रविवार, 7 दिसंबर 2025

पुस्तक और पुस्तकालय से बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव

 लेख-

मनुष्य के विकास का सबसे सशक्त आधार ज्ञान है, और ज्ञान का सबसे विश्वसनीय साधन पुस्तकें। बदलते समय में भले ही मोबाइल, टैबलेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से लोकप्रिय हुए हों, परंतु बच्चों के सर्वांगीण विकास की दृष्टि से पुस्तक और पुस्तकालय आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने सदियों पहले थे। पुस्तक न केवल ज्ञान का भंडार है, बल्कि यह बच्चे के मन, मस्तिष्क और व्यक्तित्व को निर्माण देने वाली अदृश्य गुरु भी है। वहीं पुस्तकालय वह वातावरण प्रदान करता है जहाँ बच्चे सीखने, समझने और विचार करने की स्वतंत्रता और प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
1. पुस्तकों से बौद्धिक विकास-पुस्तकें बच्चों की सोचने, समझने और विश्लेषण करने की क्षमता को बढ़ाती हैं। कहानी, विज्ञान, इतिहास, यात्रा-वृत्तांत, जीवनी जैसे विविध साहित्य बच्चों में जिज्ञासा, कल्पनाशीलता और तर्कशक्ति विकसित करते हैं। पढ़ने से बच्चे नई-नई अवधारणाओं, स्थानों, व्यक्तियों और संस्कृतियों से परिचित होते हैं। यह परिचय उनके दिमाग में नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। नियमित रूप से पढ़ने वाले बच्चों की एकाग्रता, स्मरण-शक्ति, भाषा कौशल और समस्या-समाधान क्षमता अन्य बच्चों की तुलना में अधिक विकसित पाई जाती है।
2. भाषा और अभिव्यक्ति का विकास-पुस्तकें बच्चे की भाषा को समृद्ध करती हैं। शब्दों का भंडार बढ़ता है, वाक्य गठन और अभिव्यक्ति की क्षमता में निखार आता है। कहानियाँ पढ़ते-पढ़ते बच्चे संवाद, भाव, वर्णन, तर्क और प्रस्तुति जैसे भाषाई रूपों को सहज रूप से सीख जाते हैं। एक अच्छा पाठक अक्सर एक अच्छा लेखक और वक्ता भी बनता है। इसलिए बच्चों को पुस्तकों से जोड़ना भाषा सीखने की प्रक्रिया को सहज, आनंदपूर्ण और प्रभावी बनाता है।
3. भावनात्मक और नैतिक विकास-कहानियों के पात्र बच्चों को जीवन के मूल्य सिखाते हैं। साहस, ईमानदारी, सहयोग, कर्तव्य, संवेदना, त्याग, मित्रता, ये सब पुस्तकें बच्चों के भीतर स्वाभाविक रूप से रोपती हैं। जब बच्चा कहानी के पात्रों के संघर्ष या संकल्प को पढ़ता है तो वह उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ता है। उनके निर्णयों और परिणामों से सीखकर अपने भीतर भी सही-गलत का विवेक विकसित करता है। इस प्रकार पुस्तकें बच्चे को केवल बुद्धिमान ही नहीं बनातीं, संवेदनशील और नैतिक चरित्र भी बनाती हैं।
4. कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का विस्तार-किताबें बच्चे को उस दुनिया में ले जाती हैं जहाँ कल्पना की कोई सीमा नहीं। परियों की कहानियाँ, रोमांचक यात्राएँ, भविष्य की विज्ञान-कथाएँ, रहस्य-रोमांच, सभी बच्चे की सृजनशीलता को उड़ान देते हैं। एक पुस्तक पढ़ते समय बच्चा स्वयं अपने दिमाग में चित्र, पात्र और दृश्य बना रहा होता है। यही अभ्यास आगे चलकर उसकी रचनात्मक सोच, कलात्मक क्षमता और नवाचार को बढ़ाता है।
5. पुस्तकालय, सीखने का प्रेरक वातावरण-पुस्तकालय केवल पुस्तकों का भंडार ही नहीं होता, बल्कि वह एक सांस्कृतिक और शैक्षणिक वातावरण है। जहाँ बच्चे शांत और अनुशासित माहौल में पढ़ते हैं, दूसरों को देखकर प्रेरित होते हैं, और ज्ञान से संवाद करने की कला सीखते हैं। पुस्तकालय में उपलब्ध विविध पुस्तकों से बच्चे अपनी पसंद का साहित्य चुनते हुए स्वायत्त सीखने की प्रक्रिया विकसित करते हैं। इसके अलावा, पुस्तकालय में आयोजित पुस्तक मेले, कहानी-सत्र, लेखन कार्यशालाएँ, चित्र-पुस्तक प्रदर्शनियाँ बच्चों को सीखने के नए तरीकों से परिचित कराती हैं।
6. डिजिटल युग में पुस्तकालय की भूमिका-आज जब बच्चे स्क्रीन पर अधिक समय बिताने लगे हैं, तब पुस्तकालय उन्हें विकल्प और संतुलन प्रदान करते हैं। डिजिटल सामग्री उपयोगी है, परंतु पुस्तक की गहराई और एकाग्रता का अनुभव उससे अलग है। इसलिए आधुनिक पुस्तकालय अब डिजिटल संसाधनों को भी सम्मिलित करते हुए हाइब्रिड लर्निंग स्पेस बन रहे हैं, जहाँ किताबें, ई-बुक्स, ऑडियो बुक्स और वर्कस्टेशनों की सुविधाएँ मिलकर सीखने को विस्तृत बनाती हैं।
7. सामाजिक और सहकर्मी विकास-पुस्तकालय में बच्चे केवल पढ़ते ही नहीं, बल्कि मिलते-जुलते, चर्चा करते और समूह में सीखते भी हैं। इससे उनके भीतर सहयोग, नेतृत्व और सामाजिक व्यवहार का विकास होता है। किसी पुस्तक पर समूह-वाचन या चर्चा बच्चों के भीतर आत्मविश्वास, विचार अभिव्यक्ति और सुनने की क्षमता को बढ़ाती है।
8. आत्म-अनुशासन और समय-प्रबंधन-पुस्तकालय की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका अनुशासित वातावरण है। यहाँ प्रवेश करते ही बच्चों के भीतर शांत, संयमित और एकाग्र रहने का भाव स्वयमेव पैदा होता है। नियत समय में पुस्तक लौटाना, पढ़ाई के लिए समय निकालना और लक्ष्य निर्धारित करके पढ़नाकृये सभी आदतें बच्चे को जिम्मेदार बनाती हैं।
9. पुस्तक व पुस्तकालय से व्यक्तित्व निर्माण-एक अच्छा पाठक अधिक जिज्ञासु, विवेकशील, संवेदनशील और आत्मविश्वासी बनता है। पुस्तकालय उसका सहयात्री और विकास का मंच बन जाता है। बच्चों में पढ़ने की संस्कृति विकसित होने से उनमें नेतृत्व, निर्णय क्षमता, आत्मचिंतन, और भविष्य दृष्टि जैसी महत्वपूर्ण क्षमताएँ स्वतः विकसित हो जाती हैं। यही कारण है कि विश्व के विकसित देशों ने पढ़ने की संस्कृति को विद्यालयों व समुदायों का मूल आधार बनाया है।
10. अभिभावक व शिक्षकों की भूमिका-एक पुस्तक तभी प्रभावी होती है जब बच्चे के हाथ तक पहुँचे। इसलिए अभिभावकों और शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों में पुस्तकों के प्रति उत्साह जगाएँ-
घर में छोटा-सा पुस्तक कोना
स्कूल में सक्रिय पुस्तकालय
हर सप्ताह पढ़ने का लक्ष्य
कहानी सुनाने और साझा करने की परंपरा

ये उपाय बच्चों को जीवनभर पढ़ने का साथी बना सकते हैं। पुस्तक और पुस्तकालय बच्चों के सर्वांगीण विकास की आधारशिला हैं। ये केवल ज्ञान नहीं देते, बल्कि बच्चे के व्यक्तित्व, बुद्धि, भावनाओं, भाषा, सामाजिक व्यवहार और रचनात्मकता, सभी को समग्र रूप में विकसित करते हैं। यदि समाज, विद्यालय और परिवार मिलकर बच्चों में पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करें तो निश्चय ही भविष्य एक ऐसे शिक्षित, संवेदनशील और नवोन्मेषी पीढ़ी का होगा जो पुस्तकों की रोशनी से जगमगाएगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें