मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूल गए लोग?

 एक जनवरी बलिदान दिवस पर विशेष लेख-

भारतीय लोकतंत्र, कला और जनसंघर्ष के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ने चाहिएं, बल्कि और अधिक उज्ज्वल होने चाहिएं। सफ़दर हाशमी ऐसा ही एक नाम है। वे केवल एक रंगकर्मी या नाटककार नहीं थे, बल्कि जनता की आवाज़, शोषितों की पीड़ा और सत्ता से सवाल करने वाली चेतना थे। आज यह प्रश्न बार-बार उठता है, क्या हम सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूलते जा रहे हैं? क्या उनकी शहादत केवल स्मृति दिवसों और औपचारिक श्रद्धांजलियों तक सिमट कर रह गई है?
नुक्कड़ से उठी आवाज़
सफ़दर हाशमी ने रंगमंच को अभिजात्य सभागारों से निकालकर सड़कों और गलियों तक पहुँचाया। वे मानते थे कि असली दर्शक वही है, जो जीवन की सबसे कठोर परिस्थितियों से जूझ रहा है, मज़दूर, किसान, छात्र और आम नागरिक। नुक्कड़ नाटक उनके लिए कला का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का माध्यम था। उनके नाटक सत्ता के दंभ, पूँजी के शोषण और सामाजिक असमानता पर सीधा प्रहार करते थे। वे दर्शकों से संवाद करते थे, उपदेश नहीं देते थे।
जन नाट्य मंच और वैचारिक संघर्ष
सफ़दर हाशमी जन नाट्य मंच के प्रमुख स्तंभ थे। यह मंच केवल नाटक करने का संगठन नहीं था, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन था। ‘हल्ला बोल’, ‘मशीन’, ‘औरत’ जैसे नाटक आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे उन प्रश्नों को उठाते हैं, जिनसे समाज अक्सर मुँह मोड़ लेता है। हाशमी के लिए कला तटस्थ नहीं हो सकती थी; वह या तो शोषक के पक्ष में होती है या शोषित के।
1 जनवरी 1989ः अभिव्यक्ति पर हमला
1 जनवरी 1989 को ग़ाज़ियाबाद के साहिबाबाद क्षेत्र में जन नाट्य मंच द्वारा एक नुक्कड़ नाटक का मंचन किया जा रहा था। विषय था-मज़दूरों के अधिकार। तभी राजनीतिक हिंसा ने कला पर हमला कर दिया। सफ़दर हाशमी को बेरहमी से पीटा गया। अगले दिन 2 जनवरी को उन्होंने दम तोड़ दिया। यह केवल एक कलाकार की हत्या नहीं थी, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किया गया सुनियोजित प्रहार था।
क्या समाज सचमुच शोकाकुल हुआ?
उस समय देशभर में आक्रोश फैला। कलाकारों, बुद्धिजीवियों और आम लोगों ने इस हत्या की निंदा की। लेकिन समय के साथ सवाल उठता है-क्या यह आक्रोश टिकाऊ था? क्या हमने इस घटना से सबक लिया? या फिर हम भीड़ की तरह कुछ दिनों का शोर मचाकर चुप हो गए?
विस्मृति के कारण
आज सफ़दर हाशमी की चर्चा सीमित दायरे में सिमटती दिखती है। इसके कई कारण हैं। पहला, तेज़ी से बदलता समय, सोशल मीडिया और तात्कालिक सूचनाओं के युग में गहन वैचारिक विमर्श के लिए धैर्य कम होता जा रहा है। दूसरा, सुविधाजनक चुप्पी, सत्ता को सवाल पूछने वाले कलाकार असहज करते हैं, इसलिए उन्हें भुला देना आसान होता है। तीसरा, औपचारिक स्मरण, हमने स्मृति को रस्म बना दिया है। माल्यार्पण, गोष्ठी और दो भाषण, बस यहीं तक सीमित। चौथा, शिक्षा से दूरी, हमारे पाठ्यक्रमों में सफ़दर हाशमी जैसे जनपक्षधर कलाकारों को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे।
आज के दौर में सफ़दर हाशमी
आज जब असहमति को देशद्रोह समझ लिया जाता है, जब कलाकारों और लेखकों को डराया जाता है, तब सफ़दर हाशमी और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि सवाल पूछने की आज़ादी से जीवित रहता है। अगर कला सत्ता की प्रशंसा तक सीमित हो जाए, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है।
क्या नई पीढ़ी जानती है?
यह चिंता का विषय है कि नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा सफ़दर हाशमी के नाम और काम से अपरिचित है। वे चे ग्वेरा या वैश्विक प्रतीकों को तो जानते हैं, लेकिन अपने ही देश के उस कलाकार को नहीं, जिसने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए जान दे दी। यह केवल पीढ़ी की भूल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक विफलता है।
सक्रिय स्मरण की ज़रूरत
सफ़दर हाशमी को याद करने का अर्थ केवल उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना नहीं है। उनका असली स्मरण तब होगा, जब नुक्कड़ नाटक फिर से सड़कों पर लौटेंगे, कलाकार सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस करेंगे, शिक्षा में कला और विचार को साथ-साथ महत्व मिलेगा और समाज असहमति को दुश्मनी नहीं, लोकतंत्र की ताक़त मानेगा।
साहित्य और रंगमंच की जिम्मेदारी
आज के साहित्यकार और रंगकर्मी पर यह नैतिक दायित्व है कि वे हाशमी की परंपरा को आगे बढ़ाएँ। यह ज़रूरी नहीं कि हर कलाकार वही भाषा या शैली अपनाए, लेकिन जनपक्षधर दृष्टि बनाए रखना अनिवार्य है। अगर कला केवल पुरस्कार, मंच और तालियों की भूखी हो जाए, तो सफ़दर हाशमी की शहादत व्यर्थ लगने लगेगी। तो क्या लोग सफ़दर हाशमी के बलिदान को भूल गए हैं? शायद पूरी तरह नहीं, लेकिन खतरा ज़रूर है। स्मृतियाँ तभी जीवित रहती हैं, जब उन्हें कर्म में बदला जाए। सफ़दर हाशमी का जीवन और मृत्यु हमें यह सिखाती है कि कला, विचार और साहस, तीनों एक साथ चलें, तभी लोकतंत्र मज़बूत होता है। यदि हम उनके सवालों को जीवित रखते हैं, तो वे हमारे बीच हैं। अगर नहीं तो इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

अटल बिहारी वाजपेयी का बहुमुखी व्यक्तित्व

 जन्म जयंती पर विशेष लेख-

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के ऐसे युगपुरुष थे, जिनका व्यक्तित्व अनेक आयामों से सुसज्जित था। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि कवि, विचारक, ओजस्वी वक्ता, कुशल प्रशासक और मानवीय मूल्यों के सजग प्रहरी थे। उनके जीवन और कृतित्व में राजनीति की कठोरता के साथ कविता की कोमलता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यही कारण है कि वे सत्ता में रहते हुए भी सर्वमान्य बने रहे और सत्ता से बाहर रहते हुए भी उतने ही सम्मानित रहे।
प्रारंभिक जीवन और वैचारिक निर्माण
अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन सादगी, संघर्ष और अनुशासन से निर्मित हुआ। छात्र जीवन से ही उनमें राष्ट्रसेवा की भावना प्रबल थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर उन्होंने अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभक्ति के संस्कार पाए। यही संस्कार आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की रीढ़ बने। वे विचारों में दृढ़ थे, किंतु दृष्टि में उदार, और यही संतुलन उन्हें अन्य राजनेताओं से अलग करता है।
राजनीतिक जीवनः सिद्धांतों की राजनीति
अटल जी का राजनीतिक जीवन अवसरवाद नहीं, बल्कि सिद्धांतनिष्ठा का उदाहरण रहा। वे लंबे समय तक विपक्ष में रहे, किंतु कभी भी मर्यादा नहीं छोड़ी। संसद में उनकी भूमिका केवल विरोध करने की नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझाव देने की रही। वे मानते थे कि लोकतंत्र की मजबूती सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। तीन बार प्रधानमंत्री बनना उनके व्यक्तित्व पर जनता के अटूट विश्वास का प्रमाण है, विशेषकर गठबंधन राजनीति के कठिन दौर में।
प्रधानमंत्री के रूप में दूरदर्शी नेतृत्व
प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने साहसिक और ऐतिहासिक निर्णय लिए। पोखरण परमाणु परीक्षण ने भारत को सामरिक दृष्टि से आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। इसके साथ ही उन्होंने यह स्पष्ट संदेश भी दिया कि भारत शांति का पक्षधर है, परंतु अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा। उनके कार्यकाल में सड़क, संचार और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना ने देश के आर्थिक और औद्योगिक विकास को नई गति दी। उनका शासन ‘कम बोलो, ज़्यादा काम करो’ की भावना से प्रेरित था।
विदेश नीतिः संवाद और संतुलन
अटल जी की विदेश नीति का मूल मंत्र था-संवाद, संतुलन और सम्मान। उन्होंने पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधारने की ईमानदार कोशिश की। बस कूटनीति के माध्यम से शांति का संदेश देना उनके दूरदर्शी नेतृत्व का प्रतीक था। वैश्विक मंचों पर भारत की स्वतंत्र और आत्मसम्मान से भरी आवाज़ उनके नेतृत्व में और अधिक सशक्त हुई। वे मानते थे कि राष्ट्रों के संबंध केवल कूटनीति से नहीं, बल्कि मानवीय संपर्क से भी मजबूत होते हैं।
ओजस्वी वक्ता और संसदीय गरिमा
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय संसद के सर्वश्रेष्ठ वक्ताओं में गिने जाते हैं। उनकी वाणी में ओज, तर्क और शालीनता का अनूठा संतुलन था। वे तीखे से तीखे विषय को भी सौम्यता और विनोद के साथ प्रस्तुत करते थे। उनके भाषणों में तथ्यात्मक मजबूती के साथ भावनात्मक अपील होती थी। यही कारण था कि उनके विरोधी भी उनके भाषण सुनने को उत्सुक रहते थे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि असहमति भी सम्मानजनक हो सकती है।
कवि-हृदय और साहित्यिक व्यक्तित्व
अटल जी का कवि-हृदय उनके व्यक्तित्व का सबसे संवेदनशील पक्ष था। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, जीवन-संघर्ष, मानवीय करुणा और आशा का स्वर मुखर है। “हार नहीं मानूँगा” जैसी पंक्तियाँ उनके जीवन-दर्शन का घोष बन गईं। राजनीति की कठोरता के बीच कविता उनके लिए आत्मसंवाद का माध्यम थी। उनकी कविताएँ बताती हैं कि सत्ता के शिखर पर बैठा व्यक्ति भी भीतर से कितना संवेदनशील हो सकता है।
मानवीय मूल्य और व्यक्तिगत सादगी
अटल बिहारी वाजपेयी का निजी जीवन सादगी, संयम और विनम्रता का उदाहरण था। सत्ता और वैभव के बीच रहते हुए भी उन्होंने कभी अहंकार को स्थान नहीं दिया। उनके व्यवहार में करुणा, सहिष्णुता और उदारता स्पष्ट दिखाई देती थी। वे मतभेदों के बीच भी मनभेद नहीं होने देते थे। यही गुण उन्हें केवल नेता नहीं, बल्कि सच्चा लोकनायक बनाता है।
लोकतंत्र के सजग प्रहरी
अटल जी लोकतंत्र को केवल शासन-प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य मानते थे। वे प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की गरिमा और संसदीय परंपराओं के संरक्षण के प्रति सदैव सचेत रहे। उनका विश्वास था कि मजबूत लोकतंत्र वही है जिसमें असहमति का सम्मान हो, संवाद की गुंजाइश बनी रहे और सत्ता जवाबदेह हो। उन्होंने अपने आचरण से लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त किया।
विरासत और प्रेरणा
अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत केवल नीतियों या योजनाओं तक सीमित नहीं है। उनकी सबसे बड़ी देन है-राजनीति में नैतिकता, संवाद में शालीनता और सत्ता में संवेदना। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश छोड़ गए कि राजनीति को भी मानवीय बनाया जा सकता है।
अटल बिहारी वाजपेयी का बहुमुखी व्यक्तित्व भारतीय लोकतंत्र की अमूल्य धरोहर है। वे राजनीति में कविता की कोमलता और कविता में राजनीति की जिम्मेदारी लेकर आए। उनका जीवन इस सत्य को प्रमाणित करता है कि दृढ़ सिद्धांतों के साथ उदार हृदय और मानवीय संवेदना संभव है। अटल जी न केवल अपने समय के महान नेता थे, बल्कि वे सदैव भारत की आत्मा में जीवित रहने वाली प्रेरणा हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


रविवार, 21 दिसंबर 2025

लोकतंत्र की पाठशाला थे अटल जी

 25 दिसम्बर अटल जी के जन्मदिन पर विशेष लेख-


अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम हैं, जिनके साथ ‘क़िस्से’ केवल रोचक घटनाएँ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कारों की सीख भी हैं। उनके जीवन से जुड़े प्रसंग बताते हैं कि सत्ता में रहते हुए भी विनम्रता, संवाद और मानवीयता कैसे बचाए रखी जा सकती है। अटल जी के क़िस्से आज के शोरगुल भरे राजनीतिक माहौल में शालीनता का पाठ पढ़ाते हैं।
विरोध का सम्मानः संसद से सड़क तक
संसद में तीखी बहस के दौरान जब शोर-शराबा बढ़ जाता, अटल जी मुस्कराकर माहौल हल्का कर देते। एक बार विपक्ष के तीखे प्रहार पर उन्होंने कहा “लोकतंत्र में विरोध सरकार की कमजोरी नहीं, ताक़त होता है।” यह वाक्य केवल एक तात्कालिक टिप्पणी नहीं था, बल्कि उनके राजनीतिक दर्शन का सार था। वे असहमति को भी संवाद में बदलने की कला जानते थे।
ऐतिहासिक भाषणः देश पहले
1996 में विश्वास मत हारने के बाद संसद में दिया गया उनका वक्तव्य आज भी उद्धृत किया जाता है, “सरकारें आती-जाती रहती हैं, पार्टियाँ बनती-बिगड़ती रहती हैं, लेकिन देश रहना चाहिए।” यह क़िस्सा बताता है कि सत्ता उनके लिए साध्य नहीं, साधन थी; राष्ट्र सर्वोपरि था।
लाहौर बस यात्राः साहस का संदेश
जब अटल जी लाहौर बस यात्रा पर निकले, तो आलोचनाएँ भी हुईं। लेकिन उनका उत्तर सरल और दूरदर्शी था, “मित्र बदले जा सकते हैं, पड़ोसी नहीं।” यह प्रसंग बताता है कि वे जोखिम उठाने से नहीं घबराते थे, यदि उद्देश्य शांति और संवाद हो। उनके लिए कूटनीति केवल समझौते नहीं, भरोसे की पहल थी।
कवि का मन, प्रधानमंत्री का दायित्व
एक कार्यक्रम में उनसे पूछा गया, आप पहले क्या हैं, कवि या प्रधानमंत्री? अटल जी का उत्तर था, “प्रधानमंत्री संयोग से हूँ, कवि स्वभाव से।” सत्ता के उच्च शिखर पर बैठा व्यक्ति भी भीतर से संवेदनशील रचनाकार हो सकता है, यह क़िस्सा इसी सच्चाई को रेखांकित करता है।
हार में भी गरिमा
चुनावी पराजय के बाद कार्यकर्ताओं में निराशा थी। अटल जी ने कहाकृ?, “हार हमें और बेहतर बनने का अवसर देती है।” राजनीति में हार को भी सीख मानने का यह दृष्टिकोण उन्हें विशिष्ट बनाता है। वे जीत में संयमी और हार में धैर्यवान थे।
सादगी का प्रसंग
प्रधानमंत्री रहते हुए भी उनका जीवन सादा रहा। बताया जाता है कि देर रात तक फाइलों पर काम के बाद वे कुछ पंक्तियाँ लिख लेते थे, कविता उनके लिए थकान की दवा थी। यह क़िस्सा बताता है कि सत्ता उनके स्वभाव को नहीं बदल सकी।
विरोधी भी प्रशंसक
एक वरिष्ठ विपक्षी नेता का कथन चर्चित है, “हम अटल जी से राजनीतिक असहमति रख सकते हैं, लेकिन उनका अपमान नहीं कर सकते।” यह प्रसंग दर्शाता है कि उनका व्यक्तित्व दलगत सीमाओं से ऊपर था।
युवाओं के नाम संदेश
एक छात्र ने राजनीति में सफलता का सूत्र पूछा। अटल जी बोले, “पहले अच्छा इंसान बनो, नेता अपने आप बन जाओगे।” यह छोटा-सा क़िस्सा उनके जीवन-दर्शन को संक्षेप में रख देता है।
अटल बिहारी वाजपेयी के क़िस्से केवल स्मृतियाँ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की पाठशाला हैं। वे सिखाते हैं कि दृढ़ विचारों के साथ भी शालीनता संभव है, सत्ता के साथ भी संवेदना बची रह सकती है। आज जब राजनीति में कटुता बढ़ रही है, अटल जी के ये प्रसंग हमें याद दिलाते हैं कि संवाद, सम्मान और संयम ही लोकतंत्र की असली ताक़त हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


बुधवार, 17 दिसंबर 2025

जानलेवा कोहरा बना राष्ट्रीय चुनौती

 लेख-

भयावह आंकड़े, नुकसान और भविष्य की चेतावनी
भारत में सर्दी का मौसम आते ही एक अदृश्य लेकिन अत्यंत घातक संकट जन्म लेता है, घना कोहरा। यह केवल मौसम की सामान्य स्थिति नहीं रहा, बल्कि अब यह जान-माल के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। हर वर्ष दिसंबर से जनवरी के बीच देश के अनेक हिस्सों में कोहरा सड़क, रेल और हवाई यातायात को बुरी तरह प्रभावित करता है। इसके कारण सैकड़ों लोग अपनी जान गंवाते हैं और हजारों घायल होते हैं। हाल के वर्षों में कोहरे से जुड़ी दुर्घटनाओं के आंकड़े इस समस्या की भयावहता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
भारत में कोहरे से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र
उत्तर भारत सबसे अधिक प्रभावित-दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड के तराई क्षेत्र कोहरे से सबसे अधिक प्रभावित रहते हैं। दिल्ली, नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, गुरुग्राम और फ़रीदाबाद में कई बार दृश्यता 20 से 50 मीटर तक सिमट जाती है। उत्तर प्रदेश के आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, यमुना एक्सप्रेसवे, मेरठ, मुरादाबाद, बरेली और कानपुर क्षेत्र में कोहरे के कारण बार-बार बड़े हादसे होते हैं। हरियाणा के करनाल, पानीपत, रोहतक, अंबाला और रेवाड़ी तथा पंजाब के लुधियाना और जालंधर में भी कोहरा जानलेवा साबित होता है।
अन्य क्षेत्र-उत्तराखंड के रुद्रपुर, काशीपुर, हरिद्वार जैसे तराई इलाकों में सुबह के समय घना कोहरा जनजीवन ठप कर देता है। हाल के वर्षों में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी कोहरे से दुर्घटनाएँ दर्ज की गई हैं।
कोहरे से होने वाली दुर्घटनाओं के भयावह आंकड़े
सरकारी और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कोहरा अब एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा संकट बन चुका है। भारत में हर साल 30,000 से अधिक सड़क दुर्घटनाएँ सीधे तौर पर कोहरे या अत्यधिक धुंध के कारण होती हैं। औसतन सर्दियों के मौसम में प्रतिदिन 14 लोगों की मौत कोहरे से जुड़ी दुर्घटनाओं में होती है। वर्ष 2019 में कोहरे के कारण लगभग 35,600 से अधिक सड़क हादसे दर्ज किए गए। वर्ष 2020 में यह संख्या घटकर 26,500 के आसपास रही, लेकिन इसके बाद फिर बढ़ने लगी। 2014 से 2021 के बीच कोहरे से जुड़ी दुर्घटनाओं में 5,700 से अधिक लोगों की मौत और 4,000 से अधिक लोग घायल हुए। अकेले 2021 में कोहरे से संबंधित सड़क हादसों में 13,000 से अधिक लोगों की जान गई।
हालिया घटनाएँ-यमुना एक्सप्रेसवे पर कोहरे के कारण हुई एक भीषण दुर्घटना में 13 लोगों की मौत और 100 से अधिक लोग घायल हुए। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर कोहरे से हुई चेन-कोलिजन में 4 लोगों की जान चली गई। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड में केवल कुछ ही दिनों में कोहरे से 20 से अधिक मौतें दर्ज की गईं। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि कोहरा केवल असुविधा नहीं, बल्कि घातक आपदा बन चुका है।
जान-माल और आर्थिक नुकसान
सड़क दुर्घटनाएँ-कोहरे में दृश्यता अचानक बहुत कम हो जाती है। चालक आगे चल रहे वाहन, मोड़ या अवरोध को समय पर नहीं देख पाते, जिससे मल्टी-व्हीकल टक्कर, बस और ट्रक पलटना, दोपहिया वाहन चालकों की मौत, पैदल यात्रियों का कुचला जाना
जैसी घटनाएँ होती हैं।
रेल और हवाई यातायात-कोहरे के कारण ट्रेनें कई-कई घंटे लेट होती हैं, सैकड़ों उड़ानें देरी से चलती हैं या रद्द हो जाती हैं, यात्रियों को भारी असुविधा और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है।
आर्थिक प्रभाव माल ढुलाई प्रभावित होती है। उद्योगों और व्यापार की गति धीमी पड़ जाती है। स्कूल, कॉलेज और कार्यालय देर से खुलते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कोहरा हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का अप्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान करता है।
स्वास्थ्य पर असर-कोहरा जब प्रदूषण के साथ मिलकर स्मॉग बनता है, तब दमा और अस्थमा के मरीजों की हालत बिगड़ती है। आँखों में जलन, एलर्जी और साँस की तकलीफ़ बढ़ती है। बच्चों और बुज़ुर्गों को विशेष खतरा होता है।
कोहरे के प्रमुख कारण
1. तापमान में तेज़ गिरावट
2. हवा की गति का कम होना
3. वातावरण में अधिक नमी
4. प्रदूषण और धूल कण
5. बढ़ता शहरीकरण और वाहन उत्सर्जन
प्रदूषण कोहरे को अधिक घना और लंबे समय तक टिकाऊ बना देता है, जिससे खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
कोहरे में सुरक्षा के आवश्यक उपाय-सड़क पर वाहन धीमी गति से चलाएँ। फॉग लाइट और लो-बीम हेडलाइट का प्रयोग करें। हाई-बीम का उपयोग न करें। आगे चल रही गाड़ी से पर्याप्त दूरी रखें। अत्यधिक कोहरे में यात्रा टाल दें। यात्रा से पहले मौसम विभाग की चेतावनी देखें। रात और सुबह तड़के यात्रा से बचें। वैकल्पिक समय और मार्ग अपनाएँ।
स्वास्थ्य सुरक्षा
बुज़ुर्ग, बच्चे और श्वास रोगी सुबह बाहर न निकलें
मास्क और चश्मे का उपयोग करें
भविष्य में कोहरे की स्थिति-मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण के कारण आने वाले वर्षों में कोहरे की अवधि और तीव्रता बढ़ सकती है। उत्तर भारत में लंबे समय तक घना कोहरा छाया रह सकता है। दुर्घटनाओं का जोखिम और बढ़ेगा। यदि प्रदूषण नियंत्रण, सड़क सुरक्षा तकनीक और जन-जागरूकता पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो कोहरा भविष्य में और अधिक जानलेवा बन सकता है। कोहरा अब मौसम की साधारण घटना नहीं, बल्कि एक गंभीर राष्ट्रीय चुनौती बन चुका है। हर साल हजारों दुर्घटनाएँ, सैकड़ों मौतें और भारी आर्थिक नुकसान इसकी भयावहता को दर्शाते हैं। सरकार, प्रशासन और नागरिक तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि सावधानी, तकनीक और जागरूकता के माध्यम से इस संकट से निपटा जाए। कोहरे में सावधानी ही जीवन की सुरक्षा है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

कथावाचन : धर्म या धंधा

 विशेष लेख-

भारत के कथावाचकों की बढ़ती दुनिया
भारत में कथावाचन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा है, जो सदियों से समाज को जोड़ने, अध्यात्म को सरल बनाने और जीवन मूल्यों को स्थापित करने का माध्यम रही है। वेदों-पुराणों में वर्णित कथाएँ, लोक परंपराएँ और भक्ति आंदोलन ने इस कला को समय के साथ और भी समृद्ध किया। किंतु 21वीं सदी में, विशेषकर पिछले दो दशकों में, कथावाचन एक नए स्वरूप में दिखाई देने लगा है, जहाँ यह सिर्फ “धर्मकार्य” नहीं रहा, बल्कि कई स्थानों पर “व्यवसाय” का रूप भी ले चुका है। फीस, लोकप्रियता, सोशल मीडिया का प्रभाव और हजारों-लाखों की भीड़ ने कथावाचन को एक बड़े उद्योग में बदल दिया है। इस बदलाव ने अनेक प्रश्न भी खड़े किए हैं। क्या कथावाचन अब भी शुद्ध आध्यात्मिक साधना है? या यह एक पेशा, मंच-कला और आर्थिक गतिविधि बन गया है?
कथावाचन का मूल स्वरूप : धर्म, भक्ति और जन-जागरण
प्राचीन भारत में कथा-वाचन सामाजिक ज्ञान-वितरण का प्रमुख साधन था। कथा-व्यास गाँवों-नगरों में जाकर रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, शिवपुराण जैसी कथाएँ सुनाते थे। यह सेवा-भावनाओं पर आधारित कार्य था, जहाँ कथावाचक को यथासंभव ‘दक्षिणा’ दी जाती थी, जो उनका जीवन-यापन सुनिश्चित करती थी। कथा का उद्देश्य था, धर्म का प्रचार, समाज में नैतिकता का संरक्षण और सामान्य लोगों को जीवन-दर्शन समझाना।
आज भी अनेक कथावाचक इसे सेवा ही मानते हैं और कोई निश्चित फीस नहीं लेते। कई संगठन और आश्रम कथाओं को मुफ्त आयोजित करते हैं। समाज में ऐसे व्यासों की संख्या कम नहीं है जो भक्ति को ही सर्वोपरि मानते हैं। परंतु समय के साथ-साथ, कथावाचन की प्रस्तुति शैली, मंच, आयोजन और लोकप्रियता ने इसे नया आर्थिक आयाम भी प्रदान किया है।
आधुनिक कथावाचन : मंच, मीडिया और बढ़ता व्यावसायीकरण
आधुनिक दौर में कथा अब केवल मंदिर या धर्मशाला तक सीमित नहीं रह गई। बड़े पंडाल, भव्य साउंड सिस्टम, एलईडी स्क्रीन, सोशल मीडिया लाइव स्ट्रीम और प्रचार-प्रसार के साथ यह बड़े आयोजनों में बदल चुकी है। लोकप्रिय कथावाचकों के कार्यक्रमों में लाखों की भीड़ उमड़ती है। आयोजक इसके लिए भारी खर्च करते हैं। आवास, यात्रा, मंच, पंडाल, भंडारा, सुरक्षा और मीडिया कवरेज। ऐसे में कथा-व्यास की फीस भी स्वाभाविक रूप से बढ़ी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज कथावाचन स्प्रिच्युअल एन्टरटेनमेंट और फेथ इवेंट इंडस्ट्री का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यहाँ यह समझना जरूरी है कि व्यावसायीकरण का अर्थ अनिवार्य रूप से नकारात्मक नहीं होता। यदि कथा के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन, अध्यात्मिक प्रेरणा और सांस्कृतिक एकता फैल रही है, तो यह उपयोगी भी है। परंतु फीस और संपत्ति को लेकर उठने वाले प्रश्नों ने बहस को गहरा किया है।
भारत के प्रसिद्ध कथावाचक और उनकी फीस
मीडिया रिपोर्टों के आधार पर आज भारत में कई कथावाचक अत्यधिक लोकप्रिय हैं और उनकी कथाओं के लिए बड़ी राशि खर्च की जाती है।
1. देवकीनंदन ठाकुर सबसे लोकप्रिय कथा-व्यासों में से एक, जिनकी फीस लगभग 10-12 लाख रुपए बताई जाती है। उनकी भक्ति व रसपूर्ण भाषा-शैली और बड़ी भीड़ उनकी विशेष पहचान है।
2. पं. प्रदीप मिश्रा (सीहोर) शिवपुराण कथा के लिए जाने जाते हैं। विभिन्न रिपोर्टों में उनकी फीस 10 लाख से 50 लाख तक बताई जाती है। शिवभक्ति की शैली ने उन्हें देशव्यापी पहचान दी है।
3. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर धाम) दिव्य दरबार शैली के कारण प्रख्यात। मीडिया के अनुसार एक कार्यक्रम की फीस 3 से 4 लाख के आसपास है।
4. अनिरुद्धाचार्य जी भागवत और रामकथा के लोकप्रिय व्यास, जिनकी अनुमानित फीस 12 से 15 लाख मानी जाती है।
5. जया किशोरी जी युवा कथावाचक, जिनकी कथा व भजन दोनों अत्यंत लोकप्रिय हैं। फीस 8 से 12 लाख बताई जाती है।
6. मोरारी बापू विश्वप्रसिद्ध रामकथाकार, जो किसी प्रकार की फीस नहीं लेते। वे कथा को साधना मानते हैं।
इन कथावाचकों के मंच इतने बड़े हो गए हैं कि कई बार पूरा आयोजन करोड़ों तक पहुँच जाता है। इसमें कथा-व्यास की फीस के अलावा पंडाल, ध्वनि, मंच, भोजन और भी बहुत कुछ शामिल होता है।
कथावाचकों की अनुमानित संपत्ति : मीडिया-आधारित आँकड़े
कथावाचकों की वास्तविक संपत्ति आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं होती, इसलिए उपलब्ध सभी आंकड़े “अनुमानित” ही कहे जाते हैं। कई कथावाचकों की नेटवर्थ 10 करोड़ से 30 करोड़ के बीच बताई जाती है। कुछ लोग आश्रम, ट्रस्ट या चैरिटी के माध्यम से कार्य करते हैं, इसलिए उनकी व्यक्तिगत संपत्ति अलग नहीं आँकी जा सकती। कुछ कथावाचक कोई फीस नहीं लेते, पर कार्यक्रमों से जुड़े दान/दक्षिणा, संस्थागत सहयोग आदि से उनका आर्थिक ढांचा चलता है।
धर्म बनाम धंधा : मूल प्रश्न
अब बड़ा सवाल यह है कि कथावाचन धर्म है या धंधा? सच्चाई यह है कि धर्म उन कथावाचकों के लिए है जो कथा को सेवा मानकर करते हैं, समाज में आध्यात्मिक चेतना फैलाते हैं और वैदिक संस्कृति का प्रसार करते हैं। धंधा तब प्रतीत होता है जब फीस, शो-ऑफ, भीड़, चकाचौंध और प्रचार-मार्केटिंग कथा की मूल भावना पर हावी हो जाते हैं। ये दोनों स्थितियाँ आज एक साथ मौजूद हैं। कई बड़े कथावाचक अपार लोकप्रियता और भारी भीड़ के कारण अपने कार्यक्रमों को व्यवस्थित करने के लिए शुल्क लेते हैं, जो व्यावहारिक भी है। वहीं कुछ लोग इसे भक्ति के कारोबार में बदलने का आरोप भी लगाते हैं। इसलिए कहना उचित है कि आज का कथावाचन “धर्म $ प्रबंधन $ व्यवसाय” तीनों का मिश्रित रूप है।
कुमार विश्वास कथावाचक नहीं, बल्कि वक्ता और कवि
कई लोग मंचीय प्रस्तुति देखकर कुमार विश्वास का नाम कथावाचकों के साथ जोड़ देते हैं, पर यह गलत है। वे धार्मिक कथावाचक नहीं, बल्कि शायर, कवि और प्रेरक वक्ता हैं। उनकी मंच-शैली साहित्य, देशभक्ति और प्रेम-कविता पर आधारित है। फीस 5 से 10 लाख तक बताई जाती है, पर यह “कथा“ नहीं बल्कि “कवि सम्मेलन” और “स्पीच इवेंट” की श्रेणी में आता है। इसलिए उन्हें कथावाचकों की सूची में रखना उचित नहीं होगा।
समाज पर कथावाचन का प्रभाव
कथावाचन चाहे धर्म हो या व्यवसाय, यह आज भी करोड़ों लोगों के जीवन में भावनात्मक ऊर्जा भरता है। भक्ति रस और अध्यात्मिक विचार लोगों को शांति प्रदान करते हैं। सामाजिक सद्भाव, दान, सेवा और आध्यात्मिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है। कई कथावाचक समाज सेवा, गौसेवा, शिक्षा और चैरिटी कार्यों में भी सक्रिय हैं।
कथावाचन भारत की सांस्कृतिक धरोहर है। बदलते समय में इसका स्वरूप बदला है। एक ओर आध्यात्मिक परंपरा, दूसरी ओर आधुनिक आयोजन-व्यवस्था और आर्थिक ढांचा। यह कहना सही होगा कि आज कथावाचन न तो केवल धर्म है, न केवल धंधा, बल्कि “धार्मिक-सांस्कृतिक उद्योग” का एक नया रूप है, जहाँ भक्ति भी है और प्रबंधन भी। भारत के कथावाचकों की लोकप्रियता ने यह सिद्ध कर दिया है कि कथाएँ आज भी भारतीय समाज की आत्मा हैं, बस उनकी प्रस्तुति और मंच बदल गए हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

बुधवार, 10 दिसंबर 2025

दुनिया में बढ़ता डेटा-लीक संकट

 लेख-

भारत टॉप-3 देशों में शामिल
डिजिटल युग ने जहाँ मानव जीवन को आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधों के नए खतरे भी उतनी ही तेजी से सामने आए हैं। आज दुनिया का हर देश हजारों-लाखों टेराबाइट डेटा संग्रह कर रहा है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं बन पाई है। परिणामस्वरूप, डेटा-चोरी, डेटा-लीक और अनधिकृत डेटा-शेयरिंग विश्वभर में गंभीर संकट के रूप में उभर रहे हैं। 2024-25 की अंतरराष्ट्रीय साइबर रिपोर्टों से पता चलता है कि कुछ देशों में इन घटनाओं की मात्रा अन्य देशों की तुलना में कई गुना अधिक है। इसका मुख्य कारण इन देशों में डिजिटल अवसंरचना का विशाल विस्तार, बड़ी कंपनियों द्वारा डेटा-संग्रह का पैमाना, और साइबर सुरक्षा की चुनौतियाँ हैं। अमेरिका, चीन, रूस, भारत और ब्राज़ील देशों में डेटा-लीक की मात्रा केवल संख्या में ही नहीं, बल्कि उसके प्रभाव, वित्तीय लागत, पारदर्शिता और साइबर-हमलों की तीव्रता में भी अलग-अलग है।
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा डेटा-ब्रीच हॉटस्पॉट
अमेरिका लंबे समय से डेटा-लीक की घटनाओं में शीर्ष पर रहा है। 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में 489 बड़े सार्वजनिक डेटा-ब्रीच दर्ज किए गए, जबकि कुल वार्षिक घटनाओं की संख्या 4,600 से भी अधिक मानी जाती है। आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले कुछ वर्षों में ही अमेरिका से 5 अरब से अधिक डेटा-रिकॉर्ड्स लीक हुए। अमेरिका की यह स्थिति कई कारणों से बनती है। पहला, वहाँ डिजिटल अर्थव्यवस्था और ऑनलाइन सेवाओं का प्रसार सबसे अधिक है। दूसरा, हेल्थकेयर, फाइनेंस, ई-कॉमर्स और क्लाउड कंपनियों के पास अत्यंत संवेदनशील उपभोक्ता डेटा मौजूद रहता है, जिसे साइबर अपराधी बड़े मूल्य पर बेचते हैं। तीसरा, अमेरिका में घटनाओं का खुलासा अनिवार्य है, इसलिए अधिक मामले सार्वजनिक हो जाते हैं। इसके साथ एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अमेरिका में किसी डेटा-ब्रीच की औसत लागत 10.22 मिलियन डॉलर से अधिक है, जो दुनिया में सबसे ऊँची है। यह लागत संस्थाओं के लिए भारी बोझ बन जाती है, परंतु उपभोक्ता सुरक्षा के प्रति मजबूत कानूनी ढाँचा होने के कारण पारदर्शिता भी उच्च रहती है।
चीन सबसे अधिक अकाउंट-लीक वाला देश
यदि घटनाओं की संख्या नहीं, बल्कि ब्रीच्ड अकाउंट्स की बात करें, तो 2024 की वैश्विक रिपोर्ट में चीन दुनिया में पहले स्थान पर पाया गया। देश के कई बड़े सरकारी व निजी डेटाबेस, स्वास्थ्य, नागरिक पहचान, मोबाइल सेवाएं, ई-कॉमर्स, साइबर अपराधियों का प्रमुख निशाना रहते हैं। चीन में कई बार गलत कॉन्फ़िगरेशन, अपर्याप्त एन्क्रिप्शन और विशाल सामाजिक डेटा-प्लेटफॉर्म के कारण बड़े पैमाने पर अकाउंट-लीक होते हैं। अनुमान के अनुसार पिछले वर्षों में चीन से 2 अरब से अधिक रिकॉर्ड्स डार्कवेब पर उपलब्ध हुए। यहाँ डेटा-लीक का एक कारण यह भी है कि कई ब्रिचेज़ सरकारी संस्थानों पर होते हैं, और कुछ मामलों का सार्वजनिक खुलासा सीमित रूप में ही किया जाता है। इससे वास्तविक आँकड़े अनुमान से भी कहीं अधिक हो सकते हैं।
रूस डार्कवेब में सबसे अधिक उपलब्ध डेटा
रूस साइबर युद्ध, डिजिटल जासूसी और ऑनलाइन वित्तीय अपराधों के केंद्रों में से एक माना जाता है। कई अंतरराष्ट्रीय साइबर सुरक्षा कंपनियों की रिपोर्ट बताती हैं कि रूस से 4.5 अरब से अधिक डेटा-प्वाइंट्स लीक हुए, जो दुनिया में सबसे ज्यादा उपलब्ध “चोरी के डेटा“ की श्रेणी में आता है। रूस में डेटा-लीक के दो प्रमुख कारण हैं। पहला, देश के सरकारी, सैन्य और बैंकिंग ढाँचे को लेकर लगातार साइबर हमले किए जाते हैं। दूसरा, रूस के भीतर भी कई साइबर अपराधी समूह सक्रिय हैं जो डेटा चोरी कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेचते हैं। रूस की स्थिति यह दर्शाती है कि डेटा-सुरक्षा केवल तकनीक से नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक परिस्थितियों से भी प्रभावित होती है।
भारत तेजी से उभरता हुआ टॉप 3 डेटा-लीक देश
भारत में डिजिटल क्रांति ने सामाजिक व आर्थिक बदलाव को नई दिशा दी है। लेकिन इसी के साथ डेटा-ब्रीच की घटनाएँ भी बड़ी गति से बढ़ी हैं। 2024 की रिपोर्ट में भारत को तीसरा सबसे अधिक डेटा-ब्रीच वाला देश बताया गया, जहाँ 114 बड़े साइबर घटनाएँ दर्ज की गईं। भारत में लीक हुए रिकॉर्ड्स की संख्या कई रिपोर्टों में 30-50 करोड़ के बीच बताई जाती है। ज्यादातर हमले स्वास्थ्य, शिक्षा, टेलीकॉम, सरकारी पोर्टल्स और ऑनलाइन सेवाओं पर होते हैं। भारत में सबसे बड़ी समस्या थर्ड-पार्टी वेंडर सिक्योरिटी, कमजोर पासवर्ड नीति और असुरक्षित क्लाउड कॉन्फ़िगरेशन है। भारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश बन रहा है। आधार, यूपीआई, डिजिटल हेल्थ मिशन आदि। लेकिन जैसे-जैसे डेटा संग्रह बढ़ता जा रहा है, सुरक्षा चुनौती भी उसी गति से जटिल होती जा रही है। विश्व स्तर पर भारत की यह बढ़ती संवेदनशीलता चिंता का विषय तो है, लेकिन इसे सुधारने की संभावनाएँ भी उतनी ही अधिक हैं, क्योंकि देश साइबर कानूनों को तेज़ी से मजबूत कर रहा है।
ब्राज़ील लैटिन अमेरिका का सबसे बड़ा डेटा-लीक क्षेत्र
ब्राज़ील डिजिटल भुगतान और इंटरनेट उपयोग के मामले में लैटिन अमेरिका का अग्रणी देश है। हालाँकि, देश अभी भी डेटा सुरक्षा कानूनों को पूरी तरह लागू करने की प्रक्रिया में है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में ब्राज़ील से 20-40 करोड़ रिकॉर्ड्स लीक होने की घटनाएँ दर्ज की गईं और इसे वैश्विक स्तर पर टॉप-5 में स्थान मिला। ब्राज़ील की चुनौतियों में सबसे बड़ा तत्व है, मोबाइल बैंकिंग और ई-कॉमर्स का तेजी से विस्तार, लेकिन समान गति से साइबर सुरक्षा अवसंरचना का विकास न हो पाना। इसके कारण क्रेडिट कार्ड धोखाधड़ी, पहचान-चोरी और सोशल मीडिया डेटा एक्सपोज़र जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं।
सभी देशों के आँकड़ों की तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि डेटा-लीक की समस्या किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं है। लेकिन कुछ देशों में इसके कारण अलग-अलग हैं। कहीं पारदर्शिता अधिक है, तो कहीं डिजिटल रिकॉर्ड्स का आकार बड़ा, कहीं साइबर अपराधियों की गतिविधियाँ व्यापक हैं, और कहीं डेटा-सुरक्षा ढाँचा अभी निर्माण के चरण में है। संक्षेप में कहें तो अमेरिका घटनाओं की संख्या और वित्तीय नुकसान में सबसे आगे है। चीन ब्रीच्ड अकाउंट्स की श्रेणी में शीर्ष पर है। रूस डार्कवेब पर उपलब्ध चोरी के डेटा की मात्रा में अग्रणी है। भारत तीव्र गति से बढ़ती डेटा-लीक घटनाओं के कारण अब वैश्विक टॉप-3 में शामिल है। ब्राज़ील लैटिन अमेरिकी क्षेत्र में सबसे अधिक प्रभावित देश है।
इन आँकड़ों से यह निष्कर्ष निकलता है कि डिजिटल सुरक्षा अब वैश्विक चुनौती बन चुकी है। देशों को केवल तकनीकी सुरक्षा पर नहीं, बल्कि कानून, जागरूकता, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। डेटा-लीक की हर घटना सिर्फ एक संस्था का नुकसान नहीं होती, यह करोड़ों लोगों के निजी जीवन, आर्थिक सुरक्षा और डिजिटल विश्वास पर सीधा प्रहार करती है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)



सोमवार, 8 दिसंबर 2025

फिर कैसे हो वायु प्रदूषण पर नियंत्रण

 विशेष लेख-

अन्य देशों की तुलना में भारत का बजट सबसे कम
वायु प्रदूषण आज दुनिया के सामने खड़ी सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। दक्षिण एशिया, खासकर भारत, इस संकट का केंद्र बन गया है। दुनिया के कई देश प्रदूषण से लड़ने के लिए बड़े आर्थिक संसाधन, आधुनिक तकनीक और दीर्घकालिक योजनाएँ लागू कर रहे हैं। लेकिन जब भारत की स्थिति की तुलना इन देशों से की जाती है, तो यह स्पष्ट होता है कि हमारा बजट, संसाधन और क्रियान्वयन दुनिया के कई विकसित देशों की तुलना में काफ़ी कम है। यह अंतर न सिर्फ संख्या में दिखता है, बल्कि योजनाओं के प्रभाव और जमीन पर बदलाव में भी साफ़ झलकता है।
भारत का प्रदूषण-नियंत्रण बजटः कितना और कैसे
भारत में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बजट मुख्य रूप से पर्यावरण मंत्रालय और नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के माध्यम से जारी होता है। नवीनतम उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार-वर्ष 2025-26 के लिए पर्यावरण मंत्रालय का कुल बजट 3,413 करोड़ रुपए है। इसमें प्रदूषण नियंत्रण योजना के लिए 854 करोड़ है। 2019 से 2025 तक राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के लिए कुल आवंटन 19,711 करोड़ रुपए है। अगर इसे भारत की विशाल आबादी 142 करोड़ 132 से अधिक प्रदूषण-प्रभावित शहरों और देश की औद्योगिक-कृषि गतिविधियों के पैमाने से तुलना करें, तो यह खर्च अपर्याप्त माना जाता है। कई संसदीय रिपोर्टें बताती हैं कि आवंटित धन का भी पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता, कुछ वर्ष तो ऐसे रहे जब गतिविधियों, योजनाओं या प्रशासनिक प्रक्रियाओं की धीमी गति के कारण एक प्रतिशत से भी कम धन उपयोग हुआ। भारत का बजट यह संकेत देता है कि देश ने प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत तो कर दी है, लेकिन आवश्यक आर्थिक शक्ति और निरंतरता की दृष्टि से यह अभी भी काफी कम है।
दुनिया के प्रमुख देशों का बजटः भारत से कितनी दूरी
अब देखते हैं कि दुनिया के वे देश, जो प्रदूषण से जूझ चुके हैं और अब सफलतापूर्वक निपट रहे हैं, वे इस पर कितना खर्च कर रहे हैं।
1. चीन-सबसे बड़ा मजबूत उदाहरण-चीन एक समय दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में शामिल था, लेकिन 2013 के बाद उसने अभूतपूर्व बजट जारी किया। चीन ने वायु प्रदूषण एक्शन प्लान (2013-2017) के लिए लगभग $270 बिलियन यानी 22 लाख करोड़ खर्च किए। सिर्फ बीजिंग शहर ने ही प्रदूषण नियंत्रण, स्वच्छ ईंधन, उद्योग परिवर्तन और मॉनिटरिंग के लिए $120 बिलियन से अधिक निवेश किया। यह भारत के मुकाबले कई गुना अधिक है, न सिर्फ संख्या में बल्कि कार्यान्वयन की गति में भी। चीन की सफलता का बड़ा कारण यही भारी आर्थिक निवेश माना जाता है।
2. संयुक्त राज्य अमेरिका-अमेरिका में प्रदूषण नियंत्रण र्प्यावरण संरक्षण एजेंसी के माध्यम से होता है। इसका वार्षिक बजटः $9-10 बिलियन  यानी 75,000-80,000 करोड़ रुपए रहा। क्लीन एयर एक्ट कार्यक्रमों पर हर साल अरबों डॉलर खर्च किए जाते हैं। बड़े शहरों की वायु गुणवत्ता सुधार के लिए स्थानीय फ़ंडिंग भी समानांतर चलती है। यूएसए की तुलना में भारत का बजट बेहद कम नजर आता है।
3. यूरोपीय संघ-प्रदूषण नियंत्रण के लिए ग्रीन डील और जीरो पॉल्यूशन एक्शन प्लान पर विशाल निवेश किया जा रहा है। यूरोपीय ग्रीन डील के तहत कई वर्षों में कुल निवेश एक ट्रिलियन यानी 90 लाख करोड़ रुपए, वायु-गुणवत्ता सुधार के लिए केवल एक वर्ष में ही भारत के पूरे पर्यावरण बजट से कई गुना अधिक धन यूरोपीय संघ जारी करता है। स्थानीय निकाय, नगर निगम और सिविल समाज भी बड़े स्तर पर निवेश करते हैं।
4. दक्षिण कोरिया-सियोल दुनिया के प्रदूषित शहरों में शामिल था, लेकिन देश ने बड़े पैमाने पर निवेश बढ़ाया। पीएम 2.5 से निपटने के लिए वार्षिक खर्चः $2-3 बिलियन यानी 17,000-25,000 करोड़ रुपए, वायु शोधन, मॉनिटरिंग, इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन और सरकारी हस्तक्षेप में भारी खर्च। इन देशों की तुलना दर्शाती है कि भारत प्रदूषण-नियंत्रण पर बहुत कम निवेश कर रहा है, जबकि समस्या का पैमाना कहीं अधिक बड़ा है।
भारत की कम फ़ंडिंग चिंता का विषय
1. भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में शामिल है, इसलिए बजट “समस्या के अनुपात” में होना चाहिए।
2. भारत में 40 से अधिक शहर अक्सर दुनिया की प्रदूषण सूची में आते हैं, इसलिए बड़े क्षेत्र के लिए बड़े बजट की ज़रूरत है।
3. विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रदूषण से भारत में हर साल 10-12 लाख मौतें जुड़ी मानी जाती हैं, लेकिन स्वास्थ्य-जोखिम के अनुपात में खर्च बेहद कम है।
4. बड़े देशों की तुलना में भारत में आबादी बहुत अधिक है; प्रति व्यक्ति खर्च भी काफी कम है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना
देश प्रदूषण नियंत्रण वार्षिक/प्रधान खर्च भारत की तुलना
चीन $270 बिलियन$ (4-5 वर्षों में) भारत से दर्जनों गुना अधिक
यूएसए $10 बिलियन प्रति वर्ष भारत से 10 गुना अधिक
यूएई 1 ट्रिलियन मल्टी-ईयर भारत से बहुत विशाल अंतर
दक्षिण कोरिया $2-3 बिलियन प्रति वर्ष भारत से 20-30 गुना अधिक
भारत 854 करोड़ रुपए पदूषण नियंत्रण आवश्यकता की तुलना में अत्यल्प
भारत के पास योजनाएँ हैं, कार्यक्रम हैं और नीतियाँ भी हैं, लेकिन समस्या इतनी बड़ी है कि वर्तमान बजट उसके सामने बहुत छोटा पड़ता है। अन्य विकसित देशों ने प्रदूषण से लड़ने के लिए न सिर्फ भारी धन खर्च किया बल्कि मजबूत संस्थागत व्यवस्था, वैज्ञानिक मॉनिटरिंग और निवेश की निरंतरता बनाए रखी। भारत का बजट, आबादी के अनुपात, भूगोल और प्रदूषण स्तर की तुलना में अभी भी बहुत कम है। इसलिए जब भारत की तुलना चीन, यूरोप या अमेरिका जैसे देशों से की जाती है, तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि हमारा निवेश “समस्या के आकार” के अनुरूप नहीं है। यह स्थिति बताती है कि यदि भारत को वायु प्रदूषण जैसी बड़ी चुनौती से वास्तव में निपटना है तो आर्थिक निवेश को भी उसी स्तर पर बढ़ाना होगा जैसा दुनिया के प्रमुख देशों ने किया, तभी भारत अपने नागरिकों को स्वच्छ हवा और स्वस्थ जीवन का भरोसा दे सकेगा।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


रविवार, 7 दिसंबर 2025

पुस्तक और पुस्तकालय से बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव

 लेख-

मनुष्य के विकास का सबसे सशक्त आधार ज्ञान है, और ज्ञान का सबसे विश्वसनीय साधन पुस्तकें। बदलते समय में भले ही मोबाइल, टैबलेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से लोकप्रिय हुए हों, परंतु बच्चों के सर्वांगीण विकास की दृष्टि से पुस्तक और पुस्तकालय आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने सदियों पहले थे। पुस्तक न केवल ज्ञान का भंडार है, बल्कि यह बच्चे के मन, मस्तिष्क और व्यक्तित्व को निर्माण देने वाली अदृश्य गुरु भी है। वहीं पुस्तकालय वह वातावरण प्रदान करता है जहाँ बच्चे सीखने, समझने और विचार करने की स्वतंत्रता और प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
1. पुस्तकों से बौद्धिक विकास-पुस्तकें बच्चों की सोचने, समझने और विश्लेषण करने की क्षमता को बढ़ाती हैं। कहानी, विज्ञान, इतिहास, यात्रा-वृत्तांत, जीवनी जैसे विविध साहित्य बच्चों में जिज्ञासा, कल्पनाशीलता और तर्कशक्ति विकसित करते हैं। पढ़ने से बच्चे नई-नई अवधारणाओं, स्थानों, व्यक्तियों और संस्कृतियों से परिचित होते हैं। यह परिचय उनके दिमाग में नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। नियमित रूप से पढ़ने वाले बच्चों की एकाग्रता, स्मरण-शक्ति, भाषा कौशल और समस्या-समाधान क्षमता अन्य बच्चों की तुलना में अधिक विकसित पाई जाती है।
2. भाषा और अभिव्यक्ति का विकास-पुस्तकें बच्चे की भाषा को समृद्ध करती हैं। शब्दों का भंडार बढ़ता है, वाक्य गठन और अभिव्यक्ति की क्षमता में निखार आता है। कहानियाँ पढ़ते-पढ़ते बच्चे संवाद, भाव, वर्णन, तर्क और प्रस्तुति जैसे भाषाई रूपों को सहज रूप से सीख जाते हैं। एक अच्छा पाठक अक्सर एक अच्छा लेखक और वक्ता भी बनता है। इसलिए बच्चों को पुस्तकों से जोड़ना भाषा सीखने की प्रक्रिया को सहज, आनंदपूर्ण और प्रभावी बनाता है।
3. भावनात्मक और नैतिक विकास-कहानियों के पात्र बच्चों को जीवन के मूल्य सिखाते हैं। साहस, ईमानदारी, सहयोग, कर्तव्य, संवेदना, त्याग, मित्रता, ये सब पुस्तकें बच्चों के भीतर स्वाभाविक रूप से रोपती हैं। जब बच्चा कहानी के पात्रों के संघर्ष या संकल्प को पढ़ता है तो वह उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ता है। उनके निर्णयों और परिणामों से सीखकर अपने भीतर भी सही-गलत का विवेक विकसित करता है। इस प्रकार पुस्तकें बच्चे को केवल बुद्धिमान ही नहीं बनातीं, संवेदनशील और नैतिक चरित्र भी बनाती हैं।
4. कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का विस्तार-किताबें बच्चे को उस दुनिया में ले जाती हैं जहाँ कल्पना की कोई सीमा नहीं। परियों की कहानियाँ, रोमांचक यात्राएँ, भविष्य की विज्ञान-कथाएँ, रहस्य-रोमांच, सभी बच्चे की सृजनशीलता को उड़ान देते हैं। एक पुस्तक पढ़ते समय बच्चा स्वयं अपने दिमाग में चित्र, पात्र और दृश्य बना रहा होता है। यही अभ्यास आगे चलकर उसकी रचनात्मक सोच, कलात्मक क्षमता और नवाचार को बढ़ाता है।
5. पुस्तकालय, सीखने का प्रेरक वातावरण-पुस्तकालय केवल पुस्तकों का भंडार ही नहीं होता, बल्कि वह एक सांस्कृतिक और शैक्षणिक वातावरण है। जहाँ बच्चे शांत और अनुशासित माहौल में पढ़ते हैं, दूसरों को देखकर प्रेरित होते हैं, और ज्ञान से संवाद करने की कला सीखते हैं। पुस्तकालय में उपलब्ध विविध पुस्तकों से बच्चे अपनी पसंद का साहित्य चुनते हुए स्वायत्त सीखने की प्रक्रिया विकसित करते हैं। इसके अलावा, पुस्तकालय में आयोजित पुस्तक मेले, कहानी-सत्र, लेखन कार्यशालाएँ, चित्र-पुस्तक प्रदर्शनियाँ बच्चों को सीखने के नए तरीकों से परिचित कराती हैं।
6. डिजिटल युग में पुस्तकालय की भूमिका-आज जब बच्चे स्क्रीन पर अधिक समय बिताने लगे हैं, तब पुस्तकालय उन्हें विकल्प और संतुलन प्रदान करते हैं। डिजिटल सामग्री उपयोगी है, परंतु पुस्तक की गहराई और एकाग्रता का अनुभव उससे अलग है। इसलिए आधुनिक पुस्तकालय अब डिजिटल संसाधनों को भी सम्मिलित करते हुए हाइब्रिड लर्निंग स्पेस बन रहे हैं, जहाँ किताबें, ई-बुक्स, ऑडियो बुक्स और वर्कस्टेशनों की सुविधाएँ मिलकर सीखने को विस्तृत बनाती हैं।
7. सामाजिक और सहकर्मी विकास-पुस्तकालय में बच्चे केवल पढ़ते ही नहीं, बल्कि मिलते-जुलते, चर्चा करते और समूह में सीखते भी हैं। इससे उनके भीतर सहयोग, नेतृत्व और सामाजिक व्यवहार का विकास होता है। किसी पुस्तक पर समूह-वाचन या चर्चा बच्चों के भीतर आत्मविश्वास, विचार अभिव्यक्ति और सुनने की क्षमता को बढ़ाती है।
8. आत्म-अनुशासन और समय-प्रबंधन-पुस्तकालय की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका अनुशासित वातावरण है। यहाँ प्रवेश करते ही बच्चों के भीतर शांत, संयमित और एकाग्र रहने का भाव स्वयमेव पैदा होता है। नियत समय में पुस्तक लौटाना, पढ़ाई के लिए समय निकालना और लक्ष्य निर्धारित करके पढ़नाकृये सभी आदतें बच्चे को जिम्मेदार बनाती हैं।
9. पुस्तक व पुस्तकालय से व्यक्तित्व निर्माण-एक अच्छा पाठक अधिक जिज्ञासु, विवेकशील, संवेदनशील और आत्मविश्वासी बनता है। पुस्तकालय उसका सहयात्री और विकास का मंच बन जाता है। बच्चों में पढ़ने की संस्कृति विकसित होने से उनमें नेतृत्व, निर्णय क्षमता, आत्मचिंतन, और भविष्य दृष्टि जैसी महत्वपूर्ण क्षमताएँ स्वतः विकसित हो जाती हैं। यही कारण है कि विश्व के विकसित देशों ने पढ़ने की संस्कृति को विद्यालयों व समुदायों का मूल आधार बनाया है।
10. अभिभावक व शिक्षकों की भूमिका-एक पुस्तक तभी प्रभावी होती है जब बच्चे के हाथ तक पहुँचे। इसलिए अभिभावकों और शिक्षकों का दायित्व है कि वे बच्चों में पुस्तकों के प्रति उत्साह जगाएँ-
घर में छोटा-सा पुस्तक कोना
स्कूल में सक्रिय पुस्तकालय
हर सप्ताह पढ़ने का लक्ष्य
कहानी सुनाने और साझा करने की परंपरा

ये उपाय बच्चों को जीवनभर पढ़ने का साथी बना सकते हैं। पुस्तक और पुस्तकालय बच्चों के सर्वांगीण विकास की आधारशिला हैं। ये केवल ज्ञान नहीं देते, बल्कि बच्चे के व्यक्तित्व, बुद्धि, भावनाओं, भाषा, सामाजिक व्यवहार और रचनात्मकता, सभी को समग्र रूप में विकसित करते हैं। यदि समाज, विद्यालय और परिवार मिलकर बच्चों में पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करें तो निश्चय ही भविष्य एक ऐसे शिक्षित, संवेदनशील और नवोन्मेषी पीढ़ी का होगा जो पुस्तकों की रोशनी से जगमगाएगी।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

दुनिया में चीन का प्रदूषण घटा, भारत का चिंताजनक

 लेख-

दुनिया भर में वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सीधे लोगों की सेहत, अर्थव्यवस्था और जीवन प्रत्याशा को प्रभावित करने वाला बड़ा वैश्विक संकट बन चुका है। अनेक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें बताती हैं कि एशिया, विशेषकर दक्षिण एशिया, इस समय प्रदूषण के सबसे गंभीर प्रभाव झेल रहा है। इसी पृष्ठभूमि में जब हम “दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों” की सूची पर नज़र डालते हैं, तो भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक दिखाई देती है। हाल के वर्षों में भारत के कई शहर लगातार दुनिया की शीर्ष 10 या शीर्ष 20 प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल होते रहे हैं। यह स्थिति न सिर्फ पर्यावरणीय चुनौती का संकेत है, बल्कि यह जन स्वास्थ्य के लिए आज की सबसे बड़ी चेतावनी भी है।
वैश्विक रिपोर्टें और भारत-अंतरराष्ट्रीय संगठनों, जैसे आईक्यू एयर की वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट, डब्ल्यूएचओ की वायु गुणवत्ता सूचियाँ और कई देश-आधारित शोध, लगातार इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि दुनिया के अत्यधिक प्रदूषित शहर एशिया में केंद्रित हैं। इनमें सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन बताए जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों के आँकड़े यह भी स्पष्ट करते हैं कि भारत के शहरों ने इस सूची में सबसे ज्यादा स्थानों पर कब्ज़ा किया है। ताज़ा उपलब्ध रिपोर्ट (2024) में यह एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत के हैं। यह आँकड़ा अपने आपमें यह दर्शाता है कि वायु प्रदूषण का संकट अब भारत के लिए एक व्यापक भौगोलिक समस्या है, न कि केवल कुछ महानगरों तक सीमित। वैश्विक सूची में शामिल भारतीय शहरों में बड़े महानगरों के साथ-साथ कई मध्यम और छोटे शहर भी शामिल हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रदूषण का दायरा तेजी से फैल रहा है और यह देश के कई हिस्सों को प्रभावित कर रहा है। कई रिपोर्टों में गाजियाबाद, नोएडा, दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद, मुजफ्फरनगर, बेगूसराय और अन्य उत्तर भारतीय शहरों को उच्चतम प्रदूषण स्तर वाले शहरों में रखा गया है।
शीर्ष 10 शहरों में भारत की छवि-जब केवल शीर्ष 10 की बात की जाती है, तो स्थिति और गंभीर दिखाई देती है। 2024 की रिपोर्टों ने एक बार फिर दिखाया कि इनमें से कई शहर भारत के थे। दिल्ली, जो भारत की राजधानी है, दुनिया की “सबसे प्रदूषित राजधानी” के रूप में कई बार रैंक की गई है। कई वर्षों में पीएम 2.5 का औसत स्तर दिल्ली को दुनिया के शीर्ष 10 प्रदूषित शहरों की श्रेणी में बनाए रखने के लिए पर्याप्त रहा है। हालांकि कुछ वर्षों में रीयल-टाइम एक्यूआई या कुछ विशिष्ट मौसमीय परिस्थितियों के कारण अन्य शहर इसमें ऊपर या नीचे आते हैं, लेकिन समग्र स्थिति यही बताती है कि भारत के कई शहर अक्सर इस शीर्ष वर्ग में बने रहते हैं। ये केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं, बल्कि मध्य और पूर्वी भारत के हिस्सों में भी व्यापक स्तर पर देखे जाने लगे हैं।
क्यों चिंता का विषय है शीर्ष सूची में भारत का होना-विश्व स्वास्थ्य संगठनों के अनुसार, वायु प्रदूषण दुनिया में मृत्यु और बीमारियों का एक प्रमुख कारक बन चुका है। जब कोई शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल होता है, तो इसका अर्थ होता है कि वहाँ पीएम 2.5 जैसे प्रदूषक सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक हैं। लंबे समय में इसका सीधा असर लोगों की सेहत, उत्पादकता, मानसिक स्वास्थ्य और बच्चों के विकास पर पड़ता है। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि यहाँ सिर्फ एक या दो शहर नहीं, बल्कि दर्जनों शहर इस सूची में शामिल हैं। यह स्थिति बताती है कि समस्या स्थानीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर की है। उदाहरण के लिए एनसीआर में स्थित दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम, गाज़ियाबाद और फरीदाबाद, ये सभी शहर अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयाँ हैं, लेकिन सभी में हवा की गुणवत्ता लगभग एक जैसे खराब स्तर पर दर्ज होती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हवा का बहाव और वातावरणीय परिस्थितियाँ प्रदूषण को व्यापक क्षेत्र में फैलाती हैं।
भारत की जनसंख्या और भौगोलिक विस्तार का प्रभाव-भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। इतने बड़े जनसमूह का बड़े शहरों में एकत्र होना किसी भी प्रदूषण संबंधित समस्या को और गंभीर बना देता है। जब करोड़ों लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ हवा सुरक्षित सीमा से कई गुना खराब हो, तो यह स्वास्थ्य प्रणाली, आर्थिक उत्पादकता और जीवन प्रत्याशा पर गहरा प्रभाव डालता है। दुनिया के शीर्ष प्रदूषित शहरों में बड़ी संख्या में भारत के शहरों का शामिल होना यह दर्शाता है कि देश को व्यापक स्तर पर वायु प्रदूषण के जोखिमों से जूझना पड़ रहा है। कई अध्ययन कहते हैं कि भारत के बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की आयु 5 से 10 वर्ष तक कम हो सकती है, यदि वायु गुणवत्ता में सुधार न किया जाए।
भारत की स्थिति वैश्विक तुलना में कितनी गंभीर-दुनिया में कई विकासशील देशों को प्रदूषण की समस्या है, लेकिन भारत की स्थिति विशिष्ट इसलिए है क्योंकि-
1. भारत सूची में बार-बार और बहुत बड़े पैमाने पर आता है।
2. यहाँ केवल 1-2 नहीं, बल्कि 10, 12, 15 या कभी-कभी उससे भी अधिक शहर शीर्ष सूची में दर्ज होते हैं।
3. प्रदूषण केवल शहरी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर का संकट बन चुका है।
4. दुनिया के अन्य क्षेत्रों की तुलना में भारत के शहरों में पीएम 2.5 स्तर कई महीनों तक अत्यधिक ऊँचा रहता है।
सबसे प्रदूषित देशों की की सूची
1.चाड
2.बांग्लादेश
3.पाकिस्तान
4.डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो
5.भारत
6.ताजिकिस्तान
7.नेपाल
8.बहरीन, कुवैत
9.साउथ एशिया के भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश पिछले 25 सालों से लगातार विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित देश बने हुए हैं। चीन ने वर्ष 2015-25 में अपने प्रदूषण को आधा कर दिया है। जबकि अफ्रीका के देशों का प्रदूषण आंकड़ों में अब अधिक दिखने लगा है। क्योंकि इनकी मॉनीटरिंग बढ़ी है।
यह स्थिति साफ़ संकेत देती है कि भारत “वैश्विक वायु प्रदूषण संकट” का केंद्र बन चुका है। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में भारत की स्थिति चिंताजनक और विचारणीय है। शीर्ष 10 और शीर्ष 20 की सूची में भारत के इतने शहरों का होना सूचित करता है कि देश की हवा से जुड़ा संकट केवल स्थानीय पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य के लिए व्यापक खतरा बन चुका है। दुनिया के अत्यधिक प्रदूषित शहरों में शामिल होना सिर्फ एक रैंकिंग नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांसों पर मंडराता हुआ वास्तविक खतरा है। भारत के लिए यह समय गंभीर आत्मचिंतन और दीर्घकालिक रणनीति की मांग करता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा मिल सके और दुनिया की प्रदूषण सूची में भारत का स्थान किसी अन्य दिशा में बदल सके।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)


मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

दिल्ली-एनसीआर में स्थायी स्वास्थ्य का संकट

 विशेष लेख-

बढ़ते प्रदूषण ने बढ़ाया मौतों का आंकड़ा
दिल्ली-एनसीआर आज उस दौर से गुज़र रहा है जहाँ हवा की गुणवत्ता केवल पर्यावरण की समस्या नहीं रही, बल्कि सीधे जीवन और मृत्यु से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है। दुनिया के जिन शहरों में वायु प्रदूषण सबसे गंभीर माना जाता है, उनमें दिल्ली लगातार शीर्ष पर रही है। सर्दियों के महीनों में जब शहर धुँध और धुएँ से ढक जाता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि खराब हवा का हमारे जीवन पर असली प्रभाव क्या है। पिछले कुछ वर्षों में जारी रिपोर्टों ने इस प्रश्न का उत्तर काफी स्पष्ट कर दिया है, प्रदूषण लोगों की आयु घटा रहा है और मौतों की संख्या बढ़ा रहा है। इन आँकड़ों को देखने के बाद यह समझना कठिन नहीं कि दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण अब एक अस्थायी नहीं, बल्कि स्थायी स्वास्थ्य संकट बन चुका है। पिछले दस वर्षों का स्वास्थ्य रुझान साफ बताता है कि दिल्ली-एनसीआर की हवा ने लोगों के जीवन पर गहरा असर डाला है। 2018 में 15 हजार से अधिक और 2023 में 17 हजार से अधिक मौतें, ये संख्याएँ केवल सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि हर परिवार की सुरक्षा और भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न हैं। 2024 का आँकड़ा भले अभी उपलब्ध न हो, पर 2023 तक की तस्वीर ही यह जताने के लिए काफी है कि दिल्ली की हवा अब केवल एक मौसम समस्या नहीं, बल्कि एक लंबी और चुनौतीपूर्ण लड़ाई बन चुकी है।
2023ः मौतों के आँकड़े ने दी गंभीर चेतावनी
दिल्ली में प्रदूषण से होने वाली मौतों का सबसे ताज़ा और भरोसेमंद आँकड़ा वर्ष 2023 का है। वैश्विक संस्था इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मैट्रिक्स एंड इवैल्यूवेशन की रिपोर्ट बताती है कि 2023 में दिल्ली में 17,188 मौतें वायु प्रदूषण से संबंधित पाई गईं। इसका अर्थ है कि शहर में हुई कुल मौतों में से लगभग 15 प्रतिशत, यानी लगभग हर सात में से एक मौत, खराब हवा से जुड़ी रही। यह संख्या न केवल दिल्ली के लिए, बल्कि पूरे देश के स्वास्थ्य ढाँचे के लिए चेतावनी है, क्योंकि यह दिखाती है कि हवा की गुणवत्ता किस हद तक लोगों की जीवन-रेखा को प्रभावित कर चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है, ये मौतें अचानक नहीं होतीं। प्रदूषण का असर धीरे-धीरे शरीर पर जमा होता है। लंबे समय तक जहरीली हवा में रहने से फेफड़ों, हृदय और रक्त संचार प्रणाली पर गहरा असर पड़ता है। अस्पतालों में श्वसन और हृदय रोगों से जुड़े मरीजों की संख्या सर्दियों में बढ़ जाती है और कई मामलों में स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि लोग इलाज के दौरान दम तोड़ देते हैं। 2023 के रिकॉर्ड इस बढ़ते संकट का सबसे स्पष्ट प्रमाण बनकर सामने आए हैं।
2014 से 2023ः एक दशक जो हवा की बिगड़ती हालत का गवाह बना
यदि पिछले दस वर्षों के रुझानों का अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट है कि समस्या साल-दर-साल बढ़ती गई है। 2014 से ही दिल्ली का पीएम 2.5 स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर दर्ज होता आया है। यह दशक मानो प्रदूषण के स्थायी विस्तार का प्रमाण बन गया है। 2014-2017 के बीच कई शोध संस्थानों ने हजारों मौतों का अनुमान लगाना शुरू किया था। लेकिन 2018 से यह संख्या और बढ़ने लगी। 2018 में जारी एक विश्लेषण के अनुसार दिल्ली में प्रदूषण-संबंधी मौतों का अनुमान लगभग 15,700 था। यद्यपि यह संख्या अलग-अलग अध्ययनों में थोड़ी भिन्न दिखाई देती है, पर समग्र रुझान यही बताता है कि मौतों का बोझ उसी समय से ऊँचे स्तर पर पहुँचने लगा था। 2019 से 2021 तक यह स्थिति लगभग उसी चिंताजनक दायरे में बनी रही। 2020 में कोरोना-लॉकडाउन के दौरान कुछ महीनों के लिए हवा साफ दिखाई दी, लेकिन स्वास्थ्य से जुड़ा वार्षिक बोझ उल्लेखनीय रूप से कम नहीं हुआ। 2021 और 2022 में भी मौतों का अनुमान 15-16 हजार के आसपास ही रहा। 2023 इन सभी वर्षों में सबसे गंभीर रहा, जब मौतों का आंकड़ा 17,188 तक पहुँच गया। इससे यह साफ है कि पिछले दस वर्षों में समस्या रुकने के बजाय गहराती गई है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि दिल्ली की जनसंख्या, यातायात दबाव और मौसम संबंधी स्थितियों ने इस दौरान कोई बड़ी राहत नहीं दी, और सर्दियों में प्रदूषण का स्तर कई बार गंभीर श्रेणी से भी आगे निकल गया। 2024 में मौतों की संख्या कितनी रही। इसका सीधा उत्तर यह है कि 2024 का आधिकारिक मृत्यु-आँकड़ा अभी प्रकाशित नहीं हुआ है। स्वास्थ्य बोझ जैसी रिपोर्टें हमेशा एक वर्ष के अंतर से जारी होती हैं। यह प्रक्रिया इसलिए समय लेती है क्योंकि इसमें व्यापक डेटा जैसे अस्पताल रिकॉर्ड, स्वास्थ्य सर्वेक्षण, जनसंख्या परिवर्तन और प्रदूषण स्तर के वैज्ञानिक मॉडल सबको मिलाकर विश्लेषण किया जाता है।
विशेषज्ञों की राय
मौतों के बढ़ते ग्राफ़ का क्या मतलब-देश और विदेश के कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बढ़ते रुझान को बेहद चिंताजनक मानते हैं। उनके विचारों में कुछ महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। पहली बात, दिल्ली अब स्थायी स्वास्थ्य संकट के दौर में है। विशेषज्ञ बताते हैं कि लगातार खराब हवा शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर गहरा असर डालती है। प्रदूषण का प्रभाव केवल सांस तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे शरीर के कार्यों को प्रभावित करता है। इसलिए मौतों का बढ़ना स्वाभाविक परिणाम माना जा रहा है। दूसरी बात, बच्चों पर प्रदूषण का असर जीवन भर रहता है। कई डॉक्टर यह बताते हैं कि जिन बच्चों का बचपन अत्यधिक प्रदूषण वाली हवा में बीतता है, उनके फेफड़ों की क्षमता वयस्क होने पर भी पूरी नहीं बन पाती। इससे वे आगे चलकर कई बीमारियों के अधिक शिकार बनते हैं। तीसरी बात, मौतों का अनुमान वैज्ञानिक रूप से स्वीकार्य पद्धति है। अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि मृत्यु प्रमाण पत्र पर तो “प्रदूषण” नहीं लिखा होता, फिर ये आँकड़े कैसे तय होते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि दुनिया भर में स्वास्थ्य शोध में यह मान्य तरीका है कि बड़े पैमाने पर प्रदूषण स्तर और बीमारियों के बीच संबंध को मॉडलिंग द्वारा समझा जाता है। दिल्ली के मामले में यह संबंध अत्यंत मजबूत पाया गया है। चौथी बात, 2023 का आँकड़ा आने वाले खतरे का संकेत है। जब किसी शहर में एक वर्ष में 17 हजार से अधिक मौतें प्रदूषण से जुड़ी हों, तो यह शहर की जीवन-गुणवत्ता पर सीधा सवाल है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संख्या आने वाले वर्षों में बढ़ भी सकती है, यदि उपयुक्त कदम नहीं उठाए गए।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता प्रदूषण, बचाव के उपाय

 लेख-

हर साल सर्दियों के आते ही दिल्ली-एनसीआर एक बार फिर “गैस चैंबर” जैसी स्थिति का सामना करता है। हवा में घुला स्मॉग, धुंध की मोटी परत, धूप का न पहुँच पाना, सुबह-शाम की जलन और साँस लेने में कठिनाई, ये सब सर्दियों के प्रदूषण की पहचान बन चुके हैं। भारत के कई शहर प्रदूषण से जूझते हैं, पर दिल्ली-एनसीआर की भूगोल, जनसंख्या, उद्योग, वाहन-भार और मौसम इसे सबसे जोखिमपूर्ण क्षेत्रों में शामिल कर देते हैं।
1. सर्दियों में प्रदूषण क्यों बढ़ता है?
(1)तापमान-इन्वर्शन-सर्दियों में पृथ्वी का तापमान तेजी से गिरता है और ऊपर की हवा अपेक्षाकृत गर्म रहती है। इस स्थिति में प्रदूषक कण ऊँचाई की ओर नहीं उठ पाते और जमीन के पास ही फँस जाते हैं। हवा की परतें उलट जाती हैं, जिसे तापमान-इन्वर्शन कहते हैं। यह प्रदूषण को कई गुना बढ़ा देता है।
(2)हवा की गति बहुत कम होना-सर्दियों में उत्तरी भारत में हवा की गति कम होने से कणों का फैलाव रुक जाता है। प्रदूषक फैलने के बजाय एक ही क्षेत्र में जमते रहते हैं।
(3)स्मॉग-कोहरा पहले से मौजूद होता है। जब उसके साथ वाहन, औद्योगिक धुआँ, धूल, एसओटू-एनओएक्स, पीएम 2.5 जैसे कण जुड़ जाते हैं, तो स्मॉग बनता है, जो अधिक जहरीला और सघन होता है।
(4) पराली जलाना-अक्टूबर-नवंबर में पंजाब-हरियाणा में खेतों की पराली जलाने से भारी मात्रा में पीएम 2.5 और सीओटू दिल्ली की ओर पहुँचती है। सर्दियों की शुरुआत में हवा पश्चिम-उत्तर-पश्चिम से चलती है, इसलिए इसका अधिक प्रभाव दिल्ली-एनसीआर पर पड़ता है।
(5) वाहन और औद्योगिक उत्सर्जन-दिल्ली-एनसीआर में 1 करोड़ से अधिक वाहन और बड़ी संख्या में छोटे-बड़े उद्योग हैं। सर्दियों में हीटिंग, ट्रकों की बढ़ी आवाजाही और निर्माण-धूल भी प्रदूषण में योगदान देती हैं।
2. दिल्ली-एनसीआर की वर्तमान स्थिति
(1)एक्यूआई लगातार ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ में-सर्दियों के महीनों अक्टूबर से जनवरी में दिल्ली-एनसीआर में एक्यूआई अक्सर 300-450 के बीच रहता है। कुछ इलाकों में यह 500 तक पहुँच जाता है।
(2)स्वास्थ्य पर बढ़ते खतरे-आँखों व त्वचा में जलन, गले, फेफड़ों और नाक में सूजन, अस्थमा के मरीजों में अटैक बढ़ना, दिल-दिमाग पर असर, खून में ऑक्सीजन की कमी, बच्चों और बुजुर्गों में जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार पीएम 2.5 का अधिक स्तर दीर्घकाल में फेफड़ों का कमजोर होना, कैंसर, हृदय रोगों और समय पूर्व मौत तक का कारण बन सकता है।
(3) सामाजिक-आर्थिक प्रभाव-स्कूल बंद करने पड़ते हैं, उड़ानें देरी से उड़ती हैं, ट्रैफिक जाम और दृश्यता में गिरावट, दमा, एलर्जी, वायरल संक्रमण का बढ़ना, रोज़गार, निर्माण और व्यापार पर असर।
3. दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के बड़े स्रोत
(1)पराली जलाना-विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली के प्रदूषण में पराली का योगदान 25 से 40 प्रतिशत तक होता है।
(2)परिवहन 25 से 30 प्रतिशत-पुराने डीज़ल वाहन, भारी ट्रक, अनियमित ट्रैफिक और वाहनों की अत्यधिक संख्या प्रदूषण का मुख्य स्रोत हैं।
(3) निर्माण/धूल 15 से 20 प्रतिशत-सड़क धूल, निर्माण स्थल, कचरा जलाना और रिसाइकल यूनिट धूल को हवा में मिलाते रहते हैं।
(4) औद्योगिक उत्सर्जन 10 से 15 प्रतिशत-औद्योगिक धुआँ, कोयला/डीजल आधारित बॉयलर्स और छोटे उद्योग वायु को प्रदूषित करते हैं।
(5) कचरा जलाना-सर्दियों में नमी के चलते कचरा जलाने का धुआँ हवा में अधिक फैले बिना जमा हो जाता है।
4. सरकार और एजेंसियों के प्रमुख कदम
(1)ग्रेप यानी ग्रेडेड रेस्पांस एक्शन प्लान-एक्यूआई के स्तर के अनुसार अलग-अलग चरणों में निर्माण रोकना, डीज़ल जेनरेटर बंद, ट्रकों की एंट्री पर प्रतिबंध, स्कूल बंद, गाड़ियों की संख्या सीमित जैसे कदम उठाए जाते हैं।
(2)सीएक्यूएम यानी कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट-क्षेत्रीय निगरानी, वैज्ञानिक अध्ययन, औद्योगिक उत्सर्जन नियंत्रण और नियमों के पालन की निगरानी करता है।
(3) बीएस-6 ईंधन और ई-वाहनों का विस्तार-वाहनों के धुएँ को कम करने के लिए सख्त ईंधन मानक लागू किए गए हैं।
(4) पराली प्रबंधन योजनाएँ-हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, एसएमएएम सब्सिडी, बायो-एंजाइम और डीकम्पोजर, पराली खरीद/ऊर्जा संयंत्र प्रस्ताव, इनका विस्तार अभी भी धीमा है।
5. बचाव के उपाय (व्यक्तिगत, सामुदायिक, नीतिगत)
(।) व्यक्तिगत स्तर पर, एन95 या एन99 मास्क पहनना, सुबह-शाम बाहर घूमने से बचना, घर में एयर-प्यूरिफायर का उपयोग, पौधे, मनी-प्लांट, स्नेक-प्लांट, आरिका पाम जैसे इनडोर पौधे, पानी अधिक पीना, एंटी-ऑक्सीडेंट युक्त आहार, दमा/एलर्जी वाले मरीज डॉक्टर की सलाह से इनहेलर या दवा साथ रखें, बच्चे और बुजुर्ग कम से कम बाहर जाएँ।
(2) सामुदायिक स्तर पर, कचरा न जलाएँ और दूसरों को भी रोकें, निर्माण-स्थलों को ढककर रखना, धूल नियंत्रण, सोसाइटी स्तर पर ग्रीन-बेल्ट बनाना।
(3) नीतिगत या दीर्घकालिक उपाय, पराली को ऊर्जा-संयंत्रों में उपयोग करने की व्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन का विस्तार, ईवी पर इंसेंटिव, निर्माण-धूल पर सख्त नियंत्रण, औद्योगिक क्षेत्रों में रियल-टाइम मॉनिटरिंग, शहरी हरियाली (ग्रीन-कोरिडोर, सिटी-फॉरेस्ट), पूरे एनसीआर राज्यों का संयुक्त एक्शन-प्लान। सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण सिर्फ मौसम की वजह से नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियों, क्षेत्रीय कारकों और प्रशासनिक चुनौतियों का संयुक्त परिणाम है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी सर्दी आते ही स्मॉग और एक्यूआई में भारी गिरावट दिखाई देती है। यह समस्या हल तभी होगी जब सरकार, उद्योग, किसान, नागरिक सभी मिलकर इसे “साल भर चलने वाली लड़ाई” मानें। नियमों का पालन, तकनीकी उपाय, पराली का वैज्ञानिक प्रबंधन, सार्वजनिक परिवहन की मजबूती और जागरूक नागरिकता, यही वे रास्ते हैं जो दिल्ली-एनसीआर को सर्दी के प्रदूषण संकट से बाहर निकाल सकते हैं।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

पाकिस्तान में प्रधानमंत्रियों का इतिहास, वर्तमान स्थिति और माहौल

 विशेष लेख-

पाकिस्तान की राजनीति हमेशा से अस्थिरता, सत्ता संघर्ष और सैन्य प्रभाव के लिए जानी जाती रही है। इस पृष्ठभूमि में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान का उदय और पतन पाकिस्तान की समकालीन राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बन गया है। उनका कार्यकाल न केवल राजनीतिक घटनाओं से भरा रहा, बल्कि उनके हटने के बाद के हालात ने पूरे देश की लोकतांत्रिक संरचना पर गहरे प्रश्न खड़े कर दिए।
इमरान खान का उदय और परिवर्तन की राजनीति-इमरान खान ने क्रिकेट के मैदान पर विश्व कप जीतकर जो लोकप्रियता हासिल की, उसे उन्होंने राजनीति में परिवर्तन के संदेश के रूप में रूपांतरित किया। 1996 में उन्होंने अपनी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ की स्थापना की, लेकिन दो दशक तक यह एक छोटी, प्रभावहीन पार्टी बनी रही। 2013 के चुनावों में वे मुख्य विपक्ष बने और 2018 में उन्होंने “नया पाकिस्तान“ के वादे के साथ सत्ता हासिल की। उनका कार्यकाल तीन प्रमुख क्षेत्रों अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और सेना से संबंध के इर्द-गिर्द घूमता रहा। आर्थिक मोर्चे पर वे महँगाई, बेरोजगारी और आईएमएफ कर्ज पर निर्भरता को कम नहीं कर सके। विदेश नीति में वे चीन और तुर्की के करीब रहे, जबकि अमेरिका से रिश्ते उतार-चढ़ाव से गुजरे। सेना के साथ उनके शुरुआती मजबूत संबंध बाद में विवाद में बदल गए, खासकर सेना प्रमुख की नियुक्ति को लेकर।
सत्ता से हटने और जेल तक का सफर-अप्रैल 2022 में इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, जिसे वे बचा नहीं सके। यह पहला मौका था जब पाकिस्तान में किसी प्रधानमंत्री को संसद ने हटाया। इसके बाद उन पर कई कानूनी मामले दर्ज हुए, तोशाखाना, भ्रष्टाचार, साइफर और सरकारी गोपनीय दस्तावेजों से जुड़े मामले प्रमुख हैं। 2023-2025 के दौरान उन्हें कई बार सज़ाएँ सुनाई गईं और वे जेल में ही रहे। उनकी पार्टी पर आधिकारिक प्रतिबंध नहीं लगा, लेकिन उसके दफ्तरों, नेताओं और चुनाव चिह्न तक पर कई तरह के प्रतिबंध और दबाव बनाए गए। चुनावों में भी उनकी पार्टी को कई तकनीकी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी राजनीतिक शक्ति काफी सीमित हो गई।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों का इतिहास
पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास को समझने के लिए उसकी प्रधानमंत्री संस्था की स्थिति को देखना आवश्यक है। 1947 में देश की आज़ादी के बाद से आज तक कोई भी प्रधानमंत्री अपनी पाँच वर्ष की अवधि पूरी नहीं कर सका। यह पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
(क) प्रारंभिक दौर (1947-1958)-पहले प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान 1951 में हत्या का शिकार हो गए। इसके बाद सत्ता संघर्ष और संविधान की अनिश्चितता ने लगातार सरकारें गिराईं। 1958 में सेना प्रमुख अयूब खान ने मार्शल लॉ लगा दिया।
(ख)सैन्य शासन (1958-1971, 1977-1988, 1999-2008)-अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक़ और परवेज मुशर्रफ, इन चार सैन्य शासनों ने कुल मिलाकर 30 से अधिक वर्षों तक पाकिस्तान पर शासन किया। इन कालखंडों में लोकतंत्र कमजोर हुआ और नागरिक सरकारों को केवल नाममात्र की शक्ति मिलती रही।
(ग) लोकतांत्रिक प्रयोग और अस्थिरता (1988-2018)-इस दौर में कई महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री आए, बेनज़ीर भुट्टो पहली मुस्लिम महिला च्ड, दो बार हटाई गईं। नवाज़ शरीफ़, तीन बार पीएम बने, तीनों बार असमय हटे, कभी सेना से विवाद, कभी न्यायपालिका से। यूसुफ़ रज़ा गिलानी, न्यायालय ने हटाया। शाहिद खाक़ान अब्बासी, शौकत अज़ीज़, जफ़रुल्लाह जमाली जैसे नेता भी लंबी अवधि तक नहीं टिक सके। इमरान खान (2018-2022) उनका हटना भी अस्थिरता की इसी पुरानी परंपरा का एक और अध्याय बन गया। यह इतिहास दिखाता है कि पाकिस्तान में सत्ता का वास्तविक केंद्र हमेशा नागरिक सरकार नहीं बल्कि सेना, नौकरशाही और न्यायपालिका की संयुक्त संरचना रहा है।
पाकिस्तान का वर्तमान राजनीतिक माहौल (2024-2025)
(क)राजनीतिक परिदृश्य-2024-25 में पाकिस्तान में गठबंधन सरकार है, जिसे सेना का समर्थन प्राप्त माना जाता है। विपक्ष विभाजित और कमजोर स्थिति में है। सोशल मीडिया पर सेंसरशिप बढ़ी है और पत्रकारों व विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई तेज हुई है। संसद और न्यायपालिका में भी सत्ता संतुलन का संघर्ष देखा जा रहा है।
(ख)इमरान खान की भूमिका-हालाँकि वे जेल में हैं, पर उनके समर्थकों में नाराज़गी और उनके लिए सहानुभूति उच्च स्तर पर है। उनकी रिहाई या चुनावी वापसी की संभावनाएँ अभी अनिश्चित हैं, लेकिन पाकिस्तान की राजनीति में उनकी छाया अब भी मौजूद है।
आर्थिक स्थितिः संकट गहरा, समाधान अनिश्चित-पाकिस्तान 2024-25 में गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घटता रहा। महँगाई 20-28 प्रतिशत के आस-पास रही। आईएमएफ कार्यक्रमों ने कठोर आर्थिक शर्तें लगाईं, बिजली दरें बढ़ीं, टैक्स बढ़ाए गए। उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य बजट पर भारी दबाव पड़ा। जनता महँगाई से त्रस्त है और बेरोज़गारी उच्च स्तर पर है। चीन, सऊदी अरब और यूएई से आर्थिक मदद मिलती रही है, लेकिन यह दीर्घकालीन समाधान नहीं माना जाता।
सुरक्षा और सामाजिक माहौल-पाकिस्तान के कई क्षेत्रों विशेषकर खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और अफगान सीमा से लगे इलाकों में आतंकी घटनाएँ बढ़ी हैं। टीटीपी की सक्रियता ने सरकार और सेना की चुनौतियाँ बढ़ा दी हैं। सामाजिक तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित, मीडिया पर दबाव, राजनीतिक आवाज़ों पर कार्रवाई, विपक्ष पर अंकुश, ये स्थितियाँ आम हैं। जनता में भविष्य को लेकर अनिश्चितता का भाव गहरा है।
बड़ी चुनौतियाँ और संभावनाएँ
पाकिस्तान के सामने आने वाले वर्षों में तीन प्रमुख चुनौतियाँ हैं-
(1)राजनीतिक स्थिरता-जब तक नागरिक सरकार, न्यायपालिका और सेना के बीच संतुलन नहीं बनता, लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा। इमरान खान की जेल से रिहाई या राजनीतिक वापसी भी परिदृश्य बदल सकती है।
(2) आर्थिक मजबूती-अंतरराष्ट्रीय कर्ज, महँगाई और ऊर्जा संकट से बाहर निकलना सबसे कठिन कार्य होगा। चीन और गल्फ देशों की भूमिका अहम बनी रहेगी।
(3) सुरक्षा और सामरिक वातावरण-टीटीपी, बलूच विद्रोह और अफगानिस्तान की स्थिति पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करती रहेगी। इमरान खान की गिरफ्तारी, अस्थिर सरकार और आर्थिक संकट ये तीन कारक आज पाकिस्तान की राजनीति को परिभाषित कर रहे हैं। पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास यही बताता है कि वहाँ लोकतंत्र कभी भी सीधी रेखा में नहीं चला। वर्तमान माहौल भी उसी अस्थिरता और संघर्ष की निरंतरता है। फिर भी, पाकिस्तान की राजनीति में इमरान खान, सेना का प्रभाव, आर्थिक मददगार देशों का दबदबा और जनता की उम्मीद ये सब मिलकर आने वाले समय का नया अध्याय लिखेंगे।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

SIR भारतीय लोकतंत्र को नई दिशा देने वाली पहल

 विशेष लेख-

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ हर नागरिक का वोट देश की दिशा तय करता है। ऐसे में मतदान प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है मतदाता सूची। यदि मतदाता सूची सटीक और अद्यतन हो, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता और शक्ति दोनों बढ़ती हैं। लेकिन यदि सूची में त्रुटियाँ हों, नाम गायब हों, पता गलत हो, मृत व्यक्तियों के नाम बने रहें, तो चुनाव की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है। यही कारण है कि चुनाव आयोग ने हाल के वर्षों में मतदाता सूची सुधार नीति को एक प्रमुख सुधार के रूप में लागू किया है। यह नीति न केवल पारदर्शिता बढ़ाती है, बल्कि मतदाता को सशक्त भी बनाती है।
मतदाता सूची सुधार की आवश्यकता क्यों पड़ी-भारत की जनसंख्या विशाल है और लगातार स्थानांतरित होने वाली भी। लाखों लोग रोजगार, शिक्षा या विवाह के कारण हर साल अपना पता बदलते हैं। इन बदलावों के बीच अक्सर मतदाताओं का नाम गलत क्षेत्र में रह जाता है या बिल्कुल हट जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह समस्या और गंभीर हो जाती है, जहाँ डिजिटल जागरूकता कम होने के कारण सुधार प्रक्रिया तक लोगों की पहुँच भी सीमित है। 2019 में कई राज्यों में हजारों मतदाताओं के अचानक नाम गायब मिलने के मामले सामने आए, जिसके बाद चुनाव आयोग पर यह दबाव बढ़ा कि मतदाता सूची को डिजिटल, पारदर्शी, सटीक और सार्वजनिक नियंत्रित बनाया जाए। इसी आवश्यकता से जन्म हुई मतदाता सूची सुधार नीति की।
क्या है मतदाता सूची सुधार नीति
इस नीति के तहत चुनाव आयोग ने ऐसी व्यवस्थाएँ लागू की हैं जो मतदाता पंजीकरण को सरल, सुरक्षित और पारदर्शी बनाती हैं। इसके मुख्य प्रावधान निम्न हैं-
1.ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण और संशोधन-अब नागरिक अपना नाम जोड़ना, हटाना, पता बदलना या सुधार करना घर बैठे ऑनलाइन कर सकते हैं।
2.एआई आधारित डुप्लीकेट एंट्री हटाना-डुप्लीकेट वोटर आईडील और फर्जी प्रविष्टियों को हटाने के लिए उन्नत तकनीक का उपयोग।
3.मतदाता सूची का वार्षिक नहीं, बल्कि ‘चार बार संशोधन’-पहले साल में केवल एक बार संशोधन होता था, अब वर्ष में चार बार अवसर मिलता है।
4.पता और पहचान-ऑनलाइन दस्तावेजों से अब सत्यापन के लिए फिज़िकल दौड़ कम हो गई है।
5.बीएलओ को डिजिटल उपकरण (टैबलेट/ऐप)-घर-घर जाकर डेटा अपडेट करने का काम तेजी से और सटीक होता है।
6.ईपीआईसी को आधार से जोड़ने का विकल्प (स्वैच्छिक)-इससे फर्जी पहचान और डुप्लीकेट नाम रोकने में मदद मिलती है।
भारत के मतदाताओं पर इसका प्रभाव
1.मतदान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हुई-फर्जी मतदान और डुप्लीकेट नाम हटने से चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ी है। आज लोग मतदान के दौरान अधिक आत्मविश्वास महसूस करते हैं कि उनका वोट सुरक्षित है।
2.नए युवाओं का नाम आसानी से जुड़ रहा है-डिजिटल प्रक्रिया ने 18 प्लस युवाओं को सबसे अधिक लाभ दिया है। पहले सप्ताहों तक फॉर्म भरने और बीएलओ के चक्कर लगाने पड़ते थे, अब मोबाइल फोन ही पर्याप्त है।
3.प्रवासी और किराएदार मतदाताओं को राहत-जो लोग नौकरी या पढ़ाई के कारण दूसरे शहरों में रहते हैं, वे अब आसानी से अपने नए पते पर वोट ट्रांसफर कर सकते हैं।
4.मतदान प्रतिशत में सुधार-नाम सही जगह दर्ज होने और बूथ तक सरल पहुँच के कारण वास्तविक मतदाता चुनाव में अधिक संख्या में भाग ले रहे हैं।
5.गलतियों में कमी-जैसे, नाम की स्पेलिंग, आयु, पता, क्षेत्र, बूथ संख्या, ये त्रुटियाँ पहले आम थीं। अब डिजिटल वेरिफिकेशन से इनमें भारी कमी आई है।
कहाँ-कहाँ लागू हुई है यह नीति-यह सुधार नीति पूरे भारत में लागू है। हालाँकि कुछ विशेष प्रोजेक्ट कुछ राज्यों में पहले शुरू हुए जैसे दिल्ली, केरल, कर्नाटक, घर-घर सत्यापन का उन्नत मॉडल। तेलंगाना, गुजरात, महाराष्ट्र, डुप्लीकेट हटाने के लिए एआई आधारित पायलट, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बीएलओ मोबाइल ऐप का व्यापक उपयोग, अब यह मॉडल चुनाव आयोग की केंद्रीय गाइडलाइन के साथ सभी राज्यों में लागू है।
फिर भी कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं
1.डिजिटल पहुंच की असमानता-ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता सीमित है। इससे कई लोग ऑनलाइन सुधार प्रक्रिया का उपयोग नहीं कर पाते।
2.प्रवासी कामगारों की बड़ी संख्या-भारत के लगभग 30 करोड़ आंतरिक प्रवासी हैं। हर बार पता बदलने पर उनकी प्रविष्टि अपडेट करना एक बड़ी चुनौती है।
3.बीएलओ पर अत्यधिक कार्यभार-देशभर में लाखों बहएलओ ही फील्ड में पूरा काम संभालते हैं। संसाधन और स्टाफ की कमी के कारण कई जगह त्रुटियाँ रह जाती हैं।
4.राजनीतिक दबाव और स्थानीय हस्तक्षेप-कुछ क्षेत्रों में मतदाता सूची के सुधार पर राजनीतिक दबाव भी देखने को मिलता है।
5.डुप्लीकेट हटाने में तकनीकी त्रुटियाँ-एआई प्रणाली कभी-कभी सही मतदाताओं के नाम भी गलती से डुप्लीकेट समझकर हटा देती है।
समाधान क्या होना चाहिए
1.डिजिटल जागरूकता अभियान-गांव-गांव जाकर मतदाता सूची से नाम जोड़ने या सुधारने की प्रक्रिया के बारे में लोगों को जानकारी देना।
2.बीएलओ को अधिक संसाधन और तकनीकी समर्थन-टैबलेट, एआई आधारित ऐप, और स्टाफ बढ़ाने से त्रुटियाँ कम होंगी।
3.रिमोट वोटिंग सिस्टम लागू करना-प्रवासी कामगारों के लिए चुनाव आयोग आरवीएम मशीन का परीक्षण कर रहा है। यह लागू हो जाए तो करोड़ों लोग अपने शहर बदले बिना भी वोट डाल सकेंगे।
4.सार्वजनिक पारदर्शिता-मतदाता सूची को क्षेत्रवार ऑनलाइन उपलब्ध कराना, जिससे नागरिक त्रुटियाँ तुरंत पकड़ कर सुधार करा सकें।
5.राजनीतिक हस्तक्षेप रोकना-चुनाव आयोग को कार्यवाही की अधिक स्वतंत्रता और कानूनी शक्ति दी जानी चाहिए।
मतदाता सूची सुधार नीति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक कदम है। इससे चुनाव अधिक पारदर्शी हुए, फर्जी वोटिंग पर रोक लगी, नए मतदाताओं को सुविधा मिली, डिजिटल प्रणाली ने प्रक्रिया को सरल बनाया और लोकतंत्र में आम नागरिक का विश्वास मजबूत हुआ। हालाँकि चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, विशेषकर डिजिटल असमानता, प्रवासी कामगारों की समस्या और बीएलओ पर बढ़ता दबाव, लेकिन इनका समाधान भी नीति के साथ-साथ विकसित हो रहा है। एक बात स्पष्ट है, सटीक और अद्यतन मतदाता सूची ही लोकतंत्र की सच्ची नींव है। मतदाता सूची सुधार नीति उसी नींव को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)

बुधवार, 26 नवंबर 2025

भारत में घटे मगर टले नहीं आतंकवादी हमले

 लेख-

भारत एक विशाल, विविधतापूर्ण और भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील देश है। इसकी सीमाएँ पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश और म्याँमार जैसे देशों से मिलती हैं, जिनमें से कुछ क्षेत्रों में दशकों से सुरक्षा चुनौतियाँ मौजूद हैं। इन परिस्थितियों के कारण भारत को लंबे समय से विभिन्न प्रकार के आतंकवादी संगठनों और उग्रवादी आंदोलनों से जूझना पड़ा है। पिछले दस वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों ने अनेक सफलताएँ हासिल की हैं, लेकिन खतरे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
1. भारत में सक्रिय प्रमुख आतंकवादी नेटवर्क
भारत में आतंकवाद मुख्यतः तीन प्रकार की पृष्ठभूमियों से संचालित होता है-
(1) सीमा पार से प्रायोजित इस्लामिक आतंकवाद
(2) वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद), और
(3) क्षेत्रीय/अलगाववादी उग्रवाद
पाकिस्तान-आधारित आतंकवादी संगठन
भारत के लिए सबसे बड़ा और निरंतर खतरा पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों से आता है। इनमें प्रमुख हैं-लश्कर-ए-तैयबा , जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन। ये संगठन कश्मीर क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं और कई बार बड़े हमलों को अंजाम दे चुके हैं। इनकी फंडिंग, प्रशिक्षण और हथियारों की आपूर्ति पाकिस्तान के भीतर मौजूद ढाँचों से होती है।
आईएसआईएस और अल-कायदा की शाखाएँ
पिछले एक दशक में आईएसआईएस और अल-कायदा जैसे वैश्विक जिहादी संगठनों ने भारत में वैचारिक स्तर पर पैठ बनाने की कोशिश की है। हालांकि इनकी सक्रियता सीमित रही, लेकिन कई मॉड्यूल पकड़े गए और कुछ राज्यों में कट्टरपंथी गतिविधियाँ उजागर हुईं।
भारतीय मूल के इस्लामिक नेटवर्क
इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे संगठनों की गतिविधियाँ पिछली दशक में तेज थीं, परंतु सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाईयों से इनकी क्षमता बहुत कमजोर पड़ गई है।
वामपंथी उग्रवाद
छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और बिहार के कुछ हिस्सों में वामपंथी उग्रवाद पिछले 40 वर्षों से चुनौती बना हुआ है। यह आंदोलन भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए लंबे समय तक सबसे बड़ा खतरा माना जाता रहा, हालांकि पिछले पाँच-छह वर्षों में इसकी ताकत काफी कम हुई है।
उत्तर-पूर्व के अलगाववादी समूह
उल्फा, एनएससीएन और अन्य समूह वर्षों से सक्रिय रहे हैं। कई संगठन अब शांति वार्ता में हैं, जिससे इस क्षेत्र में हिंसा काफी कम हुई है।
खालिस्तानी समर्थक नेटवर्क
कनाडा, यूरोप और पाकिस्तान से चलने वाली कुछ गतिविधियाँ पंजाब तथा दिल्ली-एनसीआर के लिए खतरा पैदा करती हैं। ये संगठन मुख्यतः सोशल मीडिया और विदेशों में समर्थकों के सहारे नेटवर्क बनाते हैं।
2. दिल्ली-एनसीआर की आतंकवाद के संदर्भ में स्थिति
दिल्ली-एनसीआर देश की राजधानी होने के कारण हमेशा से संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यहाँ संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, दूतावास, बड़े सरकारी कार्यालय, ऐतिहासिक स्मारक और अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट जैसी महत्वपूर्ण जगहें मौजूद हैं। इसलिए आतंकवादी संगठनों की निगाहें इस क्षेत्र पर बनी रहती हैं।
पिछले वर्षों की प्रमुख चिंताएँ
सीमा पार से आने वाले मॉड्यूल कई बार दिल्ली-एनसीआर में पकड़े गए। खालिस्तानी समर्थित मॉड्यूल और गैंगस्टर-आतंकी गठजोड़ ने नए प्रकार का खतरा पैदा किया। आईएसआईएस से प्रेरित कुछ छोटे मॉड्यूल भी दिल्ली पुलिस व स्पेशल सेल ने उजागर किए। वर्ष 2025 में लाल क़िला क्षेत्र में हुए बम धमाके ने यह साबित किया कि राजधानी अभी भी शत्रुओं के निशाने पर है। दिल्ली पुलिस, एनआईए, रॉ और आईबी ने पिछले एक दशक में कई योजनाओं को विफल किया है, जिस कारण बड़े आतंकी हमले अपेक्षाकृत कम हुए हैं। परंतु राजधानी की सुरक्षा एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें नए खतरों को पहचानते रहना आवश्यक है।
3. पिछले 10 वर्षों (2015-2025) का परिदृश्य
(1) कश्मीर में आतंकवाद-कश्मीर घाटी पिछले दस वर्षों में सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा। 2016-2020 के बीच आतंकवादी गतिविधियाँ बढ़ीं। 2021 के बाद सुरक्षा बलों ने कई सफल ऑपरेशन किए। बड़ी संख्या में स्थानीय व विदेशी आतंकवादी मारे गए। कई मॉड्यूल पकड़े गए, हथियार बरामद हुए, और पाकिस्तान से चलने वाले नेटवर्क कमजोर पड़े।
(2) नक्सलवाद की स्थिति-2010 के मुकाबले 2024-2025 तक नक्सल हिंसा में लगभग 70 प्रतिशत तक कमी आई है। सैकड़ों उग्रवादी मुठभेड़ों में मारे गए। बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण हुए। कई राज्यों में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घट चुकी है।
(3) आईएसआईएस और कट्टरपंथ से प्रेरित गिरफ्तारियाँ-कर्नाटक, महाराष्ट्र, केरल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में दस वर्षों में कई मॉड्यूल पकड़े गए। इनकी संख्या कम थी, परंतु यह प्रकार “लोन वुल्फ” शैली के हमलों के कारण खतरनाक माने गए।
(4) खालिस्तानी नेटवर्क और गैंगस्टर गठजोड़-पिछले कुछ वर्षों में यह खतरा तेजी से उभरा है। एनआईए, दिल्ली पुलिस और पंजाब पुलिस ने कई मॉड्यूल पकड़े हैं। सोशल मीडिया और विदेशों से संचालित गतिविधियाँ इस खतरे का नया स्वरूप हैं।
4. पिछले 10 वर्षों में आतंकियों की मौत और गिरफ्तारियाँ   
जम्मू-कश्मीर में हर वर्ष 100-200 के बीच आतंकवादी मुठभेड़ों में मारे जाते रहे हैं (वर्ष विशेष के अनुसार उतार-चढ़ाव)। नक्सल क्षेत्र में पिछले दस वर्षों में सैकड़ों उग्रवादी ढेर हुए और हज़ारों ने आत्मसमर्पण किया। आईएसआईएस, आईमी अन्य मॉड्यूल की लगभग हर वर्ष 20-40 के बीच गिरफ्तारियाँ दर्ज हुईं। दिल्ली-एनसीआर में अधिकांश मॉड्यूल “गिरफ्तारी” चरण में पकड़े गए, जिससे बड़े हमले रोके जा सके। कुल मिलाकर पिछले दशक में भारत ने आतंकवाद-निरोधक मोर्चे पर बड़ी सफलता पाई है। देश की खुफिया क्षमताएँ, निगरानी सिस्टम, पुलिस आधुनिकीकरण और एनआईए जैसी जांच एजेंसियों की दक्षता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
5. वर्तमान चुनौतियाँ और समाधान
चुनौतियाँ-सीमा पार से निरंतर प्रायोजित नेटवर्क। साइबर/सोशल मीडिया माध्यम से कट्टरपंथ का प्रसार। गैंगस्टर-आतंकी गठजोड़ का उभरना। ड्रोन, डार्क-वेब और क्रिप्टो का दुरुपयोग। बड़े शहरों में छुपे ‘स्लीपर सेल’।
समाधान और प्रगति-तकनीकी निगरानी, एआई और ड्रोन आधारित सुरक्षा व्यवस्था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ा। सुरक्षा बलों का बेहतर समन्वय। युवाओं को कट्टरपंथ से बचाने के लिए सामाजिक-शैक्षणिक कार्यक्रम। यूएपीए एवं एनआईए अधिनियम जैसे क़ानूनों की मजबूती।
भारत ने पिछले दस वर्षों में आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक प्रगति की है। जहाँ कश्मीर और नक्सल क्षेत्रों में हिंसा में भारी कमी आई है, वहीं नए खतरों जैसे वैश्विक जिहादी विचारधारा, साइबर कट्टरपंथ और गैंगस्टर-समर्थित मॉड्यूल ने सुरक्षा ढांचे को और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता पैदा की है। दिल्ली-एनसीआर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को हमेशा ही उच्च सुरक्षा की आवश्यकता रहेगी, क्योंकि आतंकवादी नेटवर्क प्रतीकात्मक और रणनीतिक लक्ष्यों पर हमला करना चाहते हैं। आतंकवाद की चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, परंतु भारत की सुरक्षा एजेंसियों, खुफिया ढाँचे और लोगों की जागरूकता ने देश को काफी सुरक्षित बनाया है। आने वाले वर्षों में तकनीक और वैश्विक सहयोग इस लड़ाई को और मजबूत बनाएँगे।

लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)