शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

कृत्रिम वर्षा-विज्ञान से आसमान तक

 लेख-

जलवायु परिवर्तन और वैश्विक ऊष्मीकरण के इस दौर में जब प्राकृतिक वर्षा का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है, तब “कृत्रिम वर्षा” यानी क्लाउड सीडिंग तकनीक नई आशा की तरह सामने आई है। यह तकनीक बादलों में रासायनिक पदार्थ (जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या ड्राई आइस) छिड़ककर वर्षा की संभावना को बढ़ाने का प्रयास करती है। सरल शब्दों में कहें तो यह “आसमान को मनाना” है, ताकि बादल अपने जलकण बरसा दें।
 दुनिया में कृत्रिम वर्षा का इतिहास और प्रयोग
कृत्रिम वर्षा का पहला प्रयोग 1940 के दशक में अमेरिका में हुआ, जब वैज्ञानिक विन्सेंट शेफर ने सिल्वर आयोडाइड और ड्राई आइस के प्रयोग से हिमपात करवाने का दावा किया। इसके बाद से लगभग 50 से अधिक देशों ने इस तकनीक को आजमाया है। चीन इस क्षेत्र में सबसे बड़ा खिलाड़ी है। बीजिंग ओलंपिक (2008) के दौरान चीन ने बारिश को नियंत्रित करने के लिए क्लाउड सीडिंग तकनीक का व्यापक उपयोग किया था। अब चीन का लक्ष्य है कि वर्ष 2035 तक अपने देश में वर्षा की मात्रा को 5 से 10 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए। संयुक्त अरब अमीरात ने रेगिस्तानी मौसम के कारण वर्षा की कमी को दूर करने हेतु 2010 के दशक में बड़े पैमाने पर ड्रोन-आधारित सीडिंग प्रोग्राम शुरू किया। थाईलैंड में तो इसे “रॉयल रेनमेकिंग प्रोजेक्ट“ कहा गया, जो राजा भूमिबोल अदुल्यादेज के संरक्षण में चला। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और मेक्सिको जैसे देशों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में इसका उपयोग किया है। इन प्रयासों से यह साबित होता है कि कृत्रिम वर्षा सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रही, यह अब जल-संकटग्रस्त देशों की जलनीति का हिस्सा बन चुकी है।

भारत में कृत्रिम वर्षा, प्रयोग और अनुभव
भारत में भी इस दिशा में कई प्रयोग हुए हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम की अनिश्चितता, सूखे और जल संकट को देखते हुए राज्य सरकारों ने समय-समय पर क्लाउड सीडिंग कार्यक्रम चलाए। तमिलनाडु ने सबसे पहले 1983-84 में कृत्रिम वर्षा का प्रयोग किया। बाद में 1993-94 में फिर से प्रयास किया गया। कर्नाटक ने 2003 में बड़े पैमाने पर यह कार्यक्रम चलाया, जिसे “वर्षा योजना” कहा गया। इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र को राहत देना था। महाराष्ट्र में 2015 के आसपास “वार्म क्लाउड मॉडिफिकेशन एक्सपेरिमेंट” किया गया, जो 11 वर्षों तक चला। वैज्ञानिकों ने पाया कि वर्षा की मात्रा में लगभग 18 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई। दिल्ली में हाल ही में (2025) क्लाउड सीडिंग की तैयारी की जा रही है, ताकि वायु प्रदूषण कम किया जा सके और वायुमंडल की नमी बढ़े। हालाँकि, भारत में इस तकनीक का कोई स्थायी या केंद्रीकृत कार्यक्रम नहीं है। विभिन्न राज्यों ने इसे अस्थायी उपाय के रूप में अपनाया है, लेकिन इसका राष्ट्रीय स्तर पर मूल्यांकन अभी नहीं हुआ।
यह तकनीक कैसे काम करती है-क्लाउड सीडिंग के लिए विशेष विमान या रॉकेट का उपयोग किया जाता है। इनसे रासायनिक पदार्थ बादलों में छोड़े जाते हैं, जिससे जलकण संघनित होकर बारिश की बूंदों में बदलते हैं।

इस प्रक्रिया के तीन प्रमुख तरीके हैं-
1.स्टैटिक सीडिंग-बादलों में सिल्वर आयोडाइड डालकर संघनन प्रक्रिया तेज करना।
2.डायनामिक सीडिंग-वायु धाराओं की गति को प्रभावित कर बारिश को बढ़ाना।
3.हाइड्रोस्कोपिक सीडिंग-सोडियम क्लोराइड (नमक) से बादलों के जलकणों को बड़ा करना।

संभावित फायदे
क्लाउड सीडिंग के कई वैज्ञानिक और सामाजिक लाभ हो सकते हैं-
1.वर्षा बढ़ाना, सूखे या शुष्क क्षेत्रों में जलस्रोतों को पुनः भरने में मदद।
2.कृषि लाभ, बारिश पर निर्भर फसलों को आवश्यक पानी उपलब्ध हो सकता है।
3.भूजल स्तर में सुधार, कृत्रिम वर्षा से तालाब, झीलें और बांध पुनः भर सकते हैं।
4.धूल और प्रदूषण नियंत्रण, बारिश से हवा में मौजूद प्रदूषक तत्व धुल सकते हैं (जैसे दिल्ली में योजना)।
5.बिजली उत्पादन, जलाशयों में पानी बढ़ने से हाइड्रो पावर प्लांट की कार्यक्षमता बढ़ सकती है।

नुकसान और सीमाएँ
हालाँकि इसके लाभ अनेक हैं, पर इसके जोखिम और सीमाएँ भी कम नहीं-
1.वैज्ञानिक अनिश्चितता, विशेषज्ञ मानते हैं कि कृत्रिम वर्षा की सफलता दर लगभग 60-70 प्रतिशत है, और कई बार यह काम नहीं करती क्योंकि उपयुक्त बादल न हों तो रासायनिक छिड़काव बेअसर रहता है।
2.उच्च लागत, एक-एक अभियान में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं।
3.पर्यावरणीय खतरे, सिल्वर आयोडाइड जैसे रसायनों का दीर्घकालिक प्रभाव मिट्टी और जल पर अभी स्पष्ट नहीं है।
4.न्यायसंगतता का प्रश्न, अगर एक क्षेत्र में वर्षा बढ़ाई जाती है, तो दूसरे क्षेत्र के बादल “चुराए” जा सकते हैं, जिससे असंतुलन पैदा होता है।
5.सीमित प्रभाव क्षेत्र, यह तकनीक केवल मौजूदा बादलों पर ही काम करती है; नए बादल नहीं बना सकती।
भारत में सफलता बनाम असफलता-अब तक भारत में हुई सभी क्लाउड सीडिंग परियोजनाओं के बारे में कोई केन्द्रीय डेटाबेस उपलब्ध नहीं है। हालाँकि विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, कुछ प्रयोग आंशिक रूप से सफल रहे हैं, जबकि कुछ में वर्षा अपेक्षा से बहुत कम हुई। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के प्रयोग में वर्षा में औसतन 15-18 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। लेकिन कर्नाटक के कुछ अभियानों में अपेक्षित बारिश नहीं हुई और वैज्ञानिकों ने इसे “मौसमी परिस्थितियों पर निर्भर” बताया। कुल मिलाकर, भारत में अब तक दर्जनों प्रयोग किए जा चुके हैं, लेकिन “असफलता की सटीक संख्या” सार्वजनिक रूप से दर्ज नहीं है।
भविष्य की दिशा-भारत में बढ़ते जल संकट और अनिश्चित मानसून को देखते हुए, कृत्रिम वर्षा भविष्य में एक सहायक तकनीक साबित हो सकती है। हालाँकि, इसके लिए सरकार को चाहिए कि इस पर राष्ट्रीय नीति तैयार करे, वैज्ञानिक संस्थानों को संयुक्त रूप से अनुसंधान करने दे, पर्यावरणीय सुरक्षा के मानक तय करे और इसके सामाजिक-आर्थिक लाभ-हानि का पारदर्शी मूल्यांकन करे। कृत्रिम वर्षा एक ऐसी तकनीक है जिसमें विज्ञान, पर्यावरण और उम्मीद  तीनों का संगम है। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि संभावनाओं की प्रयोगशाला है। अगर इसका सही, पारदर्शी और पर्यावरण-सुरक्षित उपयोग किया जाए, तो यह सूखे, जल-संकट और प्रदूषण जैसी आधुनिक समस्याओं का एक महत्वपूर्ण समाधान बन सकती है। परंतु इसे अपनाने से पहले हमें यह समझना होगा कि आसमान को मनाने से पहले, धरती को समझना भी उतना ही ज़रूरी है। भारत में कृत्रिम वर्षा के प्रयोग अभी शुरुआती दौर में हैं। इसके लिए दीर्घकालिक योजना, वैज्ञानिक निवेश और पर्यावरणीय दृष्टि से सावधानी आवश्यक है। तभी यह तकनीक हमारे सूखते जल-संसाधनों को फिर से जीवन दे सकेगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

दिल्ली-एनसीआर बढ़ता प्रदूषण, व्यवस्था लाचार

 विशेष लेख-

भारत की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर क्षेत्र (गाज़ियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम आदि) पिछले एक दशक से लगातार प्रदूषण के चंगुल में फंसे हुए हैं। सर्दियाँ आते ही हवा जहरीली हो जाती है, साँस लेना कठिन और दृश्यता धुँधली हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दिल्ली विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में शीर्ष स्थान पर बनी हुई है। यह सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों का संकट बन चुका है।

पिछले 10 वर्षों का प्रदूषण परिदृश्य (वर्षवार आँकड़े)
वर्ष पीएम10 माइकोग्राम) पीएम 2.5 (माइकोग्राम) स्थिति

2015      295            133          अत्यंत गंभीर
2016      303            137 विश्व के सबसे खराब शहरों में
2017      277            130 कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं
2018      277            128      स्थिर प्रदूषण स्तर
2019      230            112 कुछ सुधार, पर सीमा से ऊपर
2020      187            101 लॉकडाउन का सकारात्मक प्रभाव
2021      221            113             फिर वृद्धि
2022      223            103      औसत स्तर समान
2023      219            106 डब्ल्यूएचओ मानक से 20 गुना अधिक
2024 (प्रारंभिक) 210             98 मामूली गिरावट, पर असुरक्षित स्तर
(स्रोतः डीपीसीसी 2023-24)
डब्ल्यूएचओ मानक के अनुसार पीएम 2.5 की अधिकतम स्वीकृत सीमा 5 माइकोग्राम है, जबकि भारतीय मानक 40 माइकोग्राम है। इस दृष्टि से दिल्ली की हवा 2023 में भी 20 गुना ज्यादा जहरीली थी।

प्रदूषण के मुख्य कारण
वाहन प्रदूषण (40 प्रतिशत)-दिल्ली की सड़कों पर प्रतिदिन लगभग 1.3 करोड़ वाहन चलते हैं। डीज़ल वाहन और ट्रैफिक जाम से निकलने वाला धुआँ सबसे बड़ा कारक है।
निर्माण और सड़क धूल (20 प्रतिशत)-निर्माण कार्यों, सड़कों की धूल और खुले में खुदाई से बड़ी मात्रा में पीएम 10 कण उड़ते हैं।
कृषि अवशेष (पराली) जलाना (15 प्रतिशत)-हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने से सर्दियों में दिल्ली की हवा में ज़हरीले तत्व 30-40 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं।
औद्योगिक उत्सर्जन (10 प्रतिशत)-एनसीआर में फैक्ट्रियाँ और थर्मल पावर स्टेशन गंधक ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड छोड़ते हैं।
घरेलू प्रदूषण और कूड़ा जलाना (10 प्रतिशत)-खुले में कचरा जलाना और ठोस ईंधन के प्रयोग से भी हवा दूषित होती है।

स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
फेफड़ों की बीमारियाँ-अस्थमा, सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़) और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियाँ तेजी से बढ़ी हैं।
हृदय रोग और स्ट्रोक-लगातार प्रदूषित हवा में रहने से हृदयाघात और स्ट्रोक का खतरा 30 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
कैंसर-डब्ल्यूएचओ ने बताया है कि पीएम 2.5 के लंबे समय तक संपर्क से फेफड़ों के कैंसर की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर प्रभाव-दिल्ली में जन्म लेने वाले बच्चे अपने फेफड़ों की क्षमता का औसतन 10 प्रतिशत हिस्सा खो देते हैं। गर्भस्थ शिशुओं में जन्म से पहले मृत्यु और कम वजन के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है।

मौतों का भयावह आँकड़ा
2019 में लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 17 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं। अकेले दिल्ली में हर वर्ष 10,000-12,000 लोगों की असामयिक मृत्यु का अनुमान है। स्टेट ऑफ ग्लोबल एअर रिपोर्ट 2023 के अनुसार, दिल्ली में वायु प्रदूषण से औसतन जीवन प्रत्याशा 11.9 वर्ष घट जाती है। 2021 में प्रकाशित आईआईटी दिल्ली अध्ययन के अनुसार, वायु प्रदूषण के कारण राजधानी के अस्पतालों में श्वसन रोगी 30 प्रतिशत बढ़े। बच्चों की मृत्यु दर में भी बढ़ोतरी हुई। 2022 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में पाँच वर्ष से कम उम्र के हर 1000 बच्चों में से 9 की मृत्यु प्रदूषणजन्य कारणों से हुई।

सरकारी प्रयास और योजनाएँ
(1) ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (जीआरएपी)
दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण के स्तर के अनुसार चार चरणों में कार्रवाई-
स्टेज वन (एक्यूआई 201-300)-सड़कों पर पानी का छिड़काव।
स्टेज टू (एक्यूआई 301-400)-निर्माण गतिविधियाँ सीमित।
स्टेज थ्री ((एक्यूआई 401-450)-स्कूल बंद, डीज़ल जेनरेटर प्रतिबंधित।
स्टेज फॉर ((एक्यूआई 450 से कम)-ट्रक एंट्री बंद, निर्माण पूर्ण प्रतिबंध।
(2) राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी)
2019 में शुरू हुआ। लक्ष्य 2017 के स्तर की तुलना में 2024 तक प्रदूषण में 30 प्रतिशत कमी लाना। लेकिन 2023 तक दिल्ली में पीएम 2.5 में औसत कमी मात्र 12 प्रतिशत रही।
(3) वाहन नीति और ईंधन सुधार
बीएस फोर ईंधन लागू किया गया। पुराने 15 साल से अधिक वाहनों पर प्रतिबंध। इलेक्ट्रिक वाहन नीति (ईवी पॉलिसी 2020) से अब तक 1 लाख से अधिक ई-वाहन पंजीकृत हुए।
(4) पराली प्रबंधन योजना
दिल्ली सरकार ने पूसकंपोस्ट बायो-डीकंपोजर का उपयोग किया, जिससे खेतों में पराली जलाने की आवश्यकता घटे। फिर भी हरियाणा-पंजाब में पराली जलाने के 60,000 से अधिक मामले 2024 में दर्ज हुए।
(5) कचरा प्रबंधन
कूड़ा जलाने पर सख्ती, तीन वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट सक्रिय किए गए हैं, लेकिन क्षमता अभी भी आधी ही उपयोग हो पा रही है.

आर्थिक और सामाजिक असर
2022 के एक वर्ल्ड बैंक अध्ययन के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से सालाना 2.6 अरब डॉलर (लगभग 21,000 करोड रुपये़) का आर्थिक नुकसान होता है। उत्पादकता में गिरावट और स्वास्थ्य खर्चों में वृद्धि इसके मुख्य कारण हैं। गरीब वर्ग सबसे अधिक प्रभावित है, जो खुले में रहते हैं और जिनके पास एयर प्यूरिफायर या बंद आवास की सुविधा नहीं है।

निवारण के उपाय
1.सार्वजनिक परिवहन का विस्तार और निजी वाहन उपयोग पर नियंत्रण।
2.निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और हरित पट्टी बढ़ाना।
3.पराली के लिए किसानों को वैकल्पिक मशीनें व आर्थिक सहायता। 4.थर्मल पावर संयंत्रों में आधुनिक उत्सर्जन नियंत्रण तकनीक लागू करना।
5.नागरिक स्तर पर पर्यावरण शिक्षा, वृक्षारोपण और “ग्रीन डेज़” का पालन।
दिल्ली-एनसीआर की हवा हर वर्ष हजारों लोगों की जान ले रही है। पिछले दस वर्षों में सरकारों ने नीतियाँ बनाईं, योजनाएँ लागू कीं, लेकिन परिणाम सीमित रहे हैं। पीएम 2.5 का स्तर आज भी 100 माइकोग्राम के आसपास है, जो सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। वायु प्रदूषण सिर्फ पर्यावरणीय नहीं बल्कि मानवीय आपदा है। जब तक केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर ठोस, निरंतर और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कार्य नहीं करतीं, तब तक दिल्ली की साँसों में जहर बना रहेगा। नागरिकों को भी यह समझना होगा कि यह संकट हमारे अपने जीवन का प्रश्न है कृ तभी “दिल्ली की हवा” सच में सुधर सकेगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)



किन्नर समाज, अस्तित्व की स्वीकार्यता की लड़ाई

 विशेष लेख-

-पुरुष और स्त्री के बीच किन्नर समुदाय की सामाजिक स्थिति
-कानूनी अधिकार, संख्या और सरकारों के प्रयासों पर एक समग्र दृष्टि

मानव सभ्यता की लिंग-धारणा सदियों तक केवल “पुरुष” और “स्त्री” तक सीमित रही। लेकिन प्रकृति ने इन दो सीमाओं के बीच एक और सच्चाई रची किन्नर समाज। भारतीय संस्कृति में इन्हें कभी आशीर्वाद देने वाला तो कभी अपशकुन मानकर तिरस्कृत करने वाला व्यवहार मिला। आज यह समुदाय शिक्षा, रोजगार, सम्मान और समान अवसर की माँग को लेकर विश्वभर में संघर्षरत है।

भारत में किन्नर समुदाय का सामाजिक स्थान
भारतीय परंपरा में किन्नरों का उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। शिखंडी और अर्धनारीश्वर जैसे पात्र बताते हैं कि तीसरा लिंग सृष्टि का अभिन्न हिस्सा है। विवाह, जन्म या उत्सव में इनके आशीर्वाद को मंगलकारी माना जाता है, फिर भी सामाजिक जीवन में इन्हें हाशिए पर रखा गया।

कानूनी मान्यता : अधिकार की पहली जीत
भारत में किन्नर समुदाय को संवैधानिक मान्यता वर्ष 2014 में मिली,
जब सर्वोच्च न्यायालय ने नालसा बनाम भारत संघ प्रकरण में इन्हें तीसरा लिंग घोषित किया। न्यायालय ने कहा, “लिंग पहचान हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।” इसके बाद 2019 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम लागू हुआ, जिसने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आवास में भेदभाव को अपराध घोषित किया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट (2021) बताती है कि भारत में 92 प्रतिशत किन्नरों को स्थायी रोजगार नहीं मिलता और 50 प्रतिशत से अधिक अपने परिवारों से बेदखल हैं।

विश्व में स्थिति और संख्या
विश्व जनसंख्या समीक्षा (2024) के अनुसार, विश्व में लगभग 34 लाख 40 हज़ार (3.44 मिलियन) तृतीय लिंग व्यक्ति हैं।
देश                    अनुमानित संख्या        वर्ष
अमेरिका               10,00,000           2018
ब्राज़ील                 10,00,000           2018
फिलीपीन्स             3,17,000           2024
दक्षिण अफ्रीका        1,02,300           2024
कनाडा                   1,01,000           2021
भारत                       96,200           2022
पाकिस्तान               52,400            2016
नेपाल                      21,500            2016
बांग्लादेश                 12,600            2023
भारत में 2011 की जनगणना में 4.9 लाख लोग “ट्रांसजेंडर” के रूप में दर्ज हुए थे, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार वास्तविक संख्या कई गुना अधिक है।

आंदोलन और संघर्ष की कहानी
1969 के स्टोनवॉल आंदोलन (अमेरिका) ने विश्व में समानता की लड़ाई को स्वर दिया। दक्षिण एशिया में नेपाल ने 2007 में, पाकिस्तान ने 2009 में और भारत ने 2014 में तीसरे लिंग की कानूनी मान्यता दी। भारत में गौरव यात्राएँ, मिस ट्रांस क्वीन प्रतियोगिता और किन्नर परिषदों की स्थापना ने इस समुदाय को आत्मसम्मान और दृश्यता प्रदान की।

भारत सरकार के प्रयास
गरिमा गृह योजना (2020)-सामाजिक न्याय मंत्रालय की इस योजना के तहत बेघर या हिंसा पीड़ित किन्नरों को आवास, भोजन और कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है। अब तक 12 गरिमा गृह स्थापित हो चुके हैं।
राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर पोर्टल और हेल्पलाइन (2021)-इस पोर्टल के माध्यम से पहचान पत्र, प्रमाणपत्र और योजनाओं की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध है। हेल्पलाइन 14567 पर परामर्श और शिकायत सुविधा दी जा रही है।
शिक्षा और रोजगार योजनाएँ-यूजीसी ने तृतीय लिंग विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति और प्रवेश में आरक्षण का प्रावधान किया। कर्नाटक ने सरकारी सेवाओं में 1 प्रतिशत आरक्षण लागू किया। कौशल विकास मंत्रालय के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से अब तक 4000 से अधिक किन्नर लाभान्वित हुए हैं।
स्वास्थ्य सेवाएँ-तमिलनाडु और केरल में लिंग परिवर्तन सर्जरी निःशुल्क कराई जा रही है। दिल्ली, महाराष्ट्र और केरल में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श केंद्र कार्यरत हैं।

राज्य सरकारों की पहलें
-केरल : 2015 में भारत की पहली ट्रांसजेंडर नीति लागू।
-तमिलनाडु : पहचान पत्र, पेंशन और छात्रवृत्ति योजना प्रारंभ।
-दिल्ली : “गौरव योजना” के अंतर्गत मासिक पेंशन और बीमा सुविधा।
-महाराष्ट्र : “किन्नर कल्याण निधि” से ब्याज-मुक्त ऋण।
-मध्य प्रदेश : “किन्नर सम्मान योजना” के अंतर्गत राज्य सम्मान।

अंतरराष्ट्रीय प्रयास
-अर्जेंटीना : 2012 में लिंग पहचान कानून लागू; सरकारी नौकरियों में 1 प्रतिशत आरक्षण।
-नेपाल : पासपोर्ट में “अन्य” श्रेणी और नागरिकता अधिकार।
-बांग्लादेश : सामाजिक सुरक्षा भत्ता योजना।
-पाकिस्तान : ट्रांसजेंडर आयोग और शिक्षा-स्वास्थ्य योजनाएँ।
-ब्राज़ील व मेक्सिको : हिंसा-निरोधक निगरानी तंत्र की स्थापना।

चुनौतियाँ अब भी बरकरार
कानूनी मान्यता के बावजूद किन्नर समाज को समाज में बराबरी का दर्जा मिलना अभी दूर है। ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाएँ नहीं पहुँच पातीं, बहुत-से लोग सामाजिक तिरस्कार के भय से अपनी पहचान छिपा लेते हैं और स्वास्थ्य सेवाएँ सीमित हैं। समाधान के रूप में सरकारों को शिक्षा पाठ्यक्रम में लिंग संवेदनशीलता, निजी क्षेत्र में रोजगार अवसर और ग्राम स्तर पर पुनर्वास योजनाएँ सशक्त करनी होंगी।

समानता की ओर एक कदम और
किन्नर समाज की लड़ाई केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि अस्तित्व की स्वीकार्यता की है। भारत और विश्व के 70 से अधिक देशों में तीसरे लिंग को मान्यता मिल चुकी है, पर वास्तविक समानता तभी आएगी जब समाज उन्हें स्नेह, सम्मान और अवसर देगा। “हम सब समान हैं, चाहे हमारा लिंग कुछ भी हो।” यही संदेश आज हर सरकार और हर नागरिक के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)



बुधवार, 29 अक्टूबर 2025

दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसायटियों में बढ़ते विवाद

 कारण, उदाहरण, निवारण और सरकारी प्रयास


भा
रत की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर (नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद, गाजियाबाद) क्षेत्र आज देश के सबसे विकसित शहरी इलाकों में गिने जाते हैं। यहाँ लाखों लोग बहुमंज़िला हाउसिंग सोसायटियों में रहते हैं। ये सोसायटियाँ आधुनिक जीवनशैली का प्रतीक तो बन गई हैं, लेकिन इनके भीतर उठते विवाद अब एक गंभीर सामाजिक व प्रशासनिक समस्या का रूप ले चुके हैं। आमतौर पर इन सोसायटियों में “साझा जीवन, सुविधाएँ और सुरक्षा” का सपना देखा जाता है, लेकिन व्यवहार में आए दिन मेंटेनेंस फीस, पार्किंग, पानी-बिजली, समिति चुनाव, भ्रष्टाचार और सदस्य-असहमति जैसे विवाद सुर्खियाँ बनते रहते हैं।


विवादों के प्रमुख कारण
1.मेंटेनेंस और शुल्क विवाद-दिल्ली और गुरुग्राम की कई सोसायटियों में मेंटेनेंस चार्ज को लेकर विवाद आम हैं। उदाहरण के तौर पर नोएडा सेक्टर 137 की पाम ओलंपिया सोसायटी में निवासियों ने समिति के खिलाफ धरना दिया क्योंकि मेंटेनेंस चार्ज हर वर्ष बिना स्पष्ट लेखे बढ़ा दिया गया था। कई परिवारों का आरोप था कि उन्हें सुरक्षा और सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी पूरी नहीं मिल रहीं। इसी तरह, गुरुग्राम की निर्वाणा कंट्री सोसायटी में बिजली बैकअप और मेंटेनेंस चार्ज को लेकर निवासी और प्रबंधन में टकराव इतना बढ़ा कि मामला अदालत तक पहुँचा। गोविन्दपुरम गाजियाबाद की गौड़ होम्स सोसायटी में चुनाव, रखरखाव और गबन का मुद्दा गर्माया हुआ है। आरोप है कि प्रशासन द्वारा चुनाव कराने के बाद भी पूर्व पदाधिकारी अपने पद छोड़ने के बजाय कोर्ट कचहरी के चक्कर काट रहे हैं। इससे सोसायटी का आम जनमानस तो परेशान है ही नई कार्यकारिणी सदस्य भी आर्थिक अभाव में अपने कर्तव्यों को सही से अंजाम नहीं दे पा रहे।
2.प्रबंधन समितियों की पारदर्शिता की कमी-अक्सर सोसायटी के मैनेजिंग कमेटी पर भ्रष्टाचार, फर्जी बिलिंग और ठेकेदारों से सांठगांठ के आरोप लगते हैं। दिल्ली वसंत कुंज की ए-2 ब्लॉक कोऑपरेटिव सोसायटी में सदस्यों ने शिकायत की कि प्रबंधन समिति ने लाखों रुपये के पेंटिंग और लिफ्ट रिपेयर के बिल बिना जनरल बॉडी की मंजूरी के पास कर दिए। इन मामलों में चुनाव समय पर न होना, लेखा पुस्तकों का न दिखाया जाना और सदस्यों को वोट का अधिकार न मिलना, विवाद को जन्म देता है।
3.अवैध निर्माण और नियमों का उल्लंघन-एनसीआर की कई सोसायटियों में सदस्य अपने फ्लैटों में अवैध विस्तार, बालकनी बंद करना या टेरेस पर कमरे बनाना शुरू कर देते हैं, जिससे न केवल सौंदर्य बिगड़ता है बल्कि सुरक्षा पर भी असर पड़ता है। गाजियाबाद की इंदिरापुरम की एक सोसायटी में ऐसे ही एक मामले में लिफ्ट शाफ्ट में अवैध निर्माण से संरचना कमजोर हो गई थी और स्थानीय विकास प्राधिकरण को हस्तक्षेप करना पड़ा।
4.सदस्यों के आपसी विवाद और अनुशासनहीनता-कई बार विवाद समिति से नहीं, बल्कि निवासियों के आपसी टकराव से शुरू होते हैं। जैसे पार्किंग स्लॉट, पालतू जानवरों का व्यवहार, रात का शोर या सामुदायिक स्थानों के उपयोग पर असहमति। नोएडा सेक्टर 75 की एक सोसायटी में पालतू कुत्ते को लेकर दो परिवारों में झगड़ा इतना बढ़ा कि मामला पुलिस थाने तक पहुँचा। इस प्रकार के छोटे विवादों की बढ़ती घटनाएँ “साझा समुदाय” की भावना को कमजोर कर रही हैं।
5.भ्रष्टाचार और सरकारी निगरानी की कमी-दिल्ली की कई पुरानी हाउसिंग सोसायटियाँ जैसे द्वारका सेक्टर-6 और 11 की कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसायटियाँ में सदस्यों ने शिकायत की कि समिति और रजिस्ट्रार ऑफिस के बीच मिलीभगत से फर्जी ऑडिट रिपोर्टें बनाई गईं। कई बार शिकायतें वर्षों तक लंबित रहती हैं, जिससे निवासियों में सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ता है।

विवाद निवारण के उपाय
विवादों को रोकने और हल करने के लिए सोसायटी स्तर पर कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं-
1.स्पष्ट नियमावली और पारदर्शिता-हर सोसायटी को अपने बायलॉज को समय-समय पर अपडेट करना चाहिए। नियमों की प्रति हर सदस्य को दी जानी चाहिए। यदि शुल्क, पार्किंग, मेंटेनेंस के नियम पहले से लिखित रूप में हों तो विवाद की संभावना घट जाती है।
2.लेखा-जांच और जवाबदेही-समिति को सालाना ऑडिट कराना चाहिए और खर्च का लेखा सभी सदस्यों के लिए पारदर्शी बनाना चाहिए। दिल्ली में कई सोसायटियों ने अब “ऑनलाइन अकाउंटिंग सिस्टम” शुरू किया है ताकि कोई अनियमितता छिप न सके।
3.नियमित चुनाव और सामूहिक निर्णय-जनरल बॉडी मीटिंग्स (जीबीएम) नियमित अंतराल पर आयोजित होनी चाहिए। प्रत्येक बड़े निर्णय जैसे ठेके देना, शुल्क बढ़ाना या मेंटेनेंस कंपनी बदलना सदस्यों की आम सहमति से होना चाहिए।
4.मध्यस्थता और संवाद-छोटे विवादों को अदालत में ले जाने की बजाय सोसायटी के भीतर या किसी निष्पक्ष मध्यस्थ के जरिए सुलझाया जा सकता है। दिल्ली डिस्प्यूट रेजॉल्यूशन सोसाइटी इस तरह की मध्यस्थता को प्रोत्साहन देती है। यहाँ ट्रेंड मध्यस्थों के माध्यम से बिना खर्च विवाद सुलझाए जा सकते हैं।
5.सदस्यों की शिक्षा और जिम्मेदारी-सदस्यों को अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी बोध होना चाहिए। अक्सर किरायेदारों और नए निवासियों को नियमों की जानकारी नहीं होती, जिससे विवाद बढ़ते हैं। कुछ सोसायटियों ने अब “सोसायटी इंडक्शन मीटिंग” शुरू की है ताकि नए सदस्य सभी नियमों को समझ लें।

सरकारी प्रयास और विधिक प्रावधान
1.दिल्ली में कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों को संचालित करने के लिए यह दिल्ली कॉपरेटिव सोसायटीज एक्ट 2003 और रूल्स 2007 कानून लागू है। इसमें सोसायटी के गठन, चुनाव, वित्तीय अनुशासन और विवाद निवारण की विस्तृत प्रक्रिया दी गई है। इस अधिनियम के तहत रजिस्ट्रार ऑफ कॉपरेटिव सोसायटीज यानी आरसीएस सोसायटियों की निगरानी करता है।
2.दिल्ली सरकार ने आरसीएस की वेबसाइट पर ऑनलाइन शिकायत प्रणाली शुरू की है, जिससे सदस्य अपने विवाद दर्ज कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, 2024 में दिल्ली सरकार ने आरसीएस पॉर्टल लॉन्च किया, जिसमें सोसायटियों से जुड़ी फाइलें, ऑडिट रिपोर्ट और शिकायतें ऑनलाइन ट्रैक की जा सकती हैं।
3.दिल्ली डिस्प्युट रिसोलेशन सोसायटी यानी डीडीआरएस “विवाद सुलझाओ, अदालत मत जाओ” की भावना के तहत कार्य करती है। यहाँ हाउसिंग सोसायटी विवाद, पारिवारिक विवाद, मकान-मालिक और किरायेदार विवाद मध्यस्थता द्वारा हल किए जाते हैं। इस संस्था ने 2024 तक लगभग 35,000 से अधिक मामलों में सफल समाधान किया है।
4.नोएडा और ग्रेटर नोएडा में नॉएडा अथॉरिटी और जीएनआईडीए, जबकि गुरुग्राम में डिपार्टमेंट ऑफ टाउन एंड कंट्री प्लानिंग सोसायटियों के निर्माण और रखरखाव की निगरानी करते हैं। इन प्राधिकरणों ने “रेसिडेंट ग्रिवांस पोर्टल” शुरू किए हैं जहाँ निवासी शिकायतें दर्ज कर सकते हैं।
5.यदि सोसायटी विवाद आंतरिक रूप से नहीं सुलझता, तो दिल्ली कॉ-ऑॅपरेटिव ट्रिब्यूनल या कंज्यूमर कोर्ट में मामला ले जाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर 2023 में नोएडा की एमरल्ड कोर्ट सोसायटी के निवासियों ने बिल्डर के खिलाफ उपभोक्ता फोरम में केस जीता और मेंटेनेंस चार्ज में राहत पाई।

भविष्य की दिशा : सुधार की राह
हाउसिंग सोसायटियों को “साझा समाज” के रूप में विकसित करने के लिए प्रशासनिक सुधार और नागरिक सहयोग, दोनों आवश्यक हैं।
कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं-
ई-गर्वनेंस प्रणाली-सभी सोसायटियों में डिजिटल वोटिंग, ऑनलाइन ऑडिट और शिकायत ट्रैकिंग सिस्टम लागू किया जाए।
सोसायटी ओम्बड्समैन की नियुक्ति-हर जिले में एक स्वतंत्र अधिकारी नियुक्त किया जाए जो सोसायटी मामलों की त्वरित सुनवाई करे।
समिति प्रशिक्षण कार्यक्रम-प्रबंधन समिति के सदस्यों को प्रशिक्षण दिया जाए कि वे कानून, वित्त और संवाद-कौशल में दक्ष बनें।
निवासी भागीदारी को बढ़ावा-प्रत्येक निर्णय में पारदर्शी जनमत या ऑनलाइन सर्वे के माध्यम से सदस्य की भागीदारी सुनिश्चित हो।
राज्य स्तरीय निरीक्षण अभियान-समय-समय पर सरकार द्वारा सोसायटियों के ऑडिट और निरीक्षण किए जाएँ ताकि भ्रष्टाचार पर रोक लगे।
दिल्ली-एनसीआर की हाउसिंग सोसायटियाँ आधुनिक भारत की शहरी जीवनशैली का आईना हैं, जहाँ विविध समुदाय एक साथ रहते हैं। लेकिन जब पारदर्शिता, संवाद और ईमानदारी कमजोर पड़ जाती है, तो यही सहजीवन विवाद का केंद्र बन जाता है। जरूरत है कि सरकार, सोसायटी प्रबंधन और निवासी तीनों मिलकर साझा जिम्मेदारी निभाएँ। जहाँ नियमों का पालन, पारदर्शिता और संवाद की संस्कृति मजबूत होगी, वहीं ये सोसायटियाँ वास्तव में “नए भारत की शहरी सभ्यता” की मिसाल बन सकेंगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

दिल्ली-एनसीआर में महंगे स्वास्थ्य का फैलता जाल

 विशेष लेख-


(स्वास्थ्य के नाम पर बढ़ती व्यावसायिकता और आमजन की पीड़ा)
भारत की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर (नोएडा, गुरुग्राम, ग़ाज़ियाबाद, फरीदाबाद) देश के सबसे विकसित और आधुनिक क्षेत्रों में गिने जाते हैं। यहाँ की चमक-दमक, ऊँची इमारतें और आधुनिक अस्पताल देखने में तो विश्वस्तरीय लगते हैं, परंतु इस चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है, “महंगे स्वास्थ्य का फैलता जाल”, जो धीरे-धीरे आम नागरिक को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। स्वास्थ्य, जो संविधान के अनुसार हर नागरिक का मौलिक अधिकार होना चाहिए, अब एक “व्यापार” बनता जा रहा है। दिल्ली-एनसीआर में यह व्यापार इतना विशाल हो चुका है कि आज इलाज का खर्च मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक रीढ़ तोड़ रहा है।
बढ़ती लागत, घटती राहत-हाल ही में राष्ट्रीय स्वास्थ्य खाता (एनएचए) रिपोर्ट 2024 में बताया गया कि भारत में एक व्यक्ति का औसतन वार्षिक स्वास्थ्य व्यय पिछले दस वर्षों में तीन गुना बढ़ गया है। दिल्ली-एनसीआर में यह वृद्धि देश के औसत से भी कहीं अधिक है। यहाँ प्राइवेट अस्पतालों में इलाज का खर्च प्रति दिन 15,000 रुपये से 60,000 रुपये तक पहुँच चुका है, जबकि सरकारी अस्पतालों की क्षमता सीमित है। एक साधारण डेंगू या वायरल बुखार का निजी अस्पताल में इलाज 70,000 से एक लाख रुपये तक में होता है। हार्ट स्टेंट सर्जरी, जो कुछ वर्ष पहले 1.5 लाख में हो जाती थी, अब 3-5 लाख रुपये तक पहुँच गई है। आईसीयू का एक दिन का खर्च कई अस्पतालों में 25,000 रुपये से अधिक है।
स्वास्थ्य का कॉरपोरेटकरण-दिल्ली-एनसीआर में स्वास्थ्य सेवाएँ अब “कॉरपोरेट हेल्थ सेक्टर” के नियंत्रण में हैं। फोर्टिस, अपोलो, मणिपाल, मैक्स, मेट्रो, यशोदा, पारस, ब्लडचेन जैसी श्रृंखलाएँ अब एक “हेल्थ इंडस्ट्री” बना चुकी हैं। आरोप है कि इनकी कार्यप्रणाली में सेवा भावना से अधिक व्यवसायिक रणनीति देखने को मिलती है। रोगी अब “पेशेंट” नहीं बल्कि “कस्टमर” कहलाने लगा है। अस्पतालों में “ट्रीटमेंट पैकेज” और “रूम अपग्रेड” योजनाएँ ऐसे प्रस्तुत की जाती हैं जैसे यह कोई पर्यटन सेवा हो। 2025 के एक सर्वे के अनुसार, एनसीआर के 10 प्रमुख निजी अस्पतालों में 78 प्रतिशत मरीजों को “अनावश्यक जांच” या “अतिरिक्त दवाओं” की सिफारिश की गई थी। इसका उद्देश्य अक्सर बिलिंग बढ़ाना होता है, न कि रोगी के उपचार में वास्तविक सुधार।

मध्यम वर्ग पर आर्थिक बोझ-मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए अब स्वास्थ्य संकट आर्थिक आपदा बन गया है। इंश्योरेंस होने के बावजूद अस्पतालों के “कैशलेस क्लेम” जटिल प्रक्रिया में फँस जाते हैं और मरीज के परिवार को तत्काल भुगतान करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली के ग़ाज़ियाबाद निवासी अमित तिवारी के पिता की एक सामान्य हृदय सर्जरी का बिल 4.8 लाख रुपये आया, जिसमें से बीमा कंपनी ने मात्र 2.3 लाख रुपये का भुगतान किया। शेष 2.5 लाख नकद देने पड़े। यह एक सामान्य परिवार के लिए विनाशकारी बोझ है। ऐसे कई उदाहरण बताते हैं कि बीमा और अस्पताल के बीच के जाल में आम आदमी सबसे कमजोर कड़ी बन गया है।
सरकारी अस्पतालों की सीमाएँ-दिल्ली में एम्स, सफदरजंग, आरएमएल जैसे बड़े सरकारी संस्थान हैं, परंतु इनकी क्षमता कुल मरीजों की माँग के मुकाबले बहुत सीमित है। एम्स में एक गंभीर मरीज को बिस्तर मिलने में औसतन 7 से 10 दिन लग जाते हैं। सरकारी अस्पतालों की भीड़ और संसाधनों की कमी के कारण आम जनता को मजबूर होकर निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। एनसीआर के ज़िला अस्पतालों (जैसे ग़ाज़ियाबाद, फरीदाबाद, गुरुग्राम) की रिपोर्ट बताती है कि 70 प्रतिशत तक सुविधाएँ या तो पुरानी हैं या कम स्टाफ के कारण उपयोग में नहीं हैं।
दवाइयों और जांचों का मुनाफ़ा खेल-महंगे इलाज का एक बड़ा हिस्सा डायग्नोस्टिक टेस्ट और फार्मेसी बिल से आता है। एनसीआर के कई अस्पतालों में 30-40 प्रतिशत तक कमीशन की व्यवस्था जांच केंद्रों और दवा कंपनियों के बीच होती है। डॉक्टरों को “टारगेट” पूरा करने के लिए कहा जाता है। यानी हर माह इतनी जांचें या दवाइयाँ लिखनी ही होंगी। इससे स्वास्थ्य सेवा “उपचार” से अधिक “व्यवसाय मॉडल” में बदल रही है।

कानूनी व नियामक ढिलाई-भारत में निजी अस्पतालों पर नियंत्रण के लिए क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 2010 है, परंतु दिल्ली और कई एनसीआर राज्यों में इसका पालन आधा-अधूरा है। राज्य स्वास्थ्य नियामक प्राधिकरणों के पास पर्याप्त निरीक्षण क्षमता नहीं है, और अस्पतालों की लॉबी इतनी शक्तिशाली है कि शिकायतें अक्सर लंबित रह जाती हैं। महंगे इलाज के मामलों में अदालतें भी कई बार हस्तक्षेप करती हैं। जैसे मणिपाल हॉस्पिटल और फोर्टिस गुरुग्राम पर अधिक बिलिंग के मामले सामने आए, परंतु दंडात्मक कार्रवाई दुर्लभ है।

क्या है समाधान
स्वास्थ्य नीति में संतुलन-सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्वास्थ्य सेवाएँ “सेवा” और “व्यापार” के बीच संतुलन बनाए रखें।
बीमा प्रणाली का पारदर्शी ढाँचा-हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों और अस्पतालों के बीच पारदर्शी दरें तय की जाएँ। बीमा क्लेम में मरीज को कभी नुकसान न हो।
नियामक सख्ती-क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट को पूरे एनसीआर में पूर्ण रूप से लागू किया जाए। बिलिंग, जांच और दवा मूल्य निर्धारण पर नियमित निरीक्षण हो।
सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण-एम्स जैसे मॉडल को जिला स्तर तक विस्तार दिया जाए। डॉक्टरों की संख्या, बिस्तरों और सुविधाओं में भारी वृद्धि आवश्यक है।
जनजागरूकता और डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म-नागरिकों को अपने अधिकारों और मान्य शुल्क संरचना की जानकारी हो। “राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल” पर हर अस्पताल की फीस और शिकायत व्यवस्था सार्वजनिक की जाए।
दिल्ली-एनसीआर का स्वास्थ्य परिदृश्य दो चेहरों वाला है। एक तरफ अत्याधुनिक सुविधाएँ, विश्वस्तरीय अस्पताल और उन्नत तकनीक है; दूसरी तरफ, इन सुविधाओं तक पहुँचने की कीमत इतनी अधिक है कि आम नागरिक बीमार होने से भी डरने लगा है। यदि सरकार, चिकित्सा संस्थान और समाज मिलकर स्वास्थ्य को “मानव अधिकार” की तरह देखें, न कि “मुनाफ़े के साधन” की तरह, तो दिल्ली-एनसीआर न केवल देश बल्कि पूरे एशिया में “स्वास्थ्य राजधानी” बन सकता है। “इलाज का उद्देश्य जीवन बचाना होना चाहिए, न कि बिल बढ़ाना।”

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

जीएसटी की दरें घटीं, फिर भी राहत क्यों नहीं

 लेख-


दीवाली का पर्व भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा अवसर होता है। यह केवल दीपों का त्योहार नहीं, बल्कि खपत और बाजार की रौनक का प्रतीक भी है। हर साल इस मौसम में करोड़ों रुपये की खरीदारी होती है, दुकानों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर ऑफर की बाढ़ आ जाती है। फिर भी उपभोक्ता के मन में एक सवाल लगातार बना हुआ है-“सरकार ने तो कई वस्तुओं पर जीएसटी घटाया है, फिर भी बाजार में चीजें सस्ती क्यों नहीं हुईं?” इस सवाल का जवाब भारत की टैक्स प्रणाली, सप्लाई चेन और मूल्य निर्धारण की वास्तविकता में छिपा है।
1.दीवाली का अर्थशास्त्र, खपत का मौसम-भारत की जीडीपी में निजी उपभोग व्यय का हिस्सा लगभग 60 प्रतिशत है। त्योहारी सीजन, विशेषकर दीवाली, इस खपत को चरम पर ले जाता है। 2024 में भारतीय उपभोक्ताओं ने दीवाली के अवसर पर लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपये की खरीदारी की थी, जो पिछले वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक थी। फिर भी उपभोक्ता को राहत का एहसास नहीं हुआ, क्योंकि अधिकांश वस्तुओं की कीमतों में अपेक्षित गिरावट नहीं दिखी।
2.सरकार ने दरें घटाईं, लेकिन असर सीमित-जब जुलाई 2017 में वस्तु एवं सेवा कर लागू हुआ था, तब इसका उद्देश्य था-“एक राष्ट्र, एक टैक्स, एक बाजार।” समय के साथ सरकार ने कई वस्तुओं पर टैक्स घटाया-
वस्तु पहले की दर      अब की दर
मोबाइल फोन 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
इलेक्ट्रिक वाहन 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
एलईडी बल्ब 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
सोलर उपकरण 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
वस्त्र (1000 रुपये तक) 12 प्रतिशत 5 प्रतिशत
किताबें, खाद्यान्न 5 प्रतिशत या 0 प्रतिशत 0 प्रतिशत
वित्त मंत्रालय के अनुसार, 2025 में औसत मासिक जीएसटी संग्रह  1.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है, जो दर्शाता है कि टैक्स प्रणाली स्थिर और सफल है। लेकिन कीमतों में राहत उतनी स्पष्ट नहीं है जितनी उम्मीद की गई थी।
3.सप्लाई चेन की लागत ने खाया लाभ-जीएसटी घटने के बावजूद उपभोक्ता को राहत क्यों नहीं मिली, इसका बड़ा कारण है-सप्लाई चेन की बढ़ी हुई लागत। पिछले कुछ वर्षों में  ईंधन की कीमतें लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ीं। परिवहन लागत 25-30 प्रतिशत तक बढ़ी। मजदूरी और किराया औसतन 20 प्रतिशत बढ़ा। पैकेजिंग और विज्ञापन खर्च में 15 प्रतिशत वृद्धि हुई। इन सबके कारण उत्पाद की आधार कीमत इतनी बढ़ गई कि जीएसटी घटने का प्रभाव नगण्य रह गया।
4.व्यापारी “लाभ पास ऑन” नहीं करते-सरकार ने एंटी प्रॉफिटिंग कानून बनाया ताकि टैक्स में कमी का लाभ उपभोक्ता तक पहुँचे। लेकिन व्यवहार में, व्यापारी और निर्माता इस लाभ को अपने मार्जिन में जोड़ लेते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी रेफ्रिजरेटर की कीमत 30,000 रुपये थी और जीएसटी 18 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत किया गया, तो कीमत लगभग 1,500 रुपये कम होनी चाहिए थी। परंतु व्यापारी या ब्रांड ने अपनी लागत या मार्जिन बढ़ाकर अंतिम कीमत 29,800 रुपये ही रखी, यानी उपभोक्ता को केवल 200 रुपये की राहत। इस तरह का व्यवहार पूरे बाजार में आम है, जिससे सरकार का लाभ जनता तक नहीं पहुँच पाता।
5.जटिलता और इनपुट टैक्स क्रेडिट का जाल-जीएसटी प्रणाली में “इनपुट टैक्स क्रेडिट” की सुविधा है, यानी निर्माता या व्यापारी, जो टैक्स उसने कच्चे माल पर दिया, वह अपने आउटपुट टैक्स से घटा सकता है। लेकिन यह प्रक्रिया अत्यंत तकनीकी और जटिल है। कई छोटे व्यापारी आईटीसी क्लेम करने में सक्षम नहीं हैं, जिससे उनकी कुल लागत बढ़ जाती है, और वे उपभोक्ता से अधिक वसूलने को मजबूर हो जाते हैं।
6.महँगाई का दबाव-जीएसटी की दरें घटीं जरूर हैं, लेकिन महँगाई दर लगातार 5 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। अर्थात हर साल सामान्य कीमतों में बढ़ोतरी होती ही है। 2023 में औसत महँगाई दर 5.7 प्रतिशत, 2024 में 5.3 प्रतिशत और 2025 में अनुमानित 5.2 प्रतिशत रही। इस महँगाई का असर यह है कि टैक्स में कमी की राहत मूल्य वृद्धि के दबाव में गुम हो जाती है।
7.छोटे बनाम बड़े व्यापारी-जीएसटी का सबसे बड़ा प्रभाव छोटे व्यापारियों पर पड़ा है। बड़ी कंपनियाँ ऑटोमेटेड सिस्टम, सॉफ्टवेयर और अकाउंटिंग टीम के जरिए टैक्स मैनेज कर लेती हैं। लेकिन छोटे दुकानदारों को हर महीने रिटर्न, बिलिंग और इनवॉइस की झंझट में समय और पैसा दोनों खर्च करना पड़ता है। इन अतिरिक्त खर्चों को वे कीमत में जोड़ देते हैं। इससे छोटे बाजारों में सामान महँगा और ऑनलाइन पोर्टल पर अपेक्षाकृत सस्ता दिखता है।
8.उपभोक्ता के अनुभव की सच्चाई-गाज़ियाबाद की गृहिणी रीना गुप्ता बताती हैं “सरकार कहती है टैक्स घटा है, लेकिन बाजार में सब चीज़ें महँगी ही लगती हैं। मिठाई, कपड़े, सजावट किसी पर भी वास्तविक राहत महसूस नहीं होती।” दिल्ली के इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापारी अमित खुराना कहते हैं “हमारी मार्जिन 7-8 प्रतिशत रह गई है। अगर हम ग्राहक को छूट दें तो टैक्स का बोझ हमारे सिर पर आता है। इसलिए जीएसटी घटने के बावजूद हम कीमत कम नहीं कर पाते।”
9.विशेषज्ञों की राय-आर्थिक विश्लेषक डॉ. अरुण कुमार कहते हैं “जीएसटी का मूल उद्देश्य सरलता था, पर आज यह पाँच दरों वाली जटिल प्रणाली बन गई है। जब तक टैक्स दरें एक समान और प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होंगी, राहत अधूरी रहेगी।” वित्त विशेषज्ञ मीरा रस्तोगी का कहना है “जीएसटी दरों में कमी दीर्घकालिक लाभ देती है, राजस्व स्थिरता, कर चोरी में कमी, लेकिन तत्काल उपभोक्ता राहत महँगाई और व्यापारी व्यवहार के कारण नहीं पहुँचती।”
आगे का रास्ता : सुधार और उम्मीद
सरकार अब जीएसटी 2.0 की दिशा में सोच रही है, जहाँ 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत के तीन स्लैब को मिलाकर एक समान दर बनाने की चर्चा है। यदि ऐसा हुआ, तो कर संरचना और सरल हो सकती है, और उपभोक्ता को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। साथ ही डिजिटल रिटर्न प्रक्रिया और ई-इनवॉइसिंग प्रणाली को सरल बनाना भी जरूरी है, ताकि छोटे व्यापारियों पर अनुपालन का बोझ घटे।
टैक्स घटा, लेकिन राहत अधूरी
जीएसटी ने भारत की टैक्स प्रणाली को एकीकृत और पारदर्शी बनाया है। सरकार ने कई वस्तुओं पर दरें घटाईं, ताकि उपभोक्ता को राहत मिले। लेकिन बढ़ती लागत, महँगाई, और बाजार की व्यवहारिक कठिनाइयों के कारण वह राहत जमीन तक पहुँच नहीं पा रही। दीवाली जैसे पर्वों पर जब उपभोक्ता अपनी मेहनत की कमाई से खरीदारी करने निकलता है तो उसे सबसे पहले मूल्य की पारदर्शिता चाहिए, न कि केवल विज्ञापन में लिखी जीएसटी ऑफ की पंक्ति। जब टैक्स प्रणाली सचमुच सरल, समान और उपभोक्ता-केंद्रित बनेगी, तभी कहा जा सकेगा कि जीएसटी की दरें घटीं और राहत सचमुच आम जनता तक पहुँची। जीएसटी भारत के आर्थिक सुधार का बड़ा कदम है, लेकिन इसे “जन-हित” का रूप देने के लिए अब अगला चरण जरूरी है, जहाँ सरकार, व्यापारी और उपभोक्ता तीनों की साझेदारी से वास्तविक आर्थिक राहत आम लोगों तक पहुँचे।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

भारतीय त्योहारों का समाजशास्त्र : एक सांस्कृतिक प्रतिबिंब

 लेख-

भारत विविधताओं का देश है। यहाँ भाषाएँ बदलती हैं, पहनावे बदलते हैं, भोजन की शैली बदलती है, परंतु जो चीज़ हर दिशा में समान है, वह है त्योहारों की सामाजिक चेतना। भारतीय समाज में त्योहार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक एकता, सांस्कृतिक निरंतरता और सामूहिक सहभागिता के सबसे बड़े प्रतीक हैं। समाजशास्त्र की दृष्टि से त्योहार भारतीय जीवन के “सामाजिक संरचना” का अभिन्न अंग हैं।

1. त्योहार : समाज का जीवंत ताना-बाना
समाजशास्त्र में एमिल दुर्खाइम ने कहा था कि “समाज स्वयं को त्योहारों के माध्यम से पुनः अनुभव करता है।” भारतीय त्योहार भी यही करते हैं। वे समाज को एकजुटता, सांस्कृतिक पहचान और नैतिक चेतना का अनुभव कराते हैं। दीवाली केवल दीप जलाने का पर्व नहीं, बल्कि यह अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और लोभ पर संयम की सामाजिक शिक्षा देता है। होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि यह वर्ग, जाति और स्थिति के भेदों को भुलाकर समानता की सामाजिक भावना का विस्तार करती है।

2. सामाजिक एकता और सहभागिता
भारत के गाँवों और कस्बों में त्योहारों का स्वरूप सामूहिक होता है।
नवरात्रि में पूरा समुदाय एक साथ गरबा नृत्य करता है, दशहरे पर रामलीला समिति बनती है, ईद पर सेवई बाँटी जाती है, क्रिसमस पर समाज के सभी लोग चर्च में सजावट में हाथ बँटाते हैं। इन त्योहारों में न कोई अमीर होता है, न गरीब, सभी “साझा संस्कृति” के हिस्सेदार बनते हैं। समाजशास्त्रीय रूप से यह “सामाजिक एकजुटता” और “सामूहिक चेतना” का उत्कृष्ट उदाहरण है।

3. आर्थिक और वर्गीय दृष्टि
त्योहारों का एक गहरा आर्थिक समाजशास्त्र भी है। त्योहारों के समय व्यापार बढ़ता है, स्थानीय कलाकारों और कारीगरों को काम मिलता है। दीपावली पर दीये बनाने वाले, रक्षाबंधन पर राखी तैयार करने वाले, दुर्गापूजा में मूर्तिकार, होली में रंग बनाने वाले, सभी के जीवन में त्योहार आर्थिक सशक्तिकरण का अवसर लाते हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह त्योहार स्थानीय अर्थव्यवस्था को गतिशील रखते हैं और वर्गों के बीच आर्थिक संतुलन बनाने में मदद करते हैं।

4. परंपरा, परिवर्तन और आधुनिकता
आज के शहरी समाज में त्योहारों का स्वरूप बदल रहा है। पहले घर-घर पर सांझे दीये जलते थे, अब इलेक्ट्रिक लाइटें लगी हैं। पहले त्योहारों में भावनात्मक श्रम अधिक था, अब सुविधा और उपभोगवाद अधिक दिखता है। समाजशास्त्र की भाषा में कहा जाए तो “त्योहार अब ‘सामाजिक क्रिया’ से ‘सांस्कृतिक उपभोग’ में बदल रहे हैं।” फिर भी, यह परिवर्तन समाज की गतिशीलता को दर्शाता है। परंपरा का अर्थ स्थिरता नहीं, बल्कि निरंतर रूपांतरण है। आज भी लोग एक-दूसरे को दीपावली, होली या ईद की शुभकामनाएँ देते हैं, यह बताता है कि सामाजिक बंधन अभी जीवित हैं, भले ही उनके रूप आधुनिक हो गए हों।

5. सामाजिक नियंत्रण और नैतिक शिक्षा
त्योहार समाज में नैतिक अनुशासन बनाए रखने का माध्यम भी हैं।
हर त्योहार के पीछे एक संदेश छिपा है। दीपावली सिखाती है कि मेहनत और धर्म से अर्जित धन ही “लक्ष्मी” है। रक्षाबंधन में नारी की रक्षा और सम्मान का संस्कार है। होली बताती है कि अहंकार का अंत अवश्य होता है। ईद में साझा भोजन और समानता की शिक्षा है। क्रिसमस में प्रेम और सेवा भाव की भावना है। समाजशास्त्री मैक्स वेबर के अनुसार, ऐसे मूल्य समाज को “नैतिक दिशा” देते हैं और सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखते हैं।

6. जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय विविधता
भारतीय त्योहारों का एक अद्भुत समाजशास्त्रीय पहलू यह है कि वे बहुलता का उत्सव हैं। उत्तर में होली, दक्षिण में पोंगल, पूर्व में बिहू, पश्चिम में गणेशोत्सव, सब अलग-अलग हैं, परंतु सबमें एक समान सामाजिक तत्त्व है-“समूह में आनंद की अनुभूति।” यह विविधता भारतीय समाज को सांस्कृतिक सह-अस्तित्व का उदाहरण बनाती है। त्योहारों के अवसर पर अलग-अलग धर्मों और जातियों के लोग एक-दूसरे के यहाँ पहुँचते हैं, यह “सामाजिक समरसता की परंपरा को जीवित रखता है।

7. वैश्वीकरण और मीडिया का प्रभाव
आज के युग में त्योहारों का मीडिया समाजशास्त्र भी विकसित हुआ है। टेलीविज़न और सोशल मीडिया ने त्योहारों को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर पहुँचा दिया है। अब दीवाली केवल भारत की नहीं, बल्कि लंदन, दुबई, न्यूयॉर्क तक मनाई जाती है। हालाँकि इसके साथ ही त्योहारों में ब्रांड संस्कृति और विज्ञापन आधारित उपभोग भी बढ़ा है। यह समाजशास्त्रीय दृष्टि से एक संस्कृति का वाणिज्यिकरण है, जो परंपरा को प्रभावित करता है।

8. समाज का उत्सव धर्म
भारतीय समाजशास्त्र में त्योहारों को केवल धार्मिक अवसर नहीं माना जा सकता। वे सामाजिक ऊर्जा के पुनर्संचार का माध्यम हैं। हर त्योहार समाज को एक नई चेतना देता है, लोगों को जोड़ता है, सह-अस्तित्व सिखाता है और हमें यह याद दिलाता है कि “मनुष्य अकेला नहीं, बल्कि समुदाय का हिस्सा है।” त्योहारों का यह समाजशास्त्र भारत की पहचान है, जहाँ विविधता में एकता, साझा आनंद और मानवीय भावनाओं की गहराई ही असली संस्कृति है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


ई-कचरा उत्पादन में भारत दुनिया का तीसरा देश

 लेख-

तकनीकी युग में इंसान ने अपने जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अंधाधुंध उपयोग शुरू किया। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टीवी, रेफ्रिजरेटर, एसी से लेकर छोटे खिलौनों तक, हर वस्तु में अब सर्किट और माइक्रोचिप जुड़ गए हैं। लेकिन इन उपकरणों के अप्रचलित होते ही जो कचरा बचता है, वह “ई-वेस्ट” कहलाता है और यही आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र की “ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2024” रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनिया ने लगभग 62 मिलियन टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा उत्पन्न किया, जिसमें से केवल 22 प्रतिशत ही रीसायकल हुआ। यह मात्रा हर साल लगभग 5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।

दुनिया के शीर्ष 10 ई-वेस्ट उत्पादक देश
(2024 के अनुमान अनुसार)

1.चीन-10,129 किलो टन यानी 16 प्रतिशत दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार, जहां लाखों टन पुराने मोबाइल, टीवी और उपकरण फेंके जाते हैं।
2.संयुक्त राज्य अमेरिका-6,918 किलो टन यानी 15 प्रतिशत उपभोक्ता संस्कृति और अपग्रेड प्रवृत्ति के कारण भारी ई-वेस्ट।
3.भारत-3,230 किलो टन यानी 1 से 2 प्रतिशत अधिकतर कचरा अनौपचारिक रीसायक्लिंग सेक्टर में जाता है, जिससे स्वास्थ्य खतरे बढ़ते हैं।
4.जापान- 2,569 किलो टन 22 प्रतिशत उन्नत तकनीक से लैस, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक उपभोग बहुत अधिक।
5.ब्राज़ील- 2,143 किलो टन यानी 5 प्रतिशत लैटिन अमेरिका में सबसे बड़ा उत्पादक, रिसायकल ढांचा कमजोर।
6.रूस-1,631 किलो टन यानी प्रतिशत नीति सीमित, लेकिन उद्योग तेजी से बढ़ रहा।
7.इंडोनेशिया-1,618 किलो टन यानी 4 प्रतिशत सस्ते गैजेट्स के कारण ई-वेस्ट में बढ़ोतरी।
8.जर्मनी-1,607 किलो टन यानी 52 प्रतिशत यूरोप का अग्रणी देश, मजबूत औपचारिक रीसायक्लिंग सिस्टम।
9.यूनाइटेड किंगडम-1,598 किलो टन यानी 57 प्रतिशत प्रभावी कलेक्शन और नीति आधारित रिसायकल।
10.फ्रांस-1,362 किलो टन यानी 56 प्रतिशत उपभोक्ता जागरूकता और सशक्त रीसायक्लिंग नेटवर्क।

ई-वेस्ट की भयावहता
ई-वेस्ट में सीसा, पारा, कैडमियम, क्रोमियम और पॉलीविनाइल क्लोराइड जैसे जहरीले रसायन पाए जाते हैं, जो मिट्टी, पानी और वायु में मिलकर पर्यावरण को स्थायी नुकसान पहुंचाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अनौपचारिक ई-वेस्ट प्रोसेसिंग से हर वर्ष लाखों मजदूर, विशेषकर बच्चे, जहरीले धुएं और धातुओं के संपर्क में आते हैं। इससे कैंसर, त्वचा रोग, सांस की बीमारियां और तंत्रिका तंत्र की समस्याएं बढ़ रही हैं। भारत जैसे देशों में यह खतरा और बड़ा है क्योंकि यहाँ लगभग 95 प्रतिशत ई-वेस्ट अनौपचारिक क्षेत्र में रीसायकल किया जाता है, खुले में तार जलाकर तांबा निकालना, एसिड से धातु घोलना आदि प्रक्रियाएँ मानव जीवन और पर्यावरण दोनों के लिए घातक हैं।

निस्तारण और रीसायकल के मौजूदा तरीके
1.औपचारिक रीसायक्लिंग-इसमें पुराने उपकरणों को अधिकृत केंद्रों में जमा कर, धातु, प्लास्टिक और कांच को अलग-अलग किया जाता है। यह पर्यावरण-अनुकूल तरीका है, परंतु विश्व स्तर पर अभी केवल 22 प्रतिशत ई-वेस्ट ही इस प्रक्रिया से गुजरता है।
2.रीयूज़ और रिफर्बिशमेंट-कार्यशील उपकरणों को मरम्मत कर फिर से उपयोग में लाया जाता है। जापान और जर्मनी में यह नीति सफल है।
3.ऊर्जा पुनःप्राप्ति-कुछ ई-वेस्ट को जलाकर ऊर्जा बनाई जाती है, लेकिन यह प्रक्रिया कार्बन उत्सर्जन बढ़ा सकती है।
4.लैंडफिल या डंपिंग-विकसित देशों से अवैध रूप से ई-वेस्ट का निर्यात अफ्रीकी व एशियाई देशों में किया जाता है, जहाँ खुले में जलाने से मिट्टी और जल प्रदूषित होते हैं।

ई-वेस्ट संकट की जड़ें
तकनीकी अपग्रेड की तेज़ी-हर साल नए मॉडल आने से पुराने उपकरण ‘बेकार’ माने जाते हैं।
कम पुनर्चक्रण अवसंरचना-विकासशील देशों में पर्याप्त औपचारिक रीसायक्लिंग संयंत्रों की कमी।
कम उपभोक्ता जागरूकता-लोग जानते नहीं कि पुराना मोबाइल कहाँ जमा करें।
अवैध निर्यात और लूज रेगुलेशन-ई-वेस्ट का भारी हिस्सा एशिया और अफ्रीका में पहुँच जाता है।

सुधार और समाधान के सुझाव
1.नीति निर्माण-प्रत्येक देश को ई-टेन्डेड प्रॉड्यूसर रेस्पॉन्सिबिल्टी कानून को कड़ाई से लागू करना चाहिए ताकि निर्माता अपने उत्पादों के जीवन के अंत तक जिम्मेदार हों।
2.अवसंरचना-हर राज्य और जिले में ई-वेस्ट संग्रह केंद्र स्थापित किए जाएँ। स्वचालित व पर्यावरण-अनुकूल रीसायक्लिंग संयंत्रों की स्थापना आवश्यक है।
3.शिक्षा और जागरूकता-स्कूलों और कॉलेजों में ई-वेस्ट प्रबंधन पर कार्यक्रम चलाए जाएँ। “ई-वेस्ट डोनेशन ड्राइव” अभियान प्रभावी हो सकते हैं।
4.उद्योग जगत की भूमिका-कंपनियों को उत्पाद डिज़ाइन में “इको-डिज़ाइन” सिद्धांत अपनाने चाहिएं, ताकि उपकरण आसानी से डिसमेंटल होकर रीसायकल हो सकें।
5.नागरिक जिम्मेदारी-उपयोगकर्ता प्रमाणित रीसायक्लर को ही पुराने उपकरण दें, खुले में न फेंकें। सामाजिक स्तर पर पुनःप्रयोग संस्कृति को बढ़ावा दें।

भारत की स्थिति और संभावनाएँ
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ई-वेस्ट उत्पादक देश है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, देश में हर साल 3 मिलियन टन से अधिक ई-वेस्ट निकलता है। सरकार ने 2016 से ई-वेस्ट मैनेजमेंट नियम लागू किए हैं, लेकिन अभी भी लगभग 90-95 प्रतिशत कचरा अनौपचारिक सेक्टर में जाता है। यदि भारत अपने शहरी कचरे के प्रबंधन में तकनीकी नवाचार, औपचारिक संग्रह प्रणाली और प्रशिक्षण आधारित मॉडल लागू करे, तो वह ई-वेस्ट से आर्थिक लाभ भी कमा सकता है, क्योंकि इसमें सोना, चांदी, तांबा जैसी मूल्यवान धातुएँ होती हैं।

“सुविधा का मूल्य, जिम्मेदारी के साथ”
ई-वेस्ट संकट आधुनिक जीवन की कीमत है। हम डिजिटल दुनिया में जितनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, उतनी ही तेजी से धरती का पर्यावरण जहरीला होता जा रहा है। यदि सरकारें, उद्योग और आम नागरिक मिलकर ठोस कदम उठाएँ, औपचारिक रीसायक्लिंग, जागरूकता और जिम्मेदार उपभोग, तो हम इस खतरे को अवसर में बदल सकते हैं। ई-वेस्ट केवल कचरा नहीं, बल्कि संसाधन है, बशर्ते हम उसे सही दिशा दें।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

बिहार चुनाव 2025-

 


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स करवट बैठेगा ऊँट, किसका बदलेगा भाग्य 

बिहार की राजनीति सदैव परिवर्तनशील रही है। यहाँ के मतदाता जाति, वर्ग, विकास और नेतृत्व सभी को संतुलित दृष्टि से देखते हैं। वर्ष 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव भी कुछ ऐसा ही रोमांच लेकर आया है। सवाल वही पुराना है-“ऊँट किस करवट बैठेगा?” लेकिन इस बार उत्तर आसान नहीं है। स्थिति लगभग संतुलन पर है, दोनों प्रमुख गठबंधन एनडीए और महागठबंधन, एक-दूसरे को कांटे की टक्कर दे रहे हैं। वहीं, प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी तीसरे मोर्चे के रूप में कुछ नए समीकरण बनाने की कोशिश में है। चुनाव नज़दीक हैं, हवा में सवाल गूंज रहा है, किसका भाग्य बदलेगा, किसका सूर्यास्त होगा, और बिहार के मतदाता किस दिशा में झुकेंगे? आइये जानते हैं।

वर्तमान परिदृश्यः टक्कर बेहद कड़ी
बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में बहुमत के लिए 122 सीटों की आवश्यकता है। चुनाव दो चरणों में होने जा रहे हैं 6 और 11 नवंबर 2025 को। वर्तमान में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार है, जबकि तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला महागठबंधन सत्ता में वापसी का पूरा प्रयास कर रहा है। कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सर्वेक्षण यह संकेत दे रहे हैं कि दोनों गठबंधनों के बीच का अंतर मात्र 1.5 से 2 प्रतिशत तक सिमटा हुआ है। यानी, मुकाबला बेहद करीबी है और हर सीट निर्णायक हो सकती है। जनता के बीच यह भी सवाल है कि नीतीश कुमार की बार-बार की राजनीतिक करवटों के बावजूद क्या जनता फिर उन पर भरोसा करेगी, या इस बार तेजस्वी यादव जैसे युवा चेहरे को मौका देगी। दूसरी ओर, भाजपा की रणनीति यह है कि नीतीश के अनुभव और मोदी के करिश्मे को मिलाकर सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखी जाए।

ऊँट किस करवट बैठेगा?
चुनावी विश्लेषकों की राय में इस बार ऊँट का बैठना कई छोटे-छोटे समीकरणों पर निर्भर करेगा। यदि एनडीए अपने परंपरागत वोटबैंक कुर्मी, कुशवाहा, बनिया और उच्चवर्गीय मतदाताओं को एकजुट रख पाने में सफल रहा, तो उसे मामूली बढ़त मिल सकती है। वहीं, महागठबंधन यदि यादव, मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्गों के मतों को एकजुट करने में सफल रहता है, तो सत्ता परिवर्तन संभव है। इन दोनों के बीच जनसुराज जैसी नई ताकतें कुछ सीटों पर समीकरण बिगाड़ सकती हैं, विशेषकर उन इलाकों में जहाँ जनता पारंपरिक दलों से ऊबी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार में “वोट ट्रांसफर” और “जातिगत जुड़ाव” सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। यदि इनमें से किसी एक मोर्चे पर कोई दल कमजोर पड़ा, तो खेल बदल सकता है।

किसका बदलेगा भाग्य?
2025 का चुनाव कई नए चेहरों और युवा नेताओं के भाग्य बदलने वाला साबित हो सकता है। तेजस्वी यादव ने बेरोज़गारी और शिक्षा जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं से सीधा संवाद साधा है। उन्होंने यह दावा किया है कि सत्ता में आने पर वे “बेरोजगारीमुक्त बिहार” बनाएँगे। वहीं, एनडीए ने उनके वादों को “असंभव और छलावा” बताते हुए अपने एजेंडे में विकास, सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था और स्थिरता को प्रमुखता दी है। युवाओं, महिलाओं और प्रथम बार वोट देने वाले मतदाताओं की संख्या इस बार निर्णायक भूमिका निभाने जा रही है। जिन दलों ने इन वर्गों को सही दिशा में साधा, उनका भाग्य अवश्य बदलेगा।

किसका होगा सूर्यास्त?
हर चुनाव कुछ नेताओं के लिए नई सुबह लेकर आता है और कुछ के लिए राजनीतिक सूर्यास्त। इस चुनाव में भी कई ऐसे चेहरे हैं जिनकी साख दांव पर है। अगर महागठबंधन अपेक्षानुसार प्रदर्शन नहीं करता, तो तेजस्वी यादव की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठ सकते हैं। वहीं, अगर एनडीए बहुमत नहीं जुटा पाता, तो यह नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक सफर का अंत साबित हो सकता है। भाजपा के लिए भी यह चुनाव महत्वपूर्ण है, पार्टी को साबित करना है कि वह बिहार में स्वतंत्र रूप से जनादेश हासिल करने की क्षमता रखती है, न कि केवल सहयोगी दलों पर निर्भर है। नए दलों के लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है। जनसुराज पार्टी अगर इस चुनाव में कुछ सीटें भी जीत जाती है, तो वह बिहार की राजनीति में नया अध्याय खोल सकती है। लेकिन यदि वह असफल रही, तो उसका अस्तित्व सीमित रह जाएगा।

मतदाताओं का रुझान, मुद्दों का गणित
इस बार बिहार के मतदाता जातीय राजनीति के साथ-साथ स्थानीय विकास, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर भी सजग दिख रहे हैं।
1.रोजगार और पलायन-हर घर से कोई न कोई रोज़गार की तलाश में बाहर है। युवाओं की यह पीड़ा इस चुनाव का बड़ा मुद्दा बनेगी।
2.विकास और आधारभूत ढाँचा-सड़कें, बिजली, पुल, स्वास्थ्य सेवाएँ कृ ये अब भी बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं।
3.कानून व्यवस्था-जनता अब “सुशासन” के नाम पर केवल वादे नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है।
4.जातिगत समीकरण-यादव, कुर्मी, पासवान, भूमिहार, मुसलमान, अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग, इन सभी की हिस्सेदारी को देखते हुए कोई भी दल किसी वर्ग की उपेक्षा नहीं कर सकता।
5.भ्रष्टाचार और पारदर्शिता-सत्ता में आने के बाद जवाबदेही और पारदर्शिता पर जनता की निगाहें होंगी।
6.महिलाओं की भूमिका-बिहार की महिलाएँ अब राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। सरकार की “आरक्षण नीतियों” और “स्वयं सहायता समूहों” ने उन्हें सशक्त बनाया है।
7.मतदान की मनोवृत्ति, ‘बदलाव’ बनाम ‘स्थिरता’-बिहार के मतदाता भावनात्मक नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय लेते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी “जाति” एक बड़ा फैक्टर है, जबकि शहरी मतदाता “विकास और रोज़गार” पर अधिक केंद्रित हैं। कई युवा मतदाता यह मानते हैं कि अब बिहार को एक “स्थिर और दीर्घकालिक सरकार” चाहिए। वहीं, बदलाव की चाह रखने वाले मतदाता कह रहे हैं कि “अब नई सोच को मौका मिलना चाहिए।”

अभी ऊँट बैठा नहीं है
बिहार के 2025 चुनाव का नतीजा भविष्य की राजनीति को गहराई से प्रभावित करेगा। फिलहाल समीकरण यह कह रहे हैं कि न तो एनडीए और न ही महागठबंधन पूरी तरह हावी दिख रहा है। स्थिति इतनी करीबी है कि 1,000 से 5,000 वोटों का झुकाव ही सरकार तय कर सकता है। ऊँट किस करवट बैठेगा, यह कहना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव राजनीतिक परिपक्वता, जनभावना और युवा ऊर्जा का संगम बनने जा रहा है। बदलाव की चाह, स्थिरता की उम्मीद और नेतृत्व की परीक्षा यही इस चुनाव के तीन सूत्र हैं। अब देखना यह है कि बिहार की जनता किसे अपना भविष्य सौंपती है, नीतीश का अनुभव, तेजस्वी की युवा ऊर्जा या किसी नए चेहरे की नई सोच। (समाप्त)

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


अगले दशक में दोगुना हो सकता है त्योहारों का आर्थिक उत्सव

 विशेष लेख-


लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि, पत्रकार एवं विश्लेषक)

भारत में त्योहार केवल पूजा-अर्चना का नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के स्पंदन का भी प्रतीक हैं। दीपावली, नवरात्र, ईद या क्रिसमस, इन पर्वों के दौरान बाजारों की चमक देश की आर्थिक सेहत को दर्शाती है। हर त्योहारी मौसम में उपभोग बढ़ता है और यही उपभोग देश की जीडीपी में नई ऊर्जा भरता है। इसीलिए अर्थशास्त्री मानते हैं कि भारत का “फेस्टिव सीज़न” दरअसल उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का इंजन बन चुका है।

पिछले दशक में बढ़ी चमक
पिछले दस वर्षों में भारतीयों की क्रय-शक्ति में उल्लेखनीय बदलाव आया है। विश्व बैंक के अनुसार, 2014 से 2024 तक भारत का प्रति व्यक्ति जीडीपी औसतन 9 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ा। किंतु मुद्रास्फीति को घटाने पर वास्तविक वृद्धि दर 3 प्रतिशत-3.5 प्रतिशत के आसपास रही। श्रम-अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ और संतोष मेहरोत्रा लिखते हैं कि “आर्थिक विकास दर ऊँची है, लेकिन वास्तविक मजदूरी ठहरी हुई है। नतीजा यह कि क्रय-शक्ति का लाभ असमान रूप से विभाजित है।” ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी लगभग स्थिर रही, जबकि शहरी वर्गों में आय व उपभोग दोनों बढ़े। बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2024 में केवल दीपावली सीज़न में 1.85 लाख करोड़ रुपये की खरीदारी हुई, जो पिछले वर्ष से लगभग 20 प्रतिशत अधिक थी।

त्योहारों का आर्थिक जादू
त्योहारों का समय भारत की सबसे बड़ी उपभोग लहर लेकर आता है। बैंक ऑफ बड़ौदा व आईबीईएफ की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के उत्सव और विवाह सीज़न में भारत में कुल खर्च 12 से 14 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है। ई-कॉमर्स इस उछाल का प्रमुख कारण बन गया है। एमेजॉन, फ्लिपकार्ट और मीशो जैसे प्लेटफॉर्म्स त्योहारी बिक्री में अरबों डॉलर का कारोबार कर रहे हैं। यह परंपरागत बाजारों के साथ-साथ डिजिटल भारत की नई आर्थिक परंपरा भी बन चुका है। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. अरविंद सुब्रमण्यम के शब्दों में-“भारत का उपभोक्ता अब ज़रूरत नहीं, आकांक्षा पर खर्च करता है। त्योहार उस आकांक्षा का आर्थिक उत्सव हैं।”

किसके पास बढ़ी है खरीद शक्ति?
सवाल यह भी अहम है कि क्या यह समृद्धि सभी को समान रूप से मिली है? भारत असमानता रिपोर्ट 2023 के अनुसार, पिछले दशक में शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी की आय 60 प्रतिशत बढ़ी, जबकि निचले 40 प्रतिशत वर्ग की वृद्धि 20 प्रतिशत से भी कम रही। स्पष्ट है, त्योहारों पर बढ़ती खरीद का अधिकांश हिस्सा मध्यम और उच्च आय वर्गों से आता है। ग्रामीण भारत में खर्च की रफ़्तार धीमी है, हालांकि सरकारी योजनाएँ, जैसे प्रधानमंत्री किसान निधि या मनरेगा उपभोग को स्थिर बनाए रखे हुए हैं।

2035 की ओरः भविष्य की झलक
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, यदि भारत 6-7 प्रतिशत वार्षिक आर्थिक वृद्धि बनाए रखे तो अगले 10 वर्षों में प्रति व्यक्ति वास्तविक क्रय-शक्ति 50 प्रतिशत से 80 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इसका सीधा असर त्योहारों के बाजार पर पड़ेगा। दीपावली जैसे प्रमुख पर्वों का वार्षिक खर्च, जो आज 1.85 लाख करोड़ रुपये है, 2034 तक बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है। यदि पूरे विवाह और त्योहार सीज़न का कुल बाजार 13 लाख करोड़ रुपये है, तो अगले दशक में यह बढ़कर 22-23 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है। डॉ. रघुराम राजन का मानना है-“भारत की उपभोग-वृद्धि तभी स्थायी होगी जब रोजगार और आय-वृद्धि समानांतर चलें। यही वह राह है जो भारत को विश्व का सबसे बड़ा ‘फेस्टिव मार्केट’ बना सकती है।”

चुनौतियाँ और सावधानियाँ
1.मुद्रास्फीति नियंत्रणः यदि महँगाई बढ़ी, तो वास्तविक लाभ घट जाएगा।
2.रोजगार-गुणवत्ताः अस्थायी नौकरियों के स्थान पर स्थायी और कौशल-आधारित रोजगार आवश्यक हैं।
3.ग्रामीण समावेशनः यदि कृषि आय में वृद्धि नहीं हुई, तो आधी आबादी त्योहार-खर्च की दौड़ में पीछे रह जाएगी।
4.आय-वितरणः अमीर-गरीब अंतर घटाने के बिना उपभोग स्थायित्व नहीं पा सकेगा।

नीतिगत दिशा
भारतीय अर्थशास्त्री सुझाव देते हैं कि अब विकास केवल  जीडीपी केंद्रित नहीं, बल्कि वेतन और उपभोग-केंद्रित होना चाहिए। सरकार और उद्योग को मिलकर तीन मोर्चों पर काम करना होगा, वास्तविक मजदूरी में वृद्धि और न्यूनतम वेतन का सख्त क्रियान्वयन। कौशल विकास कार्यक्रमों का ग्रामीण व अर्धशहरी क्षेत्रों तक विस्तार। डिजिटल वित्तीय सुलभता ताकि छोटे शहरों में भी ई-कॉमर्स और क्रेडिट पहुँच सके।

हर घर की आर्थिक दीपावली
भारत की बढ़ती खरीद शक्ति यह संकेत दे रही है कि उपभोग अब हमारे विकास की धुरी बन चुका है। पिछले दशक की तरह आने वाले दस वर्ष भी “उत्सव अर्थशास्त्र’’ को नई ऊँचाइयाँ देंगे। परंतु यह तभी सार्थक होगा जब विकास सबके लिए होगा। जब ग्रामीण और शहरी, अमीर और मध्यम, सभी वर्गों के घरों में समान रूप से रौशनी पहुँचे। क्योंकि अंततः “खुशहाल अर्थव्यवस्था वही है, जहाँ हर घर की दीपावली जगमगाए।”

समाप्त


शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

पत्रकारिता की दशा-दिशा, चुनौतियाँ और संभावनाएँ

 विशेष लेख-


-तकनीक, बाजार और राजनीति के दबावों के बीच सत्य की खोज में संघर्षरत है पत्रकारिता

-नई पीढ़ी के सामने हैं ईमानदार और जिम्मेदार पत्रकारिता की बड़ी उम्मीदें

पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, क्योंकि यह समाज, सत्ता और जनता के बीच संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है। लेकिन आज पत्रकारिता एक संक्रमणकाल से गुजर रही है। जहाँ एक ओर तकनीकी प्रगति और डिजिटल मीडिया ने सूचना के प्रवाह को तेज किया है, वहीं दूसरी ओर पूँजी, राजनीति और फेक न्यूज़ ने उसकी विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुँचाया है। ऐसे समय में सवाल यह है कि पत्रकारिता की दशा और दिशा क्या है, और इसमें नौजवानों का भविष्य कितना सुरक्षित है?

पत्रकारिता की वर्तमान दशा
आज पत्रकारिता ने अपने रूप और माध्यम दोनों बदल लिए हैं। अब यह केवल प्रिंट या टीवी तक सीमित नहीं, बल्कि डिजिटल और सोशल मीडिया तक फैल चुकी है। लेकिन खबरों की इस बाढ़ में “सत्य” अक्सर शोर में दब जाता है। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का यह कथन बिल्कुल सटीक प्रतीत होता है-“पत्रकारिता अब सत्ता से सवाल पूछने के बजाय, सत्ता के लिए तालियाँ बजाने लगी है।” वास्तविकता यह है कि अब खबरों की दिशा पूँजी, विज्ञापन और राजनीतिक विचारधाराओं से प्रभावित होती जा रही है।

पत्रकारिता के सामने प्रमुख चुनौतियाँ
1. आर्थिक और संस्थागत दबाव-मीडिया हाउस अब कॉर्पोरेट समूहों के नियंत्रण में हैं। समाचारों की प्राथमिकता टीआरपी और विज्ञापन पर निर्भर करती है। स्वतंत्र पत्रकारों के लिए आर्थिक स्थिरता और निष्पक्षता बनाए रखना कठिन होता जा रहा है।
2. राजनीतिक हस्तक्षेप और वैचारिक झुकाव-पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट उसकी निष्पक्षता पर मंडरा रहा है। आज कई मीडिया संस्थान किसी न किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़कर काम कर रहे हैं। इससे जनता का विश्वास डगमगाने लगा है।
3. फेक न्यूज़ और सोशल मीडिया का खतरा-डिजिटल क्रांति ने सूचनाओं की गति तो बढ़ाई है, पर सत्यापन की प्रक्रिया कमजोर हुई है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैली अफवाहें समाज में अविश्वास का वातावरण बना रही हैं।
4. नैतिकता और जिम्मेदारी का संकट-खबरों को सनसनीखेज़ बनाने और ‘पहले दिखाने’ की होड़ में पत्रकारिता की आत्मा कमजोर हो रही है। कई बार पत्रकारिता जनहित के बजाय व्यावसायिक हित का साधन बन जाती है। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने कहा था- “पत्रकारिता का पहला धर्म है डर और लालच से मुक्त होकर सच कहना।” आज यही सबसे बड़ी चुनौती है।
5. सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा-कई पत्रकार सच्चाई उजागर करने की कीमत अपनी जान देकर चुका रहे हैं। धमकियाँ, हमले और कानूनी उत्पीड़न पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा रहे हैं।
6. तकनीकी बदलाव और प्रशिक्षण की कमी-एआई डेटा जर्नलिज़्म और डिजिटल माध्यमों के युग में जो पत्रकार तकनीक से अपडेट नहीं हैं, वे पिछड़ रहे हैं। पत्रकारिता संस्थानों में भी व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी महसूस की जा रही है।
7. दर्शकों की मानसिकता में बदलाव-अब दर्शक गंभीर विषयों से अधिक “मनोरंजन” पसंद करते हैं। टीवी बहसें कई बार ज्ञान से अधिक तमाशा बन जाती हैं, जिससे पत्रकारिता की गंभीरता कमजोर होती जा रही है।

संभावनाएँ और नई दिशा
इन चुनौतियों के बावजूद पत्रकारिता के सामने नई संभावनाएँ भी खुल रही हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्वतंत्र मीडिया, यूट्यूब चैनल, पॉडकास्ट और नागरिक पत्रकारिता युवाओं को अपनी बात कहने का नया माध्यम दे रहे हैं। नए पत्रकार डेटा-आधारित, शोधपरक और मानवीय सरोकारों से जुड़ी रिपोर्टिंग कर रहे हैं। पर्यावरण, शिक्षा, महिला अधिकार, साइबर सुरक्षा और ग्रामीण मुद्दों पर काम करने वाले युवा पत्रकार पत्रकारिता को फिर से जनसरोकारों की दिशा में मोड़ रहे हैं। वरिष्ठ संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी कहते हैं- “पत्रकारिता तभी जीवित रहेगी जब वह सत्ता के नहीं, समाज के प्रति जवाबदेह रहेगी।” यह विचार नई पीढ़ी के लिए दिशा-सूचक है।

नौजवानों के लिए मार्गदर्शन
1.पत्रकारिता को पेशा नहीं, सेवा और जिम्मेदारी मानें।
2.खबर से पहले सत्यापन को प्राथमिकता दें।
3.तकनीकी दक्षता के साथ नैतिकता और संवेदनशीलता बनाए रखें।
4.किसी भी विषय को जनहित की दृष्टि से देखें।
5.सत्ता से नहीं, समाज से संवाद करें।
पत्रकारिता का वर्तमान समय चुनौतीपूर्ण अवश्य है, लेकिन संभावनाओं से भरा हुआ भी है। यदि युवा पत्रकार ईमानदारी, संवेदनशीलता और निष्पक्षता को अपना ध्येय बनाएं तो आने वाले समय में पत्रकारिता फिर से अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकती है। महात्मा गांधी ने कहा था-“पत्रकारिता का उद्देश्य जनता की सेवा है, न कि सत्ता की स्तुति।” यदि यही भाव फिर से पत्रकारिता का मार्गदर्शक बने, तो यह न केवल लोकतंत्र को मज़बूत करेगी, बल्कि नौजवानों के लिए एक उज्ज्वल और सार्थक भविष्य का द्वार भी खोलेगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि)



सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

आधुनिक युग में करवाचौथ की महत्ता


भारत की संस्कृति अपने विविध त्योहारों और परंपराओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहाँ हर त्यौहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संस्कार, प्रेम और सामाजिक एकता का प्रतीक होता है। इन्हीं पर्वों में एक है करवाचौथ। यह पर्व भारतीय नारी के प्यार, विश्वास, त्याग और समर्पण का उत्सव है। आज जब समाज तेजी से आधुनिक हो रहा है, जीवन की गति और सोच बदल रही है, तब भी करवाचौथ का महत्व कम नहीं हुआ, बल्कि और गहराई से महसूस किया जाने लगा है।

करवाचौथ का अर्थ और परंपरा-‘करवा’ का अर्थ होता है मिट्टी का घड़ा (लोटा) और ‘चौथ’ का अर्थ है चतुर्थी तिथि। यह पर्व कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार, इस दिन विवाहित महिलाएँ सूर्योदय से लेकर चाँद निकलने तक निर्जला व्रत रखती हैं। वे शाम को चाँद का दर्शन कर, उसकी आराधना करके और पति के हाथों जल ग्रहण करके व्रत का पारण करती हैं। इस व्रत का उद्देश्य है पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की स्थिरता।
धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व-करवाचौथ का संबंध भगवान शिव-पार्वती, गणेश और चंद्रदेव से माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था। इसलिए यह व्रत पार्वती के तप और नारी के संयम का प्रतीक माना जाता है। करवाचौथ की कथा “वीरवती” नामक स्त्री से जुड़ी है, जिसने अपने पति के प्राणों की रक्षा अपने अटूट व्रत-विश्वास से की। यह कथा इस बात का प्रतीक है कि आस्था और प्रेम मिलकर असंभव को भी संभव बना सकते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से यह व्रत मनुष्य को संयम, विश्वास और आत्मनियंत्रण का संदेश देता है। जब स्त्री पूरा दिन निर्जल व्रत रखती है, तो वह केवल धार्मिक कर्म नहीं करती, बल्कि अपनी आत्मिक शक्ति और निष्ठा को भी सशक्त करती है।
सामाजिक और पारिवारिक दृष्टिकोण-करवाचौथ केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और पारिवारिक प्रेम का पर्व है। यह पति-पत्नी के रिश्ते में विश्वास और सम्मान को बढ़ाता है। आज के दौर में जब पारिवारिक संबंधों में दूरी बढ़ रही है, यह पर्व लोगों को एक-दूसरे के प्रति भावनात्मक रूप से जोड़ने का काम करता है। अब कई पति भी अपनी पत्नियों के साथ यह व्रत रखते हैं, यह बदलते भारत का नया संदेश है कि प्रेम एकतरफा नहीं, बल्कि परस्पर समर्पण का नाम है। इस प्रकार करवाचौथ आज लैंगिक समानता और वैवाहिक सामंजस्य का प्रतीक भी बन गया है।
सांस्कृतिक और लोक परंपरा-भारत की लोक परंपराएँ हमेशा से सामूहिकता और सहयोग पर आधारित रही हैं। करवाचौथ के दिन महिलाएँ सोलह श्रृंगार करती हैं, समूह में कथा सुनती हैं, लोकगीत गाती हैं और एक-दूसरे को आशीर्वाद देती हैं। यह सामूहिक आयोजन स्त्रियों के बीच आत्मीयता, सहानुभूति और सामाजिक एकता को मजबूत करता है। ग्रामीण भारत में आज भी यह पर्व पूरे हर्षोल्लास से मनाया जाता है। महिलाएँ ‘करवा’ में जल भरती हैं और इसे सौभाग्य का प्रतीक मानकर पूजा करती हैं। लोकगीतों में नारी की श्रद्धा और प्रेम झलकता है-
“सौभाग्यवती हो तू, सुहाग तेरा अमर रहे,
चाँद जैसा तेरे माथे का बिंदिया सदा चमकता रहे।”

आधुनिक भारतीय समाज में करवाचौथ का स्वरूप-आज का भारत परंपरा और आधुनिकता के संगम पर खड़ा है। महिलाएँ अब शिक्षित, आत्मनिर्भर और जागरूक हैं, परंतु इसके बावजूद करवाचौथ की आस्था में कोई कमी नहीं आई। वह इसे किसी सामाजिक बंधन के रूप में नहीं, बल्कि अपने प्रेम और विश्वास की स्वैच्छिक अभिव्यक्ति के रूप में निभाती हैं। मीडिया और फिल्मों ने भी करवाचौथ को लोकप्रिय बना दिया है। “दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे”, “कभी खुशी कभी ग़म”, “हम दिल दे चुके सनम” जैसी फिल्मों ने इसे प्रेम और संस्कृति के प्रतीक पर्व के रूप में प्रस्तुत किया। अब शहरी युवाओं में भी यह पर्व रोमांटिक और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन गया है।
नारी सशक्तिकरण और करवाचौथ-कई लोग करवाचौथ को केवल “पति के लिए पत्नी का व्रत” मानकर पारंपरिक सोच से जोड़ते हैं, परंतु इसका गहरा अर्थ इससे कहीं अधिक है। करवाचौथ नारी की इच्छाशक्ति, आत्मबल और श्रद्धा का प्रतीक है। वह व्रत रखकर यह संदेश देती है कि प्रेम किसी निर्भरता का नाम नहीं, बल्कि शक्ति और विश्वास का नाम है। इस व्रत के माध्यम से भारतीय नारी यह दर्शाती है कि वह केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि संस्कृति और मूल्यों की रक्षक भी है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि-व्रत और पूजा से मनुष्य के भीतर आत्मसंयम और धैर्य का विकास होता है। करवाचौथ नारी के लिए आत्मनियंत्रण का अभ्यास है, वह पूरे दिन बिना जल-भोजन के रहकर अपनी मानसिक शक्ति को परखती है। चाँद निकलने के बाद जब पति उसकी थाली में जल अर्पित करता है, तो वह क्षण प्रेम, संतुलन और कृतज्ञता का प्रतीक बन जाता है। इससे रिश्ते और भी गहरे और स्नेहमय बनते हैं।
समसामयिक महत्व-आज के भौतिक युग में जहाँ रिश्ते औपचारिक हो रहे हैं, करवाचौथ का संदेश और भी सार्थक हो उठता है। यह पर्व सिखाता है कि सच्चे रिश्ते त्याग, प्रेम और विश्वास पर टिके रहते हैं। यह केवल स्त्री के व्रत का पर्व नहीं, बल्कि परिवार की स्थिरता और संस्कृति की जीवंत परंपरा का प्रतीक है।
करवाचौथ भारतीय नारी की श्रद्धा, त्याग और समर्पण का प्रतीक पर्व है। यह हमें सिखाता है कि आधुनिकता के साथ चलते हुए भी संस्कार और संस्कृति की जड़ें न खोई जाएँ। यह पर्व पति-पत्नी के प्रेम को सुदृढ़ करता है, परिवार को जोड़े रखता है और समाज को आस्था से भर देता है। “करवा चौथ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और भारतीय संस्कृति की अमर परंपरा है।”


लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

सावधान! आधा उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ असुरक्षित

 लेख-

हिमालय को विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला कहा जाता है। इसकी भूगर्भीय संरचना अभी स्थिर नहीं है, यही कारण है कि यह क्षेत्र लगातार भूकंपीय गतिविधियों और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, जो हिमालयी राज्यों का अहम हिस्सा हैं, आज अभूतपूर्व संकट से जूझ रहे हैं। सवाल यह है कि इन पहाड़ों का कितना हिस्सा असुरक्षित है और यह खतरा किन-किन रूपों में सामने आ रहा है।

असुरक्षित पहाड़ः प्रतिशत और आंकड़े
किसी भी राज्य के पूरे भौगोलिक क्षेत्र को “असुरक्षित“ कहना सरल नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन हमें स्पष्ट संकेत देते हैं कि स्थिति बेहद गंभीर है।
उत्तराखंड-वाडिया इंस्टीट्यूट और विभिन्न भू-वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार राज्य का लगभग 51 प्रतिशत क्षेत्र उच्च और बहुत उच्च भूस्खलन संवेदनशील क्षेत्र में आता है। यानी हर दूसरा इलाका असुरक्षित माना जा सकता है। मसूरी, चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल जैसे जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
हिमाचल प्रदेश-यहां का किन्नौर जिला और सतलुज घाटी भूस्खलन के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील माने गए हैं। शिमला, कुल्लू और चंबा के कुछ हिस्सों को भी उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में रखा गया है।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य-भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) की रिपोर्टों के मुताबिक, भारत का लगभग 12.6 प्रतिशत भूभाग भूस्खलन-प्रवण है। अगर केवल हिमालयी पट्टी देखें, तो यह प्रतिशत और भी अधिक हो जाता है।
विशेष जिलों की स्थिति-इसरो की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल देश के सबसे ज्यादा असुरक्षित जिलों में शामिल हैं।

खतरे की प्रमुख वजहें
1.भूगर्भीय अस्थिरता और भूकंपीय सक्रियता-हिमालय अभी भी “बढ़ते हुए“ पहाड़ हैं। प्लेट विवर्तनिकी के चलते यह क्षेत्र लगातार दबाव में है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तराखंड और हिमाचल दोनों “भूकंप ज़ोन 4 और 5“ में आते हैं। छोटे-मोटे झटके अक्सर आते रहते हैं और एक बड़े भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है।
2.जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों का पिघलना-ग्लोबल वार्मिंग के कारण यहां के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं। इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) की घटनाएं बढ़ रही हैं। वर्ष 2021 में चमोली जिले में आई आपदा इसका उदाहरण है, जिसने सैकड़ों लोगों की जान ली और कई परियोजनाओं को बहा दिया।
3.अंधाधुंध निर्माण और अव्यवस्थित पर्यटन-चारधाम सड़क परियोजना, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं और होटलों का अनियंत्रित निर्माण पहाड़ों की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। मसूरी, नैनीताल, शिमला और मनाली जैसे पर्यटक स्थलों पर कैरिंग कैपिसिटी कई गुना ज्यादा दबाव है। इससे पहाड़ दरक रहे हैं और जमीन धंसने की घटनाएं (जैसे जोशीमठ में) सामने आ रही हैं।
4.वनों की कटाई और जलस्रोतों का सूखना-जंगलों की अंधाधुंध कटाई से पहाड़ों की मिट्टी कमजोर हो गई है। जलस्रोत सूख रहे हैं और पारिस्थितिकी का संतुलन बिगड़ रहा है। खेती योग्य भूमि सिकुड़ रही है और ग्रामीण पलायन कर रहे हैं, जिससे “भूतिया गांवों“ की संख्या बढ़ रही है।

विशेषज्ञों की चेतावनी
प्रो. वी. के. जैन (आईआईटी रुड़की, भू-विज्ञान विभाग) का कहना है-“हिमालयी राज्यों में विकास की रफ्तार प्रकृति की गति से कहीं ज्यादा है। यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से अभी स्थिर नहीं है। यदि निर्माण कार्यों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो अगले दशक में कई शहर असुरक्षित हो जाएंगे।“ वाडिया इंस्टीट्यूट, देहरादून की रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड के 51 प्रतिशत इलाके में भूस्खलन का गंभीर खतरा है। संस्था के वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर जलविद्युत परियोजनाओं और सड़क चौड़ीकरण पर पुनर्विचार नहीं हुआ, तो आने वाले सालों में आपदाएं और घातक रूप ले सकती हैं। इसरो के अध्ययन (2023) में यह पाया गया कि रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल देश के शीर्ष 10 भूस्खलन-प्रवण जिलों में शामिल हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार बढ़ता पर्यावरणीय दबाव इन क्षेत्रों को “आपदा हॉटस्पॉट“ बना रहा है। पर्यावरणविद् अनिल जोशी का कहना है-“हिमालय केवल पहाड़ नहीं हैं, यह हमारी नदियों का उद्गम स्थल है। यदि यहां संतुलन बिगड़ा, तो इसका असर पूरे उत्तर भारत की जल-व्यवस्था पर पड़ेगा।“

खतरे वाले प्रमुख क्षेत्र
उत्तराखंड
1.जोशीमठ (चमोली)-जमीन धंसने की घटनाओं से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय।
2.रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल-चारधाम यात्रा मार्गों पर सबसे ज्यादा भूस्खलन।
3.मसूरी और आसपास-लगभग 15 प्रतिशत क्षेत्र उच्च संवेदनशील।
4.उत्तरकाशी और पौड़ी गढ़वाल-लगातार भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं।
हिमाचल प्रदेश
1.किन्नौर-बड़े पैमाने पर भूस्खलन और सड़क दुर्घटनाएं।
2.सतलुज घाटी-जलविद्युत परियोजनाओं और सड़क चौड़ीकरण से अस्थिर इलाका।
3.शिमला-कुल्लू-चंबा क्षेत्र-पर्यटन दबाव और निर्माण के कारण असुरक्षा बढ़ रही है।

निष्कर्ष और समाधान
उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ आज जिस असुरक्षा का सामना कर रहे हैं, वह केवल प्राकृतिक नहीं बल्कि मानवीय हस्तक्षेप से भी उपजी है।
क्या करना ज़रूरी है?
1.अनियंत्रित निर्माण और बड़ी परियोजनाओं पर रोक लगानी होगी।
2.स्थानीय स्तर पर छोटे पैमाने की ऊर्जा और सड़क योजनाओं को प्राथमिकता देनी होगी।
3.कैरिंग एंड कैपेसिटी के हिसाब से ही पर्यटन को सीमित करना होगा।
4.आपदा पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत बनाना होगा।
5.स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण देना होगा।
हिमालय हमारे लिए केवल पर्यटन या प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवनदायिनी नदियों का उद्गम स्थल है। यदि हमने समय रहते संतुलन नहीं साधा, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संकट और भी भयावह हो सकता है। कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि उत्तराखंड का करीब आधा हिस्सा और हिमाचल के महत्वपूर्ण जिले (किन्नौर, सतलुज घाटी, शिमला-कुल्लू बेल्ट) असुरक्षित स्थिति में हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि विकास का वर्तमान मॉडल बदला नहीं गया, तो अगले दस वर्षों में इन पहाड़ों का बड़ा हिस्सा आपदा-ग्रस्त घोषित करना पड़ सकता है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

सफलता के 9 सूत्र

 लेख-

सफलता हर व्यक्ति का सपना है। यह केवल धन, पद या शोहरत तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मसंतोष, लक्ष्य प्राप्ति और समाज में सार्थक योगदान का नाम है। सफलता पाने का मार्ग सरल नहीं होता, बल्कि संघर्ष, धैर्य और सतत् प्रयास की मांग करता है। दार्शनिकों, महापुरुषों और आधुनिक विद्वानों ने सफलता के कई सूत्र बताए हैं।
1.स्पष्ट लक्ष्य निर्धारण-लक्ष्य ही जीवन की दिशा है। जिस तरह नाव को बंदरगाह तक पहुँचने के लिए रास्ते की पहचान ज़रूरी है, उसी तरह इंसान को जीवन में मंज़िल पाने के लिए लक्ष्य स्पष्ट करना चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।” सफलता उन्हीं के कदम चूमती है, जो तयशुदा मकसद के साथ आगे बढ़ते हैं।
2.सकारात्मक सोच-विचार ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को गढ़ते हैं। कठिनाइयों में भी आशा बनाए रखना ही असली ताकत है। महात्मा गांधी का कथन है-“मनुष्य अपने विचारों का ही परिणाम है, जो वह सोचता है, वही बन जाता है।” इसलिए सकारात्मक दृष्टिकोण ही हर कठिनाई को अवसर में बदल सकता है।
3.निरंतर परिश्रम-बिना मेहनत के कोई उपलब्धि स्थायी नहीं होती। प्रतिभा तभी चमकती है जब उसे परिश्रम का साथ मिले। थॉमस एडीसन ने कहा था-“प्रतिभा एक प्रतिशत प्रेरणा और निन्यानवे प्रतिशत पसीना है।” निरंतर अभ्यास और मेहनत से ही बड़े सपने हकीकत बनते हैं।
4.समय का प्रबंधन-समय ही सबसे बड़ा संसाधन है। जो इसे व्यर्थ गंवाता है, वह अवसरों से वंचित रह जाता है। बेंजामिन फ्रैंकलिन का कथन है-“खोया हुआ समय फिर कभी वापस नहीं आता।” समय का सही उपयोग ही सफलता की गारंटी है। प्राथमिकताओं को समझना और आलस्य से दूर रहना ही असली समय प्रबंधन है।
5.अनुशासन-अनुशासन सफलता की रीढ़ है। बिना अनुशासन के प्रयास बिखरे रहते हैं। अरस्तू ने कहा था-“हम वही बनते हैं, जो हम बार-बार करते हैं। अतः उत्कृष्टता कोई कार्य नहीं, बल्कि एक आदत है।” अनुशासित आदतें ही व्यक्ति को लगातार आगे बढ़ाती हैं।
6.ज्ञान और सीखते रहना-ज्ञान कभी पुराना नहीं होता। बदलते समय के साथ सीखते रहना ही आगे बढ़ने का मंत्र है। कन्फ्यूशियस ने कहा था-“जो सीखता है लेकिन सोचता नहीं, वह खो जाता है। और जो सोचता है लेकिन सीखता नहीं, वह बड़े खतरे में है।” सफलता के लिए सीखते रहने की भूख बनाए रखना ज़रूरी है।
7.आत्मविश्वास-आत्मविश्वास ही वह शक्ति है जो कठिनाइयों के बीच भी इंसान को खड़ा रखती है। हेनरी फोर्ड के अनुसार-“चाहे आप सोचें कि आप कर सकते हैं या सोचें कि आप नहीं कर सकते, दोनों ही स्थितियों में आप सही हैं।” जिसे खुद पर विश्वास है, उसे दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती।
8.अच्छे संबंध और सहयोग-मनुष्य अकेले कुछ बड़ा नहीं कर सकता। सहयोग और अच्छे संबंध ही उसे ऊँचाइयों तक ले जाते हैं। आंद्रे मोरोआ का कथन है-“दोस्त बनाना एक कला है, और जीवन की हर सफलता उसी पर निर्भर है।” सफलता के लिए नेटवर्किंग और सहयोग का महत्व उतना ही है जितना व्यक्तिगत परिश्रम का।
9.धैर्य और दृढ़ता-सफलता का मार्ग लंबा होता है। असफलताओं के बावजूद टिके रहना ही विजेता की पहचान है। अब्राहम लिंकन ने कहा था-“मैं धीरे-धीरे चलता हूँ, लेकिन कभी पीछे नहीं मुड़ता।” धैर्य और दृढ़ता से ही सपनों को साकार किया जा सकता है।
सफलता केवल संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि यह स्पष्ट लक्ष्य, सकारात्मक सोच, कड़ी मेहनत, समय प्रबंधन, अनुशासन, निरंतर सीखने की प्रवृत्ति, आत्मविश्वास, सहयोग और धैर्य का समन्वय है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था-“सपना वह नहीं जो आप सोते हुए देखते हैं, सपना वह है जो आपको सोने न दे।” यदि इन 9 सूत्रों को जीवन में अपनाया जाए तो सफलता निश्चित ही हमारे कदम चूमेगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)