, उद्यमों से लेकर काव्य और कूटनीति तक, हर जगह भारतीय नारी ने अपने साहस, प्रतिभा और लगन से देश का गौरव बढ़ाया है। पिछले दस वर्षों (सन् 2015 से 2025) का यह कालखंड भारत की छोरियों के लिए स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है।

विज्ञान और अंतरिक्ष में भारतीय नारी का उत्कर्ष-भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान में अब महिलाओं की भागीदारी केवल सहायक नहीं, बल्कि नेतृत्व की बन चुकी है।चन्द्रयान-2 और चन्द्रयान-3 अभियानों में वैज्ञानिक डॉ. ऋतु करिधल श्रीवास्तव तथा वनीता रंगनाथन मुख्य अभियंता दल का हिस्सा रहीं। जब भारत ने 2023 में चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपने यान विक्रम को सफलतापूर्वक उतारा तो इस उपलब्धि में महिलाओं का योगदान निर्णायक था। रक्षा अनुसन्धान में टेस्सी थॉमस, जिन्हें “भारत की क्षेपणास्त्र नारी” कहा जाता है, 2015 में मिसाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैज्ञानिक नेतृत्व का प्रतीक बनीं। स्वास्थ्य-विज्ञान में डॉ. सौम्या स्वामीनाथन विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रधान वैज्ञानिक बनीं, जो भारत के लिए गर्व का विषय रहा। इस प्रकार विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में भारतीय नारी की उपस्थिति आज विश्व के किसी भी देश से कम नहीं रही।
उद्यमिता और अर्थ निर्माण में अग्रणी बेटियाँ-यदि विज्ञान ने आसमान छुआ तो भारतीय महिलाओं ने उद्यमिता के क्षेत्र में धरती पर आर्थिक परिवर्तन की मिसाल कायम की। सन् 2018 में फाल्गुनी नायर ने नायका नामक सौन्दर्य-व्यवसाय की स्थापना की, जो शीघ्र ही अरबों रुपये मूल्य की कंपनी बन गई। यह भारत की पहली सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध महिला स्थापित कंपनी बनी। विनीता सिंह की शुगर कॉस्मेटिक्स और गज़ल अलग की मामाअर्थ ने भी यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिक भारत की महिलाएँ केवल भागीदारी नहीं, बल्कि उद्योग-जगत की निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं। नवउद्यम मंचों के अनुसार, देश में लगभग 20 प्रतिशत नये उद्योग महिलाओं द्वारा स्थापित हैं और लगभग 40 प्रतिशत महिला उद्यमी अपने व्यवसाय को अकेले संचालित करती हैं। इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारतीय नारी अब आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ रही है।
साहित्य और कला में वैश्विक मान्यता-भारतीय स्त्रीलेखन अब विश्व साहित्य में अपना स्वाभाविक स्थान बना चुका है। सन् 2025 में बानु मुश्ताक और अनुवादिका दीपा भस्थी को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार प्राप्त हुआ। यह पहला अवसर था जब किसी भारतीय भाषा कन्नड़ की कहानियों का संग्रह यह सम्मान जीत सका। 2017 में कवयित्री अरुंधति सुब्रमण्यम का काव्य संग्रह व्हेन गॉड इज़ ए ट्रैवेलर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित हुआ। ये उपलब्धियाँ दिखाती हैं कि भारतीय महिलाएँ अपनी मातृभाषाओं और जीवनानुभवों को विश्व संवाद की भाषा में रूपान्तरित कर रही हैं। कला और चलचित्र के क्षेत्र में जोया अख़्तर, रीमा कागती तथा गायत्री पुष्पक जैसी निर्देशिकाओं ने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई पहचान दी है।
खेलों में स्वर्णिम अध्याय-भारत की महिला खिलाड़ियों ने विश्व खेल मंचों पर देश का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया है। 2016 के रियो ओलम्पिक में पी. वी. सिंधु ने रजत पदक जीतकर इतिहास रचा। 2021 में मीराबाई चानू ने भारोत्तोलन में रजत पदक अर्जित किया। 2022 में निकहत ज़रीन ने विश्व मुक्केबाज़ी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर नया अध्याय जोड़ा। 2025 में भारतीय महिला क्रिकेट दल ने दक्षिण अफ्रीका को पराजित कर अपना पहला विश्व कप जीता। यह सफलता महिलाओं के खेल इतिहास में वैसी ही रही जैसी 1983 में पुरुष क्रिकेट की थी। कप्तान हरमनप्रीत कौर और उपकप्तान स्मृति मंधाना आज युवतियों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। मंधाना ने 2024 में एक वर्ष में 763 रन बनाकर विश्व टी20 का रिकॉर्ड कायम किया। शतरंज में 19 वर्षीय दिव्या देशमुख ने विश्व महिला शतरंज कप जीतकर भारत को नई ऊँचाई दी। अरुणाचल प्रदेश की हिलांग याजिक ने दक्षिण एशियाई बॉडीबिल्डिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा।

नीति और समाज सेवा में भूमिका-भारत की महिलाएँ अब केवल विज्ञान या खेल तक सीमित नहीं बल्कि नीति निर्माण और सामाजिक परिवर्तन की वाहक भी बन रही हैं। 2025 में नीना गुप्ता, जो संयुक्त राष्ट्र महिला भारत शाखा से जुड़ी हैं, उन्हें लैंगिक समानता अभियानों में योगदान के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला। भारत में भी प्रशासन और न्याय व्यवस्था में महिला प्रतिनिधित्व दोगुना हुआ है। नीति आयोग के 2024 के आँकड़ों के अनुसार, वरिष्ठ प्रशासनिक सेवाओं में महिलाओं की संख्या पिछले दशक की तुलना में 90 प्रतिशत तक बढ़ी है। यह परिवर्तन समाज के निर्णय प्रक्रिया में महिला दृष्टिकोण की उपस्थिति को सशक्त बनाता है।
दशकीय उपलब्धियों की झलक
वर्ष     क्षेत्र                   प्रमुख नाम                             उपलब्धि

2015   विज्ञान            टेस्सी थॉमस             क्षेपणास्त्र प्रौद्योगिकी में नेतृत्व
2016   खेल                पी. वी. सिंधु                    ओलम्पिक रजत पदक
2018   उद्यम             फाल्गुनी नायर ‘नायका’ को यूनिकॉर्न दर्जा
2019   शतरंज             कोनेरु हुम्पी                    विश्व रैपिड विजेता
2020   स्वास्थ्य      डॉ. सौम्या स्वामीनाथन   विश्वस्वास्थ्य संगठन में प्रमुख वैज्ञानिक
2021   खेल                  मीराबाई चानू                  ओलम्पिक रजत पदक
2022   मुक्केबाज़ी          निकहत ज़रीन                     विश्व विजेता
2023   अंतरिक्ष              ऋतु करिधल             ‘चन्द्रयान-3’ में प्रमुख भूमिका
2024    क्रिकेट                स्मृति मंधाना              सर्वाधिक रन, विश्व रिकॉर्ड
2025    साहित्य               बानु मुश्ताक                अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार

परिवर्तन की दिशा और चुनौतियाँ-यह दशक नारीदृउत्कर्ष का रहा है, पर चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुईं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में महिलाओं की भागीदारी लगभग 33 प्रतिशत है, किन्तु नेतृत्व स्तर पर यह अनुपात अभी आधा भी नहीं। उद्यमिता में महिलाओं की संख्या बढ़ी है, पर पूँजी निवेश और विपणन सहायता अभी सीमित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने के लिए शिक्षा, प्रशिक्षण और डिजिटल साधनों की आवश्यकता है। सरकारी योजनाएँ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, स्टार्टअप इंडिया बीज निधि योजना और विज्ञान में महिलाएँ कार्यक्रम इन बाधाओं को कम करने की दिशा में सक्रिय हैं।
सन् 2015 से 2025 तक की यह यात्रा भारतीय नारीशक्ति के आत्मविश्वास और कर्मठता की गाथा है। अब “किसी से कम नहीं हैं भारत की छोरियाँ” सिर्फ नारा नहीं, बल्कि यथार्थ है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि अवसर मिले तो भारत की बेटियाँ विज्ञान में तारे खोज सकती हैं, साहित्य में संवेदनाएँ लिख सकती हैं, उद्योग में नई अर्थनीति बना सकती हैं और खेलों में विश्व विजेता बन सकती हैं। भारत का यह दशक स्त्रीशक्ति के उत्कर्ष का दशक है, जहाँ हर दिशा में यह स्वर गूँज रहा है-“हम वो हैं जो इतिहास नहीं, भविष्य लिख रही हैं।”


लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

वैश्विक चमत्कार करेंगे भारतीय युवा

 लेख-

(भारत की युवा शक्ति का विश्व पर बढ़ता प्रभाव)
भारत आज केवल एक देश नहीं, बल्कि विश्व की युवा ऊर्जा का केंद्र बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र और नीति आयोग की ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा 35 वर्ष से कम आयु का है, जबकि 27 प्रतिशत आबादी 15 से 29 वर्ष के बीच की है। विश्व के लगभग 20 प्रतिशत युवा अकेले भारत में रहते हैं, यानी हर पाँच में से एक युवा भारतीय है। यह जनसांख्यिकीय तथ्य भारत को वह शक्ति देता है जो आने वाले वर्षों में इसे वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा सकती है।
नवाचार और तकनीकी क्रांति में भारतीय युवा
21वीं सदी की डिजिटल और वैज्ञानिक दुनिया में भारतीय युवाओं की भूमिका अग्रणी बन चुकी है। गूगल के सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला, एडोबी के शांतनु नारायण और यूके की एचएसबीसी बैंक के सीईओ नितिन परांजपे जैसे नाम यह साबित करते हैं कि भारतीय मस्तिष्क आज विश्व की सबसे बड़ी कंपनियों का संचालन कर रहे हैं। भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम भी युवा शक्ति का प्रमाण है। 2025 तक भारत में 1.25 लाख से अधिक स्टार्टअप्स के पंजीकरण की संभावना है, जिनमें से 60 प्रतिशत से अधिक की कमान 30 वर्ष से कम आयु के युवाओं के हाथ में है। फिनटेक, एग्रीटेक, हेल्थटेक, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में भारतीय युवा नवाचार की दिशा में नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर बैंगलुरु की ज़ेरोधा, पुणे की रेज़रपे, और गुरुग्राम की ओयो रूम्स जैसी कंपनियाँ यह दिखाती हैं कि भारतीय युवा “नौकरी मांगने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले” बन चुके हैं।
शिक्षा और कौशल का नया परिदृश्य
नई शिक्षा नीति (2020) ने भारतीय शिक्षा को युवा-केंद्रित दिशा दी है। अब शिक्षण संस्थान केवल डिग्री देने के स्थान नहीं, बल्कि नवाचार, कौशल और विचार निर्माण के केंद्र बन रहे हैं। आईआईटी, आईआईएम, आईसीएस और नए निजी विश्वविद्यालय युवाओं को वैश्विक स्तर की शिक्षा, उद्यमिता के अवसर और अनुसंधान का वातावरण प्रदान कर रहे हैं। यूनेस्को की 2024 रिपोर्ट के अनुसार, भारत से हर वर्ष लगभग 2.5 लाख छात्र विदेशों में पढ़ने जाते हैं। इनमें से लगभग 40 प्रतिशत विद्यार्थी अब पढ़ाई पूरी कर वापस भारत लौटकर यहाँ नवाचार और उद्योग स्थापित कर रहे हैं। यह “ब्रेन ड्रेन” से “ब्रेन गेन” की दिशा में ऐतिहासिक परिवर्तन है।
सामाजिक चेतना और जिम्मेदारी
भारतीय युवा अब केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, वे समाज परिवर्तन की धुरी भी बन रहे हैं। चाहे जलवायु परिवर्तन की बात हो या लैंगिक समानता की, युवाओं की सोच अब पहले से कहीं अधिक संवेदनशील और प्रगतिशील है। लिसिप्रिया कंगुजम, जो मात्र 13 वर्ष की हैं, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में वैश्विक मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में “प्लास्टिक फ्री कैंपस”, “क्लीन एनर्जी प्रोजेक्ट”, “सेव वाटर मिशन” जैसे आंदोलन युवाओं के नेतृत्व में चल रहे हैं। “स्वच्छ भारत मिशन”, “हर घर तिरंगा” और “डिजिटल इंडिया” जैसे अभियानों की सफलता का सबसे बड़ा श्रेय युवाओं को ही जाता है।
विश्व मंच पर भारतीय पहचान
भारत की युवा शक्ति आज विश्व के हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रही है। विज्ञान और तकनीक में इसरो के चंद्रयान-3 और आगामी गगनयान मिशन में 70 प्रतिशत से अधिक इंजीनियर युवा हैं। खेलों में नीरज चोपड़ा, स्मृति मंधाना, पीवी सिंधु और प्रणति नायक जैसे युवा खिलाड़ी भारत की नई पहचान बने हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के अनुसार, भारत की युवा आबादी विश्व के कुल युवाओं का लगभग 20 प्रतिशत है, जबकि चीन और अमेरिका जैसे देशों में यह प्रतिशत क्रमशः 12 प्रतिशत और 7 प्रतिशत है। अर्थात्, आने वाले दशक में हर चौथा वैश्विक कामगार भारतीय युवा होगा।
डिजिटल भारत और भविष्य की दिशा
सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाएँ जैसे डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया मिशन ने युवाओं को अभूतपूर्व अवसर प्रदान किए हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था में युवा अब नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे हैं। विश्व आर्थिक मंच की “फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2024” में भारत को “ग्लोबल टैलेंट पावरहाउस” कहा गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले पाँच वर्षों में भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी, ग्रीन एनर्जी और डेटा साइंस जैसे क्षेत्रों में 1 करोड़ से अधिक नई नौकरियाँ सृजित होंगी। इनका अधिकांश हिस्सा युवा वर्ग को ही मिलेगा। भारत की “डिजिटल डिप्लोमेसी” और “टेक्नो-इकॉनॉमिक स्ट्रेंथ” अब विश्व के लिए मॉडल बन रही है।
संस्कृति और संवेदना का संगम
भारतीय युवाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे तकनीकी रूप से आधुनिक हैं, परंतु अपनी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़े हुए हैं। वे परंपरा और प्रगति का संतुलित मिश्रण हैं। सफलता उनके लिए केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक उपलब्धि भी है। आज का युवा अपने व्यक्तिगत हित से अधिक, साझे कल्याण और मानवता के उत्थान की बात करता है। यही भाव भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जो अब विश्व में भारत की सॉफ्ट पावर के रूप में उभर रही है।
तुलनात्मक दृष्टिः भारत बनाम विश्व
देश      युवाओं (15-29 वर्ष) का प्रतिशत विशेष उल्लेख
भारत 27.2 प्रतिशत विश्व के कुल युवाओं का 20 प्रतिशत भारत में
चीन 17 प्रतिशत वृद्ध जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही
अमेरिका 14 प्रतिशत युवाओं की संख्या घट रही
नाइजीरिया 33 प्रतिशत जनसंख्या बहुत युवा, पर शिक्षा सीमित
यह तालिका दर्शाती है कि भारत की युवा जनसंख्या विशाल होने के साथ-साथ शिक्षित और तकनीकी दृष्टि से भी मजबूत है। भारत के युवाओं में ऊर्जा है, दृष्टि है और दिशा पाने की क्षमता है। वे आज न केवल भारत का, बल्कि पूरे विश्व का भविष्य गढ़ रहे हैं। अगर नीति, अवसर और मार्गदर्शन की सही समन्वय हो जाए, तो 21वीं सदी निश्चय ही “भारतीय युवाओं की सदी” कहलाएगी। “युवा भारत नहीं, विश्व का भविष्य गढ़ रहे हैं।”

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


सोमवार, 3 नवंबर 2025

हिन्दी साहित्य में सूफ़ी काव्य परम्परा

 विशेष लेख-


हिन्दी साहित्य के इतिहास में सूफ़ी काव्य परम्परा एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली धारा रही है। यह परम्परा न केवल भक्ति और प्रेम की भावनाओं का सुंदर रूप प्रस्तुत करती है, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता, मानवीय एकता और आत्मा के शुद्धिकरण का भी सशक्त संदेश देती है। सूफ़ी कवियों ने ईश्वर-प्रेम को मानव-प्रेम से जोड़ा और प्रेम को साधना का सर्वोच्च मार्ग बताया।
सूफ़ी काव्य की उत्पत्ति और पृष्ठभूमि
सूफ़ी काव्य परम्परा का उदय भारत में 13वीं शताब्दी के आसपास हुआ, जब तुर्क-अफ़ग़ान शासन के साथ सूफ़ी सन्त भारत आए। सूफ़ी मत इस्लाम की एक रहस्यवादी शाखा है जो आत्मा और परमात्मा के मिलन की खोज करती है। सूफ़ी कवियों ने ‘ईश्वर’ को ‘माशूक़’ (प्रियतम) के रूप में देखा और आत्मा को ‘आशिक़’ (प्रेमी) के रूप में। भारत में सूफ़ी सन्तों ने जब इस प्रेम के दर्शन को भारतीय धरती पर व्यक्त किया, तो उन्होंने स्थानीय भाषाओं, विशेषतः हिन्दी और उसकी बोलियों का सहारा लिया, ताकि उनका सन्देश आम जन तक पहुँच सके।
सूफ़ी कवि और उनके प्रमुख ग्रन्थ
हिन्दी सूफ़ी काव्य मुख्यतः दो शाखाओं में विभक्त है-शेख़ी शाखा (गुरु-शिष्य परम्परा पर आधारित) और प्रेममार्गी शाखा (ईश्वर को प्रेममय रूप में देखने वाली) इन दोनों शाखाओं के अन्तर्गत अनेक महान कवियों ने जन्म लिया-

1. मलिक मोहम्मद जायसी (1490-1542 ई.)-जायसी हिन्दी सूफ़ी काव्य परम्परा के सबसे प्रमुख कवि माने जाते हैं। उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘पद्मावत’ है, जिसमें पद्मावती और रत्नसेन की कथा के माध्यम से आत्मा और परमात्मा के मिलन की रहस्यवादी व्याख्या की गई है। जायसी की भाषा अवधी है, और उनके काव्य में प्रतीक, रूपक और रूपान्तरणों की अत्यन्त गूढ़ता है। वे कहते हैं-“मन ही मन खोजे मनुज, मन ही पाय न पार।” अर्थात् सत्य की खोज भीतर ही करनी है, बाहर नहीं।
2. कुतुबन-कुतुबन का ग्रन्थ ‘मृगावती’ सूफ़ी दर्शन का एक और उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें आत्मा-परमात्मा के मिलन को मृगावती की कथा के माध्यम से प्रतीकात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है।
3. मंझन-मंझन का प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘मधुमालती’ है। इसमें प्रेम, त्याग और आत्मानुभूति का भाव अत्यंत गहराई से प्रकट हुआ है।
4. उस्मान-उनका प्रमुख ग्रन्थ ‘चाँदायन’ है, जो हिन्दी की प्रारम्भिक प्रेमकथाओं में से एक है। इसमें चाँद और चंपा की प्रेमकथा के माध्यम से आध्यात्मिक प्रेम का भाव प्रकट किया गया है।
सूफ़ी काव्य की विशेषताएँ
ईश्वर-प्रेम का प्रतीकात्मक चित्रण-सूफ़ी कवियों ने सांसारिक प्रेम को आध्यात्मिक प्रेम का प्रतीक माना। माशूक़ (प्रेमिका) वास्तव में ईश्वर का प्रतीक है।
रूपक और प्रतीकात्मक भाषा-जायसी, मंझन और कुतुबन ने अपनी रचनाओं में प्रेमकथाओं के माध्यम से आत्मा-परमात्मा के मिलन का रूपकात्मक प्रयोग किया।
आन्तरिक साधना का महत्व-सूफ़ी कवि बाह्य अनुष्ठानों से अधिक ‘अन्तःकरण की पवित्रता’ पर बल देते हैं।
धर्म-सामंजस्य की भावना-इन कवियों ने इस्लाम और हिन्दू परम्पराओं के बीच सेतु का कार्य किया। जायसी के काव्य में हिन्दू देवी-देवताओं और सूफ़ी विचारों का अद्भुत मेल है।
जनभाषा का प्रयोग-सूफ़ी कवियों ने अवधी, ब्रज और हिन्दवी जैसी लोकभाषाओं में काव्य रचा, जिससे उनका सन्देश आम जनता तक पहुँचा।

सूफ़ी और भक्ति काव्य का साम्य
सूफ़ी और भक्ति कव्यधारा में कई समानताएँ हैं-दोनों ही ईश्वर के साक्षात्कार को जीवन का लक्ष्य मानते हैं। दोनों बाह्य कर्मकाण्डों से ऊपर उठकर ‘प्रेम’ को सर्वोच्च मानते हैं। दोनों मतों में गुरु की महिमा विशेष रूप से वर्णित है। कबीर, रैदास, और जायसी के विचारों में अद्भुत समानता है, सबने ‘ईश्वर-प्राप्ति’ को हृदय की अनुभूति बताया है।
सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
सूफ़ी काव्य ने हिन्दी समाज में धार्मिक सहिष्णुता और मानवता की भावना को सशक्त किया। मध्यकालीन भारत में जब साम्प्रदायिक तनाव बढ़ रहा था, तब सूफ़ी सन्तों ने प्रेम, भाईचारे और एकता का सन्देश दिया। उनकी कविताओं ने साहित्य के माध्यम से भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब को जन्म दिया।
सूफ़ी काव्य परम्परा हिन्दी साहित्य में आध्यात्मिक प्रेम, मानवीय एकता और आत्म-ज्ञान की अनूठी परम्परा है। इन कवियों ने धर्म, जाति और संप्रदाय की दीवारें तोड़कर ‘प्रेम’ को ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सच्चा मार्ग बताया। आज भी जायसी, मंझन और कुतुबन के काव्य भारतीय जीवन में आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत हैं। जायसी के शब्दों में-“मन ही मूरख, मन ही ज्ञानी, मन ही देव अधमानी।” यही सूफ़ी सन्देश है कि ईश्वर बाहर नहीं, हमारे भीतर है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


रविवार, 2 नवंबर 2025

भारत के मंदिरों में भगदड़, आस्था में अव्यवस्था का अभिशाप

 विशेष लेख-

 -कारण, आँकड़े और निवारण पर एक गहन विश्लेषण

हाल ही में एक नवंबर 2025 को कांठिका मास की अकादमी पर आंध्र प्रदेश के जिला श्रीकाकुलम के कासीबुग्गा स्थित श्री वेंक्टेश्वर मंदिर में मची भगदड़ में नौ लोगों की मौत हो गई तो अनेक घायल हुए। भारत की आध्यात्मिक भूमि पर मंदिर केवल उपासना के स्थल नहीं, बल्कि सामूहिक श्रद्धा और सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं। यहाँ हर दिन लाखों लोग दर्शन और पूजा के लिए आते हैं। किंतु जब यही आस्था नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो वह विनाश का रूप ले लेती है। देश में समय-समय पर मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में हुई भगदड़ की घटनाएँ इस कटु सत्य को सामने रखती हैं कि हमारी भक्ति कितनी असंगठित और प्रशासनिक तैयारी कितनी अपर्याप्त है।
बढ़ते हादसे, घटती संवेदनशीलता-पिछले दो दशकों में भारत ने कई भयावह भगदड़ें देखीं। सरकारी और स्वतंत्र रिपोर्टों के अनुसार, 2001 से 2014 के बीच ही 3,200 से अधिक घटनाओं में लगभग 2,400 लोगों की मौत हुई। 2025 तक यह संख्या 3,000 से ऊपर पहुँच चुकी है।

कुछ प्रमुख उदाहरण
1.मांधारदेवी मंदिर, महाराष्ट्र (2005)ः भीड़ के दबाव में लगभग 350 श्रद्धालुओं की मृत्यु।
2.नैना देवी, हिमाचल प्रदेश (2008)ः अफवाह से मची अफरा-तफरी में 146 लोग मारे गए।
3.चामुंडा देवी, जोधपुर (2008)ः रेलिंग टूटने से 224 लोगों की जान गई।
4.रतनगढ़ माता मंदिर, मध्य प्रदेश (2013)ः पुल पर भगदड़, 115 श्रद्धालु मृत।
5.वैष्णो देवी, जम्मू-कश्मीर (2022)ः नववर्ष की रात 12 श्रद्धालु मारे गए।
6.हाथरस, उत्तर प्रदेश (2024)ः धार्मिक प्रवचन के दौरान भगदड़ में 120 से अधिक मौतें।
7.मानसा देवी, हरिद्वार (2025)ः सावन में भीड़ के दबाव से 6 लोगों की मौत, दर्जनों घायल।
हर घटना के बाद संवेदना तो उमड़ती है, मगर कुछ सप्ताहों में सब भूल जाते हैं। व्यवस्था फिर वैसी ही ढर्रे पर लौट आती है.

मूल कारणः श्रद्धा से अधिक अव्यवस्था
1. भीड़-प्रबंधन की कमी-अधिकांश हादसों में यह पहली और मुख्य वजह होती है। आयोजक एवं प्रशासन अनुमान नहीं लगा पाते कि कितने लोग आएंगे, और सीमित स्थान में अत्यधिक भीड़ घुस जाती है।
2. संकीर्ण मार्ग और ढाँचे की कमजोरी-कई मंदिर पुराने हैं, जिनमें प्रवेश और निकासी के मार्ग संकरे हैं। रेलिंग, सीढ़ियाँ या पुल पुराने और कमजोर हो जाते हैं।
3. अफवाह और घबराहट-“बिजली गिरी”, “भूकंप आया” या “साँप निकला” जैसी अफवाहें भगदड़ का तात्कालिक कारण बनती हैं।
4. प्रशासनिक समन्वय का अभाव-पुलिस, नगर निकाय और मंदिर प्रबंधन में अक्सर पूर्व-योजना की कमी रहती है। आपात स्थिति में कोई तय जिम्मेदारी नहीं होती।
5. श्रद्धालुओं का अनुशासनहीन व्यवहार-जल्दी दर्शन या प्रसाद के लिए लाइन तोड़ना, धक्का देना, ये छोटे कदम बड़े हादसों का रूप ले लेते हैं।
मानवीय और सामाजिक असर-भगदड़ के दृश्य भयावह होते हैं। जमीन पर बिखरे जूते, टूटी चप्पलें, शवों के ढेर और चीखते परिवार। इनमें सबसे ज़्यादा जानें महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की जाती हैं। इन घटनाओं से न केवल समाज की व्यवस्था पर प्रश्न उठता है, बल्कि धार्मिक पर्यटन की साख को भी धक्का पहुँचता है। मंदिर-प्रबंधन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

निवारणः आस्था के साथ व्यवस्था
1. भीड़-प्रबंधन योजना-हर बड़े धार्मिक स्थल के लिए नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट की गाइडलाइन के अनुसार विस्तृत योजना बनाई जाए, जिसमें एंट्री, एग्ज़िट, आपात मार्ग और भीड़ की अधिकतम सीमा तय हो।
2. संरचनात्मक सुधार-पुराने पुलों, सीढ़ियों और रेलिंग की नियमित जाँच हो। जरूरत पड़ने पर पुनर्निर्माण किया जाए।
3. डिजिटल निगरानी-सीसीटीवी, ड्रोन और भीड़-गणना तकनीक से वास्तविक समय में निगरानी रखी जाए।
4. ऑनलाइन स्लॉट और ई-टिकट व्यवस्था-जैसे तिरुपति या सबरीमाला में किया गया है, उसी प्रकार बड़े मंदिरों में दर्शन के लिए ऑनलाइन स्लॉट निर्धारित किए जाएँ।
5. आपातकालीन चिकित्सा और प्रशिक्षण-हर मंदिर में मेडिकल टीम, एम्बुलेंस और प्रशिक्षित स्वयंसेवक तैनात हों। त्योहारों से पहले ‘मॉक ड्रिल’ की जाए।
6. जन-जागरूकता अभियान-श्रद्धालुओं को समझाया जाए कि संयम और अनुशासन भी पूजा का हिस्सा हैं। धक्का-मुक्की या लाइन तोड़ना पाप के समान है।
7. अफवाह नियंत्रण और सूचना प्रणाली-मंदिरों में लाउडस्पीकर और स्क्रीन के माध्यम से सही सूचना तत्काल दी जाए ताकि अफवाहें न फैलें।
8. जवाबदेही तय हो-हर हादसे के बाद जांच हो, लेकिन उसके निष्कर्षों को लागू करना सबसे जरूरी है। लापरवाही पर कठोर दंड हो।
भविष्य की दिशा-भारत में धार्मिक पर्यटन निरंतर बढ़ रहा है। 2023 में करीब 65 करोड़ लोग किसी न किसी धार्मिक स्थल पर गए। इतने विशाल प्रवाह को सुरक्षित बनाने के लिए अब राष्ट्रीय धार्मिक सुरक्षा नीति की आवश्यकता है। इसमें मंदिर प्रबंधन को ‘स्मार्ट टेम्पल मिशन’ के तहत तकनीकी रूप से सशक्त बनाया जाए। जहाँ सेंसर, डिजिटल क्यू-प्रणाली और रियल-टाइम मॉनिटरिंग हो।
भगदड़ केवल भीड़ की गलती नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है। हर वह मौत, जो मंदिरों की सीढ़ियों पर होती है, हमें यह याद दिलाती है कि श्रद्धा कभी भी विवेक से बड़ी नहीं हो सकती। यदि हम “श्रद्धा में अनुशासन” को अपना लें तो भारत के मंदिर केवल भक्ति के नहीं, सुरक्षा और संगठन के भी प्रतीक बन सकते हैं। समय आ गया है कि हम कहें-“भक्ति वही सच्ची है, जो जीवन बचाए, न कि उसे लील जाए।”

लेखक-
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)