कुनबा, जी हाँ समाज में इस शब्द का बड़ा महत्त्व है. कुनबा मतलब परिवार हो तो मकान भी घर की शक्ल ले लेता है. जंगल में
साधुओं के बीच कुनबा हो तो जंगल में मंगल हो जाता है। कुनबा राजनीति में भी होता है. इन दिनों लोकसभा चुनाव की बयार में सभी दल अपना कुनबा बनाने और बढ़ाने में लगे हैं. जिसे जैसा मौका और मुनाफा मिल रहा है, कुनबा बना भी रहा है, बढ़ा भी रहा है और बदल भी रहा है. केजरीवाल का अजब हाल है, बढ़ने के बजाय उनकी पार्टी का कुनबा घट रहा है. कोई कांग्रेस का हाथ थाम रहा है तो कोई बीजेपी को लपक रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे आप की हवा बनने की जगह वक़्त से पहले ही निकल गयी हो. बीजेपी को लग रहा है कि भैया यही सही मौका है जितनी शक्ति बढ़ानी- दिखानी है, बढ़ा-दिखा लो. मोदी का जादू बार-बार नहीं चलने वाला। पुराने घिस-पिट चुके आका चाहे नाराज़ हों या खुश, बस करते चलो हुश-हुश। कांग्रेस चाहकर भी बंधे हाथ नहीं खोल पा रही. कुनबा बढे तो बढे कैसे। अभी तक तो बस वोटर ही है जो नहीं बता रहा कि उसका कितना कुनबा वोट देगा, देगा भी या नहीं। अब कुछ भी हो, कुनबा दिखाने , बढ़ाने और बदलने का राजनीतिक महाकुम्भ जारी है. लोकसभा की गंगा में कौन नहायेगा, कौन कितने गोते लगाएगा ये तो वोटर ही बतायेगा लेकिन उंगली का चमत्कार ही होगा कि किसका कुनबा कितना बढ़ेगा। बस इंतज़ार, इंतज़ार, इंतज़ार करो, बस दो महीने और…।
चेतन आनंद
