कहानी बिलकुल सच्ची है, हमारी बिटिया के साथ श्रुति नाम की एक नाबालिग बच्ची ट्यूशन पढ़ा करती थी, उसने बताया था कि उसके पिता उन्हें छोड़कर कई साल पहले घर से कहीं चले गए, घर में अब वो है, उसकी मम्मी है और एक बड़ा भाई है, उनके घर का खर्च उसके नाना जी वहन करते हैं, घर से गरीब श्रुति के पास पढने के लिए भी पैसे नहीं होते थे, इसलिए ट्यूटर उससे पढ़ाने की फीस नहीं लेता था, हमारी बिटिया का ट्यूशन पूरा हुआ, उसने बोर्ड के पेपर भी दे दिए. श्रुति जहाँ पढ़ती थी वहां से उसने भी बोर्ड के एग्जाम दे दिए, अचानक अभी १५ दिन पहले श्रुति ने हमारी बिटिया से मोबाइल फ़ोन पर बात की, हमारी बिटिया उससे मिलने उसके घर गयी, घर के बाहर उसे श्रुति मिली, मगर उसने बताया कि अब वो लोग यहाँ नहीं रहते, दो किलोमीटर आगे रहते हैं, श्रुति उसे लेकर जहाँ गयी, वो एक स्लम बस्ती थी, रेलवे लाइन क्रॉस करके एक दो कमरों के टूटे-फूटे मकान में दाखिल होते हुए उसने बताया कि वो अब यहाँ रहते हैं, नाना जी की दो महीने पहले डेथ हो चुकी है, इस सदमे में मम्मी को हार्ट अटैक भी आ चुका है, मम्मी अब घर का काम नहीं कर सकतीं, इसलिए यहीं थोड़ी दूरी पर एक छोटी सी दुकान में कुछ रेडीमेड गारमेंट्स बेचने का काम करती हैं, दूकान पर जाकर देखा तो उसमें कुछेक मैले-कुचैले कपड़े थे, जिनकी कीमत २० से लेकर ६० रूपए प्रति पीस तक थी, पता चला कि महीने में केवल ५-६ सौ रूपए ही कमाई हो पाती है, भाई आवारा हो गया है, वो घर पर ध्यान नहीं देता, उल्टा मम्मी से पैसे छीनकर ले जाता है, मैं आगे पढाई नहीं कर सकती, घर का काम कौन करेगा, पढ़ने के लिए पैसे भी तो नहीं हैं, श्रुति बोली, सोचती हूँ कि कंप्यूटर कोर्स कर लूँ, घर चलाने को पैसे मिल जायेंगे, उसने बताया कि कंप्यूटर कोर्स के लिए भी महीने की ९०० रूपए फीस देनी होगी, अब इतने पैसे भी नहीं होते, रोज़ रात को ऐसा होता है कि हमारे पास टमाटर खरीदने तक के लिए ४-५ रूपए भी नहीं होते, रोटी पानी से खानी पड़ती है, श्रुति क्या करे, काम नहीं, पढाई के लिए पैसे नहीं हैं, अब मैं सोचता हूँ कि श्रुति की कुछ मदद की जाये, कम से कम उसे आगे पढ़ने का मौका ज़रूर मिले, इसलिए मैं तो उसकी मदद करने चला, क्या आप भी इस नयी कवायद में शामिल होंगे, अगर हाँ तो मुझे इस ईमेल आईडी पर संपर्क कर सकते हैं- av.chetan@gmail .com
सोमवार, 21 अप्रैल 2014
wo jo nahi hue apne
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाए, जोड़े से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये, जीहां, ठीक ही कहा है रहीमदास जी ने. कभी हम भी सोचा करते थे कि प्रेम बाँटने से बढ़ता है, इसलिए अपनी परवाह किये बगैर,अपनी पॉकेट लगातार हल्की करते रहे, अपनी उम्र के अधिकांश कीमती दिन, महीने, घंटे, मिनट्स, यहाँ तक कि अपने गुण , अपनी कला, अपनी सोच, अपनी कल्पना, अपना लेखन तक सब ताक पर रख दिया, ये सोचकर कि प्रेम बाँटने से बढ़ता है, लेकिन अब जाकर पता चला कि प्यारे ये दुनिया है, जैसे को तैसे की कहावत भी यहीं पर चलती है, समय को देखो, समय की धार को पहचानो, तब जाकर प्रेम या जैसे को तैसे वाला बर्ताव करो, मगर हम कभी न समझे, समझते भी कैसे, इतनी समझ कभी आई नहीं कि क्या और कैसा बर्ताव किससे , कैसे और कब करना चाहिए, अपनी ज़िन्दगी की दुकान में तो बस एक ही सौदा है-प्रेम........अब करें भी तो क्या। हमारे एक मित्र हैं, खूब कहते हैं, खूब घूमते हैं, खूब सोते हैं, खूब गुस्सा करते हैं और खूब झूठ बोलकर खूब सारी बातें छिपाने की महारत रखते हैं. एक दिन बोले यार अब से कोई बात नहीं छिपानी, ज़िन्दगी का हर पल शेयर करेंगे। हम भी बोल पड़े ओक्के। अब हुआ कुछ और--- हम तो हर बात को बताना सीख गए और वो---- अपनी बात को छिपाने के रस्ते पर चल पड़े, एक दिन ऐसा आया कि वो श्रीमान ५ दिन की यात्रा पर चुपके से निकल गए. जब पता चला तो हम भी गुस्से में दो दिन आउटिंग पर चले गए, अब हुआ क्या, दो दिन की आउटिंग की बात पता चलते ही उनका पारा तो सातवें आसमान पर जा पहुंचा, लगे गालियां देने, तेवर दिखाने-----. जब हमने पूछा कि श्रीमान आप भी तो बिना बताये ५ दिन ग़ायब हो गए थे, तो बोले फिर क्या हुआ--- हमने आकर बता दिया न.... सुनकर हम तिलमिला उठे ---- बस साहब हमने सोच लिया कि अब ऐसे शख्स का साथ हम नहीं देंगे जो अपने लिए तो छूट लिए घूमता हो और दूसरों पर पाबंदियां लगता हो, ठीक ऐसा ही हाल हमारी राजनीति का भी हो चला है, नेता चाहे जहाँ घूमे, जितने झूठ बोले, जो चाहे वो करे, मगर आम जनता को अपने घर के खूँटें से बंधी निरीह बकरी ही समझता है. अब खूंटा तोड़ो तो मरे और न तोड़ो-- तो भी मरे. हम तो नेता जी से प्रेम का धागा जोड़े बैठे थे मगर वो तो धागा तोड़कर, हमारे गले और पैरों में ज़ंजीर डालने का काम करने में जुटे हैं, इसलिए मौका है कि जनता अपनी ताकत पहचाने और तय करे कि किससे प्रेम वाला बर्ताव करना है और किससे दो-दो हाथ करने हैं.
चेतन आनंद
मंगलवार, 15 अप्रैल 2014
aao koshish karen
अभी हाल ही में देहरादून-मसूरी की यात्रा से लौटा हूँ. वहां देखकर सुकून हुआ कि डेल्ही-एनसीआर की तरह वहां लिकसभा चुनाव को लेकर कोई शोरगुल नहीं है. साथ ही ये भी देखा कि लोग भी अपने काम पर ज़्यादा लगे हुए हैं. देहरादून के गांव गुणियाल में एक दिन रहने का मौका भी मिला। क्या मौसम था. ठंडी ठंडी हवाएँ, चहचहाते पंछी, हवाओं में पेड़-पौधों की खुशबू। देर रात तक टहलते लोग-लुगाई, बच्चे। कारों के शीशे खुले, आराम से सामान कार में रखकर बहार बातचीत करते लीग. लगा ही नहीं कि किसी अनजान जगह पर हैं. बल्कि लगा कि जहाँ हम रहते हैं, वो जगह असुरक्षित है, मक्कारों, चोरों और लुटेरों से भरी पड़ी है, जहाँ न आप देर रात तक घूम सकते हैं, न कार को खुला छोड़ सकते हैं, न बच्चों को देर तक घर के भहर छोड़ सकते हैं, हर शख्स संदिग्ध नज़र आता है. हर पल लूट जाने का खतरा सताता है. जबकि ग़ज़िआबाद देश की राजधानी नई डेल्ही से २०-२५ किलोमीटर ही दूर है जबकि देहरादून २५० किलोमीटर। देखिये ज़रा से फैसले पर देश की दुनिआ ही अलग नज़र आती है. ठीक ही कहा है किसी विदेशी लेखक ने कि किसी भी देश की राजधानी के आसपास का ५० किलोमीटर का एरिया क्राइम और आर्थिक अपराध से भरा मिलता है. इससे दूर जाने लगो तो पाओगे के सबकछ, सुकून, लोगों में अपनापन, जीने का मिजाज़, खुशहाली, धरती के प्राणी सब अपने जैसे ही हैं. साफ़-सुथरे। काश डेल्ही के आस पास भी देहरादून जैसी बिना किसी प्रदुषण की दुनिआ होती. आइये कोई एक अच्छी कोशिश करके देखे--------
चेतन आनंद
मंगलवार, 8 अप्रैल 2014
matdaan
लीजिये १० अप्रैल को मतदान है. एक पर्व नवरात्रे ख़त्म तो दूसरा पर्व मतदान आने में बस ३६ घंटे ही बचे हैं. लेकिन नवरात्रे जैसी तैयारी कहीं दिखाई नहीं दे रही. सब तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है. बस शोर है तो उम्मीदवारों में, घबराहट है तो उम्मीदवारों में, उन्हें मतदाता अब परीक्षक नज़र आ रहा है. जनता के दरबार में टेस्ट जो होना है. तरह तरह के प्रलोभन,वादे, आश्वासन, मक्खन, मलाई, वोट मांगना, करबद्ध निवेदन, सब टोटके हो चुके। अबतो आज शाम ६ बजे वो भी काम नहीं आएंगे। बस हाथ जोड़कर घर-घर जाने का सिलसिला चल सकता है. ये ऐसी परीक्षा है जिसमे नक़ल परीक्षा के दौरान नहीं परीक्षा से पहले चलती है. कोई अटल बन मतदाताओं से आग्रह कर रहा है कि मैं आपका सेवक हूँ तो कोई अभिनेता बनकर जता रहा है कि भाई मैं ही हूँ जो आपका मनोरंजन भी कर सकता हूँ और आपके शहर की शान भी बन सकता हूँ. कोई आम आदमी बनकर अपने ४९ दिनों का बखान करने में जुटा हुआ है. शहर के एक कोने में दुबके बैठे डबकू ने अपने दोस्त नन्नू से पूछा अरे अपना कौन है, किसकी सुनें, रिक्शा चलाकर पेट ही भरते रहेंगे या केजरीवाल बनने का नंबर अपना भी आ सकता है. डबकू बोला----केजरीवाल अरे नहीं केजरीवाल बनने से क्या होगा। जैसे झाड़ू ४० से ५० दिन तक चलती है वैसे ही केजरी मियां की सरकार चली, वादे इतने बड़े-बड़े कर लिए जनता से कि पूरा करने के टाइम पसीने छूट गए हुज़ूर के, भाग गए मैदान से. अब शास्त्री जी का हवाला देकर अपनी करतूत छिपाने में लगे हुए हैं, नहीं भाई नहीं बनना केजरीवाल, नन्नू बोला अच्छा तो फिर राहुल गांधी बन लेते हैं, उसका तो जलवा है, अरे नहीं, डबकू बोला- राहुल तो बस रोबोट है, रिमोट तो उनकी माता जी के पास है, जैसे चाहतीहैं चला लेती हैं. अब तू बनेगा रोबोट? नन्नू ने मुंह में ऊँगली दबाते हुए कहा न---हीं.... औरमोदी, उसकी तो हवा है न, मोदी बनकर देश की सेवा करेंगे, मोदी------? मोदी खुद कुछ नहीं बन पा रहे, जनता पर दबाव बहुत है, सुबह से लेकर रात तक बस मोदी ही मोदी, टीवी के जिस चैनल को खोल लो वहाँ मोदी, सोशल साइट्स पर देख लो वहाँ मोदी, एफबी पर मोदी, ट्विटर पर मोदी, गली में मोदी, चौराहों और राजमार्गो पर मोदी, चर्चा में कोई नहीं है, बस शोर ही शोर है. इसलिए मोदी बनने से पहले देख ले कि मोदी बनकर कितने लोग तुझे अपनाएंगे। वैसेएक बात कहूंगा नन्नू तू कुछ बने न बने मगर वोट ज़रूर करियो, देश के विकास में तेरी ही नहीं सबकी भागीदारी बहुत ज़रूरी है. चल रिक्शा पकड़ देख सवारी आ रही है.
चेतन आनंद
शनिवार, 29 मार्च 2014
kunba
कुनबा, जी हाँ समाज में इस शब्द का बड़ा महत्त्व है. कुनबा मतलब परिवार हो तो मकान भी घर की शक्ल ले लेता है. जंगल में
साधुओं के बीच कुनबा हो तो जंगल में मंगल हो जाता है। कुनबा राजनीति में भी होता है. इन दिनों लोकसभा चुनाव की बयार में सभी दल अपना कुनबा बनाने और बढ़ाने में लगे हैं. जिसे जैसा मौका और मुनाफा मिल रहा है, कुनबा बना भी रहा है, बढ़ा भी रहा है और बदल भी रहा है. केजरीवाल का अजब हाल है, बढ़ने के बजाय उनकी पार्टी का कुनबा घट रहा है. कोई कांग्रेस का हाथ थाम रहा है तो कोई बीजेपी को लपक रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे आप की हवा बनने की जगह वक़्त से पहले ही निकल गयी हो. बीजेपी को लग रहा है कि भैया यही सही मौका है जितनी शक्ति बढ़ानी- दिखानी है, बढ़ा-दिखा लो. मोदी का जादू बार-बार नहीं चलने वाला। पुराने घिस-पिट चुके आका चाहे नाराज़ हों या खुश, बस करते चलो हुश-हुश। कांग्रेस चाहकर भी बंधे हाथ नहीं खोल पा रही. कुनबा बढे तो बढे कैसे। अभी तक तो बस वोटर ही है जो नहीं बता रहा कि उसका कितना कुनबा वोट देगा, देगा भी या नहीं। अब कुछ भी हो, कुनबा दिखाने , बढ़ाने और बदलने का राजनीतिक महाकुम्भ जारी है. लोकसभा की गंगा में कौन नहायेगा, कौन कितने गोते लगाएगा ये तो वोटर ही बतायेगा लेकिन उंगली का चमत्कार ही होगा कि किसका कुनबा कितना बढ़ेगा। बस इंतज़ार, इंतज़ार, इंतज़ार करो, बस दो महीने और…।
चेतन आनंद
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)




